तृतीयक क्रियाकलाप किसे कहते हैं

तृतीयक व्यवसाय के अंतर्गत वे सभी सेवाएँ आती हैं जो प्राथमिक एवं द्वितीयक व्यवसाय में लगे लोगों को व्यक्तिगत रूप से दी जाती हैं। 

इस व्यवसाय में सम्मिलित मुख्य सेवाएँ अग्रलिखित हैं -

उपर्युक्त सेवाओं में लगे लोगों के कार्य को ही तृतीयक व्यवसाय की श्रेणी में रखा गया है। वैसे इन व्यवसायों से किसी वस्तु या सामग्री का प्रत्यक्ष उत्पादन नहीं होता, परन्तु किसी भी देश का विकास इन सेवाओं में लगे लोगों की दक्षता पर बहुत कुछ निर्भर करता है। 

1. परिवहन या यातायात – परिवहन सुविधाओं के अभाव में व्यावसायिक एवं औद्योगिक विकास सम्भव नहीं हो सकता। इतना ही नहीं व्यापार भी परिवहन सुविधाओं के बिना अपूर्ण होता है। विश्व के समस्त देशों के निवासी वस्तुओं का आयात-निर्यात परिवहन सेवाओं द्वारा ही पूर्ण करते हैं। 

तृतीयक क्रियाकलाप किसे कहते हैं

पूर्व में दिल्ली से कोलकाता तक की यात्रा पैदल अथवा घोड़ों पर बैठकर किया जाता था, परन्तु वैज्ञानिक प्रगति के कारण हम मोटर, रेल अथवा वायुयान की सहायता से गंतव्य स्थान में पूर्व की तुलना में घण्टों पहले पहुँच जाते हैं । विगत वर्षों में परिवहन साधनों का विकास तीव्र गति से हुआ है, जिसे विज्ञान की देन ही माना जायेगा।

उत्पादन एवं उपभोक्ता को जोड़ने में परिवहन तंत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यातायात या परिवहन के संबंध में कहा जा सकता है कि परिवहन उन सब यांत्रिक साधनों और संगठनों का योग है, जो व्यक्तियों, वस्तुओं अथवा समाचारों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में सहायक होते हैं।

परिवहन के महत्त्व निम्नलिखित हैं।

  1. परिवहन द्वारा वस्तुओं का स्थानांतरण शीघ्रता से किया जा सकता है। 
  2. परिवहन माँग और पूर्ति संतुलन में सहायक होते हैं ।
  3. देश-विदेश के व्यापार की उन्नति परिवहन पर निर्भर करती है । 
  4. परिवहन के साधन ही श्रम विभाजन को संभव बनाते हैं ।
  5. परिवहन से ही बाजारों के क्षेत्र विकसित होते हैं।
  6. परिवहन से उत्पादन को प्रोत्साहन मिलता है। 
  7. परिवहन से ही मूल्यों की समानता संभव होती है ।
  8. परिवहन औद्योगीकरण को प्रोत्साहित करता है ।
  9. परिवहन के कारण ही जनसंख्या एवं श्रमिक के केन्द्रीकरण पर प्रभाव पड़ता है।
  10. परिवहन से ही सभ्यता एवं ज्ञान में अभिवृद्धि होती है। 

उपर्युक्त महत्त्वों से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी देश की उन्नति पर परिवहन के विकास का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। भले ही मानव द्वारा स्थल परिवहन का उपभोग किया जावे या जल और प्रसार परिवहन का अथवा वायु परिवहन का । यह तो उसकी सुविधा और क्षमता पर निर्भर करता है ।

2. व्यापार  – प्राकृतिक साधनों, आर्थिक विकास, जनसंख्या वितरण तथा अभिरुचि में असमानता तथा भिन्नता के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को जन्म मिलता है। वस्तुओं अथवा सामग्रियों का क्रय एवं विक्रय करना ही व्यापार कहलाता है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की आवश्यकता के मुख्य कारण हैं -

