प्राथमिक क्रियाकलाप किसे कहते हैं

आवश्यकता अविष्कार की जननी है। बहुत समय तक मानव अपनी प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रकृति प्रदत्त मूलभूत समाधनों जैसे- वायु - जल-मांस - कंदमूल फल आदि का उपयोग करता रहा जैसे-जैसे मनुष्य की बुद्धि का विकास हुआ उसी के अनुरूप उसकी आवश्यकताएँ भी बढ़ती गईं। 

प्राथमिक क्रियाकलाप किसे कहते हैं

ये वे व्यवसाय हैं जिनके द्वारा मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों से सीधे भोजन, वस्त्र, आवास तथा अन्य सुविधाएँ प्राप्त करता है । इनका सीधा संबंध प्राकृतिक वातावरण की दशाओं से होता है। 

वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना, घास के मैदानों में पशु चराना, नदियों, झीलों व समुद्रों से मछली पकड़ना, पशुओं दूध, माँस, खालें आदि प्राप्त करना, उपजाऊ मैदानी भागों में कृषि करना तथा खानों से खनिज निकालना आदि प्राथमिक व्यवसायों के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

प्राथमिक क्रियाकलाप किसे कहते हैं

प्राथमिक क्रिया-कलाप में संलग्न लोगों का वितरण विश्व के सभी भागों में समान नहीं हैं। विकसित देशों में प्राथमिक व्यवसाय में कार्यरत लोगों की संख्या 5 प्रतिशत से भी कम है जबकि विकासशील देशों में अधिकांश जनसंख्या प्राथमिक क्रिया-कलापों में संलग्न है। 

प्राथमिक क्रियाकलाप के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख व्यवसाय आते हैं - 

1. संग्रहण तथा निष्कर्षण  - मनुष्य अपनी मूल आवश्यकताओंभोजन, वस्त्र और आवास की पूर्ति हेतु भौतिक पर्यावरण से विभिन्न प्रकार की अनेक वस्तुएँ एकत्र करता है । इस एकत्रीकरण क्रिया को ही संग्रहण व्यवसाय कहा जाता है। 

इस प्रकार विभिन्न वस्तुओं के संग्रहण द्वारा मनुष्य अपना जीवन-यापन कर लेता है। इस संग्रहण व्यवसाय में वनोपज संग्रहण सर्वप्रमुख है । 

वनों से भोजन के लिए कन्द-मूल-फल, वस्त्रों के लिए छाल, पत्तियाँ, घास, बाँस, लताएँ आदि तथा आवास के लिए लकड़ी, बाँस आदि, औषधियों के लिए जड़ीबूटियाँ, ईंधन के लिए लकड़ी, चमड़ा रंगने के पदार्थ, मोम, गोंद, रबड़, बिरोजा आदि का संग्रहण किया जाता है। इन सभी पदार्थों के संग्रहण में लगे हुए लोग भूमध्य-रेखीय प्रदेश में प्रमुखता से पाये जाते हैं। 

अन्य क्षेत्र मानसूनी प्रदेश तथा भूमध्य-सागरीय प्रदेश हैं। भूमध्य रेखीय प्रदेश में गिरिफल, सिनकोना की छाल, पेय पदार्थों के बीज, पत्तियाँ, विभिन्न प्रकार की गोंदें, रबड़, जड़ी-बूटियाँ एवं अनेक प्रकार के कन्द-मूल-फल होते हैं । मानसूनी प्रदेशों में अनेक प्रकार के बीज, पेय पदार्थ (कोको, चाय), गोंद, रबड़, घास आदि एकत्रित किये जाते हैं। भूमध्य-सागरीय प्रदेश में कार्क, जैतून, फल आदि हैं। 

कार्क के सम्पूर्ण विश्व के कुल उत्पादन का अधिकांश भाग पुर्तगाल, फ्रांस, इटली और उत्तरी-पश्चिमी अफ्रीका (भूमध्य-सागरीय क्षेत्र) में संग्रहित किया जाता है। शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों में संग्रहण कार्य नगण्य है। यहाँ चीड़, परतल तथा देवदार वृक्षों से बिरोजा तथा कुछ अन्य पदार्थ एकत्रित किये जाते हैं। 

पेड़-पौधों के तनों में कटाव लगाकर रस अथवा दूध एकत्रित करने की प्रक्रिया को निष्कर्षण कहते हैं। रबड़ इसका उत्तम उदाहरण है।

2. आखेट एवं मत्स्य व्यवसाय  - प्राचीन काल से मानव अपनी उदर पूर्ति पशु-पक्षियों का शिकार कर एवं मछली पकड़कर करता आया है। आज तो मत्स्य व्यवसाय बहुत उन्नत व्यवसाय है और हमारी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग इस व्यवसाय को अपनाये हुए है। पशु-पक्षियों का शिकार करने का व्यवसाय विरली जनसंख्या वाले क्षेत्रों में ही सम्भव है। 

इसीलिये भूमध्य-रेखीय वनाच्छादित प्रदेशों में तथा अति कठोर शीत जलवायु वाले क्षेत्रों में यह व्यवसाय प्रमुख है। इन क्षेत्रों में आदिम जातियाँ अपना भरण-पोषण पशु-पक्षियों का आखेट करके व मछलियों को पकड़कर करते हैं । 

