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भारत के लोक उद्यमों में विनिवेश की प्रक्रिया एवं उसके औचित्य पर प्रकाश डालिए

 5. भारत के आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका का परीक्षण कीजिए ।

अथवा

भारत के लोक उद्यमों में विनिवेश की प्रक्रिया एवं उसके औचित्य पर प्रकाश डालिए । 

जिन उपक्रमों या उद्योगों पर सरकार का अथवा सार्वजनिक संस्थाओं का स्वामित्व तथा प्रबन्ध होता है, उन्हें सार्वजनिक उपक्रम या लोक क्षेत्र कहा जाता है। इनकी स्थापना प्रायः केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार अथवा स्थानीय सरकार द्वारा की गयी होती है। इनके अन्तर्गत आवश्यक रूप से विभागीय उद्योग, कम्पनी एवं संवैधानिक निगम शामिल किये जाते हैं।

परिभाषा

एन. एन. माल्या के अनुसार, “लोक उद्यम का अभिप्राय सरकारी स्वामित्व में स्थापित तथा नियन्त्रित ऐसी स्वायत्तशासी अथवा अर्द्धास्वायत्तशासी कम्पनियों तथा निगमों से है जो औद्योगिक तथा वाणिज्यिक क्रियाओं में संलग्न हों ।”

ए. एच. हैन्सन के अनुसार, “लोक उद्यम का आशय सरकार के स्वामित्व एवं संचालन के अन्तर्गत आने वाली औद्योगिक कृषि, वित्तीय एवं वाणिज्यिक इकाइयों से है।”

राय, चौधरी एवं चक्रवर्ती के शब्दों में, “व्यवसाय में राजकीय उपक्रम ऐसा स्वरूप है जो सरकार के द्वारा . संचालित एवं नियन्त्रित होता है तथा सरकार उसकी एकमात्र स्वामी होती है या बड़ी अंशधारी होती है।" उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि इन सभी उपक्रमों को सार्वजनिक उपक्रम कहा जाता है जिन पर पूर्णतया अथवा अधिकांश सार्वजनिक स्वामित्व हो तथा जिन पर नियन्त्रण एवं संचालन सरकार का ही हो ।

भारत में सार्वजनिक उद्यम के उद्देश्य 

भारत में इन सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की गई है। इन उद्देश्यों को हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं—(I) आर्थिक उद्देश्य, (II) सामाजिक उद्देश्य, (III) राजनैतिक उद्देश्य

आर्थिक उद्देश्य

कुछ सार्वजनिक उपक्रम आर्थिक उद्देश्यों से प्रेरित होकर भी स्थापित किये गये हैं। ये आर्थिक उद्देश्य निम्न प्रकार हैं

1. नियोजित आर्थिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना

अपने देश के आर्थिक विकास हेतु विकासशील देश नियोजित आर्थिक विकास की प्रक्रिया अपनाता है। इन योजनाओं के विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु सरकार वाणिज्यिक एवं औद्योगिक क्रियाकलापों में भाग लेती है। 

सरकार इन लोक उद्यमों के माध्यम से संसाधनों का व्यवस्थित ढंग से, विकास, प्रबन्ध एवं नियन्त्रण करके योजनागत लक्ष्यों को प्राप्त करना सम्भव बनाती है।

(2) भावी योजनाओं के लिए संसाधन जुटाना

इन उपक्रमों की स्थापना का एक उद्देश्य भावी विकास हेतु वित्तीय साधन जुटाना भी है। लोक उद्यम की संचालन प्रक्रिया में उपयुक्त मूल्य एवं लाभ नीति के माध्यम से राजस्व में वृद्धि का प्रयास किया जाता है। योजनाओं के लिए वित्त प्राप्ति हेतु सरकारों द्वारा अधिकाधिक लोक उद्यमों की स्थापना का प्रयास किया जाता है।

(3) आर्थिक विकास की दर में वृद्धि करना 

योजनाओं में आर्थिक विकास का लक्ष्य रखा जाता है जिसे अकेले निजी क्षेत्र प्राप्त करने में सक्षम नहीं होता क्योंकि निजी क्षेत्र की अपनी सीमाएँ होती हैं। अतः इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु लोक उपक्रमों का विस्तार किया जाता है।

(4) उच्च तकनीक आधारित क्षेत्रों का विकास

देश की आर्थिक प्रगति में आधुनिकीकरण को बनाए रखने के लिए नवीनतम तकनीक का विकास आवश्यक होता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सरकार लोक उद्यमों की स्थापना करके पूरा करती है। 

(5) आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण पर नियन्त्रण

लोक उद्यमों की स्थापना का उद्देश्य निजी क्षेत्र के एकाधिकार को समाप्त करना तथा आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण पर, जो निजी क्षेत्र के कुछ व्यक्तियों के हाथों में हो जाता है, नियन्त्रण करना होता है।

