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जीविकोपार्जन कृषि किसे कहते हैं

जीविकोपार्जन कृषि में सम्पूर्ण उपज कृषक के परिवार अथवा उसके उत्पादन क्षेत्र में ही खप जाती है। फसलें स्थानीय आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही उत्पन्न की जाती हैं। इस कृषि का मुख्य उद्देश्य भूमि के उत्पादन से अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करना है।

क्षेत्र 

एशिया के मानसूनी प्रदेश, भूमध्य रेखीय प्रदेश तथा पहाड़ी भागों में यह कृषि की जाती है । एशिया में चीन, जापान, कोरिया, भारत , बांग्लादेश, बर्मा, इण्डोनेशिया आदि देशों में निर्वाह- कृषि की जाती है। भारत में मध्य प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार के पिछड़े भागों में यह कृषि की जाती है ।

जीविकोपार्जन कृषि किसे कहते हैं

विशेषताएँ 

1. आर्द्र प्रदेशों में चावल प्रमुख फसल है और आर्द्र शुष्क प्रदेशों व सिंचाई वाले भागों में गेहूँ, मोटे अनाज, दालें, तिलहन तथा सोयाबीन की फसलें उत्पन्न की जाती हैं। 

2. खेत प्राय: छोटे आकार के होते हैं।

3. साधारण औजारों का प्रयोग किया जाता है तथा मानव श्रम को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

4. अधिकतम उत्पादन लेने का प्रयास किया जाता है। इसके लिए मिट्टी में उर्वरता बनाये रखने हेतु खाद तथा उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है।

5. वर्ष में एक, दो, तीन तथा चार-चार फसलें तक ली जाती हैं। 

6. अधिकांश उपजाऊ भूमि में कृषि की जाती है। अतः चारागाहों का अभाव हो जाता है, जिससे पशुपालन कम हो जाता है।

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