अंधेर नगरी की पाँच विशेषताएँ लिखिए - andher nagari ki visheshtayen

Post Date : 18 May 2022

अन्धेर नगरी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध कृति है। जिसे उन्होंने स्वयं प्रहसन या हास्य नाट्यकृति कहा है। वस्तुतः इसमें हास्य व्यंग्य का प्राधान्य है तथा इसका नायक धूर्त प्रकृति का है। प्रहसन संस्कृत नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटक के दस प्रकारों में से एक है। किन्तु बाबू हरिश्चन्द्र ने प्रहसन के सभी लक्षणों को न अपनाकर पुरातन और नवीन का सम्मिश्रण करके इस रचना को प्रस्तुत किया है।

अंधेर नगरी की पाँच विशेषताएँ लिखिए 

अंधेर नगरी की पाँच विशेषताएँनिम्नलिखित हैं - 

  1.  वस्तु - विन्यास
  2. चरित्र-चित्रण
  3. संवाद-योजना
  4. भाषा 
  5. हास्य और व्यंग्य 

1. वस्तु - विन्यास

नाटककार ने प्रस्तुत नाटक की कथावस्तु को छः दृश्यों में बाँट दिया है। प्रथम बाह्यप्रान्त है। जहाँ गुरूजी अपने शिष्यों को शिक्षा के लिए प्रेरित करते हैं तथा लोभ-त्याग का उपदेश देते हैं। दूसरा बाजार का दृश्य है जहाँ प्रत्येक चीज टके सेर बेची जा रही है, 'टेक सेर भाजी टके सेर खाजा।

जहाँ मेवा-मिठाई टके सेर हैं वहाँ शाक-भाजी भी इसी भाव है। चेला गोवर्धनदास का मन लुब्ध हो जाता है। वह जीभरकर मिठाई खाने को खरीदता है। तीसरा दृश्य जंगल का है जहाँ गोवर्धनदास अन्धेर नगरी की विशेषताएँ गुरुजी से बखान करता है।

चौथा दृश्य राजसभा का है जहाँ मूर्खाधिपति राजा विराजमान है और न्याय के नाम पर अपनी दुर्बुद्धि का परिचय दे रहा है। पाँचवाँ दृश्य पुनः जंगल तथा छठा श्मशान का है जहाँ गुरु की चतुराई से शिष्य के प्राण बच जाते हैं परन्तु मूर्ख राजा नष्ट हो जाता है। 

इस प्रकार के कथानक में वैसे गम्भीरता भले दिखाई न पड़े किन्तु तत्कालीन परिस्थितियों पर चोट करने के लिए सक्षम है तथा उन परिस्थितियों की आज भी उपस्थिति इस कथानक की प्रासंगिकता सिद्ध करती है। इसका कथा-विन्यास आधुनिक नाट्यकला का आधार कहा जा सकता है।

अन्धेर नगरी नाटक की रंगमंचीयता अथवा रंग विधान-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सहज और सुलझे विचारों के सहृदय साहित्यकार थे। लोक-जीवन के स्पन्दन तथा लोक-अभिरुचि का उनको पूरा जहां समसामयिक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से पूरी तरह जुड़े हुए थे, अन्दाज था।

वहाँ के स्वांग, होली, रसिया, नोटंकी, लोकनृत्य, लोकगीत आदि में भी अभिरुचि रखते थे। यद्यपि उन्होंने अपने विचारों को जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिए कई विधाओं को माध्यम बनाया, वे नाटक को इस कार्य में शक्तिशाली माध्यम समझते थे। 

हास्यपूर्ण नाटक अथवा नाटकों में हास्यपूर्ण विधानों की माँग जन-साधारण को अधिक रहती है। प्रस्तुत प्रहसन तो हास्य रूप ही है। हमें लोक जीवन में प्रचलित कई चीजों का सम्मिश्रण मिल जायेगा । राजसभा के दृश्य को स्वांग शैली में प्रस्तुत किया गया है, पद्यात्मक सेवाओं में पारसी थियेटर को आधार बनाया गया है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटकों को रंगमंच के सर्वथा अनुकूल पाया जाता है। वे यह चाहते थे कि नाटक खेले अवश्य जायें । वे स्वयं भी कभी-कभी अभिनय में हाथ बटाया करते थे। उन्होंने नाटक को पाठक की वस्तु नहीं माना। उनकी हार्दिक इच्छा तो यही थी कि नाटक लिखे ही इसलिए जाएँ कि उनका मंचन हो।

