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भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में उद्यमिता की भूमिका बताइये।

किसी भी देश के आर्थिक विकास में आधारभूत ढाँचे की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिस देश का आधारभूत ढाँचा जितना सुदृढ़ होगा वह देश उतना ही अधिक विकसित होगा।

भारत का आर्थिक विकास इसलिए तीव्र गति से नहीं हो रहा है क्योंकि यहाँ सुदृढ़ आर्थिक व सामाजिक आधारभूत ढाँचे का अभाव रहा है विकास के आधारभूत ढाँचे के विकसित होने पर ही राष्ट्रीय स्रोतों का अनुकूलतम उपयोग हो पाता है और सामाजिक उत्थान को गति मिलती है।

भारत का सामाजिक आधारभूत ढाँचा - इसके अन्तर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, पेयजल, आवास, सामाजिक वानिकी व पर्यावरण आदि को शामिल किया जाता है।

स्वास्थ्य

स्वास्थ्य जीवन के प्रत्येक पहलू पर मानव को प्रभावित करता है। मानव की सर्वांगीण उन्नति तथा विकास का आधार स्वास्थ्य ही है। स्वास्थ्य जनता की कार्यक्षमता और शक्ति के मापदण्ड के साथ ही इस बात का भी संकेतक है कि व्यक्ति कितने समय तक निर्माण कार्य में संलग्न राष्ट्रीय उन्नति में प्रवृत्त रह सकता है। रुग्ण व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता।

स्वास्थ्य की दृष्टि से भारत की स्थिति अत्यन्त शोचनीय है जो कि निम्नांकित तथ्यों से स्पष्ट है।

निम्न प्रत्याशित आयु - भारत में प्रत्याशित आयु सदैव से ही निम्न रही है। 1911 के उपरान्त भारत में स्त्री और पुरुषों की प्रत्याशित आयु मन्द गति से किन्तु निश्चयपूर्वक बढ़ती जा रही है क्योंकि कई दशकों से मृत्यु दर निरन्तर गिर रही है । 

1941 में जन्म दर अपेक्षित आयु 32 वर्ष समझी जाती थी जो 1961 में बढ़कर 41 वर्ष और वर्तमान में 62 वर्ष आंकी जा रही है। इस प्रकार ये आँकड़े इस बात के प्रतीक हैं कि देश में स्वास्थ्य के स्तर में सुधार हो रहा है।

बीमारियों की व्यापकता - भारत की अधिकांश ग्रामीण जनता मलेरिया, आँव, क्षय, हैजा, चेचक आदि भयंकर रोगों तथा साधारण चर्म और कुष्ठ रोगों आदि से पीड़ित है। भारत में पागल, एड्स, अपंग,कमजोर,बहरे व गूँगे व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है।

भारत में निम्न स्वास्थ्य के कारण 

(1) हमारे देश में जन्म दर बहुत ऊँची है जिसका माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(2) भारत में न केवल गाँवों में बल्कि शहरों में भी स्वच्छ पेयजल तथा पर्याप्त सफाई के साधनों का अभाव है परिणामस्वरूप भारतवासियों का स्वास्थ्य निम्न स्तर का है।

(3) भारत में निम्न स्वास्थ्य एवं बीमारियों की व्यापकता का मूल कारण अपर्याप्त और अपौष्टिक भोजन है जिसके कारण व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर पाता है।

(4) दवाइयों और डॉक्टरों की कमी के कारण देश के दूरदराज के गाँवों, आदिवासी इलाकों तथा पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों में अनेक प्रकार की बीमारियाँ घर कर लेती हैं और वे जीवनभर के लिए रोगी होकर काम करने के लिए अयोग्य हो जाते हैं ।

स्वास्थ्य सुधार के सम्बन्ध में सरकार द्वारा किये गये उपाय

(1) संक्रामक बीमारियों के नियन्त्रण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए हैं। चेचक, मलेरिया, क्षय रोग तथा कुष्ठ रोग आदि संक्रामक रोगों के नियन्त्रण को प्राथमिकता दी गई है।

(2) ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य देखभाल संरचना का निर्माण और विस्तार किया गया है। 1997 तक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 2622 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, 22010 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, 136339 उपकेन्द्रों का व्यापक कार्यक्रम तैयार किया गया था।

 जिसके माध्यम से जनता के निचले गरीब स्तर तक प्राथमिक स्वास्थ्य की सेवाएँ" उपलब्ध कराई जा रही हैं।

