ads

भारतीय नियोजन की उपलब्धियों की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए

 प्रश्न 5. भारतीय नियोजन की उपलब्धियों की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।

अथवा

भारत में नियोजन की प्रमुख उपलब्धियों एवं कमियों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

"भारतीय नियोजन के उद्देश्य बहुत अच्छे हैं, किन्तु उपलब्धियाँ निराशाजनक हैं।" इस कथन की व्याख्या कीजिए । 

अथवा

भारत में आर्थिक नियोजन की उपलब्धियों एवं असफलताओं की संक्षेप में विवेचना कीजिए। नियोजन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दीजिए।

भारत में आर्थिक नियोजन को 1 अप्रैल, 1951 से प्रारम्भ किया गया । तब से अब तक नियोजन के 58 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन 58 वर्षों में देश ने निःसन्देह बहुत प्रगति की है, हम आत्मनिर्भरता की ओर भी अप्रसर हुए हैं लेकिन अभी भी गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ पूर्ण रूप से खत्म नहीं हुई हैं । 

भारत में आर्थिक नियोजन की उपलब्धियाँ - अपने 58 वर्षों के नियोजन काल में भारत ने अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं जिसमें से कुछ इस प्रकार हैं

(1) प्रति व्यक्ति आय एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि - नियोजन काल में शुद्ध राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय दोनों में बराबर वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय 1950-51 में चालू मूल्यों के आधार पर क्रमशः 8,905 करोड़ रुपये व 225 रुपये थी जो कि 1999-2000 में बढ़कर 17,71,028 करोड़ रुपये व 16,047 रुपये हो गयी है। 

(2) कृषि का विकास–नियोजन के 58 वर्षों में कृषि उत्पादन में चार गुने के लगभग वृद्धि हुई है। खाद्यान्नों का उत्पादन 1950-51 में 508 लाख टन था वह 1999-2000 में बढ़कर 2,089 लाख टन हो गया है इसी प्रकार कपास व जूट का उत्पादन भी इसी अवधि में 30 व 33 लाख गाँठों बढ़कर क्रमश: 116 व 105 लाख गाँठें हो गया है।

सिंचाई सुविधाओं में भी चार गुने की वृद्धि हुई है। 1950-51 में 2.21 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध थीं, जबकि 1999-2000 में ये सुविधाएँ 8.47 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में मिलने लगीं।

(3) औद्योगिक क्षेत्र में प्रगति — योजना अवधि में सबसे अधिक प्रगति औद्योगिक क्षेत्र में हुई है। इन वर्षों में औद्योगिक क्षेत्र का न सिर्फ आधार ही मजबूत हुआ है बल्कि उद्योगों का विविधीकरण भी है। 

कई नये-नये उद्योग स्थापित हुए । उद्योगों के विकास के कारण पूँजीगत सामग्रियों के लिए अब भारत दूसरे देशों पर निर्भर नहीं है बल्कि भारत में पूँजीगत सामान का निर्यात होने लगा है जिससे मुद्रा अर्जन में सहायता मिल रही है। 

1950-51 व 1999-2000 के बीच तैयार इस्पात व सीमेंट में क्रमशः 24 व 37 गुना, कागज में 30 गुना, साइकिलों में 139 गुना, मशीनरी औजारों में 4,663 गुना व नाइट्रोजन खाद में 1,220 गुना उत्पादन बढ़ा है।

(4) सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार - नियोजन काल में सार्वजनिक क्षेत्र का काफी विकास हुआ है। 1950-51 में भारत में केवल 5 सार्वजनिक उपक्रम थे और उनमें 29 करोड़ रुपये विनियोजित थे।

लेकिन 2000 के अन्त तक इन उपक्रमों की संख्या 240 हो गयी जिनमें 3,03,332 करोड़ रुपये विनियोजित थे । इन उपक्रमों में 15 लाख कर्मचारी कार्य कर रहे हैं।

(5) बचत एवं विनियोग दरों में वृद्धि योजना काल में शुद्ध घरेलू बचत व शुद्ध विनियोग दोनों में बराबर हुई है। 1950-51 में सकल घरेलू बचत की दर 8.9 प्रतिशत थी जो 1999-2000 में बढ़कर 22-3 प्रतिशत हो गयी । इसी प्रकार 1950-51 में विनियोग दर 8.7 प्रतिशत थी वह 1999-2000 में बढ़कर 22.3 प्रतिशत हो गयी है।

