भूगोल किसे कहते हैं - what is geography in hindi

भूगोल देश की अर्थव्यस्था को प्रभावित करता हैं। जैसे प्राकृतिक आपदा हमे आर्थिक नुकसान पहुंचता हैं। वही अच्छी मानसून कृषि उत्पादन में सहायता करता हैं। भूगोल को अंग्रेजी में जियोग्राफी कहते हैं। जियोग्राफी शब्द दो ग्रीक शब्द जियो और ग्राफी से मिलकर बना है।

भूगोल किसे कहते हैं

भूगोल दो शब्दों भू + गोल से मिलकर बना है। जिसका कार्य पृथ्वी का वर्णन करना हैं। यह एक ऐसा विज्ञान है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के स्वरुप और उसके प्राकृतिक भागों जैसे पहाड़, नदी, समुद्रझील, वन, मानव समुदाय आदि का अध्ययन किया जाता है।

पृथ्वी की सतह में जो विषमता हैं, उनका स्पष्टीकरण भूगोल का निजी क्षेत्र है। भूगोल मानव और वातावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। 

साथ ही पृथ्वी की सतह के भौतिक गुणों और उस पर फैले मानव समाज भूगोल का विषय क्षेत्र हैं। भूगोल यह समझने का प्रयास करता है कि चीजें कहां पाई जाती हैं, वे वहां क्यों हैं और समय के साथ वे कैसे विकसित होती हैं।

भूगोल किसे कहते हैं - what is geography in hindi

जियोग्राफी शब्द प्राचीन यूनानियों से आया है। लेखों और मानचित्रों का वर्णन करने के लिए एक शब्द की आवश्यकता थी। ग्रीक में जियो का अर्थ है पृथ्वी और -ग्राफी का अर्थ है लिखना होता हैं। इस तरह जियोग्राफी शब्द का प्रयोग की शुरुआत हुयी थी। 

भूगोल सामान्य व्यक्ति भूगोल को पर्वत, पठार, मैदान, नदियाँ, सागर तथा राजनीतिक सीमाओं का अध्ययन ही समझते है किन्तु भूगोल समस्त विज्ञान का सार है। पहले भूगोल नक्षत्र शास्त्र का हा एक भाग था क्योंकि इसको विकसित करने का प्रयास यनान वासियों ने ही किया था। बाद में धीरे-धीरे अन्य देशों के विद्वानों ने इसका विकास करने में योगदान दिया। 

यह एक प्रगतिशील विज्ञान है जिसका अध्ययन पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही प्रारम्भ हो गया था, परन्तु इसका स्वरूप, अध्ययन-क्षेत्र और उद्देश्य परिवर्तित होते रहे हैं। प्रारम्भ में जियोग्राफी को Gco = Earth अर्थात् पृथ्वी तथा Graphy = Description अर्थात वर्णन करना माना जाता था। इसका अर्थ पृथ्वी का अध्ययन करने वाले विषय से था।

अतः प्राचीन काल में इसे पृथ्वी का वर्णन मात्र समझा जाता था। प्राचीनकाल में यूनान एवं रोम के अनेक विद्वानों ने महत्वपूर्ण भौगोलिक वर्णन प्रस्तुत किए, जिनमें अनेरजीमेण्डर, हेकेटियसं, अरस्त. इरेटॉस्थनीज, हैरोडोटस, हिप्पारकस, पोलिबियस. स्ट्रेबो तथा टालमा आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

भूगोल की परिभाषा

इरेटॉस्थनीज ने सर्वप्रथम 'ज्योग्राफिया' शब्द अर्थात् भूगोल शब्द का प्रयोग किया था। इसीलिए इन्हें भूगोल का जनक कहा जाता है। चलिए जानते है भूगोल की परिभाषा किन किन भूगोल वेत्ताओं ने दिया है। यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण परिभाषा को दिया गया है:

स्टैबो नामक महान भूगोलवेत्ता एवं इतिहासकार के अनुसार, "भूगोल एक ऐसा स्वतन्त्र विषय है, जिसका उद्देश्य लोगों के इस विश्व का, आकाशीय पिण्डों का तथा थल, महासागर, जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों और पृथ्वी के क्षेत्रों में देखी जाने वाली प्रत्येक अन्य वस्तु का ज्ञान प्राप्त करना था।" 

