मृदा संरक्षण किसे कहते हैं - mrida sansadhan

Post Date : 09 April 2022

भूमि पृथ्वी का वह भाग है जिस पर हम निवास करते हैं पशु, पक्षी और सभी जीव जन्तु रहते हैं, जिस पर पेड़-पौधे और वनस्पति उगते हैं, जिसके अन्दर अनेक प्राकृतिक संसाधन (खनिज) भरे हैं। यह पूरी पृथ्वी का 3/10 भाग है और इसे स्थल मण्डल कहते हैं।

मृदा संरक्षण किसे कहते हैं

सामान्य भाषा में पृथ्वी के जिस ऊपरी पर्त पर हमारी दैनिक क्रियाएँ होती हैं वह भू-पटल कहलाता है, साधारण बोलने तथा समझने में हम भू–पटल को ही भूमि कह देते हैं, जबकि हमें अपने कार्यों में स्थलमंडल के लगभग सभी भागों की आवश्यकता होती है।

पृथ्वी के खनिज, जो भू–पटल के बहुत नीचे हैं, खेती जिस मिट्टी - पर होती है वह भी भू-पटल के नीचे है, भू–गर्भ जल और पानी के भण्डारों (महासागर, समुद्र, झीलें नदियाँ आदि) के नीचे के अंतिम भाग भूमि से ही जा मिलते हैं। 

इसे भी देखे – संसाधन किसे कहते हैं

अतः व्यापक रूप से भूमि एक ठोस पिंड है, जो अनेक चट्टानों से मिलकर बना है और जिसके ऊपरी भाग में अपेक्षाकृत कम कठोर भाग मिट्टी और अंदर के भाग में खनिजों के संग्रह चट्टानें और अधिक तापमान के कारण पिघले पदार्थ हैं।

पर्यावरण की दृष्टि से हमारी चर्चा इस पूरे भू–भाग से है।

भूमि एवं मृदा  

भूमि पृथ्वी की सतह के पानी रहित ठोस भाग को, जिस पर किसी भी कार्य का निष्पादन किया जा सकता है, कहते हैं, जबकि मृदा (मिट्टी) भूमि का वह ऊपरी सतह, है जिसमें खनिज व अन्य आर्गेनिक पदार्थ मिले होते हैं और जिस पर पेड़-पौधे उग सकते हैं या उगाए जा सकते हैं। 

भूमि के नष्ट अथवा दूषित होने के कारण  

भूमि का नष्ट अथवा दूषित होना निम्नलिखित दो कारणों से होता है

1. भूमि क्षरण
2. भूमि-प्रदूषण

1. भूमि क्षरण

तेज वर्षा, आँधी तथा तूफान से मिट्टी की ऊपरी सतह कुछ ही दिनों में बह जाती है अथवा उड़ जाती है, जबकि इसके बनने में बहुत अधिक समय लगता है। अतः मिट्टी की रक्षा करना बहुत आवश्यक है।

भूमि क्षरण जल और हवा दोनों से होता है। 

(अ) जल द्वारा भूमि क्षरण 

जहाँ वनस्पति क्षेत्र विरल तथा अपर्याप्त होता है और आस-पास भी सघन पेड़ नहीं होते, वहाँ की भूमि की मिट्टी की सतह धीर धीर क्षय होती जाती है। भूमि की मिट्टी में कटाव होता है और वर्षा जल बहने के साथ ही मिट्टी भी बह जाता है। यदि तेज वर्षा होती है तो यह कटाव और भूमि क्षय शीघ्र तथा अधिक होता है

बचाव 

जल द्वारा भूमि क्षरण को रोकने के निम्न उपाय हो सकते हैं

  • भूमि की जुताई पानी की व्यवस्था के लम्बवत् करने से मिट्टी का कटाव और भूमि-क्षरण कम हो जाता है।
  • खेतों के आस पास धने वृक्ष लगाए जाएँ क्योंकि वर्षा की तेज बूंदों को वृक्ष अपने ऊपर लेकर बूंदों की तेजी को कम करता है तथा फिर पानी को मिटठी में धीमे-धीमे जाने देता है।
  • खेतो अथवा भूमि भाग के ऊपरी हिस्सों में, जहाँ से वर्षा के पानी की आवक है, छोट-छोटे एनीकट बनाए जाएँ जिससे कि पानी उस एनीकट में रूक जाए तथा बाद में इस जल का पुनः उपयोग हो सके।

