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हिंदी साहित्य का इतिहास - hindi sahitya ka itihas

 हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखे गए हिन्दी साहित्य का इतिहास को व्यवस्थित और प्रमाणित माना गया है। आचार्य शुक्ल ने अधिक शोध के बाद हिन्दी साहित्य के इतिहास पर प्रकाश डाला है। हिंदी साहित्य को चार भागो में बांटा गया है। 

हिंदी साहित्य का इतिहास 

  1. आदिकाल (1050ई से 1375ई)
  2. भक्तिकाल (1375 से 1700 ई.)
  3. रीतिकाल (1700 से 1900 ई.)
  4. आधुनिक काल (1900 से अब तक)

आदि काल का इतिहास 

आदि काल या वीर-गाथा काल (संवत् 1050 से 1375) आदि काल 15 वीं शताब्दी से पहले का साहित्य है। इसका  विकास कन्नौज, दिल्ली, अजमेर के मध्य भारत तक फैला हुआ क्षेत्र में हुआ था। पृथ्वीराज रासो, चंद बरदाई द्वारा लिखित महाकाव्य (1149 - संवत्  1200) को हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली रचनाओं में से एक माना जाता है। 

चांद बरदाई पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि थे। जो ग़ौर के मुहम्मद के आक्रमण के दौरान दिल्ली और अजमेर के प्रसिद्ध शासक थे।

कन्नौज के अंतिम शासक जयचंद्र ने स्थानीय बोलियों के बजाय संस्कृत को अधिक संरक्षण दिया। नैषध्य चरित्र के लेखक हर्ष उनके दरबारी कवि थे। इसके अलावा उस समय अजमेर में नाल्हा और जगनायक महोबा के शाही कवि थे।  सभी इस अवधि के प्रमुख साहित्यकार थे।

हालांकि, तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद, इस अवधि से संबंधित अधिकांश साहित्यिक कार्यों को मुहम्मद की सेना ने नष्ट कर दिया था। इस अवधि के बहुत कम शास्त्र और पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं और उनकी वास्तविकता पर भी संदेह किया जाता है।

इस काल से संबंधित कुछ सिद्ध और नाथपंथी काव्य कृतियां भी पाई जाती हैं, लेकिन उनकी वास्तविकता पर फिर से संदेह किया जाता है।

सिद्ध काव्य का संबंध वज्रयान से था। जो की बौद्ध संप्रदाय से संबधित था। कुछ विद्वानों का तर्क है कि सिद्ध काव्य की भाषा हिंदी का पुराना रूप नहीं है, बल्कि मगधी प्राकृत से सम्बंधित है। 

दक्षिण भारत में दक्खन क्षेत्र में दक्खिनी या हिंदवी का उपयोग किया जाता था। यह दिल्ली सल्तनत के तहत और बाद में हैदराबाद के निज़ामों के अधीन पनपा। इसे फारसी लिपि में लिखा गया था। 

फिर भी, हिंदवी साहित्य को प्रोटो-हिंदी साहित्य माना जा सकता है। शेख अशरफ या मुल्ला वजही जैसे कई दक्कनी विशेषज्ञों ने इस बोली का वर्णन करने के लिए हिंदवी शब्द का इस्तेमाल किया है। रूस्तमी, निशति आदि विद्वानों ने इसे दक्कनी कहा है। 

इस काल के बाद और प्रारंभिक भक्ति काल के दौरान, रामानंद और गोरखनाथ जैसे कई संत-कवि प्रसिद्ध हुए। हिंदी का आरंभिक रूप विद्यापति की कुछ मैथिली रचनाओं में भी देखा जा सकता है।

भक्ति काल का इतिहास

भक्ति काल (सी। 1375 से 1700) - मध्यकालीन हिंदी साहित्य भक्ति आंदोलन और लंबी, महाकाव्य कविताओं की रचना से प्रभाव है।