इमेनुअल काण्ट के अनुसार, "भूगोल धरातल का अध्ययन करता है तथा यह भूतल के विभिन्न भागों में पायी जाने वाली विभिन्नताओं की पृष्ठभूमि में की गयी व्याख्या का अध्ययन करता है। इसमें सभी घटनाओं के मध्य जटिल एवं क्रियाशील सम्बन्ध तथा अन्तर्सम्बन्ध पर विशेष ध्यान दिया जाता है।"

कार्ल रिटर के अनुसार, "भूगोल विज्ञान का वह भाग है जिसमें भूमण्डल के सभी लक्षणों, घटनाओं और उनके सम्बन्धों का, पृथ्वी को स्वतन्त्र रूप से मानते हुए वर्णन किया जाता है।" 

टॉलमी ने बताया कि भूगोल के अन्तर्गत बसे हुए भागों के अध्ययन के साथ-साथ पृथ्वी तथा ब्रह्माण्ड के आपसी सम्बन्धों का भी अध्ययन है। टॉलमी ने विश्व का सर्वप्रथम मानचित्र बनाया तथा उसे परिभाषित करते हुए लिखा कि "भूगोल एक ऊर्ध्वपातन विज्ञान है जो पृथ्वी का परावर्तन देखता है।"

हार्टशोर्न के अनुसार "भूगोल वह अनुशासन है, जो पृथ्वी को मानव का संसार मानकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर विभिन्न लक्षणों को वर्णन तथा व्याख्या के लिए खोजता है।"

मोकहाउस के अनुसार "भूगोल विज्ञान में पृथ्वी पर प्राकतिक तथा मानवीय दोनों प्रकार के तथ्यों के वितरणों और मानव निवास के रूप में पृथ्वी के धरातल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है।" 

अमेरिकी विद्वान एकरमैन के अनुसार "भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी तल पर समस्त मानव जाति एवं उसके प्राकतिक वातावरण की पारस्परिक क्रियाशी प्रणाली का अध्ययन है।" 

20 वी शताब्दी तक भूगोल के अध्ययन में प्रदेश, क्षेत्र तथा उनकी व्याख्या करना सम्मिलित हो गया था तथा इसके साथ-साथ मानव, स्थान तथा स्थानिक अध्ययन के महत्व को भी स्वीकारा किया जाने लगा था। आधुनिक भूगोल में मानव और वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों को दिखाया जाता है।

जीन बून्श का विचार है, "यह अब कोई वर्णनों की सूची नहीं, किन्तु यह एक इतिहास है। यह अब केवल स्थान मात्रों की गणना नहीं करता अपितु यह एक व्यवस्थित क्रमबद्ध विषय है। इसका उद्देश्य दोहरा है। कार्यशील तथ्यों के प्रत्यक्ष प्रभाव को  वर्गीकृत करना, उनको समझना और इन सभी तथ्यों का सम्मिलित प्रभाव क्या होगा यह निर्देशन करना है।"  

उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है 

  1. भूगोल पृथ्वी तल का अध्ययन है। 
  2. भूगोल पारिस्थितिकी का विज्ञान है। 
  3. भूगोल प्रादेशिक विषमताओं का अध्ययन है। 
  4. भूगोल स्थानिक संगठनों की संरचनाओं तथा पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन है।

17वीं शताब्दी में अनेक प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों के विकास की भाँति भूगोल का भी एक सुव्यवस्थित रूप स्पष्ट होने लगा। इस काल के विद्वान बाइबिल एवं धार्मिक चिन्तन के प्रभाव से मुक्त होकर स्वतन्त्र स्थायित्व के साथ तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत करने लगे। 

जर्मन विद्वान वारेनियस ने भूगोल में क्रमबद्ध पद्धति का आरम्भ होता है। उन्होंने पहली बार भूगोल को सामान्य भूगोल तथा विशिष्ट भूगोल नामक दो भागों में विभाजित किया। सामान्य भूगोल भौतिक है।

