भारतीय जनजाति का वर्गीकरण - bhartiyan jankari ka vargikaran

Post Date : 31 March 2022

भारत एक विशाल क्षेत्र वाला देश है इसके अनेक भू भागों में बसने वाली जनजातियो को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता अतः इसके वर्गीकरण के आधार भी भिन्न भिन्न हैं।

भारतीय जनजाति का वर्गीकरण

भारतीय जनजातियों का वर्गीकरण सामान्यतः पांच आधार पर किया जाता है।

  1. भौगोलिक या क्षेत्रीय वर्गीकरण 
  2. प्रजातीय  वर्गीकरण
  3. सांस्कृतिक वर्गीकरण
  4. भाषा के अधार पर वर्गीकरण
  5. अर्थ व्यवस्था के अधार पर वर्गीकरण

क्षेत्रीय अधार पर जनजातियो का वर्गीकरण

भौगोलिक दृष्टि से भारतीय जनजातियों को कई भागों में विभाजित किया गया है जिसमें गुहा तथा मजूमदार का वर्गीकरण उल्लेखनीय है।

बी. सी. गुहा ने भारतीय जनजातियों को तीन बड़े भौगोलिक क्षेत्र में बांटा है।

1. उत्तरी उत्तर पूर्वी क्षेत्र जो की उत्तर में लेह से लेकर पूर्व में लुसाई पर्वत तक फैला हुआ है।

2. मध्यवर्ती क्षेत्र जो गंगा नदी के दक्षिण तथा कृष्णा नदी के उत्तर तक फैला हुआ है नर्मदा तथा गोदौवरी नदियों के बीच के पर्वतीय प्रदेश में अति प्राचीन काल की जनजातियां निवास करती हैं।

3. दक्षिण क्षेत्र में कृष्णा नदी में दक्षिण का प्रदेश है। दक्षिण प्रदेश के समस्त जनजातियां इसी क्षेत्र में आती हैं।

1. उत्तर तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र

उत्तर में शिमला, लेह, लुशाई की पहाडियाँ तथा पिरमी का प्रदेशआता है। कश्मीर का पूर्वी भाग, पूर्वी पंजाब , उत्तर प्रदेश, असम तथा सिक्किम भी इसी भाग में आते है।

इस प्रदेश में उल्लेखनीय जनजातियाँ लेपचा, डफला, पिरमी, गारो, खासी, नागा, कुकी, अबोर चकमा, गुरुंग आदि है ये जनजातियाँ सीमांत प्रदेश में बसे होने के कारण बहुत महत्वपूर्ण हैं।

लेपचा जनजाति सिक्किम और सीमावर्ती भारतीय क्षेत्रों में पाई जाती है इस क्षेत्र की अनेक जनजातियाँ अपनी विशेषता बनाये हुए है; जैसे-भोटिया लोग प्रसिद्ध व्यापारी होने के साथ-साथ हस्तकला में भी अत्यन्त निपुण है। थारू जनजाति में स्त्रियों में जादू की कुशलता सर्वविदित है।

नागा जनजाति ने भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। यह अपनी वीरता तथा युद्ध कुशलता के लिये प्रसिद्ध है। मणिपुर, त्रिपुरा और चटगाँव के पर्वतीय प्रदेश से लेकर बर्मा की अराकान पहाड़ियों तक कुकी, लुशाई, लाखेर और विन आदि जनजातियाँ रहती हैं। 

ये जनजातीय समूह तिब्बती तथा चीन परिवार की भाषा बोलते हैं। कुछ प्राचीन जनजातियाँ सिक्किम और दार्जिलिंग के उत्तरी भागों में रहती हैं जिनमें लेपचा तथा गलौंच विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इस क्षेत्र में निवास करने वाली गारो तथा खासी जनजातियों में मातृ सत्तात्मक परिवारों का प्रचलन है। देश के इस भू-भाग में रहने वाले समूह सीढ़ीनुमा खेतों पर कृषि कार्य करते है। कुछ समूह छोटे करघों पर बुनाई कला में भी निपुण होते हैं।

