ads

भारत के आर्थिक विकास में कृषि की भूमिका

3. भारत में कृषि क्षेत्र के विकास में तकनीकी परिवर्तनों की क्या भूमिका रही है ? क्या भारतीय अर्थव्यवस्था में यन्त्रीकरण लाभदायक होगा ?

अथवा

कृषि के क्षेत्र में प्राविधिक परिवर्तन की अवधारणा को समझाइए।

तकनीकी परिवर्तन का सम्बन्ध उत्पादन के ढंग में परिवर्तन से होता है। ऐसा परिवर्तन किसी नयी तकनीकी या अन्वेषण के कारण होता है। 

इस प्रकार कृषि में तकनीकी परिवर्तन का अर्थ यन्त्रीकरण, उर्वरकों का प्रयोग, अधिक उपज के बीजों का प्रयोग, सिंचाई सुविधाओं तथा पौध संरक्षण आदि से है।  तकनीकी परिवर्तन में दो बातें शामिल होती हैंप्रथम, वह तकनीकी जो भूमि की उत्पादकता को बढ़ा देती है, जैसे - सिंचाई, उर्वरकों का प्रयोग, उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग आदि। 

दूसरे, वह तकनीक जिसमें मानवीय पशु श्रम के स्थान पर मशीनों, जैसे- ट्रैक्टर, थ्रेसर आदि का प्रयोग किया जाता है जिसे कृषि यन्त्रीकरण कहते हैं।

भारतीय कृषि में तकनीकी परिवर्तन

कृषि में तकनीकी परिवर्तन के लिए उत्तरदायी घटक निम्नलिखित हैं।

(1) सिंचाई, (2) उर्वरकों का प्रयोग, (3) उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग, (4) पौध संरक्षण, (5) यन्त्रीकरण।

सिंचाई 

कृषि के लिए सिंचाई एक अनिवार्य तत्व है। बिना जल के कृषि उत्पादन सम्भव नहीं है। भारत सदा से ही कृषि प्रधान देश रहा है। कृषि की पैदावार अन्य चीजों के साथ-साथ पर्याप्त सिंचाई पर निर्भर करती है। भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा गया है क्योंकि प्राचीन काल से ही हमारी कृषि वर्षा पर निर्भर रही है। 

वर्षा पर निर्भर रहने के कारण इसमें अस्थिरता है। अतः सिंचाई के साधनों का विकास करके कृषि में स्थिरता उत्पन्न की जा सकती है। जब कृषि कार्यों के लिए वर्षा पर्याप्त नहीं होती, तब कृत्रिम रूप से अर्थात् तालाब, नहरों तथा नलकूपों आदि साधनों से पानी का उपयोग खेती के लिए किया जाता है तो उसे सिंचाई कहते हैं।

भारत में मानसून पर कृषि की निर्भरता आज भी है लेकिन उतनी नहीं है जितनी आज से 50 वर्ष पूर्व थी । 1950-51 में कुल सिंचित क्षेत्र 2-26 करोड़ हेक्टेयर था लेकिन आज यह बढ़कर 8-47 करोड़ हेक्टेयर हो गया है । इसमें ट्यूबवैल का महत्वपूर्ण योगदान है जो कुल सिंचित क्षेत्र का 31-6 प्रतिशत से भी अधिक है।

उर्वरक

कृषि में दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन उर्वरकों का प्रयोग है। पहले भारतीय कृषक गोबर की खाद पर ही निर्भर रहते थे, लेकिन आज उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन हो गया है और वे रासायनिक खादों को काम में लाने लगे हैं। 

खेतों को उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक मिलने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है। 1966 के बाद कृषि क्रान्ति के अन्तर्गत उन्नत किस्म के बीजों के उपयोग के बढ़ने से तो रासायनिक उर्वरकों की माँग में तेजी से वृद्धि हुई है।

प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रारम्भ में रासायनिक खादों का प्रयोग बहुत कम मात्रा में होता था लेकिन बाट में इसमें वृद्धि होती चली गई। 

इसी का परिणाम है कि रासायनिक खादों की खपत जो 1952-53 में 0.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी वह अब बढ़कर 96 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गयी है। 

इस प्रकार देश में रासायनिक खादों की खपत जो 1960-61 में 2 लाख टन थी वह 2000-2001 में बढ़कर 194 लाख टन हो गई है।

उन्नत किस्म के बीज

1965-66 तथा 1966-67 में देश में भयंकर सूखा पड़ने के कारण सरकार ने कृषि उत्पादन में वृद्धि करने के लिए 1966-67 में अधिक उपज वाले बीजों की नई कृषि नीति को अपनाया। 