अवधी और ब्रजभाषा ऐसी बोलियाँ थीं जिनमें भक्ति काल के साहित्य का विकास हुआ था। अवधी में मुख्य रचनाएँ मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत और तुलसीदास की रामचरितमानस हैं।

ब्रज बोली की प्रमुख रचनाएँ तुलसीदास की विनय पत्रिका और सूरदास की सूर सागर है। कबीर द्वारा कविता और दोहाओं में साधुकाड्डी बोली का भी इस्तेमाल किया गया है। 

भक्ति कल की कविता या दिहा में प्रेम श्रृंगार और वीर रास का अधिक प्रयोग किया गया है। जबकि वीरगाथा काल में केवल वीररस का प्रयोग किया जाता था। 

भक्तिकाल के समय दोहा (दो-लाइनर), सोरठा, चौपाया (चार-लाइनर) आदि का इतेमाल अधिक हुआ था। इस युग में कविता में विभिन्न रसों का इतेमाल  गया हैं। इस युग में साहित्यकारों को स्वतंत्र थी की वह अपने भावों को व्यक्त कर सके। और इसका उपयोग साहित्यकारो ने भली भांति की है। इसी कारण हमें विविध प्रकार के लेख देखने को मिले है। 

भक्ति काल के कविता को तो भंगो में बांटा गया है - निर्गुण भक्ति एक निराकार ईश्वर या एक अमूर्त नाम के आस्तिक को मानने वाले कवी और सगुण भक्ति विष्णु के अवतारों के गुणों और उपासकों के साथ एक ईश्वरपर विश्वास करने वाले कवी। 

कबीर और गुरु नानक निर्गुण भक्ति के कवि थे। और आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन से बहुत प्रभावित थे। वे निर्गुण निराकार ब्रह्मा में विश्वास करते थे। जबकि सगुण भक्ति का प्रतिनिधित्व मुख्य रूप से वैष्णव कवि जैसे सूरदास, तुलसीदास और अन्य ने किया था। 

कई मुस्लिम भक्ति कवियों जैसे अब्दुल रहीम खान के आगमन के साथ इस काल में हिंदू और इस्लामी तत्वों के बीच जबरदस्त एकीकरणहुआ। जो मुगल सम्राट अकबर के दरबारी कवि थे और कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे।

रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएं

रीति-काव्य काल (संवत् 1700 से 1900) - रीतिकाव्य काल में, कामुक तत्व हिंदी साहित्य में प्रमुख था। इस युग को रीति कहा जाता है (जिसका अर्थ है 'प्रक्रिया') क्योंकि यह वह युग था जब काव्यात्मक सिद्धांत पूर्ण विकसित थे। 

भक्ति शाखा की मुख्य विशेषता और कविता का महत्व काम होने लगा था। इस युग में सगुण भक्ति का राम भक्ति और कृष्ण भक्ति में विभाजित हो गया। 

अधिकांश रीति रचनाएँ कृष्ण भक्ति से संबंधित थीं।  फिर भी उनका ज़ोर कुल भक्ति से बदलकर कृष्ण के जीवन के श्रंगार या कामुक पहलुओं में बदल गया था - उनकी लीला, ब्रज में गोपियों के साथ उनकी लीलाए और शारीरिक सौंदर्य का वर्णन अधिक हो गया था। बिहारी की कविता, और घनानंद दास इस पर फिट बैठते हैं। 

इस युग की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक बिहारी की बिहारी सतसई है जो दोहा का एक संग्रह है। भक्ति, नीती और श्रृंगार (प्रेम) से संबंधित है।

देवनागरी लिपि का उपयोग करने वाली पहली हिंदी किताबें, ऐन-ए-अकबरी पर एक हीरा लाल का ग्रंथ थीं, जिन्हें ऐन ई अकबरी की भाषा वचनात्मक कहा जाता है, और कबीर पर रीवा महाराज का ग्रंथ है। 