(6) परिवहन एवं संचार साधनों का विकास योजना काल में देश में परिवहन एवं संचार साधनों का भी काफी विकास हुआ है । 1950-51 में 53,000 किलोमीटर रेलमार्ग था जो 1999-2000 में बढ़कर 62,800 किमी हो गया है। 

इसी प्रकार 1950-51 में 4 लाख किमी. लम्बी सड़कें थीं, जबकि आज इन सड़कों की लम्बाई 33-2 लाख किमी. है। 1950-51 के अन्त में जहाजरानी की क्षमता 3.7 लाख GRT थी जो अब बढ़कर 1999-2000 में 68.2 लाख GRT हो गयी है।

1950-51 में कुल 36,000 डाकखाने थे लेकिन अब इनकी संख्या एक लाख 54 हजार है। इसी प्रकार 1950-51 में 1.7 लाख टेलीफोन देश में थे जिनकी संख्या वर्तमान में बढ़कर 265 लाख हो गयी है । 

(7) शिक्षा का प्रसार – मानवीय पूँजी निर्माण में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। देश में इस दिशा में भी काफी प्रगति हुई है। शिक्षा के क्षेत्र में साक्षरता की दर जो 1951 में 18.3% थी, वह बढ़कर 1991 में 52.21 प्रतिशत हो गई । 

6- 11 आयु वर्ग के विद्यार्थियों का सकल पंजीकरण अनुपात 1950-51 में 42.6% था जो अब बढ़कर 1999-2000 में 87% हो गया है। इसी प्रकार इस अवधि में 11-14 आयु वर्ग का प्रतिशत 13 से बढ़कर 50 हो गया है।

(8) आयात एवं निर्यात में वृद्धि–58 वर्षों के नियोजन काल में आयात एवं निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 1950-51 में आयात एवं निर्यात क्रमशः 608 व 606 करोड़ रु. के थे जो 1999-2000 में बढ़कर क्रमशः 2,04,583 व 1,62,935 करोड़ रुपये के हो गये हैं।

(9) बैंकिंग क्षेत्र में उन्नति देश में बैंकिंग सेवा का काफी विस्तार किया गया है। 1951 में वाणिज्यिक बैंकों की शाखाओं की संख्या 2,647 थी जो जून 2000 के अन्त में बढ़कर 65,450 हो गयी है।

(10) स्वास्थ्य एवं जीवन प्रत्याशा में वृद्धि– योजना काल में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में समान प्रगति हुई है। 1951 में रोग शैयाओं की अस्पतालों में कुल संख्या 117 हजार थी वह अब बढ़कर 834 हजार हो गई है। इसी के परिणामस्वरूप 1951 में भारत में जीवन प्रत्याशा जो 32 वर्ष थी वह बढ़कर 61 वर्ष हो गई है।

भारतीय नियोजन की विफलताएँ —58 वर्षों के इस नियोजन काल में जो कुछ प्रगति हुई है, वह अपर्याप्त है क्योंकि योजनाओं से सम्बन्धित क्षेत्र के लिए विकास को जो लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं उनकी सापेक्षिक रूप से प्रगति की गति बहुत धीमी रही है । अतः आशा के अनुरूप सफलता नहीं मिली है। इसलिए कुछ विद्वानों का कहना है कि नियोजन असफल रहा है। नियोजन की असफलता निम्नांकित तथ्यों से स्पष्ट की जा सकती है -

(1) प्रति व्यक्ति आय व राष्ट्रीय आय में धीमी प्रगति — यद्यपि नियोजन काल में राष्ट्रीय व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है, परन्तु वृद्धि की दर बहुत धीमी रही है। हमारी आय पहले ही निम्न स्तर की है और उस पर यदि धीमी गति से ही वृद्धि हो तो सामान्य स्थिति में किसी प्रकार की सुरक्षा की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।

आय और प्रति

(2) आर्थिक विषमता में वृद्धि–आर्थिक नियोजन का एक उद्देश्य देश में आर्थिक केन्द्रीकरण को समाप्त कर आर्थिक समानता में वृद्धि करना था। लेकिन नियोजन के 58 वर्षों में धनी व्यक्ति और धनी व गरीब और गरीब हो गया है। आय व धन की असमानता बढ़ गयी है। अतः देश में गरीबी का विस्तार हुआ है।

(3) आर्थिक अस्थिरता या मूल्य वृद्धि - आर्थिक नियोजन का उद्देश्य स्थिरता के साथ विकास करना था किन्तु कीमतों को निर्धारित करने में हम असमर्थ रहे हैं। भारत में घाटे की अर्थव्यवस्था होने से यह मूल्य वृद्धि आवश्यकता से अधिक रही है ।

