ads

ज्वालामुखी किसे कहते हैं - jwalamukhi kya hai

आन्तरिक शक्तियों में से ज्वालामुखी एवं भूकम्प की घटनाएँ इतनी आकस्मिक एवं शीघ्र घटित होती कि उनका पृथ्वी की सतह पर तत्काल विनाशकारी प्रभाव दिखाई देता है । 

ज्वालामुखी किसे कहते हैं

ज्वालामुखी जैसा कि शब्द से स्पष्ट है  एक ज्वाला उगलने वाला या आग का पहाड़ होता है। इसमें से बहुत ऊँचे तापमान पर आग की से लपटों की भाँति दहकते ठोस व गैसीय पदार्थ तेजी से धरातल की ओर फेंक दिए जाते हैं। इसी कारण यह दूर से आग फेंकने वाली घटना जैसी  दिखाई देती है। 

यूनान काल में वूलकेनो नामक ज्वालामुखी के मुख को पाताल का मार्ग कहा जाता था। अतः इसी से Volcano शब्द बना। मोटे तौर पर “पृथ्वी के भीतरी भाग से जो दहकते हुए पदार्थ जिस मार्ग विशेष से निकलते हैं उसे ज्वालामुखी कहते हैं।

एवं उससे बनने वाली आकृति या पहाड़ को 'ज्वालामुखी शंकु' कहते हैं।” ज्वालामुखी से निकले पदार्थों में पिघला हुआ लावा, ठोस शिलाखण्ड, अनेक प्रकार की जलती हुई गैसें, धूल, राख एवं भारी मात्रा में ऊँचे ताप पर जलवाष्प तेजी से प्रायः ऊँचे दबाव पर या कम दबाव पर बाहर आती है। 

सभी पदार्थ जिन शक्तियों एवं घटनाओं के अधीन भूगर्भ से बाहर की ओर आते हैं उन सबको एक साथ 'ज्वालामुखी क्रिया' के नाम से पुकारते हैं। 

अतः वूलरिज एवं मॉर्गन के अनुसार : 'ज्वालामुखी क्रिया' के अन्तर्गत वह सम्पूर्ण प्रक्रिया आ जाती है जिनके माध्यम से भूगर्भ से मैग्मा भूतल की ओर आता है अथवा धरातल पर प्रकट होते हैं। 

आर्थर होम्स के अनुसार, “वह सारी घटना जिसके द्वारा पृथ्वी की गहराइयों से, मेग्मा सम्पूर्ण पदार्थ की ओर अथवा धरातल पर लाकर बिछा दिया जाता है, ज्वालामुखी क्रिया कहलाती है।" 

इस प्रकार ज्वालामुखी घटना का सीधा सम्बन्ध पृथ्वी की विभिन्न गहराइयों में होने वाली विशेष प्रक्रियाओं एवं घटनाओं से है ऐसी घटनाओं के एवं उनके लिए जिम्मेदार शक्तियों के प्रभाव से वहां की पहले से ही विशेष चट्टानें पिघल जाती है।

इन्हीं पिघली हुई चट्टानी पदार्थों को मेग्मा कहते हैं। जब मेग्मा पृथ्वी की सतह पर आता है तो उसमें मिलने वाली गैस बाहर निकल आती हैं तब उसे लावा कहते हैं इस प्रकार लावा + गैस मेग्मा कहा जाता है मैग्मा आग्नेय चट्टानें बनने का वर्तमान में आधार है।

मेग्मा जब पृथ्वी तल की ओर विशेष मार्ग से आने का प्रयास करता है तो वह भूतल के कमजोर भागों  या पहले की दरारों या मार्गों को ढूंढ कर बाहर निकल आता है। यदि इसमें गैसों एवं जलवाष्प का दबाव कम होता है जो यह पृथ्वी की सतह से नीचे ही, जहाँ भी स्थान मिलता है वहीं फैलकर धीरे-धीरे ठण्डा हो जाता है। इससे भूमि के नीचे भूगर्भ में अनेक प्रकार की आकृतियाँ बनती हैं। 

इन्हें ही ‘आन्तरिक आग्नेय चट्टानें' आदि कई नामों से पुकारते हैं।इसके दूसरी ओर जब मेग्मा धरातल पर फैलने लगता है तो उसके साथ अनेक प्रकार की गैसें, राख, धुआँ, धूल एवं जलवाष्प पहले वायुमण्डल में काफी दूर-दूर तक फैलकर तेजी से तापमान बढ़ा देती हैं एवं वहाँ प्राय: साँस लेना भी कठिन हो जाता है।

ऐसी जलवाष्प के ठण्डा व संघनित होते ही सभी पदार्थों की सम्मिलित या जहरीली वर्षा होती है एवं भूमि पर दलदल फैलने लगता है । इसी समय उद्गार की शक्ति के अनुसार एवं मेग्मा की प्रकृति के अनुसार भूगर्भ से लावा एवं अन्य ठोस चट्टानी टुकड़े बाहर उगल दिये जाते हैं।

 ऐसे पत्थर के टुकड़ों एवं गाढ़े मेग्मा (लावा) के ठण्डा होने से बचे विशेष आकार के टुकड़ों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। ज्वालामुखी के मार्ग से धरातल पर निकलने वाले सारे पदार्थ ज्वालामुखी उद्दगार  की सीमा में आते हैं।

ज्वालामुखी  उद्दगार की नली को ज्वालामुखी नली कहा जाता है जिस मुख या क्षिद्र से पदार्थ बाहर निकलता है उसे ज्वालामुखी या क्रॆटर कहा जाता है । 

ज्वालामुखी की उत्पत्ति के कारण

ज्वालामुखी की घटना या संपूर्ण क्रिया का आधार भूगर्भ की स्थिति एवं वहां की घटना से संबंधित है। जब यह घटना तेजी से घटित होती है तब भूमि के नीचे एवं सतह पर उथल-पुथल मच जाती है। यद्यपि इस संपूर्ण घटना की तथ्यात्मक एवं सही सही जानकारी आज भी प्राप्त नहीं है 

फिर भी आधुनिक वैज्ञानिक माध्यमों से भूगर्भ की विभिन्ना गहराइयों में की जाने वाली खोज के साथ-साथ इस घटना के कारणों या संभावित कारणों की खोज की जाती रही हैं। 

भूगर्भ में विकसित वे सब परिस्थितियां जिनके कारण वहां गैसे व जल वाष्प  एकत्रित होकर भारी मात्रा में दबाव उत्पन्न करती है एवं ठोस किंतु विशेष धर्म चट्टानों को सापेक्षत: स्थानीय रूप से दबाव घटने से उन्हें पिघलने का वहां अवसर मिलता है

