हरिशंकर परसाई का जीवन परिचय - jivan parichay of harishankar parsai

Post Date : 29 April 2020

हरिशंकर परसाई का जीवन परिचय

आधुनिक युग के सशक्त व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई मध्य प्रदेश की साहित्यिक विभूति हैं। इस विभूति का आगमन इस संसार में 22 अगस्त, सन् 1924 को जमानी गाँव में हुआ। यह गाँव इटारसी के पास है। आपने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. किया।

कुछ वर्षों तक अध्यापन करने के बाद आप नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र लेखन में रत हो गये। आप जबलपुर से निकलने वाली 'वसुधा' नामक पत्रिका के सम्पादक रहे। आपका स्वास्थ्य यद्यपि बहुत खराब हो गया था, किन्तु आप अभी स्वस्थ हैं तथा अनवरत रूप से साहित्य सेवा कर रहे हैं। आपको उच्च अध्ययन हेतु म.प्र. सरकार द्वारा फैलोशिप प्रदान की गयी है।

रचनाएँ - आपकी प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तकें हैं - निबन्ध-संग्रह - (1) तब की बात और थी, (2) भूत के पाँव पीछे, (3) बेईमानी की परत, (4) पगडण्डियों का जमाना, (5) सदाचार का ताबीज, (6) शिकायत मुझे भी है, (7) और अन्त में । उपन्यास - (1) रानी नागफनी की कहानी, (2) तट की खोज। कहानी संग्रह – (1) हँसते हैं, रोते हैं, (2) जैसे उनके दिन फिरे आदि।

विषय-वस्तु

परसाई जी मुख्यत: व्यंग्यकार हैं। उनके निबन्ध के विषय चाहे सामाजिक हों या राजनीतिक सब में व्यंग्य समाया रहता है। व्यंग्य के पीछे सुधार की भावना छिपी रहती है। अतएव परसाई जी ने व्यक्ति, समाज व सरकार की कमजोरियों पर करारा व्यंग्य किया है। 

कबीर की तरह इन्होंने समाज की कमजोरियों पर तीखा व्यंग्य किया है। सामाजिक एवं राजनीतिक व्यंग्य लिखने में परसाई जी अत्यंत कुशल हैं। 'निन्दा रस' व्यंग्य की दृष्टि से उनकी अत्यन्त सफल रचना है। उनके तीखे व्यंग्य का उदाहरण देखें 

निन्दा की ऐसी महिमा है। दो - चार निन्दकों को एक जगह बैठकर निन्दा में निमग्न देखिए और तुलना कीजिए दो-चार ईश्वर भक्तों से, जो रामधुन लगा रहे हैं। निन्दकों की सी एकाग्रता, परस्पर आत्मीयता, निमग्नता, भक्तों में दुर्लभ है।

भाषा-शैली

परसाई जी की भाषा सरल पर धारदार है। उनके शब्द-शब्द में व्यंग्य के तेवर हैं। इनकी भाषा में तत्सम शब्दों की बहुलता नहीं है, न आग्रह है। उर्दू, फारसी तथा अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से इन्होंने किया है यथा - - उर्दू शब्द - सुबह, कमबख्त, आदतन आदि, अंग्रेजी- कैटलाग, मशीन, मिशनरी। परसाई जी की शैली व्यंग्यात्मक है। इसके साथ ही विवेचनात्मक शैली का भी उन्होंने प्रयोग किया है।

साहित्य में स्थान

परसाई जी हिन्दी के सशक्त व्यंग्यकार हैं। आधुनिक व्यंग्यकारों में इनका नाम शीर्ष स्थान पर लिखा जा सकता है। अभी इनकी लेखनी थकी नहीं है, हिन्दी को इनसे बड़ी आशाएँ हैं।