(4) बेरोजगारी में वृद्धि — आर्थिक नियोजन का लक्ष्य देश की बढ़ती श्रम को लाभप्रद रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है किन्तु नियोजन के 58 वर्षों में रोजगार के अवसरों में आशातीत वृद्धि नहीं हुई है। 

हर योजना के अन्त में बेरोजगारी कम होने के बजाय बढ़ती गयी है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रारम्भ में 33 लाख व्यक्ति बेकार थे,वर्तमान में लगभग 6 करोड़ व्यक्ति बेरोजगार होने का अनुमान है ।

(5) कृषि क्षेत्र में असफलता — यद्यपि नियोजन काल में कुल कृषि क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है लेकिन इन समस्याओं का निदान नहीं किया गया है। जैसे—(1) कृषि पर जनसंख्या के दबाव की अधिकता, (2) कृषि का मानसून पर निर्भर रहना, (3) अदृश्य बेरोजगारी की पर्याप्तता, (4) कृषि में यन्त्रीकरण का पिछड़ापन, (5) सिंचाई की अपर्याप्त व्यवस्था, (6) रासायनिक खाद एवं नवीन पद्धति का अभाव आदि ।

(6) औद्योगिक क्षेत्र की असफलता- औद्योगीकरण की उपलब्धियों के एक अनुमान द्वारा यह कहा जा सकता है कि औद्योगिक उन्नति का अधिकतम भाग मिथ्या है। इसके पक्ष में निम्न तर्क दिये जा सकते हैं - (1) औद्योगीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने के क्षेत्र में तीव्र विस्तार हुआ है और इसकी तुलना में छोटे तथा मध्यम क्षेत्र की उपेक्षा हुई है। (2) औद्योगीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप बेरोजगारी की समस्या में विशेष सहायता नहीं मिली है। (3) नियोजन में उपभोक्ता वस्तुओं की अपेक्षा विलासिता की वस्तुओं पर अधिक ध्यान दिया गया है । (4) उत्पादित औद्योगिक वस्तुओं की लागत पर नियन्त्रण पाने में असफलता मिली है । (5) देश के अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चल रहे हैं।

(7) लक्ष्य प्राप्ति में असफलता—योजनाओं में साधन संग्रह के निर्धारित लक्ष्यों की वास्तविक प्राप्तियों में काफी अन्तर पाया गया जिससे प्रकट होता है कि इस दिशा में नियोजन में काफी सुधार करने की आवश्यकता है। 

कहीं तो वास्तविक प्राप्ति लक्ष्यों से बहुत कम रही और कहीं बहुत अधिक । अतः नियोजन की वित्तीय व्यवस्था काफी त्रुटिपूर्ण रही है। विकास व उत्पादन के लक्ष्यों व उपलब्धियों के बीच भी अन्तर पाया गया है। 

इसके दो कारण हो सकते हैं—एक तो लक्ष्य का ठीक से निर्धारण न होना और दूसरा योजना के कार्यान्वयन में कमियों का रह जाना।

(8) विदेशी सहायता पर निर्भरता - भारतीय आर्थिक नियोजन की विफलता का एक कारण विदेशी सहायता पर अत्यधिक निर्भरता भी है। भारत पर मार्च, 2000 के अन्त तक 4,29,271 करोड़ रुपये का विदेशी ऋण भार था। समय-समय पर विदेशी सहायता रोक लिये जाने से देश के आर्थिक नियोजन में गतिरोध पैदा हो गया था जिसके फलस्वरूप योजनाओं को स्थगित करना पड़ा ।

(9) दोषपूर्ण नियन्त्रण नीति — नियोजन काल में सरकारी नियन्त्रण की नीति दोषपूर्ण रही है। विभिन्न क्षेत्रों में समय-समय पर लगाये गये नियन्त्रण परस्पर असम्बद्ध रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप नियन्त्रण का भले ही एक क्षेत्र को लाभ हुआ परन्तु अन्य क्षेत्रों को उससे हानि हुई है।

योजनाओं का सफल बनाने के लिए सुझाव — आर्थिक नियोजन को अधिकाधिक सफल बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं।

