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भ्रमरगीत सार की व्याख्या - रामचंद्र शुक्ल

 यहां इस पोस्ट में हमने लिखा है। M.A. हिंदी साहित्य के सिलेबस में दिए गए भ्र्मर गीत सार के पद के व्याख्या है।  bhrmar geet sar surdas ke pad

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल भ्रमर गीत सार : सूरदास

श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति

1. राग सारंग

पहिले करि परनाम नंद सो समाचार सब दीजो। 
औ वहां वृषभानु गोप सो जाय सकल सुधि लीजो।। 

श्रीदाम आदिक सब ग्वालन मेरे हुतो भेंटियो। 
सुख-सन्देस सुनाय हमारी गोपिन को दुख मेटियो।। 

मंत्री एक बन बसत हमारो ताहि मिले सचु पाइयो। 
सावधान है मेरे हुतो ताही माथ नावाइयो।। 

सुंदर परम् किसोर बयक्रम चंचल नयन बिसाल। 
कर मुरली सिर मोरपंख पीताम्बर उस बनमाल।। 

जनि डरियो तुम सघन बनन में ब्रजदेवी रखवार। 
वृंदावन सो बसत निरन्तर कबहूँ न होत नियार।। 

उध्दव प्रति सब कहीं स्यामजू अपने मन की प्रीति। 
सुन्दरदास किरण करि पठए यहै सफल ब्रजरीति।।

शब्दार्थ - परनाम = प्रणाम, दीजो=देना, वृषभानु गोप = राधा के पिता, सकल = सम्पूर्ण, हुतो=ओर, माथ नवाइयो = मस्तक झुकना, वयक्रम = अवस्था, जनी-मत रखवार = रक्षा करने वाला, नियार=पृथक, प्रति=से, ब्रजरिति=ब्रज की पद्धति।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम्. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं, इस पद्यांश के सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - सूरदास जी के द्वारा रचित यह भ्रमर गीत सार का पहला पद है, इस पद के माध्यम से सूरदास जी ने बताया है  की श्री कृष्ण को अपने  माता-पिता और गोपिकाओं की याद आ गई है और इसी कारण वह अपने ज्ञानी सखा उद्धव को दूत बनाकर ब्रजवासियों और प्रियजनों की कुशल क्षेम ज्ञात करने के लिए भेज रहे हैं और उद्धव वहाँ पहली बार जा रहें हैं तो वहाँ की रीति-नीति से उन्हें अवगत करा रहे हैं। 

व्याख्या - सूरदास जी ने लिखा है श्री कृष्ण उद्धव को समझाते हैं कि ब्रज पहुँचने पर तुम सबसे पहले नंद बाबा को प्रणाम करके सब समाचार कह देना। 

नंद यहां एक तो श्री कृष्ण के पिता हैं और इसलिए पूज्य हैं और दूसरे वहां  के राजा हैं और सबसे अधिक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। उन्हें  प्रणाम करना स्वभाविकता और औपचारिक्ता दोनों की दृष्टि से ही उपर्युक्त है और उसके बाद सारे समाचार दे देना। 

सारे समाचार से तात्पर्य यह है कि पहले तो यह बताये की आप कौंन हैं फिर श्री कृष्ण की व्यस्तता का कारण बताये राज कार्य की जटीलता के कारण गोकुल आने की असमर्थता बताएं। और श्री कृष्ण कहते हैं की ये सब बात होने के बाद राधा के पिता वृषभानु गोप के पास जाकर उनके सम्पूर्ण कुशलक्षेम मालुम करना। 

यहां पर देखिये वृषभानु का सारा समाचार नंद के यहां से प्राप्त हो सकती थी किन्तु उनके यहां जाकर सुधी लेने मतलब खबर लेने को सूरदास जी ने रहस्य रखा है वह रहस्य यह है कि वृषभानु की कन्या राधा वहां मिलेगी स्वभाविक है की वह वृषभानु के यहां जाने पर राधा की स्थिती सुख दुःख आदि की दशा तथा कृष्ण विरह के प्रभाव आदि की दशा का पता चल जाएगा। इसके पीछे यही भाव निहित प्रतीत होता है। 

आगे श्री कृष्ण कहते हैं मेरी ओर से श्री दामा (सुदामा) आदि से मिलकर स्नेह से प्रणाम करना और साथ ही 
गोपियों को हमारा सुख संदेश अर्थात कुशल समाचार सुनाकर उनके विरह जन्य दुःख संताप को दूर करना। 

यहां श्री कृष्ण ने सूदामा का नाम ले दिया है लेकिन आगे आदिक लगा दिया है आदिक में उनके और सखा आ जाते हैं जिनके उल्लेख सुर ने स्यता, पयता, मना, मनसुखा आदि नामो से किया है। और उसके बाद गोपियो की बारी आती है गोपियाँ विरह से व्यतीत होंगी उन्हें जब यह पता चलेगा की श्री कृष्ण उनके प्रिय उनके सतत स्मृति को संजोये हुए हैं तो उन्हें सुख मिलेगा।

जब प्रेमी को यह पता चलता है की उसका प्रिय भी उसकी याद में तड़प रहा है तो उसको बड़ा सुख मिलता है वो संतोष प्राप्त होता है की आखिर वह भी मेरे तरह जल रहा है। श्री कृष्ण आगे कहते हैं। 

वहां वन में हमारा एक मंत्री रहता है यहां मंत्री का अभिप्राय राधा से है। श्री कृष्ण कहते हैं की उनसे मिलकर सुख प्राप्त करना जब तुम उसके सम्मुख जाओ तो हमारी ओर से मस्तक नवाकर प्रणाम करना। 

श्री कृष्ण का उध्दव को सावधान करने का कारण यही है की वह कही राधा से मिलकर भ्रम में न पड़ जाय क्योकि वह उनका ही वेश धारण करके वहां विचरती रहती है। 

श्री कृष्ण कहते हैं की हमारा वह मंत्री अत्यंत सुंदर एवं किशोरावस्था का है उसके नेत्र चंचल और बड़े बड़े हैं।
वह हाँथ में मुरली सिर पर मोर पंख शरीर पर पीतांबर और हृदय में अर्थात गले में वनमाला धारण करता है। 

श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं की हमारा जो मंत्री है वह अत्यंत सघन वन में निवास करता है। तुम जाकर उससे मिलना और वन में जाने से डरने का कोई कारण नहीं है इसलिए मत डरना क्योकि वहां ब्रजदेवी सबकी रक्षा करती हैं। इसलिए चिंता का कोई कारण नहीं है। 

वह ब्रजदेवी सदा वृन्दावन में निवास करती है  और वहां से कभी पृथक नही होती इस प्रकार श्री कृष्ण ने उद्धव से अपने मन की समस्त प्रेममयी स्थिती का स्पष्टीकरण किया। सूरदास जी कहते हैं कि इस प्रकार श्री कृष्ण ने कृपा करके उद्धव को सारी ब्रजरीति समझाकर ब्रज भेजा और उनसे कहा की वह इसी प्रकार का व्यवहार करे। 

2. राग सोरठ

कहियो नंद कठोर भए। 
हम दोउ बीरै डारि पर घरै मानो थाती सौंपि गए।। 

तनक-तनक तैं पालि बड़े किए बहुतै सुख दिखराए। 
गोचारन को चलत हमारे पीछै कोसक धाए।। 

ये बसुदेव देवकी हमसों कहत आपने जाए। 
बहुरि बिधाता जसुमतिजू के हमहिं न गोद खिलाए।। 

कौन काज यह राज, नगर को सब सुख सों सुख पाए ?
सूरदास ब्रज समाधान करूं आंजू काल्हि हम आए।।

शब्दार्थ - बीरैं=भाई , पर घरै=दूसरे के घर में, थाती=धरोहर या अमानत, तनक-तनक=छोटे-छोटे से, कोसक=एक कोस, धाये=दौड़े आते थे, बहुरि=फिर, जसुमति=यशोदा माता, समाधान=संतावना या तसल्ली, आजु-काल्हि=आज कल में। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - कृष्ण उद्धव को ब्रज जाने से पहले नंद बाबा के लिए जो कह रहे हैं उसका वर्णन इस पद में किया गया है।

व्याख्या - कृष्ण उद्धव को समझाते हुए कह रहे हैं की हे उद्धव तुम नंद बाबा से कहना की वो इतने कठोर क्यों हो गए हैं। 

हम दोनों भाइयों को अर्थात कृष्ण और बलदाऊ को पराये घर अर्थात मथुरा में हम दोनों से इस प्रकार अलगे जैसे कोई किसी की धरोहर को लौटाकर एकदम से निश्चिंत हो जाता है, और पुनः उसकी कोई खोज खबर नही लेता। कहने का तातपर्य यह है की हम दोनों भाइयों के प्रति उनका अनुराग ही नहीं रह गया है।

आगे श्री कृष्ण कहते हैं की हम जब छोटे-छोटे से थे तब उन्होंने हमारा पालन पोषण किया था पाल पोषकर उन्होंने हम दोनों को अनेक सुख प्रदान किये थे। किन्तु आज उन्हें न जाने क्या हो गया है। जो हमें इस प्रकार विस्मरण कर बैठे हैं। 

और जब हम गाय चराने के लिए वन को जाते थे तो वह हमें छोड़ने के लिए कोष भर हमारे पीछे दौड़े आते थे तब तो हमारे साथ इतना स्नेह था किन्तु अब न जाने उन्हें क्या हो गया है। 

यहां देव और देवकी हमें आत्मज कहते हैं अपना पुत्र कहते हैं ये लोग हमें ब्रम्ह समझ बैठे हैं। 
और कहते हैं की यशोदा माता ने अपनी गोद में नहीं खिलाया। 

श्री कृष्ण आगे कहते हैं की हमने इस नगर के सम्पूर्ण सुखों को भली प्रकार भोग लिया है हमारे लिए यह सुख भोग व्यर्थ है। क्योकि ब्रज के सुखों की तुलना में ये जो सुख है वह महत्वहीन है कोई मूल्य नही। 

सूरदास जी कह रहें हैं की श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं की तुम ब्रजवासियों को हमारा कुशल समाचार कह देना और उनको संतावना देते हुए कहना की हम आजकल में ही अर्थात शीघ्र ही वृन्दावन आकर हम उनसे मिलेंगे। 

विशेष : 

  • सम्पूर्ण पद में स्मृति नामक संचारी भाव का चित्रण अत्यंत मनोरम हुआ है। 
  • ये वसुदेव देवकी पंक्ति में कृष्ण की नवीन नागरिक परिस्थितियों के प्रति विरक्ति नंद यशोदा का वास्तविक माता पिता समझना उनका बालस्वरूप भोलापन आदि विशेषताएं अभिव्यक्त होती हैं। 
  • ये शब्द का प्रयोग कृष्ण का वासुदेव देवकी के प्रति आक्रोश विरक्ति की भावना का परिचायक है और इस प्रकार सम्पूर्ण पद को आकर्षण प्रदान कर रहा है।
  • बहुरि बिधाता जसुमतिजू के हमहिं न गोद खिलाए।। इस पंक्ति का यह अर्थ भी हो सकता है की विधाता ने हमे यशोदा मईया की गोद में पुनः खेलने का अवसर न देकर के परम सुख से वंचित कर दिया है। 
  • प्रस्तुत पद में बालयकालीन मधुर स्मृतियों का यथा तथ्य और हृदय ग्राही वर्णन उपलब्ध होता है।
  • मानो थाती थोप गए में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग किया गया है। 

3. राग बिलावल 

तबहिं उपंगसुत आय गए। 
सखा सखा कछु अंतर नाही भरि-भरि अंक लए।। 

अति सुंदर तन स्याम सरीखो देखत हरि पछताने। 
एसे को वैसी बुधि होती ब्रज पठवै तब आने।। 

या आगे रस-काव्य प्रकासे जोग-वचन प्रगटावै। 
सुर ज्ञान दृढ़ याके हिरदय जुवतिन जोग सिखावै।।

शब्दार्थ - उपंगसुत = उद्धव। अंक लाए = आलिंगन बध्द होकर, भेट। सरीखो = समान। वैसी बुधि = रागात्मक चेतना। आने = अन्य विषयों को लेकर। पठवै = भेजे। या = इसके। रस काव्य = प्रेम की कवित्त्व पूर्ण बातें। प्रकासे = प्रकट करते समय। याके हृदय = इसके हृदय में।

संदर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग- श्री कृष्ण ब्रज को याद करते हुए निम्न हैं और उसी समय उद्धव का आगमन होता है उस समय के बात को इस पद में सूरदास जी ने बताया है।

व्याख्या- श्री क्रृष्ण ब्रज की सुधि में निमग्न हैं, और किसी को ब्रज भेजना चाहते हैं। कृष्ण ब्रज की स्मृतियों में भाव विभोर हो रहे थे। और उसी समय वहाँ उद्धव आ गए। दोनों में शारीरिक रूप से दृष्टिगत अंतर नहीं हो रहा है। और दोनों परस्पर स्नेह पूर्वक आलिंगन बध्द हो गये। एक दूसरे से स्नेहपूर्वक मिले। उद्धव का शरीर अत्यं सुंदर और श्री कृष्ण के समान श्यामदूती वाला था।

ये देखकर श्री कृष्ण मन ही मन पछताये यदि शारीरिक सौंदर्य के साथ बुद्धि और विवेक भी होता तो कितना अच्छा होता अर्थात इसकी बुद्धि ज्ञान पर आधारित न होकर प्रेम मार्गीय भक्ति भावना पर आधारित होती तो उत्तम था और इसीलिए उन्होने उद्धव को किसी अन्य कारण हेतु ब्रज भेजने का निश्चय किया क्योंकि वहां जाने पर ही इनकी योगमार्ग बुद्धि का संस्कार होना सम्भव था और तभी यह प्रेमानुराग भक्ति का भली-भाँति परिपालन कर सके।

यूं तो ऐसे है की यदि इनके आगे प्रेम की सिक्त वाणी सुनाएँ अयोग्य नीरस चर्चा करने लगेंगे और इस प्रकार पक्का श्रोताओं को ऊबा देगी उनके  ह्रृदय में ज्ञान अर्थात योगमार्गी आसन इतने दृढ हैं। यदि इन्हें ब्रज भी भेजा जाये तो ये ब्रजवासियों को भी योग की शिक्षा दीक्षा देना प्रारम्भ कर देंगे। किन्तु सम्भव है वहां गोपियों के अनन्य प्रेमानुराग को देखकर इनका योग खंडित हो जाए और यह प्रेममार्गी महत्ता स्वीकार करके उसे अपना लें।

विशेष -

  1. इस पद के भाव को देखकर लगता है की यह भ्रमर गीत का आरम्भिक पद है। पर शुक्ल जी ने इसे ठीक क्रम में नही रखा।
  2. क्योकि इसी पद में कृष्ण ने अभी उद्धव को ब्रज भेजने का निश्चय किया है।
  3. जबकि पूर्व पदों में उन्हें ब्रजरीति बताई है। भेजने के निश्चय से गोपियाँ किस प्रकार सम्हरती हैं।
  4. वैसी बुद्धि से तात्पर्य प्रेम मार्गी भक्ति से भ्रमर गीत की मूल भावना को अभिव्यक्त करता है वस्तुतः कवि का उद्देश्य उद्धव के माध्यम से प्रेमानुगाभक्ती से प्रतिपादन कराना है।

4. राग घनाश्री

हरि गोकुल की प्रीति चलाई। 
सुनहु उपंगसुत मोहिं न बिसरत ब्रजवासी सुखदाई।।

यह चित होत जाऊँ मैं, अबही, यहाँ नहीं मन लागत। 
गोप सुग्वाल गाय बन चारत अति दुख पायो त्यागत।। 

कहँ माखन-चोरी? कह जसुमति 'पूत जेब' करि प्रेम। 
सूर स्याम के बचन सहित सुनि व्यापत अपन नेम।। 

शब्दार्थ : प्रीति चलाई = प्रेम प्रसंग की चर्चा। सुखदायी = सुखप्रदान करने वाले। यह चित होत = मन करता है। जेंव = खावो। करि प्रेम = प्रेम पूर्ण। आपन नेम = उद्धव का नियम मानकर।

संदर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग :- श्री कृष्ण उद्धव से ब्रजवासियों की प्रेम की चर्चा करते हुए चित्रित किये गए हैं। और उद्धव के आ जाने पर उनके सम्मुख ही श्री कृष्ण  ने  गोकुल का प्रेम प्रसंग छेड़ दिया है।

व्याख्या :- श्री कृष्ण उद्धव के आ जाने के बाद उन्हें गोकुल के प्रेम कथा का वर्णन करते हुए कहते हैं, हे उद्धव सुनो ब्रजवासी और उनके प्रति मेरा प्रेम भुलाये नही भूलता वे मेरे में सदा के लिए बसे रहते हैं।

वे मेरे मन में सदैव बसे रहते हैं क्योंकि उन्होंने मुझे अपने प्रेम से सदा सुख पहुंचाया है और इसी कारण मेरा मन यहाँ नहीं लगता। इक्षा होती है की मैं तुरंत वहां चला जाऊँ वहाँ जाकर गोप ग्वालाओं के साथ वन में गाये चराने जाया करता था। उनसे बिछड़ते समय मुझे अति दुःख हुआ था हे उद्धव आज भी मुझे गोकुल की कई बातें स्मरण हो आती हैं। न तो  अब वह माखन चोरी हैं और न ही अब माता यशोदा के समान अत्यंत आग्रह करके यह कहने वाली है की बेटा यह खा ले।

सूरदास जी कहते है की श्री कृष्ण से सिक्त वस्तुओं को सुनकर भी उद्धव अपने नियम साधना में निमग्न रहे उनका मन अपने योग मार्ग के विधि विधान में डूबा रहा।

श्री कृष्ण के प्रेम मार्ग को महत्व न देकर उन्होंने इसे हेय समझा योग मार्गी उद्धव का प्रेम मार्ग में ध्यान न देना स्वाभाविक ही था। क्योंकि उनकी दृष्टि में प्रेम भावना सांसारिक मोह मात्र ही था। जिसका तिरस्कार करना ही उचित है।

विशेष :- 

  1. हरि गोकुल प्रीति चलाई पंक्ति से यह ध्वनित होता है की कृष्ण प्रेम प्रसंग की चर्चा चलाकर उद्धव के मन में यह थाह ले रहे हैं साथ ही श्री कृष्ण उद्धव को यह भी बता देना चाहते हैं की ब्रज में व्यर्थ ही योमार्ग की चर्चा न चलाये क्योकि इसका कोई परिणाम नही निकलेगा। 
  2. इस पद से स्पष्ट है की श्री कृष्ण ब्रज को भूले नहीं हैं माता यशोदा के स्नेह दुलार के लिए उनका हृदय बार-बार व्याकुल हो उठता है। 
  3. वह उन्हें भूलने में असमर्थ हैं अंत में उनकी प्रेम की दशा स्पष्ट व्यक्त हुई है। 

5. राग रामकली

जदुपति लख्यो तेहि मुसकात। 
कहत हम मन रही जोई सोइ भई यह बात।। 

बचन परगट करन लागे प्रेम-कथा चलाय। 
सुनहु उध्दव मोहिं ब्रज की सुधि नहीं बिसराय।। 

रैनि सोवत, चलत, जागत लगत नहिं मन आन। 
नंद जसुमति नारि नर ब्रज जहाँ मेरो प्रान।। 

कहत हरि सुनि उपंगसुत ! यह कहत हो रसरीति। 
सूर चित तें टरति नाही राधिका की प्रीति।। 

शब्दार्थ:- जदुपति = श्री कृष्ण। लख्यो = देखा। तेहि = उसको अर्थात उद्धव को। जोई = जो। रैनी = रात्रि। आन = अन्यत्र।

संदर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग:- श्री कृष्ण उध्दव से ब्रज के विषय में बात-चित कर रहे हैं।

व्याख्या:- उद्धव श्री कृष्ण की प्रेम दुर्बलता को देखकर मुस्कुरा पड़ते हैं। यह मुस्कराहट उद्धव के सैद्धांतिक विषय की सफल अभिव्यिक्ति थी। जिसे कृष्ण ने ताड लिया। फलतः श्री कृष्ण ने उन्हें उलझाते हुए अपने प्रेम का मोह और खोलकर रखा जिसके पीछे मंत्री पद से संकेतित किया गया है। 

उस राधिका का नाम रति निष्ठा के साथ श्री कृष्ण ने लिया है। जिससे उद्धव  का गर्व पूरे आयाम के साथ अपने कर्तब्य का सारम्भ पाता है। जो काव्य  की प्रबंधता को अत्यंत चुस्त बना देता है। श्री कृष्ण  ने उद्धव को प्रेम प्रसंग की चर्चा में उद्धव को मुस्कुराते हुए देख लिया वो अपने मन में सोचने लगे की हमने उद्धव के विषय में जो धारणा विकसित की थी वह सत्य प्रमाणित हो रही है। 

क्योकि उसका यह मुस्काना स्पष्ट करता है की वह दृढ योग मार्गी है। इतना कहने पर भी उन्होंने अपने मन के भावों को हृदय में दबाए रखा और पुनः ब्रजवासियों के प्रेम प्रसंग की चर्चा प्रारम्भ कर दी वे कहने लगे। हे उद्धव वह ब्रज की स्मृति को भुला पाने में सर्वथा असमर्थ हैं रात्रि में सोते समय दिन में जागते समय और दर-दर घूमते समय में ब्रज की स्मृति में ही डूबा रहता हूँ मेरा मन अन्यत्र कहीं नही लगता। 

जहां ब्रज में नंद बाबा, यशोदा माता तथा अन्य नर नारियाँ अर्थात गोप गोपिकाएं निवास करती हैं वहीं उन्हीं के पास मेरे प्राण रहते हैं। मैं सदैव उनकी स्मृति में खोया रहता हूँ ऐसा लगता है कि मेरे उनके अतिरिक्त कोई अस्तित्व ही नही है। 

हे उद्धव सुनों मैं तुम्हारे सम्मुख प्रेम की रीति का वर्णन करता हूँ मेरे हृदय से राधा की प्रीति क्षण भर के लिए दूर नही हो पाती कवि के कहने का आशय है कि प्रेम की रीति ही ऐसी है कि प्रेमी निरन्तर अपने प्रेमी के स्थान में निमग्न रहे मैं यहां राधा से दूर हूँ किंतु वस्तुतः मैं उसे क्षण भर के लिए विस्तृत नही कर पाता है।

विशेष:-

उपरोक्त पद में कृष्ण अत्यंत लाघव के साथ राधा को सम्पूर्ण गोपिकाओं में अनन्य स्थान की अधिकारिणी घोषित करते हुए उसके प्रति अपनी अनन्य प्रीति की व्यंजना कर रहे है।

6. राग सारंग

सखा? सुनों मेरी इक बात। 
वह लतागन संग गोरिन सुधि करत पछितात।। 

कहाँ वह वृषभानु तन या परम् सुंदर गात। 
सरति आए रासरस की अधिक जिय अकुलात।। 

सदा हित यह रहत नाहीं सकल मिथ्या-जात। 
सूर प्रभू यह सुनौ मोसों एक ही सों नात।।

शब्दार्थ : लतागन = लताओं।  वृषभानुतनया = वृषभानु की पुत्री, राधा। गात = शरीर। सुरति = याद। रासरस = आनंद-विहार या क्रीड़ा केली। जिय = हृदय। अकुलात = व्याकुल हो जाता है। सकल = समस्त। मिथ्याजात = मिथ्या भावना के कारण उत्पन्न, भ्रम रूप। नात = नाता, संबंध।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : श्री कृष्ण राधा के विषय में उद्धव से अपने प्रेम भावना व्यक्त या प्रकट कर रहे हैं।

व्याख्या : श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं की हे सखा, तुम मेरी एक बात सुनों। मैंने ब्रज के ही लता कुंजों में गोपिकाओं के ही साथ अनेक प्रकार की रास लीलाएँ की हैं। उन मधुर क्षणों को मैं स्मरण कर पश्चाताप करता रहता हूँ कि उन्हें उनके साथ व्यतीति होने वाली आनंद की घड़ियों को छोड़कर यहां क्यों आ गया। वह सुंदर और आकर्षक शरीर वाली वृषभानु तनया राधा यहां कहाँ है ? 