(3) चिकित्सा राहत आपूर्ति के लिए अस्पतालों का विस्तार किया गया है। कुल स्वास्थ्य सुविधाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। 1957 में अस्पतालों में रोगी शय्याओं और जनसंख्या का अनुपात 32 प्रति लाख था जो 1996 में बढ़कर 93 प्रति लाख हो गया।

(4) आयुर्वेदिक शिक्षा और अनुसंधान का पर्याप्त विस्तार किया गया है।

(5) परिवार कल्याण कार्यक्रमों द्वारा जन्म दर को नियन्त्रित किया गया है ।

आवास व्यवस्था

आवास व्यवस्था से आशय व्यक्ति के लिए ऐसे आश्रय से है, जो आरामदायक हो, व्यक्तियों की आवश्यकताओं के अनुरूप हो, जहाँ वह और उसका परिवार सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें।

भारत में आवास समस्या - भारत में जिस गति से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उस गति से आवास का निर्माण न होने के कारण आवास की मात्रा उनकी तुलना में बहुत कम है। भारत की आवास समस्या को हम दो भागों में बाँट सकते हैं।

(1) शहरी आवास समस्या - शहरों में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है । 1951 में भारत के शहरों में 17% जनसंख्या रहती थी जो 1991 में बढ़कर 25.1% हो गयी । जिस गति से शहरों में जनसंख्या बढ़ रही है उस गति से मकान नहीं बन पा रहे हैं, फलस्वरूप शहरों में आवासीय समस्या बहुत कठिन होती जा रही है।

(2) ग्रामीण आवास समस्या — गाँवों में आवास की समस्या शहरी समस्या से भिन्न है। गाँवों में खेतिहर मजदूर वर्ग ऐसा है जिसके पास अपनी जमीन नहीं होती है इसलिए इनके आवास की व्यवस्था करना बहुत कठिन होता है तथा कच्चे मकानों को पक्के मकानों में परिवर्तित करने के लिए अन्य साधनों को जुटाना कठिन होता है। 

भारत में आवास समस्या के कारण – भारत में शहरी और ग्रामीण आवास समस्या के मुख्य कारण निम्न प्रकार हैं।

(1) देश में जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है और प्रत्येक व्यक्ति के लिए मकान उपलब्ध करवाना बहुत कठिन हो गया है ।

(2) नये मकान बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में सीमेंट, लोहा, ईंट आदि उपकरणों की कमी के कारण मकान बनाने की गति बहुत धीमी रही है।

(3) शहरीकरण की तीव्र गति होने के कारण भी आवास समस्या का जन्म हुआ है।

(4) भारत में भूमि वितरण बहुत ही असन्तुलित एवं अनियोजित ढंग से हुआ है। 

(5) आवास हेतु जो वित्तीय सहायता दी जाती है वह पर्याप्त नहीं है ।

आवास समस्या को दूर करने के लिए सुझाव

ग्रामीण आवास समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने 1955 में ग्रामीण योजना प्रारम्भ की थी। बाद में ग्रामीण भूमिहीन को आवास के लिए मुफ्त भूमि देना तथा इन्द्रिरा आवास योजना आदि कार्यक्रम लागू किये ।

ग्रामीण आवास समस्या को दूर करने के लिए निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं

(i) भवन निर्माण के लिए विभिन्न संस्थाएँ जो ऋण देती हैं, उनकी वापसी की किस्तों में कुछ रियायत कर देनी चाहिए ।

(ii) वित्तीय सहायता और ऋण में वृद्धि करके श्रमिकों की सहकारी समितियों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

(iii) जहाँ श्रमिक स्वयं अपने श्रम से मकान की व्यवस्था कर सकता हो, वहाँ पर श्रमिकों को एक अलग भूमि का टुकड़ा दिया जाना चाहिए जिसमें उसको समस्त सुविधाएँ प्राप्त हो सकें ।

(iv) भूमिहीन मजदूरों को अपने घर के स्वामित्व का अधिकार मिलना चाहिए। (v) राज्य आवास निगमों के कार्य-कलापों में तेजी से वृद्धि करनी चाहिए ।

(vi) पंचायतों व सहकारी समितियों को अपने सदस्यों को ऋण देकर मकान बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ।

सफाई या स्वच्छता 

सफाई या स्वच्छता से तात्पर्य मल-मूत्र को हटाने, वर्षा जल तथा प्रवाहित द्रव्य के निकास तथा कूड़ा-करकट के निकासी की व्यवस्था से है। 

सफाई की उचित व्यवस्था, स्वास्थ्य, उत्पादकता तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार की अनिवार्य शर्त है। भारत में सफाई या स्वच्छता के दो पहलू हैं—(i) ग्रामीण सफाई, (ii) शहरी सफाई ।

