ज्वालामुखी किसे कहते हैं - jwalamukhi kya hai

Post Date : 11 April 2022

आन्तरिक शक्तियों में से ज्वालामुखी एवं भूकम्प की घटनाएँ इतनी आकस्मिक एवं शीघ्र घटित होती है। कि उनका पृथ्वी की सतह पर तत्काल विनाशकारी प्रभाव दिखाई देता है। 

ज्वालामुखी किसे कहते हैं

ज्वालामुखी जैसा कि शब्द से स्पष्ट है  एक ज्वाला उगलने वाला या आग का पहाड़ होता है। इसमें से बहुत ऊँचे तापमान पर आग की से लपटों की भाँति दहकते ठोस व गैसीय पदार्थ तेजी से धरातल की ओर फेंक दिए जाते हैं। इसी कारण यह दूर से आग फेंकने वाली घटना जैसी  दिखाई देती है। 

यूनान काल में वूलकेनो नामक ज्वालामुखी के मुख को पाताल का मार्ग कहा जाता था। अतः इसी से Volcano शब्द बना। मोटे तौर पर “पृथ्वी के भीतरी भाग से जो दहकते हुए पदार्थ जिस मार्ग विशेष से निकलते हैं उसे ज्वालामुखी कहते हैं।

एवं उससे बनने वाली आकृति या पहाड़ को 'ज्वालामुखी शंकु' कहते हैं।” ज्वालामुखी से निकले पदार्थों में पिघला हुआ लावा, ठोस शिलाखण्ड, अनेक प्रकार की जलती हुई गैसें, धूल, राख एवं भारी मात्रा में ऊँचे ताप पर जलवाष्प तेजी से प्रायः ऊँचे दबाव पर या कम दबाव पर बाहर आती है। 

सभी पदार्थ जिन शक्तियों एवं घटनाओं के अधीन भूगर्भ से बाहर की ओर आते हैं उन सबको एक साथ 'ज्वालामुखी क्रिया' के नाम से पुकारते हैं। 

अतः वूलरिज एवं मॉर्गन के अनुसार : 'ज्वालामुखी क्रिया' के अन्तर्गत वह सम्पूर्ण प्रक्रिया आ जाती है जिनके माध्यम से भूगर्भ से मैग्मा भूतल की ओर आता है अथवा धरातल पर प्रकट होते हैं। 

आर्थर होम्स के अनुसार, “वह सारी घटना जिसके द्वारा पृथ्वी की गहराइयों से, मेग्मा सम्पूर्ण पदार्थ की ओर अथवा धरातल पर लाकर बिछा दिया जाता है, ज्वालामुखी क्रिया कहलाती है।" 

इस प्रकार ज्वालामुखी घटना का सीधा सम्बन्ध पृथ्वी की विभिन्न गहराइयों में होने वाली विशेष प्रक्रियाओं एवं घटनाओं से है ऐसी घटनाओं के एवं उनके लिए जिम्मेदार शक्तियों के प्रभाव से वहां की पहले से ही विशेष चट्टानें पिघल जाती है।

इन्हीं पिघली हुई चट्टानी पदार्थों को मेग्मा कहते हैं। जब मेग्मा पृथ्वी की सतह पर आता है तो उसमें मिलने वाली गैस बाहर निकल आती हैं तब उसे लावा कहते हैं इस प्रकार लावा + गैस मेग्मा कहा जाता है मैग्मा आग्नेय चट्टानें बनने का वर्तमान में आधार है।

मेग्मा जब पृथ्वी तल की ओर विशेष मार्ग से आने का प्रयास करता है तो वह भूतल के कमजोर भागों  या पहले की दरारों या मार्गों को ढूंढ कर बाहर निकल आता है। यदि इसमें गैसों एवं जलवाष्प का दबाव कम होता है जो यह पृथ्वी की सतह से नीचे ही, जहाँ भी स्थान मिलता है वहीं फैलकर धीरे-धीरे ठण्डा हो जाता है। इससे भूमि के नीचे भूगर्भ में अनेक प्रकार की आकृतियाँ बनती हैं। 

इन्हें ही ‘आन्तरिक आग्नेय चट्टानें' आदि कई नामों से पुकारते हैं।इसके दूसरी ओर जब मेग्मा धरातल पर फैलने लगता है तो उसके साथ अनेक प्रकार की गैसें, राख, धुआँ, धूल एवं जलवाष्प पहले वायुमण्डल में काफी दूर-दूर तक फैलकर तेजी से तापमान बढ़ा देती हैं एवं वहाँ प्राय: साँस लेना भी कठिन हो जाता है।