जब मुझे ब्रज में गोपियों और राधिका के साथ किये गए आनंद-विहार की स्मृति हो आती है तो हृदय और भी आकुल-व्याकुल हो उठता है श्री कृष्ण की इन प्रेम रस पूर्ण बातों को सुनकर ज्ञान मार्गी उद्धव उनके मित्र कहते हैं की हे मित्र प्रेम सदा एक सा और स्थिर नहीं रहता क्योंकि यह संसार जिसके प्रति यह प्रेम उत्पन्न होता है वह वहम है अतः मिथ्या संसार के प्रति उत्पन्न यह प्रेम भी अस्थिर और भ्रम मात्र है।

हे कृष्ण तुम मेरी एक बात सुनों और वह यह है की केवल एक ब्रम्ह से संबंध रखो की वहीं नित्य स्थाई सर्वत्र विद्यमान और स्थिर है तथा वह सत्य एवं सास्वत है।

विशेष :

  • यह पद ज्ञान और भक्ति के विवाद की भूमिका है। 
  • उद्धव कृष्ण के प्रेम का उपहास करते हुए ब्रम्ह सत्य जगत का प्रतिपादन कर रहे हैं। 
  • इस पद का उद्देश्य कृष्ण द्वारा उध्दव को प्रेम के प्रति ध्यान आकृष्ट करना है। 

7. राग टोड़ी

उध्दव ! यह मन निश्चय जानो। 
मन क्रम बच मैं तुम्हें पठावत ब्रज को तुरत पलानों।।

पूरन ब्रम्ह, सकल अबिनासी ताके तुम हौ ज्ञाता। 
रेख न रूप, जाति, कुल नाहीं जाके नहिं पितु माता।। 

यह मत दै गोपिन कहँ आवहु बिनह-नदी में भासति। 
सूर तुरत यह जसस्य कहौ तुम ब्रम्ह बिना नहिं आसति।। 

शब्दार्थ : क्रम = कर्म। बच=वचन। पठावत=भेजता हूँ। तुरत=तुरंत। पलानों=जाओ, प्रस्थान करो। अविनाशी=जिसका नाश न हो। जाके=जिसके। ज्ञाता=जानकार। भासित=सामीप्य या मुक्ति।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : उद्धव को श्री कृष्ण शीघ्र ही ब्रज प्रस्थान करने को कह रहे हैं, जो बार-बार ब्रम्ह की रट लगाते रहते हैं।

व्याख्या : श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं की हे उद्धव तुम अपने मन में यह निश्चय जान लो की मैं सम्पूर्ण सद्भावना एवं मन वचन कर्म के साथ ब्रज भेज रहा हूँ। इसलिए तुम तुरंत वहां के लिए प्रस्थान करो। कवि का यह भाव है की कृष्ण सच्चे हृदय से उद्धव को ब्रज जान को कह रहे हैं। इससे उन्हें दो कार्यों की सिद्धि अभीष्ट है एक तो उन्हें वहां का कुशल समाचार  प्राप्त हो जाएगा और दुसरा गोपियों के अनन्य प्रेम को परखकर ज्ञान गर्वित उद्धव प्रेम के सरल व सीधे मार्ग को पहचान सकेंगे प्रेम का महत्व जान सकेंगे।

कृष्ण उद्धव से कहते हैं तुम्हारा ब्रम्ह, पूर्ण, अनीश्वर और अखंड रूप है और तुम्हें ऐसे अविनाशी ब्रम्ह का पूर्ण ज्ञान प्राप्त है। तुम्हारे ब्रम्ह की न तो कोई रूप रेखा है न ही कोई कुलवंश है। और न ही उसके कोई माता पिता हैं।

कहने का मतलब या भाव यही है की तुम्हारा ब्रम्ह अखंड अनादि, अजर, अमर और पूर्ण है वह सब प्रकार के सांसारिक संबंधों से अछूता और स्वतंत्र है इसलिए कृपा करके तुम अपना यह ब्रम्ह ज्ञान ब्रज पल्ल्वियों को सुनाकर आओ।

तुम वहां सीधा जाकर उन गोपियों को समझा बुझा कर आना क्योकि वे मेरे विरह में निम्न पूर्ण होकर विरह की नदी में डूब रहीं हैं। तुरंत उससे जाकर कहो। की ब्रम्ह के बिना जीवन में मोक्ष की प्राप्ती नही हो सकती वह ब्रम्ह ही जीवन का सार तत्व है। तुम जाकर यह समझाओ की प्रेम भाव त्यागकर अविनाशी ब्रम्ह का ध्यान करें और उसी में अपनी समस्त शक्ती लगा दे तभी उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सकेगी अन्यथा नही।

विशेष : 

  1. श्री कृष्ण उद्धव को अभीष्ट कार्य के लिए प्रेरित कर रहे हैं। 
  2. निर्गुण सम्प्रदाय के अनुसार ब्रम्ह के बिना मुक्ति असम्भव है। 
  3. विरह नदी में निरंक रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है। 

8. राग नट

उद्धव ! बेगि ही ब्रज जाहु। 
सुरति सँदेस सुनाय मेटो बल्लभिन को दाहु।। 

काम पावक तूलमय तन बिरह-स्वास समीर। 
भसम नाहिं न होन पावत लोचनन के नीर।। 

अजौ लौ यहि भाँति ह्वै है कछुक सजग सरीर। 
इते पर बिनु समाधाने क्यों धरैं तिय धीर।। 

कहौं कहा बनाय तुमसों सखा साधु प्रबीन?
सुर सुमति बिचारिए क्यों जियै जब बिनु मीन।।

शब्दार्थ : बेगी=शीघ्र। जाहु=जाओ। सुरति=प्रेम। बल्लभभिन्न=गोपियाँ। दाहु=ग्रहजन्य, पीड़ा। काम पावक=काम की अग्नि, कामाग्नि। तूलमय=रूई के समान कोमल। तन=शरीर। समीर=वायु। लोचन=नेत्र। नीर=जल। अजौ लौं = आज-तक। वहै-है=होगा। समाधानों=समाधान, धीर=धीरज। तिय=नारीयाँ। साधू=सज्जन। प्रवीन=निपुण। मीन=मछलियाँ।

संदर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग :- श्री कृष्ण उद्धव को शीघ्र ही ब्रज जाने को कह रहे हैं या निर्देश दे रहे हैं और उन्हें कह रहे हैं की वह विरह में संतप्त गोपियों को तसल्ली दें।

व्यख्या :- श्री कृष्ण कहते हैं हे उद्धव तुम शीघ्र ही ब्रज चले जाओ और वहां जाकर ब्रज की नारियों को या संतप्त गोपीयों को तसल्ली दें।

श्री कृष्ण कहते हैं हे उद्धव शीघ्र ही ब्रज चले जाओ और वहां के नारियो को मेरा संदेश सुनाओ जिससे उनके चित्त में स्थित विरह जन्य पीड़ा स्माप्त हो सके। रूई के समान कोमल शरीर कामाग्नि में प्रज्वलित हो रहे हैं विरह आदि के कारण उनकी तीव्र साँसे वायु के समान उनकी कामाग्नि को और भी भड़का रही हैं। 

परन्तु उनके नेत्रों से होने वाली आंसुओं की वर्षा के कारण उनके शरीर की कामाग्नि में जलने से बच गए हैं जो कवि को कहने का भाव यह है की गोपियाँ रो रो कर अपने हृदय में स्थित विरह के ताप को हल्का कर लेती हैं इस प्रकार उनका जीवन नष्ट होने से बच जाता है।

श्री कृष्ण कहते हैं हे उद्धव इसी कारण उनके शरीर में अब भी सजगता सी है। किन्तु इस सजगता का सदा बना रहना कठिन है इसलिए यदि शीघ्र उन्हें डाइस न बताया गया तो उनके लिए धैर्य धारण करना कठिन हो जायेगा।

हे सखा अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ और किस प्रकार बताकर कहूँ तुम स्वयं ही साधू स्वभाव के और विवेकशील हो इसलिए मेरे मन के भावों को समझ लेना तुम्हारे लिए कोई कठिन कार्य नहीं, तुम अपने विवेकशक्ति के बल पर स्वयं ही विचार करो बिना जल के मछलियाँ किस प्रकार जीवित रह सकती हैं।

अर्थात जैसे जल से विलग होकर मछली का जीवन नहीं चल सकता उसी प्रकार मेरे बिना गोपिकाओं का जीवन भी चलना कठिन है। मैं ही उनका सर्वस्व हूँ अतः तुम शीघ्र ही जाकर उन्हें मेरा संदेश सुनाकर संतावना दो।

विशेष :

  1. सखा साधू प्रवीण में परिकर अलंकार से विशेष अवधारणा 
  2. काम, पावक, तुलमय तन विरहू स्वास समीर में सांग रूपक अलंकार है। 
  3. भसम नाहिन होन पावत लोचन के नीर में काव्यलिंग अलंकार 
  4. सूर सुमति--- , बिनु मीन में अप्रस्तुत काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग किया गया है।

9. राग सारंग 

पथिक ! संदेसों कहियो जाय। 
आवैंगे हम दोनों भैया, मैया जनि अकुलाय।। 

याको बिलग बहुत हम मान्यो जो कहि पठयो धाय। 
कहँ लौं कीर्ति मानिए तुम्हारी बड़ो कियो पय प्याय।। 

कहियो जाय नंदबाबा सों, अरु गहि जकरयो पाय। 
दोऊ दुखी होन नहिं पावहि धूमरि धौरी गाय।। 

यद्धपि मथुरा बिभव बहुत है तुम बिनु कछु न सुहाय। 
सूरदास ब्रजवासी लोगनि भेंटत हृदय जुड़ाय।। 

शब्दार्थ : पथिक=यात्री। अकुलाय=व्याकुल। जनि=मत। बिलगु=बुरा। धाय=धाई या पालन पोषण करने वाली। पय=दूध। धूमरी=काली। धौरी=सफेद। विभव=एसो-आराम। सुहाय=अच्छा लगता। जुड़ाय=प्रसन्न होता है।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग - उद्धव ब्रज के लिये प्रस्थान करने वाले हैं। उसी समय श्री कृष्ण उद्धव से कह रहे हैं।

व्याख्या - श्री कृष्ण उध्दव से कहते हैं हे पथिक हे उद्धव तुम ब्रज जाकर कहना हम दोनों भाई ब्रज में सबसे मिलने शीघ्र ही आएंगे, उनसे कहना वो ज्यादा व्याकुल न हों।

उनको जाकर के कहना की उन्होंने जो माता देवकी को धाय कहके संदेस भेजा है उसका हमने बहुत बुरा माना है उनसे ये भी कहना हे माता तुम्हारी कीर्ती का कहाँ तक वर्णन करूँ वह तुम ही हो जिसने अपना दूध पिलाकर इतना बड़ा किया है।

हे उद्धव तुम नंद बाबा से उनके चरण पकड़कर कहना की वह गायों का ध्यान रखें। मेरी काली और सफेद गायें मेरे बिना दुःखी न होने पाएं। श्री कृष्ण के कहने का भाव यह है की नंद बाबा हमारे आदरणीय हैं। यध्द्यपि उनके चरण पकड़कर उन्हें यथोचित आदर देना संवाद देना अनिवार्य है। 

यद्धपि मथुरा नगरी में आपार गौरव और सुख प्राप्त है लेकिन आपके बिना हमें यहां कुछ भी नही सुहाता एक तरफ तो यह वैभव है और दूसरी तरफ आपका स्नेह। सूरदास जी कहते हैं की श्री कृष्ण के हृदय को तभी संतावना और संतोष प्राप्त होता है। 

जब वो ब्रजवासियों के मध्य में होते हैं। अर्थात श्री कृष्ण कहते हैं की हमें ब्रजवासियों से मिलकर ही वास्तविकता का या ज्ञान की अनुभूति होती है।

भ्रमरगीत सार की विशेषताएं -
  1. इस पद में अत्यंत धार्मीक संवेदना और मार्मिकता है। 
  2. गायों के प्रति सही कृष्ण का प्रेम ग्रामीण जीवन के प्रति श्री कृष्ण का प्रेम है। 
  3. पथिक शब्द भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उद्धव के लिए प्रयुक्त हुआ है। 
  4. सातवीं पंक्ति में उत्तरालंकार है।

10. राग सारंग 

नीके रहियौ जसुमति मैया। 
आवैंगे दिन चारि पांच में हम हलधर दोउ भैया।। 

जा दिन तें हम तुमतें बिछुरे काहु न कहयों 'कन्हैया'। 
कबहुँ प्रात न कियो कलेवा, साँझ न पीन्ही धैया।। 

बंसी बेनु संभारि राखियो और अबेर सबेरो। 
मति लै जाय चुराय राधिका कछुक खिलौनों मेरो। 

कहियो जाय नंदबाबा सों निष्ट बिठुर जिय कीन्हों। 
सूर स्याम पहुँचाय मधुपुरी बहुरि सँदेस न लीन्हों।।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम से लिया गया है इन पदों को सूरदास ने कहा है और उनके शिष्यों के द्वारा संकलित किया गया था। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग - श्री कृष्ण उद्धव के ब्रज प्रस्थान के समय माता यशोदा के लिए संदेश कह रहें और नंद बाबा को निष्ठुर कह रहे हैं।

व्याख्या - श्री कृष्ण कहते हैं, हे उद्धव तुम माता यशोदा से कहना की वः भली भाँती रहें हँसी खुशी से रहे हमारे लिए चिंतीत या व्याकुल न हो हम दोनों भाई अर्थात मैं और बलराम चार पांच दिन में अर्थात शीघ्र ही वहां ब्रज में आकर सबसे मिलेंगे।

नंद बाबा से कहना की जिस दिन से हम उनसे विलग्न हुए हैं हमें प्यार से किसी ने कन्हैयाँ भी नही कहा और हमने वहाँ से आने के बाद न कभी प्रातः काल नास्ता किया है न ही छैया अर्थात गाय के थन से निकला हुआ ताजा ताजा दूध ही पीया है। हे उद्धव माता से यह भी कहना की वह बंशी आदि मेरे सभी खिलौने सम्हाल कर रखें ताकि राधिका मौक़ा पाकर उनके सारे खिलौने चुराकर न ले जाए।

हे उद्धव तुम हमारे नंद बाबा से कहना की उन्होंने तो हमारे ओर से अपना हृदय बिलकुल ही निष्ठुर और कठोर कर लिया है वह जब से हमें मथुरा छोड़कर गए हैं, न तो हमारी खोज खबर ली और न तो किसी के हाँथ से कोई संदेश ही भिजवाया है।

विशेषताएं -

  • यह पद उस आक्षेप का खंडन करती है जिसमें कहा गया है की सूरदास के पद में सिर्फ गोपियों का विरह वर्णन है। 

भ्रमरगीत सार की व्याख्या 21 से 30 

21. राग केदार

गोकुल सबै गोपाल-उपासी।
जोग-अंग साधत जे उधो ते सब बसत ईसपुर कासी।।

यध्दपि हरि हम तजि अनाथ करि तदपि रहति चरननि रसरासो।
अपनी सीतलताहि न छाँड़त यध्दपि है ससि राहु-गरासी।।

का अपराध जोग लिखि पठवत प्रेम भजन तजि करत उदासी।
सूरदास ऐसी को बिरहनि माँ गति मुक्ति तजे गुनरासी ?||

शब्दार्थ : सबै=सभी। उपासी=उपासना करने वाले। जोग अंग=योग के आठ अंग। (महर्षि पतंजली ने अष्टांग योग नामक आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग एक आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठो आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के आठ अंग हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान समाधी। ईसपुर=शिवपुरी (महादेव की नगरी काशी) तजि छोड़कर। रस रासी=रस में छंकी। ससि=चाँद। गरासी=ग्रसित। उदासी=उदास। गुनरासी=गुण समूह।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यपुस्तक के हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र 6 के इकाई 1 सूरदास भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : उद्धव के ज्ञानोपदेश योग साधना की ज्ञान की बाते सुनकर गोपियाँ उद्धव के ज्ञान के विरोध में श्री क्रृष्ण के प्रति प्रेम साधना की प्रतिष्ठा कर रही हैं।

व्याख्या : हे उद्धव गोकुल में सभी नर नारी उस गोपाल के उपासक हैं श्री कृष्ण के उपासक हैं। हे उद्धव जो लोग तुम्हारे इस अष्टांग योग की साधना करने वाले हैं, वे यहां नही रहते वे सब शिव नगरी में निवास करते हैं अर्थात काशी में निवास करते हैं।

यद्यपि श्री कृष्ण ने हमें त्याग दिया है और अनाथ कर दिया है फिर भी हम उनके चरणों के रूप राशी में ही रत हैं उनमें हमारा अनुराग, प्रेम है यह उसी प्रकार सम्भव है जिस प्रकार अपनी सीतलता नही।

जिस प्रकार चन्द्रमा राहु के द्वारा ग्रसित हो जाने पर भी अपना जो स्वभाविक गुण है सीतलता प्रदान करने वाला उसे नही छोड़ता है। उसी प्रकार श्री कृष्ण भले ही हमें त्याग दें किन्तु हम अपना स्वभाविक धर्म नहीं छोड़ेंगे ये जो मन है उनके चरणों में ही ध्यानस्त रहेंगी हम समझ नही पातीं की हमारे किस अपराध के दंड के रुप में कृष्ण ने हमारे लिए योग का संदेश लिख भेजा है।

वे हमें इस प्रकार हरिभजन को छोडकर संसार से विरक्त हो जाने को कहना चाहते हैं। सूरदास जी कहते हैं यहां ब्रज में ऐसी कौंन विरहणी है जो गुणों की खान को छोड़कर अर्थात श्री कृष्ण के प्रति प्रेम के सम्मुख गोपियों के लिए निर्गुण की उपासना से प्राप्त मुक्ति का कोई महत्व नही है हम सबके लिए तो कृष्ण प्रेम प्राण के समान हैं।

विशेष :

  • काशी प्राचीन काल से ही योगियों की साधना स्थली रही है। इससे अर्थात इस पंक्ति को जोड़ने से व्यंजना पड़ जाती है। 
  • अंतिम पंक्ति में निमित्त से प्रवृत्त मार्ग की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई है। 

22. राग धनाश्री

जीवन मुँहचाही को नीको।
दरस परस दिन रात करति है कान्ह पियारे पी को।।

नयनन मूंदी-मूंदी किन देखौ बंध्यो ज्ञान पोथी को।
आछे सुंदर स्याम मनोहर और जगत सब फीको।।

सुनौ जोग को कालै कीजै जहाँ ज्यान है जी को ?
खाटी मही नहीं रूचि मानै सूर खबैया घी को।।

शब्दार्थ : मुँहचाही=प्रियतम को प्रिय लगने वाली प्रिया। नीको=अच्छा। दरस=दर्शन। परस=स्पर्श। ज्ञान-पोथी को=पुस्तकीय ज्ञान। आछे=अच्छे। मनोहर=मनमोहक। जगत=संसार। ज्यान=जियान,हानि। मही=मठ्ठा,छाछ। खवैया=खानेवाला।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यपुस्तक के हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र 6 के इकाई 1 सूरदास भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : उद्धव के द्वारा गोपियों को निर्गुण का उपदेश सुनाये जाने के बाद गोपियानं चुप नहीं रहती वरन अनेक प्रकार से अपने प्रेम मार्ग की श्रेष्ठता को प्रतिपादित करती हुई उद्धव से कह रही हैं।

व्याख्या : गोपियाँ उद्धव से कहती हैं हे उद्धव अपने प्रीतम को अच्छा लगने वाली जो प्रेमिका है उसका जीवन ही अच्छा है। अर्थात सफल है। प्रीतम के मन में समाने के कारण वह जीवन संसार के फल को भोग लेता है इसलिए उसी का जीवन अच्छा है। उसी का जीवन सफल है।

कुब्जा से ईर्ष्या का भाव प्रकट करती हुई गोपियाँ कहती हैं जीवन तो उसका अर्थात कुब्जा सफल है क्योकि वह कृष्ण की चहिती प्रेमिका है वह अपने प्रीतम कन्हैया का प्रतिदीन दर्शन करती हैं उनको स्पर्श करती है और स्पर्श से उसे शरीरिक सुख आनंद भी प्राप्त होता है।

हे उद्धव ऐसा कौन है जिसने आँखें मूँद-मूँद करके पुस्तक के ज्ञान को प्राप्त कर लिया हो अर्थात आँखें खोलकर अध्ययन से ही ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। 

उसी प्रकार प्रियतम के पास रहने से दर्शन और स्पर्श से ही जीवन सफल नहीं होता यह तो तभी सम्भव है जब प्रेम की प्रीति से परिचित हो और प्रियतम को रीझाने में समर्थ हो इसलिये कुब्जा को श्री कृष्ण के पास रहकर भी उनका प्रतिदिन दर्शन करके भी उनका स्पर्श प्राप्त करके भी इतना सुख और आनंद प्राप्त नही होता क्योकि वह प्रेम करने की उचित रीति से परिचित नही है क्योकि जीवन तो सफल तभी होगा जब प्रेम की रीति से सुपरिचित हो और प्रियतम को रिझाने में समर्थ।

हे उद्धव हम तुम्हारे गया योग को लेकर क्या करें? यह हमारे किसी काम का नही क्योकि इससे तो हमें प्राणहीन का भय है। योग साधना पर अमल करने से हमें अपने प्राण प्रिय से कृष्ण से बिछुड़ना पड़ेगा और यदि हम उनसे बिछड़ गए तो उनके बिना हमारा जीवित रहना सम्भव नहीं है और इसीलिए तुम्हारे इस योग को अपना लेने में प्राणों की हानि का भय है।

सूरदास जी कहते हैं की जिस प्रकार कोई व्यक्ती जो शुद्ध घी का प्रयोग करता है वह व्यक्ति खट्टी छाछ से प्रसन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार श्री कृष्ण के प्रेमामृत का पान करने वाला यह जो हमारा हृदय है आपके योग की नीरस बातें सुनकर आनंदित नही होगा।

विशेष : 

  1. जीवन मुहचही को निको में गोपीयां कुब्जा के प्रति ईर्ष्या का भाव प्रकट कर रही हैं।
  2. ज्यान शब्द प्रदेश विषेश से संबंधित है और इसका अर्थ है हानि अथवा नुकसान।
  3. पियारे पी, स्याम सुंदर में छेकानुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद और माधुर्य गुण से लिखा सूरदास जी द्वारा प्रस्तुत पद में किया गया है।

23. राग काफी

आयो घोष बड़ो व्योपारी।
लादी खेप गुन  ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी।।

फाटक दैकर हाटक माँगत भौरे निपट सुधारि।
धुर ही तें खोटो खायो है लये फिरत सिर भारि।।

इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी ?
अपनों दूध छाँड़ि को पीवै खार कूप को पानी।।

ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँहमाँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ।।

शब्दार्थ : घोष=अहीरों की बस्ती। खेप=माल का बोझ। फाटक=फ़टकन, तत्वहीन पदार्थ अनाज को फटकने से निकला हुआ भूषा, फ़टकन। हाटक=स्वर्ण। धारी=समझकर। धूर=मूल। डहकावे=धोखा खाए। अजानी=अज्ञानी। खार=खारा। कूप=कुआँ। सवार=सवेरे। साहुहि=साहूकार,महाजन। आनि=आकर।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यपुस्तक के हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र 6 के इकाई 1 सूरदास भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : निर्गुण ब्रम्ह की उपासना की शिक्षा देने आये उद्धव को गोपियाँ खरी खोटी सुनाती हुई आपस में चर्चा करते हुए कह रही हैं।