सामाजिक उद्देश्य

सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति भी लोक उद्यमों की स्थापना का उद्देश्य होता है। ये सामाजिक उद्देश्य निम्न प्रकार हैं

(1) सन्तुलित क्षेत्रीय विकास — 

पूँजीपति व उद्योगपति इन्हीं स्थानों पर कारखाने व उद्योग खोलते हैं जहाँ प्राकृतिक साधन उपलब्ध होते हैं तथा जहाँ स्थापित करने से लाभ की सम्भावनाएँ अधिक होती हैं। इससे क्षेत्रीय सन्तुलन नहीं रहता। कुछ क्षेत्रों का विकास तीव्र गति से होता है और कुछ क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। सार्वजनिक उपक्रम इस खाई को पाटने में सहायक होते हैं, क्योंकि उनकी स्थापना देश में विभिन्न स्थानों पर होती है।

(2) आय एवं धन की विषमता को कम करना – 

लोक उद्यमों की स्थापना इस उद्देश्य से की जाती है कि वे श्रमिकों के हितों का ध्यान रखेंगे तथा निजी उद्योगों में होने वाले उनके शोषण की प्रक्रिया को समाप्त कर एक आदर्श नियोक्ता का व्यवहार करेंगे। श्रमिकों के वेतनमानों में सुधार एवं लाभ की सीमाओं में कमी करके रोजगार के एक बड़े क्षेत्र में आय एवं धन की असमानताओं को कम करने में सहायक होंगे।

(3) रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना - 

नियोजित आर्थिक विकास की प्रक्रिया में अधिकाधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा जाता है। यह उद्देश्य लोक उपक्रमों की सहायता से सुगमतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। देश के पिछड़े क्षेत्रों में उत्पादन इकाइयाँ विकसित करके लोक उद्योग वहाँ के स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है।

(4) सद्भावपूर्वक औद्योगिक सम्बन्ध – 

सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना इस उद्देश्य से की जाती है कि श्रमिकों के शोषण को रोककर उन्हें उचित सम्मान दिया जाय। लोक उद्योग एक आदर्श नियोक्ता की तरह कार्य करें। श्रमिकों के कार्य की दशाएँ वेतन तथा श्रमिकों के हितों की सुरक्षा हो सके तथा औद्योगिक सम्बन्ध सद्भावनापूर्ण बना रहे ।

राजनैतिक उद्देश्य

लोक उद्योगों की स्थापना एवं विकास के सन्दर्भ में निम्नलिखित राजनैतिक उद्देश्य निहित होते हैं

(1) राजनैतिक शक्ति के लिए आर्थिक शक्ति आवश्यक - लोक उद्यमों के माध्यम से सरकार आर्थिक शक्ति पर नियन्त्रण स्थापित कर अपनी राजनैतिक शक्ति को आधार प्रदान करती है। आर्थिक शक्ति और राजनैतिक शक्ति का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। इसलिए आर्थिक शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से सरकार लोक उद्योगों की स्थापना करती है।

(2) समाजवादी समाज की स्थापना – समाजवादी समाज की स्थापना हेतु सरकार लोक उपक्रमों की स्थापना करती है। समाजवादी समाज की स्थापना के लिए लोक उद्योग एक तन्त्र के रूप में प्रयुक्त होते हैं । समाज में आर्थिक विषमता को कम करने, नियोजित आर्थिक विकास करने के लिए यह आवश्यक है कि आधारभूत एवं केन्द्रीय महत्व के सभी उद्योग तथा जनोपयोगी सेवाओं से सम्बन्धित उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में हों। इस प्रकार सार्वजनिक उपक्रमों के विकास से समाजवादी समाज की स्थापना करने में सहयोग मिलेगा।

सार्वजनिक उपक्रमों का उद्गम एवं विकास

भारत में केन्द्रीय सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों का अस्तित्व स्वतन्त्रता से पूर्व भी था, लेकिन यह कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित था, जैसे— सैनिक, डाक- तार की व्यवस्था, रेल परिवहन आदि। ये सभी विभागीय उपक्रम थे।

स्वतन्त्रता के पश्चात् देश में उद्योगों के विकास हेतु आधारभूत उद्योगों की स्थापना करना आवश्यक था। समाजवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना हेतु भी यह आवश्यक था कि उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किया जाय। अतः 1948 तथा 1956 में घोषित औद्योगिक नीतियों में सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया। 

1956 की औद्योगिक नीति में यह स्पष्ट किया गया कि सभी आधारभूत व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तथा जनोपयोगी उद्योग सरकारी क्षेत्र में ही रहें।

सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है- प्रथम श्रेणी के अन्तर्गत अत्यधिक महत्वपूर्ण 17 उद्योगों को, द्वितीय श्रेणी में 12 प्रकार के महत्वपूर्ण तथा तृतीय में शेष सभी उद्योगों को रखा गया है।

पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत इन उपक्रमों में भारी वृद्धि हुई है तथा अभी भी इनके बढ़ने की प्रवृत्ति जारी है। नियोजन काल में केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों की प्रगति निम्नांकित तालिका द्वारा दिखाई जा सकती है—

सार्वजनिक क्षेत्र की उपलब्धियाँ

सार्वजनिक क्षेत्र अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में काफी हद तक सफल रहा है। सार्वजनिक उपक्रमों की उपलब्धियों को हम निम्नांकित शीर्षकों में व्यक्त कर सकते हैं

(1) राष्ट्रीय आय में अंशदान

राष्ट्रीय आय में सार्वजनिक क्षेत्र का अंशदान निरन्तर बढ़ता जा रहा । सन् 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद में सार्वजनिक क्षेत्र का अंशदान 7.5 प्रतिशत था जो चालू कीमतों पर वर्ष 1980-81 में बढ़कर 17.5 प्रतिशत तथा 1998-99 में 22.2 प्रतिशत हो गया। इस प्रकार देश के G.N.P. का लगभग चौथाई भाग अकेले सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा उत्पन्न किया जाता है ।

(2) रोजगार में वृद्धि

सार्वजनिक उपक्रमों के विकास से रोजगार के अवसरों में भी काफी वृद्धि हुई है। सन् 1961-62 में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में 2.67 लाख व्यक्तियों को रोजगार मिला हुआ था, जिनकी संख्या आज बढ़कर 195.56 लाख हो गई है।

(3) पूँजी निर्माण में अंशदान 

भारत में पूँजी निर्माण में भी सार्वजनिक क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सातवीं पंचवर्षीय योजना में देश की कुल सकल स्थायी पूँजी निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत था ।

(4) निर्यात में योगदान 

सार्वजनिक उपक्रमों का निर्यात वृद्धि में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सन् 1965-66 में देश के सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा मात्र 35 करोड़ रु. की विदेशी मुद्रा अर्जित की गई थी जो 1998-99 में बढ़कर 18,827 करोड़ रु. हो गयी।

(5) लघु एवं सहायक उद्योगों की स्थापना 

देश के बहुत से लघु एवं सहायक उद्योगों की स्थापना सार्वजनिक उपक्रमों के निर्देशन एवं सहायता से की गयी है। अब इस प्रकार के निर्देशन एवं सहायता से स्थापित इकाइयों की संख्या 600 के लगभग है। ।

(6) अविकसित क्षेत्रों का विकास 

भारत के पिछड़े एवं अविकसित क्षेत्रों के विकास में भी सार्वजनिक उपक्रमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मार्च 1990 के अन्त में सार्वजनिक उपक्रमों पर जितना विनियोग किया गया था,उसका 55 प्रतिशत भाग देश के 10 पिछड़े एवं अविकसित राज्यों में लगा हुआ था।

(7) तकनीक के आधार का विस्तार 

तकनीक के आधार को फैलाने एवं आधुनिक रूप देने में लोक उपक्रमों ने अपनी अच्छी भूमिका निभाई है। एक तो नवीनतम तकनीक वाले उद्योगों में बड़ी धनराशि का 

विनियोग,इस क्षेत्र के समस्त उद्योगों को ऊपर उठाने में यह बहुत सहायक रहा है। दूसरे, सहायक उद्योग जो इस क्षेत्र के लिए तरह-तरह के माल की व्यवस्था करते हैं, उनकी तकनीक में काफी सुधार आया है ।

(8) बीमार मिलों के पुनर्वास में सहायता 

राष्ट्रीय सूती वस्त्र निगम जो कि एक सार्वजनिक उपक्रम है, इस सम्बन्ध में आजकल 125 मिलों का नियन्त्रण अपने हाथ में लिए हुए है, जिनके पुनर्वास पर वह करोड़ों रुपये व्यय कर रहा है । इस प्रकार लोक उपक्रमों ने बीमार मिलों का पुनर्वास करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

(9) आत्मनिर्भरता को प्राप्त करने में सहयोग

लोक उपक्रमों ने आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में भी सहयोग दिया है। भारतीय इस्पात उद्योग के विभिन्न उपकरणों व संयन्त्रों के निर्माण में भारत एक सीमा तक आत्मनिर्भर हो गया है । रासायनिक उर्वरकों का उत्पादन काफी बढ़ा है। हवाई जहाज व पानी के जहाज अब भारत में बन रहे हैं। विभिन्न प्रकार की इकाइयाँ अब भारत में ही मिल जाती हैं। यह सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार का ही परिणाम है।