(ब) वायु द्वारा भूमि मरण  

वायु के तेज प्रवाह से भी भूमि-क्षरण होता है। तेज हवा अपने साथ मिटटी के छोटे-छोटे कणों को भूमि से उठाकर बहुत दूर ले जाती है तथा वहाँ से पुनः वायु वेग के साथ यह मिट्टी कण एक तूफान के रूप में बहुत दूर उड़ जाते हैं जिससे भूमि का क्षरण हो जाता है।

 बचाव 

वायु द्वारा भूमि क्षरण बचाव से बचाव के निम्न उपाय हैं 

  • वायु के प्रवाह के विरूद्ध रक्षा पेटियों की व्यवस्था करना।  
  • वायु की नमी बनाए रखना, जिससे मिट्टी सहज ही उड़ने न पाए। 
  • खेतों के आस-पास सघन वृक्ष लगाकर ।

(2) भूमि प्रदूषण

भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में ऐसा कोई भी अवांछित परिवर्तन जिसका प्रभाव मनुष्य तथा अन्य जीवों पर पड़े अथवा भूमि की प्राकृतिक गुणवत्ता तथा उपयोगिता नष्ट हो, भूमि प्रदूषण कहलाता है।

वर्तमान समय में उत्पादन बढ़ाने के लिए खेतों में रासायनिक खादों, कीटनाशक, रोगनाशी एवं कवकनाशक रसायनों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है, जिससे भूमि में हानिकारक तत्वों की मात्रा बढ़ने से भूमि प्रदूषित हो रही है। उदाहरण के लिए अमोनियम सल्फेट उर्वरक का खेतों में लगातार प्रयोग करने से भूमि में अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है।

 डी. डी टी. अथवा बी. एच. सी. जैसे हानिकारक कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि में इन रसायनों का अंश कई वर्षों तक रहता है, जिससे मृदा प्रदूषित होने के साथ ही इन कीटनाशकों का अंश अनाजों में आने से मानव में नए-नए रोग व बीमारियां फैल रही है, जो मानव समाज के लिए अभिशाप है।

 बचाव

भूमि प्रदूषण से बचाव के निम्न उपाय है

  • भूमि क्षरण को नियन्त्रण करने के उपाय किए जाए।
  • कृषि में रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का उपयोग कम से कम किया जाए। 
  • रासायनिक खादों के स्थान पर जैविक खाद भू-परिष्करण इत्यादि को प्राथमिकता दी जाए।
  •  डी डी.टी. तथा बी एच सी का उपयोग कम से कम किया जाए। भारत सरकार द्वारा अनाजों साग सब्जियों आदि में डी.डी.टी., बी एच सी. जैसे रसायनों का प्रयोग नहीं करने की सिफारिश की गई है। 
  •  नगरीय तथा औद्योगिक अपशिष्ट को समुचित उपचार के बाद ही प्रवाहित किया जाए।
  •  समुचित भूमि का उपयोग फसल प्रबंधन के अनुसार किया जाए।
  •  किसानों को भूमि-प्रदूषण की जानकारी भी देनी चाहिए, जिससे वे रासायनिक पदार्थों का उपयोग कृषि में सावधानी से करें।

मृदा संरक्षण

मृदा के संरक्षण के विभिन्न विधियों को दो भागों में विभक्त किया गया है:

(अ) जैविक विधियाँ (ब) यान्त्रिक विधियाँ

 (अ) जैविक विधियाँ

ये विधियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं। 

1. सस्यावर्तन 

मृदा संरक्षण का यह एक महत्वपूर्ण उपाय है। प्रत्येक बर्ष यदि मृदा में एक ही प्रकार की फसल उगाई जाए, तो मृदा की उर्वरा शक्ति समाप्त होने लगती है। 

अतः आवश्यक है कि मृदा की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए प्रत्येक वर्ष फसलों में परिवर्तन किया जाए। इसे सस्यावर्तन या फसल चक्र कहते हैं। जैसे एक बार मृदा में गेहूँ, कपास, मक्का, आलू आदि के बाद दूसरी फसल लेग्यूमिनोसी कुल (दलहन) के पौधों की होनी चाहिए। 

इन पौधों की जड़ों में गॉठे पाई जाती है जिससे उसमें उपस्थित जीवाणु द्वारा वायुमण्डल के नाइट्रोजन का यौगिकीकरण होता है। इससे मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। ।

