ads

पर्वत किसे कहते हैं - parvat kise kahate hain

पृथ्वी की सतह पर पाये जाने वाले पर्वत, पहाड़ियाँ, पठार एवं मैदान ही यहाँ के प्रधान स्थल रूप या स्थलाकृतियाँ हैं। इनमें विश्व के कुल स्थल खण्ड के 27% भाग पर पहाड़ियाँ व पर्वत पाये जाते हैं। 

पर्वत धरातल पर शंकु या त्रिकोणाकार वह स्थल रूप है जिनके किनारों पर प्राय: 25° से 40° के मध्य ढाल होता है और जिनका ऊपरी सिरा (शीर्ष) नुकीला होता है, इसे चोटी या शिखर कहते हैं। 

जिस भाग की ऊँचाई 600 मीटर से अधिक होती है उसे पर्वत एवं कम ऊंचाई वाले भाग को पहाडी कहते हैं।

प्रो. फिंच के अनुसार, “पर्वत स्थल के वे भाग हैं जो अपने आसपास के क्षेत्र से 2,000 फुट से अधिक ऊँचे हों।"

सेलिसबरी के अनुसार, “पर्वत स्पष्टत: विशेष ऊँचाई वाले वे स्थल रूप हैं जिनकी चोटी का क्षेत्र बहुत संकुचित या सीमित होता है।

वॉरसेस्टर के अनुसार, “पर्वत उत्कृष्ट उच्च भूमि भू-भाग होते हैं जिनके शिखर संकुचित होते हैं। 

वॉन रायपर के अनुसार, “पर्वत निकटवर्ती क्षेत्रों से 2,000 फीट (600 मीटर) उठे ऐसे भाग होते हैं जिनका शिखर क्षेत्र विशेष संकुचित होता है।"

डॉ. सविन्द्र सिंह के अनुसार, “पर्वत उस श्रेणी अथवा उच्च स्थान को कहते हैं जिसका ढाल तीव्र हो तथा वह अपने समीपवर्ती क्षेत्र से इतना अधिक ऊँचा हो (कम से कम 1,500 फीट) कि वह दूर से ही स्पष्ट रूप से दिखायी दे सके तथा उसका शिखर क्षेत्र पठार के विपरीत संकुचित हो।

पर्वतों का वर्गीकरण

पर्वतों को निम्नलिखित आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है

1. भौगोलिक व्यवस्था के आधार पर 

वारसेस्टर के अनुसार. विस्तार एवं आकृति के अनुसार पर्वत निम्न प्रकार के होते हैं। 

(i) पर्वत शिखर 

निकटवर्ती पहाड़ी क्षेत्र में गुम्बद या नुकीले सींग की भाँति उठे पर्वतीय खण्ड को शिखर कहते हैं। जैसे—माउण्ट एवरेस्ट, गॉडविन ऑस्टिन आदि।

(ii) पर्वत कटक 

जब कुछ किलोमीटर तक पहाड़ी सिलसिला चला गया हो जिसमें कई कम या अधिक ऊँचाई के शिखर पाये जाये तो उसे कटक कहते हैं। जैसे-अप्लेशियन पर्वत की ब्लूरिज, अरावली की आबू कटक आदि।

(iii) पर्वत श्रेणी 

जब लम्बी दूरी तक बड़े प्रदेश में पर्वत विस्तृत होते इनमें कटक, शिखर घाटियाँ एवं जटिल मोड़ एवं ऊबड़-खाबड़ संरचना पायी जाती है तो उसे पर्वत श्रेणी कहते हैं। हिमालय पर्वत श्रेणी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

(iv) पर्वत समूह या पर्वत तन्त्र 

जब एक ही समय की पर्वत निर्माण गतियों से एक साथ कई पर्वत श्रेणियाँ विकसित होती हैं, तो उसे पर्वत तत्र कहते हैं। उदाहरणार्थ, भारत के हिमालय एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के अप्लेशियन के पर्वत तन्त्र । हिमालय में कई पर्वत श्रेणियाँ पाई जाती हैं । ऐसे पर्वत स्पष्टत. जटिल, बहुत ऊंचे-नीचे एवं विस्तृत क्षेत्र घेरे होते हैं।

(v) पर्वत वर्ग या कार्डिलेरा 

जब विभिन्न युगों की पर्वत श्रेणियाँ या पर्वत तन्त्र पास-पास फैले हुए हों एवं जिनमें पहाड़ियाँ एवं जटिल संरचनाएँ भी पाई जाती हैं तो उन्हें कार्डिलेग कहा जाता है । इन पर्वतों का विस्तार अनियमित भी हो सकता है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी पर्वतीय भाग एवं हिन्दुकुश व निकट के पर्वत कार्डिलेरा के उत्तम उदाहरण हैं। ।

(vi) पर्वत श्रृंखला 

इसमें असमान क्रम में एवं असमान कारणों से विकसित पर्वत एक साथ पाये जाते हैं। यहाँ ज्वालामुखी पहाड़ एवं मोड़दार पर्वत साथ-साथ पाये जा सकते हैं। इनके मध्य ऊँचे पठारी खण्ड भी हो सकते हैं। जापान के पर्वतीय भाग, एल्युशियन द्वीप के पर्वत इसके उदाहरण ।

