ads

नाटक, निबन्ध से व्याख्यात्मक प्रश्न BA 2nd year hindi sahitya

(1) कोकिल वायस एक सम पंडित मूरख एक।
रहिए तो दुःख पाइए प्रान दीजिए रोय।।
बसिए ऐसे देश नहिं कनक दृष्टि जो होय।
इन्द्रायन दाडिम विषय, जहाँ न नेकु विवेक।। 

संदर्भ - प्रस्तुत दोहा भारतेन्दु द्वारा विरचित 'अंधेर नगरी' शीर्षक प्रहसन से उद्धृत है। 

प्रसंग - इन पंक्तियों में महन्त जी द्वारा गोवर्धन दास को यह समझाने का प्रयास किया गया है कि जिस राज्य में भले-बुरे दोनों एकसमान समझे जाते हों, उसमें रहना अपने प्राणों को संकट में ने डालना ही कहा जाएगा।

व्याख्या - गोवर्धन दास को ऐसे नगर में न रहने का परामर्श देते हुए - जिसमें भाजी और मिठाई दोनों वस्तुएँ टके सेर के एक ही भाव से बेची जाती हों - महन्त जी समझाते हैं कि, जिस देश या नगर में कोयल और कौआ को तथा मूरों और पंडितों को एक जैसा समझा जाता हो।

जहाँ पर इन्द्रायन के कड़वे फल और अनारों में कोई अन्तर न समझा जाता हो, अर्थात् जहाँ विद्वान और मूर्ख, गुणी और अवगुणी सबको एक ही लाठी से हाँका जाता हो ।

उस देश में चाहे स्वर्ण की वर्षा क्यों न होती हो, तो भी उसमें रहना उचित नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति ऐसे देश में रहने की मूर्खता करता है, तो उसके हाथ रो-रोकर मरने के अतिरिक्त और कुछ नहीं लगता।

विशेष - 1. महन्त जी का यह कथन आगे चलकर सर्वथा सत्य सिद्ध होता है। 

2. महन्त जी की इस चेतावनी द्वारा नाटककार ने भावी संकट का पूर्वाभास देने का कौशल दिखाया है।

3. दोनों ही दोहे वर्ण्य-वस्तु के सर्वथा अनुकूल 

4. सरस ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है। हैं।

5. अनुप्रास अलंकार है।

(2) बादाम, पिस्ते, अखरोट, अनार, बिहीदाना, मुनक्का, किशमिश, अंजीर, आबजोश, आलू बुखारा, चिलगोसा, सेब, नाशपाती, बिही, सरदा, अंगूर का पिटारी । आमरा ऐसा मुल्क जिसमें अंगरेज का भी दाँत खट्टा हो गया। नाहक को रुपया खराब किया बेवकूफ बना। हिन्दोस्तान का आदमी लकलक हमारे यहाँ का आदमी बुबुक बुबुक। 

संदर्भ - प्रस्तुत अवतरण भारतेन्दु हरिशचन्द्र द्वारा रचित “अंधेर नगरी' नामक नाटक से अवतरित है।

प्रसंग - प्रस्तुत अवतरण में नाटककार ने मेवा बेचने वाले पठान के माध्यम से हिन्दुस्तान के आदमी की कमजोरी की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

व्याख्या - पठान (मुगल) अनेक प्रकार के मेवे जैसे बादाम, पिश्ते, अखरोट, अनार, दाना, मुनक्का, किशमिश, अंजीर, आबजोश, चिलगोजा (चीड़ या सनोबर का फल), आलू सेब, नाशपाती, बिही, सरदा, अंगूर आदि मेवे बेचता है।

पठान कहता है कि हमारे देश में अंग्रजों को युद्ध में हार खानी पड़ी। उसके दाँत खट्टे कर दिये अंग्रेजों को परास्त कर दिया। युद्ध के भयंकर विनाश के बाद भी उसे कुछ प्राप्त न हो सका और अवकूफ कहलाया। 

अंग्रेज तो हिन्दुस्तान में ही सफल हो पाया है क्योंकि यहाँ का आदमी दुबला-पतला है अर्थात् उसमें संगठन-शक्ति, एकता की कमी है और हमारे यहाँ का आदमी बहादुर और पहलवान है। 

यहाँ तो अन्धेरगर्दी है कि सभी मेवों का भी भाव टके सेर है। अर्थात् जनता की वस्तुओं को सस्ती कीमत पर खरीद कर शोषण किया जा रहा है और उसे शक्तिहीन बनाया जा रहा है 

विशेष - 1. आपसी फूट एवं कमजोरी का अंग्रेजों की सफलता के कारण के रूप में निरूपण है। 2. भाषा सामान्य होते हुये भी प्रवाहमयी एवं प्रभावी है।

(3) ले सेव इमारती लड्डू, गुलाब - जामुन, खुरमा, बुंदिया, बरफी, समोसा, पेड़ा, कचौड़ी, दालमोट, पकौड़ी, घेवर, गुपचुप । हलुआ ले हलुआ, मोहन भोग ! मोयनदार कचौड़ी, कचाका हलुआ, नरम चभाका । घी में गरक, चीनी में तरातर, चासनी में चभाचभ ले भूर का लड्डू।

संदर्भ - प्रस्तुत अवतरण भारतेन्दु हरिशचन्द्र द्वारा रचित “अंधेर नगरी” नामक नाटक से उद्धृत है। 

प्रसंग - प्रस्तुत अवतरण में हलवाई के द्वारा विभिन्न प्रकार के मिठाई बेचने का वर्णन है।

व्याख्या - प्रस्तुत गद्यांश में मिठाई वाला (हलवाई) विभिन्न प्रकार के मिठाइयों को आवाज लगाकार मिठाइयों की अतिश्योक्ति करते हुए बेचता है। 

वह कहता है कि सेव, इमरती, लड्डू, गुलाब जामुन, खुरमा, बुंदिया, बरफी, समोसा, पेड़ा, कचौड़ी, दालमोठ, घेवर, गुपचुप ले लो। चीनी के चाशनी में डूबे और घी में गरम किये मूरे का लड्डू ले लो। 

वह मिठाइयों की अतिश्योक्ति में कहता है कि जो व्यक्ति एक बार खा ले, वह फिर खाने के लिए पछताता है और जो न खाए वह भी पछताता है

विशेष - 1. प्रस्तुत अवतरण में लेखक के उत्कृष्ट भाषाशैली का दर्शन है। 2. मिठाई वाले (हलवाई) के माध्यम से अंधेर नगरी के उलट-पुलट व्यवस्था व व्यापारिक गुणों का वर्णन है।

(4) गुरुजी, ऐसा तो संसार भर में कोई देश नहीं है। दो पैसा पास रहने से ही मजे से पेट भरता है। मैं तो इस नगर को छोड़कर नहीं जाऊँगा, और जगह दिन भर माँगो तो पेट नहीं भरता। बरंच बाजे-बाजे दिन उपवास करना पड़ता है। सो मैं तो यहीं रहूँगा। 

सन्दर्भ- प्रस्तुत अवतरण भारतेन्दु हरिशचन्द्र द्वारा रचित “अंधेर नगरी” नामक नाटक से उद्धृत है। 

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में नगरी का नाम 'अन्धेर नगरी' और राज्य का नाम चौपट तथा यहाँ खाजा तथा भाजी टका सेर बिकने की बात जानकर महन्त अपने शिष्य गोवर्धनदास से वहाँ न रहने का आदेश देते हैं। गोवर्धनदास अपने गुरु की बात का विरोध करते हुए कहता है।

व्याख्या - हे   गुरुजी ! जैसा यह नगर है, इस प्रकार का सुविधापूर्ण कोई भी देश दुनिया भर में नहीं है। यहाँ दो पैसे पास हों तो आसानी से पेट भरा जा सकता है। यहाँ दो पैसे में एक सेर मिठाई मिलती है, जिसे खाकर उदरपूर्ति हो सकती है। 

मैं तो इस सुविधापूर्ण नगर को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। दूसरे स्थान यहाँ से बुरे हैं। वहाँ दिनभर भीख माँगी जाये तो भी इतना नहीं मिलता, जिससे पेट भर सके। इतना ही नहीं, स्थिति इससे भी खराब हो जाती है। किसी-किसी दिन तो भूखा रहना पड़ता है। इसी कारण मैं तो इसी अन्धेर नगरी में ही रहूँगा। ।

विशेष—(1) यह गद्यांश गोवर्धनदास को नकली साधु और पेटू सिद्ध करता है। (2) गुरु की आज्ञा का विरोध करने वाला गोवर्धनदास किसी प्रकार साधु अथवा शिष्ट नहीं है। (3) भाषा सरल एवं साधुजनोचित है।

(5) प्रकृति के रम्य रूपों में तल्लीनता की जो अनुभूति होती है उसका उपयोग क-विगण कभी-कभी रहस्यमयी भावनाओं के संचार में भी करते हैं। यह अखण्ड भूमण्डल तथा असंख्य ग्रह-उपग्रह, रवि-शशि अथवा जल, वायु, अग्नि, आकाश कितने रहस्यमय तथा अज्ञेय हैं। इनके सृष्टि संचालन आदि के सम्बन्ध में दार्शनिकों अथवा वैज्ञानिकों ने जिन तत्वों का निरूपण किया है वे ज्ञानगम्य अथवा बुद्धिगम्य होने के कारण नीरस तथा शुष्क है।

संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'बसन्त आ गया' नामक निबन्ध से उद्धृत है। इन पंक्तियों में श्री द्विवेदी जी ने बसन्त की अल्प अवधि पर प्रकाश डाला है। 

प्रसंग - निबंधकार ने इन पंक्तियों में प्रकृति के रम्य रूपों की तल्लीनता की अनुभूति का वर्णन  किया है।

व्याख्या -प्रकृति में सौन्दर्य उच्च कोटि का होता है। उसके सौन्दर्य से मानव को जो आनंदानुभूति होती है, वह अन्यत्र नहीं होती। अखण्ड भूमण्डल तथा असंख्य ग्रह, उपग्रह, सूर्य, चन्द्रमा, जल, वायु, अग्नि, आकाश आदि सभी प्रकृति के रहस्यमय रूप हैं। 

प्रकृति के सभी रहस्यमय रूप किस शक्ति से संचालित होते हैं। इस सम्बन्ध में अनेक दार्शनिकों एवं वैज्ञानिकों ने जिन तत्वों की खोज की है, वे ज्ञान एवं विज्ञान से सम्बन्धित होने के कारण काफी नीरस एवं शुष्क हो गये हैं।

विशेष-(1) यहाँ पर कवि व वैज्ञानिक दृष्टिकोण में अन्तर स्पष्ट किया गया है। (2) सत्यता है कि प्रकृति में कवियों के लिए सदैव से रहस्य की वस्तु है।

(6) मुझे कचनार फूल की ललाई बहुत भाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन फूलों की पकौड़ियाँ भी बन सकती हैं। पर दुर्भाग्य देखिए कि इतना स्वस्थ पेड़ ऐसा सूना पड़ा हुआ है और वह कमजोर दुबला लहक उठा है। कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।

संदर्भ - प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'बसन्त आ गया' नामक निबन्ध से उद्धृत है। इन पंक्तियों में श्री द्विवेदी जी ने बसन्त की अल्प अवधि पर प्रकाश डाला है। 

प्रसंग-पूरे निबंध में हजारी प्रसाद जी ने बसंत आगमन पर होने वाले परिवर्तन को बताया है। यहाँ वे शिरीष की प्रशंसा कर रहे हैं।

व्याख्या-लेखक कह रहा है कि मुझे कचनार फूल की ललाई (लालिमा) अत्यधिक प्रिय है। इन फूलों की विशेषता यह है कि इनकी पकौड़ियाँ भी बन जाती हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि बसंत आ चुका है और यह पेड़ सूना अर्थात् बिना फूल-पत्ती के खड़ा हुआ है 

जबकि दूसरी ओर एक कमजोर पेड़ लहक उठा है। यहाँ लेखक बता रहा है कि कमजोर लोगों में भावुकता अधिक होती है। विशेष-उक्त निबंध 'अशोक के फूल' नामक निबंध से लिया गया है।

(7) अंधेर नगरी अनबूझ राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा।नीच-ऊँच सब एकहि ऐसे, जैसे भडुए पंडित तैसे।। 
कुल मरजाद न मान बड़ाई, सबै एक से लोग लुगाई। 
जात-पात पूछ नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई।।

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा' नामक एकांकी में से लिया गया है। इसके लेखक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं।

प्रसंग—प्रस्तुत उद्धरण के माध्यम से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अन्धेर नगरी में व्याप्त अराजकता व अन्याय के वर्णन द्वारा तत्कालीन समाज की अव्यवस्था पर भी प्रकाश डाल रहे हैं।

व्याख्या—प्रस्तुत उद्धरण में शिष्य गोवर्धनदास अन्धेर नगरी राज्य का वर्णन करते हुए कहता है कि इस नगरी का राजा नासमझ है। यहाँ की बाजार व्यवस्था भी अजीब है। प्रत्येक एक ही मोल की है। वस्तुएँ अपने प्रकार, गुणवत्ता, आकार आदि भेदों के बावजूद एक मूल्य में बिक रही हैं। 

भाजी (सब्जियाँ) हो या मिठाई दोनों एक टके में विक्रय की जा रही है। इस राज्य में निम्न व उच्च का भेद समाप्त हो चुका है। बिचौलिए व पंडित के कर्म का कर्मफल का अन्तर समाप्त हो चुका है।

इस अन्धेर नगरी में कुल व मर्यादा का किसी को ध्यान नहीं है। स्त्री व पुरुष भेद मिट चुका है। । जाति-धर्म का अन्तर समाप्त हो चुका है। आगे नाटककार व्यंग्यात्मक शैली में कहते हैं कि जैसे ईश्वर भक्ति में सभी भेद समाप्त हो जाते हैं, सब उसकी शरण में समान हो जाते हैं वैसी ही समानता अन्धेर नगरी में भी है।

विशेष- (1) नाटक में पद्य का प्रयोग।
(2) व्यंग्यात्मक शैली।
(3) खड़ी बोली के साथ ब्रजभाषा का समन्वय।
(4) अन्धेर नगरी के माध्यम से अंग्रेजी सरकार की व्यवस्था पर कुठाराघात है। 

(8) जात ले जात, टके सेर जात । एक टका दो हम अभी अपनी जात बेचते हैं। टके के वास्ते ब्राह्मण से धोबी हो जाएँ और धोबी को ब्राह्मण कर दें, टके के वास्ते जैसी कहो वैसी व्यवस्था दें। टके के वास्ते ब्राह्मण को मुसलमान, टके के वास्ते हिन्दू से क्रिस्तान ।

टके के वास्ते धर्म और प्रतिष्ठा दोनों बेचे, टके के वास्ते झूठी गवाही दे। टके के वास्ते पाप को पुण्य माने, टके के वास्ते बीच को भी पितामह बनावें । वेद, धर्म, कुल, मरजादा, सच्चाई, बड़ाई सब टके सेर। लुटाय दिया अनमोल माल ले टके सेर।

सन्दर्भ - प्रस्तुत अवतरण ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा' नामक एकांकी में से लिया गया है। इसके लेखक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं।

प्रसग-यहाँ पर एकांकीकार ने बाजार का चित्र खींचा है। बाजार में सभी प्रकार के व्यापारी अपना-अपना माल बेचने के लिए प्रस्तुत है, वहीं पर एक ब्राह्मण अपनी जाति बचने के लिए उत्सुक नजर आ रहा है।

व्याख्या - एक ब्राह्मण, जो कि जात वाला है, बाजार में खड़ा हुआ जाति बेच रहा है। जाति किस भाँति सस्ती हो गई है कि उसका मूल्य केवल टके सर है। टक सेर जाति ले । एक टका दीजिए, हम अपनी जाति बेचते हैं। मात्र एक टक के लिए ब्राह्मण से धाबी हो जाएँ और धोबी को ब्राह्मण कर दें। 

केवल एक टके के लिए जिस प्रकार की व्यवस्था चाहे, वैसी हा सकती है। टके के लिए असत्य का सत्य में परिवर्तित कर सकते हैं। ब्राह्मण में मुसलमान और हिन्दू से ईसाई टके के लिए बन सकते हैं। धन के लिए हम अपना धर्म और अपनी मर्यादा दानों बेच सकते हैं तथा झूठी गवाही दे सकते हैं। 

धन के लिए पाप को पुण्य मान सकते हैं। टके के लिए नीच व्यक्ति को भी उच्च पद दे सकते हैं। वद, धर्म, कुल, मर्यादा, सच्चाई, बड़ाई सब एक टके में मिलता है। सभी अनमोल वस्तुएँ यहाँ एक टके में मिलती है।

विशेष—(1) उपर्युक्त कथन एक ब्राह्मण का है, जिस पर समाज को ही मार्ग दिखान की जिम्मेदारी होती है। जो पाप-पुण्य का भेद निरूपित करता है। जिसकी दी हुई व्यवस्था पर समाज आँख मींचकर चलता है, जिसे गुरु और समाज का श्रेष्ठ व्यक्ति समझा जाता है। 

उसी व्यक्ति का चरित्र जब टके सेर बिकता हो, बोली लगाकर बिकता हो, सर बाजार बिकता हो तो अन्य व्यक्तियों का चरित्र कैसा होगा, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

(2) नाटककार ब्राह्मण नामक पात्र की कल्पना करके अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है इस तरह का पात्र एकांकी में प्रस्तुत करना एकदम मौलिकता एवं नवीनता है।

(3) इस स्थल पर जात बेचने की बात कहकर पैसे के लिए कुलीन लोगों द्वारा सारी धर्म मर्यादा को तिलांजलि दे देने की प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार किया गया है।

(4) प्रस्तुत अवतरण में हास्य-व्यंग्यात्मक शैली में धनलोलुप ब्राह्मणों पर और सारी मर्यादा और समाज-व्यवस्था के कर्णधारों पर बहुत ही चुभता हुआ व्यंग्य प्रस्तुत किया है। 

(9) चूरन अमले सब जो खाने, दूनी रिश्वत तुरत पचावें। चूरन सभी महाजन खाते, जिससे जमा हजम कर जाते। चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिन्द हजम कर जाता। चूरन पुलिस वाले खाते, सब कानून हजम कर जाते।

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित 'अन्धेर नगरी' शीर्षक प्रहसन से उद्धृत किया गया है। इसमें भारतेन्दु जी ने चूर्ण विक्रता के माध्यम से व्यंग्यात्मक शैली में यह प्रदर्शित करने की चेष्टा की है कि किस प्रकार कचहरी के कर्मचारी, अंग्रेज अफसर और पुलिस वाले भारतीय जनता के धन को डकारते रहते हैं।

व्याख्या-चूर्ण विक्रेता अपने चूर्ण को अमलबेत नामक खट्टे फल के मिश्रण से बना हुआ बताते हुए कहता है कि पाँच नमकों के मिश्रण से तैयार किया गया मेरा चूर्ण इतना अधिक पाचक है कि इसको खाने वाले कचहरी के कारिन्द दुगुनी रिश्वत को सहज ही पचा जाते हैं-रिश्वत खाकर डकार भी नहीं लेते। 

जब कोई नाटककार मेरे इस चूर्ण को खा लेता है तो वह रिश्वत लेने वाल कारिन्दे की नकल का अभिनय करने लगता है। महाजनों और लाला या सेठों पर अपने अतीव पाचक चूर्ण का प्रभाव दिखाते हुए वह चूर्ण वाला कहता है कि मेरे चूर्ण का सेवन करने वाले महाजन उस सम्पूर्ण धनराशि को हजम कर जाते हैं, ।

जो उनके पास जमा कराई जाती है मेरे चूर्ण को व लाला लोग भी खाया करते हैं जिन्हें अक्ल की अपच की बीमारी होती है अर्थात् मेरा चूर्ण खाकर उनकी मोटी बुद्धि तेज हो जाती है।

अपने चूर्ण का सेवन वालों में बड़े-बड़े लोगों का उल्लेख करते हुए वह पाचक वाला नाटककार ने उसके लिए इसी शब्द का प्रयोग किया है। आगे कहता है कि मेरे चूर्ण को वे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक महाशय भी खाया करते हैं, 

जिनके पेट में कोई भी बात नहीं पचती अर्यात् जो सुनी हुई झूठी-सच्ची बातों को अपने पत्रों में तुरन्त छाप देते हैं वे अंग्रेज अफसर भी मरा ही चूर्ण खाते हैं, जो धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत को हजम करते जा रह हैं—जो पूरे भारत में अपनी हुकूमत फैलाते जा रहे हैं ।

इसी प्रकार वे पुलिस वाले भी मेरा ही चूर्ण खाया करते हैं, जो रिश्वत लेकर सारे कायदे-कानूनों को हजम करते हुए अपराधियों का बाल भी बांका नहीं होने देते।

विशेष—1) जिन कुछ आलोचकों ने ‘अन्धेर नगरी' को एक हल्का-फुल्का और निरर्थक-सा प्रहसन समझा है, उन्हें इस प्रहसन की निम्नांकित पंक्तियों पर विशेषतः दृष्टिपात करना चाहिए, जिनमें भारतेन्दु ने तत्कालीन समाज के धूर्त, स्वार्थी, रिश्वतखोर तथा अपने आंग्ल-साम्राज्य का विस्तार करके लोलुप अंग्रेजों का उल्लेख किया है।

