राहुल सांकृत्यायन की भाषा शैली की विशेषताएँ लिखिए

Post Date : 18 May 2022

भाषा-शैली-राहुल जी की शैली बहुमुखी है। उनकी शैली की कुछ आधारभूत विशेषताएँ अग्रलिखित हैं

1. शैली की सबसे बड़ी विशेषता मनोरंजकता है। राहुल जी आरम्भ से ही रोचकता के समर्थक रहे थे। यह विशेषता उनकी साहित्यिक कृतियों में ही नहीं अपितु गम्भीर विषयों में भी दिखलाई देती है। 

2. उनकी शैली की दूसरी विशेषता खोजपूर्ण वृत्ति की परिचायक है। हिन्दी-साहित्य में राहुल जी ही प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने खोजपूर्ण शैली का सूत्रपात किया।

3. विवरण प्रस्तुत करने की भावना उनकी शैली में सदैव स्पष्ट रूप में मिलती है। प्रस्तुत निबन्ध उनकी वर्णनात्मक शैली का परिचायक है।

4. सर्वत्र प्रभावोत्पादकता उनकी शैली में विद्यमान रही। किसी भी कृति को देखा जाए तो यह विशेषता सुन्दर रूप में आई है। है

अतः संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राहुल जी की शैली में प्रभावोत्पादकता, मनोरंजकता, व्यंग्य, सरलता, सरसता, भाव गाम्भीर्य आदि विशेषताओं के दर्शन मिलते हैं। उर्द, फारसी का विशेष रूप उनकी शैली में उभार दिखाई देता है। प्रमुख रूप से राहुल जी ने निम्न शैली-रूपों को अपनाया है।

(1) वर्णनात्मक-शैली-राहुल जी ने बहुत बड़ी यात्रा में यात्रा-साहित्य की रचना की है। सलिए उनकी शैली प्रायः वर्णनात्मक है। इस शैली की भाषा सरल प्रवाहमयी है तथा वाक्य छोटे-छोटे । इस शैली का निम्नलिखित उदाहरण दृष्टव्य है-'कोलम्बस और वास्कोडिगामा दो घुमक्कड़ ही थे, जिन्होंने पश्चिमी देशों के लिये आगे बढ़ने का रास्ता खोला। अमेरिका अधिकतर खाली पड़ा था।'

(2) विवेचनात्मक-शैली-इतिहास, दर्शन, धर्म, विज्ञान आदि विषयों पर लिखते समय उनकी शैली विवेचनात्मक हो गई है। इस शैली में उनके चिन्तन और अध्ययन की गहराई स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। इस शैली की भाषा प्रौढ़ परिमार्जित और उद्धरणों से युक्त है। अनेक जटिल विषयों की व्याख्या भी इसी शैली में की गई है।

(3) व्यंग्यात्मक-शैली-राहुल जी ने समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों, कुपरम्पराओं तथा पाखण्डों पर तीव्र व्यंग्य प्रहार किये हैं। ऐसे स्थलों पर उनकी शैली पूर्ण रूप से व्यंग्यात्मक हो गई है। इस शैली का एक उदाहरण दृष्टव्य है

'ये सब तेली के बैल तो हैं ही, दूसरों को भी अपने जैसा बना रखेंगे।'

भाषा-गत वैशिष्टय-राहुल जी की भाषा अत्यन्त सीधी-सादी, सरल और स्पष्ट है। शब्दों के चयन में लेखक संस्कृत की तत्समता को नहीं अपनाता। भाव को व्यक्त करने के लिये जिस भी भाषा के-चाहे वह उर्दू हो या फारसी या संस्कृत और अंग्रेजी शब्दों को भावों के स्फुरण में उपयुक्त, स्वाभाविक और सरल पाते हैं, बेधड़क होकर प्रयोग में लाते हैं। 

भाषा में प्रसाद गुण की मात्रा अधिक है और वह हास्य-रस के संचार में बड़ी ही सुन्दर बन पड़ी है। तत्सम, तद्भव, देशज तथा बाहरी देशों के शब्द उनकी भाषा में मिलते हैं। स्वतंत्र भारत की राष्ट्र-भाषा में जो गुण होने चाहिए वे सब उनकी भाषा में व्याप्त हैं। उनकी भाषागत विशेषताओं की विवेचना निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर दृष्टव्य है

(1) चिन्तन एवं विचारात्मकता-दार्शनिक ग्रंथों और निबन्धों में आपकी भाषा चिन्तन प्रधान विचारात्मक हो गई है। यह संस्कृतनिष्ठ, पारिभाषिक, संयत और तर्कपूर्ण है। इसी भाषा का थोड़ा परिवर्तित रूप उनके शोध और अनुसंधान परक निबन्धों में दृष्टिगोचर होता है। 

एक उदाहरण देखिए'कोई भी धर्म या विचारधारा सफलता नहीं प्राप्त कर सकती, यदि वह कोई ऐसी चीज नहीं देती, जिससे समाज का कल्याण होता है।'

(2) व्याख्यात्मकता एवं आलंकारिकता-प्रकृति या मानव के सौन्दर्य का चित्रण करते समय राहुल जी की भाषा प्रायः काव्यमयी हो गई है। गूढ़ एवं जटिल विषयों का प्रतिपादन करते समय उनकी भाषा व्याख्यात्मक हो गई है। दोपहर के सौन्दर्य का एक चित्र दृष्टव्य है

'ग्रीष्म का समय, मध्याह्न की बेला, फिर मृग के पीछे दौड़ना, इस पर भी दिवा के ललाट पर श्रम बिन्दु अरुण के मुक्ताफल के समान न झलके, यह कैसे हो सकता है ?'

(3) भाषा का व्यावहारिक-रूप-राहुल जी की भाषा अनेक स्थलों पर पूर्णतया व्यवहारिक हो गई है। व्यवहारिक भाषा का यह रूप वर्णनात्मक निबन्धों और व्यवहारिक गद्य में देखा जा सकता है। 

(4) शब्द-प्रयोग में स्वच्छन्दता-राहुल जी ने स्वच्छदता पूर्वक शब्दों का प्रयोग किया है। आपने अनेक प्राचीन शब्दों का उद्धार किया है, अनेक ग्रामीण शब्दों का परिमार्जन करके भावों का संचार किया है और अनेक विदेशी शब्दों को देशी बनाकर हिन्दी भाषा के शब्द-भण्डार में वृद्धि की है। इस दृष्टि से राहुल जी की हिन्दीभाषा के लिये बहुत बड़ी देन स्वीकार करनी होगी।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने जीवन काल में भारतीय भाषा और सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट होने से बचाने के लिये जितना कार्य अकेले किया उतना शायद कोई एक सम्पूर्ण संस्था अपने साधनों के बलबूते पर नहीं कर पाती है। 

अतः हमारी इस महान् ‘यायावर' साम्यवादी चिन्तक, दार्शनिक, त्रिजिटकाचार्य लेखक और विश्वयात्री के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उसकी खोज की रक्षा करें और अधूरे कार्यों को पूरा करने का संकल्प लें।