स्थानांतरित कृषि क्या है

विश्व की प्रायः सभी उष्ण एवं आर्द्र क्षेत्रों में स्थानान्तरित कृषि किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं। पर्वतों के ढलानों पर जनजातियाँ इस प्रकार का कृषि कार्य करती हैं। एफ. ए. ओ. के अनुमान के अनुसार, विश्व का स्थानान्तरित कृषि के अन्तर्गत वास्तविक क्षेत्र तीन लाख साठ हजार वर्ग किलोमीटर है।

स्थानांतरित कृषि क्या है 

जहाँ तकरीबन 20 करोड़ लोग निवास करते हैं। भारत में सन् 1955 में कमिश्नर द्वारा अनुमानित संख्या के अनुसार पाँच लाख पचपन हजार पाँच सौ सात जनजातीय परिवार के लोग स्थानान्तरित कृषि पर निर्भर हैं।

यहाँ 1.08 करोड़ हेक्टेयर जमीन में इस तरह की कृषि होती है। सर्वाधिक स्थानान्तरित कृषि करने वाले क्षेत्र मध्य प्रदेश एवं उत्तर-पूर्वी प्रान्त हैं। सन् 1960 में 9,74,680 एकड़ भूमि इस प्रकार की कृषि के अन्तर्गत थी।

मणिपुर में एक लाख हेक्टेयर भूमि अभी भी इस तरह की कृषि के अन्तर्गत है। यहाँ 65,000 हेक्टेयर भूमि में प्रतिवर्ष स्थानान्तरित कृषि होती है तथा लगभग 55,000 जनजातीय परिवार इसमें संलग्न हैं।

स्थानांतरित कृषि क्या है

विभिन्न स्थानों पर इस कृषि को विभिन्न नामों से अभिहीत किया जाता है; यथा-इण्डोनेशिया में इसे लादांग, मध्य अमेरिका में मिल्पी, ब्राजील में मैक्सिकोलोका कहते हैं। भारत में भी इसके विभिन्न नाम हैं।

यथा-मेघालय में आदि-आरिक, त्रिपुरा में होकिनसोमो, नगालैण्ड में टेकोन्धै, आंध्रप्रदेश में कोन्डापैडी, बिहार में कुरवा, खालु, बेवारा, उड़ीसा में रेमा, पोडू, डाही, कामन, बुंगा, गुदिया, डोगरचास, मध्य प्रदेश में पेढ़ा, दाहिया, बेवार, गुहाद, फटहा, दीप्पा, माढन या एरका, उत्तर-पूर्वी राजस्थान में वात्रा एवं मणिपुर में 'झूम' कहा जाता है। 

स्थानान्तरित कृषि, भूमि के एक ही भाग पर अधिक लम्बे समय तक न की जाकर समय-समय पर इसे बदलते रहकर नये भूखण्डों पर की जाती है। इसकी विभिन्न जनजातियाँ वनों को जलाकर भूमि तैयार करती हैं तो कुछ में कुल्हाड़ी द्वारा पौधों की कटाई कर भूमि तैयार की जाती है। 

इसके लिए विभिन्न चरणों में तैयार की जाती है। उदाहरण के लिए, मणिपुर के जनजातियों द्वारा अपनाये गये ढंग का वर्णन कर देने से इसके विभिन्न चरणों को समझने में मदद मिलेगी।

स्थानांतरित कृषि के विभिन्न चरण

(1) वन के किसी हिस्से का कृषि हेतु चयन।

(2) वृक्षों एवं पौधों को काटना तथा सूखने के लिए फैलाना।

(3) लकड़ियों एवं झाड़ियों में आग लगाना।

(4) पारस्परिक अनुष्ठान एवं पूजन।

(5) राख को फैलाना, जमीन तैयार करना।

(6) फावड़े लकड़ी की सहायता से बीज बोना।

(7) पौधों की निकौनी करना। 

(8) पौधे की देखरेख और सुर।

(9) फसल काटना तथा जमा करना।

(10) आनन्दोत्सव।

(11) भूखण्ड को परती छोड़ आगे बढ़ जा।

मध्य प्रदेश के कमारों का विवरण देते हुए दुबे (1951) ने स्थानान्तरित कृषि के तीन प्रमुख रूप बतलाए हैं। दाही. वेबर एवं गुहाद । इनमें दाही सर्वाधिक प्रचलित है। इस विधि में जमीन के ऐसे हि की खोज की जाती है जहाँ पानी बराबर उपलब्ध हो । उसके बाद वृक्षों को काटकर गिरा दिया जाता है सूखने के बाद उन्हें जला दिया जाता है। 