(vii) एकाकी पर्वत 

प्रायः ज्वालामुखी पर्वत इस श्रेणी में आते हैं। वैसे भ्रंश क्रिया से बनने वाले पर्वत भी एकाकी पर्वत ही कहलाते हैं। ये दूर-दूर एवं बिखरे होते हैं। कभी-कभी पठारी भाग के अत्यधिक कट-छंट जाने एवं स्थानीय विवर्तनिक गतियों के प्रभाव से भी ऐसे पर्वत बन सकते हैं । उदाहरणार्थ, किलीमंजेरो, केनिया, केमरून के ज्वालामुखी एवं नीलगिरि आदि ऐसे ही पर्वत हैं । 

2. ऊँचाई के आधार पर 

ऊँचाई के अनुसार प्रो. फिञ्ज ने पर्वतों को निम्न भागों में बाँटा है :

(i) निचले पर्वत 

उंचाई 600 मीटर (2,000) फिट से 900 मीटर (3000) फिट । 

(ii) कम ऊँचे पर्वत 

ऊँचाई 900 मीटर से 1,350 मीटर (3,000 फीट से 4,500 फीट)।

(iii) विषम आकृति के या मध्यम ऊँचाई के पर्वत 

ऊँचाई 1,350 मीटर से 1,800 मीटर (4,500 से 6,000 फीट तक)।

(iv) अधिक ऊँचे पर्वत 

ऊँचाई 1,800 मीटर से अधिक (6,000 फीट से अधिक)।

3. रचना विधि के आधार पर 

रचना विधि के अनुसार पर्वत निम्न प्रकार के हैं। 

(i) वलित (मोड़दार) पर्वत 

इनकी उत्पत्ति आन्तरिक शक्तियों के प्रभाव से भू-सन्नतियों के विकास के पश्चात् धरातलीय भाग पर उत्पन्न भिंचाव से मोड़ या वलन पड़ने से होती है। ये मोड़ कई अवस्थाओं में बहुत ऊँचाई तक उठ जाते हैं। 

इसी कारण पृथ्वी की सतह पर ये सबसे ऊँचे पर्वत हैं। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, भू-सन्नतियों से वलित पर्वतों का निर्माण 15-20 करोड़ वर्षों के अन्तर पर होता रहा है। अब तक की चार मोड़दार (वालनिक) पर्वत निर्माण घटनाओं का व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त हो चुका है। 

वर्तमान के सबसे ऊँचे मोड़दार पर्वत अल्पाइन युग के मोड़दार पर्वत कहलाते हैं। इसी अध्याय में कालक्रम के अनुसार वलित पर्वतों का वर्गीकरण दिया गया हैं। 

वलित पर्वत दो प्रकार के होते हैं 
 (अ) प्राचीन वलित पर्वत  

प्राचीन वलित पर्वत वे है जिनका निर्माण टर्शरी युग से पहले हुआ। ऐसे पर्वत उत्तरी अमेरिका में अप्लेशियन, यूरोप में स्कॉटलैण्ड, स्केण्डेनेनिया पर्वत तथा यूराल, भारत में विन्ध्याचल तथा अरावली पर्वत आदि हैं। 

 (ब) नवीन वलित पर्वत

नवीन वलित है। इन पर्वतों में वलन क्रिया की अनेक जटिलताएँ मिलती हैं। इन पर्वतों की चट्टानों का जटिल वलन तथा अल्पाइन पर्वतों को सम्मिलित किया जाता है । ये पर्वत विश्व में सबसे ऊँचे पर्वत हैं जिन पर बर्फ जमी रहती कायान्तरण हुआ है । रॉकी, एण्डीज, आल्पस एवं हिमालय नवीन वलित (मोड़दार) पर्वत हैं । 

वलित पर्वतों की विशेषताएँ 
वलित पर्वतों  की निम्नलिखित विशेषताएँ है। 

(1) इन पर्वतों का निर्माण अवसादी या परतदार चट्टानों से हुआ है। इन परतदार चट्टानों  का जमाव नदियों द्वारा लाए गए अवसाद से हुआ है। 

(2) वलित पर्वतों में पायी जाने वाली चट्टानें जलज हैं । इनका जमाव जलीय भागों में हुआ है। इनमें सागरीय जीवों के अवशेष मिलते हैं।

(3) इन पर्वतों में अवसाद अधिक गहराई तक पाया जाता है जो स्पष्ट करता है । कि इनका निमार्ण गहरे सागरों से हुआ है, किन्तु जीव अवशेषों में ऐसे भी मिलते हैं जिनका विकास उथले सागरों में ही सम्भव  है। 

इससे स्पष्ट होता है की चट्टानों का जमाव उथले तथा गहरे दोनों प्रकार के सागरो में हुआ है।अवसाद के भार के कारण सागरीय तल नीचे धस गए एवं अवसाद का जमाव हो गया। 

(4) वलित पर्वतों की वक्राकार आकृति स्पष्ट करती है कि इनके निर्माण में नतोदर पार्श्व की ओर खिचाव शक्ति का प्रभाव पड़ा है।

(5) ये पर्वत लम्बाई में अधिक व चौड़ाई में कम हैं । उदाहरणार्थ-हिमालय पर्वत पूरब से पश्चिम अधिक है जबकि उत्तर-दक्षिण कम हैं।

(6) इनकी आकृति चापाकार या वक्राकार है, उदाहरणार्थ-हिमालय पर्वत ।

(7) वलित पर्वतों पर अपरदन की शक्तियों का प्रभाव अधिक पड़ता है।

(ii) गुम्बदाकार पर्वत 

जब विशेष दशा में भूमि के नीचे लावा का जमाव गुम्बदाकार हो, अथवा धरातल पर जैसा उभार बन जाय तो इसे गुम्बदाकार या लैकोलिथ पर्वत कहते हैं। पश्मिी संयुक्त राज्य । के यूटाह राज्य में स्थित हेनरी पर्वत इसका सुन्दर उदाहरण है।

