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अनाच्छादन, अपक्षय एवं अपरदन किसे कहते हैं

अनाच्छादन किसे कहते हैं

अन्तर्जात शक्तियाँ अनेक प्रकार से पृथ्वी की सतह को या धरातल को ऊँचा-नीचा करती रहती हैं, वहाँ की चट्टानों की संरचना को प्रभावित कर उन्हें कठोर या असंगठित बनाने में सहायक रहती हैं। 

इसके ठीक विपरीत, बहिर्जात शक्तियाँ असमतल धरातल या ऊँचे-नीचे भागों को विविध क्रियाओं, शक्तियों एवं अभिकर्ताओं के द्वारा समतल करने का प्रयास करती रहती हैं। 

अतः इस प्रक्रिया में एक ओर जहाँ ऊँचे भाग कट-छंटकर बहाए जाते हैं वहीं इन्हें निम्न धरातलीय भागों में बहाकर जमा कर दिया जाता है। इस प्रकार, ऐसी सम्पूर्ण क्रिया-कलाप जिसके द्वारा असमतल धरातल पर समतलीकरण का कार्य होता जाता है, अनाच्छादन कहलाती है। 

इसमें स्थैतिक (स्थिर) एवं गतिशील  दोनों ही प्रकार की शक्तियाँ कार्य करती हैं।

मांकहाउस महोदय के अनुसार, “अनाच्छादन शब्द का प्रयोग उन समस्त कारकों की क्रियाओं के लिए किया जाता है जिनसे धरातल का कोई भाग विनाश, अपव्यय तथा क्षति से गुजरता है तथा उपलब्ध अवसाद परिवहन कर अन्यत्र अवसादी शैलों की रचना हेतु जमा कर दिया जाता है।"

डॉ. सविन्द्र सिंह के अनुसार, "अनाच्छादन स्थैतिक एवं गतिशील दोनों शक्तियों का योग है।" 

स्थैतिक या स्थिर शक्ति  द्वारा अनाच्छादन से अर्थ यह है कि जब चट्टानें बिना किसी गतिशील शक्ति के प्रभाव से अपने ही स्थान पर टूट-टूटकर अपखण्डित होती हैं तथा रासायनिक क्रिया द्वारा अपघटित होती रहती हैं तो इसे अपक्षय कहते हैं।

गतिशील शक्तियों 

गतिशील शक्तियों के द्वारा स्थैतिक शक्तियों द्वारा एकत्रित या धरातल पर उपलब्ध पदार्थों को काट-छाँटकर व बहाकर निम्न भागों की ओर ले जाकर जमा करने की सम्पूर्ण क्रिया पूरी की जाती है क्योंकि गतिशील शक्तियों द्वारा जो पदार्थ बहाकर ले जाया जाता है वह कहीं-न-कहीं तो जमा किया ही है। 

अतः कटाव, बहाव एवं जमाव तीनों ही क्रियाएँ कटाव का ही परिणाम हैं। कटाव प्रधानत: ढाल है एवं गुरुत्वाकर्षण से निर्धारित होता है। भूतल पर पदार्थों का अनाच्छादन एवं क्षरण या वृहद् क्षरण की क्रिया कई प्रकार से प्रभावित रही है। 

इसी कारण जब केवल तेज ढाल के प्रभाव से ही अपक्षय द्वारा एकत्रित पदार्थ बिना गतिशील शक्ति की सहायता से नीचे गिरते जाते हैं तो उन्हें वृहद् क्षरण  कहा जाता है । 

इस क्रिया में भू-स्खलन के समय एक साथ बड़े पैमाने पर पदार्थों का ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से स्थान परिवर्तन होता है। ऐसे पदार्थ एवं अन्य अपक्षय द्वारा ऊपरी डाल पर एकत्रित पदार्थ निरन्तर पर्वत पदीय भागों में एकत्रित होते रहते हैं। एक भू-वैज्ञानिक के अनुसार अर्थात् यदि आप किसी भृगु से नीचे गिरें तो इसे । धू-वैज्ञानिक भाषा में वृहद् क्षरण कहेंगे।

संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि अनाच्छादन में स्थैतिक एवं गतिशील या अपरदनकारी शक्तियों का सम्पूर्ण कार्य सम्मिलित है। अतः अनाच्छादन = अपक्षय + अपरदन 

अपक्षय किसे कहते हैं

अपक्षय  स्थैतिक या स्थिर शक्ति है। इसमें वायुमण्डल के विशेष कारकों आदि के कारण पृथ्वी की सतह की चट्टानें टूटती-फूटती अथवा विशेष रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव से अपघटित होती रहती हैं। 

हिण्ड्स के अनुसार, “अपक्षय से तात्पर्य यान्त्रिक विघटन अथवा रासायनिक अपघटन से है जो चट्टानों के सामंजस्य को नष्ट कर देता है।” 

दूसरे शब्दों में, जब चट्टानें बिना स्थान बदले विशेष प्राकृतिक कारकों की क्रिया से अपखण्डित एवं अपघटित होती रहती हैं तो उसे अपक्षय कहा जाता है। , 

आर्थर होम्स के अनुसार अपक्षय उन विभिन्न भूपृष्ठीय प्रक्रियाओं का प्रभाव है जो चट्टानों के विनाश एवं विघटन में सहायक होते हैं, बशर्ते कि ढीले पदार्थों का बड़े पैमाने पर परिवर्तन न हो।' 

स्पार्क के अनुसार, “पृथ्वी की सतह पर प्राकृतिक कारणों द्वारा चट्टानों को अपने ही स्थान पर यान्त्रिक टूटने अथवा रासायनिक वियोजन होने की क्रिया को अपक्षय कहा जाता है।"  

सविंद्र सिंह के अनुसार, “अपक्षय ताप, वायु, जल तथा प्राणियों का कार्य है जिसके द्वारा यान्त्रिक तथा रासायनिक परिवर्तनों से चट्टानों में टूट-फूट होती रहती है ।" 

ऐसे प्राकृतिक कारक भौतिक या यान्त्रिक, रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं द्वारा अपना कार्य करते रहते हैं।भूतल पर अपक्षय की क्रिया दो रूपों में होती है।

(i) अपखण्डन या विघटन 

जब बदलते हुए मौसम एवं वायुमण्डल (ताप, जल व हिमवृष्टि, जल आदि) के प्रभाव से कठोर चट्टानें भी अपनी सन्धियों या फटन तल के सहारे टुकड़ों में टूट-टूटकर छोटे-छोटे कणों एवं बालू में बदलती जाती हैं तो उसे अपखण्डन या भौतिक अथवा यान्त्रिक अपक्षय कहते हैं।

(ii) अपघटन 

जब चट्टानों में पाये जाने वाले खनिज या रसायन एवं वायुमण्डल की गैसों के साथ विशेष प्रकार की क्रिया करके चट्टानों को घोलकर या रासायनिक क्रिया द्वारा चूरा एवं अन्य पदार्थों में बदलते रहते हैं तो ऐसी क्रिया को चट्टानों का अपघटन कहते हैं। 

वह अपक्षय की विशेष दशा है। इसी कारण इसे रासायनिक अपघटन भी कहते हैं।

अपक्षय को नियन्त्रित करने वाले कारक 

पृथ्वी भाग में अपक्षय का स्वरूप किस प्रकार का हो अथवा वहाँ भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में से कौन-सा स्वरूप महत्वपूर्ण हो सकता है, यह मुख्यतः निम्न कारकों एवं उन पर आधारित क्रियाओं का परिणाम होती है।

(1) वायुमण्डलीय क्रियाएँ एवं जलवायु 

सभी प्रकार की वायुमण्डलीय क्रियाओं का आधार प्रधानतः सौर ऊर्जा है। अत: भूतल पर उसकी प्राप्ति, वायुमण्डल का तापमान, उसका दैनिक व मौसमी अन्तर, वायु में नमी व संघनन के रूप, हिम व जलवृष्टि आदि सभी कारक मिलकर भौतिक अपक्षय के लिए आधार बनाते हैं। 