अन्धेर नगरी नाटक में कथ्य, संवाद-योजना, दृश्य-विधान, भाषा-शैली आदि की दृष्टि से रंगमंच पर कोई कठिनाई नहीं होती। बाजार का दृश्य भी बड़ी आसानी से सम्पन्न किया जा सकता है। यद्यपि देशकाल के आधार पर कुछ वस्तुओं के विक्रय में जोड़ना-घटाना चल सकता है। 

किन्तु यदि यथावत भी रखें तब भी कोई अप्रासंगिकता नहीं आ सकती। बाजार में चने जोर गरम' की आवाज के प्रति भी लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। अन्धेर नगरी में घासीराम गाता है। 

चने बनावें घासीराम, जिनकी झोली में दुकान । 
चना चुरमर बुरमुरे बोले, बाबू खाने को मुँह खोले ।। 
चना खावै तौकी मैना। बोले अच्छा बना चबैना। 
चना खायँ गफूरन मुन्ना। बोले और नहीं कुछ सन्ना ।

यह गान लोकरुचि के अनुकूल है। इसमें गफूरन और मुन्ना का स्थान आज फिल्मी नायिकाओं ने ले लिया है। अतः उसमें उतना जोड़ा जा सकता है। पचलोना चूरन बेचने वाला भी सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है कि उसका चूरन भी गरीब-अमीर, हाकिम-रईस, पुलिस-एडीटर सभी की चाहत की चीज है।

राजसभा के दृश्य का अभिनय बड़ी सफलतापूर्वक किया जा सकता है, उसमें भी कहीं कोई पेचीदगी अथवा असम्भावना के दर्शन नहीं होते। राजा की मूर्खता का प्रत्यक्षीकरण ही वहाँ उद्दिष्ट है। राजा का असम्बद्ध वार्तालाप तथा अपराधियों की पेशी ही उस दृश्य का आकर्षण है। 

इसके अतिरिक्त अरण्य और श्मशान के दृश्यों में मंच-सज्जा के लिए विशेष सामग्री की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। प्रस्तुत नाटक का मंचन कितनी ही बार हो चुका है। इसकी कोई गणना नहीं। आजकल भी प्रमुख रंगकर्मी संस्थाओं के द्वारा इसका मंचन नई व्यवस्था के साथ हुआ है। इस अर्थ में इस नाटक में इतना लचीलापन है कि इसको अभीप्सित रूप में प्रस्तुत करके भी इसके मूल पर कोई असर नहीं पड़ता।

2. चरित्र-चित्रण

प्रस्तुत नाटक का प्रधान पात्र राजा है, जो मूर्खता के अतिरिक्त कुछ भी प्रदर्शित नहीं करता। यद्यपि नाटककार ने अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी सरकार पर भी व्यंग्य किया है, इस प्रकार यह राजा तत्कालीन शासक वर्ग का ही प्रतिनिधि बन जाता है। राजा में कोई भी चारित्रिक गुण दृष्टिगत नहीं होता सिवाय राजपद के, जो उसने किसी तरह हस्तगत कर लिया है। 

राजा की गरिमा के अनुकूल उसका कोई आचरण नहीं है। वह भीरू प्रकृति का है। मंत्री के पान खाइये, महाराज के सम्बोधन में सूर्पनखा की भ्रान्ति से व्याकुल हो उठता है। वह मद्यप भी है, राजसभा में भी वह नौकरों से शराब मँगवाता है। उसकी न्याय-व्यवस्था कैसी है इसका अनुमान उसके कथन से ही लगाया जा सकता है। 

वह फर्यादी से कहता है - चुप रहो, तुम्हारा न्याय यहाँ ऐसा होगा जैसा जम के भी यहाँ नहीं होगा। वह वस्तुतः न्याय की स्थूल बातों को भी नहीं जानता। उसके मन में जो बातें आती हैं, वैसे ही कह देता है। अपराधी कोई है, दण्ड के लिए दूसरे को बुलाता है। 

इसकी मूर्खता का परिणाम अन्ततः उसी के समक्ष आता है और वह अपना ही सर्वनाश कर लेता है तथा स्वयं फाँसी के फन्दे को अपने गले में लगवाता है।

नाटक में गुरु और उनके दो शिष्यों की भी प्रभावशाली भूमिका है। गुरु जहाँ अधिक अनुभवी, समझदार, दुनियादारी की नीति-रीति में प्रवीण तथा सूझ-बूझ के व्यक्ति हैं, वहीं उनका एक शिष्य गोवर्धनदास अपरिपक्च, लालची, पेटू तथा स्वार्थी है। 

अन्धेर नगरी में जाकर वह यह भूल जाता है कि वह एक साधू है, उसे लोभ तथा जिह्वा के स्वादों से परांगमुख रहना चाहिए। गुरु जी उसे भिक्षा के लिए जाते समय उपदेश देते हैं। 