  1. प्राकृतिक संसाधनों में विभिन्नताएँ। 
  2. आर्थिक विकास में विभिन्नताएँ।
  3. जनसंख्या वितरण की भिन्नता।
  4. विदेशी पूँजी - निवेश।
  5. उन्नत परिवहन साधन।
  6. सरकार की व्यापार नीति । 
  7. विदेशों से राजनैतिक संबंध।
  8. देश की भौगोलिक स्थिति। 
  9. जन रुचि।
  10. युद्ध एवं शांति।
  11. उत्पादों की गुणवत्ता
  12. राष्ट्रीय आय।

उपर्युक्त बिन्दु किसी देश द्वारा किए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करते हैं। एक ओर जहाँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अनेक लाभ हैं वहीं इसकी कुछ हानियाँ भी हैं, अतः देश के विकास के लिये अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संतुलन बनाये रखना अतिआवश्यक है।

3. संचार  - संचार वह माध्यम या युक्ति है, जिसके द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान को संदेश, सूचनायें, जानकारियाँ आदि संप्रेषित की जाती हैं। प्राचीन काल में संदेशों के संप्रेषण हेतु कबूतरों का प्रयोग किया जाता था। 

16 वीं सदी में डाक व्यवस्था का सूत्रपात हुआ और आज मानव जन-संचार के विभिन्न सोपानों पर कदम रखते हुए इंटरनेट तक पहुँच गया है, जिससे विश्व के किसी भी स्थान की जानकारी कुछ ही समय में समस्त विश्व को दी जा सकती है। यही कारण है कि संसार को सिकुड़ते विश्व की संज्ञा दी जाती है। 

जन-संचार के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं।

  1. डाक एवं तार 
  2. दूरभाष या फोन 
  3. विडियो फोन 
  4. टेलेक्स 
  5. फैक्स 
  6. रेडियो 
  7. टेलीविजन 
  8. उपग्रह 
  9. इंटरनेट 

उपर्युक्त संचार माध्यमों द्वारा सूचनाओं तथा जानकारियों का विनिमय अथवा संप्रेषण बहुत आसानी से किया जा सकता है।

4. शिक्षा एवं स्वास्थ्य - किसी भी देश का विकास उसमें निवासरत जनता के ज्ञान तथा उसके स्वास्थ्य पर मूल रूप से निर्भर करता है। आदिमानव जिसे भोजन पकाना भी नहीं आता था उसे भी अग्नि के ज्ञान ने चमत्कृत किया तथा उसने अपने खाद्य पदार्थ में कंदमूल के साथ-साथ भोजन ग्रहण करना प्रारंभ किया। किसी भी व्यक्ति के समग्र विकास हेतु शिक्षित एवं स्वस्थ होना अत्यावश्यक है। 

शिक्षा ऐसा साधन है, जिससे हम एक पीढ़ी में संचित समस्त ज्ञान को दूसरी पीढ़ी में पहुँचाते हैं। अत: इसके अभाव में मानव अपने सीमित ज्ञान में ही कूपमंडूप बनकर रह जायेगा। साथ ही यदि उसका स्वास्थ्य ठीक न हो तो ज्ञानवान होते हुए भी कुछ कार्य नहीं कर सकेगा।

उपर्युक्त व्याख्या से यह स्पष्ट हो जाता है, कि किसी भी राष्ट्र की विकास दर वहाँ उपलब्ध शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा भी निर्धारित होती है। विज्ञान के बढ़ते कदम द्वारा अंतर्राष्ट्रीय रूप से हमें शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधायें प्राप्त हो रही हैं।

तृतीयक व्यवसाय से जुड़े लोग आज की सामाजिक संरचना में तृतीयक व्यवसाय भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि इन व्यवसायों से प्रत्यक्षतः किसी वस्तु या पदार्थ का उत्पादन नहीं होता हैं। परन्तु इन व्यवसायों से जुड़े लोग अपनी क्षमताओं और कुशलताओं को पूर्णरूपेण समाज को प्रदान कर मनुष्यों की कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं। 

आज तो प्राथमिक एवं द्वितीयक व्यवसाय भी सही ढंग से तभी विकसित हो सकते हैं। जब तृतीयक व्यवसाय व्यवस्थित ढंग से उपलब्ध हो अर्थात् तृतीयक व्यवसाय से जुड़े लोगों की कार्यक्षमता एवं कुशलता पर ही सम्पूर्ण व्यवसाय जगत की सफलता निहित है।

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