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भारत में आर्थिक नियोजन का वर्णन कीजिए

आर्थिक नियोजन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए योजना में जो नीति अपनाई जाती है, उसे योजना की व्यूह रचना या रणनीति कहा जाता है । इसे विकास युक्ति या विकास कूटनीति भी कहा जाता है । इस प्रकार व्यूह रचना का आशय उन उपायों, नीतियों एवं प्राथमिकताओं के क्रम से है जिन्हें योजनाओं के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनाया जाता है।

भारत में आर्थिक नियोजन को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है - 

  1. आर्थिक नियोजन के उद्देश्य
  2. आर्थिक नियोजन में प्राथमिकताएँ
  3. आर्थिक योजनाओं का वित्त प्रबन्ध

आर्थिक नियोजन के उद्देश्य

1. प्रथम पंचवर्षीय योजना 

इस योजना के प्रारम्भ होने के समय देश की अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त थी । द्वितीय विश्व युद्ध तथा देश विभाजन के कारण अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा था । अतः प्रथम पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था से उत्पन्न हुए इस असन्तुलन को दूर करना था।

2. द्वितीय पंचवर्षीय योजना

इस योजना की व्यूह रचना महालनोबिस मॉडल पर आधारित थी । इस योजना में कृषि के स्थान पर उद्योगों को, श्रम प्रधान परियोजनाओं के आधार पर पूँजी प्रधान परियोजनाओं को, सन्तुलित विकास के आधार पर असन्तुलित विकास को, उपभोग के स्थान पर उत्पादन व रोजगार को मान्यता दी गई।

3. तृतीय पंचवर्षीय योजना 

इस योजना का प्रमुख उद्देश्य आत्म-स्फूर्ति की अवस्था को प्राप्त करना था । इस योजना में कृषि एवं सिंचाई के विकास को महत्व प्रदान करते हुए कहा गया है कि विकासशील अर्थव्यवस्था को खाद्य व कच्चे माल की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु, कृषि उत्पादन में वृद्धि लाने की अत्यधिक आवश्यकता है ।

4. चतुर्थ पंचवर्षीय योजना 

इस योजना में 'स्थिरता के साथ विकास' का नारा दिया गया। योजना के लक्ष्यों में खण्डीय सन्तुलन का महत्व स्वीकारा गया, पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर जोर दिया गया तथा भारत के विदेशी व्यापार क्षेत्र को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया ।

5. पाँचवीं पंचवर्षीय योजना 

इस योजना की व्यूह रचना अपने दोहरे उद्देश्यों - 

  1. गरीबी को दूर करना
  2. आर्थिक निर्भरता को प्राप्त करना,

यद्यपि इस योजना में गरीबी निवारण कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी गई लेकिन गरीबी कम करने के लिए घरेलू उत्पाद में वृद्धि की दर को ऊँचा उठाने पर जोर दिया गया।

  • चालू विकास परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने
  • पूर्व स्थापित क्षमताओं का पूर्ण प्रयोग करने
  • मुख्य क्षेत्र में आवश्यक न्यूनतम लक्ष्यों को प्राप्त करने
  • समाज के कमजोर वर्गों के लिए विकास का न्यूनतम स्तर प्राप्त करने पर बल दिया गया।

6. छठी पंचवर्षीय योजना

इस योजना की व्यूह रचना कृषि और उद्योग दोनों क्षेत्रों की संरचना को सुदृढ़ करने के लिए की गयी, ताकि पूँजी निवेश, उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार हो सके और इस उद्देश्य से तैयार किये गये विशेष कार्यक्रमों के द्वारा ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर में वृद्धि हो जिससे लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें 1 

7. सातवीं पंचवर्षीय योजना 

इस योजना में (i) गरीबी कम करने, (ii) उत्पादन बढ़ाने, (iii) रोजगार के अवसर बढ़ाने को प्राथमिकता दी गयी। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए जो रीति-नीति अपनायी गयी उसमें गरीबी की समस्या पर सीधा प्रहार किया गया तथा बेकारी व क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने का प्रयास किया गया। 

8. आठवीं पंचवर्षीय योजना 

इस योजना में मुख्य ध्यान मानव संसाधन विकास पर दिया गया। इसी आधारभूत उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए रोजगार सृजन, जनसंख्या नियन्त्रण, अशिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा, पेयजल और पर्याप्त अन्न एवं बुनियादी ढाँचे के प्रावधानों की योजना को प्राथमिकता के रूप में माना गया।

