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प्रगतिवाद क्या है - प्रगतिवाद और प्रयोगवाद में अंतर

प्रगतिवाद क्या है 

उत्तर- 'प्रगति' की अंग्रेजी के 'प्रोग्रेस' से उत्पत्ति मानी जाती है, जिसका अर्थ होता है आगे बढ़ना, किन्तु साहित्य में 'वाद' के साथ जुड़कर यह 'प्रगतिवाद' एक रूढ़ि शब्द बन गया है। 

प्रगतिवादी आन्दोलन और साहित्य की मूल चेतना आर्थिक विश्लेषण पर आधारित केवल सैद्धान्तिक रूप से स्वीकार न करती हुई साहित्य की कसौटी में जीवन के संघर्ष की स्थापना करती हैं।

प्रगतिवादी प्रवृत्ति सन् 1936 के लगभग से देखने को मिली। वास्तव में छायावादी कवियों द्वारा ही इस विचारधारा की उत्पत्ति हिन्दी जगत में हुई।

पन्त जी ने 'युगान्त' में छायावाद का अन्त करते हुए युगवाणी में जनवादी विचारधारा को अपनाया। प्रगतिवादी मान्यताओं का प्रयोग 'ग्राम्या' में व्यापक रूप से हुआ है। पंत जी की 'ग्राम्या' में ग्राम के समग्र रूप की झाँकी मिलती है। 

किसानों और मजदूरों, धोबियों और ग्रामवधू, ग्राम्य प्रकृति और ग्राम्य नर-नारी के प्रति बौद्धिक सहानुभूति दिखलाई पड़ती है। दूसरे छायावादी कवि निराला में भी यह प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। 

इन्होंने निम्न वर्ग को अपनी कविता का माध्यम बनाया है और उसकी दीन स्थिति के निर्माताओं पर तीव्र व्यंग्य किये । 'भिक्षुक', कुकुरमुत्ता', 'गर्म पकौड़ी', 'डिप्टी साहब आये', 'कुत्ता भौंकने लगा' आदि व्यंग्यों में निरालाजी ने पूँजीवाद की भर्त्सना की।

प्रगतिवादी प्रवृत्ति का प्रभाव बाद के कवियों पर पड़ा और उनकी रचनाएँ शुद्ध रूप से प्रगतिवादी होने लगीं। अंचल, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, रांगेय राघव, रामविलास शर्मा, 

भवानीप्रसाद मिश्र, भैरव प्रसाद गुप्त, शिवमंगल सिंह 'सुमन', बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', रामधारीसिंह 'दिनकर', गिरजाकुमार माथुर, शमशेर, महेन्द्र भटनागर, विलोचन, अमृतराय, राजेन्द्र यादव आदि कवियों का नाम प्रगतिवादी विचारधारा में विशेष रूप से उल्लेखनीय है ।

प्रगतिवाद के तीन कवियों के नाम लिखिए।

उत्तर - प्रगतिवाद के तीन कवि निम्न हैं

(1) शिमंगल सिंह 'सुमन'

(2) बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

(3) भवानीप्रसाद मिश्र |

प्रगतिवाद और प्रयोगवाद में अंतर

उत्तर - नई कविता और प्रयोगवाद में अन्तर नयी कविता भारतीय स्वाधीनता के अनन्तर लिखी गई उन कविताओं को कहा गया, जिन्होंने नये भावबोध, मूल्यों और नूतन शिल्प-विधान को अन्वेषित तथा स्थापित किया । 

नयी कविता अपनी वस्तु-छवि तथा रूपायन में पूर्ववर्ती प्रगतिवाद तथा प्रयोगवाद की विकासांविति होकर भी अपने में सर्वथा विशिष्ट तथा असामान्य है।

नयी कविता में जीवन-मूल्यों की पुनः परीक्षा ली गई है। प्रगतिवाद में लोक जीवन एक आन्दोलन के रूप में आया, प्रयोगवाद में वह कट गया, परन्तु लोक संपृक्ति नयी कविता की एक प्रमुख विशेषता बन गई ।

नयी कविता के शिल्प को भी लोकजीवन ने प्रभावित किया । उसने लोक जीवन में बिम्बों, प्रतीकों, शब्दों तथा उपमानों को चुनकर निजी संवेदनाओं तथा सजीवता को द्विगुणित किया । 

नयी कविता अपनी अंतर्लय, बिम्बात्मकता, नव प्रतीक योजना, नयी विशेषताओं के प्रयोग नव उपमान संघटना के कारण प्रयोगवाद से अपना पृथक् अस्तित्व भी सिद्ध करती है ।

“ प्रयोगवाद बोझिल शब्दावली को लेकर चलता है, परन्तु नयी कविता ने प्रगतिवाद की तरह विशेष क्षेत्रों के विशिष्ट सन्दर्भ के लिए ही शब्द नहीं लिये, परन्तु समस्त प्रकार के प्रसंगों के लिए लोक शब्दों का चयन किया। 

नई कविता की भाषा में एक खुलापन और ताजगी है । " प्रश्न 27. टिप्पणी लिखिए- व्यक्ति स्वातंत्र्य, वैविध्य एवं प्रयोगशीलता के कवि 'अज्ञेय' ।

उत्तर - प्रयोगवाद के कवि 'अज्ञेय' - प्रयोगवाद एवं नई कविता के सशक्त कवि श्री अज्ञेय का जन्म 7 मार्च, 1914 को भगवान बुद्ध की निर्वाण भूमि कुशी नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. हीरानन्द वात्स्यायन था।

वे भारतीय इतिहास, पुराण और संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान थे । अज्ञेय जी का वास्तविक नाम सच्चिदानंद था। इसलिए उनका पूरा नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन था। 

उन्होंने 1929 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय से बी. एस-सी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् अंग्रेजी में एम.ए. किया । घुमक्कड़ी का उन्हें बहुत शौक था। इसलिए उन्होंने विदेशों की यात्रा की, जिसका स्पष्ट प्रभाव उनके काव्य में देखा जा सकता है । 

'अज्ञेय' उनका उपनाम है। 4 अप्रैल, 1987 में उकन निधन नई दिल्ली में हुआ। अज्ञेय जी हिन्दी में 'प्रयोगवाद' और 'नई कविता' के प्रवर्तक माने जाते हैं। उनकी मुख्य रचनाएँ हैं- 

भग्नदूत, चिन्ता, इत्थलम्, हरी घास पर क्षर भर, आँगन के पार द्वार, सुनहले शैवाल, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर मुद्रा, महावृक्ष के नीचे आदि के अलावा उन्होंने कई कहानी संग्रह, उपन्यास, यात्रा-साहित्य, ललित निबंध और आलोचनाएँ भी लिखी हैं।

उन्हें उनकी रचना "कितनी नावों में कितनी बार" पर 1978 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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