इस कार्य के लिए दिन नियत किया जाता है। बुधा राज पूजा के बाद वृक्षों को जलाया जाता है। प्रथम वर्ष के साथ ही खेत बोने का कार्य प्रारम्भ हो जात फसल की रक्षा के लिए खेत में ही एक झोंपड़ी बना दी जाती है। बेवर कृषि में काटने और जला पक्रिया साथ-साथ की जाती है। गुहाद में बांस का जंगल काटा जाता है। इन विधियों का अन्तिम चरण कटनी और अन्न संग्रह है।

स्थानान्तरित कृषि की विशेषताएँ

 भारतीय जनजातियाँ प्रायः दुर्गम क्षेत्रों में निवास करती हैं, जहाँ संचार एवं यातायात अभाववश कृषि सम्बन्धी उन्नति नहीं हो पायी । फलतः अधिकांश जनजातियाँ इसी परम्परागत कृषि व्यवस्था को अपनाये रही। इस व्यवस्था में एक किसान के पास बहुत थोड़ी भूमि रहती है। 

इतनी सीमित भूमि में सिर्फ जीवनयापन ही सम्भव हो पाता है, वह भी कठिनाईपूर्वक । विशेषज्ञों के मतानुसार स्थानान्तरित कृषि की उपज इतनी कम है कि अत्यन्त दयनीय स्थायी कृषि की तुलना में भी यह उसके  आठवें भाग के बराबर लोगों को ही भोजन दे सकती है। 

स्थानान्तरित कृषि की तुलना में पशुचारण उतने ही क्षेत्र में दोगुनी संख्या में आदमियों को भोजन दे सकता है। इस कृषि में अत्यल्प उत्पादन के लिए अत्यधिक श्रम की जरूरत होती है। 

इस कृषि में सबसे महत्वपूर्ण कार्य उचित भूमि का चयन है। पठारी भागों में साधारणतः 10° से 15° तक का ढाल अपेक्षित माना जाता है। इससे अधिक ढाल में पानी बह जाने की आशंका बढ़ जाती है।

इसमें जमीन और बीज के उपरान्त सबसे महत्वपूर्ण है-मानव श्रम। 15 से 60 वर्ष तक के लोगों के श्रम का बड़ा भाग इसी कृषि को समर्पित हो जाता है। यही कारण है कि जनजाति परिवारों के सभी लोग इसमें संलग्न पाये जाते हैं।

स्थानान्तरित कृषि को लगभग सभी जानकार लोगों ने अक्षम, अलाभकर और अपव्ययी बताया है। इससे वनों के नष्ट होने की आशंका एवं वातावरण में प्रदूषण की आशंका भी जाहिर की गयी है। 

आशंका जैसी भी हो, लेकिन वर्तमान समय में यह स्पष्ट है कि जब तक इन जनजातीय समुदायों को उचित कृषि प्रणाली उपलब्ध कराने का भगीरथ प्रयास नहीं किया जाता तब तक अचानक थोपा गया परिवर्तन अलाभकारी है, क्योंकि इनका सम्पूर्ण जीवनचक्र इसके साथ जुड़ा है। 

स्थानान्तरित कृषि में सरल उपकरणों, यथा-खनवी, हो, हँसिया, दांव, कुल्हाड़ी, खुरपी इत्यादि।का प्रयोग होता है।

भारत में प्रधान रूप से स्थानान्तरित कृषि करने वाली कुछ जनजातियों के नाम यहाँ दिये जा रहे हैं। गारो, त्रिपुरी, नोवटिया, रियांग, चकमा, हमार, नागा, सौरिया-पहाड़िया, हिल-खड़िया, कोरवा, बिर्जिया, सिवोरा, कुट्टिया-खोड़, कमार, बैंगा, करियाजोड़, ढोरा, समन्थस, मलकुड़िया आदि जनजातियाँ प्रधान रूप से स्थानान्तरित कृषि पर निर्भर हैं। 