उष्ण-कटिबन्धीय शुष्क प्रदेश भौतिक अपक्षय के लिए आदर्श प्रदेश माने जाते हैं। यहाँ दिन में तेज तापमान से चट्टानें आग की भाँति गर्म हो जाती हैं एवं रात्रि के पिले प्रहर में शीतल हो जाती हैं। 

इससे चट्टानों के खानेज गर्मी में प्रसारित होते एवं शीतल होने पर सिकुड़ते है। ऐसी क्रिया निरन्तर होने से ही चट्टानें टूटती-फूटती हैं। 

कठोर चट्टानों में भी दरारें व फटन पड़ने लगती है। शीतोष्ण शुष्क प्रदेशों में मामूली नमी एवं शीतकाल के प्रभाव से पानी बर्फ में बदलकर चट्टानों का भौतिक अपक्षय करता है, 

जबकि उष्ण व तर या विशेष आर्द्र प्रदेशों में ऊँचे तापमान वाले जल में अनेक गैसें मिलकर कई प्रकार की चट्टानों, क्षारों व लवणों को घोल लेती हैं। इससे चट्टानों के खनिजों में अपघटन एवं रासायनिक परिवर्तन होने लगता है।

(2) चट्टानों की संरचना व्यवस्था 

अपक्षय किसी भी प्रकार से या घटना से हो, उस पर चट्टानों की संरचना एवं खनिज संगठन एवं उसकी सन्धियों के स्वरूप जैसी विशेषताओं का विशेष प्रभाव पड़ता है। 

कठोर चट्टानों में जहाँ रासायनिक क्रियाएँ बहुत सीमित स्तर पर होती हैं, वहीं ऐसी चट्टानों का भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय भी चट्टानों की सन्धियों या दरारों के सहारे ही होगा। 

चट्टानें बड़े-बड़े खण्डों में टूटेंगी। मुलायम खनिज वाली अथवा रन्ध्रमय चट्टानों का कणमय विखण्डन या भौतिक अपक्षय भी शीघ्र होगा एवं रासायनिक अपघटन के प्रभाव से भी ऐसी चट्टानें शीघ्र अपना रूप बदलकर एवं घुलकर नष्ट हो जायेंगी।

इसी भाँति जब चट्टानों की सन्धियाँ खड़ी होंगीं तो उन पर ताप परिवर्तन एवं तुषार एवं पाले की क्रिया का विशेष प्रभाव पड़ेगा। ऐसी चट्टानें इन सन्धियों के शीघ्र ढीला होने के साथ-साथ इनका परतों के सहारे अपक्षय होता जायेगा।

(3) भूमि का ढाल 

अपक्षय में ढाल का विशेष महत्व है। अधिक ढालू चट्टानी भू-भाग पर प्रायः रासायनिक अपक्षय कठिनाई से हो पाता है । भौतिक अपक्षय से विघटित चट्टानें शीघ्र ढाल से फिसलकर पर्वत पदीय क्षेत्र में नुकीली चट्टानों के रूप में इकट्ठी होती जायेंगी। 

तेज ढालू क्षेत्रों में वृहद क्षरण भी ज्यादा होगा। यहाँ पर भौतिक अपक्षय के लिए भीतरी चट्टानें शीघ्र सतह पर आती जायेंगी, जबकि कम ढालू एवं समतलप्रायः क्षेत्रों की ऊपरी परत वहीं बनी रहेगी। 

अत: ऐसे भागों की चट्टानों में भौतिक अपक्षय सीमित अवस्था में एवं ऊपरी परत पर ही प्रभावी होगा । यहाँ पर रासायनिक अपक्षय केवल आर्द्र जलवायु होने पर ही सम्भव है।

