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आयात-निर्यात नीति क्या है

भारत सरकार की नवीन आयात-निर्यात नीतियों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।

अथवा

निर्यात संवर्द्धन एवं आयात प्रतिस्थापन भारत की आज सबसे बड़ी आवश्यकता है। समझाइये। 

उत्तर – किसी भी देश को आर्थिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में विदेशी विनिमय की समस्या का सामना करना पड़ता है। इसे विदेशी सहायता के माध्यम से हल किया जा सकता है।

यदि विदेशी सहायता पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती है तो देश के सामने दो विकल्प रह जाते हैं - एक तो देश में निर्यात की वृद्धि की जाय और दूसरे आयातों को नियन्त्रित किया जाय।

अतः आर्थिक विकास की प्रक्रिया में विदेशी विनिमय संकट का सामना करने के लिए सरकार ने निर्यातों को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रयास किये हैं।

निर्यात संवर्द्धन का अभिप्राय - निर्यात संवर्द्धन वह प्रक्रिया है जिसमें पुराने निर्यातकर्ताओं को अनेक रियायतें देकर निर्यात बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और साथ ही नये उत्पादकों को निर्यात वस्तुएँ उत्पादित करने के लिए आकर्षित किया जाता है।

भारत में निर्यात संवर्द्धन की आवश्यकता – भारत में, विशेष रूप से द्वितीय पंचवर्षीय योजना से, विदेशी विनिमय की काफी कठिनाई उपस्थित हुई क्योंकि औद्योगीकरण के कारण देश को भारी मात्रा में मशीनों, पूँजीगत वस्तुओं, पेट्रोलियम इत्यादि का आयात करना पड़ा। 

किन्तु हम निर्यातों में वांछित वृद्धि नहीं कर सके जिससे हमारा निर्यात प्रतिशत नीचे गिर गया । 1950 में हमारा निर्यात विश्व के कुल निर्यात का 1.85 प्रतिशत था जो 1992 में गिरकर 0.53 प्रतिशत रह गया। 

अतः आठवीं पंचवर्षीय योजना में देश में निर्यात संवर्द्धन की आवश्यकता पर बल देते हुए अनेक नीतिगत उपाय लागू किये गये जिससे देश के निर्यातों में आंशिक वृद्धि हुई । 

भारत में निर्यात संवर्द्धन के उपाय - भारत में निर्यात बढ़ाने के लिए स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सरकार द्वारा जो उपाय किए गए हैं वे इस प्रकार हैं

(1) विभिन्न संगठनों की स्थापना – भारत सरकार ने भारतीय निर्यात के लिए बाजार खोजने, घरेलू माल का विदेशों में प्रचार करने एवं निर्यातकों को सुविधा देने के लिए विभिन्न संगठनों की स्थापना की । जैसे—विदेशी व्यापार संस्थान, आयात-निर्यात सलाहकार परिषद्, निर्यात संवर्द्धन परिषद् आदि । इन संगठनों ने निर्यात बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

(2) व्यापार विकास संस्था - भारत सरकार ने 1971 में निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से व्यापार विकास संस्था की स्थापना की जिसका मुख्य कार्य निर्यात संवर्द्धन के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न संस्थाओं में समन्वय स्थापित करना है तथा उन्हें आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराना है।

(3) उदार लाइसेन्स प्रणाली - निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने लाइसेन्स प्रणाली को काफी उदार बनाया है जिससे स्वतन्त्र व्यापार को काफी प्रोत्साहन मिला है। इसके अन्तर्गत पहले जिन वस्तुओं पर नियन्त्रण था उनसे नियन्त्रण हटा लिया गया है तथा 1991 की नई आयात-निर्यात नीति में लाइसेन्स प्रणाली को लगभग समाप्त कर दिया गया है।

(4) निर्यात प्रोत्साहन पुरस्कार - निर्यात में वृद्धि करने के लिए सरकार ने निजी उद्यमियों प्रोत्स देने के लिए पुरस्कार देने की योजना बनाई है जिसका उद्देश्य निर्यात वस्तुओं में गुणात्मक सुधार करना है ।

(5) आयात-निर्यात बैंक की स्थापना - देश में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का संवर्द्धन करने तथा उसकी वित्तीय व्यवस्था करने के लिए एक आयात-निर्यात बैंक की स्थापना की गयी है। इस बैंक में आयात-निर्यात करने वालों को सभी सुविधाएँ एक ही स्थान से मिलती हैं। हाल ही में इस बैंक द्वारा निर्यातकों को और अधिक सुविधाएँ प्रदान की गई हैं।