(iii) ब्लॉक या भ्रंश पर्वत 

इस पर्वत का विकास भ्रश क्रिया से होता है। अतः इसे भ्रंश या भ्रंशोत्थ पर्वत भी कहते हैं। जब भूतल के किसी क्षेत्र में दो समानान्तर भ्रंश पड़ने के पश्चात् बीच का भाग ऊपर उठा रह जाय तो ऐसा पर्वत भाग बन जाता है। 

ये प्रायः एकाकी पर्वत होते हैं। फ्रांस का ब्लेक फोरेस्ट, जर्मनी का होर्ट एवं पश्चिमी संयुक्त राज्य के ओरेगन राज्य के पर्वत इसके कुछ उदाहरण हैं।

(1) अवशिष्ट पर्वत 

अनाच्छादन की शक्तियों से पठार एवं पर्वतीय भाग कटते छटते रहते हैं। अत: ऐसे निरन्तर घिसाव के बाद कठोर भू भाग बचे रहते हैं। ये प्राय गुम्बदाकार एवं कठोर चट्टानों के होते हैं। प्रायः प्राचीन पठारी क्षेत्रों में अत्यधिक काट छाँट से इनका विकास होता है। 

पश्चिमी संयुक्त अमेरिका राज्य का स्टोन पर्वत, राजस्थान का आबू खण्ड (पर्वत), महादेव, मैकाल व राजमहल की पहाड़िया, दक्षिणी अफ्रीका के मरुस्थल में स्थित श्री सिस्टर्स (तीन भगिनी पहाड़ियाँ) इसके कुछ उदाहरण हैं।

(1) संचित या संग्रहीत पर्वत

धरातल पर अपरदन शक्तियों से प्राप्त पदार्थों के जमा होने से बनने वाले पहाड़ व पहाड़ियाँ एवं आन्तरिक शक्तियों के प्रभाव से ज्वालामुखी उद्गार से संग्रहित पर्वत ऐसे ही पर्वत हैं । हिमानी के जमाव के व बालू के टीले एवं ज्वालामुखी पर्वत इसके उदाहरण हैं। 

इनमें ज्वालामुखी पर्वत इसके सबसे सुन्दर एवं आदर्श उदाहरण हैं । ये त्रिकोणाकार, एकाकी एवं संग्रहीत पर्वत के रूप में विश्व के सभी महाद्वीपों में पाये जाते हैं। 

प्रशान्त महासागर, भूमध्यसागर एवं पश्चिमी द्वीप समूह क्षेत्रों में अनेक जाग्रत ज्वालामुखी पाये जाते हैं। ज्वालामुखी नवीन उद्गार के द्वारा ऐसे पर्वतों को अधिक ऊँचा उठाते रहे हैं।

4. आयु के आधार पर

आयु या कालक्रम के आधार पर पर्वत (वालनिक या मोड़दार पर्वत) निम्न प्रकार के हैं ।

भू-वैज्ञानिकों ने अब तक की ज्ञात पर्वत निर्माणकारी घटनाओं को निम्न प्रकार से विभाजित किया है।

(i) चर्नियन पर्वत निर्माणकारी घटना,

(ii) केलिडोनियन पर्वत निर्माणकारी घटना, 

(iii) हर्सीनियन या अल्टाइड पर्वत निर्माणकारी घटना,

(iv) अल्पाइन पर्वत निर्माणकारी घटना ।

(i) चर्नियन घटना

इसे चर्नियन वालनिक घटना भी कहते हैं। यह घटना पूर्व केम्ब्रियन काल की है। सम्भवतः 50 से 60 करोड़ वर्ष पूर्व या अति प्राचीन काल के मोड़दार पर्वत इसमें आते हैं। इसके अन्तर्गत भारत के विन्ध्याचल, सतपुड़ा, अरावली, कुडप्पा आदि पर्वत एवं स्केण्डेनेविया के पर्वत तथा संयुक्त राज्य के महान झीलों के पूर्व के पर्वत आते हैं। 

यूरोप के फैनोस्केण्डेनेविया में भी इसके उदाहरण मिलते हैं । यद्यपि इन पर्वतों का अपरदन के पश्चात् कई बार पुनः उत्थान भी हो चुका है, फिर भी ये घिस-घिस कर बहुत नीची पहाड़ियों में बदल गये हैं।

(ii) केलिडोनियन घटना

यह पर्वत निर्माण घटना डेवोनियन एवं सिलूरियन काल में आज से लगभग 32-35 करोड़ वर्ष पूर्व हुई। इसी समय यूरोप में स्केण्डेनेवियन पर्वत, उत्तरी आयरलैण्ड पर्वत, यूरेशिया में बागलैण्ड पर्वत एवं उत्तरी अमेरिका के महान अप्लेशियन पर्वतों की उत्पत्ति हुई। इनमें से अप्लेशियन अपनी युवावस्था में हिमालय एवं रॉकीज से भी अधिक वैभवशाली थे।

(iii) हर्मीनियन घटना

इसे वारिस्कन, अल्टाइड पर्वत निर्माणकारी घटना भी कहते हैं क्योंकि इस घटना का विस्तार सम्पूर्ण यूरेशिया में व ऑस्ट्रेलिया में दूर-दूर तक रहा। यह पर्वत निर्माण विशाल एवं अनेक रूपों में प्रभावित रहा। 