चूरन अमले सब जो खावै, दूनी रिश्वत तुरत पचावैं। 
चूरन सभी महाजन खाते, जिससे जमा हजम कर जाते। 
चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिन्द हजम कर जाता। 
चूरन पुलिस वाले खाते, सब कानून हजम कर जाते। 

(2) उपर्युक्त पात्रों का चयन किसी उत्कृष्ट नाटककार की उत्तम नाट्यकला का प्रमाण होता है।प्रस्तुत प्रहसन में भारतेन्दु द्वारा ‘पाचक-वाला' पात्र की कल्पना उनके उत्कृष्ट नाटककार होने का प्रमाण है।

(3) ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है

(4) उल्लेख और अनुप्रास अलंकार है। 

(10) वेश्या जोरू एक समाना। बकरी गऊ एक करि जाना।।
 साँचे मारे-मारे डोले। छली दुष्ट सिर चढ़ि-चढि बोले।। 
प्रगट सकय अन्तर छलधारी। सोई राज सभा बलभारी।। 
साँच कहे ते पनही खावै। झूठे बहुविध पदवी पावै ।।

संदर्भ - यह अवतरण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित 'अन्धेर नगरी' नाटक से लिया गया है। 

प्रसंग-प्रस्तुत संवाद गोवर्धनदास का है वह कहता है-यहाँ का राजा अविवेकी है अपराध कोई करता है, दण्ड किसी को मिलता है सत्य बात कहने पर यहाँ दण्ड भोगना पड़ता है। सन्दर्भ

व्याख्या-चौपट राजा के राज में व्याप्त विसंगतियों पर गोवर्धनदास कहता है-इस राज्य में वेश्या तथा कुलवधू एक समान मानी जा रही है बकरी और गाय एक समान माने जाते हैं कुशासन के कारण सत्य बोलने वाला दण्डित होता है, झूठा ऊँचे आसन पर बैठता है 

यहाँ छली लोगों की एकता के सामने किसी की नहीं चलती है। सत्य वचन कहने वाला मार खाता है झूठा व्यक्ति अच्छा पद पाता -

विशेष-1 खड़ी बोली और ब्रजभाषा का समन्वित प्रयोग किया गया है।

2 अन्धेर नगरी की अन्यायपूर्ण शासन व्यवस्था का वर्णन किया गया है

(11) सेत-सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास ।
 ऐसे देस कुदेस में, कबहुँ न कीजै बास ।। 
कोकिल वायस एक सम, पडित मूरख एक।  
इन्द्रायन दाडिम विषय जहाँ न नेकु बिबेक।। 
बसिए ऐसे देस नहि, कनक-वृष्टि जो होय। 
रहिए तो दुख पाइए, प्रान दीजिए रोय।। 

सन्दर्भ- यह अवतरण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित 'अन्धेर नगरी' नाटक से लिया गया है। 

प्रसग-प्रस्तुत कयन 'महन्त' का है जो नारायणदास और गोवर्धनदास का गुरु है। वह अपने शिष्यों को अन्धेर नगरी में ठहरने को मना करता हुआ वहाँ की बुराइयों का वर्णन करता हुआ कहता है

व्याख्या-महन्त का कथन है कि यह देश सुदेश नहीं, कुदेश है। ऐसे नगर में यदि स्वर्ण की वर्षा भी होती हो तो भी यहाँ नहीं ठहरना चाहिए। जहाँ धर्म-अधर्म का किसी को ज्ञान नहीं, जहाँ मूर्ख और पण्डित में कोई भेद नहीं जानता। 

सफेद होने से जहाँ कपूर और कपास दोनों समान समझे जाते हों। कौवे और कोयल में जहाँ अन्तर समझने वाला कोई न हो । जहाँ इन्द्रायन और अनार का एक भाव हो । वहाँ बसकर अपने प्राणों को जोखिम में डालना उचित नहीं । 

लोभ के वश में होकर ऐसे नगर में ठहकर कष्ट उठाना ज्ञानवान का धर्म नहीं है। जो किसी लोभ से वशीभूत होकर ऐसे नगर में रहने की हठ करेगा, उसे निश्चय ही प्राण हानि उठानी पड़ेगी।

विशेष—(1) शैली उपदेशात्मक है। (2) इस सूक्ति में भले और बुरे की पहचान न कर पाना बुद्धिहीन का परिचायक है।

(12)हिन्दू चूरन इसका नाम ।
विलायतन पूरन इसका काम।। 
चूरन जब से हिन्द में आया। 
इसका धन-बल सभी घटाया।। 
चूरन ऐसा हट्टा-कट्टा । 
कीना दात सभी का खट्टा ।। 
चूरन चला दाल की मण्डी। 
इसको खायेगी सब रण्डी।।

सन्दर्भ- यह अवतरण भारतेंदु हरिश्चन्द्र रचित 'अंधेर नगरी' नाटक से लिया गया है। -

प्रसंग -भारतेन्दु जी ने चूर्ण विकेता के माध्यम से व्यंग्यात्मक शैली में यह प्रदर्शित करने की चेष्टा की है कि किस प्रकार देश के बड़े पद पर आसीन लोग जनता के धन को डकारते हैं। 

व्याख्या - चूर्ण विक्रेता अपने चूर्ण का नाम हिन्दू चूर्ण रखा है। यह चूर्ण विलायत से आया है। जब से यह चूर्ण हिन्दुस्तान में आया है। इस चूर्ण का सबको आदत सी लग गई है। यह चूर्ण रूपी रिश्वत इतना तगड़ा व बलवान है कि लोगों को इसका आदत बना दिया है ।

जहाँ देखोगे वहाँ रिश्वत के बिना कोई काम नहीं होता है। छोटे से छोटे जगह दाल मिल जैसे जगहों पर भी इस चूर्ण के बिना काम नहीं होता। 

विशेष—हरिशचन्द्र जी ने इन प्रहसन की पंक्तियों के माध्यम से रिश्वतखोरों पर जबर्दस्त कटाक्ष किया है।

(13) राम भजो राम भजो राम भजो भाई
राम के भजे से गनिका तर गई ।
राम के भजे से गीध गति पाई। 
राम के नाम से काम बने सब, 
राम के भजन बिनु सबहिं नसाई।।

सन्दर्भ - प्रस्तुत पद आधुनिक काल के जनक स्वर्गीय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित 'अन्धेर नगरी' शीर्षक प्रहसन अथवा एकांकी नाटक से उद्धृत किया गया है। इसी भजन के साथ प्रस्तुत नाटक का श्रीगणेश होता है, जिसे महन्त जी और उनके दो शिष्य नारायणदास तथा गोवर्धन दास गाते हुए रंगमंच पर पदार्पण करते हैं।

प्रसंग—इस पद में राम के नाम के स्मरण की महिमा का बखान किया गया है।

व्याख्या-महन्त जी और उनके दोनों शिष्यों द्वारा राम का नाम भजने पर जोर देते हुए यह भाव व्यक्त किया गया है कि ऐसा करने वाली वेश्या का उद्धार हो गया था जो अपने तोते को राम का नाम पढ़ाया करती थी। 

इसी प्रकार राम के भक्त जटायु को भी सद्गति प्राप्त हुई थी। जो लोग राम के नाम ।का जाप करते हैं उनके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं, जाकि एसा न करने वालो के सभी कार्य हा जात अथवा बिगह जाते हैं। 

उदाहरण के लिए सूरदास यद्यपि नेत्रहीन ये तो भी राम और कृष्ण के नाम का जाप करते अर्थात् उनकी प्रशंसा में पद-रचना के कारण उन्हें कवियों के राजा का पद मिल गया था और जंगली घास की तरह महत्वहीन कवि तुलसी महाकवि तुलसीदास बन गए थे।

विशेष - नाटककार ने इस भजन में ब्रजभाषा का प्रयाग किया है। दृष्टान्त और अनुप्रास अलकार है। प्रस्तुत गीत में पर्याप्त गतिमयता और सरसता विद्यमान है। 

(14)“साँच कहै तो पनही खावै। झूठे बहुविधि पद्वी पावै ।। 
छलियन के एका के आगे। लाख कहौ एकहु नहि लागे।। 
भीतर होई मलिन की कारी। चाहिए बाहर रग चटकारी ।। 
धर्म-अधर्म एक दरसाई। राजा करे सौ न्याय सदाई।। 
भीतर स्याहा बाहर सादे। राज करहि अमल अरु प्यादे।।" 

सन्दर्भ - प्रसंग — यह प्रसंग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित 'अन्धेर नगरी' नाटक के पाँचवे अंक से लिया गया है। यह संवाद गोवर्धनदास का है। वह कहता है यहाँ का राजा अविवेकी है—

अपराध कोई करता है, दण्ड किसी और को मिलता है। इस नगरी में जो सत्य बोलेगा उसे और भी अत्याचार सहन करना पड़ेगा।

व्याख्या-चौपट राजा के राज में साधु और महात्माओं की दुर्दशा व्यक्त करते हुए गोवर्धन दास कहता है कि अन्धेर नगरी के राजा का न्याय अविवेकपूर्ण है। राजा आम आदमी की फरियाद पर कोई ध्यान नहीं देता। सत्य बोलना तो जैसे यहाँ सबसे बड़ा अपराध है। 

इस नगरी में उन्हीं लोगों का बोलबाला है, जो फरेबी हैं, दुष्ट हैं। सीधे-सच्चे लोगों की कोई सुनवाई नहीं है। ये अफसर कपटी और स्वार्थी हैं, जो बाहर से सफेद वस्त्र धारण किये हैं, किन्तु इनका मन बहुत काला ऐसे ही लोगों द्वारा शासन किया जा रहा है। 

यहाँ इनकी ही ताकत बहुत है। इन प्रपन्थियों में इतनी एकता है कि जितना है भी सबको बाँधे रखने का प्रयास किया जाये, ये उसे टिकने नहीं देते। ये बाहर चाहे जितने भी आकर्षक क्यों न हों, भीतर से इनका मन काला ही काला है। 

राजा चाहे भला करे या बुरा, वही न्याय कहलाता है। राजा के जो मुँह लगे हैं—वही सब काम करते हैं, जो अन्दर से कपटी और स्वार्थी हैं। 

विशेष- -(1) प्यादे प्रतीक है अंग्रेज अफसरों का। (2) अन्धेर नगरी की अन्यायपूर्ण शासन-व्यवस्था का वर्णन किया गया है। (3) भाषा भावानुकूल है। (4) खड़ी बोली और ब्रजभाषा का समन्वित प्रयोग किया गया है।

(15) “गुरुजी ने हमको नाहक यहाँ रहने को मना किया था। माना कि देश बहुत बुरा है, पर अपना क्या ? अपने किसी राजकाज में योड़े हैं कि कुछ डर है रोज मिठाई चाभना, मजे में आनन्द से राम भजन करना।"

सन्दर्भ -यह प्रसंग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित 'अन्धेर नगरी' नाटक के पाँचवे अंक से लिया गया है। यह संवाद गोवर्धनदास का है। वह कहता है यहाँ का राजा अविवेकी है—

प्रसंग-गोवर्धनदास के गुरुजी महन्त ने उसे अंधेर नगरी में रुकने से मना किया था, किन्तु वह वहाँ रुकता है। वहाँ की सुख-सुविधाओं को देखकर सोचने लगता है कि गुरुजी ने व्यर्थ ही उसे वहाँ रहने से मना किया था, क्योंकि वहाँ तो सभी सुख-सुविधाएँ हैं।

व्याख्या-गोवर्धनदास अंधेर नगरी के आरामदायक जीवन को देखकर कहता है कि गुरुजी ने व्यर्थ ही मुझे यहाँ रहने से मना किया था। वह कहता है कि भले ही अंधेर नगरी देश बहुत बुरा है, पर इससे मुझे क्या लेना-देना । 

मुझे यहाँ के राजकाज में तो पड़ना ही नहीं है। इसलिए डरने की कोई बात ही नहीं है। मुझे तो रोज भरपेट मिठाई खाना है और मस्त होकर राम के भजन में तल्लीन रहना है।

विशेष—इस अवतरण में लेखक ने गोवर्धनदास की सुविधाभोगी प्रवृत्ति को रेखांकित किया है।

(16) एक तो नगर भर में राजा के न्याय के डर से कोई मुटाता ही नहीं, दूसरे और किसी को पकड़े तो वह न जाने क्या बात बनावे कि हमी लोगों के सिर कहीं न पहराय और फिर इस राज मे साधु-महात्मा इन्ही लोगों की तो दुर्दशा है, इससे तुम्ही को फाँसी देंगे।" 

सन्दर्भ-प्रसंग–यह अवतरण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित 'अन्धेर नगरी' नाटक के पाँच अंक से लिया गया है। इसमें उस प्रसंग का वर्णन है. जब महाराज की आज्ञा से बकरी मारने के अपराध में सजा देने के उद्देश्य से मात्र मोटे होने के कारण गोवर्धनदास को फाँसी का हुक्म दिया जाता है तब प्यादा कहता है।

व्याख्या-अन्धेर नगरी की अराजकता, अव्यवस्था, विवेकहीनता और अन्याय को व्यक्त करते हुए राजा का चाटुकार कहता है— राजा का जैसे विवेकहीन न्याय है, उसे देखकर हर व्यक्ति असन्तुष्ट, परेशान और दुःखी है। 

चूंकि राजा ने आदेश दिया है कि किसी मोटे व्यक्ति को फाँसी पर चढ़ाया जाये। अगर किसी को पकड़ लिया जाता है तो पता नहीं उनके मस्तिष्क में और कैसे विचार आएँ ?

कहीं ऐसा न हो कि मुसीबत हमारे गले पड़ जाये, इसलिए जैसा उनका आदेश था, हम उसी का पालन करेंगे। इस अन्धेर नगरी में जो दुष्ट हैं, दुराचारी हैं वो तो अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं ।

परन्तु जो सज्जन हैं, महान पुरुष हैं, उनकी दशा बहुत बुरी है। इसलिए गोवर्धनदास को ही फाँसी दी जायेगी अर्थात् जो सज्जन है उन्हें ही कष्ट दिया जायेगा।

विशेष-(1) भाषा--- -पूर्णतः छात्र के स्तर पर परिवेश को दृष्टि में रखकर भाषा का स्वाभाविक प्रवाह दिया गया है।

(2) मुटाता, घहराय जैसे देशज शब्दों का प्रयोग किया गया है।

(17) “दुहाई परमेश्वर की, अरे मैं नाहक मारा जाता हूँ। अरे यह बड़ा ही अन्धेर है, अरे गुरुजी महाराज का कहा मैंने न माना, उसका फल भोगना पड़ा। गुरुजी कहाँ हो! आओ मेरे प्राण बचाओ, अरे मैं बेअपराध मारा जाता हूँ। गुरुजी, गुरुजी।" 

सन्दर्भ-   यह अवतरण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित 'अन्धेर नगरी' नाटक के पाँच अंक से लिया गया है। इसमें उस प्रसंग का वर्णन है. जब महाराज की आज्ञा से बकरी मारने के अपराध में सजा देने के उद्देश्य से मात्र मोटे होने के कारण गोवर्धनदास को फाँसी का हुक्म दिया जाता है तब प्यादा कहता है।

प्रसंग -जब गोवर्धनदास को फाँसी दी जाने लगी, तब वह कहता है

व्याख्या–परमेश्वर की दुहाई है। मैं तो बिना अपराध के ही मारा जा रहा हूँ। इस नगरी में बड़ा अन्याय और अन्धेर है। 

वह कहता है कि उसने अपने गुरुजी का कहना नहीं माना, उसी का फल उसे भुगतना पड़ रहा है। अरे गुरुजी आप कहाँ हो ? आप आकर मेरे प्राणों की रक्षा करो। मैं तो निरपराध मारा जा रहा हूँ। गुरुजी, गुरुजी आओ और मेरे प्राण बचाओ। 

विशेष—(1) गुरुजी की आज्ञा के पालन का महत्व बताया गया है।

(2) सकट काल में गुरु ही रक्षा करते हैं।

(18) जहाँ न धर्म न बुद्धि, नहि नीति न सुजान समाज।
वे ऐसहि आपुहि नसें, जैसे चौपट राज ।।

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक गद्यरंग के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित प्रहसन 'अन्धेर नगरी' से उद्धृत है।

प्रसंग- यहाँ पर महंतजी भरत वाक्य की तरह अपना निष्कर्ष और भविष्य के लिए चेतावनी प्रस्तुत करते हैं।

व्याख्या-जहाँ धर्म की अवहेलना की जाती है, लोग बुद्धि से काम नहीं लेते, विवेकपूर्वक नहीं चलते, नीति का पालन नहीं करते और जहाँ सज्जन समाज नहीं है, ऐसे लोग चौपट राजा की तरह अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं।

विशेष -(1) यहाँ लेखक ने बताया है कि हमें सदैव बुद्धिमान, धर्मप्रिय और नियम के अनुरूप चलने वाले देश में ही निवास करना चाहिए। अनुरू

(2) विवेकहीन व्यक्ति अपनी ही मूर्खता के कारण चौपट राजा के समान अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

(3) शैली उपदेशात्मक है। भाषा में स्वाभाविकता है।

(19) मै तो इस नगर में अब एक क्षण भी नहीं रहूँगा। देख मेरी बात मान नहीं पीछे पछताएगा। मैं तो जाता हूँ. पर इतना कहे जाता हूँ कि कभी सकट पड़े तो हमारा स्मरण करना।

सन्दर्भ- प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक गद्यरंग के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित प्रहसन 'अन्धेर नगरी' से उद्धृत है। 

प्रसंग - महन्त के बहुत समझाने पर भी उनका शिष्य वहाँ से जाने के लिए तैयार नहीं हुआ तब उन्होंने उसे अपना निश्चय बतलाया और सुझाव दिया

व्याख्या गुरुजी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे ऐसी अंधेर नगरी में एक क्षण भी नहीं रहेंगे। उन्होंने उसे समझाते हुए कहा कि वह उनकी बात मान ले अन्यथा बहुत अधिक पछतायेगा। गुरुजी ये कहकर जाते समय कहते हैं कि जब कभी उसके ऊपर मुसीबत आये तब वह उन्हें याद करें। 

विशेष-  (1) गुरुजी अंधेर नगरी में एक पल भी नहीं रहना चाहते हैं।

(2) गुरुजी उसे संकटकाल में अपने स्मरण का सुझाव भी देते हैं। 

(20) चुप रहो, सब लोग। राजा के होते और कौन बैकुण्ठ जा सकता है। हमको फाँसी चढाओ, जल्दी-जल्दी।

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक गद्यरंग के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित प्रहसन 'अन्धेर नगरी' से उद्धृत है। 

प्रसग-जब बेकसूर गोवर्धनदास को फाँसी की सजा दी जाती है तो महन्त अपने शिष्य को बचाने के लिए उपाय खोजता है और शिष्य के कान में समझाते हैं। गुरु कहता है कि मैं फाँसी पर चढूँगा और शिष्य कहता है कि मैं फाँसी पर चढूँगा।

व्याख्या-गुरू राजा, मंत्री, कोतवाल और सिपाहियों को बताता है कि इस समय ऐसा साइत है कि जो मरेगा सौ बैकुंठ जायेगा, तो मंत्री कहता है कि हम फाँसी पर चढ़ेंगे। 

कोतवाल कहता है कि हम लटकेंगे। इतना सुनते ही राजा कहता है कि सब चुप रहो। राजा के होते हुए कोई दूसरा कैसे बैकुण्ठ जा सकता है और वह फाँसी पर चढ़ने को तैयार हो जाता है और कहता है कि मुझे जल्दी फाँसी पर चढाओ।

विशेष-1. विवेकहीन व्यक्ति अपनी ही मूर्खता के कारण चौपट राजा के समान अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

2. शैली उपदेशात्मक है।

(21) मैने आपका कहना नहीं माना उसी का यह फल मिला। आपके सिवा अब ऐसा कोई नहीं जो रक्षा करे। मैं आप ही का हूँ, आपके सिवाय और कोई नहीं।

सन्दर्भ - प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक गद्यरंग के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित प्रहसन 'अन्धेर नगरी' से उद्धृत है। 

प्रसंग-महंत के समझाने पर भी उसका शिष्य नहीं समझता और वह मुसीबत में फँसने पर गुरूजी को याद करता है।

व्याख्या—नारायण दास अंधेर नगरी राजा के राज्य में फाँसी चढाये जाने के लिए चुना जाता है क्योंकि वह राज्य अंधेर नगरी और चौपट राजा था। तब नारायण दास अपने गुरु को याद करके कहता है कि मैंने आपका कहना नहीं माना इसलिए मैं यह सजा भुगत रहा हूँ। आपके सिवाय मेरा कोई नहीं जो मेरी रक्षा कर सके मैं आप का सेवक हूँ। आप ही मेरी रक्षा कीजिए।

विशेष–व्यंग्यात्मक शैली, खड़ी बोली व ब्रज भाषा प्रयोग

(22) कोई चिता नहीं नारायण सब समर्थ है। सुने, मुझको अपने शिष्य को अंतिम उपदेश देने दो, तुम लोग तनिक किनारे हो जाओ देखो मेरा कहना न मानोगे तो तुम्हारा भला होगा।

सन्दर्भ व प्रसंग - प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक गद्यरंग के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित प्रहसन 'अन्धेर नगरी' से उद्धृत है। 