व्याख्या : गोपियाँ आपस में बात करती हुई कहती हैं की आज अहीरों की बस्ती में एक बड़ा व्यपारी आया हुआ है। उसने ज्ञान और योग के गुणों से युक्त अपनी जो गठरी है वो लाकर ब्रज में उतार दी है।
उसने हमें तो बिलकुल भोला और अज्ञानी समझ लिया है। क्योकि वह फाटक देकर हाटक चाहता है अर्थात फ़टकन के समान जो तत्व हीन पदार्थ है जो भूषा है जो बेकार का कूड़ा कचरा है वह देकर के उसके बदले में सोना चाहता है अर्थात सोने के समान बहुमूल्य श्री कृष्ण को मांग लिया है।

ऐसा लगता है। इसने आरम्भ से ही लोगों को ठगा है तभी तो इस भारी बोझ को सिर पर लिए घूम रहा है। इस व्यपारी का जो समान है वह बिलकुल व्यर्थ है और इसी कारण यह बिक नही रहा है इसे हानि उठानी पड़ रही है इसका समान कोई भी नही खरीद रहा और इसलिए इसे अपने इस भारी बोझ को लादकर इधर उधर भटकना पड रहा है।

यहां हम में से ऐसी कोन ना समझ है और अज्ञानी है जो इसका माल खरीद कर धोखा खा जाएगी। आज तक ऐसा मुर्ख हमने कहीं नही देखा है जो अपना दूध छोड़कर के और खारे जल के जो कुँए का पानी है उसे वह पिये।
और गोपियाँ अंत में कहती हैं, हे उद्धव तुम शीघ्र ही यहां से चले जाओ बिना देर किये तुम शीघ्र मथुरा चले जाओ और जो तुम्हारा महाजन है तुम्हारा जो बड़ा सेठ है यदि तुम हमसे लाकर मिला दोगे, हमारा दर्शन करा दोगे तो तुम्हें मुँह माँगा पुरस्कार प्राप्त होगा अर्थात जो भी तुम मांगोगे वह हम तुम्हें दे देंगे।

भ्रमरगीत सार की विशेषताएं

  1. इस पद में गोपियों ने उद्धव को व्यपारी बना दिया है। 
  2. जो योग और ज्ञान रूपी तुच्छ वस्तु के लिए उनसे कृष के प्रेम रूपी स्वर्ण मुद्रा ठगना चाहता है। 
  3. कृष्ण के प्रेम को दुग्ध के समान और ज्ञान योग को खारे पानी के समान बताया है। 
  4. भाषा लाक्षणिक और ब्यंजना शब्द शक्ति से सम्पन्न है सम्पूर्ण पद में  अत्यंत तिरस्कृत वाच्य ध्वनि है उद्धव के ज्ञान वस्तु को निस्सार घोषित कर दिया गया है। और उसका तिरस्कार किया गया है। 
  5. फाटक और हाटक में अत्यंत सुंदर शब्द शैली है। 
  6. खोटा खाना मुहावरे का प्रयोग किया गया है।
  7. प्रसाद और माधुर्य गुण से सम्पन्न शैली प्रयोग सूरदास जी के द्वारा किया गया है। 
  8. सम्पूर्ण पद में रूपक और अन्योक्ति का मिश्रित रूप है। 
  9. खार कूप को पानी में दृष्टांत अलंकार का प्रयोग किया गया है। 
  10. गुण ज्ञान खोटो-खायो तथा मुंह मांगी में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। 

24. राग देश

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे।
यह व्योपार तिहारो ऊधो ! ऐसोई फिरि जैहै।।

जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै।
दाख छाँड़ि कै कटुक निम्बौरी को अपने मुख खैहै ?

मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै।
सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै ?।।

शब्दार्थ : ठगौरी=जादू, ठगाई से भरा सौदा। फिरि जैहैं=लौटा दिया जाएगा। जापै=जिसके पास। कटुक=कड़वी। निवौरी=नीम का फल। खैहै=खाएगा। केना=सौदा, बदले में। मुक्ताहक=मोती। निखैहैं=निवाएगा, साधन करेगा।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यपुस्तक के हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र 6 के इकाई 1 सूरदास भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : गोपियाँ उद्धव के ज्ञान योग को निश्शार बताकर उन पर गंभीर व्यंग्य करती हैं और कह रही हैं।

व्याख्या : हे उद्धव तुम्हारा ये ज्ञान योग रूपी ठगी और धूर्तता का मार्ग है वह ब्रज में नहीं बिक पायेगा। यह सौदा यहां से इसी प्रकार लौटा दिया जाता है यहां इसे कोई नहीं खरीदेगा। हे मधुकर तुम यह समान जिसके लिए इतने दूर तक आये हो उसे यह पसंद नहीं आएगा। और उसके हृदय में नहीं समा पयेगा।

ऐसा कौन मुर्ख होगा जो अपने अंगूर के दानों को छोड़कर नीम के कड़वे फल को खायेगा। निबोरी को खयेगा और मूली के पत्तों के बदले में तुम्हें मोतियों के दाने कौन देगा।

गोपियाँ यह कहना चाहती हैं की तुम्हारा ये जो ब्रम्ह है वो निर्गुण ब्रम्ह है वह नीम के फल के समान कड़वा और मूली के पत्ते के समान फीका है। अर्थात तुच्छ है त्याज्य है और हमारे श्री कृष्ण जो हैं वो अंगूर के समान मधुर और मोतियों के समान बहुमूल्य हैं इसीलिए हम ऐसे मुर्ख नही हैं कृष्ण को छोड़कर के तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह की साधना करें।

अर्थात ऐसा कौन मुर्ख है जो सम्पूर्ण गुणों के भंडार सगुण रूपी कृष्ण को छोड़कर के तुम्हारे गुणहीन निर्गुण ब्रम्ह के साथ निर्वाह करे। या उसकी साधना करे।

विशेष :

  1. दाख छाँड़ि कै कटुक निम्बौरी में अन्योक्ति अलंकार है। 
  2. जोग ठगौरी में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है। 

25. राग न

आये जोग सिखावन पाँड़े।
परमारथि पुराननि लादे ज्यों बनजारे टांडे।।

हमरी गति पति कमलनयन की जोग सिखै ते राँडें।
कहौ, मधुप, कैसे समायँगे एक म्यान दो खाँडे।।

कहु षटपद, कैसे खैयतु है हाथिन के संग गाड़े।
काहे जो झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े।।

सूरदास तीनों नहिं उपजत धनिया, धान कुम्हाड़े।।

शब्दार्थ :

जोग=ज्ञान-योग। परमार्थी=परमार्थ की शिक्षा देने वाले। बंजारे=खानादोष, इधर-उधर घूमने वाला। पुराननि=पुराणों की, पुरानी, बासी। टाँडे=सौदा, व्यपार की वस्तु। राँडे=विधवा। खाँडे=तलवार। षट्पद=भौंरा। गाँड़े=गन्ना। बयारी=हवा। भखि=खाकर। माँड़े=खाने, तैयार किए। झाल=बकवास, झल्ल। डाँड़े=दंड। कुम्हाड़े=कुम्हड़ा,काशीफल, कद्दू, पेठा।

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के मध्यकालीन काव्य से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं, सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग :

प्रस्तुत पद्य में उद्धव के ज्ञान योग की शिक्षा से गोपियाँ नाराज और उदास हैं, उस समय जो वो कहती हैं इस पंक्ति या पद में बताया गया है।

व्याख्या :

हे उद्धव तुम पाँड़े के समान हमें जोग सिखाने के लिए आ गए। जिस प्रकार बंजारे लोग अपने सिर पर माल लादे-लादे बेचने के लिए घूमते फिरते हैं उसी प्रकार तुम भी पाँड़े के समान परमार्थ की शिक्षा देने वाले पुराणों के ज्ञान के बोझ को अपने सिर पर लादे-लादे फिर रहे हो क्या तुम योग को सिखाने वाले पांडे के समान अपने परमार्थ रूपी पुरानी बासी वस्तु को लिए फिरते हो और अपने ऊपर मढ़ना चाहते हो।

हमारी गति तो अपने पति के साथ है और हमारे पति कमल नयन हैं श्री कृष्ण हैं जो हमें शरण और प्रतिष्ठा देने वाले हैं यह योग हमारे लिए नही है यह योग तो उनके लिए है जो विधवा और अनाथ हैं हमारे पति अभी जीवित हैं अतः हमारे लिए योग विकार की वस्तु है।

हे उद्धव तुम्ही बताओ एक ही मियान में दो तलवार कैसे समा सकती हैं। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवार नही समा सकती हैं। उसी प्रकार हमारे लिए योग सीखना भी बेकार है क्योकि योग की साधना हमारे लिए असम्भव है हमारे हृदय में तो श्री कृष्ण समाये हुए हैं। इसमें योग नहीं समा सकता। इसमें तो तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह की समाई नही हो सकती।

हे भवरे हे उद्धव हमें बताओ किस प्रकार हाथी के साथ गन्ने को खाया जा सकता है। क्योकि हाथी तो एक ही बार में अनेक गन्ने खा जाता है जिस प्रकार हाथी के साथ गन्ना खाने में मनुष्य कोई होड़ नही कर सकता स्पर्धा नही कर सकता उसी प्रकार हम अबला नारियों के लिए योग मार्ग की कठिन और दुरूह साधना करना कठिन है।

हे उद्धव बिना दूध, रोटी और घी खाये केवल हवा के भक्षण से अर्थात तुम्हारा ये प्राणायाम करने से तुम्हारा योग करने से किसकी भूख मिट सकती है। अर्थात कोई जीवित नही रह सकता अर्थात जिस प्रकार यह असम्भव है, की केवल प्राणायाम से भूख मिट जाय उसी प्रकार हमारे लिए भी योग की साधना करना असम्भव है।

गोपियाँ कह रही हैं की तुम किस वजह से यह बातें बना बना के व्यर्थ की बकवास कर रहे हो आखिर हमने ऐसी कौन सी चोरी कि है जिसका तुम हमें दण्ड देने आये वास्तव में तुम स्वयं चोर हो क्योकि जो हमारे सर्वस्व हैं कृष्ण और हमारे हृदय में विराजमान हैं तुम हमसे छीनकर ले जाने के लिए आये हो तुम अच्छी प्रकार जानते हो की धनिया धान और काशीफल इन तीनों की खेती एक स्थान पर होना सम्भव नही है असम्भव है इसीलिए हमारे लिए श्री कृष्ण को छोड़कर तुम्हारे परब्रम्ह को स्वीकार करना असम्भव है।


विशेष :

  • व्यंजना तथा लक्षणा शब्द शक्ति से भाषा की वाग्वैदग्धता में वृद्धी हुई है।
  • धनिये की खेती शीत ऋतू में धान की वर्षा की ऋतू में और काशी फल की खेती ग्रीष्म ऋतू में होती है और इसीलिए तीनों की खेती एक साथ एक जगह पर या स्थान पर होना असम्भव है।
  • तीनों नहीं उपजता से कुछ विद्वान भक्ति, योग और ज्ञान का अर्थ लेते हैं किन्तु यह उचित नही है की तीनों का समन्वय कबीर जैसे ज्ञानमार्गी कवियों में उपलब्ध है।
  • एक म्यान दो खाण्डे में जैसे दो लोकोक्ति का प्रयोग सूरदास जी द्वारा किया गया है।
  • "परमार्थी पुरनानी लावे ज्यों बंजारे टांडे में" उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।

26. राग बिलावल

ए अलि ! कहा जोग में नीको ?
तजि रसरीति नंदनंदन की सिखवन निर्गुन फीको।।

देखत सुनत नाहि कछु स्रवननि, ज्योति-ज्योति करि ध्यावत।
सुंदर स्याम दयालु कृपानिधि कैसे हौ बिसरावत ?

सुनि रसाल मुरली-सुर की धुनि सोइ कौतुक रस भूलै।
अपनी भुजा ग्रीव पर मैले गोपिन के सुख फूलै।।

लोककानि कुल को भ्र्म प्रभु मिलि-मिलि कै घर बन खेली।
अब तुम सुर खवावन आए जोग जहर की बेली।।

शब्दार्थ : अलि=भौरा। निको=अच्छा, गुणवान। तजि=छोड़कर। फीको=बेकार। स्त्रवननि=कानों से। ध्यावत=ध्यान करते हैं। बिसरावत=भूलना। रसाल=मधुर, मीठे। ग्रीव=गर्दन। मैले=डालते थे। लोककानि=लोक की मर्यादा। खेली=खेल डाला, कुछ भी समझा। वैली=बेल, लता, बूटी।

सदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य से लिया गया है जिसके रचनाकार सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। यह भ्रमरगीत सार का पद क्रमांक 26 है।
प्रसंग : प्रस्तुत पद्य में जो गोपियाँ हैं उद्धव के योग के उपदेश से खिन्न हो गई हैं और खिन्न होकर प्रतिक्रिया दे रही हैं।

व्याख्या : गोपियाँ खिन्न होकर उध्दव को भौरे का आड़ लेकर भौरे के माध्यम से उद्धव को  खरी-खोटी सूना रही हैं। वे उद्धव कहती हैं हे भौरे तुम्हारे निर्गुण में कौन सी खासियत है कौन सी विशेष बढ़िया बात है जो तुम नंद लाल की रस पद्धति को छुड़ाकर हमें नीरस निर्गुण फीका दिखाई दे रहे हो। 

ऐ अली कहाँ जोग में निको तुम उस नजरों को न तो देख पाते हो न बात कर पाते हो बस ज्योति-ज्योति कहकर दौड़ पड़ते हो। हमारे श्याम सुंदर तो अत्यंत दयालु हैं दया के सागर हैं हम उन्हें कैसे भुला सकती हैं हमारे कन्हैंया की मधुर मुरली की धुन सुनकर तो देवता और मुनि लोग भी उसे सुनने के लिए कौतुकवश अपना तन-मन भुला बैठे थे।

अपना भुजा ग्रीव पर जब कन्हैया अपनी भुजा हमारे कंधों पर रख देते थे तो हमारा मन खिल उठता था और हम लोग लोक लाज और कुल की मर्यादा छोड़कर प्रभु के साथ घर में वन में खेलती रहती थीं और अब तुम हमको योग रूपी विष की लता खिलाने आ गए हो अर्थात यह तुम्हारा योग का उपदेश हमारे लिए विष के समान प्राण घातक है और कृष्ण का प्रेम हमारे लिए मधुर और जीवन दायक होगा।

विशेष :
  • पुष्टिमार्ग भक्ति सिद्धांत के अनुसार लोक की मर्यादा एवं कुल बंधन की सीमाओं को तोड़ा गया है। 
  • गोकुल के माध्यम से सूरदास जी ने ज्ञान योग का खंडन किया है। 
  • ब्रज भाषा के सुंदर रूप में सूक्ष्म भावों की स्पष्ट अभिव्यक्ति हुई है।
  • व्यंग्य भाव की प्रधानता है। जोर जहर की बोली में रूपक अलंकार। 

27. राग मलार

हमरे कौन जोग व्रत साधै ?
मृगत्वच, भस्म अधारी, जटा को को इतनौ अवराधै ?

जाकी कहूँ थाह नहिं पैए , अगम , अपार , अगाधै।
गिरिधर लाल छबीले मुख पर इते बाँध को बाँधै ?

आसन पवन बिभूति मृगछाला ध्याननि को अवराधै ?
सूरदास मानिक परिहरि कै राख गाँठि को बाँधै ?।।

शब्दार्थ : हमरे=हमारे। साधै=साधना करे। मृगत्वच=हिरण की छाल। अवराधै=आराधना करे। अगाधै=अथाह। बाँध=बंधन। पवन=वायु, यहाँ प्राणायाम। विभूति=राख। मानिक=मोति। परिहरि=त्यागकर।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : यहाँ गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं की सुंदर कृष्ण को छोड़कर निर्गुण ब्रम्ह की साधना करना असम्भव है।

व्याख्या : योग साधना की कठिनाइयों बाहरी बंधनों और प्रयत्न की आलोचना करते हुए गोपियाँ उद्धव से कहती हैं। की हे उद्धव हमारे यहां तुम्हारे योग व्रत की साधना कौन करे।

मृगशाला, भस्म, उधारी आदि वस्तुओं को इकट्ठा करता कौन फिरे, और फिर अपने सिर पर जटा कौन बान्धे।

तुम्हारा ब्रम्ह तो ऐसा है जिसकी कही भी थाह नही पाई जा सकती जो अगम है अपार है अथाह है। फिर इतनी मुसीबतें मोल लेकर कौन तुम्हारे ब्रम्ह की साधना करता फिरे फिर ऐसे ब्रम्ह कैसे प्राप्त किया जा सकता है। 
इसलिए ये सब प्रयत्न करना व्यर्थ है।

हमारे सुंदर सलोने कृष्ण के छबीले मुख का दर्शन करने के लिए आसन, प्राणायाम, भस्म, मृगछाला आदि को एकत्र करना और फिर उसका ध्यान करना इन सब बातों की बिल्कुल जरूरत नही पड़ती।

वे कहना चाहते हैं की जब तुम्हारे ब्रम्ह का ध्यान करने के लिए इन सारी वस्तुओं को जुटाना आवश्यक है तो ऐसा कौन होगा जो इन प्रपंचों में पड़कर के उनकी साधना करता फिरे उसकी आराधना करता फिरे।

ऐसा कौन मूर्ख है जो अपने माणिक्य को त्यागकर राख को उसकी गांठ में बांधे हमारे कृष्ण तो मणि के समान अमूल्य है और तुम्हारा ब्रम्ह राख के समान तुच्छ है। 

विशेष :
  • सूरदास जी सगुन मार्ग की भक्ति  का 
  • पक्ष लेते हुए इसे सहज और सरस् बताते हैं। 
  • जबकि योगमार्गी भक्ति को क्लिष्ट कठिन और असहज बताते हैं अपने अष्टांग योग को साधनों का उल्लेख किया गया है। बांध बांधना और आदि मुहावरे भाषा की व्यंजना शक्ति को विस्तार देते हैं 
  • अगम अपार अगाधै में वृतयानुप्रास तथा सम्पूर्ण पद में अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग सूरदास जी द्वारा किया गया है। 

28. राग धनाश्री

हम तो दुहूँ भॉँति फल पायो।
को ब्रजनाथ मिलै तो नीको , नातरु जग जस गायो।।

कहँ बै गोकुल की गोपी सब बरनहीन लघुजाती।
कहँ बै कमला के स्वामी संग मिल बैठीं इक पाँती।।

निगमध्यान मुनिञान अगोचर , ते भए घोषनिवासी।
ता ऊपर अब साँच कहो धौ मुक्ति कौन की दासी ?

जोग-कथा, पा लोगों ऊधो , ना कहु बारंबार।
सूर स्याम तजि और भजै जो ताकी जननी छार।।

शब्दार्थ : हम तो=हमने तो। दुहुँ भाँति=दोनों तरह से। नीको=अच्छा आम। वरण हीन=नीच कुल की। लघू जाती=नीच जाती की। कमला के स्वामी=लक्ष्मी के पति। पाँति=पंक्ति। निगम=वेद। अगोचर=अप्राप्त। घोष निवासी=अहीरों की बस्ती में रहने वाले। छार=राख।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : गोपियाँ उध्दव से कहती हैं की हे उध्ध्दव कृष्ण प्रेम का फल तो हमें दोनों ही प्रकार से प्राप्त हो जाएगा। 

व्याख्या : यदि हमारे इस विरह के अंत में ब्रजनाथ श्री कृष्ण मिल जाए तो बहुत अच्छी बात है और नही भी मील पाते है तो मरने के बाद सारा संसार हमारी जस गान करेगा। गोपियो ने श्री कृष्ण के प्रेम में एकनिष्ठ भाव को अपनाया अथवा इस पंक्ति का यह अर्थ भी लिया जा सकता है, की ब्रजनाथ श्री कृष्ण मिल भी गए तो ठीक नहीं। तो जग में ये अथवा संसार में उनका यशगान ही सही उनके यश को गाकर ही हम संतुष्ट हो लेंगे। हमारे और श्री कृष्ण की समानता ही नही है।

कहाँ तो हम गोकुल की गोपियाँ जो वर्णहीन लघुजाती की हैं अर्थात नीच कुल और नीच जाती में जन्म लेने वाली है और कहाँ वे लक्ष्मीपति ब्रम्ह स्वरूप श्री कृष्ण है। ये तो हमारा परम् सौभाग्य है की हमने उनसे प्रेम किया हमें यह अवसर मिला और उन्होंने भी हमें प्यार के योग्य समझा और हम उनके साथ एक पंक्ति में बैठ सकी अर्थात उन्होंने हमें समानता का दर्जा दिया।

जिन भगवान का ध्यान वेद भी करते हैं जिन्हें ग्यानी मुनि भी प्रयत्न करने पर प्राप्त नहीं कर पाते। जो मुनियों के लिए भी अगोचर हैं वे भगवान हम अहीरों की बस्ती में आकर रहे।

अब आप हमें ये बताओ की मुक्ति किसकी दासी है यदि मुक्ति ब्रम्ह की दासी है तो वह ब्रम्ह कृष्ण हैं। हे उद्धव हम आपके पाँव पड़ते हैं। अपने इस योग की कथा को बार-बार हमें न सुनाओ।

सूरदास जी लिखते हैं की गोपियाँ कहती हैं ,की उद्धव जो कृष्ण को त्यागकर किसी और की उपासना करता है। उसकी माता भी उसकी जन्म देने वाली माता भी धिक्कार के योग्य है।

विशेष :
  • प्रस्तुत पद में ज्ञान पर भक्ति की विजय स्पष्ट दिखाई देती है सूक्ष्म भावों की सहज और प्रभावी अभिव्यक्ति की गई है।
  • कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम को दर्शाया गया है।
  • बैठी एक पाँती में भाषा के मुहावरे का प्रयोग किया गया है।

29. राग कान्हरो

पूरनता इन नयनन पूरी।
तुम जो कहत स्रवननि सुनि समुझत, ये यही दुख मरति बिसूरी।।

हरि अन्तर्यामी सब जानत बुद्धि विचारत बचन समूरी।
वै रस रूप रतन सागर निधि क्यों मनि पाय खवावत धूरी।।

रहु रे कुटिल , चपल , मधु , लम्पट , कितब सँदेस कहत कटु कूरी।
कहँ मुनिध्यान कहाँ ब्रजयुवती ! कैसे जाट कुलिस करि चूरी।।

देखु प्रगट सरिता, सागर, सर, सीतल सुभग स्वाद रूचि रूरी।
सूर स्वातिजल बसै जिय चातक चित्त लागत सब झूरी।।

शब्दार्थ : पूरनता=पूर्णता। नयन=आँख। न पूरी=नहीं जँचती। स्त्रवननि=कानों से। यहीं=यह ही। बिसूरी=बिलख-बिलखकर। समूरी=पूर्णरूप से। धूरी=धूल मिटटी। कुटिल=छली। चपल=चंचल। मधूलम्पट=रस के लोभी। कितब=धूर्त। क्रूरी=क्रूर, निष्ठुर। कुलिस=बज्र। सर=तालाब। शीतल=ठण्डा। सुभग=मधुर। रूरी=अच्छी। चित=मन। झूरी=नीरस।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक सूरदास जी हैं।

प्रसंग : प्रस्तुत पद में गपियाँ उद्धव के ज्ञानोपदेश को सुनकर नाराज और खीझी हुई हैं।