भूगोल के जनक कौन है

भूगोल के जनक इरेटोस्थनीज को कहा जाता है। क्योंकि इन्होंने सबसे पहले भूगोल को वैज्ञानिक ढंग से लोगों के सामने प्रस्तुत किया था। 

भूगोल ब्रह्मांड और उसकी विशेषताओं का एक व्यवस्थित अध्ययन है। भूगोल को कार्टोग्राफी या मानचित्र कला से जोड़ा जाता है। भूगोलवेत्ता अंतरिक्ष, प्रकृति, मनुष्य और उनके पर्यावरण की संबंध का अध्ययन हैं। भूगोल का विषय क्षेत्र मानते हैं।

क्योंकि अंतरिक्ष और स्थान विभिन्न विषयों को प्रभावित करते हैं, जैसे अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य, जलवायु, पौधे और जानवर, भूगोल अत्यधिक विस्तृत विषय है। भौगोलिक दृष्टिकोण का विषय प्रकृति भौतिक और मानवीय घटनाओं के बीच संबंधों पर ध्यान केंद्रित करती है।

हमारे पूर्वज जल की महत्व को समझ गए थे। इसलिए ज्यादातर शहर नदी या समुद्र के किनारे बसे हुए हैं। क्योंकि इस क्षेत्र में पानी और उपजाऊ मैदान आसानी से प्राप्त होते हैं। जो कृषि के लिए आवश्यक हैं। अतः पानी लोगो की प्राथमिक आवस्यकता में एक है।

पानी, भूमि, पहाड़, मैदान, कृषि, खनन कार्य और जलवायु किसी भी देश के विकाश के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। जो भूगोल का विषय क्षेत्र हैं। इस पोस्ट में भूगोल किसे कहते है और भूगोल के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे।

भूगोल कितने प्रकार के होते हैं

भूगोल को भूमि, मानव और पर्यावरण में घटित घटनाओं के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह विज्ञान पृथ्वी और मानवीय, भौतिक और पर्यावरणीय जटिलताओं की समझ की व्याख्या करता है। भूगोल को मुख्य रूप से तीन प्रकार में विभाजित किया गया है।

  1. भौतिक भूगोल 
  2. मानव भूगोल
  3. प्रादेशिक भूगोल 

भौतिक भूगोल क्या है

भौतिक भूगोल भूगोल की एक प्रमुख शाखा है जो पृथ्वी की भौतिक विशेषताओं से संबंधित है। यह केवल पृथ्वी की सतह पर ही नहीं बल्कि पृथ्वी के नीचे और पृथ्वी की सतह के चारों ओर की विशेषताओं तक सीमित है। भूगोल की इस शाखा को भौतिक विज्ञान भी कहा जाता है। 

इसका उद्देश्य भौतिक समस्याओं और स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल और वनस्पतियों और जीवों के मुद्दों को समझना है। भौतिक भूगोल पृथ्वी की ऋतुओं, जलवायु, वातावरण, मिट्टी, जलधाराओं, भू-आकृतियों और महासागरों का अध्ययन करता है।

भौतिक भूगोल क्या है what is geography in hindi

भौतिक भूगोल की परिभाषा

आर्थर होम्स के अनुसार भौतिक वातावरण का अध्ययन ही भौतिक भूगोल है, जिसके अन्तर्गत द्वीपों तथा सागरों व महासागरों की सागरीय तलहटियों के धरातलीय उच्चावच तथा वायु का अध्ययन किया जाता है।

आर्थर होम्स के अनुसार, भौतिक भूगोल में पर्यावरण के तीन तत्वों स्थल, जल एवं वायु का विवरण मिलता है।"

इमैनुअल काण्ट ने भौतिक भूगोल को विशेष महत्व प्रदान करते हुए उसको निम्न प्रकार से परिभाषित किया है।  भौतिक भूगोल विश्व के ज्ञान का प्रथम भाग है, यह वास्तव में सारभूत प्रारम्भिक तथ्य है जिसके द्वारा विश्व के वस्तुबोध को समझा जा सकता है।