बिलासपुर तथा उसके आस-पास के प्रदेश की बैगा जनजाति में भी स्थानान्तरण कृषि का प्रचलन रहा है। बैगा लोग हल से खेती करना पाप समझते थे। धरती को वे माँ समझते हैं, अतः नुकीले हल से धरती को चीरने का कार्य माँ के सीने में प्रहार करने अथवा एक अपराधी का कार्य समझते थे। 

यहाँ तक कि ये लोग हल को छूना भी एक समय में उसी प्रकार पाप समझते थे जिस प्रकार कि एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हल चलाने का अर्थ आज भी उसके जाति भ्रष्ट होने से लगाता है, परन्तु समय परिवर्तन के साथ-साथ तथा सरकारी एवं गैर-सरकारी सुधार संस्थाओं के निरन्तर प्रयास से अब इन लोगों की धारणा में परिवर्तन आ गया है तथा इन्होंने कृषि की आम प्रणाली को अपना लिया है।

उड़ीसा में स्थानान्तरण कृषि की यह व्यवस्था एक प्रकार के परिपूरक उद्योग के रूप में बदल गयी है। सवारा जनजाति के लोग, जो कि मैदानी भाग में वर्तमान प्रणाली से कृषि-कार्य करते हैं, कभी-कभी निकटवर्ती पहाड़ी ढालों पर स्थानान्तरण कृषि-कार्य करके विशेष प्रकार की फसलें पैदा करते हैं, जिनकी कि निकटवर्ती लोगों को आवश्यकता होती है।

इण्डियन काउन्सिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के एक सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि सन् 1956 में मध्य प्रदेश में करीब 40 हजार एकड़ भूमि में स्थानान्तरण कृषि प्रणाली अपनायी जाती थी। 6 हजार परिवार इस कार्य में व्यस्त थे, जिनकी कुल संख्या 30 हजार थी। इस प्रकार पूरे राज्य में 15 जनजातियाँ इस प्रणाली को अपनाती थीं। असोम की अबोर जनजाति में, जिनके जीवन का मुख्य आधार कृषि है, आदिअविक अथवा झूम खेती का अब भी प्रचुर मात्रा में प्रचलन है।

नेफा प्रदेश की अनेक जनजातियाँ आज भी झूम कृषि प्रणाली अपनाती हैं। यह प्रणाली उनकी सामाजिक प्रथा, पौराणिक गाथा एवं धर्म से सम्बन्धित है।

सन् 1953 में भारत सरकार के वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी असोम की वन समस्या के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह धारणा स्पष्ट है कि झूम कृषि ही भूमि-कटाव का एक प्रमुख कारण में है। कृषि एवं वन विभाग के विशेषज्ञों ने इस प्रणाली की अत्यधिक तीव्र आलोचना की है तथा उनका कहना है कि यह पद्धति भूमि के लिये अत्यधिक हानिकारक है। इन विशेषज्ञों ने इस समस्या के निवारण हेतु तीन प्रश्न प्रस्तुत किये हैं

1. क्या प्रत्येक राज्य सरकार के पास स्थानान्तरण कृषकों को देने के लिये मैदानी भागों में प्रचुर मात्रा में भूमि उपलब्ध है या नहीं ?

2. क्या ऐसा करने में स्थानान्तरण कृषकों का जीवन अव्यवस्थित तो नहीं हो जायेगा ? 

3. क्या कोई दूसरा उपाय उपलब्ध है अथवा नहीं ?

एक अधिकारी प्रथम प्रश्न का उत्तर आसानी से दे पाये, परन्तु अन्य दो प्रश्नों के लिये उनके पास कोई उत्तर नहीं था। दूसरी ओर गारो हिल्स जिला काउन्सिल के एक सदस्य के अनुसार उस समुदाय के लोगों ने जमीन के लिये कई बार याचना की तथा वे मैदानों में आकर बसना चाहते थे और स्थायी कृषि-प्रणाली अपनाना चाहते थे, परन्तु सरकार ने उनकी माँग पूरी नहीं की। 

