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अज्ञेय की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए

अज्ञेय का काव्य-सौष्ठव - प्रयोगवाद और नयी कविता के कवियों में अज्ञेय की गणना होती है। यह आलोचकों की एक प्रकार की धाँधली ही है कि वे अज्ञेय को एक प्रबुद्ध कलाकार से अधिक प्रयोगवाद के प्रवर्तक और पोषक के रूप में मानते हैं।

अज्ञेय की काव्यगत विशेषता

अज्ञेय ने स्वयं इस नाम को भ्रामक माना है। उनकी कविता की भावगत और शिल्पगत विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं। 

अज्ञेय के काव्य का भाव-पक्ष

अज्ञेय के काव्य में भावों का वैविध्य दर्शनीय है। डॉ. रामदरश मिश्र के शब्दों में, "अज्ञेय प्रयोगवाद और नयी कविता के विशिष्ट कवि हैं। इस धारा के कवियों में अज्ञेय का स्वर सबसे अधिक वैविध्यपूर्ण है - 

उनका स्वयं अहं से लेकर समाज तक, प्रेम से लेकर दर्शन तक, आदिम गंध से लेकर विज्ञान की चेतना तक, यन्त्र - सभ्यता से लेकर लोक-परिवेश तक, यातना-बोध से लेकर विद्रोह की ललकार तक, प्रकृति - सौन्दर्य से लेकर मानव-सौन्दर्य तक फैला हुआ है। 

यह बात और है कि इस व्याप्ति में सर्वत्र संवेदनशीलता या अनुभूति साथ नहीं देती, कहीं-कहीं कोरी बौद्धिकता या शुष्क बोध उभर आता है।”

डॉ. इन्द्रनाथ मदान अज्ञेय के काव्य में भाव- वैविध्य को लक्ष्य करके कहते हैं कि, "अज्ञेय के काव्य का वस्तु - पक्ष अनेक तन्तुओं से बुना गया है। इसमें दुःख एवं क्षण का महत्त्व है, मोह भंग एवं आस्था का स्वर है, यथार्थ के प्रति आग्रह है, सहज प्रेम की अभिव्यक्ति है, 

व्यक्तित्व की स्थापना तथा उसका परिष्कार है, अकिंचन परिस्थितियों तथा सामान्य वस्तुओं से बौद्धिक एवं रागात्मक सम्बन्ध है, व्यंग्य का पुट है, सामाजिक चेतना की अभिव्यजंना है, लोक सम्पत्ति की भावना है, छायावादी तथा · प्रयोगवादी जीवन - बोध है, 

आधुनिकता की ध्वनि है और अहंवादी प्रवृत्ति है। इसके अतिरिक्त बौद्धिक चेतना अथवा बौद्धिकता इनकी काव्य-वस्तु की विशिष्टता है।”

अज्ञेय के काव्य की इन भावगत विशेषताओं को संक्षेप में इस प्रकार देखा जा सकता है

अज्ञेय उन प्रयोगवादी कवियों में हैं जो मध्यवर्ग की पीड़ा को अच्छी तरह पहचानते हैं। आज मध्यवर्ग के सपने और आकांक्षाएँ बड़ी रंगीन हैं, किन्तु उसके चतुर्दिक परिव्याप्त आर्थिक वैषम्य की अभेद्य दीवारों से टकराकर उसके रंगीन सपने चूर-चूर हो जाते हैं। 

मध्यवर्गीय व्यक्ति थका हुआ और टूटा हुआ अपनी स्वर की सीमाओं में पीड़ा के मौक्तिक खोजने लगता है। उसकी इस पीड़ा को अज्ञेय जी ने अच्छी तरह पहचाना है, तभी वे लिखते हैं

दुःख सबको मांजता है  और
चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किन्तु
 जिनको मांजता है उन्हें वह सीख देता है सबको मुक्त रखें।

