जनजाति की अवधारणा स्पष्ट कीजिए - janjati

भारतीय समाज प्रमुख रूप से जाति प्रधान समाज है। यह सामाजिक स्तरीकरण का प्रमुख आधार जाति प्रधान प्रथा ही है। इस समय हमारे देश में अनगिनत जातियाँ तथा उपजातियाँ हैं। प्रत्येक जाति की अपनी अपनी विशेषताएँ हैं। वास्तव में जाती व्यवस्था केवल भारतीय समाज की उपज एवं अनुपम संस्था है।

आज हमारा समाज लगभग तीन हजार जातियों एवं उपजातियों में विभाजित है और यह प्रथा केवल हिन्दुओं तक ही सिमित न होकर मुसलमानों तथा ईसाइयों में भी कुछ सीमा तक प्रवेश कर गयी है।

जाति का अर्थ

जाति शब्द का अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द कास्ट से लिया गया है। अंग्रेजी के कास्ट शब्द का नाम पुर्तगाली भाषा के कास्ट से हुआ हैं जिसका अर्थ है नस्ल प्रजाति या प्रजातीय भेद।

कास्ट शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सन 1563 में ग्रेसिया डि ओरटा ने यह लिखकर किया था - “कोई अपने पिता के व्यवसाय को नहीं छोड़ता तथा जाटव जाति के सब लोग एक समाम है।'

जाति का यह शाब्दिक अर्थ है जाति का वास्तविक अर्थ एक सामाजिक समुह के रुप में लिया जाता है। यह एक ऐसा सामाजिक समूह है, जिसकी सदस्यता जन्म निर्धारित होती है।

जाति की परिभाषाएं

1. केतकर के अनुसार जाति दो  विशेषताओं वाला सामाजिक समूह हैं। सदस्य उन्ही व्यक्तिओ तक सिमित रहती है। जो सदस्यों से उत्पन्न होते है और इस तरह उत्पन्न सभी व्यक्ति उसमें शामिल रहते है। 

तथा सदस्यों पर एक अनुलंघनीय सामाजिक नियम द्वारा जाति के बाहर विवाह करने पर प्रतिबंधित रहता है।

जनजाति की अवधारणा स्पष्ट कीजिए - janjati

2. मजूमदार एवं मदान के अनुसार, "जाति एक बन्द मार्ग है।

3. रिजले के अनुसार, एक जाति की परिभाषा परिवारों की संकलन या परिवारों के समुह के रुप में की जा सकती है, जिसका एक सामान्य नाम है जो प्रायः उनके विशिष्ट व्यवसायों को बताता है, या उनसे सम्बंधित रहता है।

तथा एक काल्पनिक पूर्वज, मानवीय या दैवी से उत्पत्ति का दावा करता है तथा एक व्यवसाय करने की स्वीकृति देता है तथा जो सम्मति देने में समर्थ है उनकी दृष्टि में एक समस्त समुदाय का निर्माण करने वाला समझा जाता है।"

4. ई ए. गेट के अनुसार, “यह एक अंतर्विवासमूह है या ऐसे समूह  संकलन है जिसका एक सामान्य नाम है एक परम्परागत व्यवसाय हैं एक ही स्रोत से उत्पत्ति का दावा करता हैं। और एक सजातीय समुदाय का निर्माण करने वाला समझा जाता है।

5 कूले के अनुसार, "जब एक वर्ग पूणतः वंसानुक्रम पर आधारित होते है, तब हम उसे जाति कहते हैं।

उप्युक्त परिभषाओ से स्पष्ट है की जाति व्यवस्था एक जटिल एवं बहुपक्षीय अवधारणा है अतः किसी एक संक्षिप्त परिभाषा द्वारा इसका पूर्ण विवेचन करना संभव नहीं।"

जनजाति की अवधारणा 

साधारण शब्दों में जनजाति वह समूह है जो पूर्व सभ्यता काल में जीवन प्रतिमानों से सम्बंधित है। जनजाति के सदस्य अशिक्षित तथा तथाकथित सभ्यता से दूर है और प्राचीन आर्थिक और सामाजिक जीवन के प्रतिनिधि कहे जा सकते है।

विभिन्न जंगलों पर्वतों पठारों आदि निर्जन क्षेत्रों में निवास करने के कारण और विशिष्ट सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक जीवन विकास के कारण जनजाति में अन्य सभ्य समाजों में अनेक भिन्नताएं पायी जाती हैं।अतः विभिन्न विद्वानों ने जनजाति की विभिन्न परिभाषाये दी हैं।

