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साख नियंत्रण की विधियां

2. केन्द्रीय बैंक द्वारा साख नियन्त्रण की विभिन्न रीतियों का वर्णन कीजिये ।

अथवा

भारतीय रिजर्व बैंक की साख नियन्त्रण की विधियों का उल्लेख कीजिये। यह नीति कहाँ तक सफल रही है।

साख नियन्त्रण की विधियाँ

केन्द्रीय बैंक का एक महत्वपूर्ण कार्य देश की आवश्यकतानुसार साख की मात्रा को नियन्त्रित करना है । यदि चलन में मुद्रा की मात्रा पर नियन्त्रण किया जाये तथा साख को नियन्त्रित न किया जाये तो मुद्रा नियन्त्रण का उद्देश्य समाप्त हो जाता है। 

यही कारण है कि प्रत्येक देश का केन्द्रीय बैंक साख में परिवर्तन करके उसकी साख की मात्रा को समायोजित करते रहने की प्रवृत्ति पायी जाती है। देश में आर्थिक व्यवस्था व विकास की माँग के अनुसार साख की मात्रा को समायोजित करते रहने को साख नियन्त्रण कहा जाता है । इसके निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं।

(i) आन्तरिक मूल्यों में स्थिरता स्थापित करना । (ii) बाह्य मूल्य में स्थायित्व उत्पन्न करना । (iii) रोजगार तथा उत्पादन में स्थिरता बनाये रखना । (iv) आर्थिक नियोजन को सफल बनाना । (v) व्यापार-चक्रों पर नियन्त्रण रखना । (vi) विदेशी विनिमय दरों के परिवर्तनों को नियन्त्रित करना । (vii) बेरोजगारी बढ़ने तथा उत्पादन के गिरावट को नियन्त्रित करना ।

उपर्युक्त सभी उद्देश्य एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। कभी एक-दो उद्देश्यों को अधिक महत्व दिया जाता है तथा अन्य को नहीं। इसीलिये कहा जाता है कि विभिन्न उद्देश्यों में सम्बन्ध तथा समन्वय स्थापित किये रहना चाहिये तभी साख नियन्त्रण की नीति सफल हो सकती है। इस साख नियन्त्रण की निम्नलिखित रीतियाँ या विधियाँ पायी जाती हैं।

(i) बैंक दर बैंक दर वह है जिस पर केन्द्रीय बैंक अपने सदस्य बैंकों को प्रथम श्रेणी के विनिमय विपत्रों को पुनः कटौती करता है तथा उन्हें ऋण प्रदान करता है। कुछ देशों में, पुनः कटौती दर भी कहते हैं। प्रो. सेयर्स के शब्दों में, "कटौती दर वह नीति है जिसके अन्तर्गत केन्द्रीय बैंक अपने द्वारा चुनी हुई अल्पकालीन सम्पत्ति को पुनः कटौती की शर्तों या परिस्थितियों में परिवर्तन करता है अथवा सुरक्षित कर देता है।" इसके माध्यम से व्यापारिक बैंक ऋणों की प्राप्ति करते हैं। भारत में बैंक दर नीति की उपयोगिता इस कारण भी है कि देश की अर्थव्यवस्था का अभी विकास हो रहा है।

बैंक दर तथा ब्याज की दर में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। बैंक दर में वृद्धि होने से बाजार में ब्याज की दर बढ़ जाती है तथा बैंक साख महँगी हो जाती है। इससे लोगों द्वारा साख की माँग में कमी आ जाती है तथा साख का प्रसार धीमी गति से होने लगता है। दूसरी ओर बैंक दर में कमी होने से ब्याज की दर भी कम हो जाती है तथा साख भी सस्ती हो जाती है। इससे देशवासियों द्वारा साख की माँग बढ़ने लगती है। इस प्रकार शनैः शनैः साख का प्रसार होने लगता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि बैंक दर में वृद्धि होने से ब्याज की दरों में वृद्धि हो जाती है तथा साख महँगी होने के कारण साख का प्रसार धीमी गति से होने लगता है। इसके विपरीत बैंक दर में कमी करने से बाजार की सभी ब्याज की दरों में कमी आ जाती है तथा साख सस्ता हो जाता है। इस कारण साख का प्रसार तेजी से बढ़ जाता है। किन्तु अन्त में यह कहना गलत न होगा कि बैंक दर की सफलता के लिये निम्नलिखित शर्तों का पाया जाना आवश्यक है -