2. पश्चिमी  तथा उत्तर पश्चिमी क्षेत्र

इस क्षेत्र में पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा गुजरात की जनजातियाँ आती हैं। राजस्थान की जनजातियों में भील, मरसिया, मीणा तथा बंजारे प्रमुख हैं तथ गुजरात में महादेव कोली, कटकरी, वार्ली तथा डबला प्रमुख जनजातियाँ हैं। 

3. मध्यवर्ती प्रदेश

इस प्रदेश में देश की सर्वाधिक जनजातीय संख्या निवास करती है। इस प्रदेश में बिहार के संथाल, मुंडा, उरांव, बिरहोर, उड़ीसा के बोंदो, खोंड, सोरा तथा जवांग, मध्य प्रदेश के गोंड, बैगा, कोल, कोरकू, कमार, भूमिया आदि आते हैं। मध्य प्रदेश के गोंड सागर तथा बस्तर जिले में बहुतायत से पाये जाते हैं। 

बीसी गुहा का मानना है कि मध्यवर्ती क्षेत्र में रहने वाले ये जनजातीय समूह आर्थिक दृष्टि से दक्षिण की जनजातियों की अपेक्षा अधिक उन्नत हैं। ये समूह जो हिन्दू जातियों के पड़ोस में रहते हैं, व्यवस्थित रूप से कृषि करते हैं।

ये लोग हिन्दू जीवन पद्धति से अधिक प्रभावित हैं। छत्तीसगढ़ के कमार, रीवां के बैगा, मण्डला के भूमिया और महादेव पहाड़ों के कोरकू भी इसी क्षेत्र में पाये जाते हैं। सामान्यतया इस भूखण्ड में रहने वाले समूह पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था को मानते हैं।

4. दक्षिण क्षेत्र

गुहा ने कृष्णा नदी के दक्षिण में 16° उत्तरी अक्षांश तथा मजूमदार ने 20° उत्तरी अक्षांश के नीचे के भाग को दक्षिणी क्षेत्र माना है। इस क्षेत्र में मैसूर, ट्रावनकोर, कोचीन, आन्ध्र,
तमिलनाडु, कर्नाटक तथा केरल की जनजातियाँ सम्मिलित की जाती हैं।

इस प्रदेश में पाये जाने वाले जनजातीय समूहों में नीलगिरी के टोडा; वायनाड के बनियन, कादर; हैदराबाद के चेंचू, कूरोवन हैं। इसके अतिरिक्त चेट्ट, इरुला, कुरिचमा, कुरुम्बा, कादर तथा कैनी जनजातियाँ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। टोडा जनजाति में बहुपति प्रथा का प्रचलन आज भी देखने को I'm है।

अण्डमान तथा निकोबार टापुओं में अनेक जनजातीय समूह पाये जाते हैं। इनमें अण्डमानी, जरावा, जाखा, निकोबारी, सेंटीनली, ओंज आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत में फैली जनजातियों के विश्लेषण का एक आधार भौगोलिक भी माना जाता है। 

भौगोलिक परिस्थितियाँ अपनी विशिष्ट जलवायु तथा प्राकृतिक स्रोतों के परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की संस्कृति, रहन-सहन, वेशभूषा तथा आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं।

भारत की जनजातियों का भौगोलिक वर्गीकरण

अनेक विद्वानों जिनमें बी. सी. गुहा, मजूमदारमदान तथा एस. सी. दुबे प्रमुख हैं, ने भौगौलिक या प्रादेशिक अधार का वर्गीकरण किया है। यहाँ सभी के द्वारा प्रस्तुत वर्गीकर प्रस्तुत न करके मजूमदार तथा मदान का वर्गीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है। 

मजूमदार तथा मदान ने भौगालिक या प्रादेशिक आधार पर जनजातियों को तीन श्रेणियाँ वर्गीकृत किया है, जो निम्न प्रकार हैं -

1. उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र की जनजातियाँ 

यह क्षेत्र किनारों पर चौड़ा तथा बीच में सँकरा है। इसके पश्चिमी भाग में शिमला तथा लेह और पूर्वी भाग पर लुशाई पहाड़ियाँ व मिशनी पट्टी है। इस क्षेत्र के अन्तर्गत असोम, उत्तरी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पूर्वी पंजाब तथा कश्मीर का क्षेत्र आता है। इन क्षेत्रों के जनजातियाँ नागा, कुई मिजा, खासी, गारो, अबीरा, बाछ, भोटिया, लुशाई मिशनी, खस आदि प्रमुख हैं।

2. मध्य क्षेत्र की जनजातियाँ

इस क्षेत्र के अन्तर्गत पश्चिम बंगाल, दक्षिणी उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश और उड़ीसा क्षेत्र के अतिरिक्त उत्तरी तथा दक्षिणी राजस्थान तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख जनजाति उरांव, संथाल, गोंड, खरिया, हो, बैगा, खोड़, कमार, कोरकू, भील, सहरिया आदि हैं।

3. दक्षिणी क्षेत्र की जनजातियाँ

 इस क्षेत्र के अन्तर्गत मध्य क्षेत्र का दक्षिणी-पूर्वी भाग स्थित है। इस क्षेत्र में हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश), मैसूर-कुर्ग (कर्नाटक), त्रावनकोर कोचीन (केरल) और चेन्नई (तमिलनाडु) आते हैं तथा यहाँ चेचूकोया, कापू, येनाडी, टोडा, कोटा, बड़ागा, करूँवा, इठला, पनियर व कादर जनजातियाँ आती हैं।

एस. सी. दुबे ने भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर जनजातियों को क्रमशः उत्तर और उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, पश्चिमी क्षेत्र और दक्षिणी क्षेत्र, अर्थात् चार भागों में वर्गीकृत किया है। 

भारतीय जनजातियों का प्रजातीय वर्गीकरण

 विभिन्न विद्वानों ने भारत की जनजातियों को विभिन्न प्रजातीय आधार पर वर्गीकृत किया है, जिनमें मुख्यतः डॉ. गुहा, हट्टन एवं रिजले प्रमुख विद्वान हैं। वैसे इन लोगों ने जो प्रजातीय आधार पर वर्गीकरण किया है, उसमें पर्याप्त अन्तर दिखाई पड़ता है, जो निम्न प्रकार है

बी सी गुहा ने भारतीय जनजाति को तीन श्रेणियों मे वर्गीकृत किया है 

1. नीग्रिटो गुहा - का कहना है कि नीग्रिटो नीग्रो प्रजाति की ही एक शाखा है। यह भारत का सबसे प्राचीन प्रजातीय तत्व है। नीग्रिटो प्रजाति की शारीरिक विशेषताओं के सम्बन्ध में आपने बताया है कि ये छोटे व मध्यम कद, चौड़ा या फैला हुआ सिर, काले ऊन की तरह बाल, मोटे होठ तथा चौड़ी नाक तथा गहरा काला रंग इसके प्रमुख लक्षण हैं। 

इस प्रजाति के लोग मुख्यतः दक्षिण भारत के क्षेत्र-कादर, इरुला तथा पलयन नामक जनजाति तथा असोम के आगामी नागाओं आदि में मिलते हैं। 

2. आदि आग्नेयाम— मध्य भारत में पाई जाने वाली अधिकांशतः जनजातियाँ आदि आग्नेयाम प्रजाति की हैं। भील तथा चेंचू जनजातियाँ इसी प्रजाति की मानी गई हैं। इस प्रजाति की मुख्य शारीरिक विशेषताएँ कद छोटा, चौड़ा व छोटा चेहरा, ऊँचा सिर, मुँह आगे की ओर उठा हुआ तथा चपटी व छोटी नाक आदि हैं।