(4) वनस्पति एवं जैव जगत 

किसी भी स्थान पर वनस्पति की उपस्थिति का अपक्षय की प्रकृति पर अवश्य प्रभाव पड़ता है। यद्यपि वनस्पति मिट्टी का कटाव रोकती है फिर भी कठोर चट्टानी प्रदेश में जड़ों को जगह ढूँढ़ने के लिए चट्टानों का अपक्षय आवश्यक हो जाता है। 

वन प्रदेशों में अपक्षय कम एवं चट्टानों का व मिट्टी का संरक्षण अधिक होता है। इसी प्रकार प्राकृतिक जैव जगत भी सीमित मात्रा में भौतिक व रासायनिक अपक्षय में सहायक रहता है। तापमान की समरूपता व पाले का प्रभाव कम रहने से वनस्पति वाले प्रदेशों में अपक्षय सीमित ही रहता है।

अपक्षय के प्रकार 

अपक्षय तीन प्रकार का होता है :

1.भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय।

2 रासायनिक अपक्षय  एवं ।

3.जैविक अपक्षय।

(1) भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय 

यान्त्रिक अपक्षय में चट्टानों का विघटन अथवा विखण्डन होता है। इससे मजबूत शिलाखण्ड भी निरन्तर यान्त्रिक या भौतिक अपक्षय के प्रभाव से टुकड़ों में एवं बालू में बदलते जाते हैं। यह क्रिया निम्न कारकों द्वारा भूतल पर गतिशील बनी रहती है।

 ताप परिवर्तन क्रिया से विघटन 

जिन क्षेत्रों की चट्टानों की संरचना अनेक प्रकार के खनिजों वाली होती है वहाँ दिन में ऊँचे तापमान के कारण ऐसी चट्टानें तेजी से फैलने लगती हैं एवं रात के पिछले पहर में तेजी से तापमान घटने से पुनः तेजी से सिकुड़ने लगती हैं। 

बार-बार इस प्रकार फैलने और सिकुड़ने से ऐसी चट्टानें अपनी जोड़ या सन्धि के सहारे टूटती जाती हैं। इस भाँति मुलायम चट्टानें तेजी से चूर्ण रूप में बदल जाती हैं।

पाले की दशा का प्रभाव 

शीतोष्ण प्रदेशों में सर्दियों में रात्रि के तापमान जहाँ हिमांक बिन्दु नीचे पहुंच जाते हैं वहाँ पर भिन्न प्रकार से भौतिक अपक्षय होता है। ऐसे स्थानों पर दिन में पानी ढालू भागों में या सन्धियों के सहारे चट्टानों में प्रवेश कर जाता है। 

रात्रि में यही पानी बर्फ में बदल जाता है। बर्फ पानी से ज्यादा जगह घेरती है। अतः पानी से बर्फ में बदलते समय अधिक स्थान के लिए चलानों पर भारी दबाव पड़ता है। इससे चट्टानों के बीच या सन्धियों के बीच दूरी बढ़ती जाती है और चट्टानें टुकड़ों या कणों में टूटती जाती हैं।  

(ii) वर्षा 

गर्मी के दिनों में सूर्य के अत्यधिक ताप से चलाने गर्म होकर जब इन चट्टानों पर अचानक वर्षा का जल गिरता है तो शैलें ठण्डी होकर सिकुड़ती हैं। इस क्रिया से चट्टाने चटककर भंजित हो जाती हैं। 

मरुस्थलीय प्रदेशों में इस तरह की अपक्षय की क्रिया अधिक होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका के टेक्सास में यह क्रिया बहुत होती है।

(iv) दाब मोचन 

निचली चट्टानों का निर्माण ऊपरी दबाव के कारण होता है, किन्तु जब ऊपरी चट्टानों का अपघटन होकर दबाव कम हो जाता है तो निचली चट्टानों में चटकनें पड़ जाती हैं जिससे चट्टानों का विघटन होता है। 

