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हिंदी साहित्य प्रश्न उत्तर - hindi sahitya prashn uttar

1. मैथिलीशरण गुप्त का 'भारत-भारती' कविता में प्रमुख संदेश।

उत्तर – भारत-भारती मैथिलीशरण गुप्तजी की प्रसिद्ध काव्य कृति है जो 1992-93 में लिखी गई थी। यह स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का एक सफल प्रयोग है। 

भारतवर्ष के संक्षिप्त दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति भारत-भारती निश्चित रूप से किसी शोध कार्य से कम नहीं है। गुप्त जी की सृजनता की दक्षता का परिचय देने वाली यह पुस्तक कई सामाजिक आयामों पर विचार करने को विवश करती है। भारतीय साहित्य में भारत भारती सांस्कृतिक नवजागरण का ऐतिहासिक दस्तावेज है।

मैथिलीशरण गुप्त जिस काव्य के कारण जनता के प्राणों में रच-बस गए और राष्ट्र कवि कहलाए, वह कृति भारत भारती ही है। भारत - भारती की लोकप्रियता का आलम यह रहा है कि इसकी प्रतियाँ रातों रात खरीदी गई। 

प्रभात फेरियों, राष्ट्रीय आंदोलनों, शिक्षा संस्थानों, प्रातः कालीन प्रार्थनाओं में भारत भारती के पद गाँवों-नगरों में पाये जाने लगे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका में कहा कि यह काव्य वर्तमान हिन्दी साहित्य में युगान्तर उत्पन्न करने वाला है। 

इसमें वह संजीवनी शक्ति है जो किसी भी जाति को उत्साह जागरण की शक्ति का वरदान दे सकती है। यह काव्य 1912 में रचा गया और संशोधनों के साथ 1914 में प्रकाशित हुआ।

प्रश्न 2. मुक्त छंद की अवधारणा ।

उत्तर—मुक्त छंद कविता का वह रूप है जो किसी छन्द विशेष के अनुसार नहीं रची जाती और न ही तुकान्त होती है। पाश्चात्य आधुनिक कविता में मुक्त छंद व्हिटमैन की सबसे बड़ी देन है। रूप के क्षेत्र में उनका यह आविष्कार नये कथ्य से ही प्रसूत होता है। 

मुक्त छंद की कविता सहज भाषण जैसी प्रतीत होती है। हिन्दी में मुक्त छंद की परम्परा सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने आरंभ की।

मुक्त छंद की अवधारणा वास्तविकता से जुड़ी हुई है। तुकबंदी की अनुपस्थिति में छंदों का निर्माण बिना किसी गद्य के गाया जाता है। 

मुक्त छंद या श्वेत छंद समरूप उपायों के साथ या विभिन्न उपायों के साथ छंद में हो सकता है। इसलिए मुक्त छंद, उपायों या नियमों से बंधा नहीं होता है। 

उदाहरण के लिए वर्ग में एक बच्चा / उनके दादा मतिस के साथ नाटक / खुश रहो / पैतृक आँखों द्वारा मनाया / कपड़े पहने / एक अमर पल में भरा हुआ महसूस कर रहा था ।

जैसा कि आप देख सकते हैं कि ये छंद तुकबंदी या व्यंजन तुकबंदी के नियमों का पालन नहीं करते हैं। तथाकथित मुक्त छंद के बारे में कही गई हर बात के अलावा हम अन्य रोचक जानकारियों पर भी प्रकाश डाल सकते हैं। 

जैसे कि-उपर्युक्त छंद किसी भी पैटर्न का पालन नहीं करता है, इसके अनुरूप होने वाले पद्य में एक पैटर्न होता है जिसके संबंध में यह वाक्य रचना और मीट्रिक इकाइयों के साथ पूरी तरह से विच्छेद कर सकता है।

प्रश्न 3. पंत के काव्य में प्रकृति चित्रण । अथवा “प्रकृति के सुकुमार कवि पंत” संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर-पंत का रचनाकाल लगभग चार दशकों से विस्तीर्ण है। इस अवधि में प्रकाशित रचनाओं पर सरसरी निगाह डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि उनके व्यक्तित्व के निर्माण में सबसे अधिक योग प्रकृति, उसके भाँति-भाँति के सौन्दर्य तथा उसके पीछे छिपी शक्ति का रहा है सच तो यह है कि उनके काव्य को यदि प्रकृति काव्य कह दिया जाये तो आत्युक्ति न होगा। उनके काव्य में प्रकृति के सभी रूपों का वर्णन हुआ है ।