व्याख्या : हे उद्धव तुमने जो कार्य पूर्ण ब्रम्ह का वणर्न किया है उसकी पूर्णता हमारी नेत्रों में पूरी तरह नही समा पाती अर्थात वह हमें जँचती नहीं है तुमने ब्रम्ह की पूर्णता के बारे में हमें जो-जो बातें कही हैं वह हम इन कानों से सुनकर समझने की कोशिश कर रही हैं। प्रयास कर रहीं हैं परन्तु हमारी आखें दुखने लगती हैं और बिलक बिलक कर मरी जा रही है इस बिलखने के दो कारण हो सकते हैं एक यह की इन्हें तुम्हारे द्वारा वर्णिंत ब्रम्ह की पूर्णता कही भी नजर नहीं आती अथवा दुसरा यह भ्रम है कि कहीं हम तुम्हारी बातों में आकर श्री कृष्ण को न छोड़ दें। और तुम्हारे ब्रम्ह को न स्वीकार कर लें।

गोपियाँ कहती हैं कि सभी को यह पता है सभी को यह ज्ञात या जानकारी है कि भगवान अन्तर्यामी हैं बुद्धि द्वारा इस बात पर विचार करने पर हमें भी तुम्हारा यह कथन सत्य प्रतीत होता है इस बात पर विशवास होने लगता है किन्तु हमारे कृष्ण तो प्रेम रूप और रत्नों के सागर हैं। रत्न तो मूल्यवान हैं ऐसे माणीक को प्राप्त कर लेने पर तुम हमें धूल के समान तुच्छ अपने निर्गुण ब्रम्ह को अपना लेने का उपदेश क्यों दे रहे हो तुम्हारा यह उपदेश व्यर्थ ही जाएगा क्योकि हम अपना धर्म बदलने वाले नही हैं।

भ्रमर को सम्बोधित करती हुई उद्धव को खरी-खोटी सुनाते हुए कहती हैं कि अरे छली चंचल, रस के लोभी धूर्त भौरे ठहर, तूँ हमें ऐसा योग का कटु संदेस क्यों सूना रहा है हमें यह तो बता की कहाँ मुनियों कि ब्रम्ह विषयक कठोर साधना और कहाँ हम कॉंमलांगी ब्रज की युवतियां क्या तुझे कहीं भी समानता दिखाई देती है।

क्या कठोर ब्रज को तोड़कर चकनाचूर करना सम्भव है नही न उसी प्रकार हमारे लिए भी इस योग का करना असम्भव है। संसार में सरिता, सागर, तालाब का जल मीठा निर्मल और शीतल होता है यह देखकर भी स्वाती जल के प्रेमी चातक के हृदय में तो स्वाती नक्षत्र के समय जो जल उपलब्ध होता है उसी के प्रति प्रेम होता है।

वह उसी का पान करके जी को शांत करता है अन्य जो स्त्रोत हैं उनसे प्राप्त जल भले ही शीतल और मधुर हो उसके लिए उस चातक के लिए वह नीरस और व्यर्थ है। ठीक इसी प्रकार तुम्हारा ब्रम्ह अवश्य ही मुक्ति देने वाला हो सकता है किंतु हमें तो केवल श्री क्रृष्ण/विष्णु प्रिय लगते हैं हमें तो मुक्ति नही चाहिए हमें तो कृष्ण चाहिए अतः तुम्हारे ब्रम्ह को स्वीकार नही कर सकते हैं।

विशेष :

  • गोपियों न चातक को आधार बनाकर अपने प्रेम की अनन्यता घोषणा की है।
  • छेकानुप्रास, प्र्त्यानुप्रास आदि अलंकारों का प्रयोग कवि के द्वारा किया गया है।

30. राग धनाश्री

कहतें हरि कबहूँ न उदास।
राति खवाय पिवाय अधरस क्यों बिसरत सो ब्रज को बास।।

तुमसों प्रेम कथा को कहिबो मनहुं काटिबो घास।
बहिरो तान-स्वाद कहँ जानै, गूंगो-बात-मिठास।

सुनु री सखी, बहुरि फिरि ऐहैं वे सुख बिबिध बिलास।
सूरदास ऊधो अब हमको भयो तेरहों मास।।

शब्दार्थ : कबहूँ=कभी भी। राति=प्रेमपूर्वक। पिवास=पिलाकर। विसरत=भूलना। अधर=होंठ। काटिबो घास=घास काटना, बेकार मगझ मारना। तान स्वाद=संगीत का आनन्द। बात मिठास=बातों का मीठापन। बहुरि=फिर। तरहों मास=अवधि बीत जाना।

सन्दर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य से भ्रमर गीत सार नामक पाठ से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : प्रस्तुत गूंगे बहरों का उदाहरण देते हुए गोपियाँ उद्धव को विरह की व्यथा गान सुना रही हैं।
व्याख्या : हमारे प्रभु श्री कृष्ण हमसे कभी न उदास अथवा उदासीन नहीं हो सकते हैं क्योकि उन्हें ब्रज भूमि में बिताया हुआ समय अभी भी भूल नही पायेगा क्योकी वे जब हमारे पास थे तो हमने उन्हें प्रेमपूर्वक माखन खिलाया था। और प्रेम की अवस्था में हमने अपने अधरों से अमृत रस का पान कराया था और इसीलिए भी इस ब्रज भूमि का अपना निवास कभी भी भुला नही पाएंगे।

लेकिन तुम्हारे सामने तो इस प्रेम कथा का वर्णन करना इसका बखान करना मानों घास काटने के समान है अर्थात तुमसे माथा पच्ची करना है न तो तुम इसके महत्व को जान सकते हो और न इससे अदीत हो सकते हो।

तुम्हारी यति या स्थिति तो उस भैरे के समान है जो संगीत के उतार-चढाव से विस्मृत मधुर तानों का स्वाद नही जानता और गुंगा व्यक्ती प्रेमालाप से उपलब्ध रस को ग्रहण नही कर सकता यदि या तो तुम बहरे हो या गूंगे हो या तो तुम्हारी गति उस बहरे मनुष्य के समान है अथवा गूंगे व्यक्ति के समान।

एक गोपी अपनी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी सुनो क्या हमारे जीवन में वही सुख अनेक प्रकार की प्रेम कलियाँ क्या फिर कभी आएगी क्या कभी हमारे श्री कृष्ण पुनः ब्रज आएंगे और हमारे साथ वहीं प्रेम क्रीड़ाएं करेंगे। अब तो उनके आने का समय भी आ गया है।

सूरदास जी कहते हैं कि गोपी अपनी सखी से कह रही हैं कि अब तो उनके आने का समय भी आ गया है क्योकि जितनी अवधी के लिये वह मथुरा गए थे। कुछ समय के लिए गए थे और वह अवधी समाप्त हो रही है और इसलिए हमें आशा है कि वे शीघ्र ही लौटकर वह आएंगे।

भ्रमरगीत सार की विशेषताएं - प्रस्तुत पद में सूरदास जी ने मनहु काटिबो घास और भयो तरहों मास आदि ग्रामीण मुहावरों का प्रयोग किया है।

मनहु काटीबो घास में उत्प्रेक्षा अलंकार है। अंतिम पंक्ति में तेरह मास का तात्पर्य यह है कि अब अवधि समाप्त हो गयी है क्योकि वर्ष में बारह महीने होते हैं तेरवा महीना आ गया अर्थात जो बारह महीने थे वे बीत गए अर्थात जो विरह की अवस्था होती है। उसे कवियों ने बारह मास का नाम दिया है तो बारह मासा बीत चुका है और तेरहवाँ मासा आ गया है अर्थात अब मिलन की आशा जगमगा गई है क्योकि वह अवधी जो विरह की थी वह समाप्त हो गयी है।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या 50 से 60

 श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति

51. राग कान्हरो 

अलि हो ! कैसे कहौ हरि के रूप-रसहि ?
मेरे तन में भेद बहुत बिधि रसना न जानै नयन की दसहि।।

जिन देखे तो आहि बचन बिनु जिन्हैं बजन दरसन न तिसहि। 
बिन बानी भरि उमगि प्रेमजल सुमिरि वा सगुन जसहि।।

बार-बार पछितात यहै मन कहा करै जो बिधि न बसहिं। 
सूरदास अंगन की यह गति को समुझावै या छपद पंसुहि।।

शब्दार्थ : दसहि=दशा। आहिं=हैं। तिसहिं=उसे। जसहि=जस को। न बसहि=वश में नहीं। षट्पद=भ्रमर। पसुहि=पशु को। तन=शरीर। रसना=जिह्वा। 

संदर्भ : 

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिए गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग : 

यहां इस पद में गोपियाँ श्री कृष्ण के ध्यान में मग्न हैं लेकिन वे श्री कृष्ण के सुंदर रस रूपी, रूप का बखान करने में असमर्थ हैं अर्थात बता नहीं पा रहे हैं। 

व्याख्या : 

यहाँ पर गोपि उद्धव को अली के रूप में सम्बोधित करते हुए कह रही है। हे अली मैं कृष्ण के रूप, रस, श्रृंगार का कैसे वर्णन करूं इस शरीर के जो विभिन्न अवयव हैं उनमें परस्पर भेद है अर्थात अंतर् है। 

मेरी जिव्हा मेरे नयनों की दशा को नही जानती और न ही वह उस दशा का वर्णन कर सकती हैं हे उद्धव एक अंग एक ही कार्य कर सकता है नयनों ने कृष्ण के रूप माधुर्य के दर्शन तो किये हैं किन्तु वे वचनों के अभाव में उसके वर्णन करने में असमर्थ हैं। और 

जो जिव्हा बोलने में अथवा वर्णन करने में असमर्थ है वो नेत्र के अभाव में देखने में अथवा अनुभव करने में असमर्थ हैं नेत्र बोल नहीं पाते इसलिए कृष्ण के सगुण स्वरूप और उसके यश का स्मरण कर प्रेम के आवेग में उमड़ते हुए आंसुओं से भर उठते हैं। 

अपनी इस विवसता के कारण हमारा मन बार-बार पश्चाताप से घिर उठता है जब विधाता ही बस में नहीं है तो ये मन कर भी क्या सकता है। हमारे भाग्य में प्रियतम कृष्ण से वियोग दशा लिखी थी अब उसे हम भुगत रहे हैं। 

सूरदास जी कह रहे हैं की अपने शरीर के विभिन्न अंगों की विवशता से एक मुड़ छः पैरों वाले भौरे को कौन समझाये यह प्रेम के महत्व तथा प्रभाव को नही समझ पाता यह मुर्ख है। अतः इसको समझाना व्यर्थ है। 

विशेष : 
  • प्रस्तुत पद्यांश में गोपियों में उध्दव को अली के रूप में सम्बोधित किया है। 
  • यहां उद्धव को गोपियाँ षट्पद अर्थात भ्रमर के समान कह रही हैं। 
  • इस पद में गोपियाँ उद्धव को प्रेम के महत्व समझाने में असमर्थता प्रकट कर रही हैं। 

52. राग सारंग 

हमारे हरि हारिल की लकरी। 
मन बच क्रम नंदनंदन सों उर यह दृढ करि पकरी।।

जागत, सोवत, सपने 'सौंतुख कान्ह-कान्ह जक री।
सुनतहि जोग लगत ऐसो अलि ! ज्यों करुई ककरी।।

सोई व्याधि हमें लै आए देखी सुनी न करी। 
यह तौ सूर तिन्हैं लै दीजै जिनके मन चकरी।।

शब्दार्थ : हारिल की लकरी=हारिल नामक पक्षी सदैव अपने पंजों में कोई न कोई लकड़ी का टुकड़ा या तिनका पकड़े रहता है। बच=वचन। क्रम=कर्म। उर=हृदय। सौंतुख=प्रत्यक्ष। कान्ह=कन्हैया, कृष्ण। जकरी=रट, धुन। करुई=कड़वी। सोई=वही। व्याधि=रोग, बीमारी। तिन्हैं=उनको। चकरी=चंचल चकई के समान सदैव अस्थिर रहने वाली। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत से लिया गया है जिसका सम्पादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया है भ्रमर गीत सार के नाम से किया है। 

प्रसंग : प्रस्तुत पद में गोपियाँ उद्धव को कह रही हैं कि कृष्ण उनके लिए हारिल पक्षी की लकड़ी के समान बन गए हैं। 

व्याख्या : जिस प्रकार हारिल पक्षी कहीं भी हो वो किसी भी दशा में हो वह सहारे के लिए अपने पंजे में किसी न किसी लकड़ी को अथवा किसी तिनके को पकड़े रहता है उसी प्रकार हम गोपियाँ श्री कृष्ण के ध्यान में निमग्न रहती हैं। 

हमने अपने मन, वचन और कर्म से श्री कृष्ण रूपी लकड़ी को अपने हृदय में दृढ़ करके पकड़ लिया है अर्थात श्री कृष्ण का रूप सौंदर्य हमारे हृदय में गहराई तक बैठ गया है और यह अब जीवन का एक अंग बन गया है। 
हमारा मन तो जागते-सोते स्वप्न अवस्था में प्रत्यक्ष रूप में अर्थात सभी दशाओं में कृष्ण की नाम की रट लगाता रहता है। श्री कृष्ण का स्मरण ही एक मात्र कार्य रह गया है हमारे लिए जिसे हमारा मन सभी अवस्थाओं में करता है। हे भ्रमर तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह संबंधी ज्ञान उपदेश की बातें सुनकर हमें ऐसे लगता है जैसे कोई कड़वी ककड़ी हमने मुंह में रख ली हो। 

गोपियाँ कहती हैं हे उद्धव इस निर्गुण ब्रम्ह के रूप में तुम हमारे लिए ऐसा रोग ले आये हो जिसे न तो हमने कभी देखा है न सुना है न कभी उसका भोग किया है इसीलिए इस योग ज्ञान रूपी बीमारी को तुम उन लोगों को दो जिनका मन चकरी के समान अथवा चकरी के समान सदैव चंचल रहते हैं। वे इसका आदर करेंगे। गोपियाँ कहना हैं की उनका हृदय तो कृष्ण प्रेम में दृढ एवं स्थिर है उनके हृदय में योग ज्ञान और निर्गुण ब्रम्ह संबंधी बातों के लिए कोई स्थान नही उद्धव के योग  बातें वहीं लोग स्वीकार कर सकते हैं जो अपनी आस्था में दृढ नही होते भावावेश में अपनी आस्था और विशवास को बदलते रहते हैं और इसीलिए ऐसे अस्थिर चित्त वालों के लिए ही योग का उपदेश उचित है। 

भ्रमरगीत सार की विशेषताएं

  • गोपियाँ निर्गुण के उपदेश के लिए व्याधी शब्द का प्रयोग करती हैं। और ऐसा करके सूरदास जी ने उन्हें परोक्ष रूप से स्वयं निर्गुण ब्रम्ह की अवहेलना की है और साथ ही साथ यह स्पष्ट किया है की योग साधना चंचल व अस्थिर चित्त वालों के लिए ही उचित है स्थिर प्रेममार्गियों के लिए यह व्यर्थ है। 
  • सुनतहि जोग लगत ऐसो अलि! ज्यों करुई ककरी में उपमा अलंकार। 

53. राग सारंग

फिरि-फिरि कहा सिखावत मौन ?
दुसह बचन अति यों लागत उर ज्यों जारे पर लौन।।

सिंगी, भस्म, त्वचामृग, मुद्रा अरु अबरोधन पौन। 
हम अबला अहीर, सठ मधुकर ! घर बन जानै कौन।।

यह मत लै तिनहीं उपदेसौ जिन्हैं आजु सब सोहत। 
सूर आज लौं सुनी न देखी पोत सूतरी पोहत।।

शब्दार्थ :
सिखावत=सिखाना। दुसह=असहय, कठोर। जारे पर लौन=जले पर नमक। त्वचामृग=मृग छाला। अवरोध पौन=सांस रोकना, प्राणायाम करना। पोत=काँच की बनी छोटी गुड़िया अथवा मोती। सूरती =सुतली।

सदर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्य में उद्धव को गोपियाँ फटकार लगाते हुए उसे मुर्ख कहते हुए कह रहे हैं की तुम जले में नमक डाल रहे हो।

व्याख्या :
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव तुम हमें बार-बार मौन साधने का उपदेश क्यों दे रहे हो कम से कम तुम हमें आपना दुःख तो कह लेने दो।

हे उद्धव, हे भ्रमर तुम्हारी ये योग साधना रूपी असहिय योग वचन इस प्रकार दुःख दे रहे हैं जैसे जले पर नमक छिड़क दिया गया हो। कवि कहना चाहते हैं की गोपियाँ कृष्ण के वियोग में पहले ही दुःखी और घायल हैं ऊपर से उद्धव उन्हें क्रृष्ण को त्याग कर ब्रम्ह प्राप्ति के लिए योग साधना का उपदेश दे रहें हैं ऐसा लगता है जैसे जले पर नमक छिड़क कर घायल को और अधिक कष्ट दिया जा रहा हो।

हे उध्दव तुम हमसे, सिंगी, भभूत, मृग छाला और मुद्रा धारण करके प्राणायाम की साधना करने को कहते हो किन्तु हे मुर्ख भ्रमर क्या तुमने कभी यह सोचा है की हम अबला अहीर नारियाँ हैं हमारे लिए ये किस प्रकार सम्भव है की हम तुम्हारे कठिन योग साधना से प्राप्त निर्गुण ब्रम्ह को अपना ले योग साधना तो वन में रहकर अपनाई जाती हैं हम तो न तो घर को त्याग सकती हैं। और न ही अपने घर को वन के समान निर्जन कर सकती हैं और यह असम्भव है क्योकिं हमारे घरों में कृष्ण संबंधी पुरानी यादें समाई हुई हैं जिन्हें हमें भुलाना पड़ेगा और यह हमारे लिए सम्भव नहीं हैं और इसलिए तुम्हारे लिए यही उचित है की तुम अपना उपदेश उन लोगों के पास ले जाओं जिन्हें आजकल यह करना सोभा देता है।

कवि कहना चाहता है कि यह योगसाधना का उपदेश उनके लिए नहीं बल्कि कुब्जा के लिए उचित है क्योकि वह कृष्ण के निकट पाकर सभी प्रकार से समर्थ और प्रसन्न है जो अनुराग में रत है उसके लिए योग साधना का उपदेश उचित है हम तो पहले से ही वैराग्य का जीवन व्यतीत कर रहीं हैं इस योग साधना के उपदेश का वास्तव में उस कुब्जा को अधिक आवश्यता है जो श्री कृष्ण के साथ विषय भोग में लिप्त है और अंत में गोपियाँ कहती हैं की हमने आज तक किसी भी व्यक्ति को मोती में सुतली फिरोते हुए नही देखा है। इस प्रकार यह कार्य असम्भव है तुम हमें योगसाधना के द्वारा निर्गुण ब्रम्ह को प्राप्त करने का जो उपदेश देते हो वह भी इसी प्रकार का असम्भव कार्य है। और तम्हें इस कार्य में सफलता नहीं मिल सकती।

विशेष :

  • मौन शब्द में श्लेष अलंकार है। योगी वाणी पर संयम प्राप्त करने के लिए योग साधना करते हैं यह योग का एक उपलक्षण है।
  • "दुसह बचन अलि यों लागत डर ज्यों जारे पर लौन" में उपमा है तथा "जारे पर लौन" एक लोकोक्ति है।

54. राग जैतश्री 

प्रेमरहित यह जोग कौन काज गायो ?
दीनन सों निठुर बचन कहे कहा पायो ?

नयनन निज कमलनयन सुंदर मुख हेरो। 
मूँदन ते नयन कहत कौन ज्ञान तेरो ?

तामें कहु मधुकर ! हम कहाँ लैन जाहीं। 
जामें प्रिय प्राणनाथ नंदनंदन नाहीं ?

जिनके तुम सखा साधु बातें कहु तिनकी। 
जीवैं सुनि स्यामकथा दासी हम जिनकी।।

निरगुन अविनासी गुन आनि भाखौ। 
सूरदास जिय कै जिय कहाँ कान्ह राखौ ?।।

शब्दार्थ :
प्रेम रहित=अनुराग रहित, नीरस। काज=कार्य। कौन काज=किस कारण, किसलिए। दीनन=द्खिओं, विरह-ग्रस्त, अबलाओं। निठुर=कठोर। निज=अपने। हेरो=निहारो, देखो। लैन=लेने के लिए। तिनकी=उनकी। आनि-आनि=अन्य-अन्य। भाखौ=कहते हो। जिय के पिय=प्राणों के प्राण। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। जिसे उन्होंने सूरसार से उद्घृत किया है। 

प्रसंग : अपनी वियोग स्थिति का वर्णनं बड़े ही मार्मिक ढंग से गोपियाँ कर रहीं हैं। 

व्याख्या : गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव तुमने नीरस योग के गीतों को हमारे सामने क्यों गाया इनकी यहाँ क्या आवश्यकता है। उद्धव इनमें प्रेम का अभाव है और इसलिए ये हमारे लिए त्यक्त हैं। हे उद्धव बताओ हम अबलाओं विरहणि नारियों के सम्मुख, हम दुखियों के सम्मुख इस प्रकार की कठोर बातें कहकर तुम्हें क्या मिला। हमारे इन नयनों ने कमल नेत्रों वाले सुंदर मनमोहक सुंदर कृष्ण के मुंह के दर्शन किये हैं। 

ये तुम्हारा किस प्रकार का ज्ञान है कैसा विवेक है कि तुम इन नेत्रों को बंद करके और निर्गुण ब्रम्ह की साधना करने को कहते हो। हम अपने नेत्र बंद करके तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह के पीछे क्यों भटकती रहें। 

हे उद्धव हमें बाइये की आपके इस योग साधना को किस लालसा से अपनाये। क्योंकि हम जानती हैं की इससे हासिल कुछ नहीं होने वाला और इसमें नंदनंदन कृष्ण की भी हानि है। क्योंकि उन्हें त्यागकर ही इसे अपनाना होगा और इसलिए तुम्हारी यह साधना निरर्थक है। 

हे उद्धव हमें तो उन्हीं कृष्ण की बातें सुनाओ जिनके तुम सच्चे मित्र हो और हम उनकी दासी और सेविकाएँ हैं। उन श्याम की कथा और रसभरी हुई बातें सुनकर हम जी उठेंगी हमें प्राण मिल जाएंगे और हमारा विरह भी जाता रहेगा। 

लेकिन तुम उस कृष्ण की बातें न करके किसी निर्गुण अविनाशी ब्रम्ह के विषय में कुछ कहकर इस प्रकार की बातें करते  हो अन्यान्य बातें करते हो ऐसी बातें करते हुए न जाने तुम हमारे प्राणों के प्राण कृष्ण को कहाँ छुपाकर रखे हो उनके बारे में हमें कुछ नहीं बताते। 

विशेष :

  1. प्रस्तुत पदों में उद्धव पर आरोप है की वे गोपियों से कुछ छुपा रहे हैं। 
  2. प्रेमरहित ज्ञान योग की अवहेलना की गई है। 

55. राम केदारो 

जनि चालो, अलि, बात पराई। 
ना कोउ कहै सुनै या ब्रज में नइ कीरति सब जाति हिंराई।।

बूझैं समाचार मुख ऊधो कुल की सब आरति बिसराई। 
भले संग बसि भई भली मति, भले मेल पहिचान कराई।।

सुंदर कथा कटुक सी लागति उपजल उर उपदेश खराई। 
उलटी नाव सूर के प्रभु को बहे जात माँगत उतराई।।

शब्दार्थ :
जनि=मत, न। पराई=दूसरे की। हिराई=नष्ट की। आरती=दुःख, कष्ट, विपदा। बिसराई=भुला दी। कटुक=कड़वी। उर=हृदय। खराई=विरक्ति। उतराई=पारिश्रमिक। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। जिसे उन्होंने सूरसागर से सम्पादित किया है। 

प्रसंग :
यहां पर गोपियाँ जो हैं वह उध्दव को कृष्ण के आलावा और किसी के विषय में चर्चा करने से मना करे हैं। 

व्याख्या :
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव, हे अलि तुम यहॉँ कृष्ण के अतिरिक्त और किसी की बात न चलाओ क्योंकि यहाँ ब्रज में श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी की बात न तो कोई करता है और न सुनता है। 

