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आचार्य नरेन्द्र देव का जीवन परिचय

आचार्य नरेन्द्र देव का जन्म संवत् 1946 में कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को सीतापुर में हुआ था। उनका पैतृक् घर फैजाबाद में था, किन्तु उनके पिता श्री बलदेव प्रसादजी सीतापुर में वकालत करते थे। 

वकालत के अलावा लेखन में भी उनकी अभिरुचि थी। उन्होंने बालकों के लिए अंग्रेजी, हिन्दी और फारसी में अनेक पाठ्य पुस्तकें लिखी थीं। इसके अतिरिक्त उनके अनेक संग्रह ग्रन्थ प्रकाशित हुए थे। 

आचार्य नरेन्द्र देव के प्रथम गुरु पंडित कालीदास अवाली थे। बचपन में उन पर गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस और महाभारत की कथाओं, सूरसागर आदि का गहरा प्रभाव पड़ा था। 

उनके घर पर विद्वानों एवं संतों का निरन्तर आगमन होते रहता था। इनमें स्थायी राम तीर्थ, पंडित मदन मोहन मालवीय थे। उनकी प्रेरणा से वे इलाहाबाद पढ़ने गए। 

वहाँ हिन्दू बोर्डिंग हाऊस में रहकर उन्होंने अपनी बी.ए. तक की शिक्षा पूरी की। उन पर लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द घोष और चाचा हरदास, वीर सावरकर के विचारों का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद वे इतिहास पढ़ने काशी आ गए।

सन् 1915 में एल. एल. बी. की परीक्षा उत्तीर्ण कर आचार्य नरेन्द्र देव ने फैजाबाद में वकालत प्रारम्भ की। सन् 1944 में उन्होंने फैजाबाद में होमरूल लीग की स्थापना की। 

उन्होंने सन् 1920 में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में भाग लिया और पंडित जवाहरलाल नेहरू के कहने पर काशी विद्यापीठ में आ गए। वहाँ डॉ. भगवान दास जी की देखरेख में कार्य करने लगे। 

सन् 1934 में वे श्री राममनोहर लोहिया जी के सानिध्य में आए। सन् 1942 में उन्हें महात्मा गाँधी जी के वर्धा आश्रम में रहने का अवसर मिला। उस समय वे जेल से छूटकर आए थे। सन् 1945 में वे पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ अल्मोड़ा जेल से रिहा हुए। 

स्वतंत्रता के उपरान्त महात्मा गाँधी जी का विचार था कि अखिल भारतीय कांग्रेस का उद्देश्य भारत को स्वतंत्रता दिलाना है। अतः लक्ष्य प्राप्ति के उपरान्त कांग्रेस को भंग कर कार्यकर्ताओं को सामाजिक संरचना के क्षेत्र में लग जाना चाहिए। 

परन्तु कांग्रेस के बड़े नेता इससे सहमत नहीं हुए अतएव आचार्य नरेन्द्र देव जी ने जनतांत्रिक समाजवाद की स्थापना की। कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और सामाजिक समरूपता तथा सामाजिक संरचना के कार्य में लग गए।

आचार्य नरेन्द्र देव उच्च कोटि के विद्वान, विचारक, शिक्षक, लेखक और वक्ता थे। राजनीति में संलग्न रहते हुए  भी अध्ययन-अध्यापन में आचार्य जी की विशेष अभिरुचि थी। 

वे तीन-तीन विश्वविद्यालयों अवन्ति लखनऊ विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय और वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। वे बौद्ध धर्म, पाली भाषा, संस्कृत, उर्दू और फारसी के असाधारण विद्वान थे।

उन्होंने जीवन भर समाजवादी मूल्यों के लिए कार्य किया। 19 फरवरी सन् 1956 को क्षय रोग से उनकी मृत्यु हुई। उन्होंने कृषि, अर्थशास्त्र और समाजवाद की वैज्ञानिक व्याख्या के लिए अनेक मूल्यवान ग्रन्थ लिखे। 

उनके विद्वान मित्रों में डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, श्री रामनारायण और श्री चन्द्रशेखर आदि महान् नेता थे।

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