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मैथिलीशरण गुप्त की काव्यगत विशेषता बताइए

भारतीय संस्कृति की तात्विक विशेषताओं को अपने प्रबन्ध काव्यों के माध्यम से व्याख्यायित करने और अपनी रचनाओं के द्वारा राष्ट्र भक्ति का आह्वान करने के कारण मैथिलीशरण गुप्त 'राष्ट्र कवि ' के रूप में जाने-माने गये है। 

राष्ट्रीयता एवं सांस्कृतिकता के नवोन्मेष के कारण उनकी काव्य-साधना अत्यन्त प्रभावशाली है। इन्होंने आधुनिक समय के अनेक कवियों को अपनी कविता के भावों एवं भाषा-शिल्प आदि से प्रभावित किया है। इस कारण इन्हें सांस्कृतिक नव-जागरण का प्रतिनिधि कवि कहा जाता है।

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 ई. में चिरगाँव जिला झाँसी (उ. प्र.) के एक वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता सेठ रामचरण भगवान राम के परम भक्त थे और कनकलता उपमान से काव्य रचना किया करते थे। 

कहा जा सकता है कि कविता एवं वैष्णव भक्ति भावना गुप्त जी को विरासत में मिली थी । गुप्त जी के भाई सियारामशरण गुप्त जी भी हिन्दी के अच्छे कवि थे।

मैथिलीशरण गुप्त बचपन से ही काव्य-रचना किया करते थे। इनकी प्रारम्भिक कविताएँ कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली 'वैश्योपकारक पत्रिका' में प्रकाशित हुईं। बाद में जब इनका परिचय महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ तो इनकी रचनाएँ 'सरस्वती' में प्रकाशित होने लगीं। 

गुप्त जी की काव्य-प्रतिभा के विकास क्रम में महावीर प्रसाद द्विवेदी का विशेष योगदान रहा है। स्वयं गुप्त जी ने भी उसे स्वीकार किया है ।

करते तुलसीदास भी कैसे मानस नाद। 
महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद।

गुप्त जी की प्रथम काव्य-रचना थी- 'रंग में भंग', परन्तु 'भारत - भारती' के प्रकाशन ने इनकी ख्याति को चार चाँद लगा दिए। इस रचना में हिन्दुओं के अतीत गौरव एवं वर्तमान की हीनता का वर्णन कर कवि ने जन-मानस में देश-प्रेम की भावना का जो संचार किया, उससे हिन्दी जगत् बहुत प्रभावित हुआ । 

प्रेम, भक्ति और राष्ट्रीयता इनकी कविता के प्रमुख स्वर रहे हैं। इनकी राष्ट्रीय भावना एवं उसकी सफल अभिव्यक्ति के कारण भारत के राष्ट्रपति ने इन्हें राज्य सभा का सदस्य मनोनीत किया । गुप्त जी 'राष्ट्रीय कवि' के रूप में विख्यात हैं। इनकी मृत्यु सन् 1964 ई. में झाँसी में हुई।

रचनाएँ - गुप्त जी की रचनाएँ मौलिक और अनूदित दोनों ही हैं

मौलिक रचनाएँ - गुप्त जी की मौलिक रचनाएँ इस प्रकार हैं- 'रंग में भंग', 'जयद्रथ वध', ‘पद्य-प्रबन्ध’, ‘भारत-भारती', 'शकुन्तला', 'पत्रावली', 'वैतालिक', 'पद्यावली', 'किसान', 'अनघ', चन्द्रहास’, ‘तिलोत्तमा', 'पंचवटी', 'स्वदेश-संगीत', 'गुरु तेग बहादुर', 'हिन्दू शक्ति', 'सैरन्ध्री', 'वन वैभव', 'वक संहार', 'झंकार', 'साकेत', 'यशोधरा', 'द्वापर', 'सिद्धराज', 'नहुष', 'विकट-भट', 'मौर्य-विजय', 'मंगलघट', 'त्रिपथगा', 'गुरुकुल', 'विश्ववेदना', 'काबा और कर्बला', 'कुणाल', 'अर्चन और विसर्जन', 'अजित', 'प्रदक्षिणा' एवं 'राजा और प्रजा' । , 