 मध्यवर्ग की हीनता और आहत विश्वास का चित्रण इन पंक्तियों में देखिये - 

मेरी भुजाएँ टूट गई हैं 
क्योंकि मैंने उसकी परिधि में 
मेघों को बाँध लेना चाहा था।

दमित काम-वासना - छायावादी कवियों ने कल्पना लोक में नारी के साथ साहचर्य जोड़कर अपनी पिपासापूर्ति कर ली थी, किन्तु यथार्थ के प्रति आग्रह रखने वाले प्रयोगवादी कवि के लिए ऐसा करना सम्भव न था । 

फ्रायड का काम-सिद्धान्त उनका जीवन दर्शन बना कर उन्होंने कल्पना के सतरंगी आवरण का उच्छेद कर दमित काम वासनाओं का निवारण रूप प्रस्तुत किया। अज्ञेय के काव्य में दमित यौन-वासना को इस प्रकार रूपायित किया गया है

आह मेरा श्वास है उत्तप्त
धमनियों में उमड़ आई लहू की धार
प्यार अभिशप्त
तुम कहाँ हो नारि?

अनुभव की प्रमाणिकता - नयी कविता की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता अज्ञेय के काव्य में विद्यमान है। जिन अनुभवों को कवि ने स्वयं भोगकर प्राप्त किया है, वे अपनी सच्चाई के कारण सहज ही दूसरों को प्रभावित करने में सूक्ष्म रहेंगे, इसीलिए अज्ञेय अनुभव की प्रमाणिकता का महत्त्व स्वरों से उद्घोषित करते हैं

अच्छा 
अपना ठाठ फकीरी 
मंगनी के सुख-साज से 
अच्छा सार्थक मौन
व्यर्थ के श्रवण मधुर छन्द से
अच्छा। 

मोहभंग और यथार्थ के प्रति आग्रह - कवि अज्ञेय ने छायावादी कुहासे से निकलकर जब यथार्थ के नये धरातलों की खोज की है, उस समय जीवन के कुरूप, क्षुद्र और तुच्छ पक्ष को अपने ध्यानाकर्षण का केन्द्र बनाया है। 

जीवन में सुन्दर-असुन्दर, उदात्त - अनुदात्त, भव्य-तुच्छ आदि का सापेक्षिक महत्व है। अज्ञेय को सित चाँदनी वंचना मात्र प्रतीत होती है और जीवन के कुरूप पक्ष के प्रति आग्रह, यथार्थ के प्रति लगाव तथा मोहभंग की स्थिति के कारण वे वाल्मीकि पर बैठे क्रौंच को प्रिया-विरह जनित वेदना से आक्रान्त न बताकर दीमकों की टोह में बैठा हुआ बताते हैं

क्रौंच वाल्मीक पर
तो मत समझ
वह अनुष्टुप बाँचता है संगिनी के स्मरण में 
जान ले, दीमकों की टोह में है।

व्यक्ति का समाजीकरण- डॉ. इन्द्रनाथ मदान ने लिखा है कि "अज्ञेय के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उन्होंने अपने काव्य के नये चरण में व्यक्ति के समाजीकरण पर विशेष बल दिया है और इस प्रवृत्ति को नयी कविता का लक्षण माना गया है।” कवि समाजीकरण की भावना से अनुप्राणित होकर कहता है

झाड़ मत पत्ता खड़ा कर
स्वयं अपने आप से तू झर। 
प्यास पर तू विजय पा, पर
और जो प्यास मिलें, उनके लिए 
चुपचाप-निश्चल स्वच्छ, शीतल
प्राण-रस भर।।

क्षणवाद - अज्ञेय शब्द के महत्व को स्वीकारते हुए लिखते हैं कि

हमें किसी कल्पित अजरता का तोह नहीं।
आज के विविक्त अद्वितीय इस क्षण को
शाश्वत हमारे लिए वही है।।