(6) प्रचार अभियान तथा अन्तर्राष्ट्रीय मेलों का आयोजन — विदेशों में भारतीय वस्तुओं का प्रचार करने तथा निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा एक प्रदर्शन संचालनालय की स्थापना की गई। सरकार द्वारा समय-समय पर देश तथा विदेशों में भारतीय वस्तुओं का अन्तर्राष्ट्रीय मेला आयोजित किया जाता है जिससे देश का निर्यात बढ़ने में काफी सहायता मिलती है।

(7) नकद क्षतिपूर्ति सहायता — इसके अन्तर्गत उन निर्यातकों को नकद क्षतिपूर्ति दी जाती है जिनके उत्पादनों के निर्यात में अप्रत्यक्ष करों में कोई छूट नहीं दी जाती । इस योजना के अन्तर्गत 260 वस्तुओं को शामिल किया गया है जिन्हें 8 समूहों में विभाजित किया गया है। 

(8) निर्यात संवर्द्धन पूँजीगत सामान योजना- सरकार ने निर्यातों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से EPCG योजना प्रारम्भ की है जिसके अन्तर्गत निर्यातकों को रियायती आयात शुल्क पर पूँजीगत सामान के आयात की अनुमति प्रदान की जाती है। नई आयात-निर्यात नीति (1997-2002) के अन्तर्गत इस योजना में वस्तुओं और सेवाओं के निर्यातकों को केवल 10% आयात शुल्क पर पूँजीगत वस्तुओं के आयात की अनुमति प्रदान की गई है।

(9) निर्यात प्रोसेसिंग क्षेत्र की स्थापना - विनिर्मित वस्तुओं के निर्यातों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने निर्यात प्रोसेसिंग क्षेत्रों की स्थापना की है जिनका उद्देश्य देश में निर्यातोन्मुखी वातावरण बनाकर भारतीय निर्यात वस्तुओं को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा योग्य बनाना है। देश में वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र के 7 निर्यात प्रोसेसिंग क्षेत्र कार्य रहे हैं ।

(10) निर्यात गृह, निर्यात व्यापार गृह तथा स्टार व्यापार गृह की स्थापना- सरकार ने निर्यातकों की स्थापित क्षमता में वृद्धि करने के उद्देश्य से देश में निर्यात गृह, निर्यात व्यापार गृह तथा स्टार व्यापार गृह की स्थापना की है। निर्यात वृद्धि के लिए आवश्यक सुझाव–स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमारे निर्यातों में तीव्र वृद्धि हुई है, किन्तु इस वृद्धि को सन्तोषजनक नहीं कहा जा सकता ।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि निर्यात में वृद्धि की जाय। पिछले वर्षों में निर्यात की तुलना में आयातों में अधिक वृद्धि हुई है जिससे हमारे विदेशी विनिमय पर प्रतिकूल दबाव पड़ा है। अतः देश में निर्यात संवर्द्धन की दिशा में प्रगति के लिए निम्नांकित सुझाव दिये जा सकते हैं।

(1) उत्पादन में वृद्धि देश में निर्यात अतिरेक उसी समय सम्भव है जब उत्पादन में वृद्धि की जाय। इस दृष्टि से विदेशी माँग और निर्यात योग्य वस्तुओं में घनिष्ठ सम्बन्ध होना चाहिए तथा हमें उत्पादन बढ़ाने की दीर्घकालीन नीति अपनानी चाहिए । 

(2) निर्यातों का सुव्यवस्थित नियोजन — दीर्घकालीन नियोजन में, निर्यात वृद्धि को उचित स्थान दिया जाना चाहिए तथा इस उद्देश्य से निर्यात क्षेत्र की सही पहचान की जानी चाहिए तथा निर्यात बढ़ाए जाने की नीति निर्धारित होनी चाहिए ताकि यह ज्ञात हो सके कि हमारे उद्योग, कृषि, खनिज एवं वन क्षेत्रों में निर्यात क्षमता क्या है।

(3) वस्तुओं की किस्म में सुधार एवं लागत में कमी-विदेशी बाजार में होने वाली प्रतियोगिता को देखते हुए यह आवश्यक है कि हमारी वस्तुएँ उन्नत किस्म की हों तथा उनकी लागत कम हो । इसके लिए उत्पादन में उन्नत तकनीक का प्रयोग किया जाना चाहिए ।

