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प्रयोगवाद के प्रवर्तक माने जाते हैं - अज्ञेय जी

प्रयोगवाद अर्थात् नई कविता के प्रवर्त्तन का श्रेय कविवर अज्ञेय को ही प्राप्त है। अज्ञेय जी नई कविता के पुरोधा, आधुनिक युग के शीर्ष स्थानीय कवि, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, महान् साहित्यकार हैं।

 'माँ' वीणापाणि को अलंकृत करने वाले आधुनिक कवियों में, उसकी सेवा में अमूल्य ग्रन्थ रत्नों की भेंट चढ़ाने वाले कवियों में वे शीर्ष स्थान पर हैं। अज्ञेय जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए समकालीन काव्य के सम्पादकगण कहते हैं- “अज्ञेय जी सुपठित थे । 

वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता और मर्मज्ञ थे। विश्व के अनेक देशों की उन्होंने अनेक बार यात्राएँ कीं। उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानों से विभूषित किया गया था। वे एक अच्छे छाया चित्रकार और चित्रकार थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया था ।

परन्तु अज्ञेय मुख्यतः आत्म-परक या व्यक्तिवादी सृजक माने जाते हैं, उनकी सामाजिक यथार्थ-दृष्टि भी अत्यन्त परिपक्व और परिष्कृत है। 

मनुष्य की स्वाधीनता और गरिमा के पक्षधर वे अवश्य थे। परन्तु समाज-सन्दर्भों से उसे काटते हुए नहीं, बल्कि जोड़ते हुए। उनके काव्य में व्यक्तिवाद, यथार्थवाद, अस्तित्ववाद, रहस्यवाद आदि का अद्भुत समन्वय है।

अज्ञेय प्रयोगवादी कवि हैं। उनके काव्य में प्रयोगवाद की सभी विशेषताएँ पायी जाती हैं। पर उनकी रचनाओं में व्यक्तिवाद, यथार्थवाद, क्षणवाद (अस्तित्ववाद) मानवतावाद का अद्भुत समन्वय है। 

प्रयोगवादी काव्यधारा को दो भागों में बाँटा गया है- (1) प्रयोगकाल और (2) विकासकाल ।

सन् 1943 में अज्ञेय जी ने प्रयोगवादी कविताओं का एक संग्रह 'सप्तक' के नाम से प्रकाशित किया। इसके पश्चात् सन् 1951 में दूसरा तार सप्तक और सन् 1959 में तीसरा तार सप्तक प्रकाशित हुआ। 

इसी बीच सन् 1954 में डॉ. जगदीश गुप्त और डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के सम्पादकत्व में प्रयोगवादी कविताओं का एक अर्द्धवार्षिक संग्रह 'नई कविता' नाम से प्रकाशित हुआ। तभी से इस कविता का नाम ‘नई कविता' पड़ गया। 

प्रयोगवाद या नई कविता के कवियों में श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन, गिरिजा कुमार माथुर, मुक्तिबोध, भारतभूषण, धर्मवीर, भवनीप्रसाद मिश्र, लक्ष्मीकान्त वर्मा, सर्वेश्वर दयाल, प्रभाकर माचवे, नेमीचन्द जैन, शकुन्तला माथुर और नरेश मेहता आदि प्रमुख हैं। 

प्रयोगवाद या नयी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और अज्ञेय

(1) घोर व्यक्तिवाद -‘व्यक्तिवाद' अज्ञेय की कविता की प्रमुख विशेषता है और प्रयोगवादी काव्य की जानी मानी प्रवृत्ति। ‘अज्ञेय जी' यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक परिस्थिति में कवि सामाजिक बात कहने में अपने को असफल पा रहा है। 

वह कुछ नये को कहना चाहता है। उसकी एक भावना ऐसी है, जो उसे समाज में विद्रोही बना देती है और वह घोर अहंवादी हो जाता है ।

स्वयं अज्ञेय जी के शब्दों में, "जब कवि अपनी सामाजिक उपयोगिता को प्रमाणित करने में दोषप्रद सामाजिक प्रवृत्ति पाने में असफल होता है तो तिलमिलाकर सम्पूर्ण समाज में प्रतिविद्रोही घोर अहंवादी बन बैठता है।"

इस तरह वैयक्तिकता उनके काव्य में स्वतः ही उभर आती है। एक उदाहरण देखिए'

मैं गाया हूँ,
 तो मानव का अलिखित इतिहास हूँ,
 मैं साधना हूँ, 
तो मैं प्रयत्न में कभी शिथिल न होने का निश्चय हूँ, 
मैं संघर्ष हूँ जिसे विश्वास नहीं, 
जो है मैं उसे बदलता हूँ 
जो होगा उसे मुझे ही तो लाना है।” 

जो कविता शुद्धतः व्यक्तिवादी होती है उसमें 'मैं' प्रधान होता ही है। यहाँ 'मैं' और 'में' का अहम् में प्रबल है। लगता है कवि संसार को समाज को और सम्पूर्ण विश्वास को बदल डालेगा। , 