(i) ग्रामीण सफाई – भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई या स्वच्छता का स्तर प्रारम्भ से ही नीचा रहा है । गाँवों में 90% परिवारों के पास शौचालय की सुविधा ही नहीं है जिससे उन्हें खुले में ही जाना पड़ता है। वहाँ गन्दे पानी के निकास के लिए पर्याप्त नालियाँ भी नहीं हैं। बरसात के समय गड्ढों में पानी भर जाता हैं।

ग्रामीण सफाई की दिशा में अनेक प्रयास किए गए हैं। अनेक क्षेत्रों में जलबन्ध शौचालयों के साधारण निम्न लागत के डिजाइन विकसित किए गए हैं। ऐसे शौचालयों का विस्तार किया गया है। ग्रामीण व्यक्तियों को सफाई के क्षेत्र में सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्रायोगिक कार्यशालाओं को विकसित किया है तथा ऐसे शौचालयों के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।

(ii) शहरी सफाई–शहरी सफाई के क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्थिति बेहतर है, हालांकि सन्तोषजनक नहीं है। देश के समस्त नगरों में से केवल 10% नगरों में ही मलसुरंग सुविधाओं की व्यवस्था है जिसका प्रयोग कुल शहरी जनसंख्या के केवल 20% लोगों को ही उपलब्ध है। 

इसी प्रकार कूड़ा-करकट तथा गन्दगी के संग्रह तथा निपटाने के प्रबन्ध अभी तक सन्तोषजनक नहीं हैं, विशेषकर छोटे नगरों और बड़े शहरों की घनी आबादी वाले भागों में तथा उन क्षेत्रों में जहाँ निम्न आय वर्ग के लोग रहते हैं।

हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र की सहायता से शहरी सफाई हेतु निम्न लागत प्रविधियों को विकसित करने के प्रयोग किए गए हैं। सीवरेज शहरी विकास का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। अतः नगरपालिकाएँ इस ओर प्रयत्नशील हैं लेकिन धनाभाव उन्हें ऐसा करने में रोड़ा अटका रहा है। 

भारत में शहरी जनसंख्या के 47.9% को सफाई सुविधाएँ प्राप्त हैं। बढ़ती हुई शहरी जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शहरी सफाई कार्यक्रम को तेज किया गया है। इस दिशा में स्वयंसेवी संगठनों का सहयोग भी सराहनीय है।

सामाजिक वानिकी

 जून 1976 में 1952 की नयी राष्ट्रीय वन नीति के सन्दर्भ में सामाजिक वानिकी कार्यक्रम को सैद्धान्तिक मान्यता प्रदान की गयी थी । 

इस योजना में देश में कृषि, नगरीकरण व औद्योगीकरण के लिए बढ़ती हुई भूमि की माँग, जनसंख्या तथा पशु संख्या में वृद्धि के कारण वनों पर बढ़ते बोझ को कम करने और पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के उद्देश्य से देश में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण की योजना शुरू की गयी है। 

वर्ष 1981-82 में सामाजिक वानिकी परियोजना 5 वर्षों के लिए प्रारम्भ की गयी थी। इस परियोजना को बहुत से बाह्य अभिकरणों द्वारा सहायता प्रदान की गयी थी । 

जैसे— विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय विकास के लिए संयुक्त राज्य अभिकरण आदि । आठवीं पंचवर्षीय योजना में 4081-87 करोड़ रुपये वानिकी एवं वन्य- जीवन पर व्यय करने की व्यवस्था थी ।

सामाजिक वानिकी की सफलता के लिए सुझाव–सामाजिक वानिकी कार्यक्रम की सफलता के लिए निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं।

(1) वन विस्तार संगठन स्थापित किये जायें जिसकी देख-रेख प्रशिक्षित व कुशल व्यक्तियों द्वारा की जाय।

(2) कृषकों द्वारा वन खेती को प्रोत्साहित करने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें वित्तीय सहायता दी जाय ।

(3) सामाजिक वानिकी स्कूल व कॉलेज में भी शामिल की जाय।

(4) गाँवों में पड़ी व्यर्थ भूमि, रेल, सड़क और नगरों के किनारे भूमि पर वृक्षारोपण करते समय ग्रामीण संस्थाओं को अवश्य शामिल करना चाहिए।

(5) इस प्रकार के वृक्षों से होने वाली आय का बँटवारा शासन व ग्राम पंचायतों के बीच होना चाहिए। इससे ग्राम पंचायतों की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी।