दोनों किताबें 1795 में सामने आईं। मुंशी लल्लू लाल का संस्कृत हितोपदेश का हिंदी अनुवाद 1809 में प्रकाशित हुआ था। लाला श्रीनिवास दास ने 1886 में नागरी लिपि में हिंदी परिक्षा गुरु उपन्यास प्रकाशित किया था। शारदा राम फिल्लौरी ने एक हिंदी उपन्यास भाग्यवती लिखी थी जो 1888 में प्रकाशित हुई थी।

1888 में देवकी नंदन खत्री द्वारा लिखित चंद्रकांता को आधुनिक हिंदी में पहला गद्य माना जाता है। हिंदी गद्य साहित्य में यथार्थवाद लाने वाले व्यक्ति मुंशी प्रेमचंद थे। जिन्हें हिंदी कथा साहित्य और प्रगतिशील आंदोलन की दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता है।

आधुनिक काल 

आधुनिक काल (संवत् 1900 के बाद) - 1800 में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। कॉलेज के अध्यक्ष जे बी गिलक्रिस्ट ने हिंदी में किताबें लिखने के लिए प्रोफेसरों को काम पर रखा था। 

इनमें से कुछ किताबें लल्लू लाल द्वारा प्रेम सागर, सदल मिश्रा द्वारा नासिकेतोपाख्यान, दिल्ली के सदासुखलाल द्वारा सुखसागर और मुंशी इंशाल्लाह खान द्वारा रानी केतकी की कहानी थी। 

हिंदी गद्य साहित्य में यथार्थवाद लाने वाले व्यक्ति मुंशी प्रेमचंद थे, जिन्हें हिंदी कथा साहित्य और प्रगतिशील आंदोलन की दुनिया में सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता है। प्रेमचंद से पहले, हिंदी साहित्य परियों या जादुई कहानियों, मनोरंजक कहानियों और धार्मिक विषयों के इर्द-गिर्द घूमता था। प्रेमचंद के उपन्यासों का कई अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया है।

हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग 1900 से 1918 तक चली। इसका नाम महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर रखा गया है।  जिन्होंने कविता में आधुनिक हिंदी भाषा की स्थापना और हिंदी कविता के स्वीकार्य विषयों को व्यापक बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। उन्होंने हिंदी में राष्ट्रीयता और सामाजिक सुधार के लिए समर्पित कविता को प्रोत्साहित किया। 

1903 में द्विवेदी सरस्वती के संपादक बने, जो भारत की पहली हिंदी मासिक पत्रिका थी। जिसकी स्थापना 1900 में हुई थी। उन्होंने हिंदी साहित्य में सुधारों के लिए इसका इस्तेमाल किया। 

उस दौर की सबसे प्रमुख कविताओं में से एक मैथिली शरण गुप्त की भारत-भारती थी। जो भारत के अतीत के गौरव को उजागर करती है। श्रीधर प्रथक की भरतजीत अवधि की एक और प्रसिद्ध कविता है। 

कुछ विद्वानों ने इस काल की कविता को "प्रचारित प्रचार" कहा है। सामाजिक मुद्दों और नैतिक मूल्यों के साथ ईमानदारी से संबंधित है। कल्पना, मौलिकता, काव्य संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की समावेश इन कविताओं की विशेषता थी। 

अवधि भाषा आधुनिक हिंदी कविता की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। और यह उस समय के सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता था। 

आधुनिक हिंदी में एक काव्यात्मक परंपरा के बिना, कवि अक्सर ब्रज भाषा में अपने रूपों को चित्रित करते थे।  और बाद में संस्कृत, उर्दू, बंगाली और अंग्रेजी का उपयोग करने लगे। कविताओं के विषय व्यक्तिगत के बजाय सांप्रदायिक हो गए। पात्रों को अक्सर व्यक्तियों के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक प्रकारों के रूप में प्रस्तुत किया जाता था।