इस उन्नतिशील बीज कार्यक्रम में बुआई क्षेत्र के अन्तर्गत 1966-67 में 18-9 लाख हेक्टेयर भूमि प्रयोग में लाई गयी थी जो 1997-98 में बढ़कर 760 लाख हेक्टेयर हो गयी ।

भारत में विभिन्न फसलों के प्रमाणित बीजों के उत्पादन व वितरण को प्रोत्साहन देने के लिए केन्द्रीय सरकार ने 1963 में राष्ट्रीय बीज निगम और 1969 में भारतीय राज्य फार्म निगम की स्थापना की थी और विश्व बैंक की सहायता से 1990 में राष्ट्रीय बीज परियोजना चरण III शुरू किया है तथा किसानों के लिए उत्तम बीजों की व्यवस्था करने के लिए 13 राज्य बीज निगम स्थापित किये गये हैं।

पौध संरक्षण

उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरकों और सिंचाई के साधनों का पूरा लाभ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि फसलों की सुरक्षा व्यवस्था की जाय । भारत में 10 प्रतिशत फसल की हानि पौध संरक्षण की उपयुक्त व्यवस्था न होने के कारण हो जाती है । 

उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरकों तथा सिंचाई की सुविधाओं के प्रयोग में वृद्धि के साथ-साथ पौधों में लगने वाले कीटाणुओं व रोगों तथा खरपतवारों की समस्या भी बढ़ी है।

नियोजन के प्रारम्भिक काल में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग बहुत कम होता था किन्तु अब यह प्रयोग काफी बढ़ गया है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रारम्भ में केवल 100 टन कीटनाशक दवाओं का प्रयोग होता था जो 1985-86 में बढ़कर 52000 टन तथा 1995-96 में 73650 टन हो गया है ।

कृषि यन्त्रीकरण

कृषि के यन्त्रीकरण से अभिप्राय कुछ कार्यों को जो कि प्रायः मनुष्यों या पशुओं दोनों के ही द्वारा किये जाते हैं, उपयुक्त मशीनों की सहायता से करने की विधि है । अर्थात् कृषि यन्त्र एवं उपकरणों से अर्थ उन यन्त्रों व उपकरणों से है जो कृषि के काम में आते हैं। जब कृषि परम्परागत तकनीकों के स्थान पर यन्त्र व उपकरणों से होती है तो इसे कृषि यन्त्रीकरण कहते हैं। 

कृषि यन्त्रीकरण के अन्तर्गत खेती की समस्त क्रियाओं में हल चलाने से लेकर फसल काटने तथा बेचने तक मशीनों का प्रयोग होता है। कृषि का में यन्त्रीकरण पूर्ण अथवा आंशिक दो प्रकार का हो सकता है। पूर्ण यन्त्रीकरण में फार्म सम्बन्धी समस्त कार्य प्रायः मशीनों द्वारा किए जाते हैं, जबकि आंशिक यन्त्रीकरण में फार्म सम्बन्धी कार्यों का आंशिक भाग ही मशीनों द्वारा किया जाता है ।

भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषि विकास पर विशेष ध्यान दिये जाने के फलस्वरूप यहाँ कृषि में यन्त्रों का प्रयोग बढ़ रहा है। प्रथम दो योजनाओं की अवधि में यन्त्रीकरण के क्षेत्र में प्रगति बहुत धीमी रही । 

उसके बाद विशेषकर छठे दशक के मध्य से जबकि देश में कृषि की नई कार्यनीति का सहारा लिया गया, कृषि यन्त्रीकरण उत्तरोत्तर जोर पकड़ने लगा। इस प्रकार भारत में कृषि विकास की गति तेज करने में यन्त्रीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 

किन्तु जहाँ एक ओर तो कृषि में यन्त्रीकरण के प्रबल समर्थक मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर विरोधी पक्ष के विचारक भारत की वर्तमान आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में कृषि यन्त्रीकरण को अनुचित तथा अनावश्यक समझते हैं ।

भारत में कृषि यन्त्रीकरण के लाभ

भारत में कृषि यन्त्रीकरण के पक्ष में निम्न तर्क प्रस्तुत किये जा सकते हैं।

(1) कृषि - श्रम की कुशलता में वृद्धि कृषि यन्त्रों के प्रयोग से श्रम की कार्यकुशलता बढ जाती है तथा प्रति श्रमिक उत्पादन भी बढ़ जाता है।