भूगर्भ में ताप का बढ़ना 

गहराई बढ़ने पर प्रति 32 मीटर पर 1° सेंटीग्रेड तापमान बढ़ता जाता है और 50 किलोमीटर की गहराई पर शैलों का द्रव णांक रोना आ जाता है इसके अतिरिक्त वहां पाए जाने वाले आणविक तत्वों के विखण्डन से भी ताप बढने में साहयता करती है।

 अतः भू गर्भ में यधपि चट्टाने बहुत ऊँचे तापमान पर रहने से पिघली हुई ही मिलनी चाहिए किन्तु ऊपरी चट्टानों के भारी दबाव से वे फैल नहीं पातीं पिघल नहीं सकतीं हैं।

किन्तु 50 से 150 किलोमीटर की गहराई के मध्य प्रायः पृथ्वी के कुछ कमजोर भागों अथवा असन्तुलित एवं अस्थिर भागों में चट्टानें खिसकने, की घटना या ऐसी ही क्रिया से कहीं कही  ऊपरी दबाव में कमी भी आने लगती है 

इसी से सीमा का उपरी तल कहीं-कहीं पिघलने लगता है और वहां मेग्मा के स्थानीय भंडार एवं अन्य गैसीय पदार्थ व उच्च ताप व दाब वाली जलवाष्प एकत्रित होने लगती है 

गैसों वा जलवाष्प की उत्पत्ति 

भूमिगत जल महासागरों की गहराइयों से या भ्रंश व दरारों से भूमि में या पूर्वकालीन ज्वालामुखी प्रदेशों में काफी गहराई तक चला जाता है। इसमें मार्ग की चट्टानों से प्राप्त गैसें भी सम्मिलित होती जाती हैं। इसी कारण गैसीय पदार्थों के साथ 75 से 90 प्रतिशत भाग तक जलवाष्प का रहता है। 

यह जलवाष्प दबाव के प्रभाव से 135° सेण्टीग्रेड तक विशेष गर्म होकर बहुत अधिक विस्फोटक स्थिति ला देती है। अतः इन विशेष गतिशील एवं दबाव वाली गैसों एवं जलवाष्प को जहाँ भी कमजोर स्थल या मार्ग मिलता है।

 यह उसी भार्ग से भूतल की ओर बढ़ती हैं; तब इनके साथ मेग्मा भी तेजी से ऊपर की ओर बढ़ने लगता है। इस कारण भी प्रशान्त महासागर के चारों ओर परिप्रशान्त पेटी में सबसे अधिक ज्वालामुखी पाये जाते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी का सबसे अधिक असन्तुलित व कमजोर भू-भाग है । 

ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में कार्बन-डाइ-ऑक्साइड (CO2), गन्धक व गन्धक ऑक्साइड (SO2), कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO), हाइड्रोजन (H,), अमोनिया (NH,) आदि होती हैं। इसके साथ भारी मात्रा में जलवाष्प के अतिरिक्त महीन कणों के रूप में धूल, धुआँ एवं राख भी निकलती है।

(3) लावा एवं उद्गार

ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा जिसे कि भूगर्भ में मेग्मा कहते हैं, सभी भागों में एक जैसी अवस्था में नहीं पाया जाता। यह लावा गैसों के साथ मिलकर विशेष गतिशील एवं क्रियाशील बन जाता है। 

इसी कारण जिस प्रकार शीतल पेय की बोतल के मुँह से दबाव हटाते ही वह गैस मिश्रित होने से तेजी से बाहर आने का प्रयास करता है, उसी प्रकार से गैस मिश्रित लावा (मेग्मा) भी पृथ्वी के कमजोर भागों से या दरार आदि का मार्ग मिलते ही तेजी से पृथ्वी की सतह की ओर आने लगता है।

किन्तु लावा के उद्गार की प्रकृति बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि लावा गाढ़ा है या द्रव (पैठिक) दशा में । गाढ़ा लावा धीमी गति से तो उठेगा किन्तु उसमें व उसके चारों ओर गैसों का दबाव अधिक रहने से भयंकर विस्फोट भी हो सकता है जबकि द्रव लावा अपने में गैसों को समाहित कर लेता है।

अतः वहाँ विस्फोट धीमा रहने से उद्गार शान्त बना रहता है। लावा मुख्यतः सिलिका की मात्रा के अनुसार पतला या गाढ़ा होता है । जब लावा में सिलिका की मात्रा 75 प्रतिशत से अधिक हो तो उसे अम्लीय लावा कहते हैं । 

यह ठोस या बहुत गाढ़ा होता है एवं वायुमण्डल में आते ही ठण्डा हो जाता है। जब इसमें सिलिका की मात्रा 55 से 75 प्रतिशत के मध्य होती है तो उसे मध्यम लावा या गाढ़ा लावा कहते हैं । ऐसा लावा धीमी गति से फैलता है एवं शीघ्र ठण्डा व कठोर होने लगता है। 

जब लावा में सिलिका की मात्रा 35 से 55 प्रतिशत के मध्य ही हो तो उसे पैठिक लावा कहते हैं। ऐसा लावा पर्याप्त दूरी तक दलदल की भाँति प्रवाहित होकर धीरे-धीरे ठण्डा होता है। इसमें से गैसें भी बराबर निकलती रहती हैं।

किन्तु जब लावा में सिलिका की मात्रा बहुत ही कम 35 प्रतिशत से भी कम) हो तो तब लावा द्रव जैसा हो जाता है; इसे अति-पैठिक लावा कहते हैं। इसी दशा में लावा एक मार्ग से या केन्द्रीय उद्गार से बाहर न आकर दरारों से बाहर निकलकर सारे प्रदेश में लावा की मात्रा के अनुसार फैल जाता है। इसीलिए इसे दरारी उद्गार भी कहते हैं।

ऐसे दरारी उद्गार के लिए पहले से पृथ्वी की गहराइयों में मेग्मा या भण्डार इकट्ठा होना आवश्यक है। इसी भाँति ज्वालामुखी केन्द्रीय उद्गार से पहले भू-गर्भ में मेग्मा का स्थानीय भण्डार एवं गैसों का दबाव, विशेष उष्ण जलवाष्प एवं इन सबका गतिशील प्रभाव सभी सम्मिलित रूप से मिलकर ही पृथ्वी के कमजोर भागों के आस-पास ज्वालामुखी उद्गार की आदर्श दशाओं का विकास कर पाते हैं। 

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के आधार पर अभिसारी तथा अपसारी किनारों के निकट ज्वालामुखी क्रियाएँ होती हैं। ।

