प्रायश्चित करने के लिए गांधी जी ने कौन सा रास्ता चुना

प्रायश्चित के लिए गाँधी जी ने अपने पिताजी को सच्चाई बताकर माफी मांगने का रास्ता चुना। सच बोलने का साहस गाँधी जी में था। सत्य की राह पर चलना कठिन है, मगर नामुमकिन नहीं। 

एक छोटे से बालक के मन में सच बोलने का साहस जागा। झूठ के मार्ग से मानमर्यादा और प्रतिष्ठा की प्राप्ति से अच्छा है, सच का साथ देना।

महात्मा गाँधी ने पिता जी के समक्ष सच बोलने के लिए लिखित माध्यम का सहारा लिया। अपनी बातों को चिट्ठी में लिखकर काँपते हाथों से उनको दे दिया और स्वयं उनके तखत के सामने बैठ गए। 

संप्रेषण के माध्यमों में मौखिक और लिखित प्रमुख हैं। मौखिक संप्रेषण में समय की बाध्यता होती है। जिसके कारण बहुत सी बातें छूट जाती हैं।

सबके सामने मौखिक रूप से अपनी बातों को कहने की कला बहुत कम लोगों में होती है। उस पर अपने से बड़ों का लिहाज, डर अलग ही बना रहता है। जिससे बोलने में हिचकिचाहट होती है।

बोलने में असमर्थता महसूस होने पर अपनी बातों को लिखकर कहा जा सकता है। इसमें किसी बात के छूट जान की गुंजाईश कम होती है। अपनी भावनाओं के साथ शब्दों को पिरोया जाता है, जिससे इसकी सार्थकता अधिक होती है।

गाँधी जी ने चिट्ठी में अपने अपराध की क्षमा मांगी, अपना सभी दोष स्वीकार किया और दंड की माँग की। चिट्ठी में एक और महत्वपूर्ण बात लिखी कि वे अपने पुत्र के अपराध को जान कर दुखी न होवें, भविष्य में ऐसे अपराध नहीं करेगा, वह प्रण करता है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी बचपन से ही दृढ़ निश्चयी, अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले थे।

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