तुम्हारे बार-बार इस प्रकार की बातें दोहराने से तुम्हारी वह समस्त कीर्ती नई-नई जो तम्हें प्राप्त हुई है वह सारी की सारी कीर्ति नष्ट होये जा रही है जो यहाँ तुमने कृष्ण के सखा के रूप में अर्जित की थी। 

कवि कहना चाहते हैं कि कृष्ण को त्याग निर्गुण ब्रह्म की साधना का उपदेश सुनकर सब लोग तुम्हारे विरुद्ध होते जा रहे  हैं। 

हे उद्धव हम तुमसे यह समाचार पूछती हैं कि क्या उन्होंने अपने कुल की विपदाओं कष्टों को विस्तृत कर दिया है भूल गए हैं। क्या उन्हें कुल की कोई चिंता नहीं है मथुरा जाने पर कृष्ण को बहुत अच्छे अच्छे लोगों का सतसंग प्राप्त हुआ है और जिसके कारण उनकी बुद्धी भी श्लिष्ट हो गई है और इस नई बुद्धी के कारण ही उन्होंने तुम जैसे भले लोगों को हमारे पास भेजकर हमें तूम्हारा परिचय प्राप्त करने का अवसर दिया है। 

गोपियाँ यहाँ पर व्यंग्य कर रहीं हैं की मथुरा में बुरे लोगों की संगति के कारण कृष्ण की मति ऐसी हो गई है उनकी बुद्धि ऐसी हो गई है कि उन्होंने उद्धव को यहाँ योग का संदेश देने के लिए भेजा है। 

हे उद्धव तुम्हारे विवेक के अनुसार तो तुम्हारी यह निर्गुण ब्रम्ह की चर्चा सुंदर है लेकिन हमें कड़वी लगती है हमें अरुचिकर लगती है और इससे हमें विरक्ति होती है हमें तुम्हारी निर्गुण ब्रम्ह संबंधी योग ज्ञान की बातें बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती। और तुम्हारे सखा का अद्भुत न्याय हमें समझ में नही आ रहा नाव तो नदी के मध्य में उलट गई है। यात्री जल में बहता जा रहा है मल्लाह उन्हें डूबने से बचाने के बजाय उनसे उतराई का परिश्रमिक मांग रहा है। 

सुरदास जी कहना चाहते हैं की कृष्ण गोपियों से प्रेम की लव लगाकर उन्हें त्यागकर खुद मथुरा चले गए और अब गोपियाँ मझधार में हैं और कृष्ण उन्हें वियोग साधना के माध्यम से निर्गुण ब्रम्ह की आराधना करने का संदेश देकर और व्यतीत कर रहे हैं यह तो ठीक वैसा ही है जैसे बहते हुए जा रहे यात्रियों से नाव का किराया माँगना। 

विशेष :

  1. कृष्ण के प्रति गोपियों का अनूठा प्रेम भाव उमड़ा है।
  2. गोपियों की वागपटुता का चित्रण हुआ है। 
  3. और सम्पूर्ण पद में सरल शब्दों का अनुपम प्रयोग है। 

56. राग मलार 

याकी सीख सुनै ब्रज को, रे ?
जाकी रहनि कहनि अनमिल, अलि, कहत समुझि अति थोरे।।

आपुन पद-मकरंद सुधारस, हृदय रहत नित बोर। 
हमसों कहत बिरस समझौ, है गगन कूप खनि खोरे।।

घान को गाँव पयार ते जानौ ज्ञान विषयरस भोरे। 
सूर दो बहुत कहे न रहै रस गूलर को फल फोरे।।

शब्दार्थ :
याकी=इसकी। सीख=योग साधना का उपदेश, शिक्षा। अनमिल=परस्पर विरोधी। आपुन=स्वयं। नित=प्रतिदिन। बोरे=डूबे। बिरस=रसहीन। खानी=खोदकर। खोरे=नहाए। पयार=पयाल, धान का भूसा। विषयरस=प्रेमरस। भोरे=भोले, बावले। फोरे=फोड़ने पर। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। जिसे उन्होंने सूरसागर से सम्पादित किया है। 

प्रसंग :
प्रस्तुत पद में उद्धव की कथनी और करनी को स्पष्ट किया गया है। 

व्याख्या :
क्योकि योग सधना संबंधी निर्गुण ब्रम्ह का उपदेश यहाँ ब्रज में कौंन सुनेगा जिनके रहन सहन और व्यवहार में अर्थात कथनी और करनी में इतना विरोध रहता हो उनकी बातें यहाँ कोई भी सुनना पसंद नही करेगा। 

हे उद्धव तुम स्वयं तो श्री कृष्ण के चरण कमल रूपी मकरंद रूपी अमृत में सदैव अपने हृदय को डुबोये रहते हो और हमसे कहते हो उस कृष्ण को रसीम समझो नीरस समझो खुद तो रस में लीन रहते हो और हमें कृष्ण को रसीम समझने को कहते हो उसी प्रकार असम्भव है जिस प्रकार आकाश में कुआँ खोदकर उसके जल में स्नान करने का प्रयत्न करना। धान के गाँव का परिचय उसके चारो ओर फैले पयाल भाग के पुसे से ही प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार तुम्हें देखकर हमें यही लगता है कि तुम स्वयं तो कृष्ण भक्त हो क्योंकि तुम स्वयं उनके चरणों में अनुराग रखते हो और बावले बने हुए हो और फिर क्या यह तुम्हारे लिए उचित है की हम जैसी जो विरहणी जो बालाएँ हैं। उन्हें तुम कृष्ण से विमुख होने का उपदेश देते हो।

तुम्हारी कथनी और करनी में स्पष्ट अंतर् है और इसलिए उचित यही है की तुम हमसे इस विषय में और अधिक चर्चा न करो। 

गूलर का फल फोड़ने से जो स्थिति उतपन्न होती है वह स्थिति उतपन्न हो जाएगी और इसीलिये इस मामले में इस संबंध में हमसे अधिक बातें मत करो। 

गूलर का फल उपर से अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है किन्तु उसे फोड़ने पर मरे कीड़े को देखकर विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और इसलिए तुम अपनी जो बातें हैं उन्हें गुप्त ही रहने दो हम तुम्हारी जो वास्तविकता है उसे जान रही हैं इसे तुम यदि नहीं खुलवाओगे तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा उचित होगा। 

विशेष :
  1. आपुन पद मकरंद सुधारस हृदय रहत नित बोरे में ततगुण है। 
  2. गगन कूप खनि खौरे में दर्शना अलंकार का प्रयोग हुआ है। 

57. राग सारंग

निरख अंक श्याम सुंदर के बार बार लावा छाती
लोचन-जल कागद-मिसि मिलि कै है गई स्याम स्याम की पाती।।

गोकुल बसत संग गिरिधर के कबहुँ बयारि लगी नहिं ताती। 
तब की कथा कहा कहौं, ऊधो, जब हम बेनुनाद सुनि जाती।।

हरि के लाड़ गनति नहिं काहू निसिदिन सुदिन रासरसमाती। 
प्राननाथ तुम कब धौं मिलोगे सूरदास प्रभु बालसँघाती।।

शब्दार्थ :
संदर्भ=संबंधित। निरख=देखते ही। अंक=अक्षर, पत्री। लावती=लगाती है। लोचन=नेत्र। जल=आँसू। कागदमसि=कागज पर की स्याही। पाती=चिठ्ठी, पत्री। बयारि=हवा। ताती=गरम। बेनुनाद=मुरली की मधुर ध्वनि। लाड़=प्रेम। गनती=गिनती, समझती। काहू=किसी को। निसीदीन=रात दिन। रासरसमति=रास-रंग में उन्मत। बालसंघाती=बालपन के साथी, बालमित्र। 

संदर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। जिसे उन्होंने सूरसागर से लिया है। 

प्रसंग :
गोपियाँ उस पत्र का चर्चा कर रहीं हैं जिसमें श्री कृष्ण ने अपना संदेश भिजवाया था। 

व्याख्या :
उद्धव के हाथों कृष्ण की चिठ्ठी को पाकर वे अत्यंत भाव विभोर हो गई थी उसी समय की स्थिति का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण के पत्र में लिखे उनके अक्षरों को देख देखकर गोपियाँ बार-बार उस पत्र को अपने हृदय से लगाने लगी अपनी छाती से लगाने लगी और प्रेमावेश के कारण उनके नेत्रों में उनके आँखों में आँसु आ गए और आँखों से जब आँसू बह रही हैं तो स्याम के द्वारा जो चिट्ठी भेजी गई है वह भीग जाती है और नेत्रों के जल से कागज पर जो लिखा हुआ है उसकी स्याही और नेत्रों का जल आपस में मिल जाने से सारे कागज में स्याही फ़ैल जाती है और उनकी पूरी चिट्ठी काली हो जाती है स्याम अर्थात कृष्ण की पाती है इसलिए काली हो जाती है स्याम अर्थात कृष्ण की पाती है इसलिए काली हो जाती है इस पत्र को निहारते ही गोपियाँ की पूर्व काल की स्मृतियाँ जो है वह साकार हो उठती है। 

जब गोकुल में हम श्री कृष्ण के साथ रहा करती थीं तो हमें कभी वायु की गर्माहट नहीं लगी गोपियाँ कहना चाहती हैं की हमें किसी भी प्रकार का कष्ट नही हुआ हमें कोई भी विपत्ती नहीं आई हे उद्धव हम उस समय की क्या चर्चा तुमसे करें जब हम कृष्ण की मुरली की मधुर ध्वनि सुनकर उनके पास वन में दौड़ी चली जाती थीं और अनेक प्रकार की क्रीड़ाएं उनके साथ किया करती थीं हम कृष्ण के प्रेम में अनेक प्रकार की रास क्रीड़ाएं किया करते थे और उससे आनंदित हुआ करते थे। कृष्ण के प्रेम को पाकर हम इतनी गर्वित होती थीं की अपने सम्मुख किसी को कुछ भी नहीं समझती थीं और इस प्रकार पुरानी बातें याद करके और गोपियाँ अत्यंत भाव विभोर हो गई हैं और कृष्ण को पुकार रहीं हैं। कृष्ण को कहती हैं। 
कि हे प्राणनाथ हे बचपन के साथी आप हमें कब मिलेंगे कब हमें दर्शन देंगे और कब आपका और हमारा मिलन हो सकेगा।

विशेष :

  1. "स्याम-स्याम की पाती" में यमक अलंकार है। 
  2. "लोचन-जल कागद मसि" में ततगुण अलंकार का प्रयोग किया गया है। 

58. राग मारू 

मोहिं अलि दुहूँ भाँति फल होत। 
तब रस-अधर लेति मुरली अब भई कूबरी सौत।।

तुम जो जोगमत सिखवन आए भस्म चढ़ावन अंग। 
इत बिरहिन मैं कहुँ कोउ देखी सुमन गुहाये मंग। 

कानन मुद्रा पहिरि मेखली धरे जटा आधारी।।
यहाँ तरल तरिवन कहैं देखे अरु तनसुख की सारी।।

परम् बियोगिन रटति रैन दिन धरि मनमोहन-ध्यान। 
तुम तों चलो बेगि मधुबन को जहाँ-जहाँ जोग को ज्ञान। 

निसिदिन जीजतु है या ब्रज में देखि मनोहर रूप। 
सूर जोग लै घर-घर डोली, लेहु लेहु धरि सूप।।

शब्दार्थ - दुहुँ भाँती=दोनों अवस्थाओं में। जोगमत=योग-साधना। सुमन=पुष्प। मंग=माँग। गुहाये=सजाई हो। कानन=कानों में। मेखली का घनी तन सुख=एक प्रकार का झीना कपड़ा। सारी=साड़ी। जोग को ज्ञान=योग के ज्ञाता, पारखी। निसिदिन=रात-दिन। जीजतु=जीती हैं। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - गोपियाँ अपने भाग्य को दोष देती हुई कह रही हैं। 

व्याख्या - गोपियाँ उद्धव से कहती हैं हे उद्धव / हे भ्रमर हमें तो दोनों ही अवस्थाओं में चाहें वो कृष्ण का सामीप्य हो या आज जब हम उनसे  दूर हैं इन दोनों ही अवस्थाओं में हमें एक ही जैसा फल मिला है। जब कृष्ण हमारे निकट थे तब मुरली उनके होठों पर हमेशा सजी रहती थी और वह मुरली ही उनके अधरों का पान किया करती थी। उनकी होठों से लगी रहती थी और इस अमृत से हम वंचित थे और आज वह कुबरी, वह कुब्जा हमारी शौत बन गई है। आज मुरली का स्थान उस कुब्जा ने ले लिया है और वह कुब्जा कृष्ण के सामीप्य का लाभ उठा रही है। 

तुम हम विरहणियों को योग साधना के द्वारा प्राप्त निर्गुण ब्रम्ह का उपदेश देने के लिए आये हो और चाहते हो की हम अपने शरीर पर भस्म का लेप कर लें। 

क्या तुमने कभी किसी गोपी को अपने मांग में फूल चढ़ाये देखा है तुम हमें कह रहे की हम अपने कानों में मुद्रा पहन कर नुज की करधनी जटा जुट और अथारी धारण करें। मुझे एक बात बताओ क्या तुमने हम में से किसी को अपने कानों में कर्ण-फूल या तनसुक कपड़े से बनाई हुई साड़ी धारण किये हुए देखा है हम तो कृष्ण के प्रेम के विरह में संतप्त हैं और हम तो पहले ही शरीरिक साज सज्जा और शृंगार साधन को छोड़ दिया है और हम तो पहले से ही योगिनी बनी हुई हैं। 

हे उद्धव उचित यहीं होगा की तुम शीघ्र ही मथुरा नगरी लौट जाओ क्योंकि वहां तुम्हें तुम्हारे इस योग के अनेक पारखी मिलेंगे और इसलिए वहीं तुम्हारे इस योग का आदर सम्मान हो पायेगा हम तो रात दिन कृष्ण के मनोहर रूप को देखकर और स्मरण करके जीवित रही हैं। हे उद्धव तुम अपने इस योग को व्यर्थ ही लादे हुए घर-घर घूम रहे हों अपना समय बर्बाद कर रहे हो। क्योकि यहां तुम्हारे इस योग का कोई ग्राहक नहीं है और इसीलिए तुम वहीं काम कर रहे हो जिस प्रकार कोई व्यपारी अपने ग्राहक से अपने माल को भली भाँती छान-फटक कर खरीदने का आग्रह करता है। 

लेकिन तुम चाहे जितना भी प्रत्यन कर लो हम तुम्हें विश्वास दिलाती कि तुम्हारी इस बेकार की चीज का यहां खरीददार नहीं मिलेगा। इस ब्रज में इसकी कोई उपयोगिता नहीं है इसलिए तुम इसे लेकर के मथुरा चले जाओ। वहाँ इसके पारखी हैं और तुम उन्हीं को जाकर के यह ज्ञान योग की शिक्षा देना। 

विशेष - प्रस्तुत पद में कुब्जा से ईर्ष्या प्रकट की गई है। 

59. राग सारंग 

बिलग जनि मानौ हमारी बात। 
डरपति बचन कठोर कहति, मति बिनु पति यों उठि जात।।

जो कोउ कहत जरे अपने कछु फिरि पाछे पछितात। 
जो प्रसाद पावत तुम ऊधो कृस्न नाम लै खात।।

मनु जु तिहारो हरिचरनन तर अचल रहत दिन-रात। 
'सूर-स्याम तें जोग अधिक' केहि-केहि आयत यह बात ?।।

शब्दार्थ : विलग जनि मानौ=बुरा मत मानो। पति उठी जात=मर्यादा  जाती रहती है। जरै अपने=अपना जी जलने पर। रहत=रहता है। तर=निचे। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं जिन्होंने इन पदों को सूरसागर से लिया है। 

प्रसंग :
प्रस्तुत पद में गोपियाँ अपने द्वारा कहे गए कटु वचनों के लिए उद्धव से जो कह रहीं हैं उसी का वर्णन प्रस्तुत पद में है। 

व्याख्या : हे उद्धव, तुम हमारी बात का बुरा मत मानना हम तुमसे कठोर वचन कहती तो हैं पर डरती हैं, हमें डर लगता है क्योंकि जो बिना बिचारे बिना विवेक के कठोर वचन कहता है उसकी पति अर्थात उसकी मर्यादा उसी प्रकार नष्ट हो जाती है। 

जिस प्रकार तुम्हारी हो गई है क्योंकि तुमने कृष्ण को त्यागकर निर्गुण ब्रम्ह की उपासना करने को कहते हो। 
यदि कोई स्वयं अपना जी जलने पर उटपटांग बातें कह जाय लेकिन फिर वह मन ही मन पछताता रहता है। हे उद्धव आपको जो यहाँ इतना प्रसाद मिल रहा है वह केवल कृष्ण का नाम लेने के कारण नहीं मिल रहा है अर्थात जो सम्मान आपको यहाँ पर मिल रहा है ब्रज में मिल रहा है वो इसी कारण मिल रहा है की आपने कृष्ण का नाम लिया।

आपका मन जो है वह श्री कृष्ण के चरणों में रात दिन दृंढता पूर्वक लगा रहता है और फिर भी आपने यह बात कैसे कह दी कि योग जो है आपका वह कृष्ण से श्रेष्ठ है, हे उद्धव कृष्ण भक्त होने पर भी आप ऐसी बातें कर रहें हैं क्या यह आपकी कृतघ्नता नही है। 

विशेष :

  1. इस प्रकार गोपियाँ प्रस्तुत पद में उद्धव की कृतघ्नता और अहसान फरामोशी पर अक्क्षेप कर रही हैं। 
  2. गंभीर दिक्य का भाव यहाँ पर गोपियों के द्वारा दर्शाया गया है।

60. राग सारंग 

अपनी सी कठिन करत मन निसिदिन। 
कहि कहि कथा, मधुप, समुझावति तदपि न रहत नंदनंदन बिन।।

बरजत श्रवन सँदेस, नयन जल, मुख बतियां कछु और चलावत। 
बहुत भांति चित धरत निठुरता सब तजि और यहै जिय आवत।।

कोटि स्वर्ग सम सुख अनुमानत हरि-समीप समता नहिं पावत। 
थकित सिंधु-नौका  खग ज्यों फिरि फिरि फेर वहै गुन गावत।।

जे बासना न बिदरत अंतर तेइ-तेइ अधिक अनूअर दाहत। 
सूरदास परिहरि न सकत तन बारक बहुरि मिल्यों है चाहत।।

शब्दार्थ :  अपनी सी=अपने समान/जैसी, भरसक प्रयत्न करना। निसिदिन=दिवा रात्रि। तदपि=तो भी। बरजत=रोकती हैं। जिय=हृदय। खग=पक्षी। फिरि-फिरि=लौटकर। फेरी=पुनः। बासना=इच्छा। बिदरत=फटना। अंतर्=हृदय। अनुअर=निरंतर। दाहत=दग्ध करना। परिहरि=त्यागना, छोड़ना। तन=शरीर। बारक=एक बार। बहुरी=पुनः। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। इन पदों का सम्पादन उन्होंने सूरदास की रचना सूरसागर से किया है। 

प्रसंग : इस पद्यांश में सूरदास जी ने गोपियों की विरह व्यथा के कारण जो स्थिति उत्पन्न हुई है और विरह के कारण उनसे मन और शरीर में किस प्रकार सामंजस्य नही है उसको इस पद के माध्यम से बताया है। 

व्याख्या : गोपियाँ उद्धव से अपनी विवश्ता का वर्णन करते हुए कहती हैं कि हे उद्धव हम रात दिन अपने मन को अपने समान कठोर बनाये रखने का भरसक प्रत्यन करती रहती हैं। 

हे मधुप हम अपने इस मन को खूब समझाने का प्रयत्न करती हैं। अनेक प्रकार की कथाएँ कहती हैं ताकि यह कृष्ण से दूर हो जाए किन्तु यह चंचल मन हमारे सभी प्रयत्नों को निष्फल कर देता है। 

हम अपने कानों को कृष्ण का संदेश सुनने से रोकती हैं उनकी याद न आये और उनकी याद आकर आँखों में आँसू न आये इसके लिए हम कृष्ण के अलावा अन्य विषयों पर बात-चित करती हैं हम इस निष्ठुर मन को अनेक प्रकार से कठोर और दृढ़ बनाने का प्रयत्न करती हैं। 

लेकिन अन्य सभी बातों को छोड़कर हमारे हृदय कृष्ण के सानिध्य से जो सुख की अनुभूति करते हैं उसकी तुलना में करोड़ों स्वर्गों से प्राप्त सुख भी कुछ नहीं है अर्थात कृष्ण का सानिध्य और उससे प्राप्त सुख हमारे लिए श्रेष्ठ है। 

आगे गोपियाँ कहती हैं कि हमारा मन जो समुद्र में चलने वाली नौका होती है उसमें बैठे हुए उस थके हुए पक्षी के समान है। जो बार-बार उड़कर इधर-उधर जाने का प्रयास करता है लेकिन उसे कोई अन्य स्थान नहीं मिलता। अन्य कोई आसरा नहीं मिलता तो वह थक वापस जहाज पर ही वापस लौट लाता है। हमारा मन भी उसी प्रकार क्षण भर के लिए अन्य बातों में आकर्षण ढूंढने का प्रयत्न करता है किन्तु जब वहाँ उसे कोई सुख प्राप्त नहीं होता तो बार-बार लौटकर कृष्ण के ही गुण गाने लगता है। 

हमारा हृदय कृष्ण के वियोग से अनवरत दग्ध रहता है। दुखी रहता है। हम अपने शरीर को त्यागना नही चाहती क्योंकि यह शरीर जो है वह हृदय से कृष्ण के मिलने की आस लगाए हुए वियोग सुख की अनुभूति रखता है। 
हमारा यह हृदय दृढ़ नहीं हो पाता वह प्राणों को धारण किये हुए रहता है। 

विशेष :

  1. "थक्ति-खग में उपमा अलंकार है। 

श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति

61. राग धनाश्री 

रहु रे, मधुकर ! मधुमतवारे !
कहा करौं निर्गुन लै कै हौं जीवहु कान्ह हमारे।।

लोटत नीच परागपंग में पचत, न आपु सम्हारे। 
बारंबार सरक मदिरा की अपरस कहा उघारे।।

तुम जानत हमहूँ वैसी हैं जैसे कुसुम तिहारे। 
घरी पहर सबको बिलमावत जेते आवत कारे।।

सुन्दरस्याम को सर्बवस अप्र्यो अब कापै हम लेहिं उधारे।।

62. राग बिलावल 

काहे को रोकत मारग सूधो ?
सुनहु मधुप ! निर्गुन-कंटक तें राजपंथ क्यों रुधो ?

कै तुम सिखै पाठए कुब्जा, कै कही स्मामधन जू धौं ?
बेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ौ जुवतिन जोग कहूँ घौं ?