हिंदी साहित्य के इतिहास आदिकाल का वर्णन इसी पोस्ट में आपको पढ़ने को मिलेगा जिस प्रकार की जनकारी इस पोस्ट में बताई गई वह और कहीं आपको देखने को नहीं मिलेगा दोस्तों।


हिंदी साहित्य के इतिहास के बारे में मैंने आपको मेरे ब्लॉग के पहले ,पोस्ट में बताया था और आज मैं अपने ब्लॉग के इसी पोस्ट को लेकर दूसरा पोस्ट लिखा हूँ जिसमें मैंने आपको बताया है हिंदी साहित्य के आदिकाल के बारे में यह हिंदी साहित्य का बहुत ही महत्वपूर्ण काल है क्योकि इसे ही हिंदी साहित्य का प्रारंभिककाल के नाम से भी जाना जाता है लेकिन इसमें भी बहुत कुछ समस्याएं हैं। 

दोस्तों जैसे के मैंने आपको अपने पिछले पोस्ट में बताया है की हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन इतना सरल नहीं रहा है यह बहुत ही कठिनाई का सामना करते हुये लिखा गया है। तो आदिकाल ही वह समय है जिसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी अनुपस्थित है और शायद अनुस्पस्थित ही रहे तो जानते हैं आदिकाल के बारे में विस्तार से क्या होता है आदिकाल क्या क्या नाम दिए गए आदिकाल के हिंदी साहित्य में। 

आदिकाल हिंदी साहित्य का प्रारम्भिक समय है जिस समय हिंदी साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। इस काल में ऐसी रचनाएँ हुई जिनका कोई ग्रामर नहीं था अर्थात बिना नियम के जो रचना हुए वो आदिकाल के अंतर्गत आते हैं।

आदिकाल का इतिहास

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के अनुसार हिंदी साहित्य का इतिहास मनुष्य की या जनता की चित्तवृत्ति का ही इतिहास है।  जनता की चित्तवृत्ति में परिवर्तन के साथ ही साहित्य के  स्वरूप में परिवर्तन देखने को हमें मिलता है। ऐसा आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कहना है। आचार्य के अनुसार जनता की चित्तवृत्ति का निर्माण तत्कालीन  परिस्थितियों से होता है। अतः उनका यह भी मानना रहा है की साहित्य के इतिहास का अध्ययन तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ किया जाना चाहिये। 

आचार्य शुक्ल ने यह स्वीकार किया है की जिस काल खंड में किसी विशेष प्रवृत्ति की प्र्धानता हो, उसे अलग कालखंड माना जाए। प्रवृत्ति का निर्धारण उस काल में पाई जाने वाली प्रसिद्ध पुस्तकों के आधार पर की जानी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने प्रथम कालखंड में वीरगाथा की प्रवृत्ति प्रधान मानते हुए इस काल का नाम वीरगाथा काल रखा। इस प्रकार शुक्ल जी की काल विभाजन पध्दति के दो आधार हैं - (1) प्रधान प्रवृत्ति (2) ग्रंथों की प्रसिद्धि। 

रामचंद्र शुक्ल के अनुसार जब हम किसी काल का नाम रखते हैं तब उस कालखंड में प्रधान प्रवृत्ति के साथ-साथ अन्य प्रवित्तियाँ भी मुख्य रूप से होते हैं लेकिन हमें काल के नाम का निर्धारण प्रधान प्रवृत्ति के आधार पर किया जाना चाहिए। 
तो यहां पर स्पष्ट है की आदिकाल को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का वीरगाथा काल का नाम दिया है। 

उन्होंने हिंदी साहित्य को मुख्य रूप से तीन भागो में बांटा है लेकिन मध्यकाल को और  दो भाग में बाँट दिया है जिसके कारण चार भाग हो जाते हैं। 

इनके द्वारा किया गया काल विभाजन इस प्रकार से है -

आदिकाल (वीरगाथा काल- संवत 1050 - 1375 वि.)
पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल- सम्वत 1375 - 1700 वि.)
उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल - संवत 1700 - 1900 वि.)
आधुनिक काल (गद्यकाल - संवत 1900 - 1984 वि.)