व्याख्या-नारायण दास को फाँसी की सजा होती है। तो वह अपने शिष्य को आखिरी उपदेश देने के लिए राजा से माँग करता है। बाँकी सब को किनारे कर देता है और अपने शिष्य के कानो में कहता है कि मुझे फाँसी चढ़ा दो जो फाँसी चढ़ेगा वह बैकुंठ जायेगा। इस बात को बोलोगे तो तुम बच जाओगे। विशेष-विवेकहीन व्यक्ति अपनी ही मूर्खता के कारण फाँसी पर चढ़ जाता है।

(23) मनोविकार होने के कारण क्रोध का आविर्भाव बहुत पहले देखा जाता है। शिशु अपनी माता की आकृति से परिचित हो जाने पर ज्यों ही यह जाग जाता है कि दूध हसी से मिलता है, भूखा होने पर वह उसे देखते ही अपने रोने में कुछ क्रोध का आभास देने लगता है।

संदर्भ - प्रस्तुत अवतरण हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक और निबंधकार आचार्य रामचन्द्र शुक्न द्वारा लिखित 'क्रोध' नामक निबंध से अवतरित है।

प्रसंग - प्रस्तुत गद्यायतरण में क्रोध के उत्पत्ति के विषय में वर्णन किया गया है।

व्याख्या - आचार्य शुक्ल जी ने क्रोध को एक मनोविकार के रूप में बताया है। मनोविकार की स्थिति में ही क्रोध की उत्पत्ति होती है। शुक्ल जी कहते हैं कि कोच की उत्पत्ति का आभास पहले ही हो जाता है। काध की भावना तभी उत्पन्न होती है जब हम उसका कारण समझने लगते है। 

काध उस समय उत्पन्न होता है, जब हम दुख के कारण को भली-भाँति जान लेते हैं। छोटा बच्चा भी अपनी माता की आकृति से भित हो जाने के पश्चात अर्थात् अपनी माता को पहचान लेने के पश्चात यह समझ जाता है कि दूध इन्हीं से मिलता है। 

अत जब उसे भूख लगती है या भूख का आभास होता है तो वह रोकर अपली माता का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता है। उसे देखते ही रोने लगता है। उसके इस राजे में कुछ क्रोध का भाव भी छिपा रहता है। 

इस प्रकार शिशु रोकर क्रोध का आभास देने लगता है, जिससे उसकी माता समझ जाती है कि उसके बच्चे को भूख लगी होगी।

विशेष- 1 कोष के आविर्भाव का कारण वर्णित है। 2 काथ को मनोविकार माना गया है।

3 शुक्ल जी की शैली और भाषा के अनुरूप निबंध की भाषा-शैली परिष्कृत और सुलझी हुई है। 

(24) सामाजिक जीवन में क्रोध की जरूरत बराबर पढ़ती है। यदि क्रोध न हो तो मनुष्य दूसरों के द्वारा पहुँचाये जाने वाले बहुत से कष्टों की चिरनिवृति का उपाय ही न कर सके। कोई मनुष्य किसी दुष्ट के नित्य दो-चार प्रहार सहता है। 

यदि उसमें क्रोध का विकास नहीं हुआ है तो वह केवल आह उह करेगा जिसका उस दुष्ट पर कोई प्रभाव नहीं। उस दुष्ट के हृदय में विवेक, दया आदि उत्पन्न करने में बहुत समय लगेगा । ससार किसी को इतना समय ऐसे छोटे-छोटे कामों के लिए नहीं दे सकता है।, 

सन्दर्भ -  प्रस्तुत पक्तियाँ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्ध 'क्रोध' से ली गई हैं।

प्रसग- प्रस्तुत गद्यांश में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सामाजिक जीवन में क्रोध के महत्व का प्रतिपादन किया है

व्याख्या - सामाजिक जीवन में क्रोध का अपना विशेष महत्व है। यदि क्रोध न हो ता मनुष्य दूसरों के द्वारा कष्ट से छुटकारा पाने का उपाय ही न करे। कोई दुष्ट आदमी नित्य प्रति दो-चार गालियाँ देता है। यदि उसकी गालियाँ सुनकर क्राथ उत्पन्न नहीं होता तो उसका गालियाँ देना बढ़ता ही चला जायगा। 

इस प्रकार समाज में बुराई बढ़ती चली जायगी। उस दुष्ट के हृदय में विवेक, दया आदि सदभाव उत्पका करने में बहुत समय लगगा और ससार इतने छोटे-छोटे कार्मा के लिए किसी को इतना समय नहीं सकता।

विशेष - यही विद्वान लेखक ने क्रोध का व्यावहारिक विवेचन करते हुए उसे समाज के लिए आवश्यक बतलाया है।

(25) क्रोध शान्ति भग करने वाला मनोविकार है। एक का क्रोध दूसरे में भी कोष का सचार करता है जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है, वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुख पर उसकी भी त्योरी चढ़ जाती है। 

यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोष प्रकट किया जा रहा है. वह उचित है या अनुचित । इसी से धर्म, नीति और शिष्टाचार तीनों में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। 

सन्दर्भ एव प्रसंग - प्रस्तुत पक्तियों आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्ध 'क्रोध' से ली गई है। प्रस्तुत पंक्तियों के पूर्व निवन्धकार ने विवेचना की है कि क्रोध का वेग अत्यन्त प्रबल होता है। क्रोधी व्यक्ति इस बात पर विचार नहीं करता कि जिस पर वह क्रोध कर रहा है, उसे हानि पहुँचाने का भी उसका लक्ष्य है

व्याख्या - प्रस्तुत पंक्तियों में निबन्धकार ने विवेचना की है कि क्रोध एक ऐसा मनोविकार है, जो मनुष्य की मानसिक स्थिति में एक प्रकार की उत्तेजना भर देता है। क्रोधी व्यक्ति जिस पर क्रोध करता है, उस पर शीघ्र ही क्रोध का संचार हो जाता है। 

क्रोध के उचित या अनुचित पक्ष पर विचार करने वाले बहुत कम लोग होते हैं। इसीलिए धर्म, नीति और शिष्टाचार तीनों में ही क्रोध को रोकने का उपदेश मिलता है।

विशेष—प्रस्तुत अवतरण में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने क्रोध के सामाजिक एवं वैयक्तिक दो। पक्षों पर विचार किया है।

(26) क्रोध सब मनोविकारों में फुर्तीला है, इसी से अवसर पड़ने पर वह और मनोविकारों का भी साथ देकर उनकी तुष्टि का साधक होता है। कभी वह दया के साथ कूदता है, कभी घृणा के 

एक क्रूर कुमार्गी किसी अनाथ अबला पर अत्याचार कर रहा है। हमारे हृदय में उसे अनाय अबला के प्रति दया उमड़ रही है, पर दया की अपनी शक्ति तो त्याग और कोमल व्यवहार तक होती है। 

यदि वह स्त्री अर्थ-कष्ट में होती तो उसे कुछ देकर हम अपनी दया के वेग को शान्त कर लेते, पर यहाँ तो उस अबला के दुःख के कारण मूर्तिमान तथा अपने विरुद्ध प्रयत्नों को ज्ञानपूर्वक रोकने की शक्ति रखने वाला है। 

ऐसी अवस्था में क्रोध ही उस अत्याचारी के लिए उत्तेजित करता है जिसके बिना हमारी दया ही व्यर्थ जाती है।

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के 'क्रोध' नामक निबन्ध से अवतरित किया गया है। इसमें क्रोध, मनोविकारों में सबसे अधिक फुर्तीला बताते हुए यह कहा गया है कि कभी-कभी वह अन्य मनोविकारों का सहायक होकर भी सामने आता है।

व्याख्या—क्रोध अपनी तीव्रता के कारण कभी-कभी अन्य मनोविकारों का भी सहायक बन बैठता है और उनकी तुष्टि का कारण भी बन सकता है। कभी उसे दया के साथ देखा जा सकता है, कभी घृणा के साथ। 

निबन्धकार ने अपने इस उदाहरण में स्पष्ट किया है कि जैसे कोई दुष्ट व्यक्ति किसी निरीह नारी अथवा दुर्बल व्यक्ति को पीट रहा है। इससे निरीह नारी अथवा दुर्बल व्यक्ति के प्रति मन में दया जागृत हो जाती है ।

फलस्वरूप दया से प्रभावित हुआ व्यक्ति प्रतिकारस्वरूप क्रोधित होकर दुष्ट को प्रताड़ित कर देता है, दुष्ट को प्रताड़ित करने की भावना का उदय होता है। इस प्रकार क्रोध, दया, घृणा, मनोविकारों का सहयोगी बनकर सामने आता है।

विशेष —(1) प्रस्तुत गद्यांश में सूत्रात्मक शैली है।

(2) क्रोध समाजोपयोगी किस प्रकार होता है, इसे स्पष्ट किया गया है।

(27) "बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है जिससे हमें दुःख पहुँचा है, उस पर यदि हमने क्रोध किया और यह क्रोध यदि हमारे हृदय में टिका रहा तो वह बैर कहलाता है।' इस स्थायी रूप में टिक जाने के कारण कोध का वेग और उग्रता तो धीमी पड़ जाती है, पर लक्ष्य को पीड़ित करने की प्रेरणा बराबर बहुत काल तक हुआ करती है। 

सन्दर्भ-प्रसंग-क्रोध शीर्षक निबन्ध से उद्धृत अंश में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल बैर और क्रोध का अन्तर स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं कि

व्याख्या-शुक्लजी कहते हैं कि क्रोध में जहाँ तत्काल प्रतिकार की भावना होती है वहाँ बैर में क्रोध । अवसर की प्रतीक्षा करता है। जैसे किसी वस्तु को तेल अथवा चासनी में रखकर भविष्य के लिए सुरक्षित रखने को अचार मुरब्बे के रूप में रखना कहते हैं। 

अचार या मुरब्बा बनने में समय लगता है। इसी प्रकार जब क्रोध करने वाला तत्काल प्रतिकार लेने की स्थिति में नहीं होता, तब वह क्रोध को पीकर अवसर की प्रतीक्षा करता है अर्थात् क्रोध जब तुरन्त व्यक्त न होकर भविष्य में किसी अवसर पर व्यक्त होने के लिए दब जाता है तब वह धीरे-धीरे पक जाता है और बैर बन जाता है।

विशेष—क्रोध और बैर का अन्तर समय की दूरी है।

(28) "ससार किसी को इतना समय छोटे-छोटे कामो के लिए नहीं दे सकता। भयभीत होकर प्राणी अपनी रक्षा कभी-कभी कर लेता है, पर समाज में इस प्रकार प्राप्त दुःख जिवृत्ति तिरस्यायिनी नहीं होती। 

हमारे कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि क्रोध के समय क्रोध करने वाले के मन में सदा भावी कष्ट से बचने का उद्देश्य रहा करता है कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि चेलमा सृष्टि के भीतर का विधान इसीलिए है। 

सन्दर्भ-क्रोध शीर्षक निबन्ध से उद्धृत अंश में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल बैर और क्रोध का अन्तर स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं कि

प्रसग- 'क्रोध' शीर्षक जिबज्य के प्रस्तुत गद्याश में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सामाजिक जीतज में क्रोध के महत्व का प्रतिपादन किया है

व्याख्या-अगर व्यक्ति क्रोध न करे तो समाज में दुराई बढ़ती जायेगी। दुष्ट के हृदय में तितक दया आदि सद्भाव उत्पन्न करने में बहुत समय लगेगा और संसार इलजे छोटे छोटे कामों के लिए किसी को इतना समय नहीं दे सकता यह सत्य है कि प्राणी कभी-कभी भयभीत होकर अपने प्राणों की रक्षा में प्रवृत्त होता है। 

परन्तु समाज में दुःख की निवृत्ति कोध के लिजा नहीं हो सकती। यह आवश्यक नहीं है कि क्रोध करते समय क्रोध करने वाले के मज में अविष्य के कष्टों से बचने का उद्देश्य हो । परन्तु यह निश्चित है कि चेतज दृष्टि में क्रोध का निदान भविष्य के दुःख से खाने के लिए होता है।

विशेष-लेखक जे क्रोध का व्यावहारिक विवेचन करते हुए उसे समाज के लिए आवश्यक बतलाया है।

(29) क्रोध को उग्र वेष्टाओं का लक्ष्य हानि या पीड़ा पहुँचाने के पहले आलम्मान में भय का सवार करना रहता है। जिस पर क्रोध प्रकट किया जाता है, वह यदि डर जाता है और नम होकर पश्चाताप करता है, तो क्षमा का अवसर सामने आता है। 

क्रोध का गर्जन, तर्जज क्रोध के पात्र के लिए भावी दुष्परिणाम की सूचना है, जिससे कभी-कभी उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है और दुष्परिणाम की नौबत नहीं आती। 

एक की उग्र आकृति देख दूसरा किसी अनिष्ट व्यापार से विरल हो जाता है, या नम होकर पूर्वकृत दुर्व्यवहार के लिए क्षमा चाहता है। 

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध निबन्धकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के क्रोध' नामक निबन्ध से उद्धृत है इस गद्यांश में निबन्धकार शुक्ल जी ने क्रोध के सामजोपयोगी स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि क्रोध का आलम्बन अपने को सुधारकर भविष्य दुष्टता नहीं करता।

व्याख्या-निबन्धकार कहते हैं कि क्रोध का उद्देश्य अपने विरोधी और हानि पहुँचाने वाले के हृदय में भय का संचार करना होता है, ताकि वह भविष्य में विरोध करने अथवा हानि पहुँचाने की चेष्टा न करे। उसे भयभीत करने के अतिरिक्त उसका नाश करने अथवा उसे कोई हानि पहुँचाने का इसमें लक्ष्य नहीं होता। 

क्रोध के द्वारा अपने विरोधी को नम बनाकर भविष्य में उसको दुष्टता करने से रोकने के लिए ऐसा क्रोध समाजोपयोगी होता है। इस प्रकार क्रोध का आश्रय, जो अपने क्रोध को प्रकट करता है, 

इसमें क्रोध के पात्र के प्रति भविष्य के लिए एक चेतावनी होती है कि यदि क्रोध का पार, अपनी दुष्टता का त्याग नहीं करेगा तो भविष्य में क्रोध के आश्रय के द्वारा पीड़ित किया जायेगा, अथवा दण्डित किया जायेगा। 

इसका परिणाम यह होता है कि भविष्य में दुष्ट कोई दुष्टता नहीं करता और पीड़ित होजे के भय से अपने को सुधार लेता है इस प्रकार क्रोध अपना उपयोगी रूप उजागर करता है।

अनेक बार क्रोध किसी अहंकारी का अहंकार नष्ट करने के उद्देश्य से भी किया जाता है और अनेक बार यह सफल सिद्ध होता है। बहुत से अहंकारी अपमानित होने के भय से अपने अहंकार का त्याग कर चुके हैं।

इस प्रकार उपर्युक्त गद्यांश में क्रोध की समाजोपयोगी अवधारणा का स्पष्टीकरण किया गया है। विशेष—निबन्ध की भाषा-शैली शुक्ल जी की शैली और भाषा के अनुरूप ही परिष्कृत और सुलझी हुई है।

(30) दण्ड कोप का ही एक विधान है। राजदण्ड राजकोप है और लोकाकोप धर्मकोप है। जहाँ राजकोप धर्मकोप से एकदम भिन्न दिखाई पड़े, वहाँ उसे राजकोप न समझकर राजकोप विशेष मनुष्य को कोप समझना चाहिए। 

ऐसा कोप, राजकोप के महत्व और पवित्रता का अधिकारी नहीं हो सकता। उसका सम्मान जनता अपने लिए आवश्यक नहीं समझ सकती। 

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध निबन्धकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के क्रोध' नामक निबन्ध से उद्धृत है इस गद्यांश में निबन्धकार शुक्ल जी ने क्रोध के सामजोपयोगी स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि क्रोध का आलम्बन अपने को सुधारकर भविष्य दुष्टता नहीं करता।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने क्रोध की उत्पत्ति के कारणों तथा क्रोध के अलग-अलग रूपों को बताया है।

व्याख्या--निबन्धकार कहते हैं कि किसी को दण्ड देना क्रोध का ही एक कारण होता है। किसी व्यक्ति को अगर राजदण्ड दिया गया है तो वह राजक्रोध का भागी है। अगर किसी को लोगों द्वारा दण्ड दिया गया है तो वह धर्मक्रोध का कारण बनता है। 

जब राजक्रोध, धर्मक्रोध से भिन्न दिखाई पड़े उस क्रोध को राजक्रोध न समझकर कुछ विशेष लोगों द्वारा दिया गया क्रोध समझना चाहिए। क्योंकि राजक्रोध और धर्मक्रोध दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। 

किन्तु जो क्रोध राज और धर्म से पृथक होता है उस क्रोध की महत्ता और पवित्रता दोनों में नहीं रहती है। ऐसा क्रोध जो पवित्रता का अधिकारी नहीं होती उसका सम्मान जनता के लिए भी आवश्यक नहीं होता है।

विशेष--निबन्धकार ने क्रोध की पवित्रता को बताया है। शैली में विवेचना की प्रधानता है। 

(31) बहुत दूर तक और बहुत काल से पीड़ा पहुँचाते चले आते हुए किसी घोर अत्याचारी का बना रहना ही लोक की क्षमा की सीमा है। इसके आगे क्षमा न दिखाई देगी-नैराश्य, कायरता और शिथिलता ही छाई दिखाई पड़ेगी। 

ऐसी गहरी उदासी की छाया के बची आशा उत्साह और तत्परता की प्रभा जिस क्रोधाधर्म के साथ फूटती दिखाई पड़ेगी। इसके सौंदर्य का अनुभव सारा लोक करेगा।

सन्दर्भ-प्रसंग-हिन्दी के मूर्धन्य निबंधकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित 'क्रोध' शीर्षक निबंध से उद्घृत प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने यह विचार व्यक्त किया है कि जब क्षमा द्वारा अत्याचारी का हृदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता, वो उस अवसर पर उसके प्रति व्यक्त किया क्रोध जनता की दृष्टि से निन्दा का नहीं अपितु प्रशंसा का पात्र हुआ करता है।

व्याख्या-शुक्ल जी कहते हैं कि सामाजिक दृष्टि से क्षमा यद्यपि उत्तम गुण माना जाता है, जबकि क्रोध के निग्रह पर बल दिया जाता है क्योंकि उसको गुण की अपेक्षा अवगुण माना जाता है। किन्तु ऐसी स्थितियाँ भी आ जाती है, जब क्षमा की अपेक्षा क्रोध अधिक उपयोगी और आवश्यक सिद्ध होता है। 

उदाहरण के लिए यदि कोई रावण जैसा अत्याचारी और निरंकुश शासक दूर-दूर तक और लंबे समय तक जगत को पीड़ित करता रहे तो इस स्थिति को लोक द्वारा क्षमा करने की चरम स्थिति ही मानना चाहिए। 

इसके पश्चात अत्याचारों में पिसती प्रजा के संबंध में यह नहीं कहा जा सकता कि वह उस अत्याचारी को क्षमा कर रही है- बल्कि डरपोक जनता में निराशा, कायरता और शिथिलता ही व्याप्त दिखाई देगी। 

जब लोगों में इस प्रकार की गहरी निराशा और उदासी छाई हुई हो, तो किसी राम जैसे व्यक्ति द्वारा उस अत्याचारी के प्रति व्यक्त करते हुए जनता के हृदय में जिस आशा, उमंग और तत्परता का संचार किया जायेगा। उस क्रोध की सुंदरता, भव्यता और उत्तमता का अनुभव संपूर्ण लोक द्वारा किया जायेगा।

विशेष - लेखक ने क्रोध भाव को सामान्यता बुरा माने जोने पर भी उसकी सामाजिक उपयोगिता तथा परोपकार के कृत्यों में प्रदर्शित बोध की भव्यता पर प्रकाश डाला है।

(32) हिन्दुस्तान के जवानों में कोई उमंग नहीं है इत्यादि इत्यादि। “इधर देखता हूँ कि पेड़-पौधे और भी बुरे हैं। सारी दुनिया में हल्ला हो गया है कि बसन्त आ गया। पर इन कम्बख्तों को खबर ही नहीं। कभी-कभी सोचता हूँ कि इनके पास तक सन्देश पहुँचाने का क्या कोई साधन नहीं हो सकता। 

महुआ बदनाम है कि उसे सबके बाद बसन्त का अनुभव होता है; पर जामुन कौन अच्छा है। वह तो और भी बाद में फूलता है और कालिदास का लाड़ला यह कर्णिकार ? आप जेठ में मौज में आते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि बसन्त भागता-भागता चलता है।

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत निबन्ध 'बसन्त आ गया' में निबन्धकार डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी बसन्त आगमन पर होने वाले परिवर्तन का वर्णन करते हुए कहते हैं

व्याख्या-लेखक का कथन है भारत के नवयुवक उमंग व उत्साह से हीन दिखाई देते हैं कि लोगों में बसन्त आगमन को लेकर बहुत हल्ला हो जाता है, जबकि इधर देखो तो पेड़-पौधों पर कोई प्रभाव नहीं है, ये वैसे ही हैं जैसे पहले थे। लेखक इनको (पेड़ों) बसन्त आगमन का सन्देश पहुँचाने की तरकीब सोच रहा है। 

वह बताना चाहता है कि देखो बसन्त आ गया है और तुम अभी जैसे के वैसे ही हो । महुए के ठाठ तो और भी निराले हैं, उसे बसन्त आगमन का आभास सबसे बाद में होता है और जामुन ! जनाब ! यह तो और भी बाद में फूलता है। 