हट्टन अनुसार, “बेबार अथवा स्थानान्तरण कृषि आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं है और लाभ के बजाय उससे नुकसान होने की आशंका है।'' परन्तु अनेक लोगों ने इस व्यवस्था का समर्थन भी किया है। उदाहरण के तौर पर बी. सी. गोहेन के शब्दों में, “भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए जिसमें कि परिश्रमी अबोर कृषि-कार्य करते हैं, स्थानान्तरण कृषि ही एक सम्भव व्यवस्था हो सकती है।" -

प्रसिद्ध मानवशास्त्री वैरियर एल्विन जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन आदिवासियों के साथ रहकर बिताया तथा इनकी समस्याओं को समझने की चेष्टा की उन्होंने इस कृषि-प्रणाली को उचित बताने का प्रयास भी किया। आदिवासियों की तो यह मान्यता है कि वहाँ की जमीन की बनावट में यही एकमात्र उपयुक्त प्रणाली अपनायी जा सकती है।

देश के अनेक भागों में जहाँ कि स्थानान्तरण कृषि में सरकारी प्रतिबन्ध लगाये गये हैं, वहाँ सरकार ने लोगों को हल-बैल तथा अन्य आवश्यकताओं को जुटाने के लिये कर्ज दिया, परन्तु इन सबके बावजूद जनजातियाँ अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने में असमर्थ रही हैं। इसका एक कारण यह भी है कि स्थानीय महाजन तथा साहूकारों ने इनका शोषण करने में किसी प्रकार की कसर शेष नहीं रखी है।

 अब यह प्रश्न उठता है कि क्या स्थानान्तरण कृषि को बिल्कुल समाप्त कर दिया जाये। शायद कृषि का उत्पादन बढ़ाने तथा वनों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक हो सकता है, परन्तु यह जनजातीय भावना के विपरीत भी हो सकता है। केवल वैधानिक कदम इस दृष्टि से हानिकारक होगा, अतः यहाँ पर यह उल्लेख करना अनिवार्य होगा कि अनेक सुधारपंथी अथवा अनेक समाज- सुधारक इस दिशा में अधिक सहायक हुए हैं। 

उन्होंने जनजातीय समस्याओं को अच्छी प्रकार समझा है तथा उनके दृष्टिकोण को ठीक प्रकार से समझने के बाद ही कुछ ठोस सुझाव रखे हैं। कुछ लोगों का यह भी मत है कि वैज्ञानिक तौर पर स्थानान्तरण कृषि को अपनाया जाये जिसमें न तो जमीन अथवा वनों का नुकसान हो और न ही कृषि-उत्पादन में कमी आये।

स्थानान्तरण कृषि की समस्या को सुलझाने हेतु अनेक योजनाओं को कार्यान्वित किया जा रहा है। ये योजनाएँ निम्न प्रकार है-

(1) नियोजित भूमि के प्रयोग हेतु झूम नियन्त्रण प्रदान केन्द्रों का खुलना जिसमें फसलों क बारे में भी जानकारी दी जाती है, जैसा कि असोम राज्य में किया जा रहा है।

(2) स्थानान्तरण कृषि कार्य करने वाले परिवारों के पुनर्वास के लिये बस्तियों का निर्माण करना।

(3) ये स्थान जहाँ पर स्थानान्तरण कृषि की जाती थी, वहाँ कृषि की वर्तमान पद्धति के प्रयोग में जनजातियों की आर्थिक सहायता, कृषि के औजार व बीज आदि देकर सहायता करना ।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना के दौरान जनजातियों में स्थान परिवर्ती- कृषि का बुरा आचरण छुड़ाने के लिये एक बड़ा कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। तृतीय पंचवर्षीय योजना में भूमि-संरक्षण के लिए कृषि क्षेत्र के अन्तर्गत र 59.00 लाख की तथा पिछड़े वर्ग के कल्याण के अन्तर्गत र 343.82 लाख की व्यवस्था की गई। 

इन कार्यक्रमों से असोम, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, छत्तीसगढ़ तथा त्रिपुरा में स्थान परिवर्ती कृषि से प्रभावित क्षेत्रों में लाभ की आशा की जा सकती है उपर्युक्त कार्यक्रमों के अतिरिक्त केन्द्र द्वारा चलाये गये कार्यक्रमों के अन्तर्गत आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा में नदी-घाटी परियोजनाओं के क्षेत्र में भूमि-संरक्षण के लिये तृतीय पंचवर्षीय योजनाओं में ₹ 299.00 लाख की वित्तीय व्यवस्था की गई, 