ऐसी जलवाष्प के ठण्डा व संघनित होते ही सभी पदार्थों की सम्मिलित या जहरीली वर्षा होती है एवं भूमि पर दलदल फैलने लगता है । इसी समय उद्गार की शक्ति के अनुसार एवं मेग्मा की प्रकृति के अनुसार भूगर्भ से लावा एवं अन्य ठोस चट्टानी टुकड़े बाहर उगल दिये जाते हैं।

 ऐसे पत्थर के टुकड़ों एवं गाढ़े मेग्मा (लावा) के ठण्डा होने से बचे विशेष आकार के टुकड़ों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। ज्वालामुखी के मार्ग से धरातल पर निकलने वाले सारे पदार्थ ज्वालामुखी उद्दगार  की सीमा में आते हैं।

ज्वालामुखी  उद्दगार की नली को ज्वालामुखी नली कहा जाता है जिस मुख या क्षिद्र से पदार्थ बाहर निकलता है उसे ज्वालामुखी या क्रॆटर कहा जाता है । 

ज्वालामुखी की उत्पत्ति के कारण

ज्वालामुखी की घटना या संपूर्ण क्रिया का आधार भूगर्भ की स्थिति एवं वहां की घटना से संबंधित है। जब यह घटना तेजी से घटित होती है तब भूमि के नीचे एवं सतह पर उथल-पुथल मच जाती है। यद्यपि इस संपूर्ण घटना की तथ्यात्मक एवं सही सही जानकारी आज भी प्राप्त नहीं है 

फिर भी आधुनिक वैज्ञानिक माध्यमों से भूगर्भ की विभिन्ना गहराइयों में की जाने वाली खोज के साथ-साथ इस घटना के कारणों या संभावित कारणों की खोज की जाती रही हैं। 

भूगर्भ में विकसित वे सब परिस्थितियां जिनके कारण वहां गैसे व जल वाष्प  एकत्रित होकर भारी मात्रा में दबाव उत्पन्न करती है एवं ठोस किंतु विशेष धर्म चट्टानों को सापेक्षत: स्थानीय रूप से दबाव घटने से उन्हें पिघलने का वहां अवसर मिलता है

1. भूगर्भ में ताप का बढ़ना

गहराई बढ़ने पर प्रति 32 मीटर पर 1° सेंटीग्रेड तापमान बढ़ता जाता है और 50 किलोमीटर की गहराई पर शैलों का द्रव णांक रोना आ जाता है इसके अतिरिक्त वहां पाए जाने वाले आणविक तत्वों के विखण्डन से भी ताप बढने में साहयता करती है।

 अतः भू गर्भ में यधपि चट्टाने बहुत ऊँचे तापमान पर रहने से पिघली हुई ही मिलनी चाहिए किन्तु ऊपरी चट्टानों के भारी दबाव से वे फैल नहीं पातीं पिघल नहीं सकतीं हैं।

किन्तु 50 से 150 किलोमीटर की गहराई के मध्य प्रायः पृथ्वी के कुछ कमजोर भागों अथवा असन्तुलित एवं अस्थिर भागों में चट्टानें खिसकने, की घटना या ऐसी ही क्रिया से कहीं कही  ऊपरी दबाव में कमी भी आने लगती है 

इसी से सीमा का उपरी तल कहीं-कहीं पिघलने लगता है और वहां मेग्मा के स्थानीय भंडार एवं अन्य गैसीय पदार्थ व उच्च ताप व दाब वाली जलवाष्प एकत्रित होने लगती है 

2. गैसों वा जलवाष्प की उत्पत्ति

भूमिगत जल महासागरों की गहराइयों से या भ्रंश व दरारों से भूमि में या पूर्वकालीन ज्वालामुखी प्रदेशों में काफी गहराई तक चला जाता है। इसमें मार्ग की चट्टानों से प्राप्त गैसें भी सम्मिलित होती जाती हैं। इसी कारण गैसीय पदार्थों के साथ 75 से 90 प्रतिशत भाग तक जलवाष्प का रहता है। 