2. मल्च बनाना 

फसल काटने के पश्चात् पौधों के ठूँठ मिट्टी के अन्दर रह जाती है, जो ( एक संरक्षक परत की भाँति कार्य करते हैं। इस कारण हवा तथा जल द्वारा होने वाला मृदा अपरदन रूक जाता है तथा वाष्पन कम होने के कारण मिट्टी में जल की अधिक मात्रा एकत्रित रहती है। 

3. कण्टूर कृषि 

इस प्रकार की कृषि पहाड़ों की ढलानों पर अधिक उपयोगी है। खेतों में या ढलान वाले क्षेत्रों में खाँचे तथा कटक (ridges) बनाए जाते हैं, जिससे पानी इसमें रुक जाता है तथा मृदा का अपरदन नहीं होता है।

4. पट्टीदार खेती 

 यह कई प्रकार की होती है। इसमें खेत को पट्टियों में विभाजित कर दिया जाता है। प्रत्येक पट्टी पर बड़े पौधों के बीच के स्थान में छोटे पौधों वाली फसल गेहूँ, उड़द आदि बोई जाती है। इस प्रकार की फसलें बोने से मिट्टी दृढता से बंधी रहती है। इससे वायु एवं जल द्वारा होने वाला अपरदन रुक जाता है। 

5. घास उगाना 

जिन स्थानों पर मृदा अपरदन के कारण शीर्ष मृदा हि।

6. ड्राई खेती 

जिन क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है उसमें बहुत कम फसले ही उग पाती हैं। अतः इन स्थानों पर पशुओं को चरने के लिए घास उगाई जाती है जिससे मृदा का अपरदन नहीं हो पाता है।

7. अत्यधिक पशुचरण पर नियंत्रण 

अत्यधिक पशुचरण से मृदा की अपरदन की अत्यधिक सम्भावना रहती है। इसलिए नियन्त्रित पशुचरण ही भूमि पर करना चाहिए, जिससे मृदा का अपरदन रोका जा सके।

(A) चरने पर नियंत्रण के कारण अच्छी फसल तथा मृदा अपरदन कम होना ।

(B) चरने पर नियन्त्रण नहीं होने पर खराब फसल तथा मृदा अपरदन अधिक होना । 

8. वनारोपण 

 जंगली वृक्षों का रोपण वनारोपण कहलाता हैं | शुरु में वृक्षों की वृद्धि धीमी रहती है परन्तु कुछ समय बाद इनकी वृद्धि तथा विकास में तेजी आने पर ये मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होते हैं। 

वृक्षों की पत्तियाँ भूमि पर गिरती हैं जिससे ह्यूमस बनता है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ जाती है। इन वृक्षों के नीचे अनेक शाकीय वनस्पतियाँ भी उगाई जा सकती हैं। यह मिट्टी के कणों को बाँधने में सहायक होती है तथा मृदा अपरदन रुकता है।

(ब) यान्त्रिक यान्त्रिक विधियाँ 

मृदा अपरदन को रोकने के लिये मुख्य यान्त्रिक विधियाँ निम्न है

1. वेदिका लगाना 

पहाड़ों पर ढलान वाले क्षेत्रों में छोटे-छोटे बाँध बना दिए जाते हैं तथा खेतों को बेंचनुमा क्षेत्रों में विभक्त किया जाता है जिसे वेदिका कहते हैं। इससे जल प्रवाह की गति कम हो जाती है तथा मृदा अपरदन रुक जाता है।

2. बाँध बनाना 

नदियों में बाढ़ को नियन्त्रित करने के लिए बाँध बनाए जाते हैं। इससे वर्षा का पानी एकत्रित कर लिया जाता है, जिसका उपयोग सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन में किया जाता है । बाँध बनाने से मृदा अपरदन एवं भूमि कटाव में कमी आती है।

जैव उर्वरकों एवं जैव कीटनाशकों का उपयोग

जैव उर्वरक वास्तव में उर्वरक (जैव यूरिया, सुपर फास्फेट) नहीं है। ये सूक्ष्म जीवाणु होते हैं जो वातावरण से नाइट्रोजन स्थिर करके भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं। ये रासायनिक उर्वरक के विकल्प हो सकते हैं तथा पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित माने जाते हैं : राइजोबिया का प्रभाव पौधों की वृद्धि पर अच्छा पाया गया है।