ऊपर दी गई परिभाषाओं से स्पष्ट है कि भौतिक भूगोल का सम्बन्ध भौतिक परिस्थितियों से हैं। परिस्थितियाँ, भौतिक वातावरण तैयार करती हैं अतः भौतिक भूगोल में उस भौतिक वातावरण का ही अध्यनन किया जाता है । यह स्थल, जल एवं वायुमण्डल के सम्बन्धों के प्राकृतिक परिणाम का अध्ययन करता है।

भौतिक भूगोल का विषय क्षेत्र

भौतिक भूगोल की परिभाषाओं में ही इसका अध्ययन-क्षेत्र निहित है। भौतिक भूगोल अनेक भू-विज्ञानों का समन्वय है। इसमें भौतिक पर्यावरण तथा मानव के पारस्परिक सम्बन्धों का भी अध्ययन किया जाता है। भौतिक भूगोल मानव के समस्त प्रारूपों का विश्लेषण व प्राकतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है। 

प्राकृतिक पर्यावरण की भिन्नता को समझने के लिए शैलों की बनावट, मृदा, वनस्पति, खनिज पदार्थ, जलाशय तथा वायुमण्डल का अध्ययन किया जाता है। इसके अध्ययन-क्षेत्र में सम्पूर्ण पृथ्वी ही आ जाती है। पृथ्वी से तात्पर्य उसकी सतह, भूगर्भ एवं वायुमण्डल, स्थल, जल आदि से सम्बन्धित समस्त तत्वों का अध्ययन ही भौतिक भूगोल है।

स्थल अथवा सागर तलहटी में स्थित पृथ्वी के समस्त उच्चावच भौतिक भूगोल की परिधि में आते हैं। इन उच्चावचों का समग्र अध्ययन भौतिक भूगोल में किया जाता है। 

मानव अपनी समस्त क्रियाएँ इन्हीं उच्चावचों पर करता है, अतः इनका विस्तृत अध्ययन करना उसका परम दायित्व है। इस पृथ्वी पर रहकर ही मानव जीवित रहने के लिए साँस लेता है जो उसे वायुमण्डल से मिलती है। वायुमण्डल का अध्ययन मौसम एवं जलवायु विज्ञान में किया जाता है अतः ये सभी भौतिक भूगोल के अंग हैं।

पृथ्वी के उच्चावचों के आधार पर तीन भागो में बाँटा गया है

(1) प्रथम प्रकार के उच्चावच लक्षण - महाद्वीप एवं महासागर।
(2) द्वितीय प्रकार के उच्चावच लक्षण - पर्वत, पठार, मैदान, महासागरीय मैदान आदि।।
(3) तृतीय प्रकार के च्चावच लक्षण - घाटियाँ, जल- प्रपात, जलोढ़ पंख, बाढ़ के मैदान, डेल्टा आदि।

इन तीनों प्रकार के उच्चावचों का अध्ययन भौतिक भूगोल में किया जाता है। समस्त स्थलाकृतियों की उत्पत्ति एवं व्यवस्थित विकास का अध्ययन भूआकृति विज्ञान में किया जाता है अतः यह भी भौतिक भूगोल का अंग है। 
संक्षेप में कहा जा सकता है कि भौतिक भूगोल में सौर परिवार की उत्पत्ति, सूर्य, चन्द्रमा एवं पृथ्वी का सम्बन्ध।

भूगर्भिक चट्टानों की संरचना, भू-क्षरण, अपरदन चक्र, अपरदन, निक्षेपण के कारकों-नदी, हिमानी, पवन, भूमिगत जल आदि द्वारा निर्मित आकृति, गति, मृदा संरचना, विशेषताएँ एवं गुण आदि का अध्ययन इसमें किया जाता है। इसको विस्तार से समझने के लिए इसे विभिन्न शाखाओं में विभक्त किया गया है । 

खगोलीय शास्त्र, मिश्रित भौतिक विज्ञान, भू-आकृति विज्ञान,जलवायु विज्ञान, जल विज्ञान, समुद्र विज्ञान, हिमनद विज्ञान, मृदा भूगोल, जैव भूगोल एवं स्वास्थ्य भूगोल आदि। इन सभी का अध्ययन ही इसका अध्ययन-क्षेत्र है। स्पष्ट है कि भौतिक भूगोल का क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