यह जलवाष्प दबाव के प्रभाव से 135° सेण्टीग्रेड तक विशेष गर्म होकर बहुत अधिक विस्फोटक स्थिति ला देती है। अतः इन विशेष गतिशील एवं दबाव वाली गैसों एवं जलवाष्प को जहाँ भी कमजोर स्थल या मार्ग मिलता है।

 यह उसी भार्ग से भूतल की ओर बढ़ती हैं; तब इनके साथ मेग्मा भी तेजी से ऊपर की ओर बढ़ने लगता है। इस कारण भी प्रशान्त महासागर के चारों ओर परिप्रशान्त पेटी में सबसे अधिक ज्वालामुखी पाये जाते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी का सबसे अधिक असन्तुलित व कमजोर भू-भाग है । 

ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में कार्बन-डाइ-ऑक्साइड (CO2), गन्धक व गन्धक ऑक्साइड (SO2), कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO), हाइड्रोजन (H,), अमोनिया (NH,) आदि होती हैं। इसके साथ भारी मात्रा में जलवाष्प के अतिरिक्त महीन कणों के रूप में धूल, धुआँ एवं राख भी निकलती है।

3. लावा एवं उद्गार

ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा जिसे कि भूगर्भ में मेग्मा कहते हैं, सभी भागों में एक जैसी अवस्था में नहीं पाया जाता। यह लावा गैसों के साथ मिलकर विशेष गतिशील एवं क्रियाशील बन जाता है। 

इसी कारण जिस प्रकार शीतल पेय की बोतल के मुँह से दबाव हटाते ही वह गैस मिश्रित होने से तेजी से बाहर आने का प्रयास करता है, उसी प्रकार से गैस मिश्रित लावा (मेग्मा) भी पृथ्वी के कमजोर भागों से या दरार आदि का मार्ग मिलते ही तेजी से पृथ्वी की सतह की ओर आने लगता है।

किन्तु लावा के उद्गार की प्रकृति बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि लावा गाढ़ा है या द्रव (पैठिक) दशा में । गाढ़ा लावा धीमी गति से तो उठेगा किन्तु उसमें व उसके चारों ओर गैसों का दबाव अधिक रहने से भयंकर विस्फोट भी हो सकता है जबकि द्रव लावा अपने में गैसों को समाहित कर लेता है।

अतः वहाँ विस्फोट धीमा रहने से उद्गार शान्त बना रहता है। लावा मुख्यतः सिलिका की मात्रा के अनुसार पतला या गाढ़ा होता है । जब लावा में सिलिका की मात्रा 75 प्रतिशत से अधिक हो तो उसे अम्लीय लावा कहते हैं । 

यह ठोस या बहुत गाढ़ा होता है एवं वायुमण्डल में आते ही ठण्डा हो जाता है। जब इसमें सिलिका की मात्रा 55 से 75 प्रतिशत के मध्य होती है तो उसे मध्यम लावा या गाढ़ा लावा कहते हैं । ऐसा लावा धीमी गति से फैलता है एवं शीघ्र ठण्डा व कठोर होने लगता है। 

जब लावा में सिलिका की मात्रा 35 से 55 प्रतिशत के मध्य ही हो तो उसे पैठिक लावा कहते हैं। ऐसा लावा पर्याप्त दूरी तक दलदल की भाँति प्रवाहित होकर धीरे-धीरे ठण्डा होता है। इसमें से गैसें भी बराबर निकलती रहती हैं।

किन्तु जब लावा में सिलिका की मात्रा बहुत ही कम 35 प्रतिशत से भी कम) हो तो तब लावा द्रव जैसा हो जाता है; इसे अति-पैठिक लावा कहते हैं। इसी दशा में लावा एक मार्ग से या केन्द्रीय उद्गार से बाहर न आकर दरारों से बाहर निकलकर सारे प्रदेश में लावा की मात्रा के अनुसार फैल जाता है। इसीलिए इसे दरारी उद्गार भी कहते हैं।

ऐसे दरारी उद्गार के लिए पहले से पृथ्वी की गहराइयों में मेग्मा या भण्डार इकट्ठा होना आवश्यक है। इसी भाँति ज्वालामुखी केन्द्रीय उद्गार से पहले भू-गर्भ में मेग्मा का स्थानीय भण्डार एवं गैसों का दबाव, विशेष उष्ण जलवाष्प एवं इन सबका गतिशील प्रभाव सभी सम्मिलित रूप से मिलकर ही पृथ्वी के कमजोर भागों के आस-पास ज्वालामुखी उद्गार की आदर्श दशाओं का विकास कर पाते हैं। 