स्पष्ट है कि सभी कारणों से लावा, वाष्प एवं गैसें पृथ्वी की वलन, भ्रंशन तथा अन्य हलचलों से कमजोर पपड़ी को तोड़कर बाहर निकलने का प्रयास करते हैं।

ज्वालामुखी का वर्गीकरण

ज्वालामुखी को अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है। ये मुख्यत: निम्नलिखित हैं।

(अ) क्रियाशीलता के अनुसार ज्वालामुखी निम्नांकित प्रकार के हैं। 

(i) जाग्रत ज्वालामुखी 

जिन ज्वालामुखियों से समय-समय पर लावा एवं अन्य पदार्थों का उद्गार होता रहता है अथवा रुक-रुक कर होता रहता है, उन्हें जाग्रत ज्वालामुखी कहते हैं।

हवाई द्वीप का मोनालोआ व मोनाकी एवं भूमध्य-सागर का स्ट्राम्बोली ऐसे ही ज्वालामुखी हैं। स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी लिपारी द्वीप पर स्थित है । इससे निकलने वाली गैसों से समीपवर्ती क्षेत्र में सदैव प्रकाश बना रहता है अतः इसे भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है।

(ii) सुषुप्त ज्वालामुखी 

जिस ज्वाला- मुखी का कई सदियों से उद्गार नहीं हुआ है एवं निकट भविष्य में उद्गार की कम सम्भावना है उन्हें सुषुप्त ज्वालामुखी कहते हैं क्योंकि ऐतिहासिक काल में उद्गार के प्रमाण मिलने के कारण इनमें पुनः उद्गार की सम्भावना हो सकती है।

विसुवियस तथा क्राकाटाओ प्रसुप्त ज्वालामुखी के उदाहरण हैं। विसुवियस अनेक बार जाग्रत हो चुका है। इसमें सन् 1929 के बाद अभी तक कोई उद्गार नहीं हुआ है ।

(iii) शान्त या मृत ज्वालामुखी 

जिस ज्वालामुखी के उद्गार के हजारों वर्षों में भी कोई प्रमाण नहीं मिलते एवं उसके क्रेटर में पानी भर जाता है तथा वहाँ पर जलवायु के अनुसार जैव जगत मिलता है, ऐसे ज्वालामुखी को शान्त ज्लावामुखी कहते हैं। किलीमंजारो, कीनिया, केमरून (अफ्रीका), कोह सुल्तान , तथा देववन्द (ईरान) आदि ऐसे ही ज्वालामुखी हैं।

 (ब) उद्गार के अनुसार ज्वालामुखी को दो वर्गों में रखा जा सकता है।

(A) केंद्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी

इनमें उद्गार प्रायः एक सँकरी नाली या द्रोणी के सहारे एक छिद्र से होता है। ये निम्नलिखित हैं।

(i) अतिहिंसक ज्वालामुखी 

इस उद्गार में गैसों एवं उष्ण जलवाष्प का भयंकर दबाव बढ़ जाने से ऐसे उद्गार विशेष विनाशकारी या हिंसक एवं भयंकर विस्फोट के साथ होते हैं ।

सन् 1883 में क्राकाटाओ द्वीप (जावा एवं सुमात्रा के मध्य सुण्डा जलडमरुमध्य में) मे हुए ज्वालामुखी विस्फोट से इस द्वीप का एक-तिहाई भाग उड़ गया एवं शेष दो तिहाई भाग सागर में डूब गया। इसके विस्फोट की आवाज आस्ट्रेलिया तट पर भी सुनाई दी। इसमें स्थानीय सागर तल पर 35 मीटर ऊंची लहरे उठने से जावा व सुमात्रा तट के 36,000 व्यक्ति मारे गये।

(ii) हिंसक ज्वालामुखी 

इसमें भी विविध गैस, राख, एवं ज्वालामुखी के मार्ग के ठोस शैल खण्ड और अम्लीय लावा सभी भयंकर विस्फोट के साथ बाहर निकलते है। गैसों व वाष्प का दबाव अधिक रहने से निकले पदार्थ काफी ऊँचाई तक उठकर चारों ओर दूर दूर बिखर जाते हैं ।

आकाश में धूल, धुआँ व राख के विशाल व मोटे बादल फैल जाते हैं। इनमें भारी मात्रा में जल वाष्प भी होती है। इससे निकला लावा निकटवर्ती भागों में बहकर जम जाता है। 

सर्वप्रथम उद्गार यूनान काल में विसूवियस में सन् 79 में हुआ था। इससे वहाँ स्थित पिम्पेरी नगर नष्ट हो गया। इस ज्वालामुखी को प्लिनियन ज्वालामुखी भी कहते हैं क्योंकि इसे सर्वप्रथम प्लिनी ने ही देखा था।

(iii) भयंकर विस्फोट वाले ज्वालामुखी

जहाँ विसूवियस तुल्य में वाष्प, गैस व राख के तुल्य उद्गार में हर अगले उद्गार के समय शंकु में जमा लावा टूट-फूटकर फेंक दिया जाता है । इसके लिए भयंकर दबाव की आवाज के साथ विस्फोट होकर उद्गार द्वारा पदार्थ बाहर निकलते हैं ।

 वुल्केनो ज्वालामुखी भूमध्य सागर के लिपारी द्वीप-समूह में स्थित है। इसमें निकलने वाला लावा विसूवियस से अधिक गाढ़ा होता है । अत: इससे लेपिली व बम जैसी आकृति आकाश में उछलकर भूमि पर गिरती है। इससे निकले गैसीय पदार्थ, वाष्प, धूल व राख से फूलगोभी जैसे बादल बनकर वर्षा कर देते हैं।

(iv) मध्यम विस्फोट वाले ज्वालामुखी

स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी भूमध्य सागर में सिसली द्वीप के उत्तरी भाग में स्थित है । इसमें सामान्यतः कम गाढ़ा लावा निकलता रहता है । उद्गार के समय कभी-कभी ज्वालामुखी की नली में गैसों का दबाव बढ़ने या मध्यवर्ती अन्तराल लम्बा होने पर विस्फोट भयंकर आवाज के साथ होता है। 

लावा बेसाल्ट जैसा व कम गाढ़ा होने से काफी दूर तक फैल जाता है इस ज्वालामुखी उद्गार में गैस एवं धुआँ कम निकलते हैं। अधिकांश: राख, शिलाखण्ड एवं धूल ही निकलकर वायुमण्डल में फेंक दिये जाते हैं। इनके अतिरिक्त झामक, अवस्कर तथा ज्वालामुखी बम्ब भी निकलते हैं। 

ये अधिक ऊँचाई पर जाकर पुनः ज्वालामुखी क्रेटर में गिर पड़ते हैं। कुछ लावा तो ज्वालामुखी के क्रेटर या विवर में ही गिरता जाता है, शेष शंकु के ढाल पर गिर जाता है। अत: लावा प्रवाह तो कभी-कभी थोड़ी दूरी तक ही हो पाता है।