यहां जो कोष्टक में नाम दिए गए हैं उसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा स्वीकार किया गया है। प्रारम्भ में दिया गया नाम यह सूचित करता है की लोगों के द्वारा प्रारम्भिक काल का नाम आदिकाल कहना उचित है लेकिन आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इसे वीरगाथा काल कहना उचित माना गया है। क्योकि इस काल में वीरता से भरी घटनाएं हुई थी और आचार्य परिस्थिति के आधार पर नामकरण को उचित मानते हैं। 

चुकी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा किया गया काल विभाजन हमेशा से ज्यादा मान्यता प्राप्त रहा है इस कारण मैं यहां पर इनके आदिकाल के नामकरण के लिए क्या दृष्टिकोण थे उसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का इस संबंध में कथन इस प्रकार है - राजा भोज की सभा में खड़े होकर राजा की दानशीलता का लम्बा-चौड़ा वर्णन करके लाखों रुपये पाने वाले कवियों का समय बित चूका था। राज दरबारों में  शास्त्रार्थियों की भी वह धूम नहीं रह गयी थी। पांडित्य के चमत्कार पर पुरस्कार का विभाजन भी ढीला पड़ गया  था।  इस समय जो भाट या चारण किसी राजा के पराक्रम विजय, शत्रु-कन्या-हरण आदि का अत्युक्तिपूर्ण आलाप करता था या रण-क्षेत्र में वीरों के हृदय में उत्साह की तरंगें भरा करता था, वहीं सम्मान पाता था। 

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के समय अलग अलग लेखकों का काल विभाजन का नाम अलग अलग रखा गया और तर्क भी प्रस्तुत किये गए। जिसके कारण हमेशा से भ्रान्ति रही है इतिहास विभाजन के नामकरण में। 

आदिकाल के नामकरण 


हिंदी साहित्य के आरम्भिक काल का नामकरण इस प्रकार है-

प्रस्तावना - 

1. हिंदी साहित्य का प्रथम काल यानी की प्राम्भिक काल -

आदिकाल का प्रादुर्भाव रणभेरी के तुमुलनाद यानी की युद्धों के समय से हुआ है तथा शस्त्रों की प्रबल झंकार भी उस समय देखने को मिलता है। अगर राजनितिक दृष्टि से इस काल को देखें तो यह बहुत ही उथल पुथल का काल रहा है। इसी समय विदेशी आक्रमण का सूत्रपात हुआ। देश की सुव्यवस्था के छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। एक साथ अनेक धर्मों एवं सम्प्रदायों का जन्म हुआ। जैसे - वैष्णव, जैन, कौल, पाँचरात्र, शैव, कापालिक, शक्ति, सिद्ध व नाथ आदि। साहित्य में भी परस्पर विरोधी तत्व दिखाई देते हैं। या देखने को मिलते हैं। 
आचार्य हजारी प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य का आदिकाल (उनकी रचना का नाम) में अक्षरशः सत्य ही लिखा है - " शायद ही भारतवर्ष के साहित्य के इतिहास में इतने विरोधी और सव्तोव्याघातों का युग कभी आया होगा। इस काल में तो एक तरफ संस्कृत के ऐसे बड़े-बड़े कवि उत्पन्न हुए जिनकी रचनाये अलंकृत काव्य परम्परा की चरम-सीमा पर पहुंच गई थी और दूसरी ओर अपभ्रंश के कवि जो अत्यंत सहज, सरल भाषा में अत्यंत संक्षिप्त शब्दों में अपने मन के मनोभाव को प्रकट किया करते थे। फिर भी धर्म एवं दर्शन के क्षेत्र में भी महान प्रतिभाशाली आचार्यों का उद्भव इसी काल में हुआ था और दूसरी और निरक्षर संतों के ज्ञान-प्रचार का बीज भी इसी काल में बोया गया। संक्षेप में यहां इतना जान लेना पर्याप्त है की यह काल भारतीय विचारों के मंथन का काल है , इसलिये अत्यंत महत्वपूर्ण है।  "