(2) नग्न यथार्थवाद - प्रयोगवादी कविता की दूसरी प्रमुख विशेषता नग्न यथार्थवाद है जो कभी-कभी अश्लीलता की सीमा को लाँघकर आलोचना की वस्तु बना जाता है पर कवि को सन्तोष होता है कि कवि ने विषय का चित्रण यथार्थ के माध्यम से उसके नग्न रूप में किया है। 

सेक्स का नग्न यथार्थ उनकी कविता में इसलिए आया है कि उसे विश्वास है कि मानव सेक्स सम्बन्धी वर्जनाओं से ग्रस्त है। एक उदाहरण देखिए जिसमें कवि वर्षा से गीली धरती का वर्णन कर रहा है'

स्नेह से अलिप्त
बीज के भवितव्य से उत्फुल्ल बद्ध
 वासना के पंक सी फैली हुई थी 
धारमित्री सत्य सी निर्लज्ज नंदी
औ समर्पित ।'

(3) निराशावाद - युगीन परिस्थितियों के प्रभाव के कारण प्रयोगवादी कविता में निराशावादी के स्वर इतने मुखरित हुए हैं कि वह नयी कविता की महत्वपूर्ण विशेषता बन गया है। 

अज्ञेय जी की कविता में भी निराशावाद के दृश्य देखने को मिलते हैं। यह उदाहरण देखिए जिसमें कवि की आकांक्षा पूरी न होने और उसके घोर असन्तोष का चित्रण है

  (i)  सुख मिला, उसे हम कह न सके
 जीवित भी हम रह न सके 
(ii)
एक रेखा जिसे, न बदला जा सकता है न मिटाया जा सकता है 
न स्वीकार द्वारा ही डुबा दिया जा सकता है।
क्योंकि वह दर्द की रेखा है।

(4) अति बौद्धिकता-प्रयोगवादी कविता की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है भावपक्ष की उपेक्षा और बुद्धि तत्त्व को गृहीत करना । अतः रम्य भावुकता के स्थान पर इसमें 'विचार' ही अधिक व्यक्त होते हैं। अज्ञेय का काव्य में भी बौद्धिकता पूर्णतः उभरकर आई है।

डॉ. ओमप्रकाश अवस्थी इस सन्दर्भ में विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि“अज्ञेय के काव्य में भी बौद्धिकता का करीब-करीब वैसा ही रूप मिलता है। इनके मत से यह कविता उन लोगों के लिए है जिनका बौद्धिक स्तर काफी उठा हुआ है। 

दूसरे शब्दों में यों समझिए कि जिनका बौद्धिक स्तर इन कवियों की कोटि का नहीं है, उनकी समझ में नई कविता नहीं आ सकती।" डॉ. धर्मवीर भारती बौद्धिकता के प्रति आग्रहशील होकर लिखते हैं कि

"प्रयोगवादी कविता में भावना है, किन्तु हर भावना के सामने एक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। इसी प्रश्न चिह्न को आप बौद्धिकता कह सकते हैं। सांस्कृतिक ढाँचा चरमरा उठा है और यह प्रश्न चिह्न उसकी ध्वनि मात्र है। "

एक उदाहरण द्रष्टव्य हैं
“बनादे चितेरे, यह चित्र मेरे लिए आँक दे । 
मिट्टी की बनी पानी से सिंची, बाणाकाश की प्यासी 
उस अंतहीन दिया को, तू अंतहीन काल के लिए पलक पर टाँक दे 
क्योंकि यह माँग मेरी, मेरी, मेरी है कि प्राणों के
 एक जिस बुलबुले की ओर मैं हुआ हूँ उदग्र, वह 
अन्तहीन काल तक मुझे खींचता रहे
 मैं उदग्र ही बना रहूँगा कि
जाने कब वह मुझे सोख ले ।”

आचार्य वाजपेयी इसके प्रति असहनशील होकर कहते हैं

“ तथाकथित नई कविता में इसी बुद्धि रस का बाहुल्य है, इसीलिए कविता की यह नई धारा साहित्यकारों के लिए अटपटी और आग्रह बनी हुई है । "

(5) क्षणवाद (अस्तित्ववाद ) - प्रयोगवाद में क्षणवाद को बहुत महत्त्व दिया है। क्षणवादियों का विश्वास है कि जो क्षण हम जी रहे हैं, वह भूत और भविष्य से विषाक्त है, उसकी अनुभूति सुख ही प्राप्य है। 

अज्ञेय ने अपने काव्य में अस्तित्ववाद के इस प्रभाव को अनेक स्थलों पर ग्रहण किया है। दो उदहारण देखिए जिनमें कवि क्षण के अखण्ड सागर का आचमन करना चाहता है, पीना चाहता है । आत्मसात् करना चाहता है

(i) "सत्य के साक्षात् का, साक्षात् के 
क्षण का क्षण के अखण्ड पारावार का, आज हम आचमन करते हैं।" 

(ii)  "हमें किसी अजरता का मोह नहीं
आज के विवका अद्वितीय इस क्षण को 
पूरा जी लें, पी लें, आत्मसात् कर लें।"