यह घटना कार्बोनिफरस एवं परमियन युग के 22 करोड़ वर्ष पूर्व की है। अधिकांश मध्य एशियाई पर्वत (थ्यानशान, शान, अल्टाई, खिंगन याब्लोनाइ, स्टेनोवाइ, साइबेरिया के पर्वत), ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी कार्डिलेरा, यूरोप में पिनाइन, वॉस्जेज, कारपेथियन एवं मेसिटा आदि इस क्रम के पर्वत हैं। इस समय अप्लेशियन एवं अरावली में पुनः उत्थान भी हुए।

अनाच्छादन के परिणामस्वरूप आज ये सब पर्वत घिसकर अवशिष्ट पर्वतों के रूप में दृष्टिगत होते हैं।

(1) अल्पाइन घटना 

से पर्वत सबसे बाद के है। इनका प्रारंभ आज से 6-7 वर्ष पूर्व हुआ। इनका  आधिकांश विकास 2.6 से 3 वर्ष पूर्व पूरा हो चुका था। वर्तमान में ये विश्व के वैभवशाली एवं सर्वोच्च पर्वत है आपसे । 

इनमे सम्पूर्ण दक्षिण एशिया के टर्की के  म्यांमार तक के पर्वत यूरोप में अल्पस पिरेनिज उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के रॉकीज व एंडिज एवं न्यूजीलैंड के दक्षिणी अल्पस मुख्यताः सम्मिलित है इनकी कई शाखा पर्वत श्रेणियां भी हैं।

पर्वत निर्माण के सिद्धान्त

पर्वत निर्माण की घटना प्रक्रिया में विद्वानों में मतभेद पाए जाते है फिर भी यह सर्वमान्य तथ्य है कि पर्वतों की उत्पति भू संनियों से हुईं थी अतः पर्वत निर्माण प्रक्रिया को समझने के लिए भू-सन्नति या भू अभिन्नति को समझना अनिवार्य है।

भू सन्नति या भू अभिनति

पृथ्वी का प्राचीन स्वरूप वर्तमान स्वरूप से बहुत भिन्न था। वर्तमान समय के बिखरे भूखण्ड पूर्व में ऐसो अवस्था में नहीं थे। दृढ़ भूखण्डों के कारण हो वर्तमान महाद्वीप एवं महासागरों की रचना हुई। 

वर्तमान समय के ये व भूखण्ड (महाद्वीप) पहले जलीय भागों से घिरे थे जो अस्थिर एवं परिवर्तनशील रहे हैं। ये अस्थिर जलीय भाग हो भू-सन्नतियाँ कहलाते हैं। भू-सन्नतियों से तात्पर्य ऐसे भू-भागों से है जिनमें सदैव अवसाद का निक्षेप होता रहता है। 

ये निक्षेपित पदार्थ भूगर्भिक हलचलों के कारण वलन के रूप में ऊपर की ये ओर आने लगते हैं।

आधुनिक या अल्पाइन युग के पर्वतों की उत्पत्ति से पूर्व पृथ्वी पर पाँच दृढ़ भू-खण्ड थे । ये भू-खण्ड कठोर व स्थिर स्थलीय भाग रहे । ये पृथ्वी को सम्पूर्ण भू-वैज्ञानिक हलचलों के काल में भी समुद्र का अंग नहीं बने । 

अतः हॉल के अनुसार मध्यजीव कल्प (मेसोजोइक कल्प) के पाँच दृढ़ भू-खण्ड निम्नलिखित हैं। 

(i) उत्तरी अटलाण्टिक खण्ड, 

(ii) सिनो-साइबेरियन खण्ड, 

(iii) ऑस्ट्रेलिया-भारत-मैडागास्कर- अण्टार्कटिक भू-खण्ड, 

(iv) अफ्रीका-ब्राजील भू-खण्ड, 

(v) प्रशान्त भू-खण्ड, जबकि इन दृढ़ भू-खण्डों के मध्य या किनारों पर भू-सन्नतियाँ पाई जाती थीं। भू-सन्नति लम्बे, संकरे व छिछले सागर होते हैं । इनकी तली में निरन्तर अवसाद जमा होने से वह धंसती रहती हैं। 

स्टीयर्स के अनुसार, “भू-सन्नतियाँ लम्बे व अपेक्षतया सँकरे गर्त होते हैं, जिनमें निरन्तर जमाव होने से धंसाव होता है।"

वान राइपर के अनुसार, “एक बड़ा तलछटीय लम्बा, पतला गड्ढा जिसका निर्माण उत्तरोत्तर नीचे पड़े जमाव का परिणाम होता है ।

आर्थर होम्स के अनुसार,“पृथ्वी की पपड़ी के धंसाव से बनी लम्बी पेटी जिसमें तलछट की मोटी परत के साथ कभी ज्वालामुखी चट्टानें भी सम्मिलित होती हैं, सामान्य मात्रा में भू-सन्नति कहलाती है।" 

उस समय की भू-सन्नतियों की स्थिति हॉल एवं डाना ने निम्न प्रकार से स्पष्ट की है : ने (i) रॉकी भू-सन्नतियाँ, (ii) यूराल भू-सन्नतियाँ, (iii) टेथिस भू-सन्नतियाँ, (iv) परिप्रशान्तभू-सन्नतियाँ।

जे. टी. डाना ने भू-सन्नति सिद्धान्त के सम्बन्ध में अपना मत सर्वप्रथम सन् 1873 में रखा तथा बताया कि भू-सन्नति लम्बे, सँकरे तथा निरन्तर धंसते हुए उथले सागरीय भागों को कहा जाता है ।