जनजाति का अर्थ एवं परिभाषा

गोत्र का एक विस्तृत स्वरुप जनजाति को जाता है।यह खाना बदोशी जत्थे, झुण्ड, गोत्र भातृत्व एवं अर्धदाश से अधिक विस्तृत एवं संगठित होती हैं। 

जनजाति को परिभाषित करते हुए गिलिन तथा गिलिन लिखते हैं, स्थानीय आदिम समूहों के किसी भी संग्रह को जोकि एक समान्य क्षेत्र में रहता हो एक समान्य भाषा बोलता हो और एक समान्य संस्कृति का करता हो, एक जनजाति कहते हैं।

डॉ. रिवर्स के मतानुसार जनजाति एक ऐसा सरल प्रकार का सामाजिक समुह है जिसके सदस्य एक सामान भाषा का प्रयोग करतें हैं तथा युद्ध आदि सामान्य उद्देश्यों के लिए सम्मिलित रूप से कार्य करते हैं।

डॉ. मजूमदार लिखते हैं एक जनजाति परिवारों या परिवारों के समूह का संकलन होता हैं जिसका एक समान्य नाम होता है, जिसके सदस्य एक निश्चित भू भाग में रहते हैं समान भाषा बोलते हैं और विवाह व्यवसाय या उद्योग के विषय में निश्चित निषेधात्मक कार्यों का पालन करते हैं और पारस्परिक कर्तव्यों की एक सुविकसित व्यवस्था को मानते हैं।

इंपीरियल गजेटियर ऑफ़ इण्डिया के अनुसार एक जनजाति परिवारों का एक संकलन हैं जिसका एक नाम होता है, जो एक बोली बोलती है, एक समान्य भू भाग पर अधिकार रखती है या अधिकार जताती है और प्रायः अंतर्विवाह नही करता है।

हॉबल का कथन है की एक जनजाति एक सामाजिक समुह है जो एक विशेष भाषा बोलता है तथा एक विशेष संस्कृति रखता है जो उन्हें दुसरे जनजाति समुह में पृथक करती है। यह अनिवार्य रूप से राजनीतिक संगठन नहीं है।

चार्ल्स विनिक ने जनजाति की परिभाषा करते हुए लिखा है एक जनजाति में क्षेत्र, भाषा, सांस्कृतिक समरूपता तथा एक सुत्र में बांधने वाला सामाजिक संगठन आता है यह सामाजिक उपसमूहों गोत्रों या गांवों को सम्मिलित कर सकता हैं।

रॉल्फ पीडिंगटन ने जनजाति का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है हम एक जनजाति की वयक्तियों के एक समुह के रूप में व्याख्या करते है जो की सामान भाषा बोलता हो तथा जिसकी संस्कृति में समरूपता पाई जाती हो।

उपर्यक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है एक जनजाति एक ऐसा क्षेत्रिय मानव समूह है जिसकी एक सामान्य भाषा राजनीतिक संगठन एवं व्यवसाय होता है तथा जो सामान्यतः अंतर्विवाह के नियमों का पालन करता है।

जनजाति एवं जाति में समानताएं 

जाति व जनजाति में समानताएं कई बार जनजाति व जाति को एक समझ लिया जाता है। इसका प्रमुख कारण जनजाति का सर्वमान्य परिभाषा न होने के करना है। जाति व जनजाति की असमानताओं में से दों बाते हो प्रमुख है और वे निम्न है 

1. दोनों में ही गोत्र बहिविर्वाह की व्यवस्था पाई जाती है।

2. दोनों में ही समुह से बाहर विवाह की व्यवस्था पाई जाती है

यहां उल्लेखनीय है की आज कल यातायात व संदेश वाहनों के साधनों के विकास के कारण जनजातियों तथा जातियों में विवाह संबंधी यह बंधन ढीले पड़ते जा रहे हैं।

कई बार जाति व जनजाति का प्रयोग समान अर्थों में किया जाता है जबकि ये भिन्न अवधारणाएं हैं। यद्यपि इन दोनो मे कुछ समानताएं भी है।

जैसे कुछ जातिया ऐसी है जो जनजातियों की भांति ही एक निश्चीत क्षेत्र में निवास करती हैं और एक निश्चित भाषा का प्रयोग करते है फिर भी इनमे निम्न अन्तर है 