अनूदित रचनाएँ- 'विरहिणी ब्रजांगना', 'मेघनाद - वध', 'प्लासी का युद्ध', 'स्वप्नवासदत्तम', 'उमर खैयम की रुबाइयाँ' ।

काव्य-विमर्श - गुप्त जी का काव्य-फलक विशद् एवं विस्तृत है। यह लगभग 50 वर्ष की अवधि में फैला हुआ है। इनके विपुल काव्य-भण्डार को विषय को दृष्टि से इतिवृत्तात्मक और भाव-प्रधान भागों में बाँटा जा सकता है, जबकि शैली की दृष्टि से गीतिकाव्य, खण्डकाव्य, महाकाव्य और मुक्तक काव्य भेदों में विभाजित किया जा सकता है। 

गुप्त जी प्रबन्धकार के रूप में अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध हुए। इनकी 'भारत-भारती' राष्ट्रीयता का संचार करने वाली अविस्मरणीय रचना है। 'साकेत' तुलसी के रामचरितमानस के बाद हिन्दी में राम-कथा का महत्वपूर्ण रचना है। इसमें विरह एवं वात्सल्य को उन्होंने मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। 

इन दोनों रचनाओं में ('साकेत' और 'यशोध रा') भारतीय वाङ्मय के दो उपेक्षित स्त्री - पात्रों- उर्मिला तथा यशोधरा का अपूर्व चरित्रांकन किया है। ये दोनों रचनाएँ बड़ी कुशलता से रचा गया है।

खण्ड-काव्यों में 'पंचवटी', 'सिद्धराज', 'जयद्रथ - वध' आदि उल्लेखनीय हैं। 'जयद्रथ वध' वीर रस प्रधान काव्य रचना है। 'झंकार' एक सराहनीय गीतिकाव्य है। ,

मैथिलीशरण गुप्त की काव्यगत विशेषता

गुप्त जी के काव्य की प्रमुख विशेषता है-खड़ीबोली का काव्य-भाषा के रूप में परिष्कार। उन्होंने अपनी काव्य- कृतियों में खड़ीबोली का प्रौढ़, परिष्कृत एवं प्रांजल स्वरूप प्रस्तुत किया है इनके काव्य की दूसरी विशेषता है- कवि का अतीत के प्रति प्रेम। 

उनकी अधिकांश रचनाएँ भारत के स्वर्णमय अतीत से सम्बन्ध रखती हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में अतीत के उन महान् चरित्रों को प्रस्तुत किया है, जो हमारे समक्ष वीरता, देश-प्रेम और जाति के प्रेम का आदर्श उपस्थित करते हैं।

(1) राष्ट्रीय भावना- गुप्त जी के काव्य की एक अन्यतम विशेषता है-उनकी राष्ट्रीय भावना, प्राचीन महापुरुषों के प्रति गौरव की भावना, देश के प्रति प्रेम, समाज-सुधार की भावना, विदेशी शासन का विरोध, देश, भाषा एवं साहित्य के उत्थान के प्रयत्न आदि अनेक रूपों में व्यक्त हुई है। 

गुप्त जी के काव्य में भारतीय संस्कृति की मनोरम व्याख्या प्रस्तुत की गई है। वह भारती संस्कृति के व्याख्याता हैं।

गुप्त जी के काव्य में गृहस्थ जीवन के उच्चतम आदर्शों की स्थापना हुई है। उन्होंने पारिवारिक जीवन में नारी को विशेष महत्व दिया है। गुप्त जी के काव्य में प्रकृति-चित्रण को भी प्रमुख स्थान मिला है। 

पंचवटी, साकेत, यशोधरा आदि काव्य ग्रन्थों में उन्होंने प्रकृति के मनोरम चित्र प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने प्रकृति के कहीं आलम्बन, कहीं उद्दीपन और कहीं मानवीकरण रूप में सुन्दर चित्र अंकित किये हैं। ।

( 2 ) गुप्त जी के आदर्श - गुप्त जी एक आदर्शवादी कलाकार थे। उन्होंने कला को कला के लिए न अपनाकर जीवन की उपयोगिता के लिए अपनाया । गुप्त जी का काव्य-क्षेत्र विस्तृत एवं व्यापक है। उन्होंने काव्य के विभिन्न रूपों एवं शैलियों को अपनाया। 