जिससे इन क्षेत्रों में स्थानान्तरण कृषि-कार्य में व्यस्त जनजातीय लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ होगा। स्थान परिवर्ती कृषि के विभिन्न पहलुओं के सम्बन्ध । में अनुसन्धान करने में राज्य सरकारों को सहायता देने के लिए आसोम में दो अनुसन्धान केन्द्र तथा त्रिपुरा में एक केन्द्र खोलने की व्यवस्था की गई है।

अनेक राज्य सरकारों की ओर से यह भी प्रयत्न हुआ है कि इन जनजातियों को मैदानी भागों में जमीन देकर बसाया जाये, केवल इसी उम्मीद से कि वे स्थानान्तरण कृषि का त्याग कर देंगे। इस दिशा में थोड़ी-बहुत सफलता अवश्य मिली परन्तु कुछ कमियाँ दोनों ओर से रहीं। वर्तमान समय में असोम के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों, मध्य प्रदेश व बिहार के छोटे-छोटे भागों को छोड़कर यह पद्धति करीब-करीब समाप्त-सी हो गई है। 

अब समस्या इस बात की है कि इसका जनजातीय आर्थिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है। कहीं-कहीं नृतत्वशास्त्रियों के विवरणों से यह ज्ञात होता है कि लम्बे अर्से तक कुछ जनजातियाँ झूम कृषि के लिए संघर्ष करती रही हैं और उन्होंने सरकार की नीति को कई बार चुनौती भी दी तथा अन्त में विवश होकर उन्होंने आम कृषि- -व्यवस्था को ही अपनाया। किन्हीं स्थानों में वे स्थानीय सेठ-साहूकारों के शिकार बने ।

 जनजातियों के लोगों को कर्जा लेकर इतना अधिक बाध्य होना पड़ा कि कर्ज न चुका सकने के कारण उन्होंने अपनी जमीन भी अन्त में इन सेठों के हवाले कर दी और स्वयं कहीं के न रहे। अतः केवल मुआवजा देकर अथवा जमीन देकर ही उनको आर्थिक विपन्नताओं से बचाया जा सकता है। उनको स्थानीय शोषणकर्ताओं से भी बचाना आवश्यक होगा। शोषण की यह प्रक्रिया सम्पर्क के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई है।


जनजातियों में स्थानान्तरण कृषि के पीछे धार्मिक एवं परम्परागत विचार भी निहित हैं। केवल आर्थिक प्रलोभन से इसका त्याग करने के प्रति वे कभी उत्सुक दिखाई नहीं दिये। अतः उनकी भावनाओं को समझना तथा उनमें एक प्रकार का विश्वास पैदा करना और भी अधिक आवश्यक है। शिक्षा के माध्यम से ऐसी समस्याओं को बहुत-कुछ सुलझाया जा सकता है। जनजातियों को इस बात का ज्ञान हो तथा वे यह स्वीकार करें कि वास्तव में स्थानान्तरण कृषि भूमि-कटाव का परिणाम होती है।

 वनों को नुकसान पहुंचता है, वन राष्ट्र की सम्पत्ति हैं, उन्हें सुरक्षित रखने पर देश को अधिक लाभ हो सकता है। इसके साथ ही इन प्रदेशों में ऐसे स्कूलों की स्थापना की जाये जिसमें उद्योगों व अन्य व्यवसायों के बारे में शिक्षा दी जाती हो तथा उन व्यवसायों व घरेलू उद्योगों की स्थापना इन प्रदेशों में की जाये जिनके लिए कच्चा माल यहाँ आसानी से उपलब्ध हो सकता है। 

स्थानान्तरण कृषि के बारे में उनके धार्मिक अन्धविश्वासों को भी इसी प्रकार समाप्त किया जा सकता है क्योंकि जनजातियाँ आज परिवर्तन के मोड़ पर हैं जिसमें आधुनिक समाज की आकांक्षाओं के साथ-साथ आदिम समाज की भावनाएँ भी निहित हैं, जिनका वे पूर्ण रूप से त्याग नहीं कर पाये हैं।




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