(2) उत्पादन में वृद्धि – यन्त्रों के प्रयोग से कृषि कार्यों की गति बढ़ जाती है, मानवीय शक्ति का प्रयोग कम होता है तथा खेतों का आकार बड़ा रखा जाने लगता है जिससे गहरी एवं सघन जुताई तथा सिंचाई करना सरल हो जाता है। फलस्वरूप प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

(3) उत्पादन लागत में कमी –कृषि में यन्त्रों का उपयोग करने से लागत में कमी आयी है। यह बात कई अनुसंधानों के निष्कर्ष के रूप में कही गयी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार ट्रैक्टर से खेती करने की प्रति एकड़ लागत 100 रु. आती है,जबकि वही कार्य यदि बैलों द्वारा किया जाता है तो लगभग 160 रु. आती है । इस प्रकार यन्त्रीकरण से लागत में कमी आती है।

(4) समय की बचत - कृषि में यन्त्रों के उपयोग से कार्य शीघ्रता से हो जाता है तथा समय की बचत होती है। जो कार्य एक जोड़ी बैलों द्वारा पूरे एक दिन में किया जाता है वही कार्य ट्रैक्टर द्वारा एक घण्टे में ही हो जाता । इस प्रकार समय की बचत होती है और किसान अपने इस खाली समय को अन्य कार्यों में लगाकर अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं।

(5) भारी कार्यों में उपयोगी - कृषि यन्त्रों की सहायता से भारी कार्य, जैसे—ऊँची-नीची व कंकड़ीली, पथरीली भूमि, बंजर भूमि तथा टीलों आदि को आसानी से साफ और समतल कर कृषि योग्य बनाया जा सकता है। इस प्रकार कृषक खेतों के इन भारी कार्यों से अब मुक्त हो गये हैं।

(6) कृषकों की आय में वृद्धि कृषि में यन्त्रीकरण से प्रति हेक्टेयर लागत कम आती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है। इससे किसानों को लाभ होता है और उनकी आय बढ़ जाती है । आर्थिक दशा में सुधार होने से उनका जीवन स्तर भी ऊँचा उठ जाता है।

(7) रोजगार के अवसरों में वृद्धि—यन्त्रीकरण से उद्योग तथा यातायात में रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं ! फलत: कृषि में जो लोग बेरोजगार होते हैं उन्हें रोजगार मिल जाता है।

(8) उपभोक्ताओं को लाभ — कृषि में यन्त्रीकरण होने से उत्पादन लागत कम आती है, जिसके परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं को वस्तुएँ सस्ती कीमत पर उपलब्ध हो जाती हैं और उन्हें लाभ होता है।

 (9) बहुफसली प्रणाली को बढ़ावा - कृषि में यन्त्रीकरण होने से बहुफसली खेती को बढ़ावा मिलता है और फसल चक्र में वांछित परिवर्तन लाना सम्भव होता है।कृषि यन्त्रों के प्रयोग से व्यापारिक कृषि का विस्तार किया जा सकता है। उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराया जा सकता है। यान्त्रिक कृषि में खाद्यान्नों की अपेक्षा औद्योगिक फसलों को महत्व दिया जाता है। अतः किसान न केवल जीवन निर्वाह के लिए वरन् फसल बेचकर लाभ उठाने हेतु भी कृषि करने लगता है। 

(10) व्यापारिक कृषि को प्रोत्साहन - 

कृषि यन्त्रीकरण के दोष 

कृषि यन्त्रीकरण के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जा सकते हैं।

(1) कृषि जोतों का छोटा आकार - कृषि यन्त्रीकरण जोतों के बड़े आकार के लिए उपयुक्त होता है। भारत में कृषि जोतों का आकार बहुत छोटा है। यहाँ जोत का औसत आकार 1.57 हेक्टेयर है । इसके अतिरिक्त यहाँ खेत बिखरे हुए भी हैं । अतः इन छोटी तथा बिखरी जोतों पर कृषि यन्त्रों का प्रयोग लाभकारी नहीं हो सकता ।

(2) बेरोजगारी उत्पन्न होने का भय - भारत में जनसंख्या आधिक्य है। यहाँ श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने की गम्भीर समस्या पहले से ही विद्यमान है, अतः कृषि में यन्त्रीकरण के फलस्वरूप बहुत से लोग जो कृषि कार्य में लगे हैं वे भी बेरोजगार हो जायेंगे। 

इस प्रकार बेरोजगारों की संख्या जो पहले से ही अधिक है उसमें और वृद्धि हो जाएगी । अतः इस तरह का यन्त्रीकरण जो श्रमिकों को बेरोजगार बनाए, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता है।

(3) वित्त का अभावू – भारत में अधिकांश कृषक गरीब हैं। उनके पास बड़े-बड़े एवं महँगे कृषि उपकरणों को क्रय करने के लिए वित्तीय सुविधाओं का अभाव है।