कनिकार के बारे में लेखक कहता है यह कालिदास का प्रिय है, लेकिन यह जेठ माह की गर्मी और तपती धरती पर फूलता है अर्थात् बसन्त का इस पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी चुटकी लेते हुए कहते हैं कि मुझे ऐसा लगता है कि जैसे बसन्त भागता-भागता चलता है।

विशेष - लेखक ने प्रकृति को कितनी पैनी दृष्टि से देखा है, यह दर्शनीय है। 

(33) "मुझे ऐसा लगता है कि बसत भागता-भागता चलता है। देश में नहीं, काल में। किसी का बसन्त पन्द्रह दिन का है तो किसी का नौ महीना का ! मौजी है, अमरूद बारहों महीने इसका बसन्त ही बसन्त है।

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'बसन्त आ गया' नामक निबन्ध से उद्धृत है। इन पंक्तियों में श्री द्विवेदी जी ने बसन्त की अल्प अवधि पर प्रकाश डाला है। 

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्तियों में निबन्धकार का कथन है कि बसन्त ऋतु का आगमन होता है, किन्तु वह शीघ्रता से पलायन कर जाती है। अच्छे समय के आने व जाने का भान ही नहीं होता कि वह कब आया और कब चला गया। इसका पता नहीं चलता। 

बसन्त अपनी छवि धरती पर विकीर्ण करता है, फलस्वरूप चारों ओर उल्लास और आनन्द छा जाता है। किन्तु उसके आगमन का आभास (भान) और उसके अस्तित्व का ज्ञान उसको भली प्रकार से नहीं हो पाता है। कुछ तो वर्षभर बारह महीने बसन्त के वैभव का आनन्द लाभ करते हैं और कुछ थोड़े समय में ही आनन्द का परित्याग कर दुःख के सागर में निमग्न हो जाते हैं ।

अर्थात् दुर्भाग्य की रेखा उनके बसन्त को मलिन बना देती है। बसन्त का अनुभव बहुत कुछ व्यक्ति की अपनी मनोवृत्ति पर आश्रित होता है। कोई बसन्त में ही पतझड़ के दर्शन करता है और इसके विपरीत कोई पतझड़ को बसन्त स्वीकार कर लेता है। 

बसन्त के लिए काल-विशेष की सीमा का कोई बसन्त नहीं है। किसी का बसन्त पन्द्रह दिन का होता है तो किसी का नौ मास का (अमरूद की भाँति) बसन्त में स्थायित्व कहाँ, वरन् वह तो शीघ्रता के साथ पलायन करता है। 

विशेष—(1) बसन्त ऋतु अल्प समय के लिए आती है।

(2) प्रकृति का सुन्दर चित्रण द्रष्टव्य है।

(3) बसन्त में स्थायित्व नहीं होता।

(34) दो कचनार वृक्ष इस हिन्दी भवन में हैं, एक ठीक मेरे दरवाजे पर और दूसरा मेरे पड़ोसी के। भाग्य की विडम्बना देखिए कि दोनों एक ही दिन लगाए गए हैं। मेरा वाला ज्यादा स्वस्थ और सबल है। 

पड़ोसी वाला कमजोर मरियल है। परन्तु इसमें फूल नहीं आये और वह कमबख्त कंधे पर से फूल पड़ा है। मरियल सा पेड़ है, पर क्या मजाल कि आज उसमें फूल के सिवा कुछ और देखें। पत्ते है नहीं टहनिया फूलों से ढंक गई है। रोज देखता हूँ कि हमारे मियाँ कितने अग्रसर हुए। कल तीन फूल निकले थे।

सन्दर्भ-प्रसग - प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'बसन्त आ गया' नामक निबन्ध से उद्धृत है। इन पंक्तियों में श्री द्विवेदी जी ने बसन्त की अल्प अवधि पर प्रकाश डाला है। 

व्याख्या-लेखक कह रहा है कि दो कचनार के पेड़ हैं एक हिन्दी भवन के सामने दरवाजे पर और एक पड़ोसी के घर। हम दोनों ने इस पेड़ को एक साथ लगाया है किन्तु भाग्य की विडम्बना देखिए मैंने जो लगाया वह स्वस्थ और सबल है और उसके द्वारा लगाया गया मरियल है ।

किन्तु उसमें फूल लदे हुए हैं पत्ते दिखाई ही नहीं देते अर्थात् जो सामर्थ्य और सबल होता है वह कमजोर होता है और जो कमजोर होते हैं उसमें भावुकता अधिक होती है।

(35) आये दिन ऐसा होता है कि सुबह से आधी रात तक यह पता ही नहीं चलता कि यह शरीर अपना है, यह घर अपना है । घर लगता है रेल्वे प्लेटफार्म है, शरीर लगता है हैडिल से चलने वाला पंप है, मन लगता है हजार लोगों के हाथ बंधक रखा हुआ पुराना मकान है, जिसके दावेदार के बीच निरंतर प्रतिस्पर्धा मची रहती है।

सन्दर्भ-प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'बसन्त आ गया' नामक निबन्ध से उद्धृत है। इन पंक्तियों में श्री द्विवेदी जी ने बसन्त की अल्प अवधि पर प्रकाश डाला है। 

व्याख्या - लेखक कहता है कि शहरी वातावरण में ढल जाने से व्यक्ति का जीवन भागदौड़ में करता है उसे पता नहीं चलता कि कल रात हुई कल दिल प्रत्येक समय काम-काम घर में आकर बाराम करने का सोचो तो वह रेल्वे प्लेटफार्म में सुस्ताजे जैसा है शरीर एक मशीन बन गया है ।

जहाँ का से छुटकारा नहीं मिलता इससे अ तो गाँव की अमराई ही ठीक था । जहाँ अमराई की आयौँ में सुल जो मिला तो आज भी याद आती है यहाँ तो लोगों में प्रतिस्पर्धा चल रहा है मैं अब इस महानगरी वातावरण से जाना चाहता हूँ।

विशेष - ग्राम्य वातावरण को याद, भाषा लोकानमुखी वर्तमान जीवन के प्रमों को लिपिबद्ध

(36) अमराई से जुड़ने का अर्थ होता है, बसन्त से जुड़ना, बसन्त की तैयारी से जुड़ना, जीवन की जवीकरण की प्रक्रिया से जुड़ना, शक्ति से सघन श्यामल प्रसार से जुड़ना, सगीत मातृका दूदिलस्यामा महामातगी से जुड़ना, पूर्णपातन, पल्लवन, कुसमन और फलन की समजता से जुड़ना, प्रकृति के एकताल-वह समाज की समरस्वता से जुड़ना, मनुष्य के एकात-विश्वास से जुड़ना और घरती उमण की आकाश के स्वस्ति वाचन से जुड़ना।  

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्याश डो विद्यानिवास मिश्र के महत्वपूर्ण ललित निबन्ध उस अमराई ने राम-राम कही है' से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग इसमें मिश्रा जी गाँटों में लगी अमराई से जुड़ने का व्यापक अर्थ बताया है व प्रकृति सजीवज मे साम्यता बताई है

व्याख्या- डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी कहते हैं कि गाँव में लगी अमराई से जुड़ने का सीधा अर्थ है उस अमराई में पड़ने वाले प्रभावों से जुइना । बसन्त अमराई को और आकर्षक दना देता है और उसक प्रभाव हमारे जीवन में खुशहाली के रूप में दिखाई देता है ।

बसन्त की तैयारी से जुड़ना अर्थात उत्साह से जीवज को नवीन दृष्टिकोण से देखना अमराई में व्याप्त श्यामलता से जुइना, अनराई के कण-कण में व्याप्त संगीत से जुइना, यह संगीत पसियों का कलह, पत्तियों का हिलना या हकों की खामोशी का संगीत हो सकता है। 

अमराई में पत्तियों का झड़ना, जीवन की विनष्टता का पाठ है. अमराई में जये पत्तों और फूलों का आना मानव जीवन में सृजन का प्रतीक है अर्थात् अमराई से जुइजा मानव जीवन को सम्पूर्णला व कमियों के साथ एकात्म स्थापित करने जैसा है।

विशेष (1) परदुःखकातरता से उत्पन्न क्रोध की व्याख्या।

(2) दृष्टान्त अलंकार।

(3) तत्सम शब्दों का प्रयोग।

(37) “यहाँ अपनी जगह ठहरे रहने के लिए आदमी को दौड लगाना पड़ता है और सामने वाले आदमी के पास पहुँचने के लिए पीछे की ओर मुड़कर चलना पड़ता है। अपने वर्तमान को अतीत बजाने की निर्ममता मै नही सीख पाया, मेरी यह कमजोरी है। मैं ठेठ गाँव का आदमी हूँ इसको जबरन झुठलाने की कोशिश नहीं करता यही मेरी अतीत जीविता है।' 

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश डॉ. विद्यानिवास मित्र के महत्वपूर्ण ललित निबन्ध उस अमराई ने राम-राम कही है' से उद्धृत किया गया है।

प्रसंग-इस गद्यांश में लेखन ने वर्तमान और अतीत में जीने की कला के विषय में बताया है। लेखक का कहना है कि वह अपने वर्तमान को अतीत बनाने की कला नहीं सीख पाया।

व्याख्या--इस गद्यांश में लेखक कहते हैं कि मनुष्य को अपने वर्तमान में जीवन व्यतीत करना वाहिए न कि अतीत को छत्रछाया में। वे कहते हैं कि व्यक्ति को उर्तमान में जीने के लिए समय के साथ दौइ लगानी पड़ती है। 

अन्यथा वह वर्तमान जी रहे लोगों से पिछड़ जायेगा और सामने वाले आदमी के पास पहुंचने के लिए अर्थात् वर्तमान में जी रहे व्यक्ति के पास पहुँचने के लिए रिछे पड़ता है अर्थात् अपने अतीत को देखते हुए आगे बढ़ना पड़ता है। 

लेखक यह स्वीकार करते है कि शहर में रहते और घुमते वे कई बरस बीता चुके हैं फिर भी वह वर्तमान को अतीत बनाने को कला नहीं सीख पाये। यह उसकी कमजोरी है। वह कहते हैं कि वह गाँव का आदमी है, वह इसे झूला नहीं सकता और यही उसकी अतीत जीविता है। 

(38) "अमराई मेरा सकता बोध और तीच करती है, मेरे आतक को और सपन बनाती है और मेरी निरन्तर रीतते जाने की प्रक्रिया को तेजी देती है। मुझे जब लगता है कि अब आगे राह खो गई है, तो अमराई याद दिलाती है कि सबकी राहे सो गई है, हर एक रास्ते को अन्धकार लील चुका है।'' मैं जब आत्मीयता का प्रयोग एक मुखौरे के रूप में देखता हूँ तो अमराई स्यय एक बहुत बड़ा मुखौटा बन जाती है। 

सन्दर्भ - आलोय जिला श्री विद्यानिवास मिश्व का 'उस अमराई ने राम-राम कही है' ललित निबन्ध है, जिसमें मिप जी ले कति भिखारीदास की एक काय पंक्ति के माध्यम से ग्रामीण सौन्दर्य-बोध एवं मोले गाम मालस के सहकार का हृदयहारी चित्र प्रस्तुत किया है।

प्रसंग - लेखक शहरी बोध के साथ गौत का सौन्दर्य नहीं भुला पाते, बल्कि आज के बिखरते जीवन मूल्यों के दौर में उनकी आवश्यकता बताते हैं। जिस देश के लोग गाँव में निवास करते हैं वहीं की अमराई बसन्त की ताजगी का सन्देश है. तपते जीवन की रिजगा श्यामल छाया है।

व्याख्या - लेखक के शब्दों में अमराई उनके शहरी संकट को और पजा करती है, उनके आतंक (भय) को बढ़ाती है तथा लेखक के अन्तर में कुछ खालीपन का अहसास तेज होता चला जाता है। लेखक को लगता है कि जब आगे बढ़ने का मार्ग लगभग बन्द-सा हो चुका है,।

तब उस शहरी संकट से उबरने के लिए उन्हें गौंव के आमों के वृक्षों का झुण्ड याद आता है कि सबकी राहें खो गई है, प्रत्येक रास्ते को अन्धकार अपनी चपेट में ले चुका है। अमराई से दूर होकर निवन्धकार को एक व्याकुलता होती है कि अपनों से दूर बेगानों के बीच शहर जा रहा हूँ।

विशेष -(1) निबन्धकार अमराई से दूर बेगानापन का भाव व्यक्त कर रहे हैं।

(2) इस जिबन्ध में शैली तत्वों, आवेगात्मकता, स्तब्ध चित्रात्मकता के साथ तत्समता, ग्राम बोलियों की सहजता, लोक गीतों का सजीव चित्रण है।

(39) तुम मिलोगे भी तो मेरे पास एक पल कहाँ ठहरोगे और ठहरे भी कुछेक क्षण तो बिछुड़ना तो है ही और वह बिछोड़ और दुस्सह होगा. तुमसे प्रेम करने का अन्तिम परिणाम तुरन्त विरह है। विरह केवल तुमसे ही नहीं, अपने से भी, सब कुछ से भी, जिससे भी जुड़ने का लगाव रहा है। भक्ति के इस एक अश का भी स्पर्श, जो चेतना को कभी-कभी झन-झना देता है, उसके पीछे बसन्त की उत्कण्ठा में अमराई का बौरना हो या बसन्त के आगमन के बाद भी चैता के स्वर में आधी रात कोयल का कुहकना हो पर जो कुछ है, वह अमराई का है, मेरा नहीं।

सन्दर्भ -आलोय जिला श्री विद्यानिवास मिश्व का 'उस अमराई ने राम-राम कही है' ललित निबन्ध है, जिसमें मिप जी ले कति भिखारीदास की एक काय पंक्ति के माध्यम से ग्रामीण सौन्दर्य-बोध एवं मोले गाम मालस के सहकार का हृदयहारी चित्र प्रस्तुत किया है

प्रसंग - लेखक शहरी बोध के साथ गौत का सौन्दर्य नहीं भुला पाते, बल्कि आज के बिखरते जीवन मूल्यों के दौर में उनकी आवश्यकता बताते हैं। जिस देश के लोग गाँव में निवास करते हैं वहीं की अमराई बसन्त की ताजगी का सन्देश है. तपते जीवन की रिजगा श्यामल छाया है।

व्याख्या - जिन्होंने बसन्त पंचमी और होली के दिन आसमंजरी को चखा है, इसका स्वाद लिया है, वे जानते हैं कि आममंजरी का स्वाद कसैला होता है। अतः प्रश्न उठता है कि सहृदय और रस के पारखी महाकवि बाण ने आममंजरी को मधुर क्यों कहा है ? 

सान्द्रता का कहना तो उचित है, क्योंकि आम का बौर अकेला फूल न होकर गुच्छे के रूप में होता है। इसमें एक किंजल्क अर्थात् केसर दूसरे केसर से जुड़ा हुआ होता है।

सान्द्रता अर्थात् सघनता का कारण बताते हुए लेखक आगे कहता है कि कालिदास काव्य में जो सौन्दर्य है, वह समूह रूप में है, एकान्त रूप में नहीं है अर्थात् सौन्दर्य आनन्द पूरे श्लोक के पढ़ने से ज्ञात होता है, उसके एक अंश मात्र के पढ़ने से नहीं। इसके साथ-साथ महाकवि कालिदास के काव्य में आममंजरी की तरह बसन्त की वायु का भी आनन्द है। 

जहाँ उन्होंने कामदेव के मुख से या कहलवाकर कि “मैं पिनाक-पाणि शिव के धैर्य को नष्ट कर सकता हूँ।'' कामदेव के प्रभाव को बताय है, वहीं उन्होंने उसे शिव के द्वारा भस्म किया हुआ भी बताया है। विलासी और रसिक लोग जा मदनोत्सव के दिन आम्रमंजरी से कामदेव की पूजा करते हैं वहीं भक्त जन शिवरात्रि के । 

आसमंजरी को शिव-पूजन में विशेष महत्व देते हैं। महाकवि कालिदास ने शिव के द्वारा उसे भ. कराकर भी उसके जड़-चेतन पर प्रभाव डालने वाली शक्ति को सुरक्षित करके उसके साथ । (कामवासना) को जीवित रखा है, वहीं 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में पार्वती और शिव का नि करवाया है। .

विशेष- (1) कसैली होने पर भी बसन्त पंचमी और होली के दिन आसमंजरी का भारतीय जनों द्वारा वखा जाना, उसके प्रति आदर और श्रद्धा का प्रतीक है।

(2) बाणभट्ट द्वारा कसैली आसमंजरी को मधुर कहने पर लेखक ने स्वयं ही शंकर भक्ति द्वारा उसका समाधान किया है।

(3) भाषा संस्कृत तत्सम-प्रधान है, परन्तु इसकी मधुरता और प्रवाह में कमी नहीं आई है। शैली तर्क-प्रधान है।

(40) “शहर मुझे कोई भी अजनबी नहीं लगता, पर शहरियत बड़ी वैसी लगती है शहरियत का तनाव जैसे सूचना देता हो कि जहरीली गैस चारों ओर फैल रही है, उससे बचो। 

किसी भी बात पर दिलमजई नहीं होती, न पृथ्वी के वातावरण के प्रदूषण से उपस्थित होने वाले प्रलय की चेतावनी पर, न मनुष्य के तकनीकी कौशल की अपार क्षमता में विश्वास करने वाले वैज्ञानिकों के स्वर्णिम भविष्य के सपनों पर। 

पर अमराई है कि सशय, आतक और अविश्वास को आस्फालित करके भी एक ऐसी आकुलता पैदा करती है कि फिर कोई अपना बने या न बने, पराया नहीं रह पाता।"

सन्दर्भ- आलोय जिला श्री विद्यानिवास मिश्व का 'उस अमराई ने राम-राम कही है' ललित निबन्ध है, जिसमें मिप जी ले कति भिखारीदास की एक काय पंक्ति के माध्यम से ग्रामीण सौन्दर्य-बोध एवं मोले गाम मालस के सहकार का हृदयहारी चित्र प्रस्तुत किया है

प्रसंग-शहर में रहने के तौर-तरीकों और वहाँ की दिनचर्या पर लेखक ने विचार प्रकट किये हैं। व्याख्या-लेखक कह रहे हैं कि शहर मुझे कोई अजनबी नहीं लगता, लेकिन शहर की शहरियत अर्थात् शहरी प्रवृत्ति बड़ी दुरी लगती है। शहरों में फैला प्रदूषण तथा तनाव शहरों से भागने की ओर उद्धत करता है। बार-बार मन यही कहता है कि शहर से बचो। 

किसी भी बात से भरोसा नहीं आता है, न पृथ्वी के वातावरण के प्रदूषण से होने वाली प्रलय की चेतावनी से, न वैज्ञानिकों के तकनीकी कौशल की अपार क्षमता पर लेकिन अमराई है कि व्यक्ति को अपना बनाकर ही छोड़ती है, व शहरी प्रदूषण का आतंक, न किसी प्रकार का भय अमराई की ठण्डक और मनोहरता सहसा व्यक्ति को अपने आकर्षण में बाँध लेती है।

लेखक शहर में व्याप्त भीड़-भाड़, शोरगुल, पराये व्यवहार, बेचैनी को नापसन्द करते हैं और अपने गाँव की तन्हाई व शान्त तथा शुद्ध वातावरण को याद कर रहे हैं।

विशेष-(1) शहर की खामियों पर प्रकाश डाला है। ।

(2) वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय दिया है

(41) मुझे पूजापाठ का आडम्बर देखकर कभी-कभी बड़ा संशय होता है कि इस पूजापाठ के बाद भी क्यों कठोरता नहीं जाती, कृपणता नहीं जाती, पर जब कभी साल में एकाध बार विश्वनाथ जी की आरती में पहुँच जाता हूँ तो उस समय प्रकाश के छन्दोबद्ध नर्तन और वाद्यवृन्द के रमत ताल के उत्कर्ष पर पहुंची हुई वादन पूजा भीतर के मन को समस्त ऐन्द्रिय परिवेश से खींचकर ज्योति रूप नाद और नादरूप ज्योति में अधिष्ठित करती लगती है।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्ध उस अमराई ने राम-राम कही है से लिया गया है।

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने अमराई की महत्ता प्रतिपादित की है।

व्याख्या-लेखक विद्यानिवास मिश्र कहते हैं कि मुझे पूजा-पाठ का आडम्बर देखकर कभी-कभी बड़ा संशय होता है कि पूजा-पाठ के बाद भी क्यों कठोरता, कृपणता नहीं जाती पर लेखक आगे कहते हैं कि “जब कभी साल में एकाध बार विश्वनाथ जी की आरती में पहुँच जाता हूँ, तो उस समय प्रकाश के छन्दोबद्ध नर्तन और वाद्यवृन्द के रमत ताल के उत्कर्ष पर पहुँची हुई बाह्य पूजा भीतर के मन को समस्त इन्द्रि परिवेश से खींचकर ज्योति रूप नाद और नाद रूप ज्योति में अधिष्टित करती लगती है।" 

अमराई की समष्टि चेतना के संस्कार के कारण ही ऐसा होता है कि लेखक का मन कुछ देर के लिए आरती के छन्द में बँध जाता है। ।