3. मंगोलायड - मंगोलायड प्रजाति दो शाखाओं के रूप में जनजातियों में देखी जा सकती है। चौड़े सिर वाले तथा लंबे सिर वाले मंगोल । इस प्रजाति की मुख्य विशेषताएँ मध्यम कद, हल्का पीला रंग, सीधे बाल, लम्बा सिर, चपटी-सी नाक व अधखुली आँखें होती हैं। यह प्रजाति मुख्यतः असोम और सीमान्त प्रान्त में बसी जनजातियों में होती है। 

 जे. एच. हट्टन ने भी जनजातियों में तीन प्रजातीय तत्वों की विवेचना की है और आपने भी इन्हें नीग्रिटो, आग्नेयाम तथा मंगोलायड प्रजाति में बाँँटा है।

प्रागैतिहासिक जनजाति प्रागैतिहासिक जनजातियों का अपना महत्व है उपयुक्त प्रजातीय वर्गीकरण के साथ ही भारत की प्राचीनतम जनजातियों ने अपनी पहचान अभी भी बनाए रखी हैं।

 मुण्डा जाति प्रागैतिहासिक आदिम आग्नेय वंशी जाति है। मुण्डा भाषा के आधार पर ये मुण्डा, कोल तथा निषाद आदि नामों से ज्ञात है। भारत में इनकी संख्या साठ लाख से अधिक है। इनमें संथाल, भील, कुरुम्ब, मुण्डा शबर, जुंग तथा कोर्क जनजातियाँ सम्मिलित हैं। 

आदिम मुण्डा या काल जाति की सभ्यता अनेक युगों से अक्षुण्ण है। यह समझा जाता है कि प्रागैतिहासिक आदिम आग्नयवंशी जातियों का उद्भव मध्य एशिया या दक्षिण-पूर्वी भाग में हुआ था। यहाँ से यह जातियाँ दक्षिण कीओर व्याप्त होकर भारत के कई भागों में फैल गईं। 

डॉ. हैडन के मतानुसार, मुण्डा भाषी लोग भारतीय द्वीप समूह में गंगा की अन्तर्वेदी और पश्चिम बंगाल के मूल स्थान से ताम्रकाल में पश्चिमी भारत में फैल गए। हमारे देश की प्राचीनतम संस्कृति एवं भाषायी दृष्टि से मुण्डा तथा संथाल जनजातियाँ महत्वपूर्ण हैं।

सांस्कृतिक आधार पर जनजातियों का वर्गीकरण

भारतीय जनजातियों का सांस्कृतिक आधार उनकी संस्कृति है। आदिकाल से अद्यतन भारत में जनजातीय संस्कृति आज की विद्यमान है। जनजातीय वर्गीकरण की दृष्टि से उनका सांस्कृतिक एवं भाषायी आधार अधिक वैज्ञानिक है। सभ्यताएँ परिवर्तित अथवा समाप्त हो जाती हैं, किन्तु संस्कृति की धारा अविरल बहती रहती है।

भारतीय जनजातियों में कृष्णद्वीपीय स्थिर जाति के तत्व नाटे हब्शी और आदिम निषादीय के सम्मिश्रण में निहित हैं। इस प्रकार (सूरत-शक्ल से) के लोग आज भी असोम और म्यांमार के मध्य पहाड़ियों, निकोबार द्वीप तथा मालाबार के समुद्री तट पर निवास करते हैं। 

इनकी संस्कृति के मूल तत्व मृत व्यक्ति के शव को खुला छोड़ देना, छोटी-छोटी डोगियों को देवता मानकर उनकी पूजा करना है। यद्यपि अब यह सांस्कृतिक इकाई के रूप में अलग अस्तित्व में न रहकर अन्य जातियों के साथ घुल-मिल गये हैं, तथापि नृवंशीयशास्त्र के अनुसार इनकी पहचान की जा सकती है। 

आदिम आग्नेयवंशी जाति की सांस्कृतिक देन-निषाद वंश अथवा आदिम आग्नेयवंशीय लोगों ने हमारे देश में नव-पाषाण युग की नींव डाली थी। मिट्टी के बर्तन बनाने के साथ ही भारत की प्राचीनतम मुण्डा भाषा का प्रयोग इन्हीं लोगों ने किया था। 