(v) भूस्खलन

वर्षा काल में पहले से ढीली एकत्रित व अवसादों का ढेर भीग जाने से भारी हो जाता हैं। नवीन मोड़दार पर्वतीय ढालों की मिट्टियाँ अधिक मात्रा में जल सोख लेती हैं। इससे चट्टानों का भार बढ़ जाता है एवं वह तेजी से ढाल के सहारे भारी भार के साथ खिसकती हुई गिरती जाती हैं। 

ऐसा चट्टानों का गिरता हुआ ढेर अपने साथ मार्ग के रोड़ों एवं भूमि की सतह पर रगड़ खाते हुए और भी चट्टानी पदार्थों को इकट्ठा करता जाता है। ऐसे भूस्खलन से गाँव दब जाते हैं। इसका भी विनाशकारी प्रभाव भूकम्प से कम  रूप से ही नहीं, होता।

(2) रासायनिक अपक्षय 

शैलों का अपक्षय रासायनिक क्रिया से भी होता है। रासायनिक अपक्षय में चट्टानों के खनिजों की संरचना पर जल में घुली विभिन्न गैसों का विशेष प्रभाव पड़ता है। इससे चट्टान के जुड़े हुए कण आपस में ढीले होने लगते हैं। 

चट्टानों में पूरी तरह रासायनिक परिवर्तन होने से वे नष्ट भी हो सकती हैं। सामान्यतः रासायनिक क्रिया या अपघटन उष्ण व आर्द्र या तर प्रदेशों में विशेष महत्वपूर्ण रहता है। यह क्रिया निम्न प्रकार से ,) होती  है।

(i) ऑक्सीकरण या झारण 

पानी में ऑक्सीजन  वायुमण्डलीय आई ऑक्सीजन गैस घुली रहती है गैस चट्टानों के खनिजों से संयोग कर उन्हें ऑक्साइड में बदल देती है। यही गैस युक्त पानी उष्ण व अर्धोष्ण प्रदेशों में लौह वाली चट्टानों एवं लोहे के सामान पर तेजी से प्रभाव डालता है। 

जंग लगने की क्रिया इसी कारण होती है। बार-बार पानी व हवा के सम्पर्क में आने से लोहा बदलकर लौह ऑक्साइड बनता जाता है। 

लोहा के अतिरिक्त कैल्शियम, पोटेशियम तथा मैग्नीशियम के तत्वों पर भी ऑक्सीजन की क्रिया होती है। चट्टानों का रंग लाल, पीला या भूरा अथवा चॉकलेटी अधिकतर लौह होने से होता है।

(ii) हाइड्रेशन या जलयोजन 

चट्टानों के खनिजों में जल के अवशोषण को ही जलयोजन कहा जाता है। विशेष प्रकार की चट्टानों; जैसे बॉक्साइट, फेल्सपार आदि अधिक शीघ्रता से जल सोखती हैं। 

जल सोखने से इनका भार लगभग दुगुना हो जाता है। इसके अतिरिक्त ऐसी भीगी हुई चट्टानें तेजी से अपघटित होती जाती हैं। कुछ चट्टानें तो भीगकर खिलकर चूरे में बदल जाती हैं।

(iii) कार्बोनेशन

वायुमण्डलीय कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल में मिलकर कार्बोनिक अम्ल बनाती है अर्थात् अनेक प्रकार के कार्बोनेट बनते हैं। इसे कार्बोनेशन कहते हैं। 

चूना, चाक, डोलामाइट एवं अन्य अधिक कैल्शियम-युक्त चट्टानें पानी व कार्बनडाइ-ऑक्साइड की सम्मिलित क्रिया से तेजी से प्रभावित होती हैं। इससे चूने का कार्बन तत्व बाइ-काबोंनेट में बदल जाता है। 

(iv) विलयन या घोल 

वर्षा एवं झीलों का पानी कई प्रकार से क्षारों,लवणों, कैल्शियम एवं अन्य खनिजों को अपने में घोलता रहता है। इसी कारण अलग-अलग क्षेत्रों के जल का स्वाद अलग-अलग होता है। भारी व हल्का पानी, कड़पानी कई प्रकार से क्षारों,लवणों, कैल्शियमवा व मीठा पानी ऐसे ही घोल लेने की क्रिया का परिणाम है।

