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ताज कविता की व्याख्या - सुमित्रानंदन पंत

1. प्रेम-अर्चना यही, करें हम मरण को वरण ? 
स्थापित कर कंकाल, भरें जीवन का प्रांगण ? 
शव को दें हम रूप, रंग, आदर मानव का ? 
मानव को हम कुत्सित चित्र बना दें शव का ?
गत - युग के बहु धर्म - रूढ़ि के ताज मनोहर ? 
मानव के मोहान्ध हृदय में किये हुए घर !
भूल गये हम जीवन का सन्देश अनश्वर,
मृतकों के हैं मृतक, जीवितों का है ईश्वर !

सन्दर्भ - प्रस्तुत पंक्तियाँ महाकवि पन्त जी की 'ताज' शीर्षक कविता से उद्धृत हैं।

प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियों में कवि का ताज के प्रति विद्रोह मुखर हो उठा है। 

व्याख्या - ताज के प्रति अपनी विद्रोहात्मक प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति करते हुए कवि प्रश्न करता है कि क्या प्रेम की पूजा इसी में है कि हम मृत्यु का सत्कार करें ? 

अर्थात् क्या मृतक व्यक्तियों के प्रति अपनी प्रेमाभिव्यक्ति प्रदर्शित करना ही उच्च प्रेम का लक्षण है ? नहीं, यह समझना गलत है। क्या हम मृतकों को इकट्ठे करके जग का आँगन भरते रहें ? अर्थात् जो मृतक हैं उनकी पूजा करते रहें और जो जीवित हैं उन्हें मृतक बनाते रहें ?

मृत शरीर को क्या मानवोचित आदर और रूप-रंग देना उचित है ? नहीं कदापि नहीं और उसके विपरीत हम मानव को हर प्रकार से दुःखी रखकर उसके जीवन के साधन छीनकर - घृणित मृतक ही बना दें ? 

अब कवि ताज को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे ताज ! तुम मनोहर तो अवश्य हो, किन्तु तुम में युग-युग के मृत आदर्श भी सन्निहित हैं और तुम उन्हीं को अच्छे लगते हो जिनके हृदय में मोह का अन्धकार पूरी तरह से छाया हुआ है, अर्थात् अज्ञानी व्यक्ति ही मृतकों को प्यार करते हैं। 

इसका कारण यह है कि हम जीवन के अमर सन्देश को भूल गए हैं कि मृतकों को वही प्यार करेगा जो स्वयं मृतक है, जिसमें ज्ञान का प्रकाश नहीं है, वरना जीवित व्यक्ति ही ईश्वर की सच्ची विभूतियाँ हैं और उसके सुख-दुःख का ध्यान रखना ही न केवल मानवता का धर्म है, अपितु ईश्वर के प्रति भी अपनी गहन आस्था प्रकट करना है।

विशेष - (1) प्रश्न शैली के अपनाने के कारण भाव और भी अधिक प्रभावशाली बन गए हैं।

(2) ताज के प्रति कवि का विद्रोह पूँजीवाद के विरुद्ध गम्भीर आक्रोश है। 

(3) 'मृतकों के हैं मृतक, जीवितों का है ईश्वर' यह पंक्ति बहुत भाव-व्यंजक है। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि भले ही अज्ञानी व्यक्ति मृतकों की पूजा करे और जीवितों का ध्यान न रखें, किन्तु इन जीवितों का भी कोई आधार है- और वह है ईश्वर ! इस अर्थ से कवि की ईश्वर के प्रति गहनतम आस्था प्रकट होती है।

2. हाय ! मृत्यु का ऐसा अमर अपार्थिक पूजन ? 
जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन ! 
स्फटिक सौध में हो शृंगार मरण का शोभन, 
नग्न, क्षुधातुर, वासाविहीन रहें जीवित जन;    
मानव! ऐसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति ?
आत्मा का अपमान, प्रेम और छाया से रति ?

सन्दर्भ - प्रस्तुत पंक्तियाँ महाकवि पन्तजी की 'ताज' शीर्षक कविता से उद्धृत है। 

प्रसंग - कवि ने इस कविता में ताज को देखकर संसार में हो रहे शोषण से उसकी तुलना की है। कवि ताज को युगीन शोषण का प्रतीक मानता है।

व्याख्या - कवि मृत साम्राज्ञी के स्मारक को देखकर अत्यन्त खिन्न होकर कहता है कि देखो, मरे हुए व्यक्तियों की कितनी दिव्य और लोकोत्तर पूजा की जाती है। 

जब जन-जीवन अपने दुःखों में पिसकर प्राणहीन हो रहा हो, उस समय मृत व्यक्ति के सम्मान के लिए देवोचित स्मारक बनाया जाता है। श्वेत संगमरमर के बने हुए उस अभ्रस्पर्शी महल में मानो मृत्यु का शृंगार किया गया है। 

दूसरी ओर दीन-दलित जनता वस्त्र और अन्न के अभाव में नग्न- क्षुधित होकर दर्द से कराह रही है। कवि तब ऐसे मनुष्यों से जो इस प्रकार धन का अपव्यय करते हैं, प्रश्न पूछ उठता है कि हे मनुष्य !

मानव जीवन की प्रति इस प्रकार की उदासीनता भी किस काम की। जीवित प्राणियों को भूखे, नंगे, गृहविहीन रखकर आत्मा को अपमान किया जाए और मृतक जो प्रेम और छाया के समान है, उनसे प्रेम करके उन पर धन का अपव्यय किया जाय।

विशेष- सामन्तीय व्यवस्था में इससे बड़ी असंगति और क्या हो सकती है, जबकि जीवित व्यक्ति नंगे-भूखे रहें और मृत व्यक्तियों की समृद्धि को अमर बनाने के लिए कोटि-कोटि रुपयों का अपव्यय किया जाये । 'हाय' शब्द के प्रयोग से ताजमहल की भव्यता के प्रति आश्चर्य और विस्मय का बोध किया गया है।

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