(6) रहस्यवादी भावधारा- रहस्यवादी भावधारा ने सदैव से कवियों को आकर्षित किया है। अज्ञेय एक कवि होने के साथ-साथ एक चिन्तक भी हैं। 

अतः रहस्यवादी भावों का उनकी कविता में होना स्वाभाविक है। 'असाध्य वीणा' नामक कविता उनके काव्य की इस भावधारा की प्रतिनिधि रचना है। उदाहरण द्रष्टव्य है

और कान में जिनके हिमगिरि कहते थे अपने रहस्य । 
सम्बोधित कर उस तरू को करता, 
नीरव एकालाप प्रियंवदा। राजा जागे।"

(7) मानवतावादी रचनाएँ- प्रयोगवादी कविता की अनेक विशेषताओं में से एक रूढ़ियों विरोध और 'मुक्ति' का मोह है। मानवता की उपासना और उसके प्रति व्यापक भावना अज्ञेय के काव्य में यत्र-तत्र सर्वत्र बिखरी हुई है। 

एक उदाहरण देखिएमनुष्य ने ही मनुष्य का भक्षण शुरू कर दिया  है, अपना ही अपने को खा रहा है कितना विघटन है

"मानव का रचा हुआ सूरज, मानव को भाप बनाकर सोख गया। पत्थर पर लिखी हुई यह, जली हुई छाया मानव की साखी है।” 

कवि को अन्ततः मानवता की विजय का अमिट विश्वास है

"धरती में जिन्होंने विश्वास नहीं खोया,
 जिन्होंने जीवन में आस्था नहीं खोयी, 
जिनके घर, उन पहलों ने नष्ट किये। 
महासागर में डुबोये, पर जिन्होंने अपनी जिजीविषा
 घृणा के परनाले में नहीं डुबोयी, 
उनकी डोगियाँ फिर इन तरंगों पर तिरेंगी।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि अज्ञेय जी के काव्य में प्रयोगवाद क नयी कविता की समस्त विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। अपने समस्त कविता संग्रहों में उन्होंने समय-समय पर प्रयोगवाद के स्वरूप को बनाये रखने के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किये हैं।

प्रयोगवाद के अनुभूति और अभिव्यक्ति पक्ष का जैसा सामंजस्य अज्ञेय जी की कविता में मिलता है, वैसा अन्य किसी प्रयोगवादी कवि की कविता में नहीं मिलता। इस प्रकार अज्ञेय प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रणेता हैं।

अज्ञेय की उपमान

अज्ञेय ने उपमान, बिम्ब एवं प्रतीक योजना के क्षेत्र में क्रांति उपस्थित करते हुए परम्परा से भिन्न उपमानों, बिम्बों और प्रतीकों की योजना की है। इसके मूल में उनकी जो धारणा क्रियाशील रही है, उसे उनके निम्नांकित उद्गारों से समझा जा सकता है

“शब्दार्थ-विज्ञान का निवेदन यहाँ अनावश्यक है, एक छोटा-सा उदाहरण लिया जाए। हम कहते हैं गुलाबी और उससे एक विशेष रंग का बोध होता है। 

निस्सन्देह इसका अभिप्राय है 'गुलाब के फूल के रंग जैसा रंग' यह उपमा उसमें निहित है। आरम्भ में गुलाबी शब्द से उस रंग तक पहुँचने के लिए गुलाब के फूल की मध्यस्थता अनिवार्य रही होगी, उपमा के माध्यम से ही अर्थ - लाभ होता गया होगा, उस समय यह प्रयोग चमत्कारिक रहा होगा। पर अब वैसा नहीं है। 

अब हम शब्द से सीधे रंग तक पहुँच जाते हैं, फूल की मध्यस्थता अनावश्यक है। अब उस अर्थ का चमत्कार मर गया है, अब यह अभिधेय हो गया है, और अब इससे भी अर्थ में कोई बाधा नहीं होती कि हम जानते हैं कि गुलाब कई रंगों का होता है, सफेद, पीला, लाल यहाँ तक कि लगभग काला तक । 

यह क्रिया भाषा में निरन्तर होती रहती है और भाषा के विकास की एक अनिवार्य किया है। चमत्कार मरता रहता है और चमत्कारिक अर्थ अभिधेय बनता है। यों कहें कि कविता की भाषा निरन्तर गद्य की भाषा होती जाती है। 

इस प्रकार कवि के सामने हमेशा चमत्कार की सृष्टि की समस्या बनी रहती है, वह शब्दों को नया संस्कार देता चलता है, और वे संस्कार क्रमशः सार्वजनिक मानस में पैठ कर फिर ऐसे हो जाते हैं कि उस रूप में कवि के काम के नहीं रहते। बासन घिसने से मुलम्मा छूट जाता है। "

अभिप्राय यह है कि अज्ञेय की दृष्टि से परम्परा से चले आते उपमानों, बिम्बों और प्रतीकों में वह सौष्ठव नहीं रह जाता, जो उनके प्रयोग के आरंभिक काल में होता है, इसीलिए कवि को इन्हें संस्कृत करके (सुधार कर) प्रयोग करना पड़ता है। उनकी 'कलगी बाजरे की' शीर्षक कविता में भी यही धारणा अभिव्यक्त हुई है