(v) सिलिका का अपघटित होना 

चट्टानों से सिलिका का अलग होना ही डिसिलीकेशन कहलाता है । आई प्रदेशों की आग्नेय चट्टानों पर पानी की क्रिया के प्रभाव से उनसे सिलिका एवं अन्य तत्व तेजी से अलग होने लगते हैं। इस क्रिया में सिलिका बालू बच रहती है । 

सिलिका-युक्त चट्टानों से जब गैस मिला उष्ण जल क्रिया करता है तो ऐसी चट्टानों का अधिकांश भाग घुल जाता है। इसे ही सिलिका का पृथक् या अलग होना भी कहते हैं।

(3) जैविक अपक्षय 

पृथ्वी की सतह पर वनस्पति, अनेक प्रकार के जन्तु एवं मानव कई विधियों से भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय की क्रिया में सहायक रहे हैं। इसमें निम्न सहायक होते हैं।

(i) वनस्पति 

वनस्पति वायुमण्डल से गैसें व नमी ग्रहण करती है । पौधों की जड़ें भूमि के नीचे निरन्तर भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय की क्रिया करती रहती हैं। 

पौधों की जड़ें निरन्तर पौधों के बढ़ने के साथ-साथ मोटी होकर अधिक स्थान घेरती हैं। इससे चट्टानें चौड़ी होने लगती हैं एवं धीरे-धीरे वे पानी से क्रिया कर टूटती व चूरा बनती जाती हैं। 

जड़ों के द्वारा आसपास की मिट्टी से भोजन ग्रहण की क्रिया चलती रहती है। इस क्रिया में विविध रासायनिक शृंखला द्वारा चट्टानों का रासायनिक अपक्षय होता जाता है।

(ii) जीव-जन्तु 

पृथ्वी की सतह पर अनेक प्रकार के प्राणी या जन्तु पाये जाते हैं। इनमें से कई जमीन में गड्ढा बनाकर अथवा बिल बनाकर रहते हैं। चूहे, साँप, बिच्छू, नेवला, दीपक, गीदड़,कुत्ता आदि ऐसे ही जीव हैं। 

इससे संगठित मिट्टी व चट्टानें ढीले कणों में सतह के निकट जा जाती हैं। ऐसी चट्टानों को बहता जल, हवा आदि आसानी से बहाकर ले जा सकते हैं। खेत उपजाऊ बनाने के लिए केंचुए एवं कुछ अन्य भूमि के नीचे रहने वाले जीव मिट्टी से रासायनिक क्रिया करते हैं, मिट्टी खाते रहते हैं। 

भूगोलविद् होम्स का मत है कि,प्रति एकड़ मिट्टी में एक लाख पचास हजार केंचुए हो सकते हैं, जो एक वर्ष की अवधि में दस-पन्द्रह टन चट्टानों को उत्तम किस्म की मिट्टी बनाकर उसे धरातल के निम्न भाग से सतह पर लाते हैं। 

इस प्रकार जन्तुओं व प्राणियों से रासायनिक क्रिया सीमित किन्तु उपयोगी तथा भौतिक अपक्षय बड़े पैमाने पर रहता है।

(iii) मानव 

यद्यपि मानव भी एक प्राणी है, किन्तु वह भूतल पर सर्वव्यापी है। उसने अपने द्वारा खोजे गए औजारों, मशीनों एवं तकनीक द्वारा पृथ्वी की सतह पर आश्चर्यजनक गति से परिवर्तन किये हैं। 

वह भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय का आज सबसे अधिक प्रभावी एवं चौंकाने वाला कारक बन गया ।