जहाँ डाना ने भू-सन्नतियों को छिछला माना वहीं हॉग ने उन्हें गहरे व लम्बे सागर माना जिनमें कि निरन्तर अवसाद जमा होते हैं। उसके अनुसार भू-सन्नतियों के किनारे छिछले होते हैं। 

इनमें अवसादों के जमाव के साथ-साथ सागर जीवों के अवशेष भी पाये जाते हैं। इससे जमाव की मोटाई का पता लगाया जा सकता है। हॉग के अनुसार जब भी भू-सन्नतियों के तटीय भागों में दबाव पड़ेगा, पर्वतों या मोड़ों का विकास है। 

किन्तु हॉग एवं पूर्व की विचारधारा को माना गया, क्योंकि इसमें भू-सन्नतियों एवं दृढ़ भूखण्डों के सम्बन्ध व भू स्थिति पर मतभेद रहा तथा पर्वत निर्माण प्रक्रिया को भी गलत माना गया। 

हॉग महोदय के अनुसार, पुराजीवी महाकल्प में पृथ्वी पर पाँच अत्यधिक कठोर भू-खण्ड थे।

(i) उत्तरी अटलाण्टिक भू-खण्ड, (ii) सिनोसाइबेरिया भू-खण्ड, (iii) अफ्रीकाब्राजील भू-खण्ड, (iv) ऑस्ट्रेलिया इण्डिया-मैडागास्कर भू-खण्ड, तथा (v) पैसिफिक भू-खण्ड । इन भू-खण्डों के मध्य निम्न चार भू-सन्नतियाँ थींर (i) रॉकीज भू-सन्नतियाँ, (ii) यूराल भू-सन्नतियाँ, (iii) टेथिस भू-सन्नतियाँ एवं (iv) परिप्रशान्त भू-सन्नतियाँ।

हॉग के अनुसार भू-सन्नतियों का विकास आसान नहीं है । उनका विचार था कि भू-सन्नतियों के लिए यह भी आवश्यक है कि वे विकास की सभी अवस्थाओं को पूरा करें।

हाँग द्वारा भू-सन्नतियों की जो गहराई बतायी गयी है, वह तथ्यों के विपरीत है। इनके द्वारा जल एवं स्थल का किया गया वर्णन भी गलत

जेम्स हॉल ने भू-सन्नतियों तथा वलित पर्वत श्रेणियों के मध्य सम्बन्ध स्थापित कर उसे प्रमाणित करने का प्रयास किया। उनका विचार था कि पर्वतों की अवसादी चट्टानों की रचना किसी छिछले सागर से हुई है । तलछट के जमा होने से सागर तली नीचे दबती गयी जिससे वहाँ अवसाद का जमाव हो गया।

शूकर्ट की विचारधारा-शूकर्ट ने भू-सन्नतियों की स्थिति एवं उनके विकास के बारे में नवीन विचारधारा प्रस्तुत की। उसने अल्पाइन क्रम के पर्वतों का विस्तृत अध्ययन कर विविध पर्वतमालाओं के विकास के लिए उत्तरदायी मध्यजीव कल्प (मेसोजोइक कल्प) की एवं पूर्वकालीन भू-सन्नतियों को उनकी विषमताओं के अनुसार तीन वर्गों में बाँटा । ये निम्नलिखित हैं :

(i) एक भू-सन्नति 

ऐसी भू-सन्नति विशेष लम्बे, संकरे एवं छिछले तल वाली थी। इनकी स्थिति महाद्वीपों के मध्य अथवा किनारों पर सम्भावित मानी गई जैसे-अप्लेशियन भू-सन्नति । इनकी उत्पत्ति छिछले सागरों से ही होती है। इसलिए तलछट की अधिक मोटाई समुद्र तली के धंसने से ही सम्भव है। 

जहाँ वर्तमान समय में अप्लेशियन पर्वत है, वहाँ पैलियोजोइक कल्प में एक भू-सन्नति थी। इसके पूरब में अप्लेशिया नामक उच्च भूखण्ड तथा पश्चिम में मिसीसिपी का निम्न मैदान था। अप्लेशिया

(ii) बहु आकृति भू-सन्नति 

इन्हें शूकर्ट ने विशेष गहरी, लम्बी व संकरी भू-अभिनति माना। इसकी लम्बाई अधिक होने के साथ-साथ इसमें कुछ शाखाएँ भी थीं। इनका भू-वैज्ञानिक इतिहास विशेष जटिल रहा है। ऐसी ही रॉकी व यूराल जैसी भू-सन्नतियों से अनेक शृंखलाओं वाले पर्वतों का विकास हुआ। 

भू-सन्नतियों में अवसाद का जमाव लम्बे समय तक होता रहा जिससे अधिक दबाव के कारण वलन उत्पन्न हुआ जिससे उसके उठे हुए भाग पर्वत एवं धंसे हुए भाग घाटियों के रूप में विकसित हुए।

(iii) मध्यस्थ भू-सन्नति 

ऐसी भू-सन्नतियाँ दो विशाल भू-खण्डों या महाद्वीपों के बीच विकसित होती हैं। ऐसे सागरों को लम्बे, संकरे व गतिशील विशेषताओं वाला बताया गया। ऐसी भू-सन्नतियाँ अधिक लम्बी, मोड़दार एवं बहु-शाखाओं वाली भी हो सकती हैं । टेथिस ऐसी ही भू-सन्नति रहा। इससे आल्पस से लेकर हिमालय एवं उससे पूर्व के पर्वतों का विकास हुआ। टेथिस सागर, अंगारालैण्ड तथा गोण्डवाना लैण्ड नामक कठोर भूखण्डों के मध्य स्थित था।