हरी बिछली घास । 
दोलती कलगी छरहरी बाजने की 
अगर मैं तुमको
 लजाती साँझ के नभ की अकेली तारिका,

अब नहीं कहता,
 या शरद के भोर की नीहार-नहाई कुंई, 
रय्ली कली चम्पे की 
वगैरह तो
 नही कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
 या कि मेरा प्यार मैला है। 
बल्कि केवल यही ये उपमान मैले हो गए हैं 
देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच
 कभी वासन अधिक घिसन से मुलम्मा छूट जाता है।”
 चिहुँकती और रँभाती अफराए डाँगर - सी
 ठिलती चलती जाती हैं । "
 “विश्व नगर की गलियों में खोए कुत्ते सा
 झंझा की प्रमत्त गति मैं उलझे हुए पत्ते - सा । "

उल्लेख, सॉंगरूपक


"जीवन !
वह जगमग
एक काँच का प्याला या जिसमें यह भरमाए हमने
भर रक्खा
तीखा भ्यके खिंचा उजाला या 
कौंच उसी की से
वह फूट गया । "

कहीं-कहीं उपमान योजना में अज्ञेय ने नैतिकता और औचित्य का ध्यान नहीं रखा है। उदाहरण के लिए पन्त की छाया को सम्बोधित करके कही गई इस पंक्ति के समान

"कौन-कौन तुम परिहत-वसना रतिश्रान्ता व्रज यनिता - सी । ” 

अज्ञेय वर्षा-स्नान वसुन्धरा के लिए निर्वस्त्रा, रति-क्लांता, परिरम्भितामर्दिता स्त्री के रूप में किसी उपमान योजना करते हैं

"स्नेह से आलिप्त
बीज के भवितव्य सेक उत्फुल्ल
बद्ध
वासना के पंक- सी फैली हुई थी 
धारयित्री सत्य - सी निर्लज्ज - नंगी 
और' समर्पित ।”

निम्नांकित उपमान योजना का दुस्साहस तो कोई अज्ञेय जैसा ही दुस्साहसी कवि कर सकता था


" और वह दृढ़ पैर मेरा है,
गुरु, स्थिर, स्थाणु-सा गड़ा हुआ
तेरी प्राण-पीठिका पै लिंग-सा खड़ा हुआ। 

अज्ञेय की उपमान-योजना के विषय में अन्ततः डॉ. केदार शर्मा का यह अभिमत अवलोकनीय है"

" संक्षेप में अज्ञेय ने उन्हीं उपमानों को ग्रहण किया है, जो उपमेय से गुण-क्रिया धर्म का साम्य रखते हैं। उन्होंने उपमानों को प्रमुख रूप से प्रकृति के प्रांगन से चुना। उपमान रूप से गृहीत प्रकृति के रूप में सर्व-साधारण के जाने-पहचाने रूप हैं । 

लौकिक कृत्रिम वस्तुओं में से वे ही उनके काव्य में आई हैं जो नित्य व्यवहार की हैं। मानवीय उपमानों में उनको शिशु-रूप अधिक प्रिय है। अमूर्त उपमानों का प्रयोग कवि ने कम ही किया है। 

नई कविता की दिशा में अज्ञेय ने उपमानों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रति की है। उन्होंने उपमेय की सीमित दीवार को तोड़कर नवीन भाबबोध को व्यक्त करने के लिए कुछ ऐसे उपमेयों का संयोजन किया है। 

जो अपनी प्रकृति और सम्प्रेषणीयता के लिए आधुनिक हिन्दी काव्य में अपने आप में एक उपलब्धि है। अज्ञेय के उपमान लोक-जीवन से संपृक्त है और उनमें अस्वाभाविकता का दोष नहीं देखा जा सकता।”

बिम्ब योजना-अज्ञेय की परम्परा विरोधी नूतनाकांक्षिणी कवि दृष्टि ने बिम्ब-योजना के क्षेत्र में भी मौलिक बिम्ब योजना द्वारा काव्य क्षेत्र के शिल्प पक्ष को समृद्ध किया है। 

बिम्ब योजना को महत्ता प्रदान करते हुए वर्ड्सवर्थ ने समस्त काव्य को मानव प्रकृति का कलात्मक बिम्ब घोषित किया है तो ह्यूम ने बिम्ब-विधान को काव्य की आत्मा स्वीकार किया है। बिम्ब की परिभाषा देते हुए लेविस का अभिमत है कि

“बिम्ब एक ऐन्द्रिय चित्र है, जो कुछ अंशों में अलंकृत होता है, जिसके सन्दर्भ के मानवीय संवेदनाएँ निहित रहती हैं तथा जो पाठक के मन में विशिष्ट रागात्मक भाव उद्दीप्त करता है।"