पर्यावरण 

प्रकृति में जो कुछ भी हमें परिलक्षित होता है - वायु, जल, मृदा, पादप तथा प्राणी सभी सम्मिलित रूप में पर्यावरण की रक्षा करते हैं। पर्यावरण में सन्तुलन स्वतः होता रहता है। 

पृथ्वी सतह के ताप, वायुमण्डलीय गैसीय तत्वों, सूर्य विकिरण आदि जलवायु को प्रभावित करने वाले विभिन्न तत्वों को प्रकृति अपने आप ही सन्तुलित करती है किन्तु इस सन्तुलन की भी एक सीमा होती है । इसके बाद पर्यावरण का दूषित होना आरम्भ हो जाता है। 

औद्योगीकरण, शहरीकरण व परमाणु ऊर्जा आदि के द्वारा हम लाभान्वित अवश्य हुए हैं किन्तु इससे पर्यावरण सन्तुलन डगमगा गया है। 

पर्यावरण सन्तुलन के डगमगा जाने से इसके विभिन्न तत्वों, जैसे - वायु, जल, ध्वनि, धूल आदि से प्रदूषण की समस्या गम्भीर होती जा रही है ।

पर्यावरण प्रदूषण के कारण

(1) जनसंख्या वृद्धि पर्यावरण संकट एवं प्रदूषण का एक प्रमुख कारण रही है क्योंकि इससे प्रदूषक और प्रदूषण दोनों में वृद्धि होती है।

(2) जनसंख्या वृद्धि के तीव्र दबाव के फलस्वरूप प्राकृतिक स्रोतों का अनियन्त्रित एवं विकृत उपयोग किये जाने के कारण भी पर्यावरण संकट भयावह रूप है।

(3) औद्योगिक क्षेत्रों में भी औद्योगिक संस्थाओं द्वारा भूमि, जल तथा वायु तीनों ही तत्वों को काफी तेजी से प्रदूषित किया जा रहा है।

(4) जल, थल एवं नभ तीनों ही मार्गों के परिवहन का विस्तार होने के फलस्वरूप धुँए के द्वारा हमारे पर्यावरण को बहुत तेजी से प्रदूषित किया गया है।

(5) औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की अन्धी दौड़ में मानव सभ्यता के अभिन्न अंग वन एवं अन्य प्राकृतिक घटकों से मनुष्य का सम्बन्ध काफी दूर का रह गया है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारी उपाय - भारत में पर्यावरण सन्तुलन बनाये रखने के लिए सरकार ने निम्नांकित प्रयास किये हैं।

(1) वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम, 1972

(2) वन संरक्षण अधिनियम, 1980

(3) जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रक) अधिनियम, 1974

(4) वायु प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रक) अधिनियम, 1981

(5) पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 आदि के द्वारा सरकार ने पर्यावरण प्रदूषण को नियन्त्रित करने के प्रयास किये हैं ।

ऊर्जा या शक्ति-संसाधन

वर्तमान औद्योगिक युग में शक्ति के साधनों का अत्यन्त महत्व है। मशीनों के संचालन के लिए किसी-न-किसी शक्ति की आवश्यकता अवश्य होती है । शक्ति के साधन आधुनिक उद्योग के आधार हैं। 

अतः वर्तमान में किसी भी देश का आर्थिक विकास शक्ति-साधनों के अभाव में सम्भव नहीं है।

भारत में जितनी शक्ति का प्रयोग होता है, उसकी 20.3% शक्ति मानव व पशुओं से प्राप्त होती है जिसको जीवों से प्राप्त शक्ति कहते हैं। 

34.6% शक्ति लकड़ी व गोबर आदि से मिलती है इसको गैर-वाणिज्यिक शक्ति कहते हैं। शेष 45.1% शक्ति बिजली, कोयला, पेट्रोलियम, तरल पदार्थ, जैसे- तेल, पेट्रोल, डीजल आदि से मिलती है। इसको वाणिज्यिक शक्ति कहते हैं।

(1) कोयला – कोयला अत्यन्त महत्वपूर्ण संसाधन है तथा देश के विकास में यह निर्णायक भूमिका निभा रहा है। देश में व्यावसायिक ऊर्जा की कुल खपत का लगभग 67 प्रतिशत भाग कोयले से पूरा होता है। इसके अतिरिक्त कोयला इस्पात और कार्बो- रासायनिक उद्योगों में काम आने वाला आवश्यक पदार्थ भी है।