विशेष- (1) लेखक आरती में बँधने की अमराई से जुड़ा होने का कारण बता रहे हैं। 

(2) भाषा संस्कृत तत्सम शब्दों से सुशोभित है।

(12) मेरे वर्तमान जीवन मित्र मुहो गतीत जीवी घोषित करते है और मैं कोई सफाई दूँ भी तो उसका कोई नही, क्योकि वर्तमान पर मौजूदा समय में काबिज तो वे ही हैं। मेरा तो कब्जा न अतीत पर है नं वर्तमान पर। यहाँ तक कि कभी-कभी लगता है कि भविष्य के सपनों पर भी अपना कोई हक नहीं रहा। उन सपनों की चप्पा गप्पा जमीन छोटे छोटे प्लाटों में बँटकर बेमानी खरीददारों के नाम नीलाम हो चुकी है।

सन्दर्भ - प्रस्तुत गद्यांश विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्ध उस अमराई ने राम-राम कही है से लिया गया है।

प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण लेखक ने मामीण सौन्दर्य बोध एवं भोले याम मानस के सहकार का हृदयस्पशी शिव प्रस्तुत किया है।

व्याख्या - लेखक कहते हैं कि मेरे वर्तमान जीवी मित्र मुझे अतीत जीवी घोषित करते हैं। चूंकि पतगाल पर काबिज है इसलिए यदि सफाई देता हूँ तो भी उसका कोई अर्थ नहीं। मेरे मित्र गाँव को को हार पूरी तरह शहरी वाले चुके हैं, अतएव उनका वर्तमान सुरक्षित हो गया है। 

लेखक कहते हैं कि शहर में रहकर भी वर्तमान जीवी नहीं बन सका। मैं वर्तमान में स्थिर नहीं रहना चाहता, बल्कि मेरी मान्यता है कि वर्तमान को गतिशील (जीकर) कर अतीत बनाना ही उचित है। 

मेरे लिए वर्तमान महत्वपूर्ण है, उसे निर्ममतापूर्वक अतीत नहीं बना सका। लेखक आगे कहते हैं कि ऐसा लगता है कि भविष्का के सपनों पर भी कोई अपना हक नहीं लगता। उन भविष्य के सपनों की जमीन तो नीलाम हो चुकी है।

विशेष - भारतीय ग्राम्य परिवेश में अमराई की महत्ता और उसकी धीरे धीरे नष्ट होती संस्कृति की ओर लेखक ने ध्यान आकृष्ः कराया है।

(43) मेरे लिए अमराह स्मृति नहीं है, साक्षात्कार है जीवन की वास्तविक सार्थकता का, यत्र-चलित संचार में चल फिर रहा हूँ, भूख और नीद तक सूरज के ऊपर आने या ढलने से नियन्त्रित न होकर घड़ी से नियन्त्रित हो गई है। पर तो भी स्वयं यन्त्र-बद्ध नहीं हो पाया, इसका एकमात्र मन पर छाया हुआ अमराई का साक्षात्कार है।

सन्दर्भ -प्रस्तुत अवतरण लेखक ने मामीण सौन्दर्य बोध एवं भोले याम मानस के सहकार का हृदयस्पशी शिव प्रस्तुत किया है।

प्रसंग - शहरी जीवन में रहकर भी यन्त्रबद्ध तरीके से नहीं रह पाने का चित्रण लेखक ने प्रस्तुत अवतरण में किया है।

व्याख्या- लेखक कहते हैं कि अमराई से जुड़ने का अर्थ होता है, बसन्त से जुड़ना। मेरे लिए अमराई जीवन की वास्तविक सार्थकता का साक्षात्कार है। यह मन पर छाया हुआ अमराई का साक्षात्कार मुझे यन्त्रबद्ध नहीं होने देता। अमराई मेरे लिए पहले जीवन के स्वीकृत की वृत्ति भी और आज भी है।

विशेष (1) लेखक अपने जीवन में अमराई की महत्ता बता रहे हैं।

(2) भाषा संस्कृत तत्सम शब्दों से सुशोभित, कोमल मथुर और शालीन खड़ी बोली है । 

(44) वह मन्त्र सृष्टि का क्रम दुहराता है, लय से ऋतु और सत्य पैदा हुए, उससे उद्भूत हुआ, समुद्र अर्णव, समुद्र अर्णव से उद्भूत हुआ सवत्सर, इस प्रकार तप से, आकाक्षा के उत्ताप से ऋतु और सत्य (गतिशील और स्थितिशील धर्म) प्रवर्तित हुए और भतु और सत्य से अनन्त देश और अनन्त काल के आयाम स्फुट हुए, इनसे सावधि देश और सावधि काल जन्मे मन्त्र की। 

सन्दर्भ -प्रस्तुत अवतरण लेखक ने मामीण सौन्दर्य बोध एवं भोले याम मानस के सहकार का हृदयस्पशी शिव प्रस्तुत किया है।

प्रसंग- यहाँ लेखक ने भारत देश की प्रशंसा की है।

व्याख्या -  यह परम्परा का मन्त्र ही सृष्टि का क्रम दुहराता है जैसे कि लय से ऋतु (गति) और सत्य (धर्म) पैदा हुए हैं, और उसी से सागर जन्मा, सागर से संवत्सर तथा तप की सृष्टि हुई। इन्हीं ऋतु और सत्य से अनन्त देश और अनन्त काल के आयाम स्फुट हुए तथा सावधि देश और सावधि कालजन्मा। 

(46) मेरे लिए गाँव मधुबनी चित्रों की फैक्टरी नहीं है, न पिकनिक की जगह, न आधुनिक नगर सभ्यता की देह पर रिसता हुआ घाव, न तेज बदलाव की भँवर में पड़ी हुई अधनगी जगली तरुणी की देह मेरे लिए गाँव एक विश्व है, अपने सम्पूर्ण 'स्व' की पहचान का एक निःश्वास साघ दर्पन है। इसी गो बोध के कारण मैं विनि वर्तमान में विश्वास नहीं करता।

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण लेखक ने मामीण सौन्दर्य बोध एवं भोले याम मानस के सहकार का हृदयस्पशी शिव प्रस्तुत किया है।

प्रसंग-इस गद्यांश में लेखक ने भारतीय गाँव के प्रति अपने दृष्टिकोण को रेखांकित किया है। व्याख्या-लेखक गाँव के प्रति अपने दृष्टिकोण को बताते हुए कहते हैं कि भारत में गाँव कहने का मेरे लिए आशय नहीं है कि वह मानो सौन्दर्य से आच्छादित मधुबनी चित्रों का कोई कारखाना हो । 

गाँव मेरे लिए कोई सुरम्य जगह भी नहीं है जहाँ पिकनिक मनायी जाए। मेरे लिए गाँव का स्वरूप ऐसा भी नहीं है कि मानो वह कोई आधुनिक नगरीय सभ्यता के शरीर में कोई रिसता हुआ घाव हो । मेरे लिए गाँव किसी तेज बदलाव की भँवर में पड़ी हुई अधनंगा जंगली तरूणी का शरीर नहीं है।

लेखक कहते हैं कि गाँव मेरे लिए एक विश्व के समान है गाँव मेरे लिए अपने आप में पूर्णता की पहचान का दर्पण है। गाँव का ऐसा ही स्वरूप मेरे मनमस्तिष्क पर विद्यमान है इसके फलस्वरूप ही मैं बिखरे हुए वर्तमान में विश्वास नहीं करता मैं सनातन रूप में विद्यमान वर्तमान में विश्वास करता हूँ।

विशेष-भारतीय गाँव में यथार्थ स्वरूप के प्रति अपना दृष्टिकोण बनाने का सुन्दर प्रयास लेखक ने किया है।

(46) विज्ञान की अपेक्षा कवि का दृष्टिकोण अधिक मानवीय होता है। वैज्ञानिक मनुष्य को भी पत्थर, मेढ़क और बन्दर की तुलना में रख उसे प्रकृति के धरातल पर ले जाता है और कवि प्रकृति का भी मानवीकरण कर उसे भाव-समन्वित बना देता है। काव्य में विज्ञान का सा सामान्यीकरण रहते हुए भी वैयक्तिकता और आनंद की मात्रा अधिक रहती है।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश बाबू गुलाबराय के निबन्ध 'काव्येषु नाट्यम रस्यम्' से अवतरित है। 

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने कवि के दृष्टिकोण की चर्चा की है। है।

व्याख्या-लेखक कहते हैं कि विज्ञान का दृष्टिकोण वैज्ञानिक होता है जबकि कवि मानवीय दृष्टि रखता है। वैज्ञानिक मानव को प्रकृति की अन्य वस्तुओं व जीवों की तुलना में रखकर उसे प्राकृतिक धरातल की ओर ले जाता है। 

जबकि कवि प्रकृति का भी मानवीकरण कर उसे भावानुकूल बना देने की सामर्थ्य रखता है। और काव्य के माध्यम से कवि वैज्ञानिक मानव को सामंजस्य करके व्यक्तिकता और आनंद की अनुभूति काव्य के माध्यम से कराती है।

विशेष—(1) विज्ञान व कवि के दृष्टिकोण में अन्तर को दर्शाया गया है। (2) भाषा प्रांजल है।

(47) मनुष्य के हृदयगत रसस्वरुप आनन्द की अभिव्यक्ति को कव्य कहते हैं। ब्रह्मानन्द और काव्यानन्द में केवल वहीं अन्तर होता है कि वह संसार-निरपेक्ष और पूर्णतया आत्मगत होता है। काव्य का आनन्द संसार निरपेक्ष तो नहीं होता किन्तु लौकिक से इस बात से भिन्न होता है कि उसमें व्यक्तिगत रहते हुए भी वह क्षुद्र स्वार्थों से ऊँचा उठा हुआ होता है।

संदर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश गुलाबराय जी के निबन्ध काव्येषु नाट्यम रम्यम् से अवतरित है। यहाँ निबन्धकार अपने देश के तरुण साहित्यकारों से अनुरोध कर रहा है।

व्याख्या-मनुष्य के हृदय में जो आनन्द की अनुभूति होती है वही असली काव्य है जिसमें रस की प्राप्ति हो ब्रह्मानन्द और काव्यानन्द में अन्तर है कि ब्रह्मा में लीन व्यक्ति अपने आराध्य को याद करके आनन्द की प्राप्ति कर लेता है । 

किन्तु काव्य में आनन्द की प्राप्ति काव्य का रसपान करना अर्थात् उनको सुनकर जो आनन्द की प्राप्ति होती है व अलौकिक होती है। वह व्यक्तिगत होता है। अपने क्षुद्र स्वार्थी से ऊँचा उठा होता है। व

(48) महाकाव्य में विषय का विस्तार तो उपन्यास का-सा रहता है किन्तु महाकाव्य आदर्शोन्मुख अधिक होता है। उपन्यास और नाटक में यथार्थ की मात्रा अधिक रहती है। उपन्यास जीवन का पूरा चित्र देने का प्रयास करता है। यद्यपि उपन्यास में भी चुनाव रहता है, तदपि नाटक में चुनाव की कला अधिक परिलक्षित होती है। 

संदर्भ- प्रस्तुत गद्यांश बाबू गुलाब राय द्वारा लिखित निबंध 'काव्येषु नाटकं रम्यम्' से लिया गया है।

प्रसंग—प्रस्तुत गद्यांश में लेखन ने महाकाव्य, नाटक और उपन्यास में अतर बताया है। व्याख्या- -प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक कहते हैं कि जिस तरह उपन्यास में विषम का वर्णन विस्तार पूर्वक होता है उसी प्रकार महाकाव्य में भी विषय का विस्तृत वर्णन हाता है। 

किन्तु महाकाव्य में नायक आदर्श व्यक्ति होता है। महाकाव्य में इस आदर्श चरित्र के सम्पूर्ण जीवन का विस्तृत और आदर्शयुक्त वर्णन होता है। जबकि उपन्यास और नाटक में यथार्य का चित्रण सर्वाधिक होता है। 

उपन्यास में भी नायक के सम्पूर्ण जीवन का चित्र अंकित करने की काशिश की जाती है। उपन्यास में चुनाव दिखाई देता है किन्तु नाटक में यह चुनाव की कला अधिक होती है। नाटक और उपन्यास में जीवन की यथार्य का चित्रण होता है। 

महाकाव्य में आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति का वर्णन होता है अर्थात् महाकाव्य आदर्शोन्मुख होता है

विशेष- -(1) महाकाव्य और उपन्यास तथा नाटक में अंतर बताया गया है। (2) भाषा सरल सुबोध है।

(49) हमने दुबले होने को अपनी नियति मान लिया है। कोई मोटा हो जाता है, तो हजार अंगुलियाँ उठने लगती हैं । लोग यह समझ रहे थे कि या तो मैं गाजा शराब के स्मगलिग में लगा हूँ या किसी सस्या का मंत्री बनकर चदा खा रहा हूँ, या कहीं से काला पैसा ले रहा हूँ, या घूसखोरी के लिए किसी का एजेण्ट हो गया हूँ। रोटी खाने से कोई मोटा नहीं होता, चदा या घूस खाने से मोटा होता है।

सदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हरिशंकर परसाई रचित 'बईमानी की परत' नामक निबंध से लिया गया है। 

प्रसंग-'बेईमानी की परत निबंध में परसाईजी ने भारत की तत्कालीन राजनीति पर व्यंग्य किया है। उनका कहना है कि वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति पर बेईमानी की परत चढ़ी हुई है। 

राजनीतिक, धर्म साहित्य तथा लगभग सभी क्षेत्र भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए हैं। जहाँ नजर पड़े वहीं भ्रष्टाचार नजर आता है। आम आदमी हर तरह से शोभित हो रहा है और अमीर और अमीर होता जा रहा है। इन्हीं सब परिस्थितियों का चित्रण इस निबंध में व्यापक रूप से लिया गया है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि दुबला होना हमने नियम बना लिया है क्योंकि कोई व्यक्ति मोट हो जाता है तो उस पर लोगों की उँगलियाँ उठने लगती हैं अर्थात् मोटा होना मतलब काला पैसा कमाना। 

लोग यही सोचते हैं कि मैं गलत काम करके पैसा काम रहा हूँ, शराब, गांजा बेच रहा हूँ या किसी संस्था में पदाधिकारी बनकर घूस लेता हूँ या लोगों के पैसे खाता हूँ, रोटी खाने से कोई मोटा नहीं होता आज घूस खाने से लोग मोटा होने लगे हैं ।

(50) मेरे दोस्त ने बताया कि जिनकी तोदें इन 17 सालों में बढ़ी हैं, जिनके चेहरे सुर्ख हुए हैं, जिनके शरीर पर मास आया है, जिनकी चर्बी बढ़ी है, उनके भोजन का एक प्रयोगशाला में विश्लेषण करने पर पता चला है कि वे अनाज नहीं खाते थे, चन्दा, घूस, काला पैसा, दूसरे की मेहनत का पैसा या पराया धन खाते थे। इसलिए जब कोई मोटा होता दिखता है, तो सवाल उठते हैं। कोई विश्वास नहीं करता कि आदमी अपनी मेहनत का पैसा कमाकर भी मोटा हो सकता है। 

संदर्भ-प्रस्तुत अवतरण हरिशकर परसाई के व्यंग्य लेख 'बेईमानी की परत' से अवतरित की गई है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में परसाई जी ने रिश्वत तथा अन्य गलत तरीकों से कमाये हुए धन पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या-इसमें लेखक के एक मित्र ने बताया कि पिछले 17 वर्षों में मोटे होने वालों ने ऐसी परम्परा डाली है कि लोग मोटा होने से डरते हैं, वह कहता है कि इन 17 सालों में जिन लोगों की खा-पीकर चर्बी बढ़ गई है, या लाल सुर्ख दिखाई देते हैं अथवा शरीर का माँस मोटा हो गया है । 

ऐसे लोगों के भोजन के विश्लेषण करने पर पता चला है कि वे अनाज नहीं खाते अनाज के स्थान प. चन्दा, घूस, काला धन और दूसरों की मेहनत की कमाई का पैसा खाते हैं। अब कोई यह विश्वास करता कि आदमी मेहनत करके और ईमानदारी से भी मोटा हो सकता है।

विशेष- (1) मोटे होने में रिश्वत और अन्य गलत तरीकों से कमाकर खाये गये धन का व्यंग्य किया गया है।

(2) आजादी के बाद लोगों के चारित्रिक पतन की ओर संकेत किया गया है। 

(51) इस देश की मशीनें भी चापलूसी करना सीख गयी हैं सिर्फ दस पैसे में कुछ ऐसी बातें कहती है-आपके विचार बहुत ऊँचे हैं। आप उनके अनुसार कार्य करें तो सफल होंगे। मैं कहता हूँ - सिस्टर कभी तो सच बोला करो। यह कोई तुम्हारा स्टैंडर्ड है कि सिर्फ दस पैसे में.. । मशीनों की राय पर ज्यादा भरोसा नहीं करता विशेषकर उन पर जो आदमी को तौलने के लिए जगह-जगह रखी हुई है। उनके मुंह में दस पैसे डाल दो तो तारीफ का एक वाक्य बोल देते हैं। 

सदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हरिशंकर परसाई द्वारा रचित 'बेईमानी की परत' नामक निबंध से लिया गया है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में परसाई जी ने रिश्वत तथा अन्य गलत तरीकों से कमाये हुए धन पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या-लेखक बताना चाहता है कि व्यक्ति पर सबसे अधिक प्रभाव चाहे वह अच्छा हो या बुरा पैसों का ही पड़ा है। यहाँ तक कि चापलूसी की प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया है और पैसा भगवान बन गया है। दशा तो यह हो गयी है कि इस देश की मशीनें भी चापलूसी करना सीख गयी हैं। मात्र दस पैसे उनके मुँह में डालो तो वे आपकी तारीफों के पुल बाँध देंगी। 

विशेषकर वजन तौलने की मशीन जो आपका वजन बताने के साथ-साथ 10 पैसों में आपकी प्रशंसा भी कर देंगी। यह कहकर कि आपके विचार बहुत ऊँचे है। आप उनके अनुसार कार्य करेंगे तो सफल होंगे। इसीलिए लेखक को मशीनों की राय पर ज्यादा भरोसा नहीं है। 

उसका कहना है कि ये मशीनें भला चाहकर ऐसी तारीफ नहीं कर रही हैं बल्कि इनको तो पैसा चाहिए। ये आदमी तौलने की मशीनें दस पैसे मुँह में रखकर झूठी तारीफ का एक वाक्य उगल देती है।

(52) ग्लानि से दुबला होने में देर लगती है, और पानीदार ही दुबला होता है। मुझे इस बूढ़े शरीर की व्यवस्था करनी ही होगी। शेरवानी को खुलवाना ही पड़ेगा। मैंने छोटे भाई से कहा। वह बहुत खुश हुआ और मोहल्ले में जितने लोगों को सूचित कर सकता था, कर आया कि मेरा भाई मोटा हो गया है। मैं डरा कि अभी लोग आएँगे और कहेंगे-सुना है साहब, आप मोटे हो गये। बधाई है। ईश्वर इसी तरह सबको मोटा करे। -

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण हरिशंकर परसाई के व्यंग्य लेख 'बेईमानी की परत' से अवतरित है। इसमें लेखक स्वयं को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि वह मोटा हो गया है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि ग्लानि होने पर व्यक्ति दुबला होता है और जिसमें शर्म लाज रहती है वही व्यक्ति दुबला रह सकता है। 

मुझे अपने इस बढ़े हुए (मोटे) शरीर को छुपाना ही पड़ेगा और अपनी तंग होती शेरवानी की सिलाई खुलवानी पड़ेगी यह बात मैंने अपने छोटे भाई से कही, यह सुनकर बहुत खुश हुआ और मोहल्ले में जितने लोगों को सूचित कर सकता था सूचना दे के आ गया। 

मैं डर गया और सोचने लगा कि कहीं लोग मोटे होने की बधाई देने को न आने लगे और कहें कि ईश्वर इसी तरह सबको मोटे करे। वह

विशेष-(1) व्यंग्यकार ने बेईमानी की कमाई करने वालों पर करार व्यंग्य किया है। (2) भाषा खड़ी बोली, व्यंग्य युक्त है। --

(53) दुर्बलता का मैं अभ्यस्त हो गया था। गर्वपूर्वक दुबला रह लेता था। कोई ऋषि मोटा नहीं हुआ। वे सब भूखे और क्रोधी होते थे। कोई उनके चरण न छुए तो उसे शाप देकर बन्दर बना देते थे। पर न मैं वैसा दुबला था न वैसा क्रोधी । 

मैं अजानुभुज और आकंठ टाँग वाला था यानि बैठने में टाँगे कण्ठ तक आ पहुँचती हैं। सोचता था, भुजाओं और टांगों का जो अतिरिक्त भाग है वह बाकी शरीर से चिपका दिया जाए, तो ठीक हो जाए।

 पुराने जमाने में सुन्दरियों के लिए ऐसी सर्जरी होती होगी कि इस अंग का कुछ भाग काटकर उस अंग में चिपका दिया। प्रमाण चाहिए तो बिहारी की यह पंक्ति काफी है—“कटि को कचन काटि के कुचन मध्य धरि दीन।” (इससे दोनों ठीक हो गये।)

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण हरिशंकर परसाई के व्यंग्य लेख 'बेईमानी की परत' से अवतरित है। 

प्रसंग - लेखक स्वयं को सम्बोधित करते हुए कहता है कि मैं दुर्बलता का अभ्यस्त हो गया था। 

व्याख्या -लेखक कहता है कि मैं दुर्बलता का अध्यस्त हो गया था। गु दुबलेपन में की अनुभूति होती थी क्योंकि ईमानदार ही दुबला रह सकता है। की कोई चि मोटा नही हुआ कविता दुबले-पतले, कमजार शरीर वाले व अत्यन्त काधी हात थे। 