विद्रोह भावना - अज्ञेय के काव्य में विद्रोह भरे स्वर भी गूँज रहे हैं। उनकी विद्रोह - भावना की विशेषता यह है कि एक प्रकार की कोमलता भी उसे आवेष्टित किये हुए हैं। श्री विशम्भर 'मानव' ने लिखा है कि, "अज्ञेय का कवि व्यक्तिव शिला-सी कठोरता और नवनीत-सी कोमलता से निर्मित है।

उनके विद्रोही स्वभाव के भीतर से कोमलता की यह चेतना वैसे ही फूटकर प्रवाहित होती रहती है, जैसे पर्वत के अन्दर से निर्झर की कोमल धारा ।” अज्ञेय की कोमलता स्नात विद्रोह भावना का स्वरूप इन पंक्तियों में देखिये - 

सुनो तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान, 
तुम, जो बड़े-बड़े गद्दी पर ऊँची दुकानों में। 
उन्हें कोसते हो जो भूखे मरते हैं खानों में,
तुम, जो रक्त चूस ठठरी को देते हो जल दान।। 

हालावाद - बन्दी स्वप्न' में हालावाद को भी कवि अज्ञेय ने अपने काव्य का विषय बनाया है। हालावाद पर कवियों ने बड़ी रंगीन रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।

किन्तु अज्ञेय की रचनाएँ इनसे अलग हैं। कवि की आकांक्षा है कि उसका सूखा कंठ ही सूरा के प्याले से तृप्त न हो, उसके नेत्र भी मधुवाला के दर्शन से सुख प्राप्त करें। परन्तु अवगुण्ठन के हटते ही उसकी साकी को रक्तस्नात दुःखिया भारत माँ है।  

यह देखकर उसका हृदय लज्जा से गढ़ जाता है। इस प्रकार कवि ने देश की वास्तविक दशा और देश के नवयुवकों के स्वप्नमय जीवन को साकार करने के लिए जो कल्पना की है, निःसन्देह अत्यन्त प्रभावकारी बन पड़ी है।

मैंनें कहा, कण्ठ सूखा है
दे-दे मुझे सूर का प्याला 
मैं भी पीकर आज देख लूँ
यह तेरी अंगूरी हाला।

व्यंग्यात्मकता - अज्ञेय के काव्य में व्यंग्यात्मकता पर विचार करते हुए डॉ. शेरजंग गर्ग ने लिखा है कि, "अज्ञेय का व्यंग्य संतुलित है, उसमें बौद्धिकता की छाप है एवं आधुनिक सभ्यता की विसंगति और निरर्थकता पर व्यंग्य है, 

जो प्रायः करुणा का भाव लिए होता है। अज्ञेय जहाँ विषमता पर प्रहार करते हैं, वहाँ वे प्रगतिवादियों के ठीक विपरीत आवेश रहित शैली में ऐसा करते हैं। 

आवेश रहित होना ही अज्ञेय के व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता है।" 'हमारा देश' नामक कविता में वे ग्रामों की दुर्दशा का व्यंग्यपरक चित्र खींचते हैं, जिनमें हमारा देश बसता है

इन्हीं तृण फूस छप्पर से
ढके ढुलमुल गँवारू
झोंपड़ों में ही हमारा देश बसता है।। 

प्रकृति चित्रण - छायावाद और नयी कविता के सेतुबन्ध अज्ञेय की कविता में प्रकृति का अनेक रूप में अंकन हुआ है। उनमें प्रकृति के तटस्थ और निर्लिप्त दृश्य - चित्र खींचने की प्रवृत्ति नहीं है। 

प्रकृति का चित्र अंकित करते-करते वे उसमें ऐसी संवेदनशील जीवन्तता भर देते हैं कि प्रकृति का पृष्ठभूमि रूप में वह अंकन अतीव मनोहारी बन जाता है। 