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के आधार पर अभिसारी तथा अपसारी किनारों के निकट ज्वालामुखी क्रियाएँ होती हैं। ।

स्पष्ट है कि सभी कारणों से लावा, वाष्प एवं गैसें पृथ्वी की वलन, भ्रंशन तथा अन्य हलचलों से कमजोर पपड़ी को तोड़कर बाहर निकलने का प्रयास करते हैं।

ज्वालामुखी का वर्गीकरण

ज्वालामुखी को अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है। ये मुख्यत: निम्नलिखित हैं। क्रियाशीलता के अनुसार ज्वालामुखी निम्नांकित प्रकार के हैं। 

1. जाग्रत ज्वालामुखी

जिन ज्वालामुखियों से समय-समय पर लावा एवं अन्य पदार्थों का उद्गार होता रहता है अथवा रुक-रुक कर होता रहता है, उन्हें जाग्रत ज्वालामुखी कहते हैं।

हवाई द्वीप का मोनालोआ व मोनाकी एवं भूमध्य-सागर का स्ट्राम्बोली ऐसे ही ज्वालामुखी हैं। स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी लिपारी द्वीप पर स्थित है । इससे निकलने वाली गैसों से समीपवर्ती क्षेत्र में सदैव प्रकाश बना रहता है अतः इसे भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है।

2. सुषुप्त ज्वालामुखी 

जिस ज्वाला- मुखी का कई सदियों से उद्गार नहीं हुआ है एवं निकट भविष्य में उद्गार की कम सम्भावना है उन्हें सुषुप्त ज्वालामुखी कहते हैं क्योंकि ऐतिहासिक काल में उद्गार के प्रमाण मिलने के कारण इनमें पुनः उद्गार की सम्भावना हो सकती है।

विसुवियस तथा क्राकाटाओ प्रसुप्त ज्वालामुखी के उदाहरण हैं। विसुवियस अनेक बार जाग्रत हो चुका है। इसमें सन् 1929 के बाद अभी तक कोई उद्गार नहीं हुआ है।

3. शान्त या मृत ज्वालामुखी

जिस ज्वालामुखी के उद्गार के हजारों वर्षों में भी कोई प्रमाण नहीं मिलते एवं उसके क्रेटर में पानी भर जाता है तथा वहाँ पर जलवायु के अनुसार जैव जगत मिलता है, ऐसे ज्वालामुखी को शान्त ज्लावामुखी कहते हैं। किलीमंजारो, कीनिया, केमरून (अफ्रीका), कोह सुल्तान , तथा देववन्द (ईरान) आदि ऐसे ही ज्वालामुखी हैं।

ज्वालामुखी उद्गार से निकालने वाले पदार्थ

ज्वालामुखी उद्गार अनेक प्रकार के होते हैं। ऐसे उद्गार के समय सभी प्रकार के चट्टानी पदार्थ, खनिज, गैसें एवं जलवाष्प ऊँचे तापमान पर निकलकर भूतल पर एवं वायुमण्डल में फैल जाते हैं । यह पदार्थ निम्न तीन प्रकार के अथवा तीन अवस्थाओं में भूतल की गहराइयों से सतह पर प्राप्त होते हैं।

1. गैसें एवं जलवाष्प - ऐसे सभी पदार्थ बहुत ऊँचे तापमान पर ज्वालामुखी उद्गार के समय तेजी से फब्बारे की तरह निकलकर वायुमण्डल में फैल जाते हैं। वास्तव में ज्वालामुखी क्रिया के लिए यही पदार्थ उत्तरदायी हैं। इनमें सबसे अधिक जलवाष्प दो-तिहाई से भी अधिक मात्रा में होती है। 

इसके अतिरिक्त, कार्बन-डाइ-आक्साइड (CO2) कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO), सल्फर व सल्फर डाइ-ऑक्साइड (SOS) हाइड्रोक्लोरिक गैस (HCl), नाइट्रोजन अमोनिया (NH,) एवं अन्य अम्लीय प्रभाव वाली तथा जहरीली गैसें निकलकर वायुमण्डल में फैल जाती हैं। इनके साथ-साथ कुछ उद्गारों में धुआँ भी निकलकर फैलता है।