उन्होंने प्रबन्ध, मुक्तक एवं चम्पू तीनों प्रकार की रचनाएँ की, परन्तु सबसे अधिक सफलता उन्हें प्रबन्ध काव्य के क्षेत्र में ही मिली।

मैथिलीशरण गुप्त जी आदर्श जीवन के व्याख्याता थे। उनका अपना जीवन भी सरल और आदर्श था। प्रवृत्तिपूर्ण त्याग, कर्मशीलता, संघर्ष, संयम और विनय उनकी आदर्शवादिता के निर्माणात्मक तत्व हैं। 

राम और लक्ष्मण, गौतम और कृष्ण, उर्मिला और यशोधरा आदि गुप्त जी के सभी प्रिय और आदर्श पात्र, आदर्श त्यागी हैं। आदर्श जीवन के लिए त्याग-वृत्ति को परम आवश्यक मानते हुए भी • गुप्त जी वैराग्यजन्य त्याग को श्रेष्ठ नहीं मानते। 

निष्काम कर्म भी त्याग की प्रवृत्ति का ही एक पहलू है। गुप्त जी निष्काम कर्म के दर्शन में गहरी आस्था रखते थे।आदर्श जीवन के लिए त्याग, कर्मशीलता और संघर्ष के समान ही संयम को भी गुप्त जी एक आवश्यक गुण मानते थे। 

गुप्त जी के राम मर्यादा बनाये रखने के लिए अवतीर्ण हुए, तो उनके अन्य प्रिय पात्र संयम की उज्ज्वलता और तेज को सिद्ध करने के लिए। उर्मिला और यशोधरा का संयम स्तुत्य है, किन्तु उसमें अपने मन के एकान्त निग्रह के ही साधना हैं। संयम को स्खलित करने वाला कोई प्रबल बाह्य कारण उसके समक्ष नहीं आता, जैसा बुद्ध और लक्ष्मण के समक्ष उपस्थित हुआ। 

शूर्पणखां जब लक्ष्मण को रिझाने गई, तब लक्ष्मण के समक्ष न केवल शूर्पणखां की वासना को दुत्कारने की समस्या थी, वरन् सीता का वह परिहास विनोद भी था, जो शूर्पणखां के प्रस्ताव को बल दे रहा था। इस प्रकार संयम को चुनौती देने वाले कारणों का परिहार कर संयम पालन करना गुप्त जी का प्रमुख उद्देश्य है । 

प्रलोभनों के बीच अपने मन को बाँधना ही सच्चा संयम होता है। संयम के समान ही विनय भी गुप्त जी की आदर्शवादिता का प्रमुख अंग है। गिद्धराज में क्षेत्र वर्मा की बात सुनकर गिद्धराज कहता है

गर्व और विनय इकट्ठे हुए तुममें
वीर मैं प्रसन्न हुआ, बैर नहीं प्रेम ही लूँगा उनसे मैं ।

(3) नवीन सामाजिक मूल्यों में विश्वास - मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में उनकी जो सामाजिक भावना अभिव्यक्त हुई है, उसके दो रूप मिलते हैं - एक रूप तो है प्राचीन समाज व्यवस्था में आस्था रखने का और दूसरा रूप है ।

नवीन सामाजिक मूल्यों की स्थापना का। प्राचीन समाज व्यवस्था अर्थात् वर्ण-व्यवस्था में आस्था रखते हुए भी गुप्त जी ने उसके परम्परागत रूप को ठीक नहीं समझा और वैसा ही सुधार चाहा, जो नवीन सामाजिक मूल्यों के अनुकूल हो। 

गतानुगतिकता को कवि हेय माता है और समयानुकूल व्यवस्था के परिवर्तन में विश्वास रखता है ।सबको समान सामाजिक सुविधाएँ प्राप्त हों और सभी मिल-जुलकर इस प्रकार रहें जैसे एक परिवार के लोग रहते हैं। ऐसे आदर्श समाज की कल्पना गुप्त जी के साहित्य में सर्वत्र प्रतिष्ठित है। 