ज्वालामुखी उद्गार के पदार्थ

ज्वालामुखी उद्गार अनेक प्रकार के होते हैं। ऐसे उद्गार के समय सभी प्रकार के चट्टानी पदार्थ, खनिज, गैसें एवं जलवाष्प ऊँचे तापमान पर निकलकर भूतल पर एवं वायुमण्डल में फैल जाते हैं । यह पदार्थ निम्न तीन प्रकार के अथवा तीन अवस्थाओं में भूतल की गहराइयों से सतह पर प्राप्त होते हैं।

(i) गैसीय अवस्था में विविध गैसें, धुआँ एवं जलवाष्प। 

(ii) ठोस अवस्था में शिलाओं के खण्ड, चूरा, धूल एवं राख।

(iii) द्रव अवस्था में लावा।

(i) गैसीय अवस्था में विविध गैसें, धुआँ एवं जलवाष्प।

ऐसे सभी पदार्थ बहुत ऊँचे तापमान पर ज्वालामुखी उद्गार के समय तेजी से फब्बारे की तरह निकलकर वायुमण्डल में फैल जाते हैं। वास्तव में ज्वालामुखी क्रिया के लिए यही पदार्थ उत्तरदायी हैं। इनमें सबसे अधिक जलवाष्प दो-तिहाई से भी अधिक मात्रा में होती है। 

इसके अतिरिक्त, कार्बन-डाइ-आक्साइड (CO2) कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO), सल्फर व सल्फर डाइ-ऑक्साइड (SOS) हाइड्रोक्लोरिक गैस (HCl), नाइट्रोजन अमोनिया (NH,) एवं अन्य अम्लीय प्रभाव वाली तथा जहरीली गैसें निकलकर वायुमण्डल में फैल जाती हैं। इनके साथ-साथ कुछ उद्गारों में धुआँ भी निकलकर फैलता है।

(ii) ठोस अवस्था में शिलाखण्ड धूल व राख

धूल व राख गैसों व जलवाष्प के साथ वायुमण्डल में फैल जाते हैं और दूर-दूर तक सारे जन-जीवन पर इनका प्रभाव पड़ता है। अन्य पदार्थों में मुख्यतः शिलाखण्ड व शिलाचूर्ण होते हैं। इनका आकार बालू के कण से लेकर विशाल पत्थर या खण्ड में से कोई भी हो सकता है। 

छोटे कणमय टुकड़ों को सिण्डर व ब्रेसिया के नाम से पुकारते हैं। बड़े टुकड़ों को लेपिली कहते हैं। यह सुपारी व प्याज के आकार के होते हैं। इनसे बड़े टुकटों को प्यूमिक (झाँव) एवं बड़े-बड़े खण्डों को ब्लॉक या शैलखण्ड कहते हैं। 

बम एवं प्यूमिक दोनों ही यद्यपि बाद में ठोस रूप में मिलते हैं, किन्तु वे अर्द्ध-द्रव या अम्लीय लावा के ठण्डे होने एवं उनसे गैसें निकलने के पश्चात् विशेष आकृति ग्रहण कर पाते हैं। ज्वालामुखी बम गोलाकर, अण्डाकार या फौजी बम की भाँति लम्बाकार किसी भी आकार व विस्तार का हो सकता है।

(iii) द्रविय अवस्था मे लावा

जब भी ज्वालामुखी उद्गार होता है वहाँ से लावा निकलता है यह लावा गाढा एवं पैठिक (कम गाढा) दोनो रूपों में मिलता है। जब लावा में सिलिका की मात्रा अधिक होती है तो वह हल्के रंग एवं अधिक गाढ़ा या पेस्ट जैसा होने से त्वरित ठण्डा होकर ठोस हो जाता है।

 कई बार बाद में व निरंतर भीतर की गर्मी बाहर निकलने से ऊपरी सतह चटक जाती है एवं ऐसे उद्गार के पिण्ड या खम्भे शीघ्र नष्ट भी हो सकते है। लावा में ज्योज्यो सिलिका की मात्रा घटती जाती है, यह पतला, काला एवं अधिक है फैल जाता है।

भारो पदाचों वाला होता जाता है। यह धीमी गति से ठण्डा होता है एवं काफी दूरी तक । इसमें ओलोजाइन जैसे खनिज अधिक होते हैं। इससे बेसाल्ट जैसी कठोर चट्टानें बनती हैं। अधिक द्रव लावा होने । पर दरारो उद्गार से वह भूतल पर दूर-दूर तक फैल जाता है।

ज्वालामुखी क्रिया से बनी भू-आकृतियाँ

ज्वालामुखी उद्गार के समय अनेक प्रकार के ठोस, अर्द्ध द्रव एवं गैसीय पदार्थ निकटवर्ती क्षेत्र में फैलकर वहीं पर धीरे या शोध जमा होते जाते हैं। इससे धरातल पर अनेक प्रकार की आकृतियाँ-शंकु, विवर (क्रेटर, कड़ाह (काल्डेरा) लावा गुम्बद, लावा पठार, आदि (आकृतियों) की रचना होती है। 

इसके साथ-साथ भूतल के नीचे भी विशेष अनुकूल दशा होने पर या मेग्मा के भूमि के नीचे विविध गहराइयों में ठण्डा होने पर भी कई रचनाओं का निर्माण होता है। 

यह रचना ऊपरी सतह के कटाव के पश्चात् धरातल पर दिखाई देती है। इस प्रकार से धरातल पर बनी आकृतियों को बाहा भू-आकृतियाँ एवं भूतल के नीचे बनी आकृतियों को आन्तरिक भू-आकृतियाँ कह सकते हैं।

1. बाह्य भू-आकृतियाँ 

इसके अन्तर्गत विविध प्रकार के शंकु (Cones), शंकुओं का ऊपरी भाग जिसे विवर (क्रेटर) एवं कहाड़ (काल्डेरा) कहते हैं, लावा गुम्बद एवं लावा पठार या समतल क्षेत्र सम्मिलित हैं। 

(1)ज्वालामुखी शंकु

 ज्वालामुखी उद्गार से बनने वाली पहली एवं विशेष महत्वपूर्ण आकृति उद्गार से निकले पदार्थों के जमाव से बनती है। उसका आकार शंकु जैसा या त्रिकोणाकार होता है । इसे शंकु कहते हैं। ज्वालामुखी से निकले पदार्थों की प्रकृति के अनुसार शंकु कई प्रकार के होते हैं।