लोभ पाप को मूल है, लोभ मिटावत मान।
लोभ कभी नहिं कीजिए, या मैं नरक निदान।।

गोवर्धनदास जब अन्धेर नगरी में सब माल-मिठाई टका सेर पाता है तब उसका सारा ज्ञान रफूचक्कर हो जाता है। वह गुरू के उपदेश को स्मरण नहीं रखता और लोभासक्त हो जाता है गुरु जी के बार-बार समझाने पर भी वह उस नगरी को छोड़कर उनके साथ नहीं जाना चाहता। गुरुजी उसे समझाते हैं। 

सेत सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास । 
ऐसे देस कुदेस में, कबहुँ न कीजै वास ।। 
कोकिल बायस एक सम, पण्डित मूरख एक। 
इन्द्रायन दाडिम विषय, जहाँ न नेकु विवेक।।
बसिये ऐसे देस नहिं, कनक वृष्टि जो होय। 
रहिए तो दुख पाइये, प्रान दीजिए रोय।।

सो बच्चा चलो यहाँ से। ऐसी अन्धेर नगरी में हजार मन मिठाई मुफ्त की मिले तो किस काम है ? यहाँ एक क्षण नहीं रहना।

गोवर्धनदास को टके सेर मिठाई के सामने कोई ज्ञान और उपदेश नहीं सूझता, वह गुरु की आज्ञा का उल्लंघन कर देता है जिसका उसे बड़ा बुरा परिणाम देखना पड़ता है। गुरु जी की क्षमाशील प्रकृति है। वे इस बात की चिन्ता नहीं करते कि शिष्य ने उनकी आज्ञा का अनादर किया है। 

वे शिष्य का बालकत्व समझकर उस पर ध्यान नहीं देते। अतः जब शिष्य पर संकट पड़ता है तब वे श्मशान में उपस्थित होते हैं। वे अपनी सूझ-बूझ से शिष्य को तो बचा लेते हैं साथ ही अन्धेर नगरी के राजा को समाप्त कर देते हैं। इस प्रकार गुरु-शिष्य के चरित्र-चित्रण को नाटक में बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। 

गुरु और शिष्य के परस्पर सम्बन्धों के परिपालन में भी सावधानी बरती गई है। इन पात्रों के अतिरिक्त भी मंत्री आदि हैं जो राजा के इर्द-गिर्द रहते हैं तथा उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं अथवा वही ठकुर सुहाती कहने के आदी हैं। इसी में उनका स्वार्थ सम्पादन होता है। 

नाटककार ने बाजार के दृश्य द्वारा भी कई व्यक्तियों को मंच पर प्रस्तुत किया है जिनमें घासी राम, नारंगी वाली, हलवाई, पाचक वाला, कुंजड़िन, मुगल, मछली वाली, ब्राह्मण आदि हैं। ब्राह्मण जात वाला है जो टके सेर जाति बेच रहा है। उसके द्वारा टके द्वारा होने वाले धर्म-परिवर्तन पर भी प्रकाश डाला गया।

3. संवाद-योजना

अन्धेर नगरी की संवाद-योजना रोचक है। संवाद छोटे-छोटे, नाटकीय एवं सजीव हैं। उनमें गत्यात्मकता तथा व्यंग्य का पुट है। नाटककार ने पात्रानुकूल संवाद-योजना बनाई है। छोटे-छोटे संवाद भी प्रसंगानुकूल एवं स्थिति-चित्रण के मददगार हैं। जैसे

गोवर्धनदास - क्यों भाई बनिये, आटा कितने सेर ? 

बनियाँ - टके सेर! 

गोवर्धनदास - औ चावल 

बनियाँ टके सेर 

गोवर्धनदास - औ चीनी 

बनियाँ टके सेर 

गोवर्धनदास - सब टके सेर ! सचमुच ! 

बनियाँ हाँ, महाराज, क्या झूठ बोलूँगा ?

गोवर्धनदास क्यों माई, भाजी क्या भाव ? 

कुजड़िन - बाबा जी, टके सेर। निबुआ, मुरई, धनियाँ, मिरचा, साग सब टके सेर। राजसभा के मध्य फरियादी और राजा तथा मंत्री के संवाद हास्य-व्यंग्य प्रधान हैं, जिसे दर्शक सुनकर तथा मंच पर अभिनीत होते देख अपनी हँसी नहीं रोक सकता।

फरियादी - महाराज ? कल्लू बनियाँ की दीवार गिर पड़ी सो मेरी बकरी उसके नीचे दब गई। दोहाई है महाराज, न्याय दो।