समाजवादी युग में, व्यक्तिवादी युग के विपरीत, समाज की सत्ता सर्वोपरि मानी जाती है और व्यक्ति का हित समाज के हित के प्रकाश में ही देखा जाता है। जिस प्रकार सामाजिक अधिकारों की समानता समाजवादी युग की देन है, उसी प्रकार समाज पर मर-मिटने की भावना भी समाजवादी युग की देन है। 

गुप्त जी की मान्यता के अनुसार, समष्टि के लिए व्यष्टि को उत्सर्ग कर देना चाहिए। जो सबका हित है वही अपना भी हित है, और सबके हित में त्याग अथवा बलिदान करना सबसे बड़ा कर्त्तव्य है

जहाँ कुछ भी समाज का हित हो।
वहीं मेरा तन अर्पित हो ।”

(4) परम्पराओं का नवीनीकरण - गुप्त जी की काव्य-कला की दूसरी विशेषता परम्पराओं के नवीनीकरण में निहित है। उनके पात्र पौराणिक और ऐतिहासिक अवश्य हैं, किन्तु काव्य में उनका अवतरण सामान्य व्यक्ति के रूप में हुआ है। '

साकेत' और 'यशोधरा' दोनों का कथानक पात्र और उद्देश्य की दृष्टि से इस प्रवृत्ति के लिए उदाहरण स्वरूप लिये जा सकते हैं। वस्तुतः गुप्त जी ने परम्परा के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए भी नवीनता को ग्रहण करने का सन्देश दिया है। इसी सन्देश में उनकी युगीन दृष्टि अभिव्यक्त हुई है। 

'बलराम' शीर्षक कविता में उन्होंने स्पष्ट किया है कि उद्योगी पुरुष परम्पराओं के सहारे अथवा प्राचीन बन्धनों के सहारे जीवित नहीं रह सकता है। इसी भाव से प्रेरित होकर उन्होंने लिखा है कि -

जीर्ण वस्तुओं की ममता से, घर ही घूड़ा होगा, 
अहा ! आज का कुसुम हार भी कल का कूड़ा होगा। 
एक समय जो ग्राह्य दूसरे समय त्याज्य होता है, 
ऊष्मा में हिम के कम्बल का भार कौन ढोता है ?

इतना ही नहीं, मैथिलीशरण गुप्त ने वर्तमान युग के आयोजन को भविष्य निर्माण का साधन माना है और उसके लिए अतीत से प्रेरणाएँ प्राप्त करते हुए युग-धर्म को पहचानने की बात कही है। उन्होंने लिखा है

वर्तमान यह आयोजन है भावी जीवन का, 
कुछ अतीत संकेत मिले तो अधिक लाभ वह जन का । 
अपने युग को हीन समझना आत्महीनता होगी, 
सजग रहो इससे दुर्बलता और दीनता होगी। 

(5) मानवतावाद - समाज के निम्न और दलित वर्ग के प्रति सहानुभूति, नारीत्त्व के प्रति उच्च भावना और मनुष्यता को सर्वश्रेष्ठ मानने में गुप्त जी का मानवतावाद अभिव्यक्त हुआ है। शूद्र हो, चाहे किसान हो या मजदूर, जो भी पीड़ित और दलित है, उसके प्रति गुप्त जी पसीज उठे हैं। 

मनुष्य में ऊँच-नीच के भेद को वे नहीं मानते थे । ऊँच-नीच की भावना समाज को विच्छृंखलित करने वाली होती है। अनघ में जिस प्रकार अछूतों के प्रति गुप्त जी सहानुभूतिपूर्ण हैं, उसी प्रकार जय भारत में सूत-पुत्र कर्ण के प्रति । 

कृपाचार्य अर्जुन से लड़ने के लिए आये हुए कर्ण की जाति और वर्ण पूछते हैं । कृषाचार्य को उत्तर देते हुए कर्ण ने जाति-पाँति और वर्ण-भेद से मनुष्यता को ऊँचा कहा है। कर्ण के माध्यम से मानो गुप्त जी आधुनिक कृपाचार्यों को यह शिक्षा देते हैं कि मनुष्य जाति, वर्ण के भेदों से ऊँची है। 