सार्वजनिक उपक्रमों की असफलता के कारण

सार्वजनिक क्षेत्र का अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है लेकिन फिर भी इन्हें आशातीत सफलता नहीं मिली है। अतः सार्वजनिक उपक्रमों की असफलता के लिए निम्नलिखित कारणों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है

(1) प्राविधिक कुशलता का अभाव 

सार्वजनिक उद्योगों का प्रबन्ध प्रायः सरकारी अधिकारियों और राजनीतिज्ञों को सौंपा जाता है, जिन्हें व्यापार तथा व्यवस्था का तनिक भी अनुभव नहीं होता। अतः प्रबन्धकों की अकुशलता के कारण सार्वजनिक उपक्रम वांछित प्रगति नहीं कर पाते हैं । हैं

(2) संगठन में असमान नीति 

भारतीय सार्वजनिक उद्योगों के संगठन में समान नीति का व्यवहार नहीं किया जाता । सुविधानुसार प्रत्येक व्यवसाय की प्रगति और महत्ता पर विचार करके ही यह निर्णय लिया जाता है कि किस सार्वजनिक उद्योग का क्या स्वरूप रखा जाय ।

(3) प्रेरणा का अभाव 

सार्वजनिक उद्योग में प्रेरणा का अभाव रहता है, क्योंकि जो व्यक्ति सरकारी उद्योगों को चलाते हैं उनका कोई व्यक्तिगत जोखिम नहीं रहता है। संस्थान चाहे लाभ पर चले या हानि पर, उन्हें तो महीने के अन्त में अपना वेतन मिल ही जाता है। ।

(4) लालफीताशाही 

सरकारी कार्यालयों में व्याप्त लालफीताशाही भारत के सार्वजनिक उद्योगों में व्यापक रूप से व्याप्त है जिसके कारण न तो उत्पादन, क्रय-विक्रय आदि सम्बन्धी निर्णय समय पर होते हैं और न ही इन उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी ईमानदारी से परिश्रम करके उत्पादन बढ़ाने की चिन्ता करते हैं

(5) निगमों तथा मन्त्रालयों में पारस्परिक सहयोग का अभाव

निगमों तथा मन्त्रालयों में परस्पर सहयोग का अभाव है। निगम को अपनी आन्तरिक स्वतन्त्रता का गर्व है तो मन्त्रालयों को अपने प्रभुत्व का। इसका दुष्परिणाम उनकी कार्यकुशलता पर पड़ता है और विकास की गति अवरुद्ध हो जाती है।

(6) अधिक पूँजीगत व्यय

अनेक परियोजनाओं में पूँजीगत व्यय काफी अधिक होने से अति-पूँजीकरण की समस्या उत्पन्न हो गई है।

(7) प्रबन्धकीय व तकनीकी साधनों के विकास में असफलता

सार्वजनिक क्षेत्र प्रबन्धकीय एवं प्राविधिकीय कर्मचारियों के सम्बन्ध में अपने आन्तरिक साधन आवश्यक सीमा तक विकसित नहीं कर सका है। परिणामस्वरूप इसे विदेशी विशेषज्ञों एवं कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। ।

(8) क्षमता का पूर्ण उपयोग न होना 

अनेक सार्वजनिक उपक्रम अपनी उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा अनुमान है कि यदि वे उपक्रम अपनी क्षमता का 80% भी उपयोग कर लें तो उत्पादन में लगभग 1,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हो सकती है।

सार्वजनिक उपक्रमों की सफलता के लिए सुझाव

भारत में सार्वजनिक उद्योगों की सफलता के लिए निम्नांकित सुझाव दिये जा सकते हैं।

(1) इन सार्वजनिक उपक्रमों को इस प्रकार की कीमत नीति अपनानी चाहिए जिससे न केवल वर्ग-विशेष को बल्कि सम्पूर्ण समाज को लाभ हो ।

(2) सार्वजनिक उद्योगों में कार्य कुशलता की जाँच प्रतिवर्ष की जानी चाहिए और गुण नियन्त्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए ।

(3) इन उपक्रमों की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए उपक्रमों में विभेदन, ऊँची उत्पादकता, शोध एवं विकास के लिए विनियोग तथा प्रतियोगी लागतों के विकास के प्रयास किये जाने चाहिए। (4) इन उपक्रमों में उत्पादन की नवीनतम प्रविधियों का प्रयोग किया जाय और इनकी व्यवस्था में भी नवीनता का संचार करते रहना चाहिए ।

(5) इन सार्वजनिक उपक्रमों में कर्मचारियों की नियुक्तियाँ योग्यता, अनुभव व प्रशासनिक क्षमता के आधार पर होनी चाहिए।

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