उदाहरणस्वरूप 'मालाबार का एक दृश्य' नामक कविता में प्रकृति का चित्रण करते-करते वे अचानक एक मालाबारी वाला की ओर आकृष्ट हो उठते हैं

कबरी में खौंस फल
गुड़हल का सुलगे अंगार 
सा साड़ी लाल धारे
सेंहुड़ के सामने कटीली खड़ी 
वाला मालाबार की।

प्रेमानुभूति - अज्ञेय ने प्रेम के वासनात्मक एवं प्रतीकात्मक स्वरूप का चित्रण किया है। साथ ही प्रेम के सहज और स्वाभाविक स्वरूप का उद्घाटन भी किया है। प्रेम के वासनात्मक एवं प्रतीकात्मक स्वरूप का चित्रण निम्नांकित पंक्तियों में देखिये -

उड़ गया वह बावला
पंछी सुनहला
कर प्रदर्शित देह की रोमावली को 
प्राप्त होते।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय के काव्य का वस्तु - पक्ष अनेक तन्तुओं से निर्मित है। बौद्धिक चेतना उनकी काव्य-वस्तु की विशिष्टता है। 

बुद्धि के महत्व को उन्होंने स्वीकार किया है और बौद्धिकता को वह नये साहित्य का अभिन्न अंग तथा नैतिक बोध के लिए अपेक्षित वस्तु बताते हैं। उनकी काव्य-वस्तु की विशिष्टता निर्विवाद रूप से सिद्ध है। 

अज्ञेय के काव्य का कला-पक्ष

भाव-पक्ष की भाँति ही अज्ञेय के काव्य का कला पक्ष भी विशिष्टता से युक्त है। उनके प्रतीक - विधान, बिम्ब - विधान, अलंकरण, भाषा एवं छन्द - योजना में प्रयोगशीलता एवं बौद्धिकता के तत्व परिलक्षित होते हैं। कवि नवीन उपमानों, बिम्बों एवं प्रतीकों के उपयोग पर बल देने का कारण इन शब्दों में बताता है

अगर मैं तुमको
लजाती साँझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता 
या शरद के भोर की नीहार-नहायी हुई, 
टटकी कली चम्पे की
बगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है 
या कि मेरा प्यार मैला है।
बल्कि केवल यही 
ये उपमान मैले हो गये हैं। 
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।

इस प्रकार कवि की धारणा है कि जिस प्रकार बर्तन ज्यादा घिस जाने पर उनका मुलम्मा छूट जाता है, उसी प्रकार प्रतीक और उपमान भी पुराने होकर अपना मूल्य खो देते हैं। 

वे युग एवं व्यक्ति की चेतना, काव्य की विषय वस्तु का स्वरूप निर्धारित करते हैं और सिद्ध करते हैं कि नवीन वस्तु की अभिव्यक्ति के लिए नवीन शिल्प-विधि आवश्यक है। काव्य-शिल्प के क्षेत्र में नवीन प्रयोग न केवल नवीनता के सूचक हैं, अपितु वे उसकी आवश्यकता भी हैं। 

इसलिए अज्ञेय के काव्य की शिल्प-विधि अपनी नवीनता और प्रयोगशीलता के कारण विशिष्ट बन पड़ी है। 

भाषा-भाषा की दृष्टि से अज्ञेय की कविता में नये शब्दों की भरमार है। ये शब्द मुख्यतः तीन क्षेत्रों में गृहीत हैं

(क) बोलचाल की भाषा से, यथा- मटियाली नलियारा, कुई, झेंप, टटकी, तलैया, पानीदार, अल्हड़, कलगी आदि 

(ख) विदेशी साहित्य और संस्कृति से, यथा- पियानो, मोटर, आर्ट पेपर, रेडियो, ईट्स, राकेट, फ्लैट आदि । 

(ग) भारतीय धर्म और संस्कृति से, यथा- आदिम अहेरी, हिमपुरुष, यायावर, औघड़, पारमिता आदि। 