जाति व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था मनुष्य के सामूहिक जीवन को सरल-सुखमय बनाने के उद्देश्य को लेकर प्रारम्भ हुई थी । जो व्यवस्था सरलता के स्थान पर कठिनता और सुख-सुविधा के स्थान पर दुःख-बाधा उपस्थित करे उसको अविलम्ब बदल दिया जाता है । जाति और वर्ण-व्यवस्था का रूप भी अब दुःखद हो गया है। 

ऐसी व्यवस्था को हमें अविलम्ब बदल देना चाहिए। कम से कम हम मनुष्य को तो ऐसी व्यवस्था पर बलि होने से बचाएँ । मनुष्य सभी व्यवस्थाओं से ऊँचा है। उसका हित साधन सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक वस्तु है। गुप्त जी इसी मानवतावादी विचारधारा के अनुयायी थे ।

युग तक नारी नारी को माया का प्रतीक और सभी पापों का आश्रय माना जाता था। भक्त कवियों के गुप्त जी के मानवतावाद का दूसरा अंग है नारी के प्रति उनकी आदर भावना। एक युग था जब के प्रति ऐसी मान्यताएँ प्रचलित थीं। 

इसलिए भक्ति सम्बन्धी कविताओं में नारी की निन्दा के स्वर विद्यमान हैं। नवीन युग ने जिस प्रकार जीवन के अन्य क्षेत्रों को प्रभावित किया, उसी प्रकार नारी के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को भी प्रभावित किया। 

नये युग का कवि नारी को त्याज्य और पाप- पिटारी न मानकर उसको समस्त गुणों से युक्त मानता है, जिसकी कल्पना मनुष्य में की जा सकती है। मैथिलीशरण गुप्त की को वाणी देकर लोगों में उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण आदर भावना जाग्रत की है। 

नारी जीवन को परिभाषित करने वाली उनकी ये पंक्तियाँ नारी सम्बन्धी विचार - चर्चा में बहुधा कही-सुनी जाती हैं

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ।

विधवा और वियोगिनी नारियाँ तो अपने जीवन की कारूणिकता से सहज ही प्रभावित कर लेती हैं और उनके प्रति हमारी कोमल-करुण भावनाएँ जाग्रत हो जाती हैं, किन्तु सधवा नारियों की जो दयनीय स्थिति समाज में है, ।

गुप्त जी ने उसका भी वर्णन किया है। द्वापर की विधवा ऐसी ही नारी है। वह उन सभी नारियों की प्रतिनिधि है जिन्हें घर में कोई अधिकार नहीं होता है एवं जिनका प्रत्येक कार्य सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है।

गुप्त जी के मानवतावाद का तीसरा पहलू है- धर्म और ईश्वर के समान ही मानवता की पूज्य प्रतिष्ठा का । गुप्त जी मनुष्य स्वभाव की परिवर्तनशीलता में विश्वास करते थे। मनुष्य देव भी बन सकता है और दानव भी। 

मनुष्य का देव रूप गुप्त जी का आराध्य है। जो सत्य पालन करता है, वही मनुष्य देवत्त्व धारण कर सकता है । गुप्त जी मनुष्य के इसी रूप के आराधक थे। वे मनुष्यता को ईश्वर के समकक्ष मानते थे। उनका मत है कि मानवता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म-प - पालन है। 

गुप्त जी के काव्य में जन-सेवा के साथ ही वैराग्य के प्रति उपेक्षा भाव भी है। वैराग्य के प्रति यह उपेक्षा मानव-सेवा के कारण ही है

आओ प्रिय, भव में भाव विभाव भरें हम,
संसार हेतु, शत बार सहर्ष मरें हम । 

(6) रसात्मकता- रसात्मकता की दृष्टि से यदि हम देखें तो भी गुप्त जी के काव्य का भाव-पक्ष अत्यन्त पुष्ट दिखाई देता है। उसमें प्रायः सभी रस गुप्त जी के काव्य मिलते हैं।

 कलागत विशेषताएँ

गुप्त जी के काव्य का कला - पक्ष भी भाव - पक्ष की भाँति सशक्त है। उनकी भाषा व अलंकार योजना ही नहीं, छन्द योजना भी विविधता लिए हुए हैं। उनकी कलागत विशेषताएँ निम्नवत् हैं—