अगर कोई उनक परण सा कता उस शाप देकर बन्दर बना देते थे। लेखक कह रहे हैं कि मैं वैसा हषि मुनियों के समान दुबला था न ही क्रोधी स्वभाव वाला। मैं लम्बी भुजाओं और आकंठ पैर वाला हूँ। बैठने  में मेरे टॉग कंठ तक आ पहुँचती है। 

मैं सोचता था कि मेरी भुजाओं और टाँगों का जो अतिरिक्त भाग है वह बाकी शरीर चिपका दिया जाए तो मेरा दुबलापन ठीक हो जाए। पुराने समय में सुन्दरिया के लिए या सजग होती होगी कि इस अंग का कुछ काटकर उस अग में चिपका दिया। 

प्रमाण के लिए बिहारी की यह पंक्ति काफी है- "कटि को कंचन कटि के, कुचन मध्य धरि दीन।' इस प्रकार नायिका क दाना मग ठीक हो गये।

विशेष-सुन्दर दिखने के लिए शरीर में सर्जरी करवाने वालो पर व्यंग्य किया गया है। 

(54) ठड शुरू होने पर मैने गरम शेरवानी निकालकर पहिनी तो देखा कि बटने नहीं लगती। पिताजी जब मेरे कपड़े सिलाने को देते थे, तो दर्जी से कह देते थे-जरा बढते शरीर का बनाना जब से अपने कपड़े बनवाने का जिम्मा खुद लिया है, हर बार दर्जी से कहना चाहता हूँ, जरा घटते शरीर का बनाना।

शरीर तब तक दूसरे पर लदा है, तब तक मुटाता है जब अपने ऊपर चढ़ जाता है तब दुबलाने लगता है। जिन्हें मोटे रहना है, वे दूसरों पर लदे रहने का सुभीता कर लेते हैं, नेता जनता पर लदता है, साधु भक्तों पर, आचार्य महत्वाकाक्षी छात्रों पर और बड़ा साहब जूनियरों पर।

सन्दर्भ एवं प्रसंग—प्रस्तुत गद्यांश हरिशकर परसाई की व्यंग्य रचना 'बेईमान की परत' अवतरित है। इसमें परसाई जी ने नेता, साधु, आधुनिक आचायाँ, बड़े साहवा पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या-परसाई जी कहते हैं कि सर्दी का मौसम प्रारम्भ होने पर शेरवानी निकालकर पहनकर देखी तो पता चला कि वह छोटी हो गई है और उसके बटन नहीं लगते है। 

पिताजी जब बचपन में कपड़े सिलवाने जाते थे तो दर्जी से कह देते थे कि जरा कुछ बड़े बनाना किन्तु लेखक जब से अपने कपड़े खुद सिलवाने लगा है वह कहता है कि जरा घटते शरीर के बनाना। क्योंकि वह मोटा नहीं होना चाहता है।

जब व्यक्ति स्वयं अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने लगता है तो वह मोटा नहीं सकता है। जो मोटे रहना चाहते हैं, वे दूसरों पर लदे रहने का उपाय कर लेते हैं जैसे -नेता, साधु, आचार्य और सरकारी अफसर सभी दूसरों पर लदे रहकर मुटियाते रहते हैं।

विशेष - भाषा खड़ी बोली कम्पमुक्ता है। नेता, साधु आचार्यों पर कड़ा व्यंग्य किया है। 

(55) एक और तरह की सर्जरी है, जिसमें बिना चाकू के पेट काटा जा सकता है। । वर्तमान में इस रक्तहीन सर्जरी ने काफी उन्नति की है। जो दस पाँच के पेट काट सके उसका पेट बड़ा हो जाता है। वे सारे पेट उसके पेट में चिपक जाते हैं। इस विधा के विद्यालयों में मुझे प्रवेश नहीं मिला, वरना मै भी यह सर्जरी सीख लेता और पेट चढा लेता।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हरिशकर परसाई की व्यंग्य रचना 'बेईमान की परत' अवतरित है। इसमें परसाई जी ने नेता, साधु, आधुनिक आचायाँ, बड़े साहवा पर व्यंग्य किया है।

प्रसंग-लेखक स्वयं का ईमानदार बताने की कोशिश किया है।

व्याख्या - लेखक ने अपने आप पर व्यंग्य करते हुए कहते है कि जो ईमानदार होते हैं वे दुब पतला होते हैं किन्तु बेईमान लोग मोटे होते हैं। अर्थात आज की वर्तमान सभ्यता में बेईमान : लोगों से रिश्वत ले लेकर मोटे होते जाते हैं और रिश्वत देने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत का हिर काटकर रिश्वत देता है। 

अतः लेखक कहता है कि मैंने मोटा होने वाले विद्यालय की शिक्षा नहीं लि इसलिए मैं पतला दुबला हूँ वरना मैं भी मोटा पेट वाला रहता। ।

विशेष-बेईमानी की कमाई करने वाले पर व्यंग्य। भाषा खड़ी बोली, व्यंग्य युक्त है।

एकाकी से व्याख्यात्मक प्रश्न


प्रश्न 2 निम्नलिखित गद्याशों में से किन्हीं तीन की व्याख्या कीजिए

(1) उस बेचैनी के खत्म होने का वक्त भी आ रहा है। देखो, ये तारे ढल रहे हैं। रात भर इन्होंने रोशनी की और अब वे आपनी आखिर घड़ियाँ गिन रहे हैं। हम भी गिन रहे हैं । लेकिन हमने उम भर अधेरा ही फैलाया। उजाले की कोई किरण नहीं रही। हम मौत को ही उजाला दे सके तो अपने को खुश किस्मत समझेंगे। सुबह हो गई क्या? 

संदर्भ - प्रस्तुत गद्यांश महानाटककार, एकांकीकार डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा लिखित 'औरंगजेब की आखिरी रात' नामक एकाकी से लिया गया है।

प्रसंग - प्रस्तुत गद्यांश में एकांकीकार ने औरंगजेब के आखिरी वक्त का वर्णन किया है जिसमें औरंगजेब अपनी बेटी जीनत से अपनी जीवन की आखिरी घड़ियों के बारे में बताता है। 

व्याख्या - औरंगजेब सारी रात अपनी सम्पूर्ण जिन्दगी में किये गये गुनाहों को बताता है और रात भर बेचैन रहता है और अब रात के आखिरी पहर में उसे महसूस होता है कि उस बेचैनी का समाप्त होने का समय आ गया है। 

अर्थात् औरंगजेब अपनी बेटी जीनत से (खिड़की की ओर संकेत करते हुए) कहता है कि देखो, रात भर ये तारे रोशनी की और धरती को अपनी रोशनी से रौशन करते रहे किन्तु अब ये अपने अंतिम पड़ाव पर हैं। अब ये ढलने वाले हैं। 

ठीक इसी तरह मैं भी अपनी जिन्दगी की आखिरी घड़ियाँ गिन रहा हूँ अर्थात् अब मेरी भी मृत्यु का समय आ गया है। हमने जीवन भर गुनाह किये हैं। सारी उम्र अंधेरा ही फैलाया है। ऐसा कोई काम नहीं किया जो लोगों की भलाई के लिए हो। 

औरंगजेब अपने आखिरी वक्त में पश्चाताप कर रहा है और कहता है कि अपनी मृत्यु से इस संसार को उजाला दे सके तो वह खुशनसीब होगा। आखिरी समय में औरंगजेब पूछते हैं कि सुबह हो गई क्या। क्योंकि उसे लगता है कि जैसे ही तारों का समूह सुबह होते ही छिप जाते हैं, वैसे ही वह भी अपने जीवन की अंतिम साँस लेगा।

(2) उपनिषद पढ़ने वाले दारा से सल्तनत छीनी क्या यह गुनाह है ? लेकिन कोई आवाज कानों में कहती है कि आलम ! तूने इस्लाम का नाम लेकर दुनिया को धोखा दिया है। तूने इस्लाम की हिदायतों को नहीं समझा । जीनत ! तू (तू पर जोर) बतला, यह आवाज ठीक है ? क्या हमने इस्लाम के उसूलों को गलत समझा ? 

संदर्भ - प्रस्तुत गद्यांश महानाटककार, एकांकीकार डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा लिखित 'औरंगजेब की आखिरी रात' से लिया गया है। ।

प्रसंग - इसमें एकांकीकार डॉ. वर्मा ने मुगल सम्राट आलमगीर औरंगजेब के अत्याचारी स्वभाव का उल्लेख किया है। मुगल सम्राट आलमगीर औरंगजेब अपनी पुत्री जीनत उन्निसा बेगम से अहमदनगर के किले में बीमार पड़े हुए कह रहे हैं,

व्याख्या - आलमगीर औरंगजेब, जीनत से बात करते हुए कहते हैं कि जीनत ! तुम मेरी बातों पर गौर करना। यों तो मैं इस समय बीमार पड़ा हुआ हूँ। अब मैं मौत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा हूँ। तुम्हें अच्छी तरह मालूम है कि हमने अपने जीवन में घोर अपराध किया है। 

हमने उपनिषद को पढ़ने वाले और उसे ही मान्यता देने वाले द्वारा जैसे शासक का राज्य हड़प लिया। क्या यह भी अपराध है। नहीं-नहीं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि ऐ-दरबार-ए-इलाही ! आप यह बतला दो कि क्या मैंने अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जो-जो भी कार्य किए हैं, वे सभी अपराध हैं ? खैर ! जो कुछ हो। 

अब मेरे कानों में यह आवाज बार-बार आती है कि आलमगीर! तुमने इस्लाम का नाम लेकर दुनिया के साथ विश्वासघात किया है। इसका मुख्य कारण यही है कि तुमने इस्लाम धर्म की हिदायतों का विपरीत अर्थ लेकर काम किया है। उन्हें तुमने ठीक-ठीक नहीं समझा।

विशेष - 1. उर्दू शब्दों की प्रधानता है। 2.शैली भावात्मक है।

3. मुगल सम्राट आलमगीर औरंगजेब की विक्षिप्त मानसिकता का उल्लेख किया गया है। 

4. अभिधा शब्द-शक्ति है।

5. करुण रस का संचार है।

(3) जिदगी उससे ज्यादा बीत चुकी है। देखती हो यह अधेरा ? कितना छावना कितना खौफनाक दुनिया को अपने स्याह परदे में लपेटे हुए है । गोया यह हमारी जिदगी हो इससे कमी सुद्धा नाही हा है जीनत ? अगर होगी भी तो वह इसके काले समदर जायेगी ਫਿਲਹੂ ਦਾ

संदर्भ-प्रस्तुत अवतरण हॉ. रामकुमार वर्मा को एकाकी रचना औरगजेड की आदिर सात उदधृत है।

प्रसंग-इस गद्याशा में लेखक ने औरगजट के आखिरी समय में उनकी मन स्थिति का किया है

व्याख्या-औरंगजेब अपने अंतिम समय में अपने पुराने समय का चाट करते हुए कहा है के इस समय रात से ज्यादा उनकी जिदी बीत चुकी है शात के अंधर को आरकत करत कर कि इस अधरी काली रात को देखकर लगाता है माला इलन पूरी दुनिया का अपना अपना नाम लेट है । 

मानो यह मरी ही जिंदगी है और इस अंधी जिदर्श को सुबह की नाही हाणी जोन अगर जिंदगी की कभी सुबह हुई भी तो भी यह काल समुदर के अंदर में फिर - इट जपणे हा इतना गहरा है कि वह सूरज को भी स्वाह कर टगा

(4) हकीमों ने हकीमों ने कुछ नहीं समझा कुछ नहीं समझा उन्होने यह डॉकी कोई मर्ज नहीं है, बेटी यह खाँसी सल्तनत के खाने की आवाज है जो हमारे दन के साथ उखाड़ना चाहती है (मुँह बिगाड़कर) उखडे कहाँ तक रोकेंगे हम ? (खाँसते हैं। केतने बलवाइये के नेलनाबूद किया कितने गदर रोके लेकिन लेकिन यह खाँसी नहीं रुकती बेटी, रुकेमीकै शिथिल स्वर में अब आलमगीर आलमगीर नहीं है।

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण हॉ. रामकुमार वर्मा को एकाकी रचना औरगजेड की आदिर सात उदधृत है।

प्रसग — प्रस्तुत अवतरण में एकांकीकार ने मुगलिया सल्तनत के बादशाह और जीवन के अन्तिम क्षणों की विवशता का चित्रण किया है

व्याख्या-बादशाह औरंगजेब अपनी पुत्री जीनत से अपनी बीमारी के बारे में दाल का है औरंगजेब कहते हैं कि हकीम हमारी टीमारी के द्वार में कुछ नहीं जान पाच परन्तु दोनाली के नहीं है। यह खाँसी की आवाज हमारे सल्तनत के उखड़ने की आवाज है - इस कद तक पाएँगे। अपने शासनकाल में कितने ही उपद्रवियों का हम समाप्त केट अजला करे लेकिन यह खाँसी नहीं रुकती बटी और रुकगीनी कैसे अब आलमगोर ई अल्गी नई है 

विशेष- 1 उर्दू शब्दों की प्रधानता।

(2) शैली भावात्मक है

(3) मुगल सम्राट आलमगीर औरंगजब की मानसिक स्थिति का उल्स है

(5) हमारे गुनाहों ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है जमीर की जजीरो ने की हमारे हाथ-पैर बे लिये हैं। हम अब इस दुनियाँ को आँख उठाकर भी नहीं देख सकते जिस लल्लन्ट को खून से सीच-सीचकर इतना बड़ा किया है उसे अगर आँसुओं से भी सोचना चाहे तो हमें पूरी जिन्दगी चाहे वह हमारे पास कहाँ है? 

सन्दर्भ- प्रस्तुत अवतरण हॉ. रामकुमार वर्मा को एकाकी रचना औरगजेड की आदिर सात उदधृत है।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों के पूर्व एकांकीकार ने विश्वका की है के बीना लथा पाउनुभो के कारण औरंगजब बेहोश हो जाते हैं उन्हें हाश में लाने के लिए हकीक दुल्यम जान है होर में आने के बाद औरंगजब इस बात का अफसोस जाहिर करते हैं के जीवन के अनमक कोई बेटा उनके पास नहीं है उन्हें दुख होता है कि उन्होंने अपने बेटेज इले कि उनके द्वारा कोई विद्रोह न खड़ा कर दिया जाय।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्तियों में औरंगजेब अपने बर्ट के भाग्य के साथ अपवाद तुलना करता है। उसका कथन है कि उसने अपने बटों को जंजीरों सडाँधलर ख ठीक उसी प्रकार पापों ने जंजीर बनकर आज उसे जकड दिया है जीवन के अन्तिम कणों में औराजद की स्थिति हो गई है कि वह संसार को आँख उठाकर भी नहीं देख सकता और अब खून उसके सिर पर चढ़ कर बोल रहा है। 

विशेष प्रस्तुत पंक्तियों में औरगजेच यह स्पष्ट अनुभव करता है कि कोई भी व्यक्ति अपने पापों के बाद उनके परिणामों से मुक्त नहीं हो सकता। एक न एक दिन अपने पापों के लिए उसे पश्चाताप करना ही पड़ता है।

(6) जीनत, जब हम पैदा हुए थे, तब हमारे चारों तरफ हजारों लोग थे, लेकिन लेकिन इस वक्त हम अकेले जा रहे हैं। हम इस दुनिया में आये ही क्यों ? इससे किसी की भलाई नहीं हो सकी। हम वतन और रैयत दोनों के गुनाह अपने सर लिये जा रहे हैं। 

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण हॉ. रामकुमार वर्मा को एकाकी रचना औरगजेड की आदिर सात उदधृत है।

प्रसंग-मुगलिया सल्तनत के बादशाह औरंगजेब अपनी मृत्यु के पूर्व अपने किये गये तमाम गुनाहों को अपने बेटी जीनत के सामने कह रहे हैं।

व्याख्या-औरगजेब अपनी पुत्री जीनत से कह रहे हैं कि जब हम पैदा हुए थे तब हमारे चारों तरफ हजारों लोग थे। लेकिन इस समय हम अकेले ही दुनिया को अलविदा कह रहे हैं। औरंगजेब अपने आपको कोसता हुआ कहता है कि हम इस दुनिया में आये ही क्यों ? 

हमने इस दुनिया में किसी का भला नहीं किया। हमसे किसी भी प्रकार की भलाई का काम नहीं हो सका। हम जाते समय अपने देश और जनता दोनों पर किये गये अत्याचारों का गुनाह अपने साथ लिये जा रहे हैं। 

विशेष—(1) अपने पूर्व-दुष्कर्मों का स्मरण ।

(2) मार्मिक शैली।

(3) उर्दू शब्दों की प्रधानता।

(7) हमने जिन्दगी भर इबादत का ढिंढोरा पीटा, लेकिन खुदा के पास तक नहीं पहुँच सके अगर पहुँच पाते तो चलते वक्त इतने गुनाहों का बोझ हमारे सर पर न होता । चलने का वक्त करीब आ रहा है। मुझे खुशी है कि आज जुमा है। हमने जिन्दगी भर इबादत कर यही चाहा कि जुमा हमारा आखिरी दिन हो। 

सन्दर्भ-प्रस्तुत अवतरण हॉ. रामकुमार वर्मा को एकाकी रचना औरगजेड की आदिर सात उदधृत है।

प्रसंग-मुगलिया सल्तनत के बादशाह औरंगजेब अपनी मृत्यु के पूर्व अपने किये गये तमाम गुनाहों को अपने बेटी जीनत के सामने कह रहे हैं।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्तियों में औरंगजेब का कथन है कि जीवन भर हमने धर्म के नाम का उपयोग कर लोगों को सताया किन्तु अपने पापों से मुक्ति नहीं मिली, न ही ईश्वर के दर्शन हुए। अगर हमें उसका दर्शन हो जाता तो हमारे सिर पर जो गुनाहों का बोझ रखा है ।

वह कम हो जाता, जब इस जीवन से मुक्ति पाने का समय करीब आते जा रहा है तो हमें जुमा की याद आती है और औरंगजेब अपने जीवन भर के गुनाहों का पश्चाताप करते हुए कहते हैं कि जुमा हमारा जीवन का आखिरी दिन होगा।

(8) “देखो, ये तार ढल रहे हैं। रात भर इन्होंने रोशनी की और अब वे अपनी आखिरी घड़ियाँ गिन रहे हैं। हम भी गिन रहे है, लेकिन हमने उम्र भर अघेरा ही फैलाया। उजाले की कोई किरण नहीं रही। हम मौत को ही उजाला दे सकें तो अपने को खुश किस्मत समझेंगे।" 

सन्दर्भ- प्रस्तुत अवतरण हॉ. रामकुमार वर्मा को एकाकी रचना औरगजेड की आदिर सात उदधृत है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में औरंगजेब ने अपने जीवन की तुलना रोशनी प्रदान करने वाले तारों से कर रहे हैं। ।

व्याख्या-औरंगजेब शहजादी जीनत से कहता है कि जिस प्रकार ये तारे समस्त संसार को रात भर रोशनी प्रदान करते हैं, परन्तु सूर्योदय होते ही विलुप्त हो जाते हैं, तारे भी अन्तिम घड़ियाँ गिनते हैं पर वे सृष्टि को प्रकाशित कर नेक काम करते हैं ।

परन्तु हमने सारी उम्र ऐसे कार्य किये हैं जिससे कि अधेरा ही व्याप्त रहा, रोशनी की कोई किरण ही दिखाई नहीं दी। पश्चातापपूर्ण औरंगजेब कहता है कि अगर आखिरी समय में हम मौत को ही उजाला दे सकें तो हमारा जीवन सफल व सार्थक हो जायेगा। खुदा हमें जन्नत बख्शेगा। खुदा की इबादत का वक्त आ रहा है।

विशेष प्रस्तुत गद्यांश में नश्वरता द्योतित है। उर्दू मिश्रित, भाषा खड़ीबोली हिन्दी है।

(9) जिन्दगी भर गुनाहों का बोझ उठाया है तो मरते वक्त उसका तजकिरा भी न उठावे? लेकिन जीनत! हमने सैकड़ों बार अपने दिल को दिलासा देने की कोशिश की। हमने गुनाह कहाँ किये? कुराने पाक की रूह से, शरअत से हस्लाम का नाम दुनिया में बुलन्द करने के लिए जिहाद के लिए, जो काम हमने किए क्या उसका नाम गुनाह है ? 