डॉ. केदार शर्मा के शब्दों में - "भाषा और भाव के पश्चात् काव्य में जिस सशक्त वस्तु की उपेक्षा होती है, वह ठोस वस्तु बिम्ब है। बिम्ब से कविता में भाषा की संचय अभिव्यक्ति की सशक्तता होती है। काव्य में बिम्ब का महत्व असंदिग्ध है। एजरा पाउण्ड ने तो काव्य में बिम्ब की एकान्तिक महंत्ता स्वीकार की है ।”

अज्ञेय काव्य बिम्ब-विधान की दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध है और उसमें दृश्य, श्रव्य, स्पर्श, घ्रातत्व, मानस, अलंकृत और यौन बिम्ब आदि अनेक प्रकार के बिम्ब उपलब्ध होते हैं। इन पर सोदाहरण नीचे प्रकाश डाला जा रहा है -

दृश्य बिम्ब - "दृश्य बिम्ब में बिम्ब है, जिसको कवि ने साधारण भाषा में बिना किसी कलात्मकता के काव्य में उतारा है। इस प्रकार के बिम्बों को प्रकृति चित्रण या वातावरण चित्रण में देखा जा सकता है। 

शब्दों का ऐसा चयन किया गया है कि वर्ण्य वस्तु का समग्र चित्र पाठक के नेत्रों के सामने झूल जाता है। अज्ञेय के काव्य में इस प्रकार के बिम्ब अनेक स्थानों पर आये हैं। उदाहरण के लिए कवि की निम्नांकित पंक्तियाँ देखिए

"उड़ गई चिड़िया
कोंपी, फिर 
थिर
हो गई पत्ती ।”

कवि की अग्रांकित बिम्ब योजना तो दृश्य - बिम्ब का बड़ा ही भव्य - मनोरम उदाहरण है जिसमें प्रभात-कालीन धूप का मूर्तिमान किया गया है

"सूप सूप भर
धूप कनक
यह सूने नभ में गई बिखर
चौंधाया
बन रहा है
उसे अकेला एक कुरर
।" 

धूप को सुनहली तो बहुत से कवियों ने बताया है, किन्तु अज्ञेय उसे सूपों में भर-भर बिखरने का जो चित्रण किया है, सूप का रंग ही सुनहला होता है । वह लोक जीवन के कितने सन्निकट है।

स्पर्श बिम्ब - स्पर्श त्वचा (शरीर चर्म) का मूल धर्म होने के कारण इस बिम्ब योजना सम्बन्ध किसी के मृदुल स्पर्श जनित सुखानुभूति से है। इस अनुभूति का एक सजीवका बिम्ब अवलोकनीय है

“नर्निता अपवर्ग की अप्सरा सी वह 
शिखा मेरा भाल छूती है
 वक्तृ छूती है 
गाल को परिक्रांत करके 
ठिठक छन भर 
उमग कौतुक से।"

गन्ध बिम्ब- इस बिम्ब का सम्बन्ध हमारी नासिका की घ्राण शक्ति से है। अज्ञेय ने इस प्रकार के भी कई बिम्ब नियोजित किये हैं

(क)   "तुम्हारी देह
मुझको कनक चम्पा की कली है
 दूर ही से
स्मरण में भी गन्ध देती है।"

(ख)  "ये तुम्हारे नाम की दो बत्तियाँ
धूप की
 डोरियाँ दो गन्ध की 
जो न बाले, किन्तु तुमको छू सके।” 

बिम्ब-ध्वनि विशेष को कुशल शब्द-योजना के माध्यम से मूर्तिमान कर देना, ध्वनि - बिम्ब की योजना करना कहा जाता है। इस प्रकार का एक बिम्ब देखिए - 

"दूर पहाड़ों से काले मेघों की बाढ़ 
हाथियों का मानो चिंघाड़ रहा हो यूथ । 
घरघराहट बढ़ती बहिया की। 
रेतीले कगार का गिरना छप-छड़ाप 
झंझा की फुफकार, तप्त
 पेड़ों का अर रा कर टूट टूट कर गिरना 
ओले की कसी चपत 
तनी कटारी-सी सूखी घासों की टूटन
 x               x               x
घाटियों में भर्राती
गिरती चट्टानों की गूंज
 काँपती मन्द्र गूंज, अनुगूंज । " 

आस्वाध बिम्ब - कवि की निम्नांकित पंक्तियों में आस्वाध या रस्य तथा दृश्य बिम्ब का बड़ी ही कलात्मक सम्मिश्रण है

"दो पंखुड़ियाँ
भरी लाल गुलाब की तकती पियासी
 पिया के ऊपर झुके हुए उस फूल को 
और ज्यों ओठों तले ।”

मानस बिम्ब - डॉ. केदार शर्मा के शब्दों में- "मानस बिम्बों को भाव बिम्ब की उपाधि भी दी जा सकती है। मानस बिम्बों की प्रमुख विशेषता इनकी भावनात्मकता है। 

यह ठीक है कि सभी प्रकार के बिम्ब कुछ-न- कुछ अंशों में संवेदना को स्पर्श करते हैं, पर मानस बिम्ब विशेषतः संवेद्य अस्पष्ट और उलझे हुए होते हैं। 