(4) पशु-शक्ति का आधिक्य - भारत में भारी मात्रा में पशु-शक्ति उपलब्ध है। कृषि का यन्त्रीकरण होने से यहाँ करोड़ों पशु अनावश्यक रूप से बेकार हो जायेंगे। उनसे बिना काम लिये उनके चारे की व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

(5) आयातों पर निर्भरता - देश में औद्योगिक विकास धीमा होने के कारण कृषि यन्त्रीकरण के लिए आवश्यक मात्रा में आधुनिक उपकरणों एवं अन्य आवश्यक साज-सामानों का उत्पादन यहाँ नहीं हो पाता। ऐसी दशा में कृषि यन्त्रों एवं उनके पुर्जों को विदेशों से आयात करना पड़ता है जिसके लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है।

(6) कृषकों की शिक्षा का निम्न स्तर — भारत में किसानों की शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है तथा वे रूढ़िवादी और अंधविश्वासी होते हैं। ऐसी स्थिति में जटिल कृषि यन्त्रों की कार्यप्रणाली को समझना उनके लिए बहुत कठिन है। 

(7) पेट्रोल, डीजल व विद्युत की समस्या - कृषि यन्त्रों को चलाने के लिए पेट्रोल, डीजल तथा विद्युत आदि की आवश्यकता पड़ती है। देश में इन चीजों का अभाव तथा इनकी कीमतें बहुत ऊँची हैं जो एक सामान्य किसान की क्रय शक्ति से बाहर हैं। 

(8) मरम्मत की सुविधाओं का अभाव – ग्रामीण क्षेत्रों में यन्त्रों एवं उपकरणों के मरम्मत की सुविधा तथा उनके पुर्जों की उपलब्धता का अभाव पाया जाता है । इसके अतिरिक्त गाँवों में किसानों को कृषि उपकरणों के प्रयोग एवं रख-रखाव के सम्बन्ध में दी जाने वाली प्रशिक्षण सुविधाओं का भी अभाव है।

कृषि यन्त्रीकरण की प्रगति 

योजनाकाल में भारत में कृषि यन्त्रों और उपकरणों का उपयोग बढ़ रहा है। 1956 में 21 हजार ट्रैक्टर थे लेकिन आज इनकी संख्या 12 लाख से अधिक है। इसी प्रकार 1956 में बिजली में चलने वाले पम्प सेटों की संख्या 47 हजार थी जो आज बढ़कर 1 करोड़ 24 लाख 25 हजार से भी अधिक हो गई है। 

डीजल व मिट्टी के तेल से चलने वाले पम्प सेटों की संख्या 1956 में 1.23 लाख थी वह भी वर्तमान में 52 लाख से अधिक है। लकड़ी के हल के स्थान पर अब लोहे का हल तथा बैलों से चलने वाले कोल्हू के स्थान पर शक्ति से चलने वाले कोल्हू हैं ।

भारत में कृषि यन्त्रीकरण की सफलता हेतु सुझाव

भारत में कृषि यन्त्रीकरण की सफलता के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं

1. देश की परिस्थिति को देखते हुए छोटे-छोटे खेतों में प्रयोग करने के लिए उपयुक्त कृषि यन्त्रों का निर्माण किया जाय ।

2. चकबन्दी और सहकारी खेती द्वारा कृषि जोतों का आकार बढ़ाया जाय जिससे उनमें यन्त्रों का प्रयोग सम्भव हो सके ।

3. कृषि यन्त्रों को खरीदने के लिए किसानों को आवश्यक वित्त प्रदान करने की व्यवस्था की जाय । (4) कृषि यन्त्रों के संचालन के लिए देश में सस्ती जल विद्युत शक्ति को शीघ्रता से विकसित करना चाहिए ।

5. कृषि यन्त्रों के संचालन के लिए किसानों को उचित प्रशिक्षण दिया जाय ।

6. मरम्मत आदि के लिए उपयुक्त स्थानों पर मशीन-ट्रैक्टर स्टेशन बनाये जायें।

7. बेकार होने वाले श्रमिकों के लिए रोजगार के नये साधनों का विकास किया जाय। 

उपर्युक्त सुझावों को अपनाने से कृषि में यन्त्रीकरण को और अधिक बढ़ावा मिलेगा। इससे सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हम खाद्यान्नों व अन्य कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भर हो सकेंगे और उनके आयात को बन्द करके इससे बची हुई विदेशी मुद्रा को अन्य उपयोगी कार्यों में लगा सकेंगे। 

Subscribe Our Newsletter