अम्लीय लावा शंकु 

ऐसे शंकु तेज ढाल वाले एवं कभी-कभी मोटे खम्भे जैसे भी हो सकते हैं। इसमें लावा विशेष गाढ़ा होता है एवं सिलिका अधिक होने से वहाँ तत्काल ठंडा हो जाता है। 

इसी कारण कई बार इसके आन्तरिक भाग से गैसें व ताप निकलते रहने से, इसकी सतह शीघ्र चटक भी जाती है, उस पर सन्धियाँ पड़ जाती हैं। इसकी आकृति पिप्लियन या वुल्केनियन जैसी होती है।

अर्थात् ऐसा शंकु. तेज ढाल वाला एवं कम स्थान घेरे होता है। ऐसे शंकु शीघ्र नष्ट भी हो सकते हैं। स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी शंकु इसका अच्छा उदाहरण है।

पैठिक लावा शंकु 

जब लावा में बेसाल्ट अधिक एवं सिलिका कम होती है तो लावा द्रव किन्तु भारी व धीरे-धीरे ठण्डा होने लगता है । इससे धीरे ढाल वाला एवं काफी दूर तक फैला कभी-कभी ढाल के आकार का भी शंकु बन जाता है । हवाई लावा शंकु द्वीप में मोनालोआ ज्वालामुखी इसका अच्छा उदाहरण है। 

मिश्रित शंकु 

अधिकांश ज्वालामुखी शंकु मिश्रित होते हैं। इनकी रचना विशाल तेज से मध्यम ढाल वाली एवं बड़े क्षेत्र में फैली होती है। इसमें एक परत लावा की एवं उसके पश्चात् राख,पंक एवं ठोस शिलाखण्ड व चूरे आदि की परत होती है । 

यह सब लावा से मिलकर उस शंकु को ठोस रूप दे देते हैं। जापान का प्रसिद्ध फ्यूजीयामा एवं मध्य अफ्रीका के प्राचीन ज्वालामुखी मिश्रित शंकु के ही बने हैं। फिलीपाइन का जाग्रत ज्वालामुखी मेयान का भी ऐसा ही मिश्रित शंकु है ।

सिण्डर अथवा राख शंकु

जब ज्वालामुखी के उद्गार के समय लावा नही निकलकर राख, धूल व ठोस शिलाखण्ड ही निकलकर जमा होते जाते हैं तो ऐसे में सिण्डर शंकु की रचना होती है। इससे जमा होने वाले पदार्थ (शिलाखण्ड) कई बार इतने अधिक होते हैं कि उनका 8 से 10 दिन 100 मीटर से भी अधिक जमाव हो जाता है। 

अत: यह एक आश्चर्य में डालने वाली घटना भी है। इसमें कई बार राख की मात्रा अधिक होती है तो उसे राख शंकु भी कहते हैं। पश्चिमी संयुक्त राज्य के बेसिन श्रेणी प्रदेश में, मैक्सिको का जोरिप्लो ज्वालामुखी, फिलीपीन्स (लूजोन द्वीप) का केगायन शंकु ज्वालामुखी ऐसे ही उदाहरण हैं।

 हवाई द्वीप में ये शंकु अधिक मिलते हैं। इन शंकुओं का ढाल भी 30° से 45° के मध्य रहता है। यह भूतल पर लम्बे समय तक या स्थायी नहीं रह पाते क्योंकि ढीले पदार्थ अपरदन द्वारा निरन्तर बहा दिये जाते हैं। इनके मुँह पर विशेष चौड़ा काल्डेरा जैसा मुँह होता है ।

पराश्रित शंकु 

इनका विकास ज्वालामुखी की मुख्य नली के बन्द हो जाने से या अन्य कारणों से लावा द्वारा मुख्य शंकु के ढाल पर अन्य मार्ग से नवीन शंकु बनने से होता है। कई बार मुख्य नली के अतिरिक्त या दरार के आस-पास अनेक छोट-छोटे शंकु भी बनते जाते हैं ।

 शंकु मुख्य मार्ग पर ही आश्रित रहते हैं। अतः इन्हें पराश्रित शंकु कहते हैं। कभी-कभी यहाँ निरन्तर लावा एवं अन्य पदार्थ मिलते रहने पर छोटे शंकु भी मुख्य शंकु जैसे ही विशाल बन सकते हैं। पश्चिमी संयुक्त राज्य का माउण्ट शास्तिना शंकु ऐसा ही है। पदार्थों के परत रूप में जमने के कारण इन्हें स्तरित शंकु भी कहा जाता है ।

गुम्बदाकार शंकु 

कई बार अम्लीय लावा बहुत अधिक गाढ़ा नहीं होता एवं वह अपने मुँह के चारों ओर तेजी से पेस्ट जैसा निकलकर गुम्बद की भाँति एकत्रित होता जाता है। अतः ऐसे शंकु को लावा गुम्बद  या शील्ड शंकु भी कहते हैं। 

कभी-कभी इनकी आकृति ढाल जैसी भी हो सकती है। किसी भी दशा में इनका विस्तार अधिक नहीं होता। पश्चिमी संयुक्त राज्य का डेविल्स डोम ऐसा ही गुम्बदाकार शंकु है। 

(2) विवर या क्रेटर 

ज्वालामुखी शंकु के ऊपरी या शीर्ष भाग पर धंसाव से अथवा विस्फोट से ऊपरी भाग में बड़ा गड्डा बन जाता है। यह कीप के आकार वाला गड्डा ही विवर या क्रेटर कहलाता है।

 यह प्रायः वृत्ताकार या गोलीय होता है एवं इसका व्यास लगभग 800 मीटर से कुछ किलोमीटर तक एवं गहराई 150 मीटर से 900 मीटर तक हो सकती है। कई बार बड़े क्रेटर में अनेक छोटे-छोटे शंकु एवं उनके छोटे-छोटे क्रेटर (विवर) भी बन जाते हैं। 

ऐसा पैठिक लावा ज्वालामुखी के उद्गार की स्थिति में अधिक होता है। इसे घोंसलाकार विवर कहते हैं। शान्त ज्वालामुखी के मुँह या विवर में पानी भर से बनी झील को क्रेटर झील कहते हैं । पश्चिमी संयुक्त राज्य के ओरेगन राज्य में क्रेटर झील इसका अच्छा उदाहरण है। इसकी दीवारें लगभग 1,000 मीटर तक ऊंची हैं जो कि एक रिकार्ड है।

(3) काल्डेरा का कड़ाह 

जब ज्वालामुखी का ऊपरी भाग भंयकर विस्फोट से उड़ जाय अथवा निमज्जन या धंसाव के प्रभाव से वहाँ विशाल क्रेटर बन जाय तो उसे काल्डेरा या कड़ाह कहते हैं । अतः काल्डेरा विशाल कड़ाह जैसा होता है। इसके भीतर के तल पर एक या अधिक शंकु भी हो सकते हैं।