इस प्रकार के बिम्बों में दृश्य पक्ष इतना स्पष्ट नहीं होता है, जितना भाव पक्ष होता है, अपनी गठनात्मकता के कारण मानव बिम्ब धुँधले और अनुभूति प्रधान अधिक होते हैं।” अज्ञेय के काव्य से ऐसा एक बिम्ब अवलोकनीय है

"पार्श्वगिरि का नम्र चीड़ों में
डगर चढ़ती उमंगों-सी
बिछी पैरों में नदी ज्यों दर्द की रेखा।
विहग शिशु मौन नीड़ों में
मैंने आँख भर देखा ।"

अलंकृत बिम्ब - इस प्रकार की बिम्ब योजनाओं में कवि का ध्यान बिम्ब की कलात्मकता पर केन्द्रित रहता है। डॉ. केदार शर्मा के अनुसार- "उपमा, रूपक और मानवीकरण और अलंकारों के प्रयोग से कविता में जो बिम्ब प्रस्तुत किये जाते हैं, उन्हें हम इसी वर्ग के अन्तर्गत रखते हैं। इस प्रकार के दो उदाहरण अवलोकनीय हैं

"पति सेवा रत साँझ
 उचकता देख पराया चाँद 
लजा कर ओट हो गई।"

प्रस्तुत बिम्ब की कलात्मकता निःसन्देह सराहनीय है-संध्या रूपी नारी स्वपति सूर्य की सेवा में अनुरक्त थी, तभी उसे चन्द्रमा रूपी पर पुरुष दिखाई दे गया, जिससे वह लज्जित होकर एक ओर को हट गई। 

इसी प्रकार की चारुता निम्नांकित बिम्ब-योजना में भी है

"मानो कोई तपक्षीण कायालिक 

असाध्य-साधना की बल बुझी, 

झरी, बची खुची राख पर धीरे पैर रखता

नीरव चपलन्तर गति से 

चाँद भागा जा रहा है।" 

यौन बिम्ब-यौन-बिम्बों की अज्ञेय के काव्य में अपेक्षाकृत अधिकता ही है, जिनके लिए आलोचकों द्वारा उनकी कटु आलोचना की गई है। उदाहरण के लिए निम्नकित बिम्ब अवलोकनीय

 (क)  "घिर गया नभ, उमड़ आये मेघ काले 
भूमि के कम्पित उरोजों पर झुका - सा
 विशद, श्वासाहत, चिरातुर 
छा गया इन्द्र का नील वक्ष 
वज्र-सा यदि तड़ित से झुलसा हुआ-सा ।"
 (ख)  "जबकि सहसा तड़ित के आघात से चिरकर 
फूट निकला स्वर्ग का आलोक 
बाध्य देखा
स्नेह से आलिप्त 
बीज के भावंतव्य से उत्फुल्ल
 बद्ध
सना के पंक-सी फैली हुई थी 
धारयित्री सत्य सी निर्लज्ज नंगी 
औ, समर्पित ।”

प्रतीक योजना- प्रतीक के स्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए विश्वकोष में उसे अमूर्त का मूर्त स्वरूप कहा गया है। वेक्टर के अनुसार, “प्रतीक अपने सम्पर्क, सन्दर्भ और परम्परा से किसी अदृश्य वस्तु की ओर संकेत करता है।” 

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेन के अनुसार, "उस दृश्य वस्तु को प्रतीक कहा जाता है जो मूल विषय का प्रतिविधान सादृश्य और साहचर्य आधार पर करती है।" 

स्वयं अज्ञेय ने इस विषय में यह मत व्यक्त किया है कि- “प्रतीक वास्तव में ज्ञान का एक उपकरण है। सीधे-सीधे अभिधा में नहीं बँधता और आत्मसात् करने या प्रेषित करने के लिए प्रतीक काम देते हैं।”

प्रतीक विधान की दृष्टि से भी अज्ञेय का काव्य पर्याप्त मात्रा में समृद्ध है और उन्होंने हिन्दी काव्य को अनेक भव्य प्रतीकों का रिक्त प्रदान किया है। इस सन्दर्भ में उनका यह अभिमत है कि “प्रतीकों के देवता कूच कर जाते हैं, तब उन्हें भी नया संस्कार देने की आवश्यकता होती है।

प्रत्येक समर्थ कलाकार प्रतीकों को माँजता है।" उनके काव्य में नियोजित प्रतीक विधान की दृष्टि से उचित ही है। उन्होंने पुराने प्रतीकों का संस्कार भी किया है, जबकि नये प्रतीकों का भी निर्माण किया है। डॉ. केदार शर्मा ने अज्ञेय की प्रतीक योजना को चार वर्गों में विभक्त किया है