ताको कहा परेखो कीजै जानत छाछ न दूधौ। 
सूर मूर अक्रूर गए लै ब्याज निबेररत ऊधौ।।

शब्दार्थ : सूधो=सीधा, सरल, अकंटक। राजपथ=राजपथ के समान अकंटक, बाधा रहित। रुधो=रोकते हो। कै=यातो। सिखै=सीखकर। पठाए=भेजे गए हो। धौ=सम्भवतः। समति=स्मृति। जुवतिन=नारियाँ, युवतियाँ। परेखो=बुरा मानना। मूर=मूलधन, मूलराशि। निवेरत=उगाहने, वसूल करने। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग : गोपियाँ उद्धव के द्वारा बार-बार यग और निर्गुण ब्रम्ह का उपदेश देकर प्रेम के सरल और सीधे मार्ग को छोड़कर कंटकपूर्ण टेढ़े मेढ़े योग मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने पर खीज का प्रदर्शन करते हुए कहती है या कर रही हैं। 

व्याख्या : खिज का प्रदर्शन करे हुए गोपियाँ उद्धव से कहती हैं, हे उद्धव तुम हमारे सीधे-साधे सरल प्रेम मार्ग में बाधा क्यों बन रहे हो योग मार्ग का उपदेश देकर हमें प्रेम मार्ग से विचलित क्यों कर रहे हो। 

हे उद्धव राजपथ के समान बाधा रहित कंटक रहित प्रेम मार्ग को तुम काँटों से भरे हुए अनुचित और कष्ट देने वाली योग मार्ग से क्यों अवरुद्ध कर रहे हो तुम्हारा योगमार्ग जो है, वह कठिन, असाध्य है और इसीलिए हम अपने सादे प्रेम मार्ग को छोड़कर उसे अपना नही सकती उद्धव ऐसा लगता है कि कुब्जा ने हमारे प्रति जो उसकी ईर्ष्या है सिर्ष पर होने के कारण तुम्हें सिखा पढ़ाकर हमारे पास भेजा है ताकि हम कृष्ण को भूलकर योग में भटक जाए और वह कृष्ण के प्रेम को अकेली भोकती रहे उनके साथ बिहार करे या फिर कहीं लगता है कि श्याम ने ही कहीं तुम्हें समझा बुझाकर तुम्हें सिखाकर तुम्हें ये योग का सन्देश देकर हमारे पास इसलिए भेजा हो ताकि वह कुब्जा के प्रेम का भोग कर सके हे उद्धव वेद पुराण स्मृतियाँ आदि सम्पूर्ण धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करके देख लो। 

उनमें कहि भी स्पष्ट नही है, की कोमल नारियों को योग की शिक्षा देनी चाहिए। अब हम तुम्हारे जैसे मुर्ख व्यक्ति की बात का क्या बुरा माने जिसे दूध और छाछ का अंतर ही पता नही है। हमारे कृष्ण तो दुग्ध के समान सर्व गुण सम्पन्न हैं और तुम्हारे निर्गुण, छाछ के समान सार हीन हैं किन्तु तुम स्वयं उन दोनों में अंतर नहीं समझ पा रहे हो तो तुम्हारी बात का बुरा क्या माना जाए। हे उद्धव मूलधन को तो अक्रूर ही यहां से ले गए थे मूलधन अर्थात श्री कृष्ण और अब तुम यहां व्याज लुगाने आये हो। 

यानी अब यहां जो उसकी थोड़ी सी पड़ी स्मृति शेष है वह भी तुम ले जाना चाहते हो ब्याज रूप में और हमें निर्गुण ब्रम्ह का उपदेश दे रहे हो। 

विशेष :

  1. प्रेममार्ग को राजपथ के समान बताया है। 
  2. योगमार्ग को कंटक पूर्ण तथा अगम्य बताया है। 
  3. घनानंद भी अपने कवित्त में ऐसा ही कहते हैं - " अति सूधो स्नेह को मारग है जहाँ नेकु सयानक बाक नहीं। "
  4. निर्गुण कंटक में रूपक अलंकार है। 
  5. राजपथ में रूप का अतिसंयोक्ति। 
  6. मूर उधो में लोकोक्ति का प्रयोग किया गया है। 

63. राग मलार 

बातन सब कोऊ समुझावै। 
जेद्वि बिधि मिलन मिलैं वै माधव सो बिधि कोउ न बतावै।।

जधदपि जतन अनेक रचीं पचि और अनत बिरमावै। 
तद्धपि हठी हमारे नयना और न देखे भावै।।

बासर-निसा प्रानबल्ल्भ तजि रसना और न देखे भावै।।
सूरदास प्रभू प्रेमहिं, लगि करि कहिए जो कहि आबै।।

 शब्दार्थ :

बातन=बातों के द्वारा। पचि=थक गई। अनत=अन्यत्र। बिरमावै=विश्राम करते हैं। भावे=अच्छा लगता है। बासर-निशा=रात-दिन। तजि=त्याग, छोड़कर। रसना=जिहवा। लगि=नाते से। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियाँ उद्धव के उपदेश पर किस प्रकार खिझ उठी हैं, उसका वर्णन किया गया है। 

व्याख्या :

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि सब लोग हमको बातों से ही समझाने का प्रयास कर रहें हैं बातों-बातों में ही रिझाना जानते हैं किन्तु कोई भी ऐसा उपाय नहीं बताता जिससे श्री कृष्ण से हमारा मिलन सम्भव हो जाय। 

हम तो कृष्ण के दर्शन की प्यासी हैं किन्तु लोग हमें कृष्ण के दर्शन के उपाय न बताकर केवल बातों से ही हमारा परितोष करना चाहते हैं। 

हमने कृष्ण से मिलने के अनेक प्रयत्न किये किन्तु वह कहि अन्यत्र अर्थात कुब्जा के पास मथुरा में आनंद के साथ आनंद विहार करते रहे और उन्होंने हमारी को खोज खबर नहीं ली। 

और इतना होने पर भी हमारे नयना, हमारे हटिले जो नेत्र हैं वो कृष्ण के दर्शनों के प्यासे हैं उन्हें कुछ और देखना अच्छा नहीं लगता। 

और हमारी ये जो जीभ है वह रात दिन श्री कृष्ण के गुणों का गान करती रहती है और उनको छोड़कर किसी और के गुणों को गान करती रहती है और उनको छोड़कर किसी और के गुणों को गाने में इसका मन नहीं लगता। 

सूरदास जी कहते है की गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं की हे उद्धव तुम तुम्हारे इस कृष्ण प्रेम को चाहे जो समझो और चाहे जो कहो इससे हमारे लिए कोई अंतर नही पड़ने वाला हम तो मन वचन और कर्म से उस कृष्ण की ही अनुरागिनीं हैं। 

अब से तुम्हारी इन बातों का तुम्हारी इस उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। 

विशेष :

  1. सम्पूर्ण पद में अमर्ष संचारी भाव है। 
  2. गोपियाँ की एकांक प्रेम निष्ठा और कृष्ण के प्रति एकांत समर्पण का भाव दर्शनीय हैं चाहे कोई कुछ भी कहे वे कृष्ण की अनुरागिनीं रहेंगी। 
  3. ऐसा प्रस्तुत पद ये सूरदास जी ने वर्णन किया है। 

64. राग सारंग 

निर्गुन  कौन देस को बासी ?
 मधुकर ! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझति साँच, न हाँसी।।

को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि , को दासी ?
कैसो बरन, भेस है कैसो केहि रस कै अभिलासी।।

पावैगो पुनि कियो आपनो जो रे ! कहैगो गाँसी।
सुनत मौन है रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी।।

शब्दार्थ : 

वासी=निवासी। मधुकर=भ्रमर। सौह दै=सौगंध देकर। बुझति=पूछती हैं। साँच=सत्य बात। हाँसी=हँसी नहीं कर रहीं। जनक=पिता। जननि=माता। नारि=पत्नी। दासी=सेविका। वरन=वर्ण, रंग। भेश=वेश-भूषा। गाँसी=कपट की बात। नासी=नष्ट हो गई। मति=बुद्धि, विवेक। 

संदर्भ : 

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियाँ निर्गुण ब्रम्ह के विषय में अत्यंत मनोरंजक प्रश्न पूछकर उद्धव का हँसी उड़ा रहीं हैं। 

व्याख्या :

सूरदास जी कहते हैं की गोपियाँ भ्रमर के  माध्यम से पूछ रहीं हैं, हे उद्धव तुम्हारा ये निर्गुण किस देश में निवास करता है। कहाँ का रहने वाला है उसका पता ठिकाना क्या है, हे मधुकर हम कसम खाकर कहती हैं, कि हमें नहीं पता की वह कहाँ रहता हैं किस देश में निवास करता है और इसलिए हम तुमसे सच-सच पूछ रही हैं कोई हँसी मजाक नहीं कर रहीं हैं और और इसलिए हमें इस निर्गुण ब्रम्ह के निवास के बारे में ठीक ठीक बता दो तुम हमें बताओ की तुम्हारे इस निर्गुण ब्रम्ह का पिता कौन है? इसकी माता कौन है इसकी दासी कौंन हैं और ये जो तुम्हारा निर्गुण ब्रम्ह है। उसका रूप रंग उसकी वेश-भूषा किस प्रकार की है और उसकी रूचि किस प्रकार के रस में है। अर्थात उसकी रूचि किस प्रकार के कार्यों में है और आगे उद्धव को सावधान करते हुए गोपियाँ कहती हैं, की हे उद्धव सुन लेना की तुमने अपने निर्गुण ब्रम्ह के बारे में यदि कोई झूटी बात कही कोई कपट पूर्ण बात कहि तो फिर इस करनी का फल भी तुम्हें ही भुगतना पड़ेगा। गोपियों के मुँह से इस प्रकार की बातों को सुनकर उद्धव थका सा रह गया मौन रह गया चुप रह गया। 

गोपियों की इस प्रकार चतुराई पूर्ण बातों को सुनकर उद्धव जो है मौन खड़े रह गए उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला ऐसा प्रतीत हुआ मानो इनका समस्त ज्ञान और विवेक उनका साथ छोड़ गया हो प्रस्तुत पद व्यंग्य काव्य का सुंदर उदाहरण है सम्पूर्ण पद में गोपियो का उद्धव के प्रति व्यंग्य भाव प्रस्तुत हुआ है। अपने वाग वैदग्ध से उद्धव की हंसी उड़ाती हैं परन्तु साथ ही साथ उन्हें यह विश्वास भी दिलाती हैं की वे ब्रम्ह के विषय में जिज्ञासा रखती हैं। 

विशेष :

  1. गोपियों द्वारा उद्धव की हंसी उड़ाई गई है। 
  2. गोपियाँ उद्धव को नीचा दिखाने की कोशिस कर रही हैं। 

65. राग केदारा

नाहिंन रह्यो मन में ठौर।
नंदनंदन अछत कैसे आनिए उर और ?

चलत, चितवन, दिबस, जागत,सपन सोवत राति।
हृदय ते वह स्याम मूरति छन न इत उत जाति।।

कहत कथा अनेक ऊधो लोक-लाभ दिखाय।
कहा करौं तन प्रेम-पूरन घट न सिंधु समाय।।

स्याम गात सरोज-आनन ललित अति मृदु हास।
सूर ऐसे रूप कारन मरत लोचने प्यास।।

शब्दार्थ :

नाहिन=नहीं है। ठौर=स्थान। अछत=रहते हुए। आनिए=लाए। उर=हृदय। दिवस=दिन। राति=रात। छन=एक पल भी। इत=इधर। उत=उधर। लोक-लाभ=सांसारिक लाभ। समाय=समाहित होना। गात=शरीर। सरोज-आनन=कमल के समान मुख। ललित=आकर्षक। मृदु=मधुर। हास=हँसी। रूप-कारन=रूप के लिए। लोचन=नेत्र। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

निर्गुण ब्रम्ह को स्वीकार करने में अपनी विवस्ता प्रकट करते हुए गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं। की 

व्याख्या :

उद्धव मन में किसी के लिए स्थान नहीं रहा है हे उद्धव तुम ही बताओ की नंदनंदन श्री कृष्ण के इस हृदय में रहते हुए। हम किसी अन्य को अर्थात निर्गुण ब्रम्ह को अपने हृदय में कैसे ला सकती हैं और इसलिए हे उद्धव तुम्हारे इस निर्गुण ब्रम्ह को स्वीकार करने में हम असमर्थ हैं। 

हमें तो चलते फिरते इधर उधर देखते दिन में जागृत अवस्था में तथा रात को सोते समय स्वप्न अवस्था में भी श्री कृष्ण की मधुर मूर्ति लुभाती है। और 

हमारे हृदय से यह मोहनी मूरत छड़ भर के लिए इधर उधर नहीं जातीं ओझल नहीं होती। हम तो जीवन के प्रत्येक अवस्था में श्री कृष्ण के ध्यान में मग्न रहती हैं। 

हे उद्धव आप योग और निर्गुण ब्रम्ह के संबंध में अनेक कथाएं सुनाकर हमें सांसारिक लाभ का मार्ग सुझा रहे हैं हमारे लिए मोक्ष प्राप्ति का साधन उपलब्ध करा रहें हैं हमारे लिए मोक्ष प्राप्ति का साधन उपलब्ध करा रहे हैं किन्तु हम क्या करें इस मार्ग को नहीं अपना सकते। 

हम तो कृष्ण प्रेम के लिए पुनः शरीर धारण करने के लिए भी तैयार हैं तत्पर हैं क्योकि हमारा यह तन कृष्ण प्रेम से परिपूर्ण है। 

और जिस प्रकार सागर का जल सिंधु का जल एक छोटे से घड़े में नहीं समा सकता उसी प्रकार हमारे इस छोटे से हृदय में तुम्हारा अनंत ब्रम्ह नहीं समा सकता। 

हे उद्धव हमारे श्री कृष्ण का शरीर सांवला है मुख कमल के समान सुंदर है मनमोहक है उनकी हंसी मधुर है और बर्बश अपने ओर खीचते वाली है और इसलिए हमारे जो नेत्र हैं कृष्ण की ऐसी आकर्षक रूप माधुर्य का पान करके तृप्त होने के लिए व्याकुल बने रहते हैं। 

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद में गोपियों की कृष्ण प्रेम विषयक विवशता एकांत दृढ प्रेमनिष्ठा की अभिव्यक्ति अत्यंत मार्मिक रूप से प्रस्तुत हुई है। 
  2. सरोज आनन में रूपक अलंकार है। 
  3. चलत चितवन कहत कथा में अनुप्रास अलंकार है। 
  4. आकर्षक बिम्ब विधान का प्रयोग सूरदास जी द्वारा किया गया है। 

66. राग मलार

ब्रजजन सकल स्याम-ब्रतधारी।
बिन गोपाल और नहिं जानत आन कहैं व्यभिचारी।।

जोग मोट सिर बोझ आनि कैं, कत तुम घोष उतारी ?
इतनी दूरी जाहु चलि कासी जहाँ बिकति है प्यारी।।

यह संदेश नहिं सुनै तिहारो है मंडली अनन्य हमारी।
जो रसरीति करी हरि हमसौं सो कत जात बिसारी ?

महामुक्ति कोऊ नहिं बूझै, जदपि पदारथ चारी।
सूरदास स्वामी मनमोहन मूरति की बलिहारी।।

शब्दार्थ : ब्रजजन=ब्रजवासी। सकल=सारे। स्याम-ब्रतधारी=कृष्ण प्रेम का व्रत धारण करने वाले। आन=अन्य। मोट=गठरी। घोष=अहीरों की बस्ती-गोकुल। प्यारी=महँगी। तिहार=तुम्हारा। अनन्य=अनोखी, विचित्र। रसरीति=प्रेम-रस-विहार, प्रेम-क्रीड़ाएँ। बिसारी=भुलाई। कत=कैसे। पदार्थ चारी=धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष, नामक चार पदार्थ। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियाँ ब्रज निवासियों के भक्ति का वर्णन कर रहीं हैं। 

व्याख्या :

अगोपियाँ श्री कृष्ण प्रेम के समक्ष मोक्ष को तुच्छ  समझती हैं और गोपियाँ की ही भाँती अन्य ब्रजवासी भी श्री कृष्ण प्रेम धारी हैं और कृष्ण प्रेम के लिए मोक्ष को ठुकरा सकते हैं। 

गोपियाँ कहती हैं, हे उद्धव हमारे  सम्पूर्ण ब्रजवासी भी कृष्ण प्रेम के व्रत को धीरता और दृढ़ता से धारण किये हुए हैं, वे श्री कृष्ण के अलावा और किसी को प्रेम करना तो दूर उसके प्रति आकर्षित भी नहीं हो सकते हम यदि गोपाल के अतिरिक्त अन्य किसी की बात भी करें अर्थात तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह  बातें भी करें तो हम व्यभिचारी कहीं जाएंगी की पतिव्रता नारी किसी अन्य को अपने मन में नही ला सकती और यदि वह ऐसा करती है तो वह व्यभिचारीणी है और हम तो श्री कृष्ण की पतिव्रताएँ हैं और तुम्हारे ब्रम्ह का विचार करके व्यभीचारी नहीं कहलाना चाहती। और 

हे उद्धव तुम अपनी योग की गठरी का भारी बोझ यहाँ अहीरों की बस्ती में गोकुल में लाकर क्यों उतारे हो यहां इस निरर्थक वस्तु का कोई ग्राहक नहीं है। तुम ऐसा करो तुम इसे यहां से दूर काशी ले जाओ वहां के लोग इसे जानते हैं। उसका मर्म समझते हैं और वह यहाँ प्यारी बिक सकेगी। अर्थात महँगी बिक सकेगी हे उद्धव हमारी जो यह मंडली है विलक्षण मंडली है और श्री कृष्ण के प्रेम में निमग्न है और इसलिए यहां तुम्हारा निर्गुण ब्रम्ह संबंधी उपदेश कोई नहीं सुनने वाला हे उद्धव तुम्ही बताओ कृष्ण ने जो यहां हमारे साथ प्रेम लीलाएँ की भी जो रास रचाया था वह कभी भुलाया जा सकता है। 

हे उद्धव हमें तो कृष्ण के प्रेम में ही तुम्हारे उन चारो पदार्थों की प्राप्ति हो चुकी है उन पदार्थों से युक्त युक्ति प्राप्त हो चुकी है और इसलिए निर्गुण ब्रम्ह के मार्ग पर चलकर प्राप्त होने वाली भक्ति का हमारे लिए कोई आकर्षण नहीं है कोई मोल नहीं है हम तो अपने स्वामी श्री कृष्ण की मूर्ति की सुंदर मूर्ति पर प्राण निवछावर किया करती हैं। 

विशेष :

  1. गोपियों को कृष्ण प्रेम से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष नामक ये चारो पदार्थ प्राप्त थे अतः निर्गुण ब्रम्ह को इसके अपनाने से केवल मोक्ष ही प्राप्त होता वे इसे निरर्थक सा समझती थीं। 
  2. प्रादेशिक प्रयोग है जिसका पंजाब में प्रचलन है प्यारी का अर्थ महँगी से है।

67. राग धनाश्री

कहति कहा ऊधो सों बौरी।
जाको सुनत रहे हरि के ढिग स्यामसखा यह सो री !

हमको जोग सिखावन आयो, यह तेरे मन आवत ?
कहा कहत री ! मैं पत्यात री नहीं सुनी कहनावत ?

करनी भली भलेई जानै, कपट कुटिल की खानि।
हरि को सखा नहीं री माई ! यह मन निसचय जानि।।

कहाँ रास-रस कहाँ जोग-जप ? इतना अंतर भाखत।
सूर सबै तुम कत भईं बौरी याकी पति जो राखत।।

शब्दार्थ :

बौरी=बावली, पगली। ढिंग=पास, समीप। सखा=मित्र। पत्यात=विशवास करती हूँ। कपट=छल। खानि=खजाना। निसचय=निश्चय। भाखत=कहते हैं। कत=क्यों। याकी=इसकी। पति=विश्वास। राखत=करती हो। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियों का मानना है कि योग का संदेश लाने वाला कृष्ण का सखा कभी नहीं हो सकता यह तो कोई धूर्त या कपटी है व्यंग्य कटु सुनाते हुए कहती हैं। 

व्याख्या :

एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है की हे पगली तू उद्धव से क्या बात कर रही है। अरी पगली यह श्याम का सखा है यह कृष्ण का साथी है मित्र है जो सदा उनके पास निवास करता है। 

और जिसके विषय में हम कब से सुनते आ रही हैं क्या यह समझ रही है की योग की शिक्षा देने आया है। 

अरे तू क्या कह रही है मुझे तो इस बात का वीश्वास ही नही हो रहा की यहां हमें योग का संदेश देने के लिए आया है योग का संदेश देने के लिए उपदेश देने के लिए आया है तुम्ही बताओ प्रसन्न होगी कौन सी कहावत की सज्जन और भले लोग जो होते हैं अपनी प्रकृति के अनुसार दूसरों की भलाई में लगे होते हैं या रहते हैं और नीच मनुष्य अत्यंत कपटी होते हैं। और दूसरों का कार्य बिगाड़ने में खुशी अनुभव करते हैं और इसलिए हे सखि ये अपने मन में तूं निश्चय जान ले। यह कृष्ण का सखा नहीं है यह बात तूँ अपने मन में जान ले निश्चय जान ले। 

हे सखी थोड़ा इस बात पर विचार करो की कहाँ तो श्री कृष्ण के साथ प्रेम विहार क्रीड़ाओं का आनंद और कहाँ योगसाधना का तपस्या का कठिन कार्य वो कैसी परस्पर विरोधी बातें कर रहा है यदि यह कृष्ण का सखा होता तो हमें उनके प्रेम से विमुख होकर योग की तपस्या का उपदेश नहीं देता। अरे तुम सब क्या पागल हो गई हो जो इसकी बातों को विशवास करके इसे कृष्ण के सखा के समान आदर दे रही हो यह तो कोई छलिया है कोई बहरूपिया है जिसे यहां से अपमानित करके भगा देना ही उचित है। 

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद में अत्यंत मार्मीक एवं चुभने वाला व्यंग्य किया गया है। 
  2. कपट कुटिल की खानी में वृत्यानुप्रास अलंकार है।

68. राग रामकली

ऐसेई जन दूत कहावत !
मोको एक अचंभी आवत यामें ये कह पावत ?

बचन कठोर कहत, कहि दाहत, अपनी महत्त गवावत।
ऐसी परकृति परति छांह की जुबतिन ज्ञान बुझावत।।

आनुप निजल रहत नखसिख लौं एते पर पुनि गावत।
सूर करत परसंसा अपनी, हारेहु जीति कहावत।।

शब्दार्थ :

ऐसेइ=ऐसे। जन=आदमी। मोको=मुझे या में=इसमें। महत्त=महत्ता, गुरुत्व, सम्मान। परकृति=प्रकृति संसर्ग अथवा छाया का प्रभाव। जुवतिन=युवतियों, अबलाओं, गोपियों को। बुझावत=समझाते हैं। आपुन=स्वयं। निलज=निर्लज्ज। नखसिख-लौ=ऊपर से नीचे तक पूरी तरह। एते पर=इतने पर भी। गावत=चर्चा करते हैं। परसंसा=प्रसंसा। हारेहु=हार। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियाँ योग का संदेश लाने वाले उद्धव पर कटाक्ष कर रहीं हैं। 

व्याख्या :

गोपियों के मत में सफल दूत वहीं हैं जो वास्तविक संदेश न कहकर दिन भर की झूटी बातें बढ़ चढ़कर सुनाया करते हैं। गोपियाँ उद्धव के संदेश पर संदेह करती हुई और उसके योग पर व्यंग्य करती हुई आपस में बातचीत करती हैं और कहती हैं "ऐसेई जन दूत कहावत।" ऐसे ही लोग सफल दूत कहे जाते हैं जो वास्तविक संदेश न कहकर इधर-उधर की बातें करके सुनाया करते हैं।

मुझे एक बात का आश्चर्य है की ऐसा करने पर अर्थात योग का संदेश सुनाकर हमें संतप्त करने पर इन्हें क्या लाभ होता है? ऐसे लोग दूसरों से कठोर वचन कहते हैं जैसे ये उद्धव हमें कृष्ण को भुलाकर निर्गुण ब्रम्ह की उपासना करने को कह रहे हैं और इस प्रकार के वचनों से दूसरों को दुखी करते हैं संतप्त करते हैं और इस प्रकार अपनी महत्ता और सम्मान भी गवां बैठते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति पर संगीत का प्रभाव पड़ता है जिसके कारण वह बौरा जाता है पागल हो जाता है और उटपटांग बातें करने लगता है देख लो उद्धव को ये इस बात के साक्षात प्रमाण हैं कुब्जा के संगत में रहने के कारण इसकी बुद्धि भ्रस्ट हो गई है और जिसके कारण ये अबलाओं को योग और निर्गुण ब्रम्ह की शिक्षा देने यहां पर आ गए हैं इन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा की इनका कार्य कितना अनुचित है। 

ऐसे लोग पूर्णतः निर्लज होते हैं और अपनी निर्लज्ज कार्यों के लिए निर्लजता का अनुभव करके अपनी ही हाँके चले जाते हैं ये लोग स्वयं ही अपनी प्रसंसा करते करते अपनी हार को भी जीत कहते हैं अपनी पराजय को भी विजय कहते हैं। 

ये उद्धव ज्ञान में विवेक में हमसे हार चुके है। क्योंकि एक बात का तो उत्तर नहीं दे पाते फिर भी वह स्वयं को विजयी घोषित कर रहे हैं और निररंतर निर्गुण ब्रम्ह से संबंधित अपनी रट लगाए हुए हैं। 

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद में उध्दव के साथ साथ कुब्जा पर भी व्यंग्य किया गया है। 
  2. कुब्जा स्वयं निर्लज है जो हमारे प्रेम को खुद भोग रही है और उसके समीप रहकर उद्धव भी निर्लज्ज हो गए हैं और अपनी हार को भी जित का दर्जा दे रहे  हैं। 
  3. कठोर कहत कहि में वृत्यानुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है।

69. राग धनाश्री

प्रकृति जोई जाके अंग परी।
स्थान-पूँछ कोटिक जा लागै सूधि न काहु करी।।

जैसे काग भच्छ नहिं छाड़ै जनमत जौन धरी।
धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी ?