 ( 1 ) भाषा-शैली - गुप्त जी की प्रारम्भिक कृतियों की भाषा ब्रज और खड़ी बोली का मिश्रित रूप है। हाँ, उनकी बाद की रचनाओं में खड़ी बोली का शुद्ध रूप मिलता है। 

डॉ. नगेन्द्र ने गुप्त जी के काव्य की भाषा के विषय में लिखा है कि, “कवि को खड़ी बोली की प्रकृति का पूर्ण ज्ञान है, दूसरे वे द्विवेदी जी के चरणों में बैठकर व्याकरणसम्मत भाषा के प्रयोक्ता बने थे ।” 

अतः गुप्त जी की भाषा सर्वत्र भावों का अनुसरण करती है। उस पर कहीं-कहीं छायावादी शैली का प्रभाव भी दिखाई देता है। उनका शब्द विध् शान, तत्सम, तद्भव, व्यावहारिक व सरल शब्दावली के योग से बना है। 

यही कारण है कि उनकी भाषा सरल, सहज, आत्मीय और प्रवाहपूर्ण बन गयी है। उदाहरणार्थ, उनकी ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -

जिस युग में हम जिए, वही तो अपने लिए बड़ा है, 
आह ! हमारे आगे कितना कर्म-क्षेत्र पड़ा है। 
नये-नये अध्याय खुले हैं, नये पाठ हैं कितने,
कैसे काटट-छाँट कर कौशल और ठाट हैं कितने।

(2) अलंकार विधान- अलंकारों की दृष्टि से देखें तो गुप्त जी के काव्य में प्रायल-सी लोकालय में, रूढ़ि बैठ जाती है। 

2. उत्प्रेक्षा- क्या जाने क्या देख यहाँ पर यह औत्सुक्य उमड़ता। मानों अभी किसी झुरमुट से वह है निकला पड़ता। 

3. सन्देह - श्याम समाया कालिन्दी में यह उसमें कालिन्दी । 

4. दृष्टान्त - एक समय जो ग्राह्य दूसरे समय त्याज्य होता है। ऊष्मा में हिम के कम्बल का भार कौन ढोता है ।। 

निष्कर्ष - कहने का तात्पर्य यह है कि गुप्त जी के काव्य की भाषा में जहाँ सरलता, सुबोधता और सहज स्वाभाविक अलंकृति है, वहीं उसमें मुहावरेदारी भी मिलती है। प्रसंग, परिस्थिति, भाव व मनोदशा के अनुसार भाषा का प्रयोग करना गुप्त जी की कला की विशेषता है। 

उनकी 'बलराम' कविता में भाषा का जो सरल स्वरूप मिलता है, वह मुहावरे से भी सजग हुआ है। उन्होंने घर ही घूड़ा होगा, हाथ सिकोड़ना, कालगति को पहचानना, और डूब मरना जैसे मुहावरों के प्रयोग से अपनी भाषा को उसी प्रकार सहज बनाये रखा है। जिस प्रकार अलंकारों के सहज, स्वाभाविक प्रयोग से उनके भाव सरल और प्रेषणीय बने रहे। 

काव्य में खड़ी बोली का प्रयोग

गुप्तजी की काव्य भाषा खड़ी बोली है। जिस समय इन्होंने काव्य रचना प्रारम्भ की थी उस समय ब्रजभाषा में काव्य रचना होती थी तथा खड़ी बोली का निर्माण और परिमार्जन हो रहा था,

इसलिए इनकी प्रारम्भिक रचनाओं में कुछ अपरिपक्वता है परन्तु आगे चलकर 'जयद्रध-वध' लिखा गया तो इनकी खड़ी बोली पूर्ण परिष्कृत हो गई। 

साकेत में इन्होंने भाषा को भावानुकूल बना लिया था। गुप्तजी का भाषा पर पूर्व अधिकार था। क्योंकि इनके पास शब्दों का असीम भण्डार और व्याकरण का पूर्व ज्ञान था। आचार्य शांतिप्रिय द्विवेदी ने इनकी भाषा को इंगित करते हुए लिखा है। खड़ी बोली में गुप्तजी संस्कृत की शालीनता और बुंदेलखण्ड की ओजस्विता लेकर आये हों।

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