 इसकी दीवारें भी काफी ऊँची रहती है। इसका व्यास कई किलोमीटर होता है मध्य अफ्रीकी देश केनिया का किलीमंजेरो ज्वालामुखी पर्वत का विशाल मुख जापान का अशोक कॉल डेरा पश्चिमी कनारी द्वीप का कालाडेरा इसके विशेष उदाहरण है

(4) ज्वालामुखी प्लग या ग्रीवा 

यह शंकु की संशोधित आकृति है। इसमें जब ज्वालामुखी के मार्ग में लावा ठण्डा होकर जमा हो जाता है और लम्बे समय के कटाव के दौरान मिश्रित शंकु का अधिकांश भाग कटाव से नष्ट हो जाता है।

तब अन्तत:भीतरी गर्दन जैसी ज्वालामुखी की नली या प्लग (डाट) की भाँति खम्भे जैसी कठोर आकृति बन जाती है । ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है । ऐसे ज्वालामुखी ग्रीवा पश्चिमी संयुक्त राज्य के न्यू मैक्सिको राज्य में पाए जाते हैं ।

(5) लावा पठार या समतल क्षेत्र

जब पैठिक या द्रव लावा दरारों के द्वारा निकलकर बड़े क्षेत्र में फैल जाता है, तब इससे आस-पास के सम्पूर्ण ऊबड़-खाबड़ हिस्सों में लावा जमा होता जाता है। इससे वह सारा ही क्षेत्र समतलीप्रायः एवं बेसाल्ट चट्टानों से बना भाग बन जाता है। इसे निचले भाग में होने पर लावा का मैदान एवं ऊँचाई पर जमा होने पर लावा का पठार कहते हैं ।

 ऐसे लावा पठार या लावा मैदान विशेष उपजाऊ होने से सघन कृषि के क्षेत्र कहलाते हैं। भारत में दकन का लावा का पठार, पश्चिमी संयुक्त राज्य का ओरेगन राज्य का लावा का पठार, इटली, जापान एवं आइसलैण्ड के लावा के मैदान इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं ।

2. आन्तरिक भू-आकृतियाँ 

ज्वालामुखी उद्गार के समय ज्वालामुखी मेग्मा वाष्प तथा गैस की शक्ति घटने या कम हो जाने से धरातल से बाहर नहीं आकर धरातल के अन्तर भूगर्भ की लावा दरारों में ही भर जाता है और धीरे-धीरे ठण्डा हो जाने के बाद निम्न आकृतियाँ बनाता है।

(1) बैथोलिथ

यह शब्द जर्मन भाषा का है, यह बैथोस शब्द से लिया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ गहराई से है। भू-वैज्ञानिकों ने परीक्षण करके देखा कि इस प्रकार का जमाव काफी गहराई पर पाया जाता है। यह कभी मेग्मा भण्डार का भी भाग रहा होगा। इसकी आकृति ऊपर से असमान गुम्बद की तरह होती है तथा इनके किनारे खड़े ढाल वाले तथा काफी गहराई तक चले जाते हैं। अत: कई बार इसके सही विस्तार का ज्ञान नहीं हो पाता।

(2) लैकोलिथ' 

यह भी भू-भाग के अन्दर एक उन्नतोदर ढाल की आकृति होती है। प्रायः परतदार चट्टानों के बीच यह आकृति पायी जाती है। अतः जब दो परतों के बीच गर्म मेग्मा भर जाता है तो वाष्प तथा गैस के कारण ऊपर की परत गुम्बद की भाँति फूल जाती है या उठ जाती है तथा वहाँ लावा भर जाता है। 

इस प्रकार भरे हुए लावा को लैकोलिथ कहते हैं । उदाहरण के लिए, लैकोलिथ की आकृति संयुक्त राज्य के यूटाह प्रान्त के हेनरी पर्वत पर स्थित है। इसकी छतरीनुमा आकृति होने से इसे छत्रक भी कहते हैं।

(3) फैकोलिथ 

यह आकृति मोड़दार पर्वतों की अपनति तथा अभिनति में ज्वालामुखी लावा भर जाने से होती है। इसका आकार लैन्स की भाँति होता है। 

(4) लोपोलिथ 

उद्गार के समय जब लावा धरातल में नतोदर (तश्तरीनुमा) या छिछले बेसिन में जमा होकर ठण्डा हो जाता है, तो लोपोलिथ आकृति बनती है। उदाहरण के लिए, दक्षिणी अफ्रीका में ट्रान्सवाल में ऐसी ही आकृति का जमाव पाया जाता है। यह आकृति लगभग 750 किलोमीटर लम्बी है।

(5)सिल' 

इसका जमाव परतदार चट्टानों में लावा भर जाने से होता है। सिल सदैव क्षैतिज परत में पायी जाती है। इसकी मोटाई प्रत्येक जगह समान नहीं होती। उसकी गहराई भी कुछ फीट से प्रारम्भ होकर सैकड़ों फिट तक होती है । उदाहरण के लिए, उत्तरी इंग्लैंड में ग्रेट हिन सिल तथा दक्षिणी अफ्रीका में कारू क्षेत्र में ऐसे ही सिल पाए जाते है। स्थानीय रूप से इस प्रकार के उदाहरण पश्चिम बंगाल एवं बिहार की कोयला खानों में देखे जा सकते है। 

(6) डाइक 

जहां सिल् की आकृति सीधी तथा क्षैतिज होती है वहीं डाइक की आकृति गोलाकार व लम्बवत रूप लिये होती है। इसकी मोटाई अधिकांशत: एक से तीन मीटर तक होती है कहीं पर यह मोटाई अधिक भी हो जाती है उदाहरण के लिए ग्रेट ब्रिटेन में अरान तट  के पास डाइक की अनेक आकृतियां हैं डाइट का वास्तविक रूप उस स्थान के ऊपरी जमाव के अपरदन के बाद ही दिखाई पड़ता है क्योंकि अपरदन से लावा की जमी हुई कठोर डाइक नहीं कट पाती तथा वहां की डाइक खड़े जमाव या खंभे जैसी दिखाई देती है। स्थानीय रूप से झारखंड के सिंह भूम जिले में डोले राइट की संख्या डाइक दिखाई देती है जो नवीन डोले राइट के नाम से जानी जाती हैं।

(1) गाइजर या उष्ण फब्बारें

 यह शब्द आइसलैंड की भाषा के गाइजर शब्द से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है फुहारें या फब्बारें की भांति उछलता हुआ। 