(i) देश में एक संगठित मुद्रा बाजार होना चाहिये । (ii) देश में स्वस्थ बैंकिंग सुविधाएँ पायी जानी चाहिये । (iii) देश की अर्थव्यवस्था लोचपूर्ण होनी चाहिये । (iv) बैंक दर के परिवर्तन से बाजार की अन्य दरों में भी परिवर्तन होना चाहिये। (v) देश में एक पूर्ण विकसित वित्त बाजार होना चाहिये । (vi) ब्याज की दर में परिवर्तन से ऋण की माँग में परिवर्तन होना चाहिये । (vii) व्यापारिक बैंकों की मुद्रा की पूर्ति को केन्द्रीय बैंक पर निर्भर होना चाहिये । 

(ii) खुले बाजार की क्रियाएँ – खुले बाजार की क्रियाएँ मात्रात्मक साख नियन्त्रण की एक अन्य इस विधि के अन्तर्गत सरकारी तथा गैर सरकारी प्रतिभूतियों, बॉण्ड तथा बिलों का क्रय-विक्रय के मात्रात्मक साख नियन्त्रण किये जाते हैं। इसके अन्तर्गत केन्द्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों तथा प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय प्रत्यक्ष रूप से अंश बाजार में करने लगता है। परन्तु ऐसा करने के लिये उसके प्रतिभूतियों का भण्डार होना नितान्त आवश्यक है। इसे ही खुले बाजार की क्रियाएँ कहते हैं ।

जब केन्द्रीय बैंक देश में साख की मात्रा में वृद्धि करना चाहता है तो वह बाजार में सरकारी तथा व्यापारिक प्रतिभूतियों को खरीदना प्रारम्भ कर देता है। 

चूँकि यह वस्तुएँ प्रायः बाजार में ऊँची दर पर खरीदी जाती हैं इसलिये बैंक इन्हें बेचने लगते हैं जिससे व्यापारिक बैंकों को नकद राशि प्राप्त हो जाती है। इससे बैंकों की तरल कोषों में वृद्धि हो जाती है जिसके कारण यह साख का प्रसार करने लगते हैं।

 इसी प्रकार जब केन्द्रीय बैंक साख का संकुचन करना चाहता है तो वह बाजार में प्रतिभूतियों को बेचना प्रारम्भ कर देता है। इसे व्यापारिक बैंक खरीदते हैं तथा अनेक बैंकों के नकद कोषों की माँग कम हो जाती है।

 इससे उनके ऋण देने की शक्ति में कमी आ जाती है तथा साख की मात्रा में भी कमी आने लगती है। परन्तु इसकी तरलता के लिये निम्नलिखित बातों का पाया जाना आवश्यक होता है।

(i) केन्द्रीय बैंक के पास असीमित प्रतिभूतियों का भण्डार होना चाहिये । (ii) ऋणों की माँग यथावत् बनी रहनी चाहिये ।

(iii) व्यापारिक बैंकों को अपनी ऋण नीति केन्द्रीय बैंक की ऋण नीति के अनुरूप बनानी चाहिये।