1. जनजाति एक ऐसा सामाजिक समुह है जो एक निश्चित भू भाग पर बसा हुआ है जबकि जाति का कोई निश्चित भू भाग नही होता।

2. जाति मुख्यतः जन्म के आधार पर विकसित होती है जबकि जनजाति एक निश्चित भू क्षेत्र में निवास करने के कार।

3. प्रत्येक जाति का एक निश्चित परम्परा गत व्यवसाय रहा है, किंतु किसी जनजाति का कोई निश्चित व्यवसाय नही होता और न ही उनके सदस्यों पर व्यवसाय संबंधी कोई नियंत्रण रहता है।

4. जनजाति अपनी उत्पत्ति किसी काल्पनिक पूर्वज से मानती है जबकि जातियां ऐसे नही मानती 

5. एक जनजाति में कोई उपजातियां नही होती एक जाति में कई उपजातियां होती है।

6. जाति में अंतर्विवाह के कठोर नियम पाए जाते है जबकि जनजाति में ये नियम लचीले होते है।

7. एक जाति में उच्च नीच की भावना एवं अस्पृश्यता नही पाई जाती जबकि जाति व्यवस्था में संस्तर व अस्पृश्यता की भावना पाई जाती है।

8. जनजातियों के अपने अपने टोटम होते है जिसको ये पवित्र मानते है और जिसकी अध्यात्मिक शक्ति में विश्वास करते है जातियों में किसी टोटम शक्ति में विश्वास नहीं किया जाता।

9. जनजातीय आत्मनिर्भर होती है किंतु जाति नहीं कई जातियां संपूर्ण समाज व्यवस्था का निमार्ण करते है।

डा. बेली की यह मान्यता है की जनजातियों को ऐसे सतत सेतू की तरह माना जाना चाहिए जिसके एक ओर जातियां तथा दूसरी ओर जनजातिया हो। जनजातियों की संरचना पृथककृत तथा समता वादी है जबकि जातियों की जैविक अकात्मवादी वाली संरचना की तरह अन्योन्यासरित। सिन्हा ने भी जाति व जनजाति को सतत सेतू के रुप में देखा है।

जनजाति एवं जाति में भिन्नताएं

यह सच है की अंतर्विवाह तथा सांस्कृतिक आधार पर जनजाति तथा जाति के बीच अनेक समानताएं देखने को मिलती है लेकिन इन्ही आधारों पर जनजाति तथा जाति एक दुसरे से भिन्न दो पृथक समूह है निम्नांकित भिन्नताओं के आधार पर इनकी वास्तविक प्रवृति को समझा जा सकता है।

1. जाति एक मानव निर्मित व्यवस्था है जिसके इतिहास और उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है सभी जानते है की मनुस्मृति में पवित्रता और अपवित्रता तथा वर्ण संकरता के जिन नियमों का उल्लेख किया गया है। 

उन्हीं के आधार पर एक एक वर्ण के अंदर जातियों और उपजातियों का निमार्ण होना आरंभ हुआ इसके विपरित एक विशेष भू भाग पर जब वक्तियों का कोई समुह समान्य संस्कृती के अन्तर्गत संयुक्त जीवन व्यतीत करने लगा तब उसी को एक जनजाति का रूप मिल गया इसी आधार पर जनजातियों को किसी समाज की मौलिक सभ्यता और संस्कृति का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाता है।

2. एक ही जाति के सदस्यों में एक दुसरे से भिन्न सांस्कृतिक और भाषायी विशेषताएं होने के साथ वे कितने दूर दूर के क्षेत्रों में फैले हुए हो सकते है। इसके विपरीत एक निश्चीत भू भाग समान्य भाषा समान संस्खृति एक जनजाति की एक ऐसी विशेषताएं है जो उसे दूसरी जनजातियों से पृथक करती है।

3. जाति व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक जाति की सामाजिक परिस्थिति दूसरी जाति की तुलना में स्पष्ट रूप से ऊंची अथवा नीची होती है। इसका अर्थ है की जातियों के बीच एक  निश्चीत संस्तर होता है जिसे हम समाज का उदग्र विभाजन कहा जाता हैं। हम किसी जाति को सामाजिक या सांस्कृतिक आधार पर दूसरी जाति की तुलना में उच्च अथवा निम्न नही कह सकते हैं।