आर्थर होम्स के अनुसार, “गाइजर गर्म जल के सोते होते हैं, जिनसे थोडे थोड़े समय के अन्तर पर गरम जल तथा वाष्प प्रायः ऊँचे दबाव पर तीव्रता से निकलता है। इनकी ऊंचाई कई मीटर तक होती है ।

वारसेस्टर महोदय के अनुसार, “गाइजर सविराम गर्म जल के स्रोत होते हैं जो कि समय समय पर अपने मुख से गर्म जल के फुहारे तथा वाष्प छोड़ते हैं। इनके मुख से भाप व गैस मिश्रित गरम जल निकलता है। इनके सम्मिलित प्रभाव से फुहारा छूटता है।

 कभी-कभी इनका उष्ण जल 50 से 60 मीटर तक उठ जाता है। ऐसा माना जाता है कि विशेष दरारों एवं पानी रिस-रिसकर छिद्रों के द्वारा ज्वालामुखी क्षेत्रों में कहीं-कहीं काफी गहराई तक नीचे पाताल में जाने लगता है। वहाँ यह पानी गर्म चट्टानों के सम्पर्क में आकर तेजी से गर्म होकर भाप बनता जाता है।

ऊपरी जल के दबाव एवं कठोर चट्टानें होने से भाप निकल नहीं पाती। अतः दबाव युक्त भाप के तापमान 100° सेण्टीग्रेड से भी बढ़ते जाते हैं। कई बार यह 130° या 135° सेण्टीग्रेड तक पहुँच जाते हैं। इस प्रकार विशेष दबाव, बहुत ऊँचे तापमान एवं गैसों के संयोग से ऐसी भाप विशेष गतिशील और विस्फोटक बन जाती है।

भारी दबाव के साथ पानी में प्रवेश कर यह भाप तेजी से ऊपर की ओर बढ़ने लगती है। साथ में ऊपर के पानी के भण्डार को तेजी से बाहर फेंकती है। इसी कारण गैस मिश्रित भाप एवं गर्म पानी फब्बारे की तरह बाहर उछलता हुआ निकलता है। अधिकतर गाइजर आइसलैण्ड,न्यूजीलैण्ड तथा कैलिफोर्निया में पाये जाते हैं। 

संयुक्त राज्य अमेरिका के यलोस्टोन पार्क में कई गाइजर पाये जाते हैं; जैसे जाइण्ट, जाइण्टेस, कैसल, ओल्ड फेथफुल, मिनट्समेन आदि; इनमें से ओल्ड फेथफुल प्रमुख , है। इसमें हर बार 65 मिनट के पश्चात् उद्गार होता है और प्रत्येक उद्गार 5 मिनट तक रहता है, जल 45 से 50 मीटर तक ऊंचा उछलता है। 

विगत कई शताब्दियों से क्रम बना रहा है। इसलिए इसका नाम अनंत की घड़ी भी रख दिया गया है। गाइजर की सक्रियता में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। इनमें कुछ अधिक मात्रा में जल व वाष्प तथा कुछ कम मात्रा में कुछ निश्चित समयावधि में एवं रुक रुककर सक्रिय होते है। इनके आधार पर इन्हें निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है।

(1) कुण्ड गाइजर, 2 संकरे गाइजर  3 सविराम  गाइजर 4 अविराम गाइजर।

(2)धूम्र छिद्र या धुआरें

धूम्र छिद्र शब्द से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ ऐसे छिद्र से है जिससे गैस तथा वाष्प निकला करती है। ज्वालामुखी से जब राख तथा लावा निकलना बन्द हो जाता है तो उससे कभी कभी वाष्प और अन्य गैसें निकलती रहती हैं। इन धुआँरों से भाप के बादल धीरे-धीरे निकलते रहते हैं । इनको ही धूम छिद्र नाम से पुकारा जाता है। अलास्का की दस सहस्र धूम छिद्रों की घाटी विश्व के धुआँरों का सबसे बड़ा क्षेत्र है।

ज्वालामुखी का वितरण

विश्व में ज्वालामुखी विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाते हैं जिनमें अधिकांश सागरीय भागों में हैं। ज्वालामुखियों की भिन्न पेटियाँ हैं।

(1) परिप्रशान्त महासागरीय पेटी 

(2) मध्य महाद्वीपीय पेटी 

(3) अटलाण्टिक महासागरीय पेटी 

(4) बिखरे ज्वालामुखी

(1) परिप्रशान्त महासागरीय पेटी 

इस ज्वालामुखी पेटी का विस्तार प्रशान्त महासागर के चारों ओर है इस पेटी का प्रारम्भ दक्षिणी अमेरिका की एण्डीज पर्वत श्रृंखला से प्रारम्भ होकर मध्य अमेरिका, मैक्सिको, पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका, अलास्का होती हुई एल्यूशियन द्वीप पहुँचती है।

जहाँ से एशिया के कमचटका प्रायद्वीप होती हुई आगे क्यूराइल द्वीप समूह होती हुई जापान, फिलीपीन्स, सुलावेसी, न्यूगिनी, सोलोमन द्वीप होती हुई न्यूजीलैण्ड पर समाप्त होती है । इस पेटी में विश्व के दो तिहाई ज्वालामुखी मिलते हैं। 

प्रशान्त महासागर के चारों ओर तटीय भागों, द्वीपीय चापों तथा समुद्री द्वीपों के सहारे ज्वालामुखी पाए जाने के कारण इस पेटी को प्रशान्त महासागर का अग्नि-वृत्त कहा जाता है। इस पेटी में पाये जाने वाले ज्वालामुखी एक श्रृंखला के रूप में मिलते हैं। एल्यूशियन नामक द्वीप समूह तथा हवाई द्वीप समूह के ज्वालामुखी एक श्रेणी के रूप में पाये जाते हैं।

इक्वेडोर में पाए जाने वाले ज्वालामुखी विश्व प्रसिद्ध हैं। यहाँ 22 ज्वालामुखी पर्वत समूह में पाए जाते हैं जिनमें 15 ज्वालामुखी तो 1,500 फीट से अधिक ऊँचे हैं। इक्वेडोर में स्थित कोटोपेक्सी सक्रिय ज्वालामुखी 5,897 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं।

(2) मध्य महाद्वीपीय पेटी 

इसे महाद्वीपीय प्लेट अभिसरण मेखला भी कहा जाता है। इसका प्रारम्भ मध्य अटलाण्टिक क्षेत्र से होता है जहाँ रचनात्मक प्लेटें हैं। 

यूरेशियाई तथा अफ्रीकन एवं भारतीय प्लेटें मिलती हैं तो किनारों पर ज्वालामुखी आते हैं। इस पेटी का प्रारम्भ आइसलैण्ड के हेकला पर्वत से होता है जहाँ दरारी उद्गार वाले ज्वालामुखी हैं। 