प्रतीक योजना-अज्ञेय के काव्य की प्रतीक-योजना उनके नवीन दृष्टिकोण की परिचायक है। उनके प्रतीकों का स्वरूप उनकी काव्य-वस्तु के अनुरूप ही वैयक्तिक और बौद्धिक हैं। 

जीवन की जटिलता को व्यक्त करने के लिए उन्होंने बौद्धिक प्रतीक अपनाये है तो काम-भावना तथा मनोविश्लेषण से प्रेरित होकर मौन - प्रतीकों का प्रश्रय लिया है। कहीं-कहीं उनके प्रतीक इतने वैयक्तिक हैं कि वे दुरूह और क्लिष्ट हो गये हैं। क्षण की अनुभूति एवं मानसिक स्थितियों का व्यक्तिकरण कवि ने  नवीन प्रतीकों के माध्यम से किया है। 

उदासीन मनः स्थिति के लिए शिशिर, मोह भंग की स्थिति के लिए रेत, जीवन - विस्मय की स्थिति के लिए काँच की टंकी में पली सोन मछली, नागरिक मानव की चेतना के लिए साँप, अभिशप्त मानव की चेतना के लिए गिरगिट, नवीन आलोक के लिए बावरा अहेरी, मानव-व्यक्तित्व के लिए नदी का द्वीप, समष्टि के लिए सागर तथा व्यष्टि के लिए मछली के प्रतीकों का प्रयोग कवि की बौद्धिक चेतना का परिणाम है।

अज्ञेय ने सौन्दर्य चित्रण, रूप-योजना और नयी कल्पनाओं के नियोजन में जिन प्रतीकों का उपयोग किया है, वे प्रकृति के क्षेत्र से गृहीत हैं। दमित काम-वासना की अभिव्यक्ति के लिए ये प्रतीक अधिकांशतः प्रयुक्त हुए हैं। निम्न पंक्तियों में 'दो पंखुड़ियाँ' लाल अधरों की प्रतीक हैं

दो पंखुड़ियाँ
भरी लाल गुलाब की तकती पियासी। 
पिया के ऊपर झुके हुए उस फूल को,
और ज्यों ओंठों तले।।

अज्ञेय की छन्दबद्ध रचनाओं में 'इत्यलम्' के लोक धुनों पर आधारित कुछ गीत आते हैं जो कि सफल बन पड़े हैं। श्री प्रभाकर माचवे का उनके छन्द - विधान के सम्बन्ध में मत है। 

उनके मुक्त छन्द पर अंग्रेजी के आधुनिक छन्द के प्रयोगों, विशेषतः ईलियट की प्रलम्बित वाली टेकनीक का और लारेन्स को भावावेशमय गद्यात्मक ध्वनि-चित्रण पद्धति का बहुत सूक्ष्म पर गहरा प्रभाव परन्तु अज्ञेय के मुक्त छन्द में सरसता न आ पाने का कारण उसमें नाद- माधुर्य की जो एक मूलभूत अन्तर्धारा चाहिए, उसका अभाव है।

निष्कर्ष - उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री अज्ञेय हिन्दी साहित्य के एक अप्रतिम कलाकार हैं। वे आधुनिक कविता के सर्वाधिक चर्चित कवि भी हैं। उनकी रचनाएँ उनके संवेदनशील कवि व्यक्तित्व के साथ ही उनके वैचारिक मानस की भी संवाहिका हैं। 

अज्ञेय का चिन्तन पक्ष पर्याप्त समृद्ध एवं मौलिक है, जिससे हिन्दी कविता को नये विचार सूत्र मिलते रहे हैं। अज्ञेय के काव्य का शिल्प आयास-जन्य है। उसमें तराशे हुए शब्दों की जगमगाहट, प्रतीकों और बिम्बों की नवीनता तथा संस्कृत कोश की क्लासिकता द्रष्टव्य हैं।

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