राजा - कल्लू बनिये की दीवार को अभी पकड़ लाओ। 

मंत्री - महाराज, दीवार नहीं लाई जा सकती। 

राजा - अच्छा, उसका भाई, लड़का, दोस्त, आशना जो हो उसको पकड़ लाओ। 

मंत्री - महाराज, दीवार ईंट चूने की होती है, उसका भाई-बेटा नहीं होता। 

राजा - अच्छा कल्लू बनिये को पकड़ लाओ।

इस प्रकार हास्य रस की संसृष्टि करने वाले कथन हैं। कुछ संवाद ही बड़े हैं अन्यथा बहुत छोटे-छोटे कथन ही हैं।

4. भाषा 

संवादों में प्रयुक्त भाषा बोलचाल के निकट है फिर भी कहीं खड़ी बोली गद्य का रूप है, तो कहीं ब्रजभाषा का मिश्रण है। गीत और कविता में ब्रजभाषा के ही शब्द प्रयुक्त हैं तो गद्यमय संवादों में खड़ी बोली का प्रयोग है। भाषा को पात्रानुकूल बनाने का विशेष ध्यान रखा गया है जिससे उसमें सहजता दृष्टिगत होती है। महन्त की भाषा सधुक्कड़ी ही है। 

महन्त - बच्चा, नारायणदास, यह नगर तो दूर से बड़ा सुन्दर दिखलाई पड़ता है, देख कुछ भिक्षा-उच्छा मिले तो ठाकुर जी को भोग लगै। और क्या।

इसके अतिरिक्त भाषा में लोक-व्यवहार के प्रचलित शब्दों का प्रयोग भी किया है। उसमें किसी प्रकार की कृत्रिमता तथा बनावटीपन की गन्ध नहीं आती।

5. हास्य और व्यंग्य

प्रस्तुत नाटक में नाटककार का मूल उद्देश्य मनोरंजन मात्र कराना नहीं रहा है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी शासन पर व्यंग्य करना तथा देशवासियों को प्रतिबोधित करना रहा है। नाटक में जहाँ भी उन्होंने हास्य-व्यंग्य का पुट दिया है, वहाँ धीरे से विदेशी शासन पर अवश्य ही फबती कसी है। चने बेचने वाला अपने गाने में हाकिमों पर चुटकी लेता है

चना हाकिम सब जो खाते। 
सब पर दूना टिकस लगाते।।

कुंजड़िन के मुँह से भी देशवासियों को कचोटने वाली बात कही गई है। 

जैसे काजी वैसे पाजी। 
रैयत राजी टके सेर भाजी।
ले हिन्दुस्तान का मेवा फूट और बेर ।। 

पाचक वाला भी व्यंग्यपरक शब्दावली का प्रयोग करता है जिसका संकेत भी विलायती शासन की ओर है। 

हिन्दू चूरन इसका नाम, 
विलायतन पूरन इसका काम । 
चूरन अमले सब जो खावै । 
दूनी रिश्वत तुरन्त पचावै। 
चूरन साहब लोग जो खाता,
सारा हिन्द हजम कर जाता।। 

महन्त (गुरु) भी तत्कालीन नीति व्यवस्था पर प्रहार करता है। 

बसिये ऐसे देस नहिं, कनक वृष्टि जो होय। 
रहिये तो दुख पाइये, प्रान दीजिए रोय ।। 

राजसभा के मध्य हास्यपूर्ण उक्तियाँ तथा संवाद हैं - जब गोवर्धनदास को प्यादा पकड़ लेता है तो वह पूछता है - फाँसी! अरे बाप रे बाप, फाँसी। मैंने किसकी जमा लूटी है कि मुझको फाँसी। मैंने किसके प्राण मारे कि मुझको फाँसी!

दूसरा प्यादा - आप बड़े मोटे हैं। इस वास्ते फाँसी होती है।

राजा की असम्बद्धता प्रलाप सदृश भाषा एवं शब्दावली भी हास्य की सृष्टि करती है। स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों का उल्लेख राजा की कम अक्ली तथा गोवर्धनदास का लोभ और संकट भी हास्य-रस का संचार करते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि इस नाटक द्वारा जहाँ जन-साधारण का स्वस्थ मनोरंजन होता है वहाँ इसमें छिपी प्रेरणा से भी साक्षात्कार है। देश तथा समाज की स्थिति-परिस्थिति का परिज्ञान होता है तथा चिन्तन के राष्ट्रोन्मुखी होने के लिए दिशा-निर्देश मिलता है।

इस नाटक की लोकप्रियता का उदाहरण यही है कि यह आज भी उसी रूप में प्रस्तुत भी अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने में सक्षम है तथा इसके आधार पर अन्य प्रहसन भी लिखे गये। इस अर्थ में यह नाटक प्रेरणा स्त्रोत भी रहा है।