भौतिक भूगोल की शाखा कौन सी है

भौतिक भूगोल का सम्बन्ध उन विषयों से है जो प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक वातावरण के तत्वों काअध्ययन करते हैं। इस प्रकार प्राकृतिक तथा सामाजिक दोनों विज्ञानों से भौतिक भूगोल का सम्बन्ध है। समस्त भूविज्ञानों का अपना विशिष्ट क्षेत्र होता है परन्तु उनकी संरचनाएँ अनिवार्य रूप से परस्पर व्याप्त होती हैं और एक-दूसरे के क्षेत्र का अतिक्रमण करती हैं।

पृथ्वी का आकार तथा विस्तार भूमापन विज्ञान से सम्बन्धित है तो पृथ्वी तथा सूर्य के सम्बन्ध ज्योतिषशास तथा भूगणित से सम्बन्धित हैं। 

भौतिक भूगोल इन विज्ञानों से इसलिए सम्बन्धित है। क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा जैसे आकाशीय पिण्ड पृथ्वी के भौतिक एवं जैविक पर्यावरण को प्रभावित करते है। सूर्य से विकरित होने वाली ऊर्जा से ही भूतल पर जीवों को पोषित करने वाली समस्त ऊर्जा धाराओं एवं पवन की समस्त प्रेरक शक्ति उपलब्ध होती है। 

सौर्थिक शक्ति की प्रखरता दैनिक एवं वार्षिक गति में घटती-बढ़ता रहती है। अतः सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के अपने अक्ष एवं कक्षा पर गतियों का ज्ञान भौतिक भूगोल में आवश्यक होता है। चन्द्रमा की गतियों तथा उसकी ज्वारीय शक्ति का अध्ययन समुद्र विज्ञान में किया जाता है।

भूविज्ञान में धरातल की बनावट, चट्टानें उनकी उत्पत्ति एवं वितरण, पृथ्वी का भूवैज्ञानिक कालक्रम, चट्टानों में पाये जाने वाले खनिज, पृथ्वी की आन्तरिक संरचना आदि का अध्ययन किया जाता है। 

भातिक भूगोल में भी पृथ्वी के धरातल का अध्ययन किया जाता है जिसका सम्बन्ध पृथ्वी की आन्तरिक संरचना से रहता है। चट्टानों में जो खनिज पाये जाते हैं, उनका भौतिक भूगोल में महत्वपूर्ण स्थान होता है। खनिजों एवं चट्टानों का निर्माण भूगर्भशास्त्र का भी अध्ययन क्षेत्र है। अतः इसका भूगर्भशास्त्र से निकट का सम्बन्ध है।

भूपटल पर स्थलरूपों का विकास आन्तरिक तथा बाह्य बलों द्वारा होता है। आन्तरिक बलों में पटल विरूपणी बल तथा ज्वालामुखी एवं भूकम्प क्रिया जैसे आकस्मिक बल महत्वपूर्ण होते हैं। 

यद्यपि इन बलों का सम्बन्ध भौतिक भौमिकी से है तथापि इन बलों का अध्ययन भूआकृति विज्ञान में स्थल रूपों के विकास को समझने में किया जाता है। जलीय एवं तटीय भूआकृति विज्ञान का अध्ययन तरल यान्त्रिकी और अवसाद विज्ञान से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। 

इसी भाँति शैल पुंज प्रवाह, अपक्षय, पवन के कार्य एवं मृदा का अध्ययन करते समय भौतिक भूगोलवेत्ता को वायुमण्डलीय विज्ञान, मृदा भौतिकी, मृदा-रसायन विज्ञान और मृदा-यान्त्रिकी जैसे विषयों का अध्ययन करना पड़ता है। स्थलरूपों के प्रकारों के अध्ययन में भौतिक एवं ज्वालामुखी विज्ञान के सिद्धान्तों एवं विधियों का अध्ययन अपरिहार्य हो जाता है।

भौतिक भूगोल में जैव जगत का अध्ययन किया जाता है । जीव-जन्तु मानव को भोज्य सामग्री, पहनने के लिए वस्त्र (खाल व समूर) तथा उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं। जन्तु विज्ञान में जीव-जन्तुओं के संवर्धन एवं उनके विकास का अध्ययन किया जाता है। इसलिए दोनों एक दूसरे के निकट हैं।