पन्तजी को प्रकृति से असीमित प्रेम है। इसका कारण कोमल कल्पना के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत का जन्म प्रकृति की सुरम्य गोद अर्थात् कूर्मांचल के कौसानी नामक स्थान में होना है जहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य सर्वत्र बिखरा हुआ है।

पन्त की छायावादी प्रकृति उनकी छायावादी रचनाएँ वीणा, ग्रंथि, पल्लव तथा गुंजन काव्य-कृतियों में प्राप्त होती है। इन रचनाओं में कवि का प्रकृति के प्रति भारी आकर्षण रहा है।

पन्तजी के काव्य में आलम्बन रूप में, आलंकारिक रूप में, रहस्यात्मक रूप में, मानवीकरण के रूप में, उपदेशिका के रूप में, लोकशिक्षा के रूप में, मानवीकरण के रूप में प्रकृति चित्रण हुआ है। 

पन्तजी को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है क्योंकि उन्होंने प्रकृति के कोमल और मधुर रूप का चित्रण ही अपने काव्य में अधिक किया है।

प्रश्न 4. माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य का मूल स्वर।

उत्तर - कविवर पं. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय चेतना के संवाहक ही नहीं, अपितु उसके पोषक और प्रतीक भी थे। उन्होंने अपनी काव्य-यात्रा तब आरम्भ की थी, जब अंग्रेजी सत्ता का मूलोच्छेदन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर क्रान्ति की ज्वाला प्रज्वलित होने लगी थी। 

चतुर्वेदीजी ने प्रज्वलित हो रही क्रान्ति की इस ज्वाला को बड़े ध्यान से देखा। उसका आंकलन और अनुभव किया। उन्होंने देखा कि इसमें समग्र राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान हेतु त्याग-समर्पण की आहुति दी जा रही है। 

इस प्रकार की अनुभूति के प्रतीकात्मक काव्यों का सृजन और प्रकाशन करना चतुर्वेदीजी ने अपना जीवन-लक्ष्य समझा ही नहीं, अपितु निर्धारित किया। इसके महत्व के लिए उन्होंने अतीत का गौरव - गान करना आवश्यक समझा। 

वर्तमान दशा के दुःखद, उपेक्षित और असहाय पक्षों को उद्घाटित करते हुए इन्हें राष्ट्रोत्थान के लिए रीढ़ - स्वरूप चित्रित करने वाले राष्ट्रीय कवियों में कविवर माखनलाल चतुर्वेदी का स्थान अत्यन्त विशिष्ट और अन्यतम है। चतुर्वेदीजी की काव्यधाराएँ राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक चिह्न हैं। 

राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत इनके गीतों में नवजीवन, नवीन रक्त संचार की अपूर्व क्षमता है। वस्तुतः देश की सूखी नसों में उनके गति नई जवानी फूँकते हैं। राष्ट्र के अनेक बलिदानी वीरों ने इनके गीत गाते-गाते राष्ट्र की बलि - वेदी पर कुर्बानी दे दी। 

कविवर चतुर्वेदीजी का काव्य-संसार बहुआयामी फलक से युक्त है। राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मक पर लेखनी चलाने वाला यह कवि आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण आदि रूपों में प्रकृति चित्रण किया है। कविवर चतुर्वेदीजी की अधिकतर कविताओं में आत्मोत्सर्ग की भावना प्रकट होती है। 

ऐसी कविताएँ उसी काल-परिप्रेक्ष्य में रची-लिखी गई हैं, जो देश की स्वतन्त्रता के लिए बलिपन्थियों का बड़े ही स्पष्ट रूप से आह्वान करती है। उनकी सुप्रसिद्ध कविता 'पुष्प की अभिलाषा' इसी तथ्य को चरितार्थ करती है

“चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ, । चाह नहीं सम्राटों के शव हे हरि-डाला जाऊँ, चाह नहीं देवों के सिर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ, मुझे तोड़ लेना वनमाली,उस पथ पर तुम देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक।" 

प्रकृति के मनोरम चित्रों को लोक बिम्बों में ढालने वाला यह 'भारतीय आत्मा अपनी बहुमूल्य काव्य-साधना के कारण युग-युगान्त तक अमर बना रहेगा।

"क्या आकाश उतर आया है, दूबों के दरबार में, नीली भूमि हरी हो आयी, इन किरणों के ज्वार में।" 

प्रश्न 5. टिप्पणी लिखिए- “निराला और छायावाद"

उत्तर - कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' हिन्दी छायावादी के काव्य-सर्जना के प्रमुख स्तंभ हैं। उन्हें हिन्दी के छायावादी युग का महाकवि माना जाता है। इनका जन्म पश्चिम बंगाल के जिला मिदनापुर के महिषादलं स्थान में सन् 1897 में बसंत पंचमी को हुआ। 