(1) व्यापक जनसहयोग — योजनाओं को सफल बनाने के लिए जनता का पूर्ण सहयोग प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है। जनता का सहयोग तभी प्राप्त किया जा सकता है, जबकि योजनाओं के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति का अन्त किया जाये और योजनाओं की पूर्ण जानकारी देकर उसके लाभों से अवगत कराया जाये । (2) मूल्य स्थायित्व — नियोजन को सफल बनाने के लिए मूल्यों में स्थायित्व लाना आवश्यक है। यद्यपि

योजनाकाल में वृद्धि होती है, लेकिन वह सीमित दायरे में ही होनी चाहिए। अत्यधिक मूल्य वृद्धि योजना की लागत बढ़ाती है

तथा योजना के लाभों को अप्रभावी कर देती है। इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

 (3) सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में समन्वय — योजनाओं की असफलता का एक कारण सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में समन्वय का अभाव भी है। ये दोनों क्षेत्र एक-दूसरे के प्रतियोगी न होकर पूरक एवं सहयोगी होने चाहिए । अतः योजनाओं की सफलता के लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में उचित समन्वय एवं सहयोग स्थापित किया जाये।

(4) दीर्घकालिक एवं अल्पकालिक कार्यक्रमों में सन्तुलन – ऐसे कार्यक्रम जो देर में फल देने वाले हैं,उनमें तथा अल्पकालिक कार्यक्रमों में सन्तुलन करना आवश्यक । कार्यक्रमों को निर्धारित समय में ही समाप्त करने का प्रयास किया जाये ।

(5) केन्द्र व राज्य में अच्छे सम्बन्ध — योजना की सफलता सदैव केन्द्र एवं राज्यों में अच्छे सम्बन्धों पर निर्भर करती है। अतः ऐसे कार्यक्रम जो केन्द्र के निर्देश पर चलाये जा रहे हों, उनमें राज्यों को भी ध्यान देना चाहिए।

(6) बचत एवं विनियोग को प्रोत्साहन — देश में पूँजी निर्माण की दर को गति देने के लिए यह आवश्यक है कि बचत एवं विनियोग को प्रोत्साहित किया जाये। इसके लिए व्यय में छूट दी जानी चाहिए । (7) कार्य प्रधान शिक्षा प्रणाली – देश में बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने के लिए शिक्षा प्रणाली

सैद्धान्तिक के स्थान पर व्यावहारिक एवं कार्य प्रधान बनायी जाय ।

(8) जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण — योजनाओं को सफल बनाने के लिए बढ़ती हुई जनसंख्या को नियन्त्रित करना आवश्यक है। बढ़ती जनसंख्या योजना के लाभों को निगल जाती है। जनसाधारण को जिस अनुपात में लाभ मिलने चाहिए उससे वे वंचित रह जाते हैं। अतः जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए कारगर उपाय किये जाने चाहिए।

(9) पूँजी प्रधान एवं उपभोग प्रधान उद्योगों में समन्वय — योजनाओं की सफलता के लिए पूँजी प्रधान एवं उपभोग प्रधान उद्योगों में समन्वय होना चाहिए जिससे कि राष्ट्र आत्मनिर्भर हो सके तथा जनता की उपभोग सम्बन्धी कठिनाइयाँ दूर हो सकें।

(10) मानव-शक्ति का उपयोग - योजनाएँ इस प्रकार की होनी चाहिए कि इन योजनाओं में उपलब्ध मानव-शक्ति अधिकाधिक लगाई जा सके। इससे बेरोजगारी की समस्या हल करने में सहायता मिलेगी । ( 11 ) प्रशासन का शुद्धीकरण योजनाओं का संचालन एवं कार्यान्वयन प्रशासन के हाथ में होता है।

अतः योजनाओं के लाभों को जन-साधारण तक पहुँचाने के लिए भ्रष्ट प्रशासन को समाप्त करना आवश्यक है ।

नियोजन के विगत 58 वर्ष सफलताओं और असफलताओं का मिश्रण रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है।

कि औद्योगिक उत्पादन में आशानुरूप प्रगति नहीं हुई है। विकास दर धीमी रही, बेरोजगारी कम होने के स्थान पर और बढ़ी है लेकिन इस अवधि में देश ने बड़ी-बड़ी कठिनाइयों को झेला है व प्राकृतिक प्रकोपों का सामना किया है। 

वास्तव में इन योजनाओं से कुछ सफलता भी मिली है। जैसे-नये-नये उद्योगों की स्थापना, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि,कृषि उत्पादन में वृद्धि, लेकिन यदि नियोजन की असफलताओं को ध्यान में रखकर कुछ और प्रयास किये जायें तो नियोजन से और अधिक लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं ।

Subscribe Our Newsletter