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हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र कविता - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

1.मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज, 
मैं हूँ केवल पदतल-आसन, 
तुम सहज विराजे महाराज । 
ईर्ष्या कुछ नहीं, मुझे, यद्यपि, 
मैं ही बसंत का अग्रदूत, 
ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत
मैं रहा आज यदि पार्श्वच्छवि। 
तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन 

सन्दर्भ - प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर निराला की रचना 'हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र' से ली गई हैं। प्रसंग - इस कविता में कवि ने अपनी आर्थिक दृष्टि से अपेक्षित, अवमानित जीवन की चर्चा की है। साथ ही कवि ने भावी-हिन्दी कवियों को हिन्दी वालों की मनोवृत्तियों से परिचित कराया है। अपने उपेक्षित जीवन की चर्चा करते हुए कहते हैं।

व्याख्या - मेरा जीवन छिन्न-भिन्न शोभा वाला तथा अनेक प्रकार के दोषों से पूर्ण होकर रह गया है। इसके विपरीत तुम लोगों का जीवन अभी तक सुन्दर पंखुड़ियों, सुन्दर रंगों और सुगन्धित फूलों के समान है। तुम लोगों के मन भी अभी तक विषमताओं से परिचित न रहने के कारण सुन्दर हैं। मैं तो पैरों के नीचे आने वाले आसन के समान नीचे गिरा हुआ व्यक्ति बनकर या समझा जानकर रह गया हूँ।

अर्थात् मुझे जो आसन कवि होने के नाते जो सम्मान और मान का पद मिलना चाहिए या मिल नहीं सका है। पर हे महाराजों (हिन्दी भाषा साहित्य के ठेकेदारों) ! तुम लोग तो सहज भाव से उच्च आसन पर विराजमान हों।

यद्यपि मैं बसंत का अग्रदूत हूँ। अर्थात् काव्य या साहित्य के क्षेत्र में नव आचार्यों को लाने वाला हूँ, इस पर भी मुझे उचित मान सम्मान नहीं मिल सका, फिर भी मुझे तुम लोगों से या किसी से भी कोई ईर्ष्या नहीं है। जिस प्रकार ब्राह्मणों के समाज से अछूत दूर कर दिये जाते हैं, उसी प्रकार मुझे भी हिन्दी जगत में शोभा से अर्थात् समाज से दूर धकेल कर उपेक्षित कर दिया गया है। तो भी मेरे मन में ईर्ष्या या शिकायत नहीं है।

विशेष-पद्यों में अनुप्रास अलंकार स्पष्ट है। 'सुमन' शब्द में श्लेष की योजना है। 'महाराज' शब्द में हिन्दी के ठेकेदारों के प्रति तीखे व्यंग्य का भाव छिपा है। 

2. तुम मध्य भाग के, महाभाग ! 
तरु के उर के गौरव प्रशस्त 
मैं पढ़ा जा चुका पत्र, न्यस्त 
तुम अलि के नव रस-रंगराग । 
सन्दर्भ - पूर्ववत् ।

प्रसंग - कवि ने इन पंक्तियों में ऐसे पत्र से अपनी तुलना की है जो पढ़कर फेंक दिया गया है। 

व्याख्या–हे सौभाग्यशाली ! तुम मध्य भाग की शोभा हो तुम वृक्ष के हृदय के विस्तृत गौरव हो । मैं उस पत्र की भाँति हूँ जिसे पढ़कर फेंक दिया गया है और तुम भौरे के लिए नवीन रस, रंग और राग प्रदान करने वाले हो ।

विशेष - 

(1) अलंकार - उपमा । 

(2) भाषा-साहित्यिक हिन्दी। 

3. देखो, पर, क्या पाते तुम 'फल' 
देगा जो भिन्न स्वाद रस भर, 
कर पार तुम्हारा भी अन्तर
निकलेगा जो तरु का सम्बल । 

संदर्भ-पूर्ववत् ।

प्रसंग - कवि यहाँ भविष्य में किस प्रकार का फल प्राप्त होगा इस विषय में बता रहा है। व्याख्या - कवि कहता है कि यह तो भविष्य ही बतलायेगा कि तुम्हें इसका क्या फल मिलेगा जो भिन्न तथा स्वाद से भरा हुआ रस देगा, अर्थात् तुम किस प्रकार की कृतियों की रचना करोगे, यह तो भविष्य के ही गर्भ से निहित है। जब तुम्हारा हृदय पार करके वह रस निकलेगा और जब वह तरु का पूर्ववर्ती कवियों का सहारा बनेगा।

विशेष - (1) अनुप्रास अलंकार की छटा दृष्ट है । (2) सामाजिक पदावली का प्रयोग दृष्टव्य है । 

4. फल सर्वश्रेष्ठ नायाब चीज 
या तुफ बाँध कर रँगा धागा, 
फल के भी उर का, कटु, त्यागा, 
मेरा आलोचक एक बीज ।

संदर्भ- पूर्ववत् ।

प्रसंग-कवि ने स्पष्ट किया है कि सर्वश्रेष्ठ फल सरलता से प्राप्त नहीं है उसके लिए परिश्रम करना आवश्यक होता है।

व्याख्या - सर्वश्रेष्ठ फल आसानी से प्राप्त नहीं हुआ करता, वह तो अमूल्य चीज होती है। तुम अपने परिश्रम से अप्राप्त फल को प्राप्त करोगे अथवा रंगा हुआ धागा ही बाँधकर जाओगे, अर्थात् कुछ शृंगारिक कविताओं का प्रणयन करके ही इति श्री कर दोगे ? फल का हृदय में भी कडुवापन होता है, • उसको त्याग दोगे। मेरे आलोचक तो अभी तक बीज के रूप में है, जिसका पल्लवन अभी भविष्य के गर्भ में निहित है।

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