 (iv) मुद्रा बाजार पूर्ण रूप से विकसित होना चाहिये ।

(v) प्रतिभूतियों की माँग व पूर्ति बराबर बनी रहनी चाहिये ।

 (vi) सरकारी प्रतिभूतियों का स्थायित्व कायम रहना चाहिये ।

(vii) इन शर्तों के अभाव में साख नियन्त्रण सम्भव नहीं होता है

(iii) परिवर्तनशील न्यूनतम कोषानुपात - प्रायः विश्व के समस्त देशों में केन्द्रीय बैंक अपने सदस्य बैंकों को उधार देते हैं तथा बिलों की कटौती की सुविधा प्रदान करते हैं। इसके बदले में व्यापारिक बैंकों को अपने चालू तथा स्थायी खातों का कुछ प्रतिशत नकद रूप में केन्द्रीय बैंक के पास जमा करना पड़ता है। केन्द्रीय बैंक को इसके प्रतिशत में कमी तथा वृद्धि करने का अधिकार प्राप्त होता है। 

अतएव जब केन्द्रीय बैंक देश में मुद्रा की मात्रा कम करना चाहता है तो व्यापारिक बैंकों द्वारा रखे जाने वाले नकद कोष में वृद्धि कर देता है। इस प्रकार इस तरल का एक भाग केन्द्रीय बैंक के पास चला जाता है। इससे व्यापारिक बैंकों की साख निर्माण शक्ति कम हो जाती है । 

किन्तु इसके विपरीत जब नकद कोषों के प्रतिशत में कमी कर दी जाती है तो इससे व्यापारिक बैंकों को कुछ नकद कोष प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार इन बैंकों की साख निर्माण की शक्ति में वृद्धि हो जाती है । भारतीय रिजर्व बैंक ने इस प्रतिशत को 3% से बढ़ाकर 4% कर दिया है। वास्तव में यह रीति साख नियन्त्रण की ऐसी सरल नीति है जो नकद कोषों के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को प्रभावित नहीं करती है। यही कारण है कि यह साख नियन्त्रण की प्रभावपूर्ण रीति मानी जाती है ।

(iv) तरल कोषानुपात — द्वितीय महायुद्ध काल में साख नियन्त्रण की एक नवीन रीति का आविष्कार किया गया जिसे तरल कोषानुपात के नाम से जाना जाता है । इसके अन्तर्गत देश के व्यापारिक बैंकों को अपनी कुल " सम्पत्ति का एक भाग तरल रूप में देश के केन्द्रीय बैंक के पास रखना पड़ता है। इस तरल राशि में नकद तथा प्रतिभूतियाँ सम्मिलित होती हैं। इसका प्रभाव यह होता है कि बैंक एक निश्चित राशि नकद तथा प्रतिभूतियों के रूप में रखते हैं। 

इससे एक सीमा तक उनकी साख निर्माण शक्ति कम हो जाती है। हमारे देश में बैंकिंग अधिनियम, 1949 के अन्तर्गत प्रत्येक बैंक को अपने निक्षेपों का कम-से-कम 20% तरल कोष के रूप में अपने पास रखना पड़ता है, किन्तु अब जून 1974 से यह बढ़ाकर 33% कर दिया गया है।

(v) चयनात्मक साख नियन्त्रण — द्वितीय महायुद्ध काल में अनेक साख नियन्त्रण की रीतियों का अनुसन्धान किया गया। इनमें से कुछ ऐसी रीतियाँ हैं जो समस्त अर्थव्यवस्था पर सामान्य रूप से अपना प्रभाव डालती हैं। परन्तु कुछ ऐसी भी रीतियाँ हैं जो केवल एक विशेष माँग की वित्तीय तथा आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। 

यह पद्धति चयनात्मक साख नियन्त्रण कहलाती है। इसमें केन्द्रीय बैंक को यह अधिकार होता है कि वह किसी भी व्यापारिक बैंक को ऋण देने के सम्बन्ध में आदेश पारित करे। ऐसे आदेशों में मार्जिन निश्चित करना, पूर्व अनुमति प्राप्त करके ऋण देना, बहुमुखी दरें, ऋण देने का निषेध करना आदि शामिल हैं। इस प्रकार केन्द्रीय बैंक को ऋणों की दिशा तथा मात्रा निश्चित करने का अधिकार प्राप्त होता है। यही इस रीति का महत्व है ।