मुण्डा भाषा आज भी लद्दाख और सिक्किम के बीच हिमालय के भीतरी भाग, पश्चिमी मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के गंजाम और विशाखापट्टनम के पहाड़ी भाग में जीवित है। आदिम मुण्डा जाति की सभ्यता निरन्तर काल से जीवित है तथा इनके विशेष लक्षण स्वतन्त्र ग्राम संस्थाएँ, सामूहिक रूप से शिकार करना, व्रत रखना, जाति भेदभाव नहीं रखना तथा वृक्ष देवताओं की पूजा का प्रचलन आज भी विद्यमान है। इससे जनजाति की सांस्कृतिक पहचान स्थापित है।

भारतीय जनजातियों का सांस्कृतिक वर्गीकरण

सांस्कृतिक आधार पर वर्गीकरण प्रस्तुत करने का श्रेय वैरियर एलविन को हैं, जिन्होंने भारतीय जनजातियों को चार सांस्कृतिक आधारों पर वर्गीकृत किया है, जो निम्न प्रकार हैं

1. प्रथम वर्ग में वैरियर एलविन ने उन जनजातियों को माना है जो कि आदिम स्थिति में जीवन व्यतीत कर रही हैं। ये मध्य भारत के बस्तर की मुरिया, उड़ीसा की जुआँग, गादवा तथा बोदो जनजातियाँ हैं। इनका सामाजिक एवं आर्थिक जीवन आदिम अवस्था में है। ये लोग झूम खेती करते हैं तथा अत्यन्त दुर्गम व पहाड़ी तथा वन्य क्षेत्रों में जीवन बिताते हैं।

2. द्वितीय वर्ग में एलविन ने ऐसी जनजातियों को लिया है, जिनके आदिम जीवन में परिवर्तन होना शुरू हो चुका है। ये झूम खेती को ज्यादा महत्व नहीं देते और अपने परम्परागत रीति-रिवाजों को मानते हैं। 

3. तीसरे वर्ग में एलविन ने उन जनजातियों की चर्चा की है, जो कि बाहरी संस्कृति से प्रभावित हुई हैं तथा बाहरी संस्कृति के सम्पर्क में आने के कारण इनकी स्वयं की संस्कृति मिटती जा रही है और इनका परम्परागत सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व सांस्कृतिक जीवन नष्ट होता जा रहा है।

4. चौथे वर्ग में एलिवन ने उन जनजातियों को रखा है जो कि प्राचीन कुलीन वर्ग की जनजातियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये जनजातियाँ बाहरी संस्कृति के सम्पर्क में आने के पश्चात् भी अपनी परम्परागत संस्कृति को बनाए हुए हैं। इस वर्ग में भील व नागा जनजातियों को रखा है।

भारतीय जनजातियों का भाषायी वर्गीकरण

भाषा के आधार पर भी भारतीय जनजातियों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है

(i) आग्नेय भाषा परिवार - इसमें मध्य तथा पूर्वी भारत की कोल या मुण्डा समूह की भाषाएँ या बोलियाँ बोलने वाली जनजातियाँ आती हैं। इस प्रकार की भाषाएँ बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बांगल और असोम में प्रचलित संथाली, मुन्दारी, हो, भूमिज, गारो तथा खासी जनजातियों में बोली जाती हैं।

(ii) द्राविड़ भाषा परिवार - यह भाषा बोलने वाली जनजातियाँ मध्य तथा दक्षिणी भारत में पाई जाती हैं। इस वर्ग की जनजातियाँ इस प्रकार हैं-उड़ीसा की खोघ या काँध, बिहार तथा उडीसा की कुई, उरांव, राजमहल पहाड़ियों की माल्टो, टोडा, मलेर पोलिया, सावर, पनियन, चू, इलुरा, कादर आदि जनजातियाँ भी द्राविड़ बोलियों का व्यवहार करती हैं।

