मम्मी ठकुराइन एकांकी का सारांश - लक्ष्मीनारायण लाल

Post Date : 16 May 2022

एकांकीकारों में डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल का विशेष स्थान है। व्यक्ति और समाज के जीवन में व्याप्त विविध समस्याओं का चित्रण आपके एकांकियों में मिलता है। इस दृष्टि से आपका मम्मी ठकुराइन एकांकी विशेष प्रसिद्ध है। जिसमें लेखक ने वर्तमान मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी और तथाकथित शिक्षित वर्ग में मिथ्या सम्मान की भावना और सामान्य जन से परे हटकर विशिष्ट और प्रतिष्ठित बनने की आकांक्षा पर तीव्र प्रहार किया है।

मम्मी ठकुराइन एकांकी का सारांश

एकांकी की कथा सीधी, सरल, कौतूहलपूर्ण और मार्मिक है। मम्मी और ठकुराइन का घर आमने-सामने है। मम्मी के घर पर परदा पड़ा रहता है और ठकुराइन के घर पर खाट बिछी रहती है। एक दिन ठकुराइन के लड़के बहादुर और मम्मी के लड़के अजय में झगड़ा हो जाता है। दोनों ही समवयरक है। 

इस पर मम्मी अपनी पड़ोसी ठकुराइन को भला-बुरा कहने के साथ-साथ सब मुहल्ले वालों को भी भला-बुरा कहती है। मुहल्ले वाले उसकी हँसी उड़ाते हैं। इतने में उसके पति प्रो. सत्संगी घर आते हैं। वे भी अपनी पत्नी के साथ-साथ मुहल्ले वालों को भला-बुरा कहते हैं और ठकुराइन को हथकड़ी पहनाने की धमकी देते हैं।

ठाकुर साहब जो टिकट बाबू हैं, प्रोफेसर से उससे अच्छे व्यवहार के लिए कहते हैं। एक दिन मम्मी की बहिन के बच्चा होने वाला था। वह ठकुराइन से सहायता माँगने के लिए आई। ठकुराइन आँधी-पानी में गयी और मम्मी के बच्चों को अपने घर लायी और उन्हें भोजन कराकर सुला दिया। 

रात भर उसने जच्चा और बच्चा की सेवा की। लेकिन दुर्भाग्य से दो-तीन दिन बाद बच्चा और उसकी माँ दोनों मर गये। उसकी पत्नी ने यह आरोप लगाया कि ठकुराइन ने बच्चे पर जादू-टोना कर दिया था तथा उसने अपने गन्दे हाथों से मौसी को छू लिया जिससे बच्चे को टिटनेस हो गई। 

ठकुराइन को इनके आरोप से पर्याप्त आघात लगा। उसके पति ने इस मुहल्ले को छोड़ने का निश्चय कर लिया। जिस दिन वे अपना मकान छोड़ रहे थे। ठकुराइन मम्मी से मिलने के लिए गई। इस स्थिति में ठाकुर साहब के इस निश्चय को देखकर मम्मी का नारी हृदय जाग उठा। 

वह ठकुराइन के समक्ष गिड़गिड़ा उठी और अपने अपराध की क्षमा-याचना करने लगी। ठाकुर और ठकुराइन घर र-मुहल्ला छोड़कर रेलवे के क्वाटरों में चले गये। यही संक्षिप्त कथानक एकांकी का मूलाधार है। कथानक रोचक, सरल, मौलिक, सुसम्बद्ध और गतिशील है। कथावस्तु में आदि से अन्त तक पाठक की जिज्ञासा बनी रहती है। 

पात्र और चरित्र-चित्रण

एकांकी में कुल मिलाकर ग्यारह पात्र हैं। मम्मी और ठकुराइन एकांकी की प्रमुख स्त्री पात्र हैं। मम्मी स्थानीय कॉलिज के प्रो. सत्संगी की पत्नी तथा अजय और नीता की माँ हैं। उसमें तथाकथित शिक्षित होने का मिथ्याभिमान है। 