ये जातियाँ चलवासी तथा अर्द्ध-चलवासी - यापन करती हैं। इनमें प्रमुख जायरे के पिग्मी, टुण्ड्रा प्रदेश के एस्किमोज और समोयड्स हैं। जीवन

3. खनन व्यवसाय - खनन-व्यवसाय भी मनुष्य के प्राचीनतम व्यवसायों में से एक है। अत: खनन व्यवसाय को मानवीय सभ्यता का आधार माना जाता है। मनुष्य ने औजारों, बर्तनों एवं अस्त्र-शस्त्रों तथा आवास- गृहों को बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के खनिजों का उपयोग किया है। 

ये खनिज पदार्थ खनन प्रक्रिया द्वारा प्राप्त होते हैं । प्राचीन काल में यह व्यवसाय स्थायी एवं व्यवस्थित न था, किन्तु औद्योगिक क्रान्ति ने खनिजों की बड़ी व्यापक माँग उत्पन्न करके इस व्यवसाय को स्थायित्व प्रदान किया तथा आज यह व्यवसाय बहुत बड़े पैमाने पर एवं व्यवस्थित रूप में संचालित है। विश्व की कुल श्रमिक शक्ति का लगभग एक प्रतिशत भाग खननव्यवसाय में लगा हुआ है।

4. पशुचारण एवं पशुपालन व्यवसाय – कृषि व्यवसाय से पूर्व मनुष्य का प्रमुख व्यवसाय पशुचारण तथा पशुपालन था। आज भी विश्व के अनेक भागों के लोग इस व्यवसाय को अपनाये हुए हैं। इस व्यवसाय के अन्तर्गत पशुओं से दुग्ध, मांस, चर्म, सींग आदि वस्तुएँ प्राप्त की जाती हैं। 

अनेक पशु बोझ ढोने के काम भी आते हैं, जैसे— बैल, भैंसा, याक आदि । इन पशुओं के लिए उत्तम चारागाह व पर्याप्त जल की आवश्यकता होती है। 

अतः इस व्यवसाय का विकास उन क्षेत्रों में हुआ है जहाँ पर्याप्त घास हो, जनसंख्या विरल हो तथा कृषि के लिए पर्याप्त वर्षा न होती हो । ऐसी भौगोलिक परिस्थितियाँ निम्नलिखित चार प्रदेशों में पायी जाती हैं।

5. लकड़ी काटने का व्यवसाय - वनों में तथा वनों के निकट निवास करने वाले लोग लकड़ी काटने का व्यवसाय अपनाये हुए हैं । लकड़ी काटने के व्यवसाय के अन्तर्गत वृक्ष काटना, लट्ठे बनाना और वन क्षेत्र से कारखानों तक परिवहन करना आदि सम्मिलित हैं। 

इस व्यवसाय में आधुनिक विकसित विधियों को अपनाकर इसे उन्नत बनाया गया है। इस व्यवसाय द्वारा वनों से आवश्यकता वाले क्षेत्रों को लकड़ी की पूर्ति की जाती है ।

लकड़ी काटने का व्यवसाय उष्ण कटिबन्धीय वनों तथा शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों दोनों में विकसित हुआ है। यह व्यवसाय शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों (टैगा वनों) में सर्वाधिक विकसित हुआ है । कोणधारी वन विश्व के कुल वन क्षेत्र के लगभग 35% भाग पर फैले हैं। इन वनों से विश्व की कुल चीरी हुई लकड़ी का लगभग 80% भाग प्राप्त होता है ।

6. कृषि  – मनुष्य के व्यवसायों में कृषि सर्वप्रथम प्राथमिक व्यवसाय है। मनुष्य के स्थायी निवास के साथ-साथ कृषि व्यवसाय का विकास हुआ। संग्रहण-आखेट तथा पशु-पालन व्यवसाय से बढ़ती हुई जनसंख्या की प्राथमिक आवश्यकताओं की आपूर्ति हो पाना सम्भव न था। 

अतः मानव ने भोजन योग्य बीजों का चयन किया और उन्हें अधिक मात्रा में उपयुक्त भू-खण्ड पर बोकर कृषि करना प्रारम्भ किया। धीरेधीरे इस कार्य से उसे आशा से अधिक लाभ होने लगा और जीवन को स्थायित्व मिला। अतः इस व्यवसाय को धरातल के अधिकांश भाग में अपनाया गया। 

कृषि व्यवसाय से, खाद्यान्नों से लेकर औद्योगिक कच्चा माल तक प्राप्त किया जाता है। आज विश्व की 75% जनसंख्या इस कार्य में लगी हुई है। अविकसित तथा अर्द्ध- विकसित देशों में परम्परागत ढंग से कृषि की जाती है, किन्तु विकसित देशों में कृषि व्यवसाय बहुत उन्नत हो चुका है। 

इसमें वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग, मशीनों एवं यन्त्रों का उपयोग तथा रासायनिक उर्वरकों, औषधियों के प्रयोग ने इस व्यवसाय को बहुत अत्यधिक लाभकारी बना दिया है। इस प्रकार की उन्नत कृषि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अर्जेण्टाइना और दक्षिणी-पूर्वी आस्ट्रेलिया में की जाती है ।

भूमि अथवा मृदा को जोतने, बीज बोकर बीज उत्पन्न करने सहायक के रूप में पशु पालने, मत्स्याखेट करने एवं वानिकी की संपूर्ण कार्य प्रणाली की कला एवं विज्ञान को कृषि कहते हैं।

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