(4) उद्योगों को निर्यातोन्मुखी बनाना – देश में ऐसे कई उद्योग हैं जो केवल घरेलू बाजार तक सीमित हैं,जबकि उनके पास निर्यात की क्षमता है। यदि हमें निर्यात में तेजी से सतत् वृद्धि करनी है तो मध्यम एवं बड़े उद्योगों को निर्यात की ओर उन्मुख करना होगा जो वर्तमान में घरेलू बाजार तक ही सीमित हैं। सरकार को ऐसे उद्योगों को प्रोत्साहित करना चाहिए जिनके लिए विदेशों में निर्यात की अच्छी सम्भावनाएँ हैं।

(5) श्रम गहन वस्तुओं के निर्यात को प्रोत्साहन - भारत जैसे विकासशील देश में श्रम गहन वस्तुओं की तुलनात्मक लागत कम है,जबकि ऐसी वस्तुओं का विकसित देशों में अच्छा बाजार है । अतः देश में श्रम गहन वस्तुओं के निर्यात को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।

(6) उद्यम और सरकार के बीच सहयोग - निर्यात सम्भावनाओं का पूरा प्रयोग करने के लिए उद्योगों तथा सरकार के बीच पर्याप्त तालमेल होना चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को जिनमें भारी पूँजी लगी हुई है, निर्यात के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए ।

1992-97 की आयात निर्यात नीति- आर्थिक उदारीकरण (जुलाई 1991) तथा हमारी अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण की प्रक्रिया के साथ ही डंकल प्रस्तावों के प्रति भारत सरकार ने अपनी सहमति व्यक्त कर दी तथा इसके बाद विश्व व्यापार संगठन के प्रारूप पर हस्ताक्षर कर दिये। इसके फलस्वरूप अब भारत को अपने आयातों पर लगे प्रतिबन्धों को समाप्त करना होगा तथा आयात करों में कमी करनी होगी जिससे स्वतन्त्र व्यापार का मार्ग प्रशस्त हो सके। 

1951 से ही हमारी व्यापार नीतियों में आयात प्रतिस्थापन, आयातों पर प्रतिबन्धों तथा निर्यातों को बढ़ाने के उपाय किये जा रहे थे जिसके कारण भारत की अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में स्पर्द्धाशीलता काफी कम हो गयी थी। इसी कारण 1992-97 तथा हाल ही में घोषित 1997-2002 की हमारी आयात-निर्यात नीतियाँ महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनका मूल उद्देश्य भारत के व्यापार को अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में स्पर्द्धाशील बनाना है न कि आयातों पर प्रतिबन्ध लगाना अथवा कृत्रिम तरीकों से निर्यातों में वृद्धि करना ।

1992-97 की आयात-निर्यात की प्रमुख विशेषता यह थी कि इसके अन्तर्गत कुछ पूँजीगत वस्तुओं के आयात को पूर्णतया प्रशुल्क मुक्त कर दिया गया, जबकि व्यापक उपभोग की कुछ वस्तुओं के आयात को सरलीकृत कर दिया गया।

1992-97 की आयात-निर्यात नीति की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं।

(1) पूँजीगत वस्तुओं के निर्यात हेतु आयात की स्कीम का विस्तार करके इनमें मर्चेण्ट निर्यातकों तथा सेवा देने वाली इकाइयों को भी शामिल किया गया।

(2) अग्रिम लाइसेन्स प्रणाली को अधिक विस्तृत करके इसे उदार बनाया गया। इसमें यह भी छूट दी गई है कि निर्यात- दायित्व को पूरा करने तथा बैंक गारण्टी आदि के पूरा होने पर अग्रिम लाइसेन्स को हस्तान्तरित किया जा सकेगा ।

(3) निर्यातोन्मुखी इकाइयों, निर्यात प्रोसेसिंग क्षेत्र की इकाइयों, कम्प्यूटर टैक्नोलॉजी पार्क, सॉफ्टवेयर आदि की इकाइयों को समान स्तर पर रखा गया ।

(4) निर्यात की राशि प्राप्त होने की शर्त को समाप्त कर दिया गया। कस्टम क्षेत्र से माल के बाहर निकलते ही यह माना जायेगा कि निर्यात का दायित्व पूरा हो चुका ।

(5) गिफ्ट के आयात हेतु कस्टम की जाँच को समाप्त कर दिया गया।

(6) हीरे-जवाहरात के आयात को उदार बनाया गया।

(7) उपभोग वस्तुओं पर आयात प्रतिबन्ध जारी रखने की बात कही गयी ।

(8) खुले आयात लाइसेन्स के अन्तर्गत 75 अतिरिक्त मदों को निर्बाध रूप से आयात करने की छूट दे दी गयी।