उपनिषद् पढ़ने वाले दारा से सल्तनत छीनी..क्या यह गुनाह है ?' नमूना-ए-दरबार हलाही में क्या मुझसे गुनाह हुए? आलमगीर जिन्दापीर लेकिन कोई आवाज कानो में कहती है कि आलम ' तूने इस्लाम का नाम लेकर दुनिया को धोखा दिया। 

तूने इस्लाम की हिदायतों को नहीं समझा। जीनत ! तू (तू पर जोर) बतला, यह आवाज ठीक है? क्या हमने इस्लाम के उसूलों को गलत समझा।

सदर्भ-प्रस्तुत अवतरण हॉ. रामकुमार वर्मा को एकाकी रचना औरगजेड की आदिर सात उदधृत है।

प्रसग-इसमें एकाकीकार हो रामकुमार वर्मा ने युगल सम्राट आलमगीर औरंगजेब के अत्याचारों का उल्लेख किया है। मुगल सम्राट आलमगीर औरंगजेब अपनी पुत्री जीनतुन्निसा बेगम से अहमदनगर के किले में बीमार पड़े हुए कह रहे हैं कि

व्याख्या-औरंगजेब अपनी पुत्री जीनत से कहते हैं कि जिन्दगी भर मैंने गुनाह किया है तो क्या मरते वक्त उस गुनाह की चर्चा भी न करूँ। लेकिन जीनत ! मैं अपने दिल के सैकड़ों बार दिलासा देता हैं कि हमने गुनाह जहाँ किये हैं। 

मैंने तो इस्लाम का नाम दुनिया में बुलन्द करने के लिए किए हैं। क्या यह गुनाह है ? उपनिषद् पढ़ने वाले से उसका राज्य छीना । क्या यह गुनाह है ? क्या यह इस्लाम धर्म में गुनाह है। इस पर जीनत कहती है-जो कुछ हो, ।

अब मेरे कानों में यह आवाज बार-बार आती है कि आलमगीर तुमने इस्लाम का नाम लेकर दुनिया के साथ विश्वासघात किया है, इसका मुख्य कारण यही है कि तुमने इस्लाम धर्म की हिदायतों का विपरीत अर्थ निकालकर काम किये हैं। उन्हें तुमने सही सही रूप में नहीं समझा।

औरंगजेब इसी को अपनी पुत्री जीनत से जोर देकर पूछता है कि जीनत ! क्या मैंने इस्लाम के उसूलों का पालन नहीं किया क्या मैंने उनका गलत अर्थ लगाया ?

विशेष-उर्दू शब्दों की प्रधानता है, शैली भावात्मक है, मुगलसम्राट आलमगीर औरंगजेब की विक्षिप्त मानसिक स्थिति का उल्लेख किया है।

(10) देखो आदमी के सामने बड़ी समस्या यह है कि वह आदमी बची-खुची शक्ति किस तरह काम में ले आये ? आदिम जगलीपन से लेकर आज तक की सभ्यता तक जो कुछ भी आदमी ने अपने को दुखी या सुखी बनाने के लिए किया है, वह उस शक्ति को काम में लाने के लिए। 

फिर सुख या दुःख तो इतनी ठोस चीजे हैं कि एक दिन तुम देखोगी कि यह शीशियों में बिका करेंगी, शीशियों में । मुझे इन टिसुए बहाने वालो से नफरत है, सख्त नफरत ! यह सिर्फ हारते ही नहीं है, यह तो अपनी हार के गीत गाते हैं नारे लगाते है।

सन्दर्भ-प्रसंग- प्रस्तुत गद्यावतरण श्री भुवनेश्वर प्रसाद द्वारा लिखित 'स्ट्राइक' एकांकी से अवर्ता है। श्रीचन्द अपनी पत्नी से वार्तालाप कर रहा है। उसकी बीबी उससे अपनी तबियत के विषय बताती है। इस पर श्रीचन्द कहता है

व्याख्या-आधुनिक युग में व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपर अतिरिक्त शक्ति को किस कार्य में लगाये। उस शक्ति का उपयोग वह किस रूप में करे। आदिम युग से लेकर आज के मध्य युग तक मानव ने इस शक्ति का किसी न किसी रूप में उपयोग अवश्य किया है। 

अपने जीवन के सुख की वृद्धि और दुःख के निवारण में इस शक्ति का उपयोग भी अनिवार्य था। लेकिन एक बात यह भी है कि सुख-दुःख की भावना जीवन के लिए कोई ठोस चीज नहीं है, इनका सम्बन्ध व्यक्ति की इच्छा-शक्ति पर निर्भर रहता है। 

थोड़े दिनों में व्यक्ति इन्हें (दुःख-सुख को) इतना नकार देगा कि फिर यह भावना शीशियों में बिकने लगेगी। मुझे ऐसे लोगों से सख्त घृणा है जो जरा से दुःख में आँसू बहाने लगते हैं और जरा से सुख में प्रसन्नता से नाचने लगते हैं। 

ऐसे व्यक्ति यूँ अपना सारा कार्य दूसरे लोगों को दिखाने के लिए करते हैं। ऐसे लोग अपने जीवन में कुछ हारते नहीं अपितु ये लोग हारने का नाटक अधिक करते हैं। ।

विशेष—(1) लेखक ने वर्तमान जीवन की सुख-दुःख की समस्या का सुन्दर चित्रण किया है (2) व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग। 

(11) शादी एक गहरी समस्या है। आप उसके साथ खिलावाड़ नहीं कर सकते। मैं पूछता हूँ आप फैक्ट्री में तो हर तरह का विज्ञान, कानून विशिष्ट ज्ञान लगाते हैं। फिर क्या कारण है कि जीवन को ऐसे परमात्मा के भरोसे छोड़ दिया जाए कि उसमें आदमी की सस्ती से सस्ती और निकम्मी से निकम्मी शक्तियाँ ही सिर्फ काम में लायी जाएँ। आप कहते हैं, मैं औरत को समझ नहीं पाता । 

जनाब यह सब कोरी बातें हैं, बातें। समझने की क्या जरूरत है ? मशीन की एक पुली दूसरी पुली को नापने, जोखने, समझने नहीं जाती। 

सन्दर्भ प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश महान एकांकीकार श्री भुवनेश्वर द्वारा लिखित एकांकी ‘स्ट्राइक' से उद्धृत है। इसमें एकांकीकार ने उस समय का उल्लेख किया है, जब एक युवक (पात्र) दूसरे पुरुष (पात्र) से शादी ज करने की बात कहता है। तब वह पुरुष 

व्याख्या-शादी एक सामान्य समस्या नहीं है; अपितु यह तो एक अत्यन्त गम्भीर और जटिल समस्या है इसलिए इसे साधारण रूप में न लें। इस प्रकार इसे आप एक खिलौना न समझें। इसे इस प्रकार आप कर भी नहीं सकते हैं। 

इसे आप इस प्रकार समझने की कोशिश कीजिए। आप अपने कल-कारखानों में विभिन्न प्रकार के विज्ञान, नियम-विधान और अपनी बुद्धि एवं कुशलता को हमेशा लगाते रहते हैं। लेकिन क्या आप यह बतला सकते हैं कि जीवन को ईश्वर के विश्वास पर छोड़ा जा सकता है। 

अगर हाँ, तो क्या आप यह बतलायेंगे कि उसमें आदमी की सबसे कमजोर शक्तियों को सस्ते रूप में लगाया जा सकता है।

पुरुष पात्र ने युवक पात्र को पुनः समझाते हुए कहा—आपका यह कहना है कि मैंने बार-बार कोशिश की है कि मैं औरत को समझ सकूँ, लेकिन उसे मैं नहीं समझा पा रहा हूँ। आपकी इस बात से मैं बिल्कुल भी सहमत नहीं हूँ। इसे तो मैं बिल्कुल ही झूठ और बिल्कुल ही बनावटी बात मानता हूँ। 

यह इसलिए कि औरत ऐसी कोई बड़ी जटिल वस्तु नहीं है जिसे समझना बड़ा ही कठिन है। यह तो सामान्य वस्तु है, जिसे बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। यह आप भली-भाँति जानते-समझते हैं कि कल-कारखानों की मशीनों की पुलियाँ परस्पर अलग रहती हैं। वे एक-दूसरे के विषय में जानने-समझने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं करती हैं।

विशेष—(1) स्त्री को जीवन की सामान्य वस्तु कहा गया है। 

(2) भाषा लाक्षणिक है।।

(3) व्यंजना शब्द-शक्ति है। 

(4) स्त्री-पुरुष को जीवन की मशीन' कहकर रूपक अलंकार प्रस्तुत किया गया है।

(5) शैली बोधगम्य है।

(12) “अरे भाई, क्या जीत, क्या हार ? यहाँ तो इसका कभी सपने में भी ख्याल नहीं करते। हम तो ईमानदारी से जीना चाहते हैं। मैं फिर कहता हूँ, जीवन एक कला है और सबसे बड़ी कला है।"

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी एकांकियों में पश्चिमी प्रभाव और तकनीक का समावेश करने वाले एकांकी-लेखक श्री भुवनेश्वर द्वारा लिखे गये 'स्ट्राइक' एकांकी से लिया गया है। 

प्रसंग-इस स्थल पर श्रीचन्द और उसके मित्रों की पारस्परिक चर्चा का चित्रण हुआ है। उसके मित्र क्लब में बैठे हुए, उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे और उसके आने के पूर्व वे ब्रिज में हार चुके थे। इसी सन्दर्भ में वे कहते हैं कि आप सदैव जीतने वाले भाग्यशाली हो। इसके प्रत्युत्तर में श्रीचन्द उपदेशात्मक और मस्ती भरी बात कहने लगता है।

व्याख्या-श्रीचन्द अपने मित्रों से कहता है कि भाई, अपना स्वभाव तो कुछ निराला ही है। हम न है तो किसी जीत की परवाह करते हैं और न किसी हार की। हम तो सदैव निश्चित रहते हैं, इधर-उधर की कोई बात सोचते ही नहीं। 

वह यह भी कहता है कि हम तो जिन्दगी को पूरी ईमानदारी से जीना ठीक समझते हैं और मैं तो यह कहता हूँ कि जिन्दगी जीना भी एक हुनर (कला) है। 

जो इसमें माहिर (निपुण) है, वह सुखी रहता है और जो माहिर नहीं है, उसे सुख की प्राप्ति नहीं होती। उसकी ऐसी बातों से उसकी बेपरवाही और कुछ-कुछ अहमन्या के भाव प्रकट होते हैं।

(13) आप मानते हैं कि हर आदमी की जाती जिदगी में दखल होना जरूरी है। जैसा प्राय कहता हूँ कि दुनिया सास की दुकान है और हर एक बालिग आदमी का कर्तव्य है कि उसका साझेदार हो। अगर इस कोशिश में आप अपनी जान नहीं खपा देते, तो आप मनुष्य कहलाने का कोई हक नहीं रखते।

सन्दर्भ- प्रसंग प्रस्तुत गद्यांस   महान  (कांतीकार श्री भुवनेश्वर लिखित एकाकी ‘स्ट्राइक' से है। इसमें ('काकीका भुवनेश्वर ने युवक को साझाते हुए पुरुष पात्र के माध्यम से दुनिया को एक साझे की दुकान बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या - आपका यह मानना है कि प्रत्येक आदमी की जिंदगी के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वह अपनी भिका अनुसार जातीय जिदगी को लिा। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो उसका जीवन किसी प्रकार से सार्थक और महत्वपूर्ण नहीं होगा। 

इस तथ्य को स्वीकारते हुए मैं यह कहना पाहता हूँ कि दुनिया को मगर गम्भीरतापूर्वक देखा जाए तो यह एक साझे की दुकान के समान ही दिखलाई देता है। इसके अतिरिक्त यह और कुछ नहीं दिखाई देती है। 

इस तथ्य को मैं पूरी तरह मानते हुए आप जैसे प्रौढ़ों को यही सलाह देना चाहता हूँ कि वह इस साझे की दुकान में शामिल हो। ऐसा करके वह अपने पतित्र कर्तव्य का पालन भलीभांति कर सकेगा। अन्यथा वह कर्तव्यहीन सिद्ध होगा।

अगर आप इस प्रकार का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं, तो मनुष्यता की श्रेणी में नहीं आ सकेंगे। कहने का भात यह है कि अगर आप अनुष्य कहलाना चाहते हैं तो आप इस साझे की दुकान में जी-जान से शामिल होने में तनिक भी देर न लगाइए।

विशेष- (1)शैली वर्णनात्मक है।

(2) अमिषा शब्द शक्ति है

(B) आषा उर्दू प्रधान शब्दों की है।

(14) तीस करोड़ के इस देश में आज तीस भी हँसने वाले नहीं हैं। इसका कारण केवल आर्थिक र. नहीं, नैतिक भी है। आर्थिक होता तो कम-से-कम मिल मशीन वाले, पूँजी और चोर बाजार वाले तो हँसते ? उनकी तिजोरियाँ भरी है पर मन खाली है। चरित्र बल अब हमारी धरती में नहीं है।

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांस महान (कांतीकार श्री भुवनेश्वर लिखित एकाकी ‘स्ट्राइक' से है। इसमें ('काकीका भुवनेश्वर ने युवक को साझाते हुए पुरुष पात्र के माध्यम से दुनिया को एक साझे की दुकान बतलाते हुए कहा है कि

प्रसंग-उपयुक्त अश में राजनाथ को भारतीय सस्कृति के प्रशंसक के रूप में निरूपित किया गया है। वह पाश्चात्य शिक्षा पद्धति से असंतुष्ट है। वह अपने पुत्र मोहन से कहते हैं ।

व्याख्या-पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के प्रचार-प्रसार ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को दूषित करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि तीस करोड़ के इस विशाल देश में किसी के चेहरे पर प्रसन्नता दिखाई नहीं देती है। 

शिक्षा वह है, जो हमें समस्त चिन्ताओं एवं कष्टों से मुक्ति दिला दे। हमारी इस स्थिति का मुख्य कारण नैतिक अधपतन है। आर्थिक कारण से हम परेशान नहीं हैं यदि हमारे चेहरे पर मायूसी है, जिराशा है, तो इसका कारण नैतिक है। 

यदि आर्थिक कारण से हम दुःखी एवं परेशान होते तो मिल मालिक, पूँजीपति, चोर बाजार वालों के पास धन का कोई अभाव नहीं रहता है। वे तो प्रसन्न रहते उनके चेहरे पर तो प्रसन्नता के भाव दिखाई देते। वस्तुतः आर्थिक कारण हमारी प्रसन्नता हमारी सुख सम्पन्नता में कतई बाधक नहीं है। 

वास्तव में आज हमारे मन में कोई उल्लास जही है, कोई उत्साह जहीं है, इसका प्रमुख कारण हमारा निराशावादी दृष्टिकोण है। यह निराशावादी दृष्टिकोण पाश्चात्य संस्कृति की देन है। इस पाश्चात्य संस्कृति हमारा सारा सुख चैन छीन लिया है। हमारे चारित्रिक पतन का कारण भी यह पाश्चात्य संस्कृति ही है।

(15) "राजनाथ यह तुमने कहा, जिसने इससे अच्छे दिन कभी देखे नहीं। पर मैं जो सब देख चुका हूँ. कभी नही कहता कि मेरे दिन बुरे हैं। जिस युग की हम उपज थे, जब वह चला गया तो उसकी उपत्ल कब तक टिकती ? 

राज्य मिट जाते हैं। बड़े-से-बड़े वीर और ज्ञानी किसी दिन मरते हैं, पर उनकी लौ जलती रहती है। व्यक्ति और मनुष्यता का मान वह लौ है। तुमने अपने बुरे दिन की बात कही और वह दया से पिघल उठा। जहाँ किसी भी रूप मे दया की माँग है, वहाँ व्यक्ति मर जाता है, जीता नहीं।

सन्दर्भ - प्रस्तुत गद्यांश लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित एकाकी ‘एक दिन' से अवतरित है प्रसग - प्रस्तुत गद्यांश म शीला के विवाह के संबंध में मोहन तथा उसके पिता राजनाथ के बीच हो रहे संवाद का वर्णन है।

व्याख्या- लेखक कहते हैं कि मोहन की नजर में शीला के लिए योग्य लड़का निरंजन ही लगता है लेकिन राजनाथ को यह पसंद नहीं है। निरंजन मोहन का मित्र है, जिसके पिता जी एक नामी वकील हैं। निरंजन एम.ए की पढ़ाई कर रहा है। उसकी मित्रता मोहन से तब हुई जब वे हॉस्टल में रहा करते थे। 

मोहन को अपनी कार में बिठाकर वह अपने कोठी में ले जाया करता था। इसी दौरान परिवार संबंधी बात होने पर मोहन ने उसे बताया कि उनके पूर्वज भी सौ वर्ष पहले राजा हुआ करते ये किन्तु आज उनके दिन बुरे हैं। 

इस बात की जानकारी राजनाथ को होती है तो वह मोहन को कोसते हुए कहता है कि तुमने निरंजन से ऐसी बातें कही। मैं इतने समय से सब कुछ देखते आ रहा हूँ लेकिन आज तक किसी से यह नहीं कहा कि मेरे बुरे दिन हैं । 

राजनाथ फिर कहता है कि जिस युग में पैदा हुए वह समय तो चला गया। हम जिनके वंशज हैं, वे भी चले गये। हमारे पूर्वज ही नहीं रहे तो हम उनकी संतान कब तक टिकते अर्थात् समय बदलते रहता है। राज्य मिट जाता है, बड़े-बड़े वीर, ज्ञानी मिट जाते हैं। 

हम तो साधारण मानव हैं लेकिन उनके द्वारा किये गये अच्छे कार्य एक लौ की भाँति जलती रहती है। यही लौ व्यक्ति और मानवता का मान, सम्मान है। निरंजन से तुम बुरे दिन की बात कही और वह दया से पिघल गया। 

जहाँ कहीं भी किसी भी रूप से यदि दया की माँग होती है, वहाँ व्यक्ति सिर ऊँचा करके सम्मान के साथ जी नहीं पाता बल्कि उसकी स्थिति एक मृत व्यक्ति के समान हो जाती है। मान-मर्यादा के बिना व्यक्ति का जीवन मुश्किल हो जाता है।

(16) लड़कियों का स्वयंवर यहाँ होता था, पर चुनता कौन था, कन्या या वर ? एक कन्या के लिए सैकड़ों युवक आते थे। रूप, गुण और पौरुष में जो बड़ा होता, उसे कन्या चुनती, जय माला जिसके गले में पड़ती, वह अपने भाग्य से फूल उठता । उस युग में कन्या की यह मर्यादा थी, आज क्या है ? स्त्री जाति जितने नीचे पिछले दस वर्षों में गयी है। उतने पहले कभी नहीं गयी थी। 

संदर्भ एव प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश महान एकांकीकार श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा लिखित एकांकीएक दिन' से उद्धृत है। इसमें स्त्री जाति के उपेक्षा को समझाने का प्रयास किया है।

व्याख्या-प्राचीन काल में स्वयंवर की प्रथा चलती थी जिससे कन्या वर अपना जीवन साथी स्वयं चुनता था, एक कन्या के स्वयंवर में सैकड़ों युवक भाग लेते थे। जो युवक पौरुष सभी गुणों में सम्पन्न होता था, उसे कन्या अपना वर चुनती थी और अपने आप में गर्व महसूस करती थी। 

किन्तु आज वर्तमान समाज में स्त्री जाति की अवहेलना करते हुए उसे दहेज की तराजू में तोला जाता है और कन्या की मर्यादा अभी कुछ वर्षों में अत्यन्त ही दयनीय हो गई है।

(17) जी वे भाषण न दे सकी । (मुस्कराती हैं ।) दशरथ को ललकार न सकी । रामचन्द्र से न कह सकी कि तुम अपने पिता के धर्म के लिए वन जा रहे हो, मेरे रूप और यौवन की ओर नहीं देखते, की नारी यही कहेगी। पर आपने मुझे इस युग की चकाचौंध में जाने भी नहीं दिया। 

मुझे तो जानकी के त्याग में ही उसका सबसे बड़ा अधिकार दीख पड़ा है। यह अधिकार अब तक नहीं मिटा, कभी नहीं मिटेगा। अकेली एक जानकी में इस देश की नारि-जाति लय हो चुकी है, 

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश सुप्रसिद्ध एकांकीकार श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र लिखित एकांकी 'एक दिन' से है। इसमें एकांकीकार श्री मिश्र ने उस समय का उल्लेख किया है, 

जब राजनाथ ने अपनी प्रिय बेटी शीला को आधुनिक विदेशी सभ्यता और संस्कृति से प्रभावित हो रहे भारतीयों का उल्लेख किया। इसके साथ ही जब उसने जानकी को धर्मभीरू, बुद्धिहीन, साहसहीन और व्यक्तिहीन कहा, तब शीला ने बड़े ही स्पष्ट रूप से कहा है

व्याख्या-आप कहते हैं कि जानकी में बुद्धिहीनता है, साहसहीनता है और व्यक्तित्वहीनता है, तो इसका मुख्य कारण है कि वे आजकल के राजनेताओं की तरह भाषण नहीं देती रहीं। अपने भाषण के माध्यम से तत्कालीन शासक राजा दशरथ को ललकार न सकीं। उन्होंने अपने पति- -परमात्मा से इतना भी नहीं कहा कि आप अपने पिता धर्म का पालन करने के लिए ही वन में जा रहे हैं; 

आप मेरे लिए वन नहीं जा रहे हैं अगर आप मेरी सुन्दरता और मेरी मदमाती युवावस्था का पत्रिक भी मीर करते, तो आप वन में जाते ही नहीं। आप अयोध्या में ही रह जाते इस प्रकार की बात सायंका, आरी अपने जीवन-साथी से कहकर अपने पतिव्रत धर्म का निर्वाह करना चाहेगी।

शीला ने अपने पिता राजनाथ से पुनः कहा कि आपने इस युग के अलाई छुटाई का बहुत  ही नजदीक से देखा है। ऐसा होने पर भी आपने मुझे इस युग में प्रदेश नहीं करने दिया। इस प्रकार मुर इस युग के चमत्कार और प्रभाव से दूर ही रखा। 

आपकी सोच-समझ से जानकी भले ही कुछ मेरे विचार से तो जानकी बहुत ही अधिळ त्यागाशील और सहनशील टिलाई टली है, इसी में ही उसकी सारी श्रेष्टता और उसका सबसे बड़ा अधिकार दिखाई पड़ता है इस प्रकार जानकी का प्रशिकार प्राप्त किये हैं, दे आज भी कायम है 

अर्थात उसका प्रभाव अद भी है और आज भी रहेगा या जानकी की विशषता, आज हमारे देश की सारी बारियों की विशेषताओं में डिग्री हुई है।

विशेष-(1) भाषा सरल है 

(2) शैली व्यंग्यात्मक है।

(3) व्यंजना शब्द-शक्ति है 

(4) जानकी के माध्यम से भारतीय नारी का महत्वाका किया अया है। 

(5) यह अंश ज्ञानवर्द्धक है

(18) इस युग में हम अपना सब कुछ दिदेशी आँखों से देख रहे हैं स्वतन्नता का स्या हम मात्र रहे हैं, अपने को भूलकर अपने गुण और अपनी मान्यताओं को भूलकर आटो चलने में जो पीठ घूमका देखते नहीं थे, 

वही अब दूसरों के पीछे सरपट दौड रहे हैं। स्वतन्त्र भारत की स्वतन बारीको अन सा गुड फाड़ फेंकना है। जानकी उसके लिए बड़ी भोली और धर्मभीर है। उसमें बुद्धि की कमी है, साहरा की कमी है, व्यक्तित्व की कमी है। 

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश एकाकीकार श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा लिन्द्रित टाळी देव

प्रसंग इस गद्य में राजनाथ अपनी पुत्री शीला से वार्ता कल टु वर्तमान दशा भटकदार्ट संस्कृति पर दो करह हैं।

व्याख्या-राजवाय अपनी पुत्री शीला से तर्क करते हुए कहा कि आज पुर भारत चश्मों से अपना दर्तमान देख रहा है। हम स्वतन्त्र हैं और निरन्ट इस पर दुल अहिर करते हैं 

मूलतः स्वतन्त्रता का क्या अर्थ है, हम भूल चुके हैं हम आय बढ़ रहा है, पर यानि इलटेड पीछे देखना भूल गए हैं और पाश्चात्य संस्कृति का अधादुकरा कर रह हैं पर टन माटो नारियों को स्वतन्त्र विचार रखन होग, उन्हें देदतिक पतनताका त्याग करना चाह में जानकी सीता जैसे चरित्र उत्कृष्ट हान के नाटजूद आउ कंपार्टी के लिए क्रममा दलि दर्तमान पीढी सीता को माली, धर्म से डरत टाली, अलबुद्धि, कमजार, या कलाकात दाली एक याणिक पात्र मात्र समझाती है यह व्याख्या गलत होने  पर भी आज के वर्ग कि     धारणा है , 

 विशेष (1) भाष आमदालचाल की है

(2) विचारप्रधान शैली

(3 ) वर्तमान युवा पीढ़ी पर प्रश्न चिन्ह

(19) स्त्री पुटष की असावधानी को उसके अल्डङयन को प्रेम करती है जिसमें वह अपने प्राण का में सजग नहीं रहता, सकट से जूझता रहता है जिसमें वह ऐसी गहरी नीट सोता है, स्त्री का अवसर मिल कि उसे दह प्राण में उठा ले, आँखों में बन्द कर ले। कल रात भर आप जाबात रह अभी बाहदशा टा आगे दशा क्या होगी?