आर्थर होम्स का भू-सन्नति पर विचार

आर्थर होम्स ने महाद्वीपों का विस्थापन, महासागरीय तली का विकास, भू-सन्नति में निरन्तर अवसादीकरण एवं भू-सन्नति का विकास और पर्वत निर्माण सभी बातों को अन्तःसम्बन्धित घटनाएँ मानते हुए उसके लिए संवाहनिक धाराओं की विशेष विचारधारा प्रस्तुत की।

पृथ्वी के गर्म होने एवं स्थानीय रूप से सन्तुलन बिगड़ने से भी भू-सन्नतियों के क्रिया कलाप पर प्रभाव पड़ता है।जहाँ संवाहनिक धाराएँ मिलती हैं वहाँ पर नीचे उतरती हुई धारा से भू-सन्नति का विकास होता है, साथ ही वहाँ की भू-सन्नति की तली धीरे धीरे नीचे की ओर गतिशील बनी रहती है। इसके साथ-साथ उसमें निकट के महाद्वीपों से अवसाद जमा होते रहते हैं इस प्रकार निरन्तर छिछले रहने वाले सागरों में हिमालय, आल्पस व रांकी जैसे पर्वतों के लिए 40 से 45 हजार फीट (12 से 14 हजार मीटर) मोटाई के जमाव सम्भव हो पाये। इसे होम्स ने समझाया है। सभी प्रकार के पर्वतों के निर्माण व विकास में तीन अवस्थाएँ समझायी गईं जो निम्नलिखित हैं :

(1)भू-सन्नति अवस्था या पर्वतों की गर्भव्यवस्था 

इस लम्बे भू-सन्नति के काल मे निकट के महाद्विपों से  अपरदन   एवं परि वाहन द्वारा लाये गए अवसादों का निरंतर जमाव होता रहा है तली के धंसाव के साथ साथ अवसादों  की मोटाई बढ़ती जाती है। संवाहनिक धाराओं के अंतिम चरण में यहाँ जमाव से संतुलन बिगड़ने से पर्वतों की गर्भावस्था के बाद की दूसरी अवस्था प्रारम्भ होती है।

(2)वलन पड़ने की या पर्वत निर्माण अवस्था

किसी भी विधि से भू-सन्तुलन बिगड़ने एवं महाद्वीपों के निकट आने या विस्थापन से भींचाव या सम्पीडन की क्रिया होने लगती है। इससे पहले तटीय भाग के निकट एवं बाद में रुक-रुक कर आने वाले दबाव या भींचाव की प्रकृति एवं दिशा के अनुसार मोड़ों का विकास एवं पर्वतों के विशेष का निर्माण होता है।

(3)विकास अवस्था

इस अवस्था में पर्वतों का अन्तिम चरण के रूप में स्थानीय या क्षेत्रीय में धीरे-धीरे विकास होता है। इसके ही सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र में वहाँ की दशाओं के अनुसार अपक्षय के कारकों का तेजी से प्रभाव इस पर्वत निरन्तर घिस-घिस कर धीरे-धीरे नीचे होने लगते हैं। इससे स्थानीय रूप से सन्तुलन स्थापक शक्तियों प्रभाव से कहीं-कहीं उत्थान भी हो सकता है। विश्व के अधिकांश अल्पाइन पर्वत इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

कोबर का भू-अभिनति (भू-सन्नति) सिद्धान्त

कोबर ने संकुचन विचारधारा के आधार पर भू-सन्नति सिद्धान्त एवं पर्वत निर्माण की व्याख्या सन् 1923 में प्रस्तुत की। उसने पृथ्वी के ठण्डा होने एवं संकुचन होने के साथ-साथ दृढ़ भू-खण्डों या प्राचीन कठोर स्थल प्रदेश तथा महासागरों एवं भू-सन्नतियों की कल्पना प्रस्तुत की। 

उसके अनुसार पेंजिया महाद्वीप के अंगारालैण्ड एवं गोण्डवानालैण्ड के मध्य टेथिस महासागर स्थित था। इसे विद्वानों ने भू-सन्नति बताया। इसमें निरन्तर अवसाद जमाव होने एवं सिकुड़ने की क्रिया होती रही इसके साथ-साथ इसमें अवसादों के दबाव से धसाव् होता रहा। 

इस दबाव से अन्ततः अंगारालैण्ड एवं गोण्डवानालैण्ड दोनों निकट आते गये। ऐसे में भू-सन्नति पर दबाव बढ़ने लगा और अवसादों में मोड़ पड़ते गये। इस सिद्धान्त को मध्य पिण्ड सिद्धान्तभी कहा जाता है।

कोबर के अनुसार सर्वप्रथम अग्र प्रदेशों के किनारे के भाग में तटीय पर्वत श्रेणियाँ बनीं। इन्हें जर्मनी के इस विद्वान ने रेण्ड केटन कहा। दबाव निरन्तर बढ़ते रहने से अधिक जटिल एवं कई श्रेणियाँ (रेण्ड केटन) दोनों ओर विकसित होती गईं। यदि दबाव तीव्र रहा तो सम्पूर्ण प्रदेश की ऐसी श्रेणियों को कोबर ने नाब कहा। 