भौतिक भूगोल की शाखा कौन सी है

भौतिक भूगोल में निम्नलिखित उप-शाखाएँ हैं।

1. जीवविज्ञान - जीवविज्ञान भूगोल की एक शाखा के रूप में महत्वपूर्ण है जो दुनिया भर के प्राकृतिक आवासों पर प्रकाश डालती है। यह समझने में भी आवश्यक है कि प्रजातियां अपने वर्तमान स्थानों में क्यों हैं और दुनिया के प्राकृतिक आवासों की रक्षा कैसे किया जा सकता हैं। 

2. जलवायु विज्ञान - जलवायु विज्ञान जलवायु का अध्ययन है और यह समय के साथ कैसे बदलता है। यह विज्ञान लोगों को उन वायुमंडलीय स्थितियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है जो समय के साथ मौसम के मिजाज और तापमान में बदलाव का कारण बनती हैं।

3. तटीय भूगोल - किसी तट की सीमा, जहाँ भूमि जल से मिलती है। तटरेखा कहलाती है। एक समुद्र तट वह रेखा है जो भूमि और महासागर के बीच की सीमा बनाती है। लहरें, ज्वार और धाराएँ समुद्र तट बनाने में मदद करती हैं। इसका अध्ययन तटीय भूगोल में किया जाता हैं। 

4. भूविज्ञान - भूविज्ञान शब्द का अर्थ है 'पृथ्वी का अध्ययन'। इसे भूविज्ञान या पृथ्वी विज्ञान के रूप में भी जाना जाता है। भूविज्ञान प्राथमिक पृथ्वी विज्ञान है और यह देखता है कि पृथ्वी कैसे बनी, इसकी संरचना कैसे हुयी हैं।

5. भू-आकृति विज्ञान - भू-आकृति विज्ञान पृथ्वी की सतह पर भू-आकृतियों, उनकी प्रक्रियाओं, रूपों और तलछटों का अध्ययन है। अध्ययन में भू-दृश्यों को देखना शामिल है ताकि यह पता लगाया जा सके कि पृथ्वी की सतह की प्रक्रियाएं, जैसे हवा, पानी और बर्फ, परिदृश्य को कैसे ढाल सकती हैं।

6. जल विज्ञान - जल विज्ञान वह विज्ञान है जो पृथ्वी की सतह पर और पृथ्वी की सतह के नीचे के पानी का अध्ययन करता हैं। पानी के भौतिक और रासायनिक गुणों और पर्यावरण के मानव संबंध का भी अध्ययन किया जाता हैं। 

7. समुद्र विज्ञान - समुद्र विज्ञान समुद्र के सभी पहलुओं का अध्ययन है। समुद्र विज्ञान में समुद्री जीवन और पारिस्थितिक तंत्र से लेकर धाराओं और लहरों, तलछटों की आवाजाही और समुद्र तल भूविज्ञान तक विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।

मानव भूगोल क्या है

यह भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है जिसमें मुख्य रूप से मानव जाति का अध्ययन शामिल है। इसमें नस्ल, उनकी उत्पत्ति, प्रभावित करने वाली विभिन्न विचारधाराओं का अध्ययन शामिल है। 

इसमें इस बात का अध्ययन भी शामिल है कि कैसे लोगों के ये समूह उन जगहों पर खुद को व्यवस्थित करते हैं जहां वे रहते हैं। मानव भूगोल में मनुष्यों और समुदायों, संस्कृतियों, अर्थव्यवस्थाओं और पर्यावरण के साथ संबंध का विश्लेषण भी किया जाता है।

मानव भूगोल क्या है - what is geography in hindi

मानव भूगोल को कई व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है, जैसे -

  1. सांस्कृतिक भूगोल
  2. विकास भूगोल
  3. आर्थिक भूगोल
  4. स्वास्थ्य भूगोल
  5. ऐतिहासिक भूगोल
  6. भू-राजनीति भूगोल
  7. जनसांख्यिकी भूगोल
  8. धार्मिक भूगोल
  9. सामाजिक भूगोल
  10. परिवहन भूगोल
  11. पर्यटन भूगोल
  12. शहरी भूगोल