संदर्भ-प्रस्तुत अद्याप कुप्रसिद्ध एकाकीटकार श्री लवनी वायायाम मिश्र द्वारा  लिखित एकांकी एक दिन से हैं।

प्रसंग—इस गद्यांश में लेखक शीला नामक पात्र के माध्यम से स्त्री की मनोदशा का चित्रण कर रहे हैं।

व्याख्या–निरंजन के सन्देह को भांपकर उसे दूर करने के लिए शीला कहती है कि स्त्री किसी भी पुरुष की असावधानी और उसके अल्हड़ को प्रेम करती है। वह अल्हड़ स्वभाव जिसमें पुरुष असावधान रहता है, संकटों का सामना करता है। 

ऐसी असावधानी जिसमें पुरुष सब कुछ भूलकर गहरी नींद सो रहा हो और उसी क्षण में स्त्री पुरुष की अपनी आँखों में बन्द कर लेती है। कल रात भर जिस सन्देह के कारण आप जागते रहे हैं वह सन्देह हमारे भावी जीवन के लिए सही नहीं है। क्योंकि स्त्री एवं पुरुष का सम्बन्ध आपसी विश्वास एवं समझ पर ही निर्भर करता है।

(20) स्वतंत्रता का उत्सव हम मना रहे हैं। अपने को भूलकर अपने गुण और अपनी मान्यताओं को भूलकर आगे चलने में पीछे घूमकर देखते नहीं थे, वहीं अब दूसरों के पीछे सरपट दौड़ रहे हैं । स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र नारी को अब सब कुछ फाड़ फेंकना है। 

संदर्भ-प्रस्तुत अद्याप कुप्रसिद्ध एकाकीटकार श्री लवनी वायायाम मिश्र द्वारा  लिखित एकांकी एक दिन से हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत अंश में हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बसंत ऋतु के आगमन पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को बताया है।

व्याख्या-लेखक कह रहे हैं कि पढ़ना और साहित्य लिखना यही उनका व्यवसाय है। अपने इसी व्यवसाय के दौरान विभिन्न पुस्तकों और साहित्यों के जरिए उन्हें देश दुनिया की थोड़ी बहुत जानकारी है। 

इनका कहना है हिन्दुस्तान के जवानों में कोई भी जोश और उमंग नहीं है जबकि लेखक के अनुसार पेड़-पौधों का जोश हिन्दुस्तान नौजवानों से भी कम होता है। यही कारण है कि बसंत ऋतु के आगमन के बाद भी इन पेड़-पौधों द्वारा कोई उत्साह प्रदर्शित नहीं होता। 

कभी-कभी यह लगता है कि इन पेड़-पौधों के पास भी बसंत ऋतु के आगमन की सूचना पहुँचाने का कोई साधन होना चाहिए। महुआ के फूल सबसे बाद में फूलते हैं, इसीलिए ऐसा लगता है कि उन्हें बसंत के आगमन का अनुभव के सबसे अंत में होता है। किन्तु जामुन को सभी भूल जाते हैं। जामुन भी तो सबसे बाद में फूलता है।

(21) जानकी का युग इस देश से कभी नहीं मिटेगा। मैं जानकी हूँ। इस देश की कोई भी स्त्री जानकी है। जब तक हमारे भीतर जानकी का त्याग है, जानकी की क्षमा है, तब तक वही है। तुम्हारे लिए जानकी पौराणिक है इसलिए असत्य है। मेरे लिए वह भावगम्य है। उनके भीतर मेरी सारी समस्याएँ, सारे समाधान हैं। राम में तुम अविश्वास कर सकते हो, जानकी में अविश्वास का अधिकार तुम्हें नहीं है। 

संदर्भ-प्रस्तुत अद्याप कुप्रसिद्ध एकाकीटकार श्री लवनी वायायाम मिश्र द्वारा लिखित एकांकी एक दिन से हैं।

प्रसंग-उक्त गद्य खण्ड शीला नामक पात्र के द्वारा कहा गया है जब मोहन शीला को जानकी नहीं होने की बात कहता है तो उसका उत्तर देती हुई वह कहती है।

व्याख्या-मोहन द्वारा कटाक्ष में जानकी न होने की बात को सुनकर शीला तुरन्त जवाब होते हुए कहती है कि जानकी का युग इस देश से कभी नहीं मिटेगा मैं स्वयं जानकी हूँ। इस देश की कोई भी स्त्री जानकी है। 

क्योंकि जब तक हमारे भीतर जानकी का त्याग है, जानकी की क्षमा है जब तक वही है। तुम जानकी को केवल पौराणिक कथा के रूप में जानते हो इसलिए तुम्हारे लिए जानकी असत्य है। मेरे लिए तो वह भावागम्य है। 

मैं जानकी में अपने को ही देखती हूँ। तभी तो मेरे भीतर मेरी सारी समस्याएँ सारे समाधान उनके ही भीतर है। रात में तुम अविश्वास कर सकते हो कहने का मतलब तुम किसी बात में अविश्वास कर सकते हो, परन्तु जानकी मैं अविश्वास का अधिकार तुम्हें नहीं है। 

विशेष-1. शीला भारतीय संस्कृति की सम्पोषक है ।

2. उसे स्वाभिमान से जीना प्रिय है।

3. भाषा में लाक्षणिकता सहज रूप से आ गई है।

(22) कमाया है तो फायदा। न तीरथ, न प-तप, न धर्म। कभी हरिद्वार भी न ले गए। मैं तो तुम्हारा पैसा जानती ही नहीं। चार कोठियाँ हैं और हम इस गली में पड़े सड़ रहे हैं। आज तीन चार लाख रुपये के मालिक हो। एक पैसा भी कभी दान नहीं किया। ऐसा रुपया किस काम का ?

संदर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री उदयशंकर भटट द्वारा लिखित 'दस हजार' से उधृत की गई है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में सेठ विसानाराम की पत्नी सेठ की कृपणता पर उसे उलाहना दे रही है। 

व्याख्या- आपने बहुत पैसे कमाए हैं और आपने बहुत लाभ भी कमाया। लेकिन यह बहुत ही अफसोस की बात है कि आपने न कोई तीर्थ, व्रत, जप-तप और धर्म किए हैं। यहाँ तक कि आप कभी हरिद्वार भी नहीं गए हैं और न मुझे ही ले गए हैं। 

यही कारण है कि मैं आपके कमाए हुए पैसों का तनिक भी महत्व नहीं देती हूँ। आपने चार कोठियां बनायी हैं, लेकिन यह बहुत दुख और शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि हम लोग अब भी इस गली में सड़े हुए जीवन को बड़ी ही मजबूरी में बिता रहे हैं। 

आपकी हैसियत आज कम से कम तीन चार लाख रुपये की है, लेकिन अफसोस की बात है कि आपने एक पैसे का भी दान किसी को नहीं दिया है। इसलिए यह कहना सर्वथा समुचित ही है कि आपके पास जो रुपये हैं, वे बिल्कुल ही निरर्थक या अनुप्रयोगी हैं। 

विशेष—(1) व्यंजना शब्द-शक्ति, शैली व्यंग्यात्मक, सेठ जी की कृपणता पर सीधा प्रहार । 

(23))आज चार दिन में मैं इनका रूप देख रही हूँ, कहूँ हूँ रुपये के पीछे लड़के को हाथ से न खोओ, रुपया तो हाय का मैल है। दस हजार क्या बड़ी बात है। पर इन्हें तो न जाने क्या हो गया है। खांड और सूद से इनका विचार छूटे, तब न ! मुनीम जी, मैं तुम्हारे पैर पहूँ, मेरे सुन्दर को ला दो।"

सन्दर्भ-प्रसंग —प्रस्तुत गद्यांश सुप्रसिद्ध एकांकीकार श्री उदयशंकर भट्ट लिखित एकांकी ‘दस हजार' से है। इसमें उस समय का उल्लेख है जब मुनीम ने सेठ विसाखाराम की हाँ में हाँ मिलाते हुए

कहा कि लड़का आ जाए। इसे सुन करके सेठानी और राजो की माँ ने मुनीम से इस प्रकार कहा

व्याख्या-मुनीम जी मैं आज चार दिनों से ही इनके रूप-प्रतिरूप को देख और समझ रही हूँ। मैं कैसे अपने मुँह से कहूँ कि रुपये को महत्व देते हुए लड़के को नहीं खोना चाहिए। 

दूसरे शब्दों में, यह कभी नहीं चाहती कि रुपया को बचा लूँ और लड़के को खो दूं यह इसलिए कि रुपया तो आता-जाता रहता है। इसलिए दस हजार हमारे लिए कोई बड़ी चीज नहीं है। लेकिन मैं तो यह बिल्कुल ही नहीं समझ पा रही हूँ कि इन्हें क्या हो गया है और क्या नहीं हो गया है। 

मुनीम जी ! यह खांड और सूद से जब फुरसत पायेंगे तभी शायद कुछ कर पायेंगे। इसलिए मुनीम जी ! मैं आपसे बार-बार यही प्रार्थना कर रही हूँ कि आप मेरे प्यारे सुपुत्र सुन्दर को किसी न किसी तरह से अवश्य ला दीजिए। इसके लिए मैं आपके प्रति सदैव कृतज्ञ रहूँगी।

विशेष-(1) राजो की माँ की सच्ची वात्सल्य भावना झलक रही है। 

(2) भाषा सुबोध है।

(3) शैली भावात्मक है। 

(4) एकांकीकार का व्यापारियों के ऊपर व्यंग्य प्रहार स्पष्ट हो रहा है। 

(5) यह अंश हृदयस्पर्शी है।

(24) "लो, यह पढो । कैसा दुष्ट है लड़का । जरा भी लड़ाई नहीं करी। डोली में नई बहू की तरह उनके साथ चला गया, मेरी छाती पै मूंग दलने ? कहाँ से लाऊँ दस हजार ? दस हजार ? (चिट्ठी मुनीम के हाथ में देकर) लो पढ़ो, सब बराबर कर दिया। भला बाहर गया ही क्यों ? (लेट जाता है।)

सन्दर्भ-प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश सुप्रसिद्ध नाटककार एवं एकांकीकार श्री उदयशकर भट्ट द्वारा लिखित एकांकी 'दस हजार' से अवतरित है। इसमें एकांकीकार ने सेठ विसाखाराम के अपने मुनीम के प्रति उस कथन को व्यक्त किया है 

जिसमें उसने अपने पुत्र सुन्दरलाल की बुजदिली का उल्लेख किया है। सेठ विसाखाराम अपने पुत्र सुन्दरलाल की बुजदिली का उल्लेख करते हुए अपने मुनीम से कह रहा है कि

व्याख्या—मुनीम जी ! आप पठानों के खत की बात कर रहे हैं, तो लीजिए उनका यह खत पढ़ लीजिए। आप देखिये, कितना बड़ा दुष्ट और नालायक लड़का है यह। उन लोगों के साथ तनिक भी विरोध नहीं किया। उनके साथ वह वैसे ही चला गया जैसे कोई नई बहू अपनी ससुराल चली जाती है। 

इस प्रकार का शर्मनाक काम करके उसने हमारी छाती पर मूंग दलने जैसा काम किया है। उन लोगों की माँग दस हजार रुपयों की है। आप ही बताइए कि मैं कहाँ से और कैसे दस हजार रुपयों का ।

हिन्दी साहित्य (द्वितीय पजन्य कल इस प्रकार यह कहते हुए सेह विसाधाराम जे मुनीम के हाथ में पहालों का खत देकर उसे पढ़ने के लिए उससे कहा फिर उन्होंने अफसोस प्रकट करते हुए कहा कि मेरे इस नालायक लड़के ने मेरा रख कुछ खेकार कर दिया। यह नहीं समझा पा रहा हूँ कि वह बाहर गया ही क्यों ? 

विशेष (1) भाषा सरल है।

(2)शैलो भावात्मक है।

(3) करुण रस का संचार है।

(25) मेरे बच्चे कितने भी गन्दे, बत्तमीज, लड़ाकू हों, मुझे मजूर है; लेकिन ये चोरी करें. झूठ बोले, मैं इन्हें जिन्दा नहीं रहने दूंगा, मार के मर जाऊँगा, इन्हीं के सग। (रुककर) मुशी जी ! मुझे पता है,चोरी के कोडे कहाँ से मिले है, मेरे बच्चों को। 

सदर्भ- प्रसंग-पस्तुत गयांश महाएकांकीकार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल लिखित एकांकी 'मम्मी उकुराइज' शीर्षक से उधृत है। इसमें एकांकीकार जे टिकट बाबू के उस कथन का उल्लेख किया है जिसमें उसने अपने बेटे द्वारा उसकी पेंट से पैसे चुराने की बात सुनी और इससे वह उबल पड़ा। टिकट बाबू ने स्पष रूप से कहा

व्याख्या- मेरे बच्चे चाहे कितने भी गन्दे और नालायक हों. इसे मैं स्वीकार करता हूँ। मेरे बच्चे चाहे कितने भी लइजे-झगड़ने वाले हों, इसे भी मैं स्वीकार कर रहा हूँ। लेकिन मुझे यह किसी प्रकार से स्वीकार नहीं है कि वे चोरी करें और झूठ बोलते रहे। 

इस तरह मैं इन्हें किसी प्रकार से जिन्दा नहीं रहले दूंगा यह मेरा बिल्कुल दृढ निश्चय है। मैं जब इन्हें इस तरह कुपथ पर चलते हुए देशृंगा, तब मैं इन्हें समाप्त कर दूंगा, फिर स्वयं को भी समाप्त कर लूँगा। 

कुछ ठहरकर टिकट बाबू ने फिर कहामुंशी जी ! मुझे यह भली-भाँति ज्ञात है कि झूठ बोलने और सिखाने एवं चोरी-करवाजे के तत्व कहाँ से और कैसे मिल गये हैं. मेरे बच्चों को।

विशेष-1 टिकट बाबू की व्यथा का स्वाभाविक उल्लेख है 2) हिन्दी-उर्दू की मिश्रित शब्दावली है। (शैली भावात्मक है। (4) वाक्य-गज्ज सरल और सुबोध है। (5 लक्षणा शब्द-शक्ति है।

(26) जी हाँ, मास्टर साहब ! आप लोगों ने तो हम पर फूल बरसा दिये। हम सीधे हैं, तभी तुम्हारी नजरो में हम गन्दे और बदतमीज है। जादू-टोना डालते हैं हम, लेकिन एक बार फिर से सोच लो मास्टर साहब, अपनी जिन्दगी के बारे में। जो तुम जी रहे हो, वह तुम्हारी जिन्दगी नहीं है, नकल है, नाटक है, दिखावा है।

सन्दर्भ - प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश महाएकांकीकार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल लिखित एकांकी 'मम्मी ठकुराइन' शीर्षक से उद्धृत है। इसमें एकांकीकार डॉ. लाल ने टिकट बाबू के माध्यम से आधुनिक शिक्षित व्यक्तियों के अनैतिक और अशोभनीय व्यवहार पर सीधा व्यंग्य प्रहार किया है। टिकिट बाबू प्रोफेसर पर कटाक्ष करते हुए कह रहा है.

व्याख्या--हाँ प्रोफेसर साहब ! हौं जी ! मास्टर साहब ! आप लोगों ने हम लोगों पर आज जिस प्रकार से फूलों की वर्षा की है, उसे हम लोग भली-भाँति समझ चुके हैं। आपने यह भली प्रकार समझ लिया है कि हम लोग बिल्कुल ही सीधे-सादे हैं। 

इसलिए किसी बात को हम लोग बिल्कुल ही नहीं समझते हैं। आपकी नजरों में तो हम लोग बहुत ही गन्दे और उद्दण्ड व्यक्ति हैं। यही नहीं, आप तो हम लोगों के बारे में यह भी सोचते-समझते हैं कि हमी लोग जादू-टोना किया करते हैं। 

लेकिन हम लोग अब आपको सोचने के लिए यह मौका दे रहे हैं कि आप अपनी जिन्दगी के विषय में गम्भीरता से सोच लीजिए। आप जो जिन्दगी जी रहे हैं, उसे टटोलिये। ऐसा जब आप करेंगे तो आप यह अवश्य पायेंगे कि आप जो जिन्दगी जी रहे हैं, वह वास्तव में एक जकली जिन्दगी है। वह एक बहुत बड़ा ढकोसला और छल है।

विशेष—(1) भाषा सरल और प्रवाहमयी है। (2) शैली व्यंग्यात्मक है। (3) व्यंजना शब्द-शक्ति है।

(4) आधुनिक शिक्षित वर्ग पर सीधा व्यंग्य कटाक्ष है। 

(27) “खूब जानते हैं हमारी पोजीशन ! जिस दिन तुमने मुझे यहाँ ला बसा दिया, उसी वक्त हमारी पोजीशन जाहिर हो गई। सारी आदतें बच्चों की खराब हो गयीं । गन्दगी पसन्द हो गये बच्चे । सदा रोनी सूरतें बनाकर घूमने लगे। पढ़ने-लिखने से जी चुराने लगे।" 

सन्दर्भ -प्रस्तुत गद्यांश महाएकांकीकार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल लिखित एकांकी 'मम्मी ठकुराइन' शीर्षक से उद्धृत है। इसमें एकांकीकार डॉ. लाल ने टिकट बाबू के माध्यम से आधुनिक शिक्षित व्यक्तियों के अनैतिक और अशोभनीय व्यवहार पर सीधा व्यंग्य प्रहार किया है। टिकिट बाबू प्रोफेसर पर कटाक्ष करते हुए कह रहा है.

प्रसंग - प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने मम्मी के माध्यम से आवास समस्या से उत्पन्न परेशानी को संकेतित किया है।

व्याख्या - मम्मी प्रोफेसर साहब पर तीखा व्यंग्य प्रहार करते हुए कहती हैं कि जब से आपने इस मुहल्ले में लाकर बसाया है तब से हमारी इज्जत जाहिर हो गयी है। हमारे बच्चों की सारी आदतें बिगड़ गई हैं। माता-पिता को वे कुछ नहीं समझते, पढ़ने-लिखने में तो उनका जरा भी मन नहीं लगता।

विशेष - भावात्मकता एवं कलात्मकता की दृष्टि से सफल व सार्थक ठहरता है। भाषा में प्रभावोत्पादकता एवं नाटकीयता के गुण विद्यमान हैं। हैं।

Subscribe Our Newsletter