2. धूल व राख - धूल व राख गैसों व जलवाष्प के साथ वायुमण्डल में फैल जाते हैं और दूर-दूर तक सारे जन-जीवन पर इनका प्रभाव पड़ता है। अन्य पदार्थों में मुख्यतः शिलाखण्ड व शिलाचूर्ण होते हैं। इनका आकार बालू के कण से लेकर विशाल पत्थर या खण्ड में से कोई भी हो सकता है। छोटे कणमय टुकड़ों को सिण्डर व ब्रेसिया के नाम से पुकारते हैं। बड़े टुकड़ों को लेपिली कहते हैं। यह सुपारी व प्याज के आकार के होते हैं। इनसे बड़े टुकटों को प्यूमिक (झाँव) एवं बड़े-बड़े खण्डों को ब्लॉक या शैलखण्ड कहते हैं। 

बम एवं प्यूमिक दोनों ही यद्यपि बाद में ठोस रूप में मिलते हैं, किन्तु वे अर्द्ध-द्रव या अम्लीय लावा के ठण्डे होने एवं उनसे गैसें निकलने के पश्चात् विशेष आकृति ग्रहण कर पाते हैं। ज्वालामुखी बम गोलाकर, अण्डाकार या फौजी बम की भाँति लम्बाकार किसी भी आकार व विस्तार का हो सकता है।

3. लावा - जब भी ज्वालामुखी उद्गार होता है वहाँ से लावा निकलता है यह लावा गाढा एवं पैठिक (कम गाढा) दोनो रूपों में मिलता है। जब लावा में सिलिका की मात्रा अधिक होती है तो वह हल्के रंग एवं अधिक गाढ़ा या पेस्ट जैसा होने से त्वरित ठण्डा होकर ठोस हो जाता है।

कई बार बाद में व निरंतर भीतर की गर्मी बाहर निकलने से ऊपरी सतह चटक जाती है एवं ऐसे उद्गार के पिण्ड या खम्भे शीघ्र नष्ट भी हो सकते है। लावा में ज्योज्यो सिलिका की मात्रा घटती जाती है, यह पतला, काला एवं अधिक है फैल जाता है।

भारो पदाचों वाला होता जाता है। यह धीमी गति से ठण्डा होता है एवं काफी दूरी तक । इसमें ओलोजाइन जैसे खनिज अधिक होते हैं। इससे बेसाल्ट जैसी कठोर चट्टानें बनती हैं। अधिक द्रव लावा होने । पर दरारो उद्गार से वह भूतल पर दूर-दूर तक फैल जाता है।

ज्वालामुखी से बनी भू-आकृतियाँ

ज्वालामुखी उद्गार के समय अनेक प्रकार के ठोस, अर्द्ध द्रव एवं गैसीय पदार्थ निकटवर्ती क्षेत्र में फैलकर वहीं पर धीरे या शोध जमा होते जाते हैं। इससे धरातल पर अनेक प्रकार की आकृतियाँ-शंकु, विवर, लावा गुम्बद, लावा पठार, आदि की रचना होती है। 

इसके साथ-साथ भूतल के नीचे भी विशेष अनुकूल दशा होने पर या मेग्मा के भूमि के नीचे विविध गहराइयों में ठण्डा होने पर भी कई रचनाओं का निर्माण होता है। 

यह रचना ऊपरी सतह के कटाव के पश्चात् धरातल पर दिखाई देती है। इस प्रकार से धरातल पर बनी आकृतियों को बाहा भू-आकृतियाँ एवं भूतल के नीचे बनी आकृतियों को आन्तरिक भू-आकृतियाँ कह सकते हैं।

इसके अन्तर्गत विविध प्रकार के शंकु , शंकुओं का ऊपरी भाग जिसे विवर (क्रेटर) एवं कहाड़ (काल्डेरा) कहते हैं। लावा गुम्बद एवं लावा पठार या समतल क्षेत्र सम्मिलित हैं। 

ज्वालामुखी शंकु

 ज्वालामुखी उद्गार से बनने वाली पहली एवं विशेष महत्वपूर्ण आकृति उद्गार से निकले पदार्थों के जमाव से बनती है। उसका आकार शंकु जैसा या त्रिकोणाकार होता है । इसे शंकु कहते हैं। ज्वालामुखी से निकले पदार्थों की प्रकृति के अनुसार शंकु कई प्रकार के होते हैं।