स्विट्जरलैण्ड की आल्पस श्रेणी नार्ब का ही उदाहरण है किन्तु जब दबाव रुक-रुककर एवं मध्य रहा हो तो मध्यवर्ती भाग पठारी (अन्तः पर्वतीय पठार) भाग में बदल जाता है जैसा कि तिब्बत का पठार एवं मध्य एशिया के अन्य पठार हैं । 

इस चौड़े समतलप्रायः ऊँचे व पठार कहे जाने वाले भाग को मध्य पिण्ड या ज्यूसचेंजेबर्ग कहा। यूरोप में हंगरी का उच्च मैदान भी दिनारिक आल्पस एवं कारपेथियन के मध्य स्थित ऐसा ही मध्य पिण्ड है।

कोबर के इस सिद्धान्त की प्रारम्भ से ही आलोचना होती रही है। दोनों ही प्रदेशों को अग्र प्रदेश मानना, दोनों ओर से आने वाला समानप्रायः दबाव, समरूपी श्रेणियों का निर्माण एवं मध्य पिण्ड आदि तथ्यों को लेकर आलोचना की गई है। 

उत्तर दक्षिण में फैले रॉकीज, एण्डीज, अप्लेशियन, कुछ मध्य एशियाई पर्वतों की उत्पत्ति इस सिद्धान्त से स्पष्ट नहीं की जा सकती।

जे.डब्ल्यू. ईवान्स का मत-ईवान्स ने भू-सन्नतियों को तलछट का धंसाव क्षेत्र माना है। उनके अनुसार भू-सन्नतियों का आकार बदलता रहता है। इनकी आकृतियों में अन्तर होने के साथ-साथ विकास क्रम में भी परिवर्तन होता रहता है। इससे भू-सन्नतियाँ संकरी तथा चपटी भी हो जाती हैं। भू-सन्नतियाँ कहीं पर वक्राकार तो कहीं पर असमान धंसा पृष्ठ के समान होती हैं। स्थिति के आधार पर भू-सन्नतियाँ चार प्रकार की होती हैं। 

(i) दो महाद्वीपों के मध्य,।

(ii) किसी विशाल नदी के मुहाने पर।

(iii) पर्वव तथा पठार के मध्य मैदानों में। 

(iv) महाद्वीपों के निकट सागर में।

ईवान्स का मानना है कि अवसाद के धीरे-धीरे जमा होते रहने से सियाल के कमजोर भाग नीचे धंस जाते हैं। जब यहाँ भार अधिक हो जाता है तो खिंचाव तथा तनाव उत्पन्न होता है जिससे भू-सन्नति के दोनों किनारे एक दूसरे के समीप आना प्रारम्भ कर देते हैं ।

जैफ्रे का तापीय संकुचन सिद्धान्त

जैफ्रे ने पृथ्वी के ठण्डा होने के साथ-साथ उसके सिकुड़ने की विधि को एवं इस प्रक्रिया से पर्वतों के निर्माण एवं विकास को स्पष्ट किया। उनके अनुसार ठण्डी होती हुई पृथ्वी पर सिकुडन या वलन पड़ने लगे। यही सिकुडन या वलन (मोड) पर्वत कहलाए। 

प्रारम्भ में ठण्डा होने की यह प्रक्रिया अधिक तीव रही अत यह प्रक्रिया तेजी से व बड़े पैमाने पर चलती रही। अब यह विचारधारा बिल्कुल मान्य नहीं है।

आगे चलकर एडवर्ड सुएस ने सन् 1885 में तथा सन् 1892 में अपने महान ग्रन्थ 'भू-तल के इतिहास में कुछ अलग प्रकार से संकुचन पर आधारित पर्वत निर्माण सिद्धान्त प्रस्तुत किया। आरगण्ड भी सुरास से का हो पक्षपाती था। 

इन विद्वानों ने प्राचीन कठोर स्थल खण्डों का विस्तार समझाते हुए इसमें से एक को अग्र प्रदेश एवं दूसरे को पृष्ठ प्रदेश बताया। मध्य के मुलायम या कमजोर भू भाग या भू-सन्नति पर पड़ने वाले दबाव से हो पर्वतों का विकास हुआ।

वर्तमान समय में अब यह सिद्धान्त मान्य नहीं है क्योंकि आणविक पदार्थों की उष्णता से तो टण्डी होतो हुई पृथ्वो भी बार बार गरम हो जाती है एवं पर्वत निर्माण का कारण पूर्णतः भिन्न विधि से जौली एवं होम्स द्वारा समझाए गए हैं। पूर्व अध्याय में वर्णित आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी (Plate tectonics) की विचारधारा भी इस दिशा में नये रूप से पर्वत निर्माण घटना को समझाने का आधुनिक प्रयास माना जा सकता है

जौली का तापीय चक्र सिद्धान्त

जौलो ने प्रथम विश्वयुद्ध तक ज्ञात रेडियोधर्मी आणविक पदार्थो के गुणों की नवीन खोजों से विशेष प्रभावित हुए । जौलो ने उनसे निकलने वाली गर्मों या ऊष्मा पर आधारित रेडियोधर्मी सक्रियता सिद्धान्न के द्वारा अन्य बातों के साथ-साथ पर्वत निर्माणकारी घटनाओं पर भी सन् 1925 में प्रकाश कला। इसके कुछ समय पश्चात् आर्थर होम्स ने भी इससे कुछ संशोधित एवं विकसित संवहन धारा सिद्धान प्रस्तुत किया था।