4 प्रत्येक जनजाति की अपनी एक पृथक भाषा होती है तथा भाषा की यही समानता एक जाति के सदस्यों को आपस में बांधे रखती है। विभिन्न जातियों की कोई पृथक भाषा नही होती। एक क्षेत्र में रहने वाले सभी जातियां एक ही भाषा का प्रयोग करते है 

5. जनजाति एक समरूप समुदाय है जिसमें संस्था गत आधार पर विवाह, खान पान तथा सामाजिक संपर्क से संबंधित किसी तरह का विभाजन नही होता। दूसरी ओर प्रत्येक जाति एक ऐसा समूह है जो विवाह सामाजिक संपर्क तथा खान पान के आधार पर एक दुसरे से पृथक होते हैं।

6. जनजाति एक आत्मनिर्भर समूह है। विभिन्न जातियों से संबंधित लोग आत्मनिर्भर नहीं होते प्रत्येक जाति को अपनी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए जज्मानी संबंधों अथवा कुछ दूसरे तरह के संबंधों द्वारा दूसरी जातियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

7. प्रत्येक जनजाति के अपने अलग धार्मिक विश्वास होते है। इन विश्वसों में साधारणतया प्रकृति पुजा, जादुई क्रियाओं तथा टोटम सम्बंधी विश्वासों का मिला जुला रुप देखने को मिलता है। दूसरी ओर जातियों का विभाजन हिन्दू धर्म से ही संबंधित है। विभिन्न जातियों की उत्पत्ति भी स्मृतिकालीन हिन्दू धर्म ग्रंथो में दिए गए आधार पर हुई।

8. प्रत्येक जाति का परम्परा गत रूप अपना एक अलग व्यवसाय अथवा पेशा होता है तथा एक जाति के लोगों से यह आशा की जाति है वे अपने अनुवांशिक व्यवसाय के द्वारा ही आजीविका उपार्जित करें। 

एक जनजाति का व्यवसाय काफी सिमा तक भौगोलिक दशाओं पर निर्भर होता है। जनजाति के नियम व्यक्ति को एक विशेष ढंग से आजीविका उपार्जित करने के लिए बाध्य नहीं करते।

9. जनजाति एक ऐसा समुह है जो किसी पिछड़े हुए क्षेत्र में निवास करता है भौगोलिक आधार पर एक जाति के सदस्य कितने ही विकसित अथवा अविकसित भू भाग पर फैले हुए हो सकते है।

10. मानव शास्त्रियों के अनुसार जनजाति एक मानक इकाई है इसका तात्पर्य है की प्रत्येक जनजाति का एक मुख्या होता है एक जनजाति के सभी सदस्यों को मुख्या के आदेशों का पालन उसी तरह जरूरी होता है। 

जाति में इस तरह का कोई राजनीतिक संगठन नहीं होता। प्रत्येक जाति का जीवन राज्य के कानूनों से प्रभावित होते हैं।

11. जाति का संबंध एक जटिल संस्कृति से है जिसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी का समावेश हो जाने के बाद भी व्यवहार के परम्परा गत नियमों का प्रभाव बना हुआ है। दूसरी ओर, जनजाति से एक ऐसे मानव समूह का बोध होता है जो आज भी सभ्य समूहों के संपर्क से दूर रह कर जीवन व्यतीत कर रहा है।

जाति तथा जन जाति आधिकांश मानव शास्त्रियों और समाज शास्त्रियों ने एक अवधारणा और व्यवहारिकता दोनों दृष्टि कोनों से दो भिन्न समूहों के रूप में स्पष्ट किया है। 

इसके बाद भी यदि हम वर्तमान स्थीति को देखें तो हमें जाति और जनजाति के बीच एक सातत्य अथवा निरंतरता देखने को मिलती है इसका सबसे अच्छा उदाहरण सचिच्चदानंद द्वारा विहार की गोंड़ जनजाति का अध्ययन है। 

यह जनजाति अपने क्षेत्र की पड़ोसी हिन्दू जातियों की संस्कृति को ग्रहण करती जा रही है। 

इसके  फलस्वरूप अधिकांश गोंड़ अपने नाम के आगे ‘सिंह अथवा गोत्र का नाम लिखने लगे हैं जो एक, तरह से जाति सूचक शब्द हैं गोंड जनजाति की एक शाखा राजगोंड़,अपने आपको क्षत्रिय जाति से संबंधित मानती है। 