(1) सामान्य प्रतीक, (2) नवीन प्रतीक, (3) वैयक्तिक प्रतीक, (4) यौन प्रतीक । 

(1) सामान्य प्रतीक - सामान्य प्रतीकों के अन्तर्गत इन प्रतीकों की गणना की जा सकती है, जो परम्परागत रूप में प्रयुक्त होते आए हैं और उनका एक अर्थ विशेष है, रूढ़ हो चुका है उदाहरण के लिए  प्रेमी-पुरुष के लिए परवाना तथा प्रेयसी के लिए शमा या बती का परम्परागत प्रतीक लिया जा सकता है, जिसका अज्ञेय ने भी प्रयोग किया है

"मेरे हृदय की रक्त लाली, इसके तन में छाई है।
 किन्तु मुझे तज दीप शिखा ने पर से प्रीति लगाई है 
इस पर मरते देख पतंगे, नहीं चैन मैं पाती हूँ
अपना भी परवीय हुआ यह देख जली मैं जाती हूँ।”

(2) नवीन प्रतीक - इसके अन्तर्गत वे प्रतीक ग्रहण किये जा सकते हैं, जो परम्परागत होते हुए भी अज्ञेय ने उनका भिन्नार्थक प्रयोग किया है। 

उदाहरण के लिए मछली का प्रतीक रूप में ग्रहण करना कोई नई बात नहीं है। पुराण काल से आज तक मछली प्रतीक रूप धारण किए हुए हैं, लेकिन अज्ञेय उसमें विशिष्ट अर्थ लेते हैं। उनके ही शब्दों में

"जीवन" ...स्वप्नों और आकारों का एक रंगीन और विस्मय भरा पुंज। हम चाहें तो उस रूप से ही उलझे रह सकते हैं, पर रूप का यह आकर्षण भी वास्तव में जीवन के प्रति हमारे आकर्षण का ही प्रतिबिम्ब है। 

जीवन को सीधे न देखकर हम एक काँच में देखते हैं, तो हम उन रूपों में ही अटक जाते हैं जिनके द्वारा जीवन अभिव्यक्ति पाता है। काँच की टंकी में पाली हुई सोन मछली पर एक छोटी सी कविता में यह कहा गया है

हम निहारते रूप
काँच के पीछे हाँप रही हैं मछली
रूप तृषा भी
 (और काँच पीछे) है जिजीविषा ।”

मछली के प्रतीक के विषय में अज्ञेय ने यह विचार भी व्यक्त किया कि "यदि हम सागर को प्रतीक मान लें तो मछली उस प्रतीक का प्रतीक हो जाती है, जिसके द्वारा कवि अज्ञान सत्य का अन्वेषण करता है। 

मछली सेतु पर खड़े कवि की अज्ञानता रूपी परछाईं को भेद जाती है और वह सत्य का अन्वेषी स्वयं अपने अहंकार से उत्पन्न पूर्वाग्रहों की छाया को पार देख लेता है।

 " कवि के निम्नांकित प्रतीक को भी देखिए, जिसमें डॉ. केदार शर्मा के शब्दों में, "एक अन्वेषक व्यक्ति की मनःस्थिति को व्यक्त किया गया है। 

उजली मछली स्त्यानुभूति का, छाया अहंकार से युक्त पूर्वाग्रहों का, नदी जीवन का, सेतु उस स्थल या स्तर का जहाँ आकर व्यक्ति कुछ जानना चाहता है, कुछ पाना चाहता है, लक्ष्य अज्ञात सत्य का प्रतीक है

“अभी-अभी जो
उजली मछली
भेद गई है
सेतु पर खड़े मेरी छाया
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मुझे बोध है नदी वहाँ नीचे बहती है 
गहरी वेगवती प्लव शीला ।
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वह उजली मछली है 
भेद गई जो मेरी 
बहुत-बहुत पहचानी 
बहुत-बहुत अपनी यह बहुत 
पुरानी छाया ।”

इसी प्रकार दीपक के ज्ञान के नये प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने वाली अज्ञेय की यह सुन्दर प्रतीक योजना द्रष्टव्य है

"खिड़की एकाएक खुली 
बुझ गया दीप झोंकें से,
 हो गया बन्द वह ग्रन्थ 
जिसे हम रात-रात देखते रहे।" 

(3) वैयक्तिक प्रतीक - वैयक्तिक प्रतीकों से तात्पर्य डॉ. केदार शर्मा के अनुसार उन प्रतीकों से है, जो कवि अज्ञेय की निजी सम्पत्ति है, जिनका प्रचलन और प्रसार अज्ञेय काल तक ही सीमित है। ये प्रतीक किसी विशेष सन्दर्भ में किसी विशेष अर्थ के लिए कवि द्वारा गढ़े गए हैं। 

उदाहरण लिए  के एक कविता की नीचे लिखी पंक्तियों में बालू तट-बुढ़ापे का, हिल्लोलित सागर उमंग और उत्साह भरे यौवन का प्रतीक है

"इस बालू के तट पर 
(जिसकी तट जो अन्तहीन फैला-ही-फैला 
दीठ जहाँ जहाँ तक भी जाती है)
बैठे हम अवसन्न भाव से पूछ हैं-
कहाँ गया वह ज्वार, हमारा जीवन वह हिल्लोहित सागर कैसे
कहाँ गया ?”