9. नौवीं पंचवर्षीय योजना 

न्यायपूर्ण वितरण एवं समानता के साथ विकास को इस योजना का मुख्य लक्ष्य निर्धारित किया गया। योजना के प्रमुख उद्देश्य में निर्धनता निवारण एवं उत्पादक रोजगार सृजन हेतु कृषि एवं ग्रामीण विकास, मूल्य स्थिरता के साथ विकास की दर की प्राप्ति, खाद्य एवं पोषण सम्बन्धी सुरक्षा, सात बेसिक न्यूनतम सेवाओं का प्रावधान आदि शामिल हैं।

आर्थिक नियोजन में प्राथमिकताएँ

नियोजित विकास के लिए जो व्यूह रचना अपनाई गई है, उसे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में साधनों के आवण्टन या विनियोग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। एक योजना की तुलना में दूसरी योजना में विनियोग के प्रारूप में काफी अन्तर होता है।

भारत एक विकासशील देश है जहाँ नियोजित ढंग से आर्थिक विकास करने के प्रयत्न किये जा रहे हैं। हमारे पास आवश्यकता की तुलना में साधन सीमित हैं। 

अतः इस बात की आवश्यकता है कि आर्थिक नियोजन के अन्तर्गत विभिन्न उपलब्ध साधनों को इस प्रकार वितरित किया जाये कि राष्ट्रीय आय अधिकतम दर से बढ़ सके तथा शीघ्रता से देश विकसित हो सके । यही कारण है कि नियोजन में प्राथमिकताएँ निर्धारित करने की आवश्यकता होती है।

योजनाओं में प्राथमिकताएँ निर्धारित करना भी एक समस्या है कि किस योजना में किस क्षेत्र को अधिक प्राथमिकता दी जाय । वैसे प्राथमिकताएँ निर्धारित करते समय दो पहलुओं पर विशेष रूप में ध्यान दिया जाता है—

  1. समस्या की तीव्रता। 
  2. साधनों की उपलब्धि।

भारत की विभिन्न योजनाओं में प्राथमिकताएँ इस प्रकार हैं -

प्रथम पंचवर्षीय योजना 

इस योजना में यह व्यूह रचना रखी गयी थी कि कृषि विकास के द्वारा अर्थव्यवस्था में अधिशेष उत्पन्न किया जायेगा जो औद्योगीकरण को बढ़ावा देगा तथा आर्थिक विकास की गति तीव्र हो जायेगी। इसी योजना में परिवहन साधनों व सामाजिक सेवाओं को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया । इस योजना में कृषि, सिंचाई व शक्ति पर 46.6 प्रतिशत तथा परिवहन व संचार पर 26.4 प्रतिशत व्यय किया गया ।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना 

इस योजना में विकास की प्राथमिकताओं में परिवर्तन कर दिया गया। कृषि के स्थान पर उद्योग एवं खनिज के विकास पर बल दिया गया । इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र में कुल 4,672 करोड़ रुपये व्यय हुए थे जिसका 24.1 प्रतिशत उद्योग व खनिज पर, 27 प्रतिशत परिवहन एवं संचार पर, 18.9% सिंचाई व विद्युत पर, 18.3% सामाजिक सेवाओं पर व 11.7% कृषि एवं सामुदायिक विकास पर व्यय किये है गये।

तृतीय पंचवर्षीय योजना 

द्वितीय पंचवर्षीय योजना में खाद्यान्नों की समस्या पुनः उत्पन्न होने के कारण तृतीय पंचवर्षीय योजना में कृषि को फिर से प्राथमिकता दी गयी तथा दूसरा स्थान उद्योगों व खनिजों को प्रदान किया गया। इस योजना में कृषि एवं सिंचाई पर 20.5%, शक्ति पर 14.6%, उद्योग एवं खनिज पर 22.9%, परिवहन एवं संचार पर 24.6%, समाज सेवा व अन्य पर 17.4% व्यय किया गया। चीन के आक्रमण के बाद योजनागत प्राथमिकताओं में परिवर्तन करके इस योजना को सुरक्षा प्रधान बनाया गया ।

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना

इस योजना में कृषि को प्राथमिकता दी गयी जिससे कि देश कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके । दूसरा स्थान उद्योग एवं खनिज को, तीसरा स्थान परिवहन व संचार को दिया गया, जबकि चौथा स्थान शक्ति का रहा । इनका कुल व्यय कृषि एवं सिंचाई पर 23.3%, उद्योग पर 19.7%, परिवहन व संचार पर 19.5%, शक्ति पर 18.6%, समाज सेवा व अन्य पर 18.9% रहा।