ऐसे शंकु तेज ढाल वाले एवं कभी-कभी मोटे खम्भे जैसे भी हो सकते हैं। इसमें लावा विशेष गाढ़ा होता है एवं सिलिका अधिक होने से वहाँ तत्काल ठंडा हो जाता है। 

इसी कारण कई बार इसके आन्तरिक भाग से गैसें व ताप निकलते रहने से, इसकी सतह शीघ्र चटक भी जाती है, उस पर सन्धियाँ पड़ जाती हैं। इसकी आकृति पिप्लियन या वुल्केनियन जैसी होती है।

अर्थात् ऐसा शंकु. तेज ढाल वाला एवं कम स्थान घेरे होता है। ऐसे शंकु शीघ्र नष्ट भी हो सकते हैं। स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी शंकु इसका अच्छा उदाहरण है।

जब लावा में बेसाल्ट अधिक एवं सिलिका कम होती है तो लावा द्रव किन्तु भारी व धीरे-धीरे ठण्डा होने लगता है । इससे धीरे ढाल वाला एवं काफी दूर तक फैला कभी-कभी ढाल के आकार का भी शंकु बन जाता है । हवाई लावा शंकु द्वीप में मोनालोआ ज्वालामुखी इसका अच्छा उदाहरण है।

विवर या क्रेटर 

ज्वालामुखी शंकु के ऊपरी या शीर्ष भाग पर धंसाव से अथवा विस्फोट से ऊपरी भाग में बड़ा गड्डा बन जाता है। यह कीप के आकार वाला गड्डा ही विवर या क्रेटर कहलाता है।

यह प्रायः वृत्ताकार या गोलीय होता है एवं इसका व्यास लगभग 800 मीटर से कुछ किलोमीटर तक एवं गहराई 150 मीटर से 900 मीटर तक हो सकती है। कई बार बड़े क्रेटर में अनेक छोटे-छोटे शंकु एवं उनके छोटे-छोटे क्रेटर (विवर) भी बन जाते हैं। 

ऐसा पैठिक लावा ज्वालामुखी के उद्गार की स्थिति में अधिक होता है। इसे घोंसलाकार विवर कहते हैं। शान्त ज्वालामुखी के मुँह या विवर में पानी भर से बनी झील को क्रेटर झील कहते हैं। पश्चिमी संयुक्त राज्य के ओरेगन राज्य में क्रेटर झील इसका अच्छा उदाहरण है। इसकी दीवारें लगभग 1,000 मीटर तक ऊंची हैं जो कि एक रिकार्ड है।

काल्डेरा का कड़ाह 

जब ज्वालामुखी का ऊपरी भाग भंयकर विस्फोट से उड़ जाय अथवा निमज्जन या धंसाव के प्रभाव से वहाँ विशाल क्रेटर बन जाय तो उसे काल्डेरा या कड़ाह कहते हैं । अतः काल्डेरा विशाल कड़ाह जैसा होता है। इसके भीतर के तल पर एक या अधिक शंकु भी हो सकते हैं।

 इसकी दीवारें भी काफी ऊँची रहती है। इसका व्यास कई किलोमीटर होता है मध्य अफ्रीकी देश केनिया का किलीमंजेरो ज्वालामुखी पर्वत का विशाल मुख जापान का अशोक कॉल डेरा पश्चिमी कनारी द्वीप का कालाडेरा इसके विशेष उदाहरण है। 

प्लग या ग्रीवा 

यह शंकु की संशोधित आकृति है। इसमें जब ज्वालामुखी के मार्ग में लावा ठण्डा होकर जमा हो जाता है और लम्बे समय के कटाव के दौरान मिश्रित शंकु का अधिकांश भाग कटाव से नष्ट हो जाता है।

तब अन्तत:भीतरी गर्दन जैसी ज्वालामुखी की नली या प्लग (डाट) की भाँति खम्भे जैसी कठोर आकृति बन जाती है । ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है । ऐसे ज्वालामुखी ग्रीवा पश्चिमी संयुक्त राज्य के न्यू मैक्सिको राज्य में पाए जाते हैं।