इसके अतिरिक्त सच्चिदानंद ने यह भी पाया कि बिहार की गोंड़ जनजाति से संबंधित अधिकांश लोगों में हिन्दू जीवन-विधि का प्रभाव बढ़ रहा है। 

उदाहरण के लिए, हिन्दू विवाह की रीतियों के अनुसार व्यवहार, दहेज, हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा, गौमांस का निषेध तथा कुछ सीमा तक विभिन्न समूहों के बीच ऊँच-नीच की भावना आदि कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं। 

जो जाति व्यवस्था की विशेषताओं के अधिक निकट हैं अनेक दूसरे विद्वानों का भी विचार है कि जनजातियों में परसंरस्कृति ग्रहण की प्रक्रिया बढ़ने के साथ ही जाति तथा जनजाति के अंतर कम होते जा रहे है।

वास्तव में, जाति और जनजाति दो छोर हैं, जबकि इनके बीच में ऐसे समूह आते है जिनमें जातियों और जनजातियों की विशेषताओं का मिला-जुला रुप देखने को मिलता है। 

जनजातियों के जाति में परिवर्तित होने की प्रक्रिया

डॉ.डी.एन मजूमदार का कथन है कि प्रारंभिक काल से ही जनजाति से जाति के रुप में शांत परिवर्तन होता रहा है यह परिवर्तन अनेक तरीकों से हुआ है और ऐसा विश्वास किया जाता है कि आज की अधिकतर निची या बह्म जातियाँ पहले जनजातियाँ ही थी वास्तव में हिन्दू, व्यवरस्था के प्रारंभिक संदर्भों में तीन आर्य जातियों का ही उल्लेख है। 

और एक चौचथी और पाँचवी जाति शुद्र और चण्डाल, काली चमड़ी और चिपकी हुई नाक वाले जनजातीय लोगों से ही बनी है, रिजले ने यह बताया है कि एक जनजाति चार प्रक्रियाओं द्वारा जाति का रुप धारण करती है-

1.जनजाति किसी प्रदेश को जीतने के बाद अपने क्षत्रिय या राजपूत होने का दावा करती है और बाह्मण पुरोहित उनको सूर्य और चन्द्रवंश से जोड़ने वाली वंशावलियाँ गढ़ लेते हैं।

2. कुछ आदिवासी किसी धार्मिक सम्प्रदाय को स्वीकार कर लेते हैं।

3. समूची जनजाति कोई नया नाम धारण करके हिन्दू समाज में प्रविष्ट हो जाती है। 

4. अपने नाम का परित्याग न करने पर भी कोई जनजाति हिन्दू जाति बन जाती है।

 5. डॉ. मजूमदार ने पाँचवीं प्रक्रिया का जनजाति द्वारा किसी विशेष जाति का गोत्र और नाम ग्रहण कर हिन्दू समाज में घुल-मिल जाना बताया है।

जनजाति जाति बन जाने पर हिन्दू रिवाजों-यज्ञोपतित पहनना, विधवा-विवाह न करना, अस्पृश्यता आदि को ग्रहण कर लेती है। 

मैक्स वेबर अपने प्रसिद्ध लेख 'सोशल स्ट्रक्चर' में एक जनजाति को उस समय भारतीय जाति में परिवर्तित मानते हैं जब वह क्षेत्रिय अर्थ व माहत्व खो देती हैं। 

आधुनिक समय में आवागमन और संचार साधनों के विकास, शिक्षा प्रसार औधोगिकरण और विभिन्न विकास योजनाओ के कारण जनजातिया लोगों का अन्य लोगों के साथ संपर्क बढ़ा हैं। इसके फलस्वरूप जनजातिया समुह अन्य लोगों की   जीवन विधी अपनाते जा रहे हैं। 

और परम्पराओं को अपना रहे हैं। कुछ पुरोहित हिन्दू जाति व्यवस्था में सम्मिलित होने के इच्छुक जनजातीय लोगों के आध्यात्मिक मार्गदर्शक बन जाते हैं वे उन्हें अपने पड़ोसी हिन्दुओं को धार्मिक मान्यताएँ, विधि, संस्कार और रीति-रिवाज स्वीकार करने के लिए प्रेरित करते हैं और हिन्दुओं के साथ सामाजिक और धार्मिक अन्तर को कम-से-कम करने का प्रयास करते हैं। 

कालान्तर में ऐसे जनजातीय लोग किसी जनजाति की सदस्यता ग्रहण कर ही लेते हैं और ऐसा करने के लिए अपने औपचारिक, धार्मिक कर्मकाण्डों को भी छोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं।