ज्यों अहि डसत उदर नहिं तैसे हैं एउ री।

शब्दार्थ : प्रकृति=स्वभाव, आदत। स्वान=कुत्ता। कोटिक=करोड़ो। सूधी=सीधी। न काहूकरी=कोई नहीं कर सका। काग=कौआ। भच्छ=खाने न खाने योग्य। कारी कमरी=काला कंबल। अहीर=सर्प। जनमत=जन्म लेते ही। जौन धरी=जिस समय। धरनी धरि=जिस समय। धरनी धरि=टेक पकड़ रखी है, स्वभाव बन गया है। एउ=यह भी। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियों के द्वारा उध्दव की तुलना श्वान अर्थात कुत्ते से की जा रही है। 

व्याख्या :

एक गोपी दूसरी गोपी कहती है की आज तक करोड़ो प्रयत्न क्ररके भी कोई कुत्ते के पूँछ को सीधा नही कर पाया और इसका कारण क्या बताया? इसका कारण यह है की पूँछ का स्भाव सदा टेढ़ा है और स्वभाव को बदला नहीं जा सकता। और इसलिए अब से सीधा नहीं किया जा सकता। एक और उदाहरण देते हुए कहती हैं की कौआ जन्म से ही न खाने योग्य पदार्थ को खाना प्रारम्भ कर देता है कौआ अभक्षी को भी अर्थात खाने व न खाने योग्य पदार्थ को भी खाना प्रारम्भ कर देता है और पुरे जीवन इस स्वभाव को नहीं छोड़ता तुम्ही बताओ की धोने से काले कंबल का रंग उतर सकता है। क्या? जैसे सांप है वह दूसरों को डसने का काम करता है लेकिन दूसरों को डसने से उसका पेट नही भरता क्योकि उसके पेट में तो कुछ जाता ही नहीं फिर भी उसका स्वभाव पड़ गया है डसना और इसलिए मैं इसे छोड़ता नही और ऐसे ही यह उद्धव हैं दूसरों को दुखी करना इनका स्वभाव बन गया है। 

इन्हें इस बात की कोई चिंता नही है कि इनके व्यवहार का क्या परिणाम होगा? बस ये तो ऐसे ही हैं अर्थात दुसरों को दुखी करना इनका स्वभाव बन गया है इन्हें इसी बात में आनंद मिलता है। 

विशेष :

  1. गोपियों ने मानव स्वभाव का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। 
  2. दूसरे पंक्ति से चौथे पंक्ति तक स्वभावोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है। 
  3. स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सुधि न काहूकरी में अर्थांतर उपन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

70. राग रामकली

तौ हम मानैं बात तुम्हारी।
अपनो ब्रम्ह दिखावहु ऊधो मुकुट-पितांबरधारी।।

भजि हैं तब ताको सब गोपी सहि रहि हैं बरु गारी।
भूत समान बतावत हमको जारहु स्याम बिसारो।।

जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं ते विष क्यों अधिकारी।
सूरदास प्रभु एक अंग पर रीझि रही ब्रजनारी।

शब्दार्थ : वरु=भले ही। गरी=गाली, चरित्र हीन होने की गली। भूत-समान=छाया मात्र, आकार रहित। जारहु=दग्ध करते हो। बिसारी=भुलाकर। अँचवत=आचमन करते हैं, पान करते हैं। रीझी=मुग्द्ध हुई। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग : यहाँ गोपियाँ उद्धव के ज्ञान योग को स्वीकार करने के लिए एक शर्त रख रहीं हैं जिसका वर्णन प्रस्तुत पद में किया गया है।

व्याख्या : प्रस्तुत पद में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं की हम तुम्हारी बात को मानकर तुम्हारे ब्रम्ह को स्वीकार कर लेंगे। लेकिन एक शर्त है और शर्त ये की तुम अपने ब्रम्ह के मोर मुकुट और पीतांबर धारण किया हुआ दर्शन करा दो यानी यदि तुम्हारा ब्रह्म कृष्ण का वेश धारण करके हमारे सम्मुख आ जाता है तो हम उसे स्वीकार कर लेंगे ऐसा करते हुए हम बिलकुल भी संकोच नहीं करेंगे हम तुम्हारी बात मान जाएंगे फिर हम सब मिलकर उसे भजेंगे उसका ध्यान करेंगे चाहे हमें इसके लिए यह संसार गाली ही क्यों न दे हमें चरित्ररहीन क्यों न बताये कुलटा क्यों न बताये हम सब सहन कर लेंगी लेकिन हमें ऐसा लगता नही है कि तुम हमें अपने ब्रम्ह का कृष्ण रूप में दर्शन करा दोगे क्योंकि तुम तो अपने ब्रम्ह को छायाहीन बताते हो आकारहीन बताते हो भूत के समान बताते हो और इसलिए उनका मोर मुकुट और पीतांबर धारन करना ऐसा असम्भव है और इसलिए हम कृष्ण को भूलाकर उसे स्वीकार नहीं कर पायेंगी। 

हम तो सदा अपने मुख से अम्रृत का पान करते आई हैं और उसी मुख से आज विष का पान कैसे कर सकती हैं अर्थात हमारा मुख अमृत के समान प्राणदायक और मधुर कृष्ण का नाम स्मरण करने का आदि हो चुका है वह आज तुम्हारे विष के समान घातक और कटु ब्रम्ह का नाम कैसे जप सकता है हे उध्दव हम सम्पूर्ण ब्रज की नारियाँ अपने कृष्ण के मनोहर शरीर पर मुग्ध है और इसलिए उन्हें त्यागकर हमारे शरीर विहीन निराकार ब्रम्ह को स्वीकार नहीं कर सकती। 

विशेष :

  1. गोपियाँ उध्दव के सम्मुख ऐसी शर्त रख रही हैं। 
  2. जिसकी पूर्ति करना सम्भव नहीं हैं। प्रस्तुत पद में कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम का चित्रण किया गया है। 
  3. मधुकर भावों की अभिव्यक्ति की गई है। पराकर्षक नम्र विधान का प्रयोग किया गया है।

श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति

81. राग मलार

मधुकर रह्यो जोग लौं नातो। 
कहति बकत बेकाम  काज  बिनु,  होय  न  ह्याँ  ते  हातो।।

जब मिलि मिलि मधुपान कियो हो तब तू कह धौं कहाँ तो।
तू आयो निर्गुन उपदेसन सो नहिं हमैं सुहातो।।

काँचे गुन लै तनु ज्यों बेधौ ; लै बारिज को ताँतो। 
मेरे जान गह्यो चाहत हौ फेरि कै मंगल मातो।।

यह लै देहु सुर के प्रभु को आयो जोग जहाँ तो। 
जब चहिहैं तब माँगि पठैहैं जो कोउ आवत-जातो।।

शब्दार्थ: लौं = तक। कतहि = क्यों। बेकाम = बिना काम के। हा तो = दूर या अलग। कहि धौं = कह तो सही। सुहातो = सुहाता या अच्छा नहीं लगता है। गुन = रस्सी-गुण। वारिज = कमल। तातो = तन्तु। मैगल = हाथी। मातो = मदमस्त। आवत-जातो = आता जाता हुआ व्यक्ति।

सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश या पद हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी है।

प्रसंग: गोपियाँ उद्धव के ज्ञान-योग के उपदेश को बार-बार सुनकर परेशान हो रही हैं। अतः वे उद्धव से झल्लाती हुई कह रही हैं -

व्याख्या: गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं - हे भ्रमर! यदि यह सही भी ही कि कृष्ण ने ही हमारे लिए यह संदेशा भेजा है तो भी क्या यह सही है कि तुम्हारा सम्बन्ध योग तक ही सीमित है। 

हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम बिना काम के ही बाते बना रहे हो और हमारे बार-बार कहने पर भी यहां से दूर नहीं भाग जाते हो? 

हमने कृष्ण के साथ मधुपान किया है अनेक प्रकार से रसपान किया है। जब हम इस रसपान में संलग्न थीं तब तुम कहाँ थे।उस समय हमें इस मार्ग से दूर करने के लिए क्यों नहीं आये थे। 

हे उद्धव जी तुम यहाँ हमें निर्गुण का उपदेश देने क्यों आये हो? यह तुम्हारा उपदेश हमें नहीं अच्छा लगता है। अतः तेरे द्वारा हमसे अपने निर्गुण उपदेश को स्वीकार करवा लेना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे कोई कच्चा धागा लेकर शरीर को बेधने का प्रयास करे। 

कच्चा धागा कमजोर होने के कारण शीघ्र ही टूट जाता है। उसका शरीर में प्रवेश कराना असम्भव है। हमें तुम्हारा यह प्रयत्न वैसा ही प्रतीत होता है जैसे कोई कमल के कोमल तन्तुओं द्वारा मदमस्त हाथी को बाँधकर उसे वशीभूत करने का प्रयत्न कर रहा हो। 

अतः हे उद्धव जी तुम कृपया यह करो कि इस योग को वहीं ले जाओ जहाँ से इसे लेकर आये हो। कारण वे ही इसका सही उपयोग जानते हैं। हमें फिलहाल तो इसकी आवश्यकता नहीं है; जब भी कभी होगी तो किसी आते जाते के हाथों मंगा लेते।

विशेष: अंतिम पंक्ति की ध्वनि यह है कि उद्धव जी किसी भी प्रकार हमारा पीछा तो छोड़ो। 'उपमा' और 'निदर्शना' अलंकार का सही प्रयोग इस पद में किया गया है।

82. राग नट 

मोहन माँग्यों अपनो रूप। 
या  व्रज बसत अँचै तुम बैठीं, ता बिनु यहाँ निरुप।।

मेरो मन, मेरो अली ! लोचन लै जो गए धुपधूप। 
हमसों बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप।।

अपनो काज सँवारि सूर , सुनु हमहिं बतावत कूप। 
लेवा-देइ बरावर में है , कौन रंक को भूप।।

शब्दार्थ - मांग्यो = माँगा है। बसत = रहते हुए। अँचै = पी गई हो। निरुप = निराकार या रूपहीन। धूपधुप = स्वच्छ या निमूल। सूप = फटकने का आधार। सँवारि = संभाल कर। बतावत कूप = कुँआ बतला रहे हो। भाव यह है मरने का रास्ता बतला रहे हो। रंक = गरीब या निर्धन। लेवा-देई = लेना-देन। 


संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - उद्धव का विशेष आग्रह निर्गुणोपासना की ओर था। गोपियाँ उसी आग्रह को समझती हुई  कह रही हैं सखियों समझ लो। 

व्याख्या - गोपियाँ कह रहीं हैं की सखियाँ समझ लो। उद्धव जी यहां निराकार की शिक्षा देने विशेष कारण से आये हैं। कृष्ण ने अपने रूप सौंदर्य को वापस माँगा है उस रूप को जिसे तुमने इस ब्रज में रहकर पी लिया है। 

तुम्हारे द्वारा रूप-पान कर लेने के कारण ही कृष्ण अब निरुप हो गए हैं। उसी निरूपता को साकार करने के लिए उन्होंने यह योग का उपदेश भेजा है। 

सखी की इस बात को सुनकर राधा कहती है कि हे सखी ! क्या तुम्हे पता नही है कि कृष्ण मेरा धुला-धुलाया रूप-विशुद्ध मन स्वयं चुराकर ले गए हैं। देखो तो सही कितना अन्याय है की वे हमारे रूप को तो वापस नही करते और ऊपर से उल्टे योग की शिक्षा दे दी है। 

ये उद्धव हैं कि हाथ में सूप लेकर हमसे बदला लेने के लिए यहां आये हैं अर्थात अच्छी तरह से जांच-पड़ताल करके अपने लाभ की वस्तु को वापस लेना चाहते हैं। इस प्रकार से अपना काम तो सँवारना चाहते हैं किन्तु हमें कुँए में धकेल रहे हैं। 

सूरदास कहते हैं कि राधा ने कहा कि लेन-देन करने में सब बराबर होते हैं- कोई छोटा बड़ा नहीं होता है। राजा और रंक का कोई भी भेद यहाँ लेन-देन के मामले में नहीं चलता है। 

कृष्ण राजा है फिर भी अन्याय के पक्षधर क्यों बने हुए हैं? अपनी वस्तु को तो मांग रहे हैं किन्तु हमारी वस्तु को वापस ही नहीं करना चाहते हैं। 

भाव यह है कि यदि कृष्ण अपना रूप मांगते हैं तो हमारा वह मन भी तो लौटा दें जिसे वे यहां से चुराकर ले गए हैं। 

विशेष -

  1. इस पद में विनिमय अलंकार का प्रयोग बड़ी सुंदर रीति से किया गया है। 
  2. 'गर्व' संचारी का प्रयोग भी आकर्षक है। 
  3. 'हेतूत्प्रेक्षा' भी बड़ी आकर्षक बन सकी है। 

83. 

हरी सों भलो सो पति सीता को।
वन बन खोजत फिरे बंधु-संग किया सिंधु बीता को।।

रावन मारयो , लंका जारी, मुख देख्यो भीता को।
दूत हाथ उन्हैं लिखि न पठायो निगम-ज्ञान गीता को।।

अब धौं कहा परेखो कीजै कुब्जा के माता को।
जैसे चढ़त सबै सुधि भूली, ज्यों पीता चीता को ?

कीन्हीं कृपा जोग लिखि पठयो, निरख पत्र री ! ताको।
सूरदास प्रेम कह जानै लोभी नवनीता को।।

शब्दार्थ - भलो = अच्छा है। बीता को = बीते भर का। भीता = त्रस्त सीता को। पठायो = भेजा। मीता = मित्र का। चिता को = विष पीने वाले ने चेता अर्थात किसी ने भी नही। निरख = देख। ताको = उसका। नवीनता = मक्खन का। 

 संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश  हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है, जिसके संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग - विरह-विधुरा गोपियां जब अपने दु:ख में कृष्ण की तरफ से सहानुभूति का एक कण न पा सकी तो अत्यंत दु:खी हो गई और उन्हें विरहानुभूति के क्षणों में सीता की याद हो आई।

व्याख्या - गोपियां सोच रहीं हैं कि राम कितने अच्छे थे कि उन्होंने अपनी पत्नी के लिए अनेक कष्ट सहे परंतु आखिर उन्हें आखिर पाकर ही छोड़ा। इधर हमारे प्रिय कृष्णा कितने बुरे हैं कि प्रेम के बदले में योग का संदेश दे रहे हैं। इसी प्रश्न में वे सोचती विचारती कह रही हैं -

हमारे कृष्ण से तो कहीं अधिक अच्छा पति सीता को मिला था कि उसकी खोज-खबर के लिए वह (राम) वन-वन अपने भाई के साथ खोजता फिरा। इतना ही क्यों इतना विशाल समुद्र उन्होंने अपनी प्रिया को पाने के निमित्त छोटा-सा बना डाला। 

भाव यह है कि सीता के लिए राम ने इतना किया कि समुद्र पर पुल तक तैयार कर दिया किंतु कोई भी वेदना महसूस नहीं की और इधर हमारे कृष्ण हैं कि करना-धरना तो दूर रहा उल्टे जलाने के लिए योग का संदेश और भेज रहे हैं। 
राम ने तो सीता के ही निमित्त रावण का वध किया; लंका दहन कराया और तब कहीं इतने कष्टों के बाद डरी हुई सीता का मुख देखा। 

उन्होंने (सीता ने) भी दूत के माध्यम से संदेश तो भेजा था किंतु वे कितने अच्छे थे कि कोई भी ज्ञान आदि का संदेश नहीं भेजा था। अब तो केवल कुब्जा का ही हाथ उनके ऊपर है कुब्जा के ही वश में हैं। 

वह इस क्षण कुब्जा के प्रेम में पूरी तरह संलग्न हैं और हमें तो इस प्रकार भूल गये हैं जैसे कोई पीने वाला मदिरा के नशे में सभी होश-हवास खो बैठता है? कृष्ण भी कुब्जा के प्रेम नशे में सभी कुछ भूल गए हैं। 

हे सखी हमारे ऊपर तो उन्होंने प्रेम के बदले में यह कृपा की है कि योग का संदेश लिख भेजा है। देख मैं सच कहती हूं तू स्वयं ही इस पत्र को देख ले। वास्तविकता यह है कि वह तो केवल मक्खन का प्रेमी है - प्रेम की सारी स्थितियों से अनभिज्ञ लगता है कि ये तो उनमें से है जो मरने वालों की चिंता नहीं करते हैं और अपना कार्य करते रहते हैं। 

विशेष 
  1. उपालंभ की दृष्टि से यह पद श्रेष्ठ है। इसमें चित्तवृत्ति की बड़ी भावमय भावना का प्रस्तुतीकरण किया है।
  2. राम और कृष्ण के आदर्शों की तुलनात्मक प्रणाली के माध्यम से गोपियों का तर्क और भी विशिष्ट बन गया है।
  3. वन-वन में पुनरुक्ति प्रकाश, 'असूया', 'संचारी'  और 'किन्ही कृपा का व्यंग्य बहुत मार्मिक है।

84. राग सोरठ

निरमोहिया सों प्रीति कीन्हीं काहे न दुख होय ?
कपट करि-करि प्रीति कपटी लै गयो मन गोय।।

काल मुख तें काढ़ि आनी बहुरि दीन्हीं ढोय।
मेरे जिय की सोई जानै जाहि बीती होय।।

सोच, आँखि मँजीठ कीन्हीं निपट काँची पोय।
सूर गोपी मधुप आगे दरिक दीन्हों रोय।

शब्दार्थ - निर्मोहियो = निर्मोही। काहे न = क्यों नहीं प्रीति = प्रेम। मनगोय = मन को छिपाकर या चुराकर। काल = समय, मृत्यु। ढोय = धकेल दिया। बहुरि = फ़ीरी। मंजीठ = लाल। पोय = रोटी बनाना। दरकि  = टूटकर। शुक्ल जी के शब्दों में फुट-फुटकर। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश  हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग - गोपियां प्रेम-योगिनियां सभी कुछ सहन कर सकती हैं केवल अपने प्रिय की उपेक्षा उन्हें सहय नहीं है वह सोचती हैं कि हर क्षण उपेक्षा सहन करना कठिन है। गोपियों को इस बात का भी दुख है कि उन्होंने कृष्ण जैसे निर्मोही और कलुष हृदय वाले से प्रेम किया ही क्यों यदि ऐसा ना हो तो फिर परेशानी काहे की थी। इस प्रसंग में वे कह रहे हैं।

 व्याख्या - निर्मोही व्यक्ति से प्रेम करने का परिणाम दुख के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? अर्थात वह तो भोगना ही पड़ता है। 

कृष्णा तो इतने स्वार्थी और कपटी निकले कि पूरे छल और चातुर्य से उन्होंने हमसे प्रीति बढ़ाएं और उसी थोथी प्रीति के बहाने मन को चुराकर चलता बना।

एक बार भी तो हम उसकी बातों में आ गई और हमें ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसने हमें काल के मुख से निकाल लिया हो, परंतु आज उद्धव के माध्यम से आज योग की शिक्षा दिलाकर हमारी समस्त आशाओं पर पानी फेर दिया है।

अब ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों वे हमें मौत के मुंह में धकेल रहे हैं। अतः आज उनके व्यवहार से हृदय की जो वेदना हुई है वह अनिर्वचनीय है। उस पीड़ा को तो वही जान सकता है जो भुक्तभोगी हो, जिसने प्रेममार्ग की पीड़ाओं को भोगा हो।

गोपी कह रहे हैं कि मैं तो व्यर्थ ही उनकी कच्ची प्रीति के कारण रो-रोकर अपनी आंखों को फोड़ती रही।

सूरदास कहते हैं कि इन पश्चाताप की बातों को कहते हुए गोपी विशेष या राधा दहाड़ मारकर रो पड़ी। 

पांचवी पंक्ति बड़ी सार्थक है - हमें अफसोस तो इस बात का है कि हमने उनके पूर्णतः कच्चे प्रेम को ही पक्का प्रेम समझ लिया था उनके वियोग में आंखों को रो-रोकर मजिस्ठ के लाल रंग के समान कर लिया था ठीक वैसे ही जैसे कच्ची गीली लकड़ियों को फूंक-फूंक कर अपनी आंखों को धूएँ से लाल कर कोई रोटी बनाने का प्रयत्न करें। " 

इतना कहकर गोपियां निर्ममता से व्यथित होती हुई रो पडी।

 विशेष - 1. पहली और पांचवी पंक्ति में लोकोक्ति का मधुर और सार्थक प्रयोग है। चौथी पंक्ति का भाव मीरा की इस पंक्ति से मिलाकर पढ़ा जा सकता है -

 घायल की गति घायल जानै,
 कै जिणि लाई होय।।

2. गोपियों की वेदना साकार हो उठी है और उनका उपालंभ भी बड़ा तीखा और सार्थक है। गोपियों की असहाय और अवश स्थिति का चित्रांकन किया गया है।

85. राग सारंग

बिन गोपाल बैरनि भई कुंजै।
तब ये लता लगति अति सीतल , अब भई विषम ज्वाल की पुंजै।।

बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजै।
पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भई भुंजै।।

ए , ऊधो , कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजै।
सूरदास प्रभु को मग जोवत आँखियाँ भई बरन ज्यों गुंजैं।

शब्दार्थ - बैरिन = शत्रु। विषम = भयंकर। पूजै = समूह। वृथा = व्यर्थ। अलि गूंजै = भ्रमर गुंजार करते हैं। घनसार = चंदन। दधिसुत = चन्द्रमा। भानु = सूर्य। भुंजै = भूनती हैं। कदन = छुरी। लुंजैं = लुंज-पुंज बनाना। बरन = वर्ण या रंग। ज्यों = जैसे। गूंजै = गुंजा का लाल पुष्प। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसका संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने किया है।

प्रसंग - संयोग में जो वस्तुएं आनंददायक प्रतीत होती हैं; वह वियोग काल में दुखदाई प्रतीत होने लगती हैं। कृष्ण के साथ जो कुंज बड़े-भले और सुंदर प्रतीत होते थे वे ही अब कृष्णाभाव में बड़े कड़वे और कष्टदायक प्रतीत हो रहे हैं। इसी भाव की व्यंजना करती हुई गोपियाँ कह रही है -

 व्याख्या - कृष्ण के साथ ये कुंजै बड़ी भली प्रकार से सुखद और आनंद प्रद प्रतीत होती थीं। लेकिन अब उनके अभाव में रस-युक्त क्रिडाओं के आधार कुंज भी हमारे लिए शत्रु बन गए हैं। 

संयोग काल में ये लताएं बड़ी शीतल लगती थी और उनके विरह में ये कठोर लपटों के समान बन गई हैं। 

वह कहती हैं कि कृष्णा की उपस्थिति में तो सभी की सार्थकता है किंतु उनके बिना यमुना का जल बहना भी व्यर्थ प्रतीत होता है। इतना ही क्यों पक्षियों का कलरव भी महत्वहीन प्रतीत होता है। कमल व्यर्थ ही बोलते हैं और यह भ्रमर व्यर्थ ही गुलजार करते फिरते हैं। 

शीतल-पवन, कपूर एवं संजीवनी, चंद्र किरणे अब सूर्य के समान भुने डालती हैं। भावार्थ यह है की पवन की शीतलता अब दाहक बन गई है। 

हे उद्धव तुम माधव से जाकर कहना की विरह की कटार हमें काटकर लंगड़ा बना रही है। 
सुर कहते हैं कि गोपियों ने कहा कि हे उद्धव! प्राणेश कृष्ण की प्रतीक्षा करते करते यह आंखें गुंजा के समान लाल हो गई हैं। 

विशेष - अलंकारों में छेका अनुप्रास, अन्त्या अनुप्रास, उपमा आदि अलंकारों का प्रयोग किया गया है। पद्माकर की इन पंक्तियों की तुला पर रखकर इस वर्णन को पढ़ा जा सकता है-

ऊधौ यह सूधो सो संदेशो कहि दीजो भले,
हरि सो हमारे ह्यां न फुले वन कुंज हैं। 
किंसुक गुलाब कचनार और अनारन को,
डारन पै डोलत अंगारन के पुँज हैं। 

प्रकृति को उद्दीपन रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस पद में जो प्रकृति है वही तुलसी के बिरही राम की भी विषमता पूरित ये पंक्तियां देखिए - 

"कहेऊ राम बियोग तब सीता। 
मों कह सकल भये विपरीता।।
नवतरू किरनलय मनहुँ कृसानु। 
काल निशा सम निसि ससि भानू।।
जे हित रहे करत तेई पीरा। 
उरग स्वास राम त्रिविध समीरा।।"

86. राग नट

सँदेसो कैसे कै अब कहौं ?
इन नैनन्ह तन को पहरो कब लौं देति रहौं ?