पठार या समतल क्षेत्र

जब पैठिक या द्रव लावा दरारों के द्वारा निकलकर बड़े क्षेत्र में फैल जाता है, तब इससे आस-पास के सम्पूर्ण ऊबड़-खाबड़ हिस्सों में लावा जमा होता जाता है। इससे वह सारा ही क्षेत्र समतलीप्रायः एवं बेसाल्ट चट्टानों से बना भाग बन जाता है। इसे निचले भाग में होने पर लावा का मैदान एवं ऊँचाई पर जमा होने पर लावा का पठार कहते हैं।

ऐसे लावा पठार या लावा मैदान विशेष उपजाऊ होने से सघन कृषि के क्षेत्र कहलाते हैं। भारत में दकन का लावा का पठार, पश्चिमी संयुक्त राज्य का ओरेगन राज्य का लावा का पठार, इटली, जापान एवं आइसलैण्ड के लावा के मैदान इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं । 

ज्वालामुखी का प्रभाव

ज्वालामुखी घटना विस्फोटक और सबसे अधिक विनाशकारी घटनाओं में से है । इसी कारण इसका तत्काल प्रलय मचाने जैसा प्रभाव पड़ता है। अत: उद्गार या भयंकर विस्फोट के समय तो जान-माल की हानि उठानी पढ़ती है। फिर भी इससे कई प्रकार लाभ भी ऐसे क्षेत्रों में मिलता है। 

हानिकारक प्रभाव

ज्वालामुखी क्रिया एक प्रलंयकारी व दर्दनाक घटना है जिसमें लाखों लोग अकाल के गाल में चले जाते हैं । अप्रैल सन् 1815 में इण्डोनेशिया के ताम्बोरा, सुम्बावा में ज्वालामुखी विस्फोट से 92,000 लोग मारे गए। इण्डोनेशिया के क्राकाटाओ द्वीप के ज्वालामुखी से सन् 1833 में इस द्वीप का दो तिहाई भाग उड़ गया। 

सन् 1902 में माउण्ट पैली ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों से 8 किलोमीटर दूर पर स्थित सेण्ट पियरे नगर के 30 हजार लोग सोते ही रह गए। इसी प्रकार सन् 1979 में विसूवियस के ज्वालामुखी उद्गार से निकली राख व धूल वायुमण्डल में छा गयी। 

धीरे-धीरे धरातल पर गिरती गयी जिससे 10 किलोमीटर दूर स्थित पंयाई नगर में दस मीटर मोटी परत जमा हो गयी जिससे बीस हजार लोग मर गए। सारा वायुमण्डल धुआँ, राख, भाप व जहरीली गैसों से भरने लगता है । साँस लेना मुश्किल हो जाता है।

लाभकारी प्रभाव 

लावा के चारों ओर फैलने या अधिक क्षेत्र में फैलने से वहाँ नवीन 'लावा की उपजाऊ मिट्टी' बिछ जाती है । प्राचीनकाल में हुए ऐसे ही जमाव से दक्षिणी भारत का उपजाऊ चिकनी काली मिट्टी का प्रदेश बना है। 

इस रेगर मिट्टी में सभी प्रकार की फसलें पानी की प्राप्ति के अनुसार होती हैं। सभी प्राचीन ज्वालामुखी से प्रभावित पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी गर्म पानी के सोते पाये जाते हैं। इनमें गन्धक और अन्य उपयोगी खनिज मिले होने से इनका उपयोग चर्म रोग, गठिया,श्वांस जैसी बीमारियों का इलाज करने में होता रहा है। 

ज्वालामुखी अपनी नली के आस-पास कायान्तरित चट्टानों का विकास या निर्माण करते हैं। इसी कारण ज्वाला की गर्दन के आस-पास ‘बहुमूल्य खनिज मिलते हैं। अन्य कई प्रकार से धातु व अधातु खनिज भी पाये जाते हैं। इनमें गन्धक, लौह अयस्क, पायराइट, बोरिक एसिड, अनेक प्रकार की बहूमूल्य अलौह धातुएँ; जैसे चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबा, सोना आदि भी ऐसे प्रदेशों में मिलते हैं। 

राजस्थान के अलौह धातुओं के जमाव, स्वीडन का लौह अयस्क ऐसी ही चट्टानों में पाये जाते हैं। इसी प्रकार बड़े-बड़े ज्वालामुखियों के मुँह या ऊपरी भाग या क्रेटर व काल्डेरा नामक विशाल गड्डों में पानी भरने से क्रेटर झील' बन जाती है।