मैक्रोराइजा से पोषित पौधें विपरित परिस्थितियों को सहने में अधिक सूक्ष्म होते है। भूमि में स्थिर तत्वों जैसे फास्फोरस की कमी वाले भूमि में इसका उपयोग लाभदायी पाया गया है।

इसी प्रकार जैव कीटनाशकों का प्रयोग भी रासायनिक कीटनाशकों (डी. डी.टी.बी.एच.सी.) के स्थान पर किया जा रहा है इससे मृदा एवं जल प्रदूषित नही होते भविष्य में जैव उर्वरकों एवं जैव कीटनाशकों के उपयोग की प्रबल संभावनाएं है जिससे रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक का उपयोग कम किया जा सके 

वर्तमान समय में गोबर, मल जैविक अवशेष,गंदा पानी, नगरीय तथा शहरों के कूड़े कचरे से जैविक उर्वरक तैयार किये जाते हैं।इससे नगरों तथा शहरों को कचरों से मुक्ति मिल जाती है।  

वन और वन प्रबंध

वन परस्थिकी का मुख्य आधार होने के साथ भान्लाई की आजीविका के सोता भी है। वन हमारे वार्तामान एव भविष्य दोनों के संरक्षक हैं। 

वन केवल आर्थिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं अपितु वातावरण को स्वच्छ रखने रेगिस्तानो के प्रसार मिट्टी में नमी बनाए रखने तथा कटाव को बचाने तापमान को नियंत्रित करने, बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करनें मानसून की स्थिति को अनुकूल बनाने, वर्षा को नियंत्रित करने, तथा वायु को शुद्ध करने के लिए अनिवार्य है।

वनों के संरक्षण हेतु एक निश्चित नीति की आवश्यकता है। इसमें सबसे अधिक महत्व वनों में लगने वाली आग से बचाव को देना चाहिए।

वनों को आग से बचाने के लिए नियमित रूप से सर्वेक्षण किया जाता है। इस कार्य को करने के लिए मानचित्र का निर्माण किया जाता है और आग के खतरे वाले स्थानों का पता लगाया जाता है।

अनेक देशों में इस कार्य में दूर सवेदी उपग्रहो राडार तथा हवाई जहाज की सहायता ली जाती है। उपग्रहो से इन्फ्रारेड फोटोग्राफी करके वनों की आग का तुंरत पता लगाना संभव है।

वनो में आग बुझाने तथा फैलाने की गति को रोकने के लिए अग्नि त्रिकोण को तोडना आवश्यक है। यह त्रिकोण ईधन तापमान और ऑक्सीजन है।

वृक्षों की वैज्ञानिक विधि से कटाई की जानी चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाए कि वृक्ष काटते समय अन्य वृक्ष क्षतिग्रस्त न हो। रोगग्रस्त पौधों को काटना भी लाभप्रद होता है। वृक्षों में लगी व्याधियों एवं कीटों के प्रकोप को रोकने के लिए कीटनाशको के वायुयान द्वारा छिड़काव किया जाना चाहिए।

वन सुरक्षा के अन्य प्रबंध

वन सुरक्षा के लिए निम्नलिखित उपाए किए जाने चाहिए

1. ईधन के वैकल्पिक साधनों गोबर गैस, सौर ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा आदि पर जोर दिया जाए तथा इनकी कीमते कम की जाए।

2.पर्वतीय क्षेत्रों में छोटी नदियों से अधिक ऊर्जा का निर्माण किया जाए, जिससे वनों पर से ईधन की निर्भरता कम हो सके।

3. सडको, पुल निर्माण, इमारत, अस्पताल, स्कूल निर्माण की प्रक्रिया में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए दीवारें तथा पानी के निकास के लिए पक्के नाले बनाए जाएँ।

4. भारी निर्माण कार्य को कम तथा विस्फोटक सामग्री के प्रयोग को बंद किया जाए।

5. कृषि में प्रयोग होने वाले औजार, इमारती लकड़ी, साजसज्जा के सामान के स्थान पर लकड़ी के विकल्प के रूप मे सीमेन्ट, लोहा, प्लास्टिक का उपयोग किया जाए।

