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युवकों का समाज में स्थान निबंध का सारांश लिखिए

नवयुवक नूतन समाज के आरंभक होते हैं । वे नवीन समाज की प्रतिस्थापना करते हैं । जीवन में कुछ कर गुजरने का अद्भुत जज्बा उनके अंदर होता है। वह हमेशा आत्मबलिदान को उद्धृत रहता है। उसे नवीन समाज की आवश्यकता मालूम होती है। वह समाज को बदलने के लिए आन्दोलन भी कर सकता है। 

इसके लिए वह संस्थाएँ बना सकता है। वह क्रान्तिप्रिय एवं समाज सुधारक तो होता ही है, देश के लिए मर-मिटने के लिए वह तत्पर होता है। नवीन दर्शन में नवयुवकों की आस्था होती है। 

यही कारण है कि नवयुवक नव-समाज का नेतृत्व कर रहे हैं। वे शीघ्र ही अधिकारारूढ़ हो जाते है। युवक जब अधिकारारूढ़ हो जाते हैं तो वह अपने उत्तराधिकारी तैयार करना शुरू कर देता है। 

वह सामाजिक पद्धति तोड़ने के लिए फौज तैयार कर लेता है। उसे नवयुवकों का साथ भी मिल जाता है। राष्ट्र निर्माण के कार्य के लिए युवकों के अधिकार को स्वीकार करना ही होगा। प्रत्येक अधिकार के साथ कर्त्तव्य भी होता है। आज की परिस्थिति में अधिकार को स्वीकार करके कर्त्तव्य की बात कही जा सकती है। 

स्थूल सत्य यह है, कि आज की किसी भी समस्या का समाधान युवकों के सहयोग के बिना समुचित रूप से नहीं हो सकता।


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