इसी प्रकार एक कविता है- तीसरा पक्षी, जिसमें तीन पक्षियों के जीवन की एक संकेतात्मक झाँकी प्रस्तुत की गई है। इस कविता में पहला पक्षी (हारिल) स्वाभिमानी उद्देश्योन्मुख एवं कर्मठ व्यक्ति का प्रतीक है। 

दूसरा पक्षी (क्रौंच) अन्वेषक साधक व्यक्ति है, जो पुनीत क्षण में प्राणोत्सर्ग कर देता है। तीसरा पक्षी नाम हीन, उद्देश्यहीन, व्यक्ति का प्रतीक है। यह केवल चलते रहना जानता है। उसके चलने का न कोई समय है और न कोई उद्देश्य । 

इस विषय में उन्होंने नीचे कहा है“अज्ञेय के ये प्रतीक अत्यन्त वैयक्तिक हैं। वैयक्तिकता के आधार से कहीं-कहीं तो इन प्रतीकों का रूप उलटवासियों जैसा हो गया है। एक कविता है, जिसका शीर्षक है 'पहेली' ।

इस कविता में कवि ने कुछ ऐसे प्रतीकों का प्रयोग किया है, जो प्रचलित तो हैं, किन्तु परम्परागत अर्थ से भिन्न अर्थ देते हैं।" कविता अग्र प्रकार है

"गुरु ने छीन लिया हाथों से जाल,
 शिष्य से बोला
कहाँ ले चला जाल अभी ?राज्य
पहले मछलियाँ पकड़ तो ला ?"

बेचारा चेला गुरु की इस पहेली को नहीं सुलझा पाया । युग-युग बीतते गये, वह इस प्रश्न पर बार-बार सोचता रहा। तभी एक दिन

"सहसा भेद गई तीखी आलोक किरण 
अरे, कब से बेचारी मछली 
फिर अगाध से
सागर खोज रही है।"

कविता में मछली विचारानुभूतियों का और सागर व्यापकता का प्रतीक है। इस प्रकार के प्रतीक गूढ़ और दुरुह होने के कारण साधारणीकरण में प्रायः बाधक सिद्ध हुए हैं, लेकिन फिर भी अकाव्यात्मक नहीं कहे जा सकते । इसे विरोधाभास कहिए या कुछ और, तथ्य यही है । 

(4) यौन प्रतीक - इस सन्दर्भ में अज्ञेय का यह अभिमत अवलोकनीय है“आज के मानव का मन यौन - परिकल्पनाओं से लदा हुआ है और वे कल्पनाएँ सब दलित और कुंठित हैं। उसकी सौन्दर्य-चेतना भी इससे आक्रान्त है। 

उसके उपमान सब यौन-प्रतीकार्थ रखते हैं तब वह स्पष्ट इंगित से बराबर भागता है, जैसे बिजली के प्रकाश में व्यक्ति चौंक जाए।" डॉ. केदार शर्मा के शब्दों में, "अज्ञेय की दृष्टि में यौन-प्रतीक आवश्यक है। 

सावन-मेघ, हरी घास पर क्षण भर, जब पपीहे ने पुकारा, सागर के किनारे और सो रहा है, झौंप कविताओं में यौन प्रतीकों की स्थिति स्पष्ट है। अज्ञेय के काव्य में प्रयुक्त ये यौन प्रतीक छायावादी कविता की पृष्ठभूमि में ही विकसित हुए हैं। 

कवि की यौन भावनाएँ प्रकृति के माध्यम से प्रतीकात्मक पद्धति का सहारा पाकर व्यक्त हुई हैं।" उदाहरण के लिए निम्नांकित उद्धरण अवलोकनीय हैं, जिनमें मेघ कामातुर व्यक्ति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत हुए हैं

"मेघ आकुल गगन को मैं देखता था 
बन विरह के लक्षणों की मूर्ति
सूक्ति की फिर नायिकाएँ
 शास्त्र - संगत प्रेम-क्रीड़ाएँ 
घुमड़ती थी बादलों में
आर्द्र, कच्ची वासना के धूम-रसी।"

अन्ततः निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि उपमान-योजना, बिम्ब-विधान और प्रतीक नियोजन तीनों की दृष्टियों से अज्ञेय का काव्य पर्याप्त उत्कृष्ट और समृद्ध है।

 तीनों ही क्षेत्रों में अपेक्षित संस्कार करने की उनकी लालसा अधिकांशतया सफल ही सिद्ध हुई है, और बार-बार के प्रयोग रूपी घर्षण से उनकी जो कान्तिम्लान चुकी थी, उन्हें अज्ञेय ने पनी मेधा से नई कान्ति और दीप्ति प्रदान की है। 

हाँ, यत्र-तत्र कवि का यह नूतनता-मोह इतना अवश्य बढ़ गया है कि परम्परागत बिम्ब-उपमान और प्रतीकों को नई दीप्ति देने के स्थान पर उसने उनकी रही-रही चमक को भी विनष्ट कर दिया है और कहीं-कहीं वे कबीर की उलटवासियों तथा सूर के कूट पदों जैसे हो गये हैं।

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