वह अपने परिवार और अपने बच्चों को अधिक सुसंस्कृत एवं सभ्य मानती है तथा शेष सभी मुहल्ले वालों को अनपढ़ या गँवार हाय राम छड़े कहती है जबकि उसका यह केवल ढोंग है। स्वयं एकांकीकार ने मम्मी के परिचय में लिखा है कि- मम्मी तो माँ ही हैं अजय की। 

इनकी न पूछिये, डर लगता है इनके नाज-नखरे से सदा अप्रसन्न रहती हैं। अवस्या चालीस से ऊपर ही है, पर अब भी यह एम. ए. फाइल जरूर करेंगी। पतली हो जाने के लिए दबा कराने की सोचती हैं।

ठकुराइन का स्वभाव मम्मी से ठीक विपरीत है। उसमें मानवीय सहानुभूति, सहयोग और सद्भाव के गुण विद्यमान हैं। मम्मी उसे अशिक्षित और गँवार कहकर व्यंग्य करती है जबकि अजय की मौसी की तबियत खराब होने पर वह रात भर उसकी सेवा करती है। ठकुराइन का परिचय देते हुए लेखक कहता है -

ठकुराइन एक बालिश्त बड़ी है। प्यार से भी एक घूसा अगर किसी को मार दें, तो राम कसम गंगाजल । हँसती कितना है, गोरी चिट्टी और स्वस्थ। सीधे पल्ले का आँचल जैसे कभी माथे से उतरता ही कड़े कंगन वाली, भरे हाथ की चूड़ियाँ, क्या गजब करती हो ठकुराइन।

प्रोफेसर सत्संगी स्थानीय कॉलेज में प्रोफेसर हैं तथा वर्तमान मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी और तथाकथित शिक्षित वर्ग के प्रतिनिधि पात्र हैं। उनमें मिथ्या अहंकार की भावना विशिष्ट तथा प्रतिष्ठित बनने की आकंक्षा है। 

ठकुराइन द्वारा उनकी साली की विशेष सेवा करने पर भी वे उसके ऊपर आरोप लगाते हैं। इसके अतिरिक्त शेष सभी पात्र मम्मी और ठकुराइन की चारित्रिक विशेषताओं को उभारने में सफल हैं, जिसमें एकांकीकार का प्रयास प्रशंसनीय है।

देशकाल और वातावरण

वातावरण का चित्रण करना लेखक का कोई अभीष्ट नहीं रहा है। फिर भी उन्हें वातावरण की पृष्ठभूमि तैयार करने में पूर्ण सफलता मिली है। आधुनिक सभ्य कहे जाने वाले तथाकथित शिक्षितों के घर, पड़ोस, मुहल्ला आदि के लोगों के प्रति कैसा व्यवहार होता है, प्रस्तुत एकांकी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। 

ये तथाकथित शिक्षित दूसरे लोगों का तनिक भी अहसान नहीं मानते कुराइन ले इन लोगों की निस वा की। इसके परिणाम में इन लोगों ने जो कहा उससे इनके स्वभाव एवं सामाजिक परिवेश का चित्रण मिलता है - जी हाँ, मास्टर साहब, आप लोगों ने तो हम पर फूल बरसाये। 

हम सीधे है, तभी तुम्हारी नजरों में हम गन्दे और बदत्तमीज हैं, जादू-टोना डालते हैं।  लेकिन एक बार फिर से सोच लो मास्टर साहब अपनी जिन्दगी के बारे में, जो तुम जी रहे हो। तुम्हारी जिन्दगी नहीं है, नकल है, नाटक है, दिखावा है।

भाषा शैली

मम्मी ठकुराइन एकांकी की भाषा सरल, सरस और प्रभावपूर्ण है। भाषा में स्वाभाविकता लाने तथा उसे व्यावहारिक बनाने के लिए एकांकीकार ने अपनी भाषा में विविध भाषाओंं के शब्दों का प्रयोग किया है। लोकोक्तियों एवं मुहावरों के प्रयोग ने भाषा को आकर्षक एवं चुस्त बना दिया है। सम्पूर्ण एकांकी में नाटकीय, संवाद और व्यंग्यात्मक शैलियों के दर्शन होते हैं।