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना 

इस योजना का मुख्य उद्देश्य गरीबी उन्मूलन एवं आत्मनिर्भरता की प्राप्ति थे । इसमें प्राथमिकता इस प्रकार निर्धारित की गयी कि सभी क्षेत्रों का अनुकूलतम विकास हो सके तथा चालू योजनाओं को पूरा किया जा सके तथा विद्यमान क्षमता का पूर्ण उपयोग हो सके। इस योजना में उद्योग एवं खनिज पर 24.3%, कृषि एवं सिंचाई पर 22.1%, परिवहन व संचार पर 17.4% तथा शक्ति पर 18.8% व्यय हुआ।

छठवीं पंचवर्षीय योजना

इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र में वास्तविक व्यय 97,500 करोड़ रुपये था जो कि विभिन्न मदों पर इस प्रकार व्यय किया गया—(1) तेल की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि हो जाने के कारण ऊर्जा को उच्च प्राथमिकता दी गयी और इस मद पर कुल व्यय का 28.1% व्यय किया गया। (2) द्वितीय स्थान पर परिवहन व संचार को महत्व मिला। उन पर कुल व्यय का 16.2% व्यय किया गया। इसी प्रकार कृषि व सिंचाई उद्योग व खनिज पर कुल व्यय का 24% व 13.7% व्यय किया गया ।

सातवीं पंचवर्षीय योजना 

इस योजना में गरीबी कम करने, उत्पादकता बढ़ाने व रोजगार के अवसर बढ़ाने को प्राथमिकता दी गयी। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए जो रणनीति अपनायी गयी उसके अनुसार सार्वजनिक व्यय इस प्रकार हुआ । कृषि एवं सिंचाई पर 22%, शक्ति पर 8-2%, खनिज एवं उद्योग पर 13.4%, परिवहन व संचार पर 17.4% व शेष अन्य सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर व्यय हुआ ।

आठवीं पंचवर्षीय योजना 

इस योजना में रोजगार सृजन, खाद्य पदार्थों में आत्मनिर्भरता तथा समाज सेवाओं को प्राथमिकता दी गई थी जिसके लिए योजना व्यय का 26.6% ऊर्जा पर, 18.3% समाज सेवाओं पर व 2.9% कृषि एवं सिंचाई पर व्यय किया गया ।

नौवीं पंचवर्षीय योजना 

न्यायपूर्ण वितरण एवं समानता के साथ विकास करने को इस योजना में प्राथमिकता दी गयी । योजना अवधि में 7% की वार्षिक विकास दर को प्राप्त करने के लिए कृषि क्षेत्र में 4.2% व उद्योग में 9.3% की दर से विकास का लक्ष्य रखा गया है। 

आर्थिक योजनाओं का वित्त प्रबन्ध

किसी भी देश के आर्थिक नियोजन की सफलता के लिए यद्यपि भौतिक, मानवीय एवं तकनीकी साधनों संग्रह की आवश्यकता होती है, लेकिन वित्तीय साधनों के संग्रह की आवश्यकता इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। आर्थिक योजना चाहे बड़ी हो या छोटी बिना पर्याप्त वित्तीय साधन के पूरी नहीं हो सकती है । अतः योजनां की सफलता वित्तीय साधनों पर बहुत बड़ी मात्रा में निर्भर करती है। योजनाओं के लिए वित्तीय साधनों का संग्रह कई स्रोतों से हो सकता है । इसके प्रमुख स्रोत इस प्रकार हैं। 

1. घरेलू बजट साधन 

योजनाओं में प्रारम्भ में घरेलू बजट साधनों पर निर्भरता अधिक रही है। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में घरेलू साधनों का प्रतिशत इस प्रकार रहा है - प्रथम योजना में 73.4%, द्वितीय योजना में 57.1%, तृतीय योजना में 58.7%, चतुर्थ योजना में 74.3%, पंचम योजना में 8.4%, षष्ठम योजना में 78.2%, सातवीं योजना में 82.3% व आठवीं योजना में 82.8%।

2. कराधान या करारोपण 

विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए वित्तीय व्यवस्था में कराधान एक महत्वपूर्ण साधन है। नता की स्वेच्छा से बचत तो बहुत कम होती है । अतः कराधान उनको विवश करता है कि वे अपनी आय का एक निश्चित भाग अवश्य ही कर के रूप में बचायें। भारत की पहली, दूसरी व तीसरी योजनाओं में कराधान का प्रतिशत 33, 22-7 व 28.7 रहा, जबकि चौथी, पाँचवीं, छठवीं व सातवीं योजना में क्रमशः 26 ·51, 52, 36.7 व 25.6 प्रतिशत रहा है । करारोपण से प्राप्ति सन्तोषजनक नहीं रही है। किसी भी योजना में लक्ष्य प्राप्त नहीं किये जा सके हैं। ।