(iii) चीनी-तिब्बती भाषा परिवार - इनका व्यवहार हिमालय के दक्षिणी ढालों में रहने वाली पंजाब से भूटान, उत्तर-पूर्वी बंगाल और असोम तक फैली हुई जनजातियाँ करती हैं। असोम की नागा, कूकी, आवर, खासी, मिकिर आदि जनजातियाँ इसी वर्ग की हैं। 

अर्थव्यवस्था के आधार पर जनजातियों का वर्गीकरण

(i) शिकार करने और भोजन इकट्ठा करने वाली जनजातियाँ - इस श्रेणी में कादर, मलायन, पलेयन आदि जनजातियाँ आती हैं। आर्थिक दृष्टिकोण से यह जनजातियाँ सबसे अधिक पिछड़ी हुई हैं और इसलिए जीविका पालन के लिए यह शिकार और फल-फूल इकट्ठा करके लाते हैं, शिकार करते हैं या मछली पकड़ते हैं।

(ii) पशुपालक जनजातियाँ - इस प्रकार की आर्थिक व्यवस्था में निवास करने वाली जनजातियों की प्रमुख विशेषता यह है कि लोग पशुओं को पालकर उनका दूध तथा दूध से बने सामानों को बेचकर अपना पेट पालते हैं। इस श्रेणी में विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश के गुज्जर और दक्षिणी नीलगिरि के टोडा उल्लेखनीय हैं।

(iii) खेती करने वाली जनजातियाँ - उत्तरी पूर्वी और मध्य भारत की अधिकांश जनजातियाँ इसी श्रेणी में आती हैं। इन जनजातियों को खेती करने का ज्ञान होता है, परन्तु कृषि-कला के उन्नत ढंगों से ये बिल्कुल ही अपरिचित हैं। दूसरे शब्दों में, इनके खेती करने के तरीके बिल्कुल पिछड़े हुए हैं, जिसके पैदावार बहुत कम होती है। 

(iv) उद्योग में लगी हुई जनजातियाँ - भारतीय जनजातियों में कुछ जनजातियाँ इस प्रकार की भी हैं जो उद्योग-धन्धों में लगी हुई हैं। इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि इन जनजातीय क्षेत्रों में विशेष प्रकार के उद्योग-धन्धे पनप गये हैं और उनसे आवश्यक श्रमिक की पूर्ति जनजातियों को काम पर कुछ लगाकर की गई है। बिहार, पश्चिम बंगाल और असोम की कुछ जनजातियाँ इस श्रेणी में आती हैं।

डॉ. मजूमदार और मदान द्वारा सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारतीय जनजातियों के वर्गीकरण को दो प्रक्रियाओं से प्रभावित दिखाया गया है - 1. सात्मीकृत, 2. अनुकूलित।

 किसी जनजाति द्वारा अन्य संस्कृति में समाहित होकर अपना सांस्कृतिक अस्तित्व नष्ट करना सात्मीकृत तथा इसके विपरीत किसी जनजाति की संस्कृति द्वारा अन्य का उपयोग न करना अनुकूलित कहा जाता है। इसी आधार पर उक्त विद्वानों ने जनजातियों का वर्गीकरण तीन भागों में किया है।

प्रथम उन्नत वर्ग के सम्पर्क से अप्रभावित, द्वितीय ग्राम्य और नगरीय सम्पर्क में आने पर समस्या ग्रस्त एवं तृतीय ग्रामीण एवं नगरीय सम्पर्क में आकर भी अप्रभावित बनी रही।

 इसी आधार पर मजूमदार तथा मदान ने एलविन के वर्गीकरण की आलोचना की है। वस्तुतः जनजातियाँ अन्य सम्पर्क में आकर भी अपना नैतिक आधार नहीं खोती हैं। जनजातियों को आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर उनको अक्षुण्ण बनाए रखना भारत सरकार तथा भारतीय समाज का प्राथमिक कर्तव्य है।