2. प्रारम्भिक काल का नामकरण -

आदिकाल के नामकरण को लेकर विद्वानों में मत एक समान नहीं है। इस काल को लेकर विभिन्न नाम उपलब्ध हैं हिंदी साहित्य के इतिहास में डॉ. गियर्सन ने इसे ' चारण काल ' कहा है। मिश्र  बंधुओ ने ' प्रारम्भिक काल ' , राहुल सांकृत्यायन ने ' सिद्ध सामंत युग ', आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने ' आदिकाल ', डॉ. रामकुमार वर्मा ' संधिकाल एवं चारणकाल ', विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ' वीरकाल ' तथा डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने ' प्रारम्भिक काल ', ' अविभक्तिकाल ' की सर्वदा से विभूषित किया। कुछ अन्य विद्वानों ने इसे ' उत्तर-अपभ्रंश काल ', ' जैन काल ' आदि नामों से भी पुकारा गया है इस काल को। 
यद्धपि विद्वानों ने इस काल को अनेक नामों से पुकारा परन्तु इनमें कोई भी ऐसा नहीं जो युग का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर सके। इस युग का नामकरण प्रवृत्ति विशेष के आधार पर न करके इस प्रकार किया जाना चाहिए की वह समग्र युग को अपने में समेत सके।  इन नामों में प्रारम्भिक काल अथवा आदिकाल नाम उपर्युक्त प्रतीत होता है।

किसने क्या कहा आदिकाल के नाम के विषय में

डॉ. गियर्सन   - चारण काल
मिश्र  बंधुओ ने   -    प्रारम्भिक काल
राहुल सांकृत्यायन ने     -  सिद्ध सामंत युग
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी   -   आदिकाल
डॉ. रामकुमार वर्मा   -   संधिकाल एवं चारणकाल
 विश्वनाथ प्रसाद मिश्र  - वीरकाल
डॉ. गणपति चंद्र गुप्त   -    प्रारम्भिक काल
अविभक्तिकाल  - सर्वदा विभूषित

3. वीरगाथा काल नामकरण एवं वीरगाथा साहित्य आदिकाल में अधिकांशतः

वीरगाथा साहित्य की रचना हुई अथवा लिखा गया इसलिए इस रोशन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल नाम दिया डॉ शिवकुमार शर्मा ने हिंदी साहित्य युग और प्रवृत्तियों में लिखा है शुक्ला जी के नामकरण के संबंध में तीन प्रमुख बातों का ध्यान देना आवश्यक होगा पहले इसी काल में वीर का खात्मा ग्रंथों की प्रचुरता दूसरी जनों द्वारा प्राचीन ग्रंथों को धार्मिक साहित्य घोषित करके उसे रचनात्मक साहित्य की परिधि से निकाल देना और इस प्रकार ग्रंथों और सिद्धों की रचनाओं को शुद्ध साहित्य में स्थान देना तीसरी बात उन रचनाओं की है जिनमें भिन्न-भिन्न विषयों पर फुटकर दोहे मिलते हैं किंतु उनके किसी विशेष प्रवृत्ति का काव्य निर्मित ना हो सकता है नहीं बन सकता है।
आचार्य शुक्ल ने कुल 12 पुस्तकों के आधार पर कालका वीरगाथा काल नामकरण किया है और इन 12 पुस्तकों में चार उन्होंने अपभ्रंश भाषा की तथा आठ देसी भाषा के काव्य माने हैं जो निम्न प्रकार हैं

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