अपक्षय का प्रभाव 

अपक्षय का प्रभाव निम्न प्रकार से समझा जा सकता है।

(1) अपक्षय की क्रिया से चट्टानें ढीली हो जाती हैं और वे विघटित व वियोजित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटकर अन्ततः चूर्ण में बदल जाती हैं जिससे मिट्टी का निर्माण होता है जो मानव जीवन का आधार है।

(2) अपक्षय अपरदन में सहयोगी होता है क्योंकि इसके द्वारा चट्टानों को तोड़-फोड़कर ढीला कर दिया जाता है जिन्हें अपरदन के कारक सरलता से परिवहित कर लेते हैं । 

जब ये पदार्थ ढोए जाते हैं तो अन्य पदार्थों को रगड़कर एवं आपस में टकराकर छोटा करते जाते हैं जिससे अपरदन को गति मिलती है। 

(3) अपक्षय द्वारा चट्टानों की टूट-फूट होती रहती है जो अपरदन के कारकों द्वारा बहकर अन्यत्र जमा भी करायी जाती है। इससे धरातल समतल हो जाता है।

(4) अपक्षय से चट्टानों में विघटन के कारण धीरे-धीरे खनिज पदार्थ ऊपर आ जाते हैं।

(5) अपक्षय विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियों के निर्माण में सहयोगी होता है।

अपरदन किसे कहते हैं

अनाच्छादन की सम्पूर्णता में अपरदन एक महत्वपूर्ण कड़ी है। भूतल पर विविध प्रकार से एकत्रित रोड़े, पदार्थ या पदार्थों का ढेर निरन्तर गतिशील शक्तियों द्वारा काट-छाँटकर अन्यत्र बहाया या परिवहित किया जाता है। ऐसा परिवहित पदार्थ आगे चलकर अनुकूल दशाओं में बराबर जमा या निक्षेपित होता जाता हैं।

यद्यपि अपक्षय एवं गतिशील अपरदन दोनों ही स्वतन्त्र क्रियाएँ हैं फिर भी अपक्षय द्वारा एकत्रित पदार्थ अन्ततः शक्तियों अर्थात् नदी, हिमानी, हवा आदि द्वारा अपरदन एवं परिवहन (बहाव) द्वारा अन्य प्राकृतिक दशाओं के अनुसार अन्य भागों में ले जाकर जमा (निक्षेपित) कर दिया जाता है । 

इस प्रकार मोटे तौर पर कटाव का अर्थ पदार्थों को काटना, काटे गए पदार्थों को बहाना एवं बहते पदार्थों को जमा करना सभी क्रिया का सम्मिलित स्वरूप है । इसे ही तकनीकी दृष्टि से अपरदन कहते हैं। 

दूसरे शब्दों में, चट्टानों के अपघर्षण, क्षरण तथा परिवहन के सामूहिक रूप को अपरदन कहा जाता है।

अपरदन के लिए कई गतिशील शक्तियाँ जिम्मेदार हैं। इनके प्रमुख कारक या अभिकर्ता नदियाँ, भूमिगत जल, हवा या पवन, हिमानी एवं समुद्रतटीय लहरें आदि हैं । 

इनके द्वारा अपरदित पदार्थों परिवहन अनेक प्रकार से होता रहता है। कुछ पदार्थ तैरते हुए बहते हैं, कुछ पानी व हवा में झूलते रहते हैं, कुछ रगड़ खा-खाकर पेंदे की रेत की भाँति बहते हैं 

किन्तु भारी चट्टाने पानी में ढाल के साथ लुढ़कती जाती । इसके अतिरिक्त, कई रासायनिक घोल के रूप में पानी में घुल कर बहते हैं। इस प्रकार सभी अपरदन एवं परिवहन व जमाव के कारकों में बहते हुए जल का प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण एवं सर्वव्यापी रहा है । 