जौली के अनुसार पृथ्वी के आन्तरिक भागों में पाये जाने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों की गर्मी सीमा के ऊपरी परतों में ही एकत्रित होने से वहाँ के तापमान निरन्तर बढ़कर (1050° सेन्टीग्रेड तक) चट्टानों के अर्द्ध द्रवावस्था में ला देते हैं। 

इससे सियाल का भाग जोकि सीमा पर तैर रहा है, कुछ अधिक गहराई तक सोमा में डूब जाता है । इसी से सागर तल में परिवर्तन आते हैं, भू-सन्तुलन बिगड़ने लगता है एवं भू-सन्नतियों का विकास होता है। 

जब ऐसा होने से भीतरी एकत्रित गर्मी बाहर आ जाती है तो यह क्रिया धीमी पड़ने लगती एव महाद्वीप में पुन: स्थायित्व एवं उभार के साथ भिचाव व सम्पीडन की क्रिया से पर्वतों का निर्माण छिछले में सागरों या मुलायम चट्टानों के जमाव के क्षेत्रों से होने लगता है। 

पर्वत निर्माण की क्रिया के काल में महासागर तटीय भाग की ओर बढ़ने लगते हैं एवं महाद्वीपों का विस्थापन भी होता है।

आलोचना 

यह सिद्धान्त सियाल एवं सीमा परतों में रेडियोधर्मी पदार्थों के वितरण एवं उनसे निकलने वाली गर्मी के सीमा परत में कैद होकर एकत्रित होने पर आधारित है। वास्तव में इसके बारे में आज भी वैज्ञानिकों को विशेष तथ्यात्मक ज्ञान नहीं है। 

इस सिद्धान्त के अनुसार सभी महाद्वीपों के केवल किनारों पर ही पर्वत निर्माण घटना होनी चाहिए, किन्तु वास्तव में ऐसी स्थिति नहीं है। इसी भॉति जौली के अनुसार पर्वत निर्माण की सभी घटनाएँ चक्रवार या निश्चित समय के अन्तर पर होती रहनी चाहिए इसे अर्तमान में सही नहीं माना जाता । ।

आर्थर होम्स का संवाहन धारा सिद्धान्त

होम्स भी आणविक तत्वों के रेडियाधर्मी गुणों की प्रकृति से विशेष प्रभावित रहा किन्तु उसने जोल भिन्न ढंग से संवाहनिक धारा सिद्धान्त द्वारा महाद्वीपों का विस्थापन, भू-सन्तुलन, भू-सन्नति एव पर्वत सभी को समन्वित रूप से समझाया।

के अनुसार, भू-तल पर या सियाल को ऊपरी परत पर रेडियोधर्मी पदार्थों के अपने आप विर्घाटन होते रहे। क क्रिया से जो ऊष्मा पर्याप्त मात्रा में निकलती है वह तो सीधे वायुमण्डल में विकिरण द्वारा फैल जाती है। 

इसके दूसरी ओर इसके नीचे की परत अधःस्तर  में यद्यपि रेडियोधर्मी पदार्थ कम हैं, किन्तु उनके निरन्तर विखण्डन (टूटते रहने) से जो विशेष ऊष्मा निकलती है वह इसी स्तर में या नीचे की परत में कैद रहकर एकत्रित होती जाती है, क्योंकि इसका वायुमण्डल से सीधा सम्पर्क नहीं है। 

इसी से तापमान बढ़ता है। जब तापमान अधिक बढ़ने से नीचे के भाग में अति उष्णता एवं ऊपरी भाग में शीतलता की विपरीत ताप की स्थिति बनती है तो तापीय अन्तर को पुनः सन्तुलित करने के लिए विशेष विधि से संवाहनिक धाराएँ चलने लगती हैं। 

इनमें से जो तरंगें ऊपर उठकर क्षैतिज दिशा में सतह के निकट (महासागरों के किनारे या आन्तरिक सागरों के किनारे) आमने-सामने आकर मिलकर नीचे की ओर उतरती हैं तब वहाँ अवतलन होता है। इसी से भू-सन्नति एवं सम्पूर्ण पर्वत निर्माण की दशा का विकास होता है (वर्णन पूर्व में दिया गया है)। 

जब अधःस्तर में एकत्रित गर्मी धीरे-धीरे ऊपर आकर वहाँ से विकिरण द्वारा बाहर विलीन होती जाती है तो यह सम्पूर्ण प्रक्रिया अर्थात् संवाहन धाराएँ भी धीरे-धीरे कमजोर पड़कर रुक जाती हैं।

आलोचना 

यद्यपि होम्स के सिद्धान्त में जो कुछ विधि तन्त्र एवं प्रक्रिया समझायी गई है वह सहज एवं सम्भावनाओं के आधार एवं आधारभूत प्रभावों के परिणामों पर निर्भर है। इसी कारण जहाँ इस सिद्धान्त को सम्पूर्णता की दृष्टिकोण में सबसे अधिक मान्यता आज भी मिली हुई है। 

फिर भी कई वैज्ञानिकों ने कुछ अज्ञात तथ्यों को ही आधार मानकर इस सिद्धान्त से इतना कुछ पृथ्वी पर हो पाने की बात मान लेना असम्भव को सम्भव मानने जैसी बात कही है, किन्तु प्लेट टेक्टोनिक्स (प्लेट विवर्तनिकी) एवं अन्य नवोन खोजों के आधार पर भी इसकी जाँच करके इसे अधिक विश्वसनीय सिद्धान्त माना जाने लगा है।

Subscribe Our Newsletter