मध्य महाद्वीपीय ज्वालामुखी की मुख्य शाखा स्पेन, इटली होती हुई सिसली, टर्की, काकेशस, आरमीनिया, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, म्यांमार एवं मलेशिया होती हुई दक्षिण की ओर मुड़कर परिप्रशान्त पेटी से मिल जाती है। 

इसका विस्तार अल्पाइन पर्वत शाखा के सहारे है। इस पेटी में भूमध्य सागरीय ज्वालामुखियों को भी सम्मिलित किया गया है। 

भूमध्यसागरीय पेटी में यूरेशिया के अरारत पर्वत, इटली, सिसली तथा अटलाण्टिक महासागर के अजोर्स तथा कनारी द्वीप के ज्वालामुखी सम्मिलित हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख ज्वालामुखी स्ट्राम्बोली, विसूवियस, एटना ईरान का देवमन्द, कोह सुल्तान, काकेशस का एल्बुर्ज, आरमीनिया का अरारत आदि हैं । 

इस ज्वालामुखी पेटी की एक शाखा जोर्डन की भ्रंश घाटी तथा लाल सागर होती हुई अफ्रीका की विशाल भ्रंश घाटी तक चली गयी है। इसे अरब-अफ्रीकी पेटी भी कहा जाता है।

(3) अटलाण्टिक महासागरीय पेटी 

इस पेटी में पश्चिमी द्वीप समूह तथा पूर्वी अटलाण्टिक महासागर के द्वीप सम्मिलित हैं । यहाँ मध्य अमेरिका की ज्वालामुखी श्रृंखला एण्टीलीस द्वीपों से होती हुई पश्चिमी द्वीप समूह तक चली गयी है। 

यह पूर्वी तट पर अजोर्स केपवर्डे तथा कनारी द्वीपों तक चली गयी हैं। मध्य अटलाण्टिक कटक के सहारे दो प्लेटों के अपसरण से दरार या भ्रंशन उत्पन्न होता है जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। इस क्रिया में लावा निकलता है जिसमें बेसाल्ट वाला लावा कटक से दूर जमा होता रहता है।

(4) बिखरे ज्वालामुखी 

उपर्युक्त क्षेत्रों के महाद्वीपों एवं द्वीपों पर ज्वालामुखी पाए जाते हैं जिन्हें बिखरे ज्वालामुखी के रूप में जाना जाता है । हिन्द महासागर में जावा, सुमात्रा तथा बाली द्वीपों पर ज्वालामुखी पाए जाते हैं। अफ्रीका के पूर्वी भाग में मैडागास्कर के समीप कमोरी, मारीशस तथा रियूनियन द्वीपों पर, अण्टार्कटिका में रास सागर के तटीय भागों पर अरेबुस व टेरर ज्वालामुखी बिखरे ज्वालामुखी के उदाहरण हैं। 

ज्वालामुखी का मानव क्रिया-कलापों पर प्रभाव 

ज्वालामुखी घटना विस्फोटक और सबसे अधिक विनाशकारी घटनाओं में से है । इसी कारण इसका तत्काल प्रलय मचाने जैसा प्रभाव पड़ता है। अत: उद्गार या भयंकर विस्फोट के समय तो जान-माल की हानि उठानी पढ़ती है। फिर भी इससे कई प्रकार लाभ भी ऐसे क्षेत्रों में मिलता है। 

(अ) प्रलय मचाने वाले प्रभाव 

ज्वालामुखी क्रिया एक प्रलंयकारी व दर्दनाक घटना है जिसमें लाखों लोग अकाल के गाल में चले जाते हैं । अप्रैल सन् 1815 में इण्डोनेशिया के ताम्बोरा, सुम्बावा में ज्वालामुखी विस्फोट से 92,000 लोग मारे गए। इण्डोनेशिया के क्राकाटाओ द्वीप के ज्वालामुखी से सन् 1833 में इस द्वीप का दो तिहाई भाग उड़ गया। 

सन् 1902 में माउण्ट पैली ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों से 8 किलोमीटर दूर पर स्थित सेण्ट पियरे नगर के 30 हजार लोग सोते ही रह गए। इसी प्रकार सन् 1979 में विसूवियस के ज्वालामुखी उद्गार से निकली राख व धूल वायुमण्डल में छा गयी। 

धीरे-धीरे धरातल पर गिरती गयी जिससे 10 किलोमीटर दूर स्थित पंयाई नगर में दस मीटर मोटी परत जमा हो गयी जिससे बीस हजार लोग मर गए। सारा वायुमण्डल धुआँ, राख, भाप व जहरीली गैसों से भरने लगता है । साँस लेना मुश्किल हो जाता है।

(ब) निर्माणकारी या लाभकारी प्रभाव 

लावा के चारों ओर फैलने या अधिक क्षेत्र में फैलने से वहाँ नवीन 'लावा की उपजाऊ मिट्टी' बिछ जाती है । प्राचीनकाल में हुए ऐसे ही जमाव से दक्षिणी भारत का उपजाऊ चिकनी काली मिट्टी का प्रदेश बना है। 

इस रेगर मिट्टी में सभी प्रकार की फसलें पानी की प्राप्ति के अनुसार होती हैं। सभी प्राचीन ज्वालामुखी से प्रभावित पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी गर्म पानी के सोते पाये जाते हैं। इनमें गन्धक और अन्य उपयोगी खनिज मिले होने से इनका उपयोग चर्म रोग, गठिया,श्वांस जैसी बीमारियों का इलाज करने में होता रहा है। 

ज्वालामुखी अपनी नली के आस-पास कायान्तरित चट्टानों का विकास या निर्माण करते हैं। इसी कारण ज्वाला की गर्दन (ग्रीवा) के आस-पास ‘बहुमूल्य खनिज मिलते हैं। अन्य कई प्रकार से धातु व अधातु खनिज भी पाये जाते हैं। इनमें गन्धक, लौह अयस्क, पायराइट, बोरिक एसिड, अनेक प्रकार की बहूमूल्य अलौह धातुएँ; जैसे चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबा, सोना आदि भी ऐसे प्रदेशों में मिलते हैं। 

राजस्थान के अलौह धातुओं के जमाव, स्वीडन का लौह अयस्क ऐसी ही चट्टानों में पाये जाते हैं। इसी प्रकार बड़े-बड़े ज्वालामुखियों के मुँह या ऊपरी भाग या क्रेटर व काल्डेरा नामक विशाल गड्डों में पानी भरने से क्रेटर झील' बन जाती है।

Subscribe Our Newsletter