यद्यपि इसका प्रभाव मरुस्थलीय एवं बर्फीले प्रदेशों में सीमित हो जाता है।

अपरदन के रूप

अपरदन की क्रिया चट्टानों पर विविध प्रकार से प्रभाव डालती है। अत: गतिशील शक्तियों एवं अपरदन के कारकों के अनुसार विविध प्रकार की चट्टानों एवं उनकी संरचना पर भिन्न-भिन्न प्रकार से अपरदन की क्रिया होती रहती है। यह मुख्यतः निम्न प्रकार से प्रभावी रहती है।

(i) अपघर्षण 

जब अपरदन के कारण (नदी, हवा, हिमानी आदि) अपक्षय से एकत्रित या ढीली संरचना वाली चट्टानों के पदार्थों को अपरदन द्वारा बहाते हैं तो ऐसे पदार्थ चट्टानों से रगड़ खा-खाकर बहते जाते हैं। इसे ही अपघर्षण कहते हैं। 

इस क्रिया से पदार्थ और भी अधिक कटते या अपरदित होते रहते हैं। साथ ही ढीली चट्टानों व कणों की इस क्रिया द्वारा उठाकर अपने साथ ले जाये जाते हैं।

(ii) सन्निघर्षण 

इसमें हवा, नदी एवं लहरों द्वारा विशेष रूप से बहाये गये पदार्थ आपस में टकराकर, रगड़ खा-खाकर टुकड़े-टुकड़े अथवा चूरे में बदलते जाते हैं। इसके साथ-साथ अपघर्षण की क्रिया भी होती रहती है। इससे नुकीले पत्थर गोल बनते जाते हैं और इनसे धीरे-धीरे बालू व मिट्टी बनती रहती है।

(iii) जलदाब क्रिया

यह जल की एक भौतिक क्रिया है। इसका प्रभाव मुख्यतः बहते जल एवं लहरों के कार्य में देखा जा सकता है अर्थात् यह क्रिया केवल नदी द्वारा सम्भव है। इसमें पानी के भारी दबाव से विशेषकर जब दबाव एक स्थान विशेष पर क्रियाशील हो तो चट्टानें टूटती जाती हैं।

जैसे कि भंवर की या तेज दाबपूर्ण बहाव की क्रिया से अथवा लहरों का गुफाओं में फंसकर छोटे-छोटे छिद्रों द्वारा तेज दबाव से बाहर निकलते समय चट्टानों के छेद को बड़ा करने जैसी क्रिया इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

(iv) अपवाहन 

अपवाहन की क्रिया का मुख्य कारक वायु है, जबकि नदी हिमानी एवं लहरों पर ले जाया गया अवसाद परिवहन कहलाता है। वायु या हवा भौतिक अपक्षय या कटाव द्वारा एकत्रित बालू को एक स्थान से उड़ाकर अन्य स्थान पर बहा ले जाती है 

जबकि अन्य कारक पदार्थों या अवसादों को भूमि पर अपने साथ बहाकर या परिवहित करके ले जाते हैं। दोनों ही दशाओं में अपक्षय से एकत्रित या अपरदित पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाए जाते हैं।

(v) जमाव या निक्षेप 

धरातल पर अपक्षय एवं अपरदन से प्राप्त जो पदार्थ बहाकर या परिवहन एवं अपवाहन द्वारा अन्य स्थान पर ले जाया जाता है, उसे कहीं न कहीं तो अवश्य जमा होना ही है। 

जमाव की इस क्रिया को ही निक्षेप या निक्षेपण भी कहते हैं । निक्षेप एवं परिवहन कई दशाओं एवं नियमों की सीमाओं में कम-ज्यादा, धीमी गति या तेज गति से होता रहता है। 

सामान्यत: सभी अपरदन के कारक ऊपरी भागों से पदार्थ ला-लाकर निचले भागों में जमा करते रहते हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण कारक या अभिकर्ता बहता जल है। इसके लिए जमाव का सार्वभौम तल मैदान एवं सागर तट है।

इस प्रकार अपरदन, परिवहन एवं जमाव या निक्षेपण की क्रियाओं से अनेक प्रकार की भूतल की आकृतियाँ बनती व बिगड़ती तथा संशोधित होती रहती हैं।

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