(vi) साख का राशनिंग- इस रीति के अन्तर्गत देश के केन्द्रीय बैंक को अधिकार होता है कि देश की साख आवश्यकताओं का अध्ययन करके प्रत्येक व्यापारिक बैंक की साख सृजन की अधिकतम सीमा निश्चित कर सकता है। साथ-ही-साथ देश के विभिन्न व्यवसाय के किये साख सम्बन्धी अंश भी निर्धारित कर दिये जाते है। इसके लिये निम्नलिखित उपाय किये जाते हैं।

(क) किसी बैंक या बैंकों के लिये केन्द्रीय बैंक से प्राप्त ऋण की सीमा निश्चित करना ।

(ख) किसी बैंक या बैंकों के बिलों को पुनः भुनाने की सुविधा को समाप्त करना ।

(ग) किसी बैंक या बैंकों के लिये बिलों को भुनाने की सीमा निश्चित करना ।

(vii) नैतिक दबाव केन्द्रीय बैंक देश के अन्य बैंकों का मित्र, प्रेरक तथा संरक्षक होता है। वह देश की साख नीति निश्चित करता है तथा व्यापारिक बैंकों को समय-समय पर साख नीति अपनाने की सलाह देता है। 

देश का केन्द्रीय बैंक अन्तिम ऋणदाता के रूप में भी कार्य करता है। नैतिक प्रभाव नीति द्वारा साख की मात्रा तथा उसके प्रयोग पर नियन्त्रण किया जाता है। जब केन्द्रीय बैंक साख की मात्रा एक निश्चित स्तर पर लाने का प्रयास करता है तो वह अपने व्यापारिक बैंकों को इससे सम्बन्धित सलाह देता है। वास्तव में इस रीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि केन्द्रीय बैंक को अन्य बैंकों का नेतृत्व किस सीमा तक प्राप्त है। इस दबाव का अच्छा प्रभाव होता है।

(viii) प्रचार केन्द्रीय बैंक अपनी निर्धारित साख नियन्त्रण नीति को प्रचार द्वारा जनता तथा अन्य विनियोगी वर्गों के समक्ष रखती है। यह प्रचार पत्र-पत्रिकाओं में लेख देकर, भाषणों तथा गोष्ठियों के माध्यम से किया जाता है। 

इस प्रकार विज्ञापन तथा प्रचार के माध्यम से केन्द्रीय बैंक अपनी साख नीति के पक्ष में प्रभावशाली जनमत तैयार करने में सफल हो सकता है। इस सम्बन्ध में कहा जाता है कि साख में प्रधान तत्व मस्तिष्क की दशा है और आय साख नियन्त्रण तब तक नहीं करते हैं जब तक लोकमत को नियन्त्रित कर लेते हैं। इस रीति को समझना देश की जनता की शिक्षा, सामान्य ज्ञान तथा जागरूकता पर निर्भर करती है।

(ix) प्रत्यक्ष कार्यवाही - प्रत्यक्ष कार्यवाही को सीधी कार्यवाही भी कहा जाता है। प्रत्येक व्यापारिक बैंक को केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित साख नीति का पालन करना आवश्यक होता है। यदि कोई बैंक ऐसा नहीं करता है तो केन्द्रीय बैंक उसके विरुद्ध सीधी कार्यवाही कर सकता है। 

इसमें उसके बिलों को न भुनाना, उसे अग्रिम राशि न देना, ऋण पर बैंक से अधिक ब्याज लेना आदि सम्मिलित होते हैं। इस सम्बन्ध में बैंकों को चेतावनी भी दी जा सकती है कि यदि उनका रवैया न बदला तो उनका लाइसेन्स रद्द किया जा सकता है। इसे ही केन्द्रीय बैंक की प्रत्यक्ष या सीधी कार्यवाही कहा जाता है। 

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