जो कछु बिचार होय उर -अंतर रचि पचि सोचि गहौं।
मुख आनत ऊधौं-तन चितवन न सो विचार, न हौं।।

अब सोई सिख देहु, सयानी ! जातें सखहिं लहौं।
सूरदास प्रभु के सेवक सों बिनती कै निबहौं।।

शब्दार्थ - नैनन्ह = नेत्रों। देती रहौं = देता रहूँ। उर अंतर = हृदय के भीतर। रचि-पचि = अच्छी तरह से। ऊधौतन = उद्धव के शरीर। चितवत = देखते ही। न हौं = नहीं रह जाता है। लहौं = प्राप्त कर लें। प्रभु के सेवक = उद्धव। निबहौं = निर्वाह करूँ। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है यह सूरदास की रचना है जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सम्पादित किया है। 

प्रसंग - कृष्ण ने प्रेम मार्ग की  निष्ठुरता का परिचय दिया है और गोपियां उनकी निष्ठुरता को सहन नहीं कर पा रही हैं।  उन्हें सबसे अधिक इस बात की चिंता है कि कृष्ण ने प्रेम का उत्तर प्रेम से देने की अपेक्षा योग का संदेश दिया है और वह भी उद्धव जैसे प्रेम - भावना विरहित व्यक्ति के द्वारा एक गोपी अपनी इसी दुविधा को व्यक्त करते हुए अपनी सहेली से कह रही हैं-

व्याख्या - अब मैं कृष्ण के लिए संदेश किस प्रकार भेजूं अर्थात विचारणीय यह है कि ऐसे पत्थर दिल व्यक्ति को संदेश भेजना उचित भी है या नहीं। 

 मैं अपने इस तन पर नेत्रों का पहरा कब तक लगाती रहूं। भाव यह है कि कृष्ण वियोग में पहले से ही क्षीण हुआ यह मेरा शरीर अब इस निष्ठुर योग संदेश को सुनकर जीवित नहीं रहना चाहता है किंतु ये नेत्र हैं कि अभी तक यह आस लगाए बैठे हैं कि कृष्ण के दर्शन अवश्य होंगे। 

यही कारण है कि मेरे शरीर पर निरंतर पहरा लगाते रहते हैं। मैं चाहूं भी तो मुझे प्राण छोड़ने नहीं देते हैं। कितनी आशावादीता है?

 गोपी कहती हैं कि कभी मेरे हृदय में कृष्ण को संदेश देने की बात उठती है तो भी मैं बहुत सोच-विचार कर और मन मार कर रह जाती हूं। कारण यह है कि जिस व्यक्ति ने हमें योग का संदेश भेजा है उसके लिए संदेश-प्रेम-संदेश किस बल पर भेजा जाए। इतने पर भी यदि हिम्मत करके मैं कुछ कहना चाहती हूं; संदेश की बात मेरे मुख तक आ जाती है। 

मैं उसे कहना चाहती हूं कि, इन उद्धव की निगाह जाते ही न मेरे वे विचार ही रहते हैं और न मैं ही। भाव यह है कि योग का संदेश भेजने वाले कृष्ण के मित्र इन उद्धव को देखकर ही मैं कर्तव्य पूर्ण हो जाती हूं की इतने निष्ठुर और हृदयहिन व्यक्ति के द्वारा मैं अपना संदेश कैसे भेजूं? 

इन्हें देखने देखते ही वे संपूर्ण विचार गायब हो जाते हैं और मैं संज्ञाहीन हुई सी हो उठती हूँ। मन में आए संपूर्ण विचार बिखड़ जाते हैं और उनके बिखरते ही अपनी सभी सुधि-बुधि भूल जाती हूं।

अतः हे सखी अब तो कोई ऐसी सलाह दो जिससे कि मैं कृष्ण को प्राप्त कर सकूं सूरदास कहते हैं कि गोपी अपनी सखियों से पूछने लगी की, यह जो कृष्ण का मित्र उद्धव आया है, इससे किस ढंग से प्रार्थना की जाए अर्थात किस रीति से उद्धव जी को समझा-बुझाकर यह तय किया जाए कि हमें तुम कृष्ण के दर्शन करा दो और अपनी इस योग-चर्चा को बंद कर दो। 

  विशेष  - पद की अंतिम पंक्तियों में यह व्यंजित होता है कि आवश्यकता पड़ने पर किसी अनपेक्षित व्यक्ति को भी अपना आधार बना लेना चाहिए। गधे को बाप बना लेने वाली व्यंजना है। गोपियों की निरीहअवस्था का मार्मिक चित्रण किया गया है

87. राग कान्हरो

बहुरो ब्रज यह बात न चाली।
वह जो एक बार ऊधो कर कमलनयन पाती दै घाली।।

पथिक ! तिहारे पा लगति हौं मथुरा जाब जहां बनमाली।
करियो प्रगट पुकार द्वार ह्वै 'कालिंदी फिरि आयो काली'।।

जबै कृपा जदुनाथ कि हम पै रही, सुरुचि जो प्रीति प्रतिपाली।
मांगत कुसुम देखि द्रुम ऊँचे, गोद पकरि लेते गहि डाली।।

हम ऐसी उनके केतिक हैं अग-प्रसंग सुनहु री, आली !
सूरदास प्रभु रीति पुरातन सुमिरि राधा-उर साली।।

शब्दार्थ - बहरों = फिरि। चाली = चली। घाली = भेजी। पाँ लागति हौं = पैरों पड़ती हूँ। बनमाली = कृष्ण। काली = काली-नाग। कालिंदी = यमुना में। जदुनाथ = यादवनाथ-कृष्ण। प्रीति प्रतिपाली = प्रणय का पालन किया। पकरि = पकड़। गहि डाली = डाली को पकड़ कर। केतिक = कितनी ही। आली = सखी। पुरातन = प्राचीन। सुमिरि = स्मरण करके। साली = पीड़ा देती है या कष्ट देती है।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - इस पद में उस समय का वर्णन किया गया है, जब उद्धव संदेश देकर वापस में मथुरा चले गए हैं और उसके अनंतर भी गोपियों की परेशानी दूर नहीं हुई है। और उस समय राधा व्याकुल हो उठी और किसी पथिक के द्वारा कृष्ण तक संदेश भेजने के लिए तैयार हो गई हैं।

 व्याख्या - गोपियां पथिक को संबोधित करते हुए कह रहे हैं हे पथिक! हे उद्धव ब्रज में फिर कभी उस बात की चर्चा नहीं हुई जो एक बार उद्धव द्वारा कमलनयन कृष्ण ने अपनी पत्रिका भेजकर प्रारंभ की थी अर्थात उद्धव के अलावा कोई भी अन्य संदेशवाहक नहीं आया है जिसने कृष्ण विषयक कोई भी बात कही हो।

ध्वनि यह है कि उस समय निर्गुण-उपदेश के माध्यम से सही किंतु कृष्ण की चर्चा सुनने को मिल तो गई थी किंतु अब तो कोई नहीं आया गया है।

परिणामतः कृष्णा की कोई भी चर्चा सुनने को नहीं मिली है। अतः राधा पथिक के पैरों को पड़ती हुई कह रही हैं कि हे राहगीर! मैं तेरे कदम छूती हूं आप कृपा करके वहां चले जाइए। जहां वनमाली कृष्ण निवास करते हैं।

वह आगे कह रहीं हैं कि तुम उनके दरवाजे पर पहुंचकर दूर से ही इस प्रकार पुकारना की हे प्रभु! यमुना में फिर से काली नाग आकर रहने लगा है। बहुत संभव है कि कृष्ण इस बात को सुनकर पूर्व की भांति उसे मारने के लिए ही जाएं।

हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारी उनकी प्रीति की पुरातनता उन्हें यहां आने के लिए विवश कर देगी। अर्थात वे आ जाएंगे तुम अच्छी तरह समझ लो कि कृष्ण जब यहां रहा रहते थे तब वे सदैव कृपा किया करते थे। उनका प्रणय-भाव पूरी 'सुरुचि' के साथ हमें सदैव प्राप्त होता रहता था। 

जब हम किसी वृक्ष पर ऊंचाई पर लगा हुआ पुष्प मांगती थी तो कृष्ण हमें गोद में उठा लेते थे और हम डाली पकड़कर उस अभीष्ट फल या फूल को तोड़ लेती थीं। ऐसी प्रीति थी तब हमें विश्वास है कि वे हमारे कष्टों को सुनकर अवश्य ही आएंगे। हे सखी! हम जैसी उनके कितनी ही प्रेयसी ना होंगी।

अतः हे सखी ध्यान से सुन लो! हमारे पास कृष्ण विषयक अनेक कथाएं और कथाएं मौजूद हैं भाव यह है कि कृष्ण सदैव ऐसे ही प्रेम रस भरी अनेक प्रकार की क्रीडाएं किया करते थे। 

सूरदास कह रहे हैं कि इस प्रकार राधा और कृष्ण के उन विगत प्रेम भरे व्यवहारों को याद कर करके अत्यंत विह्वल होने लगी कृष्ण की स्मृतियां उसे पीड़ित करने लगी।

विशेष - 

कथा प्रवाह की दृष्टि से इस पद के अनौचित्य का प्रश्न उठना सहज और स्वभाविक है कारण इसके बाद भी गोपियों और उद्धव का संवाद चलता रहता है और यह पद बीच में ही उस भाव को संकेतित करता है कि उद्धव चले गए और गोपियों ने संदेश फिर भेजा। 

अतः इस दृष्टि से यह पद उद्धव-गोपी वार्तालाप के अनंतर ही रखा जाना चाहिए। नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित सूरसागर में यह पद नहीं मिलता है।

कुछ विद्वानों ने इस पद का महत्व स्वीकार किया है और यहां तर्क दिया है कि " इसमें राधा मुखर हो उठी हैं। इससे पूर्व के या बाद के पदों में भी हम राधा को प्रायः मौन ही पाते हैं।"

"यद्यपि सूरसागर में अनेक ऐसे पद मिलेंगे जहां राधा उद्धव द्वारा कृष्ण की ओर संदेश भेजती हैं परंतु ना मालूम क्यों आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भ्रमरगीत सार में इस प्रकार के पदों को सम्मिलित नहीं किया है।"

88. राग गौरी

ऊधो ! क्यों राखौं ये नैन ?
 सुमिरि सुमिरि गुन अधिक तपत हैं सुनत तिहारो बैन।।

हैं जो मन हर बदनचंद के सादर कुमुद चकोर।
परम-तृषारत सजल स्यामघन के जो चातक मोर।

मधुप मराल चरनपंकज के, गति-बिसाल-जल मीन।
चक्रबाक, मनिदुति दिनकर के मृग मुरली आधीन।।

सकल लोक सूनी लागतु है बिन देखे वा रूप।
सूरदास प्रभु नंदनंदन के नखसिख अंग अनूप।।

शब्दार्थ - राखौं = रोकूँ या समझाऊँ। तपत = तपते हैं - दुखी होते हैं। तिहारों बैन = तुम्हारी वाणी। मनहर = मन का हरण करने वाला। वदनचंद = मुखचन्द्र वाले। कुमुद = कमलिनी जो चंद्र को देखकर विकसित हो उठती है। तृषारत = प्यासे। मराल = हंस। गति-विलास-जल = चंचल गति रूपी जल प्रवाह। चक्रवाक = चकवा-चकवी। मणिदुति = मणि की धुति। सकल लोक = सम्पूर्ण। वारूप = उस रूप को देखे बिना। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - गोपियां कृष्ण के वियोग में व्यथित हैं और वे अनेक युक्तियों से नेत्रों के विभिन्न उप मानव से उम्मीद करती हुई यह प्रभावित करना चाहती हैं की कृष्णा के आदर्श से इनकी हालत दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है।

 व्याख्या - वे उद्धव से कह रहे हैं कि उद्धव हम अपने नेत्रों को किस प्रकार और किस लिए समझाएं हमें कृष्ण की ओर से कोई आशा भी तो नहीं जगती प्रतीत नहीं होती है। 

हमारे ये नेत्र कृष्ण के सुंदर मुखचंद के लिए कुमुद और चकोर हैं, जिन्होंने निरख-निखरकर ही विकास करना सीखा है। यह उसी ओर टकटकी लगाकर देखते रहने में ही संतोष लाभ करते हैं। यह हमारे नेत्र उन सजल घनश्याम की रूप-माधुरी के लिए परम प्यासे मयूर और चातक हैं तथा उनके चरण कमलों पर अटल अनुराग करने वाले यह भ्रमर और हंस हैं। 

यदि उनका लीला पूर्ण घमंड जल प्रवाह है तो हमारे नेत्र उसी जल प्रवाह में रहने वाले मीन हैं अर्थात मछली हैं कृष्ण के वक्ष स्थल पर चमकते हुए मणि प्रभाकर के लिए ये नेत्र चक्रवाक ही तो हैं और उनकी मधुर मूर्ति के लिए मृग हैं। 

इस प्रकार हमारे नेत्र उनकी प्रत्यंग व्यापिनी माधुरी पूर्ति पर पूरी तरह मोहित हैं। यदि वह कृष्ण का रूप इन्हें नहीं दिखता है, तो इन्हें सारा संसार सुना प्रतीत होता है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण का समस्त रूप सौंदर्य अप्रतिम है- उसकी कोई तुलना ही नहीं है अर्थात अद्वितीय है। यदि से इतना सौंदर्य प्राप्त ना होता तो संसार का सौंदर्य ही इसके बिना फिका होता। 

वस्तुतः वही सौंदर्य तो सांसारिक सौंदर्य का मूल है, उसकी स्थिति से ही समस्त सौंदर्य सुंदर होता है अगर वह नहीं तो यह समस्त सौंदर्य शुष्क और निरश है। 

विशेष - इस पद में रूपक अलंकार का उद्भव अद्भुत और रमणीय प्रयोग किया गया है कवि अधिक कलात्मक हो गया है

89. राग मलार

सँदेसनि मधुबन-कूप भरे।
जो कोउ पथिक गए हैं ह्याँ तें फिरि नहिं अवन करे।।

कै वै स्याम सिखाय समोधे कै वै बीच मरे ?
अपने नहिं पठवत नंदनंदन हमरेउ फेरि धरे।।

मसि खूँटी कागद जल भींजे, सर दव लागि जरे।
पाती लिखैं कहो क्यों करि जो पलक-कपाट अरे ?

शब्दार्थ - संदेसनि = सदेशों से। मधुवन = मथुरा। ह्यां ते  = यहाँ से। अवन करे = आने की नही सोची है। समोधे = समाधान। हमरेउ = हमारे भी। फेरि धरे = लौटाए नहीं। मसि = स्याही। खूँटी = समाप्त हो गई। दव = दावाग्नि। कपाट = किवाड़। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - यहाँ इस पद्यांश में एक गोपी श्री कृष्ण की निष्ठुरता के संदर्भ में जो कह रही है उसका वर्णन किया गया है। 

व्याख्या - गोपियाँ कृष्ण के वियोग में पूर्णतः दुखी जीवन बिता रही थीं। उन्होंने एक बार नही बल्कि कई बार श्री कृष्ण को संदेश भेजा की कृष्ण हमेशा के लिए न सहीं कम से कम एक बार तो आ जाएं पर कृष्ण ने तो पूरी निष्ठुरता धारण कर लिया है। वे आये ही नहीं। इस संदर्भ में एक गोपी कह रही है -

संदेशों से मथुरा का सारा कुआं भर गया है। भाव है हमने अनेक संदेश भेजे हैं किन्तु एक का भी कोई उत्तर नहीं आया है। हमने जिन पथिकों के माध्यम से कृष्ण के पास संदेश भेजा है वे भी दुबारा लौटकर नहीं हैं। न मालुम क्या कारण है जिससे वे आये ही नहीं हैं। 

हमें तो ऐसा प्रतीत होता है की या तो उन्हें कृष्ण ने समझा बुझा दिया है जिससे वे दुबारा लौटकर नहीं आये हैं या फिर कहीं रास्ते में ही उनके प्राण निकल गए हैं। 

गोपियाँ कहती हैं की आश्चर्य की बात यह है की वे अपने संदेश वाहकों को तो भेजते ही नहीं हैं हमारे भी अपने पास रख लिए हैं। भाव यह है की समझा बुझाकर उन्हें भी जैसे-तैसे कर समझा दिया है। परिणामतः वे आये ही नहीं हैं। 

उस कृष्ण को पत्र लिखते लिखते भी हम परेशान हो गई हैं। सभी स्याही समाप्त हो गयी है और कागज भी अश्रु जल से भीग गया है। इतना ही नही बल्कि सरकंडे जिनसे कलम बनती थी वे भी समाप्त हो गई हैं। 

अतः अब तो स्थिति बहुत ही विचित्र हो गई है। अब चिट्ठी कैसे लिखी जा सकती है क्योकि हमारे नेत्रों के पलक रूपी किवाड़ बंद हो गए हैं। भाव है की साधनों का अभाव पत्र लिखने और अधिक संदेश भेजने में व्याघात पहुंच रहा है। 

विशेष - बड़ी मार्मिक व्यंजना हुई है। पाठक को प्रभावित करने में पूरी तरह समर्थ यह पद गोपियों की वक्रता का पूरा निदर्शन करने में समर्थ है। 

90. राग नट

नंदनंदन मोहन सों मधुकर ! है काहे की प्रीति ?
जौ कीजै तौ है जल, रवि औ जलधर की सी रीति।।

जैसे मीन, कमल, चातक, को ऐसे ही गई बीति।
तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ ! नाहिं न है यह रीति।।

मन हठि परे, कबंध जुध्द ज्यों, हारेहू भइ जीति।
बँधत न प्रेम-समुद्र सूर बल कहुँ बारुहि की भीति।।

शब्दार्थ - नंदनंदन=कृष्ण। काहे की = किस बात की। जलधर = जलाशय या बादल। गइ बीति = यों ही व्यतीत हो गई। कवंध = धड़। वारुहि = बालू की। भीति = दीवार। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - प्रस्तुत पद्यांश में गोपियाँ कृष्ण की निष्ठुरता पर व्यंग्य करती जो कह रही हैं उसका वर्णन इस पद में किया गया है। 

व्याख्या - उद्धव के वचन को सुनकर गोपियो को जो कष्ट हुआ वह बताया नही जा सकता है। कहने की आवश्यकता नही है की कृष्ण का व्यवहार गोपियों के प्रति निष्ठुरतापूर्ण था। इसी निष्ठुरता पर व्यंग्य करती हुई गोपियों कह रहीं हैं कि हे भ्रमर ! 

नंदनंदन कृष्ण से हमारी प्रीति किस बात की है। भाव यह है कि वे हमें प्रेम ही नहीं करते हैं। उनसे जो भी प्रेम करता है वह पछताता रहता है। कारण कृष्ण का व्यवहार तो अपने प्रियजनों के प्रति उसी प्रकार का है जैसा की जल, सूर्य और बादल का जल से मछली प्रेम करती है, सूर्य से कमल और बादल से चातक प्रेम करता है पर इन प्रेम करने वालों की स्थिति ऐसी है कि स्वयं तो प्रेम में तड़फते रहते हैं और अपने प्रिय से कुछ प्रेम प्राप्त नहीं करते। 

जल के आभाव में मछली तड़पती रहती है। सूर्य के आभाव में कमल जलकर ही चैन पाता है - अर्थात विनष्ट हो जाता है। इसी प्रकार बादल के बिना चातक पी पी की पुकार लगाता रहता है। 

हे शठ अर्थात हे मुर्ख भ्रमर तू इस बात को अच्छी तरह समझ ले कि प्रेम का यह नियम नहीं है। प्रेम तो दोनों ओर से होता है। कोई उसे एक ओर से निभाना चाहे तो वह सम्भव नही है। 

अतः प्रेम का यह नियम नहीं है जो तुम या तुम्हारे आराध्य अपना रहे हो। मीन, कमल और चातक अपने मन से प्रेम करते हैं और उनके मर जाने पर प्रिय को प्राप्त करने में असफल हो जाने पर भी उसकी जीत ही मानी जानी चाहिए। योद्धा युद्ध में लड़ते हैं फिर लड़ते लड़ते उनका सिर कट जाता है तो उनका धड़ ही लड़ता रहता है। 

यह उनकी निष्ठा है और इसी कारण उसके निमित्त उन्हें प्रतिष्ठा या सम्मान की प्राप्ति होती हैं। मछलियाँ और चातक आदि भी अपनी प्रेमजनित निष्ठा के कारण ही ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। सूरदास कहते हैं कि गोपियों ने उद्धव से कहा कि हे उद्धव ! प्रेम का सागर कहीं बालू या रेत की दीवार के द्वारा वश में किया जा सकता है। 

भाव यह है की यह सम्भव नहीं है तो हमारा व्यक्तित्व भी इसे कैसे सम्पन्न करे। तुम्हारा निर्गुण ब्रम्ह का उपदेश हमारे हृदयों में प्रवाहित प्रेम के सागर को कैसे बाँध सकता है। इतने पर भी यदि तुम यही समझते हो कि यह सम्भव है तो यह तुम्हारा भ्रम है। 

गोपियाँ यह कहना चाहती हैं कि हम अपने प्रेम-मार्ग से पूर्णतः दृढ़ता से सलग्न हैं। उसमें कोई भी कमजोरी नहीं है। 

विशेष -

  1. इस पद में यथाक्रम और उत्प्रेक्षा अलकारों का प्रयोग किया गया है। 
  2. पांचवीं पंक्ति - ' मन हठि.......रीति। ' निदर्शना अलंकार तथा ' प्रेम - समुद्र में रूपक का वैभव पूरी कलात्मकता के साथ सुरक्षित है। 
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