उद्देश्य

प्रस्तुत एकांकी में लेखक ने समाज के तथाकथित शिक्षित एवं बुद्धिजीवियों पर तीखा प्रहार किया है। लेखक ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि आमतौर से अशिक्षित या रूढिवादी कहे जाने वाले व्यक्ति शिक्षित वर्ग की अपेक्षा कहीं अधिक मानवीय गुणों से ओत-प्रोत होते हैं।

लेखक के अनुसार, यदि आधुनिक शिक्षा हमारी सामाजिकता में अवरोध उत्पन्न करती है तो ऐसी शिक्षा मानव का विकास नहीं कर सकती। आज के शिक्षितों में मिथ्या सम्मान की भावना और सामान्य जन से परे हटकर विशिष्ट एवं प्रतिष्ठित बनने की आकांक्षा जागृत हो गई है जिसके फलस्वरूप ये व्यक्ति हीनता की ग्रन्थि से बँधकर अपने अहम् की तुष्टि के लिए पीड़ित रहते हैं। 

प्रस्तुत एकांकी में प्रोफेसर सत्संगी और उनकी पत्नी तथाकथित शिक्षित हैं। ठकुराइन उनकी काफी सहायता करती है। हर समय उनकी सेवा में तत्पर रहती है, फिर भी प्रोफेसर और मम्मी दोनों ही उसे गँवार और अशिक्षित समझते हैं। 

ठाकुर उनकी इस दिखावे की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करता हुआ कहता है - हम सीधे हैं तभी तुम्हारी नजरों में हम गन्दे और बत्तमीज हैं। जादू-टोना डालते हैं हम। लेकिन एक बार फिर से सोच लो मास्टर साहब अपनी जिन्दगी के बारे में, जो तुम जी रहे हो, तुम्हारी जिन्दगी नहीं है, नकल है, नाटक है, दिखावा है।

निष्कर्ष

डॉ. विजय वापट ने मम्मी ठकुराइन एकांकी की विशेषताओं के दिखावा सन्दर्भ में लिखा है मम्मी  ठकुराइन एकांकी प्रतिनिधि माना जाना चाहिए। इस एकांकी की कलात्मक उद्भावना में रंगमंचीय तत्व इस प्रकार समन्वित हैं कि इसके पूरे सौन्दर्य को रंगमंच के सन्दर्भ में ही ग्रहण किया जा सकता है। इसका दृश्य विधान मौलिक और यथार्थ है। 

मम्मी और ठकुराइन का घर गली आमने-सामने है और गली दूर तक दिखाई देती है। प्रस्तुत एकांकी में हमारे सामाजिक जीवन में विशेष स्थिति आधुनिक और प्राचीन परम्परा संघर्ष पर आधारित है। इसी कारण यथार्थ का आग्रह इसमें सहज ही है। परन्तु इस यथार्थ में अनुकरणात्मक नीरसता और व्यंग्यात्मक तीखेपन की अपेक्षा कलात्मक अनुभव पर पहुँचाने का आग्रह निहित है। 

लेखक ने इसके लिए गली और उसके परिवेश आधुनिक मम्मी और प्राचीन संस्कारों की ठकुराइन को साधारण यथार्थ से अधिक गहरा रंग प्रतीकार रूप में लेने का प्रयत्न किया है और इसमें उसे सफलता मिली है। प्रसंग-दृश्य के अन्त में । लोकगीत भी रखा गया है जो भावना को तीव्रतर करता है। 

भावपक्ष की समीक्षा करते हुए कहते हैं। मम्मी ठकुराइन एक मार्मिक एकांकी है। जीवन की स्थितियों के चित्रण के माध्यम से ही लेखक ने नारी की सहज हार्दिकता की अभिव्यक्ति की है।