प्रादेशिक भूगोल क्या है

प्रादेशिक भूगोल मनुष्यों और उनके पर्यावरण के बीच संबंध के स्थानिक पहलुओं और इस संबंध के परिणामी प्रभावों का अध्ययन है। भूगोल की यह शाखा एक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की मानवीय गतिविधियों और इस क्षेत्र पर उनके परिणामी प्रभाव को समझने में मदद करती है।

प्रादेशिक भूगोल क्या है - what is geography in hindi

प्रादेशिक भूगोल भौतिक भूमि रूपों और मानव गतिविधियों के साथ उनके संबंधों को समझने में मदद करता है। यह शोधकर्ताओं को यह पहचानने में मदद करता है कि कौन सी मानवीय गतिविधियाँ भूमि के रूपों की ओर ले जाती हैं। 

प्रादेशिक को प्रभावित करने वाली कुछ गतिविधियों से कैसे बचा या प्रोत्साहित किया जा सकता है। प्रादेशिक भूगोल पर्यावरणीय गतिविधियों और उनके प्रसार के आधार पर बीमारियों के कारणों का अध्ययन करके जीवन को सरल बनाने में भी मदद करता है।

भूगोल का इतिहास 

भूगोल का उपयोग करते हुए यूनानियों ने यह जानने की चाहा की उनका देश अन्य अन्य देशों की तुलना में कहाँ स्थित हैं। वातावरण लोगों को कैसे प्रभावित करता हैं। ये विषय तब से भूगोल के केंद्र में रही हैं। केवल यूनानी ही भूगोल में रुचि रखने वाले लोग नहीं थे। पूरे मानव इतिहास में अधिकांश समुदाय ने दुनिया में उनके स्थान और उनके आसपास के लोगों और वातावरण के बारे में समझने की कोशिश की है।

कई जगहों पर नक्शा बनाने का काम शायद लिखने से पहले ही हो गया था। लेकिन प्राचीन यूनानी भूगोलवेत्ता विशेष रूप से प्रभावशाली थे। उन्होंने यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों सहित ग्रीस और उसके आसपास के क्षेत्रों का विस्तृत नक्शे विकसित किया। 

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने इस बारे में भी सवाल उठाए कि पृथ्वी की सतह पर विभिन्न मानव और प्राकृतिक कैसे और क्यों अस्तित्व में आए और क्षेत्रों में इतनी भिन्नताएं क्यों हैं।  

मध्य युग के दौरान भूगोल यूरोप में एक प्रमुख शैक्षणिक खोज नहीं रह गया था। भूगोल में प्रगति मुख्य रूप से अरब प्रायद्वीप और उत्तरी अफ्रीका के आसपास स्थित मुस्लिम दुनिया के वैज्ञानिकों द्वारा की गई थी। इस इस्लामी स्वर्ण युग के भूगोलवेत्ताओं ने ग्रिड के आधार पर दुनिया का पहला आयताकार नक्शा बनाया था। 

एक नक्शा प्रणाली जो आज भी प्रचलन में है। इस्लामी विद्वानों ने भी लोगों और स्थानों के अपने अध्ययन को कृषि में लागू किया। यह निर्धारित करते हुए कि कौन सी फसलें और पशुधन विशिष्ट आवास या वातावरण के लिए सबसे उपयुक्त हैं।

एशिया में चीनी साम्राज्य ने भी भूगोल में बहुत योगदान दिया। लगभग 1500 ईस्वी तक चीन पृथ्वी पर सबसे समृद्ध सभ्यता थी।  खासकर खगोल विज्ञान के क्षेत्र में चीनी वैज्ञानिक बहुत उन्नत थे। उन्होंने भूगोल के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण विकासों में से एक को भी हासिल किया।  

वे दिशा ज्ञान के लिए कंपास का उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे। 1400 के दशक की शुरुआत में चेंग हो ने चीन सागर और हिंद महासागर की सीमा पर यात्राओं की शुरुआत की जिससे पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में चीन का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

Search this blog