अंधेर नगरी की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए

अंधेर नगरी एक जीवन सार्थक व समकालीन रचना है। इसका बहुत कुछ श्रेय इस नाटक की भाषा को है। इस नाटक की भाषा नितान्त हरकत भरी जीवन्त सक्रिय, उच्चरित शब्द की ध्वनियों और वाक्यों का सौंदर्य लिए हुए है। संवाद की विशेषता वाचालता वहीं वाग्मिता है। 

यह दृष्टि और इस दृष्टि से नाट्यभाषा का उपयोग इस नाटक में हुआ है। भाषा को 'अंधेर नगरी' की अन्यतम उपलब्धि माना गया है। भाषा की नाट्यात्मक अभिव्यंजना, पैनापन, लय और टोन, चरित्रानुकूल, चमत्कारिता, नाटकीयता और रवानगी के कारण नेमीचन्द्र जैन ने भारतेन्दु को हिन्दी नाटक में बेजोड़ कहा है। 

स्वयं बाजार का दृश्य ही भाषा की व्यंजना, लय तथा कल्पना दृष्टि का अनूठा उदाहरण है। उनकी भाषा-शक्ति ही उस साधारण दिखने वाले दृश्य को व्यापक विस्तार और अर्थ संकेत देती है। राजा के संवाद उसी की असभ्यता और मूर्खता प्रकट करते हैं महन्तजी के उलट-फेर से ही उसकी प्रवृत्ति ध्वनि होती है। 

अंधेर नगरी की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए

दूसरी ओर सामान्य मनुष्य जब भी आता है तो लय और तुकबन्दी में बातचीत चलती है। उस तुकबंदी से राजा का स्वभाव और अधिक स्पष्ट होता है। साथ ही तुकबंदी नाट्यप्रदर्शन में कई अर्थों में सोचने के अवसर देती है। व्यंग्य और प्रहर में उनकी नाट्यभाषा यहाँ सक्षम है। 

खड़ी बोली और ब्रजभाषा का नितान्त नया समन्वित, वह भी नवीन तेवर के साथ, भारतेन्दु के पुनर्मूल्यांकन के अनेक द्वार खोलता है। निर्देशक सत्यव्रत सिन्हा ने 'अंधेर नगरी' के अपने अनुभव व्यक्त करते हुए लिखा है कि 'वस्तुतः इसकी शैली पारसी रंगमंच की ओर कथ्य- -विषय के अनुकूल ही इसकी भाषा है। पढ़कर लगता है जैसे एक निरन्तर प्रवाहमान आंतरिक उच्छवास में मानसिक उत्तेजना को नाट्यबद्ध कर दिया हो। 

भाषा की लय का यह आवेग भी 'अंधेर नगरी' की सफलता है। चूने वाले के लिए चुन्नीलाल को निकालो गड़रिया के लिए 'क्यों वे ऊखपौण्ड के गड़रिया' जैसे प्रयोग भाषा को जीवन्तता तद्भव रूपों की प्रधानता तोड़-मरोड़, मुहावरों के प्रयोग आदि को सामने लाते हैं। इस प्रयोगों से अभिनय पक्ष समृद्ध हुआ है और अभिनय की सम्भावनाएँ बढ़ी हैं। 

सचमुच नाटक स्वयं एक काव्य होता है-काव्य का ही एक प्रकार। श्रेष्ठ नाटक कविता के समान ही भाषा की व्यंजन शक्ति का, बिम्बमयता का, सघनता और तीव्रता का, संगीत और लय का शब्द और अभिव्यक्ति की अनिवार्यता का उपयोग करता है। 

नेमीचन्द जैन की ये पंक्तियाँ नाटककार की सृजन शक्ति और संवेदना को एक चुनौती है। भारतेन्दु में नाटक का स्वरूप है और 'अन्धेर नगरी' तो एक नया तेवर है-काव्य का एक स्या प्रयोग जैसे निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन है। निश्चय ही 'अंधेर

नगरी' एक प्रहसन होते हुए भी अपने कथ्य में आधुनिक, निरन्तर नवीन शैली शिल्प में मौलिकता और लचीलेपन की परंपरा और प्रयोग का उदाहरण है 

भारतेन्दु आज भी ऐसे अकेले नाटककार थे जो नाटक नाट्यकला, रंगमंच, नाट्यभाषा, नाट्यसमीक्षा के प्रति सजग, सक्रिय साहित्यकार थे और अभिनेता, रंगकर्मी होने के कारण रंगमंच के प्रति निष्ठावान थे। नाटक और रंगमंच की दृष्टि से एक ऐतिहासिक संदर्भ पुरुष माने जा सकते हैं। ,

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