(2) विद्युत शक्ति - विद्युत ऊर्जा का सर्वाधिक गतिशील साधन है तथा देश के आर्थिक विकास का गहत्वपूर्ण घटक है । आज के उद्योग, कृषि, शहरी एवं ग्रामीण विकास के लिए विद्युत एक आवश्यक घट है। देश की अर्थव्यवस्था का शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो जिसमें विद्युत शक्ति की आवश्यकता न पड़ती है। अतः विद्युत मानव सभ्यता का एक अभिन्न अंग बन गई है।

(3) खनिज तेल या पेट्रोलियम - आधुनिक युग में खनिज तेल बहुत ही महत्वपूर्ण एवं उपयोगी संसाधन है। इस पर देश का औद्योगिक विकास, प्रतिरक्षा व्यवस्था व परिवहन साधनों की उन्नति निर्भर करती है । खनिज तेल केवल शक्ति का साधन ही नहीं है, बल्कि बहुत से उद्योगों के लिए आधार भी है। भारत में खनिज तेल के भण्डार 10.36 लाख वर्ग किलोमीटर में बताये जाते हैं।

(4) परमाणु शक्ति – आधुनिक तकनीकी प्रगति ने चालन शक्ति के एक बहुत महत्वपूर्ण एवं सशक्त साधन की उपलब्धि सम्भव बना दी है वह है परमाणु शक्ति। भारत ने 1974 में शान्तिपूर्ण कार्य के लिए प्रथम भूमिगत आणविक विस्फोट का सफल प्रयोग किया था। 

वर्तमान में परमाणु विद्युत के रूप में देश में कुल 1840 मेगावाट की स्थापित क्षमता है तथा 880 मेगावाट क्षमता वाले विभिन्न विद्युत केन्द्र केगा व रावतभाटा में निर्माण के अन्तिम चरणों में हैं। वर्तमान में भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों की श्रेणी में छठवाँ स्थान रखता है।

भारत में ऊर्जा संकट – भारत आज अपनी 90% ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति विभिन्न ऊर्जा स्रोत, जैसे—-कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस से कर रहा है। 

लेकिन भारत में इन ऊर्जा स्रोतों का भण्डार सीमित है। देश में ऊर्जा की बढ़ती माँग के कारण ऊर्जा संकट की समस्या खड़ी हो गयी है ।

मोटे तौर पर भारत में ऊर्जा संकट मुख्य रूप से दो कारणों से उत्पन्न हुआ है— 

ऊर्जा एवं शक्ति की माँग बढ़ने के कारण - ऊर्जा की माँग बढ़ने के निम्नांकित कारण हैं।

(1) देश का तीव्र गति से औद्योगिक विकास। 

(2) कृषि में उन्नत तकनीकों का उपयोग और कृषि का मशीनीकरण। 

(3) ग्रामीण विद्युतीकरण। 

(4) भारत में परिवहन, संचार व सिंचाई व्यवस्था की तीव्र गति से वृद्धि । 

पूर्ति के दृष्टिकोण से ऊर्जा का संकट – एक ओर शक्ति एवं ऊर्जा की माँग में वृद्धि हुई है और दूसरी ओर इसका उत्पादन लक्ष्यों से नीचे रहा है इसलिए ऊर्जा संकट गम्भीर बना हुआ है। इसके लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं- 

(1) ताप विद्युत गृहों को समय पर कोयला न मिलना ।

(2) मानसून की असफलता के कारण जल विद्युत उत्पादन में कमी । 

(3) परमाणु शक्ति के विकास की धीमी गति ।

(4) विद्युत गृहों की पूरी क्षमता का उपयोग न होना । 

(5) ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोतों का उचित विकास न होना ।

ऊर्जा संकट के समाधान के लिए सुझाव - ऊर्जा संकट के समाधान हेतु निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं - 

(1) कोयले के उत्पादन को बढ़ाया जाय क्योंकि कोयले के भण्डार भी यहाँ पर्याप्त मात्रा में हैं। 

(2) जल-विद्युत के उत्पादन में वृद्धि की जाय। इसके लिए यहाँ बारहमासी नदियाँ पाई जाती हैं। अतः जल विद्युत का उत्पादन बढ़ाकर ऊर्जा संकट को दूर किया जा सकता है। 

(3) तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम की क्रियाओं में पर्याप्त विस्तार करके प्राकृतिक गैस की नवीन स्थानों पर खोज का कार्यक्रम तैयार किया जाय ।

(4) पेट्रोलियम पदार्थों का आन्तरिक उपयोग कम किया जाय ताकि विदेशी मुद्रा की बचत हो सके।

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