6. पर्यावरण से संबधित शिक्षा को कड़ाई से लागू किया जाए तथा प्रशिक्षण दिया जाए जिससे व्यक्तियों मे व्याप्त अंधविश्वास कम हो सके। जैसे- जंगलों में आग लगाना, कृषि के लिए घने वनों का सफाया करना। 

7. वन चेतना केन्द्र की स्थापना संपूर्ण देश में किए जाने चाहिए।

वन प्रबंधन हेतु सरकारी प्रयास 

भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् वनों के संरक्षण तथा विस्तार हेतु अनेक प्रयास किए गए हैं। भारतीय सविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में स्पष्ट किया गया है 

राज्य पर्यावरण के संरक्षण तथा सुधार हेतु प्रयास करेगा सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने, वनसंपदा को पुनः प्रतिष्ठित करने, वन संपदा एवं पर्यावरण के रक्षार्थ अनेक ठोस कदम उठाए हैं। जैसे- वन संरक्षण अधिनियम 1930, जंगली जीवन सुरक्षा अधिनियम 1972, नवीन राष्ट्रीय वन नीति 1998 इत्यादि ।

वन महोत्सव 

भारत में वन संपदा की वृद्धि, वनों को सुरक्षित रखने, वृक्षों के प्रति व्यक्तियों में प्रेम जागृत करने और पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए भारत सरकार ने जुलाई 1950 में वन महोत्सव मनाना प्रारंभ किया। इसका उद्देश्य देश में वृहत् पैमाने पर वृक्षारोपण करना था उसी समय से देश में प्रतिवर्ष जुलाई और अगस्त में वृक्षारोपण सप्ताह मानाया जाता है।

सामाजिक वानिकी

देश में वनों एवं वृक्षों की कमी को समाप्त करने के लिए सामाजिक वानिकी जैसी महत्वपूर्ण केन्द्रीय योजना वर्ष 1980-81 में प्रारंभ की गई।

इस योजना के उद्देश्य निम्नलिखित हैं 

1. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ईधन की पूर्ति और गोबर को जलाने के बदले खाद के रूप में उपयोग करना । 

2. छोटी इमारती लकड़ियों की पूर्ति । 

3. चारे की पूर्ति।

4. खेत की फसलों को वायु के प्रकोप से बचाना। 

5. मनोरंजन की सुविधाएँ प्रदान करना। 

इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु राष्टीय कृषि आयोग ने सामाजिक वानिकी को चार विभागों में विभाजित किया हैं-

1. कृषि वानिकी

2. विस्तार वानिकी

3. निम्न कोटि के वनों का प्रत्योरोपण

4. मनोरंजन वानिकी

सामाजिक वानिकी योजना के सफल क्रियान्वयन हेतु देश को स्वीडन सरकार से सहायता प्राप्त हो रही है। इस योजना को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से देश में केन्द्र सरकार ने “वृक्ष पट्टा योजना” प्रारंभ किया है।

संयुक्त वन प्रबंधन 

वनों के संरक्षण संबंधी नीतिगत दिशा निर्देशों में वनों पर आश्रित व्यक्तियों की ईंधन, चारा, गैर इमारती, वन उत्पादन और इमारती लकड़ी की आवश्यक माँग को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। 

संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम के प्रमुख सिद्धांत निम्नानुसार है 

1. ह्रास होते हुए बड़े वन क्षेत्र को स्थानीय समुदाय की भागीदारी से पुनः हरा भरा बनाया जा सकता है। 

2. स्थानीय समुदाय का वन संरक्षण और वन की उत्पादकता बढ़ाने में भागीदारी। बाहर के व्यक्तियों को योजना से बाहर रखा जाऐ। 


भारत में संयुक्त वन प्रबंध प्रणाली के अंतर्गत 15,000 ग्राम वन समितियाँ लगभग 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र विविध हैं कि सामुदायिक भागीदारी की एक नीति बनाना असंभव है। इसलिए भारत सरकार ने 1 जून सन् 1990 के अपने दिशा निर्देश में स्थान विशेष की स्थितियों के अनुसार योजना बनाने एवं लागू करने का उत्तर दायित्व राज्यों पर छोड़ा था अधिकांश राज्यों ने संयुक्त वन प्रबंध को संस्थागत रूप दे दिया है।

 स्थानीय समुदाय को वनों से प्राप्त पदार्थों जैसे घास, पेड़ों की शाखाओं और छिटपुट वनोपज के उपयोग का पूर्ण अधिकार होगा।