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औरंगजेब की आखिरी रात का उद्देश्य

डॉ.रामकुमार वर्मा हिन्दी एकांकी साहित्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान के अधिकारी हैं। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि डॉ. रामकुमार वर्मा ने ही हिन्दी एकांकी को जन्म दिया। डॉ. वर्मा ने प्रमुखतः सामाजिक और ऐतिहासिक एकांकियों का प्रणयन किया है। 


आपके द्वारा लिखित एतिहासिक एकांकियों में भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास के वैभव की सुन्दर झाँकियाँ प्रस्तुत की गई हैं। इसके साथ ही आपके ऐतिहासिक चरित्र भारतीय मर्यादाओं और आदर्शों का सफल प्रतिनिधित्व करते हैं। 

सामाजिक एकांकियों में वर्मा जी समाज की विभिन्न समस्याओं को लेकर चलते हैं और चरित्र के अन्तर्द्वन्द्व का सफलतापूर्वक चित्रण करते हैं। कवि होने के कारण वर्मा जी की एकांकी रचनाओं में सर्वत्र भावुकता दिखाई देती है।

'औरंगजेब की आखिरी रात' डॉ. रामकुमार वर्मा की बहुचर्चित एकांकी रचना है। इसमें दो ही पात्र प्रधान हैं-प्रथम मुगलिया सल्तनत को हिलाकर रख देने वाला कट्टर धर्मान्ध औरंगजेब और द्वितीय उसकी बड़ी पुत्री जीनत। 

सम्पूर्ण एकांकी पर जब हम विहंगम दृष्टि डालते हैं, तब हम यह देखते हैं कि एकांकीकार का ध्यान प्रमुखतः औरंगजेब के मन में उठने-गिरने वाली भावना तरंगों के उद्घाटन के प्रति केन्द्रित रहा है। एकांकी के प्रारम्भ में एकांकीकार ने उल्लेख किया है कि छत्रपति शिवाजी के पुत्र शम्भा जी की हत्या निर्ममतापूर्वक कर देने के कारण मराठे औरंगजेब के विरुद्ध हो गये थे। 

औरंगजेब की सेना धीरे-धीरे विलासी बनती जा रही थी। औरंगजेब के अन्यायों और अत्याचारों ने भारतवर्ष के अधिकांश भागों में उनके खिलाफ विद्रोह की ज्वाला सुलगा दी थी। इस राजनैतिक परिस्थिति में 18 फरवरी सन् 1707 को अहमदनगर के कि औरंगजेब अपने जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिन रहा था। 

जिस व्यक्ति ने जीवन-पर्यन्त तलवार के बल पर हिन्दुस्तान पर शासन किया, मृत्यु पर उस व्यक्ति के पास उसके बेटे भी नहीं थे। केवल औरंगजेब की पुत्री जीनत औरंगजेब के पास उपस्थित थी। समय

प्रस्तुत एकांकी का सम्पूर्ण कथानक औरंगजेब के जीवन के अन्तिम क्षणों के आधार पर खड़ा किया गया है। यह एक चरित्र-प्रधान एकांकी है। सम्पूर्ण एकांकी में एकांकीकार ने औरंगजेब के ही चरित्र के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन किया है। 

एकांकी के आरम्भ में एकांकीकार ने औरंगजेब के द्वारा यह उल्लेख किया है कि वे जीवन-भर शक्ति का प्रदर्शन करते रहे। इसमें सन्देह नहीं कि औरंगजेब एक बहादुर पुरुष थे। लेकिन बीमारी के उन क्षणों में उनका पुरुषार्थ, उनकी शक्ति भी उनके साथ नहीं थी। औरंगजेब के चरित्र की यह खूबी रही कि वे अन्य बहादुर पुरुषों की प्रशंसा करने में नहीं चूकते थे। 

यही कारण है कि जिस शिवाजी से वे जीवन-भर परेशान रहे, उसी शिवाजी की वे तारीफ करते हैं। इस प्रसंग में एकांकीकार ने यह भी उल्लेख किया है कि औरंगजेब के हृदय में काफिरों के प्रति नफरत की भावना थी। यही कारण है कि जीवन की अन्तिम घड़ियों में भी औरंगजेब यह कामना करता है कि काफिरों को नर्क मिले। ।

यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जीवन के अन्तिम क्षणों में मनुष्य अपने कर्मों का हिसाब करता है। वह यह सोच' के लिए बाध्य होता है कि उसने अपने जीवन में क्या अच्छा किया और क्या बुरा किया। विशेषकर अपने गुनाहों की याद मनुष्य को अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में अधिक आती है। 

औरंगजेब भी जीवन के अन्तिम क्षणों में अपने गुनाहों को याद कर रहा है। औरंगजेब यह स्वीकार करता है कि उन्होंने इस्लाम के उसूलों को गलत समझा। बेगुनाह हिन्दुओं की हत्याएँ करवाई। यह तक कि अपने सगे भाई दारा को संस्कृत पढ़ने के अपराध में मरवा दिया। 

इस प्रकार औरंगजेब यार स्वीकार करता है कि इस्लाम के नाम पर उन्होंने दुनिया को धोखा दिया। औरंगजेब की यह आत्म स्वीकृति उसके चरित्र की एक प्रमुख विशेषता कही जायेगी।

रंगजेब की आँखों के साम उसके जीवन की प्रधान घटनाएँ एक-एक करके उभरती हैं। वर याद करता है कि जिस प्रकार उसने अपने पिता शाहजहाँ को कैद किया था। इसी प्रसंग में औरंगजन ने अपने जीवन की तुलना उस रात्रि से की है जिसकी कोई सुबह नहीं होती- 

"देखती हो, यह अन्धेरा कितना डरावना !! कितना खौफनाक !! दुनियाँ को अपने स्याह परदे में लपेटे हुए हैं, गोया यह हमारी जिन्दगी है। इसमें फिर कभी सुबह नहीं होगी। अगर होगी भी तो वह इसके काले-काले समुद्र में दूर जायेगी।"

इस प्रकार औरंगजेब अपने आपको गुनाहों के अन्धकार में पाता है। उसकी बेहोशी इस बात का प्रमाण है कि गुनाहों का बोझ उसकी चेतना अधिक समय तक सहन नहीं कर पाती। होश में आने के बाद वह पुनः अपने बीते जीवन को याद करता है। जीनत उसे रोकती है, लेकिन औरंगजेब का कथन है- "इस वक्त हमें मत रोको, जीनत ! हमें मत रोको, जीनत, उन्नीसा हमें मत रोको ! हम कहेंगे, जरूर कहेंगे। 

बुझने के पहले शमा की लौ भड़क उठती है। हमारी याददाश्त ताजी हो रही है। एक-एक तस्वीर आँखों के सामने आ रही है। हम हाथी पर बैठकर सैरगाह जा रहे हैं। आगे पीछे हिन्दुओं की भीड़ बेशुमार जमा है। वे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि आलम पनाह, जिजिया माफ कर दीजिये, लेकिन माफ कैसे कर सकते हैं ? 

दक्खन की लड़ाइयों का खर्च कहाँ से आयेगा ? हम कहते हैं ...... तुम काफिर हो । जिजिया नहीं हटेगा। वे लोग हमारे रास्ते पर लेट जाते हैं। हमारा हायी आगे नहीं बढ़ रहा है, हम गुस्से में आकर पीलवान को हुक्म देते हैं। इन कम्बख्तों पर हाथी चला दो। हाथी आगे बढ़ता है और सैकडों चीखें हमारे कानों पर पड़ती हैं। 

हम हँसकर कहते हैं—काफिरों तुम्हारी यही सजा है, जजिया माफ नहीं हो नहीं हो सकता।'' इस वक्तव्य के बाद औरंगजेब अपने पुत्रों को पत्र लिखता है तथा उसका निधन हो जाता है। सकता

एकांकीकार ने सम्पूर्ण एकांकी में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि अन्तिम क्षणों में औरंगजेब अपने गुनाहों, अत्याचारों, अनाचारों आदि को समझ गया था। उसकी यह आत्मा-स्वीकृति उसके चरित्र को उद्दीप्त बनाती है, और पाठकों के मन में उसके प्रति करुणा का जन्म होता है। 

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