3. सार्वजनिक ऋण 

जब नियोजन पर होने वाला व्यय बड़ी मात्रा में होता है तो अकेला कराधान इसे पूरा नहीं कर पाता है। अत: अतिरिक्त साधनों को एकत्रित करने के लिए सरकार द्वारा ऋणपत्र, बॉण्ड आदि जारी किये जाते हैं जिन पर सरकार द्वारा ब्याज दिया जाता है जिससे जनता की बचतें ऋण के रूप में सरकार के पास आ जाती हैं तो इससे निवेश की दर बढ़ जाती है। भारत की प्रथम तीन पंचवर्षीय योजनाओं में सार्वजनिक ऋणों का प्रतिशत क्रमशः 10, 16.5 व 9.6 रहा है । लेकिन चौथी, पाँचवीं, छठवीं व सातवीं योजना में यह क्रमशः 19.5%, 15.9%, 20% व 19.1% प्राप्त हुआ है ।

4. सार्वजनिक उपकरणों से बचत

किसी भी देश के सार्वजनिक उपक्रम विकास कार्यक्रमों के लिए साधन जुटाने में काफी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। भारत में केन्द्रीय सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों में आजकल 3,03,332 करोड़ रुपये से भी अधिक धन विनियोजित है, लेकिन भारतीय सार्वजनिक उपक्रमों की दशा इस दृष्टि से अच्छी नहीं है। अधिकांश घाटे में चक्र रहे हैं और जो लाभ दे भी रहे हैं वह निजी क्षेत्र की तुलना में बहुत ही कम है ।

5. अल्प बचत 

अल्प बचत को प्रोत्साहन देकर कम आय वालों को योजनाओं में सहयोग देने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। भारत एक गरीब देश है। यहाँ प्रति व्यक्ति आय निम्न है, अतः यह बचत की अपनी सीमा है । अल्प बचत प्रतिशत विभिन्न योजनाओं में क्रमशः 13%, 8.6%, 6.6%, 6.3%, 5*1%, 8.9% व सातवीं योजना में 11% था।

6. विदेशी ऋण एवं सहायता

जब किसी देश में पर्याप्त पूँजी एवं तकनीकी ज्ञान उपलब्ध नहीं होता तो विदेशी सहायता एवं ऋण लिये जाते हैं। यह विदेशी सहायता एवं ऋण कई रूपों में जैसे विदेशी मुद्रा ऋण, वस्तुओं का आयात,विदेशी मुद्रा अनुदान आदि में लिये जाते हैं। 

भारत ने विदेशी ऋण एवं सहायता का उपयोग पर्याप्त मात्रा में किया है जो प्रथम आठ योजनाओं में कुल व्यय का क्रमश: 9.6%, 22.5%, 28-2, 12.9, 12-8, 7-7, 10-0 व 12.6 प्रतिशत रहा है। नौवीं योजना में विदेशी सहायता का लक्ष्य 6.9 प्रतिशत रखा गया है।

7. घाटे की वित्त व्यवस्था 

अर्थ प्रबन्धन का यह एक नया साधन है। लेकिन इसका उपयोग बहुत सोच विचार कर किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था के सहारे सरकार चालू राजस्व से अधिक व्यय करने के योग्य हो जाती है। ऐसा अतिरिक्त मुद्रा के सृजन द्वारा सम्भव हो पाता है फलस्वरूप देश में मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है। 

घाटे की वित्त व्यवस्था का सहारा प्रथम योजना से सातवीं योजना तक प्रतिशत के रूप में लगभग समान ही रहा है। आठवीं योजना में यह घटकर 4.6 प्रतिशत ही रह गया है। नवीं योजना में घाटे की वित्त व्यवस्था का प्रावधान नहीं रखा गया है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि योजनाओं की वित्तीय व्यवस्था की दिशा में अभी बहुत कुछ प्रयत्न किये जाने बाकी हैं। योजनाओं की वित्तीय व्यवस्था के स्रोतों में कर, सार्वजनिक ऋण, हीनार्थ प्रबन्धन तथा विदेशी सहायता का प्रमुख स्थान रहा है। 

यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था अब विदेशी सहायता पर अपेक्षाकृत कम मात्रा में निर्भर है लेकिन हमारे घरेलू साधनों की स्थिति में विशेष सुधार नहीं हो सका है। विशाल योजनाओं की वित्तीय व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए हमें घरेलू एवं बाह्य दोनों ही स्रोतों में सुधार करना होगा। 

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