दिमाजपुर, रंगपुर, जलपाईगुड़ी और कूँचबिहार की पोलिया जनजाति क्षत्रियों से अपनी उत्पत्ति का दावा करती है और अपने आपको राजवंशी कहते हैं। यह जनजाति से जाति में परिवर्तन का एक उदाहरण है। 

जनजातीय लोग हिन्दुओं की उच्च भौतिक संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित हैं। वे प्रजातीय और सांस्कृतिक दृष्टि से हिन्दुओं को अपने से श्रेष्ठ मानते हैं। 

जनजातीय लोगों की दृष्टि में हिन्दू होना एक गौरव की बात है। यह प्रतिष्ठा का सूचक है और इसलिए कई जनजातीय लोग जाति व्यवस्था के माध्यम से हिन्दू समाज का अंग बनते जा रहे हैं। जब जनजातीय लोग एक जातीय संस्तरण में प्रवेश करते हैं तो जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण में भी अत्यधिक परिवर्तन आ जाता है। 

वे व्यक्ति वादिता, आर्थिक लाभ और स्वहित प्रधानता को महत्व देने लग जाते हैं और नवीन प्रथाओं को अपनाने लग जाते हैं।

अनुसूचित जनजाति

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन् 1950 में जनजातीय समुदायों की पहचान कर 212 जनजातीय समुदायों की सूची तैयार करने के बाद अनुसूचित जनजातीय आदेश 1950 से लागू किया गया।

इस सूची में सभी जनजातीय समुदाय अनेक कारण वश शामिल नहीं किये जा सके। फलतः काफी विरोध व्यक्त किया गया। इसे ध्यान में रखते हुए ‘पिछड़ी जाति आयोग' का गठन किया गया जिसके अनुमोदन से पूर्व में बनाई गई सूची संशोधित की गयी। 

इसके साथ ही, 'राज्य पुन गठन कानून' लागू किया गया जिसके तहत राज्य की सूचियों में परिवर्तन हुआ। “इन सूचीबद्ध जनजातियों को ही अनुसूचित जनजाति कहा जाता है।'' अभी भी बहुत-से जनजातीय समुदाय इस सूची में शामिल नहीं हो पाये हैं।

संविधान निर्माताओं ने इनके अविकसित रूप को ध्यान में रखकर इन्हें विशेष महत्व देते विकास हुये संविधान के विभिन्न भागों और धाराओं में इनके लिये विशेष सुविधाओं की व्यवस्था की गई है। 

भारतीय संविधान के तृतीय भाग मौलिक अधिकारों, चतुर्थ भाग राज्य के नीति निर्देशक तत्व, दशम भाग अनुसूचित एवं जनजाति क्षेत्र, द्वादश भाग सम्पत्ति इत्यादि, सोलहवाँ भाग विशिष्ट प्रयोजन के द्वारा इनके विकास को अनिवार्य माना गया है। 

इसके लिए भारत सरकार ने काफी सराहनीय प्रयास किया है। इनके तहत जनजातीय सलाहकार परिषदों की नियुक्ति की गई है। सम्पूर्ण भारतीय जनजातियों की सहायता हेतु संविधान के 338वें अनुच्छेद में राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित जनजातियों एवं जातियों के कमिश्नर की नियुक्ति की गयी है। इसे एक विशेष अधिकारी का दर्जा दिया गया है  । 

संविधान की भाषा एवं शब्दों की दृष्टि से जनजातीय भारत के इतिहास में एक नये युग का है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 खण्ड 1 में घोषित किया गया है

उपयुक्त घोषणा का अर्थ है कि राष्ट्रपति सार्वजनिक सूचना द्वारा, जनजातियों, जनजाति , समुदायों या जनजाति समुदाय के भीतरी समूहों की घोषणा करेंगे। 

इस सूचना में जो जनजातियाँ, में जनजाति समुदाय या जनजातियों के भीतरी समूह परिगणित किये जायेंगे, वे सब अनुसूचित जनजाति कहलायेंगे। 

इससे यह स्पष्ट है कि समय-समय पर जनजातियों के समूहों को अनुसूचित श्रेणी में लाया जा सकता है। भारत में पिछले दशकों में जनजातियों की अधिकाधिक संख्या को अनुसूचित वर्ग में शामिल किया गया है।

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