(9) विशिष्ट आयात लाइसेन्स की सूची विस्तृत की गयी। इनमें 39 नई मदों को जोड़ा गया । (10) अग्रिम लाइसेन्स व्यवस्था को कस्टम प्रणाली से जोड़ा गया ।

1997-2002 की आयात निर्यात नीति— भारत सरकार ने 1992-97 की जो आयात निर्यात नीति कांग्रेस सरकार के समय घोषित की थी। उसमें प्रत्यक्षतः आर्थिक उदारीकरण का मूल लक्ष्य परिलक्षित होता था। उसी क्रम में 1997-2002 की आयात-निर्यात नीति की 31 मार्च, 1997 को केन्द्रीय वाणिज्य मन्त्री ने घोषणा की। इस नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

(1) प्रतिबन्धित सूची में से 542 वस्तुओं को हटा लिया गया है। अब इन वस्तुओं का स्वतन्त्र रूप से आयात सम्भव हो सकेगा तथा इनमें से 150 वस्तुओं का विशिष्ट आयात लाइसेन्स सूची तथा शेष का स्वतन्त्र सामान्य लाइसेन्स सूची के अन्तर्गत आयात किया जा सकेगा।

(2) पाँच वस्तुओं के आयात पर पर्यावरणीय सुरक्षा, सामरिक महत्व, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सुरक्षा सम्बन्धी कारणों से प्रतिबन्ध लगाया गया है।

(3) वर्तमान नीति में मूल्य आधारित अग्रिम लाइसेन्स व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। इसके स्थान पर एक सरलीकृत पास बुक स्कीम लागू कर दी गयी है ।

(4) कृषि तथा सम्बद्ध क्षेत्रों से सम्बद्ध वस्तुओं की जो बिक्री निर्यातोन्मुखी इकाइयों द्वारा की जाती है, उसे काफी उदार बना दिया गया है। ये इकाइयाँ अब अपने उत्पादन का 50 प्रतिशत घरेलू बाजार में बेच सकती हैं, यद्यपि इसके लिए उन्हें कर चुकाना होगा।

(5) जेवरों के निर्यात हेतु स्वर्ण का स्टॉक रखने वाली नामांकित इकाइयों की संख्या में वृद्धि कर दी गयी है। (6) खनिज तेल तथा गैस क्षेत्रों को भी आभासित निर्यात का लाभ प्रदान कर दिया गया है। अब तक यह छूट विद्युत क्षेत्र की इकाइयों को ही उपलब्ध थी ।

(7) कर-मुक्त लाइसेन्सों की प्रारम्भिक वैधता-अवधि को बढ़ाकर 18 माह कर दिया गया है। इस प्रकार इस आयात-निर्यात नीति की रूपरेखा भारी व्यापार घाटा और बढ़ते हुए ऋण-भार की दृष्टि में रखकर तैयार की गई है और आशा की जाती है कि इससे निर्यात में अपेक्षित वृद्धि होगी।

आयात प्रतिस्थापन को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सुझाव — आयात प्रतिस्थापन की नीति से देश में अनेक व्यावहारिक परिणाम सामने आये हैं। देश का औद्योगिक ढाँचा विस्तृत होकर विविधतापूर्ण बन गया है। 

पूँजीगत वस्तुओं के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई है और साथ ही मध्यवर्ती वस्तुएँ तैयार करने वाले उद्योगों ने भी महत्वपूर्ण प्रगति की है। इन सफलताओं के होते हुए भी आयात प्रतिस्थापन की प्रक्रिया अपनी ऊँची उत्पादन लागत एवं कीमतों में वृद्धि के कारण अपने मौलिक उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रही है।

आयात प्रतिस्थापन प्रक्रिया में निहित दोषों को दूर करने तथा भविष्य में आयात प्रतिस्थापन को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए अग्रांकित सुझाव दिये जा सकते है।

(1) लाइसेन्स प्रणाली को अधिक सरल बनाया जाना चाहिए।

(2) आयात प्रतिस्थापन की लागत में कमी करने के उपाय सुनिश्चित किये जाने चाहिए। इसके लिए अनुसन्धान एवं विकास पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ।

(3) आयात प्रतिस्थापन को चयनात्मक रूप में अपनाया जाना चाहिए ताकि कुशल औद्योगीकरण का विस्तार किया जा सके ।

(4) आयात प्रतिस्थापन से जुड़े उद्योगों को संरक्षण दिया जाना चाहिए । 

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