निराला ने संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी व हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। परंतु कट्टरपंथी एवं क्रोधी पिताजी के कारण निराला की शिक्षा नवीं कक्षा तक हो पाई। प्रकृति प्रेम, एकांत सेवन एवं पत्रिकाओं के पठन से ही साहित्य की ओर इनकी रूचि बढ़ती गई। 

कवि होते हुए भी निराला सर्वतोसुखी प्रतिभा संपन्न थे। इन्होंने बंगला, अवधी, ब्रज एवं संस्कृत में भी काव्य निर्माण किया। इनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर दार्शनिकता का समावेश है, वहाँ कलात्मकता के साथ-साथ मानव हृदय की सूक्ष्म अनुभूतियों का भी वर्णन है। 

मुक्त छंद के ये प्रवर्तक हैं। छायावादी एवं प्रगतिवादी पत्रिका भी प्रकाशित हुई थी । इनके प्रथम कविता संग्रह को “अनामिका" नाम प्राप्त है। गद्य और पद्य दोनों विधाओं के लेखन में निराला पूर्ण कुशल थे।

छायावादी कवि होने के कारण निराला की रचनाओं में प्रकृति के विभिन्न स्वरूप रूपायित हुए हैं। इनकी प्रकृति का रूप कहीं उपदेशिका का है, कहीं आलंकारिक है। इनकी प्रकृति कोमल हो या शांत हो या रौद्र हो, सभी रूपों में मनोहर प्रतीत होती है। 

निराला जी हिन्दी के छायावादी युग में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। भाषा के क्षेत्र में संस्कृत और फारसी के दबाव को निराला जी ने समाप्त किया और छंदों के क्षेत्र में मुक्त छंद का आविष्कार किया।

प्रमुख काव्य कृतियाँ परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीति गूंज एवं सांध्य काकली । उपन्यास - अप्सरा, अलका, निरूपमा, प्रभावती, चोटी की पकड़ एवं काले कारनामे ।

कहानी - लिली, सखी, सुकुल की बीवी, देवी। रेखाचित्र - कुल्लीभाट, बिल्लेसुर, बकरिहा, चतुरी चमार । आलोचना - प्रबंध पक्ष, प्रबंध प्रतिभा, संचय और चाबुक । 

प्रश्न 6. छायावाद की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर- छायावादी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ-

छायावादी कविता बाह्य-सौन्दर्य का नहीं, आन्तरिक सौन्दर्य का उद्घाटन करती है। भाषा में अभिधा के स्थान पर लक्षणा और व्यंजना का अधिक प्रयोग होता है। छायावाद में निम्नलिखित विशेषताएँ या प्रवृत्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।

(1) स्वानुभूति-निरूपण
(2) शृंगार-भावना 
(3) सौन्दर्यानुभूति
(4) वेदना और करूणा का आधिक्य 
(5) अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम 
(6) नारी के प्रति नवीन- भावना 
(7) मानवतावाद 
(8) प्रकृति का मानवीकरण 
(9) जीवन-दर्शन
(10) अभिव्यंजना शैली में क्रान्ति 
(11) नवीन - अलंकार 
(12) नवीन छन्द 

अधिक जानकारी - छायावाद से आप क्या समझते हैं

प्रश्न 7. प्रगतिवाद की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

उत्तर - प्रगतिवादी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ

 (1) रूढ़ियों का विरोध

प्रगतिवादी कवियों ने सभी प्राचीन रूढ़ियों का जमकर विरोध किया है । उनका दृष्टिकोण भौतिकवादी है, इसी कारण धर्म के नाम पर चलने वाली सामाजिक विकृतियों और व्यक्ति चेतनानिष्ठ भ्रान्त धारणाओं की उन्होंने खूब ख़बर ली है। 

छायावादी कवियों की भाँति वे कल्पना के सुख में डूब जाने को अनर्य से अधिक कुछ नहीं समझते और प्राचीन इतिहास की गरिमा पर उन्हें विश्वास नहीं। 

ईश्वर की करुणा पर उन्हें कोई भरोसा नहीं। वे अन्धविश्वासों, मिथ्या और निर्यक परम्पराओं और रूढ़ियों पर गहरी चोट करके मनुष्य को उसके वास्तविक मनुष्यत्व के रूप में देखना चाहते हैं।

विश्व की मानवीयता को दमन और शोषण से मुक्त कर उन्हें एक भाव से देखने की इच्छा प्रगतिवादी काव्य में अभिव्यक्त हुई है।

(2) वर्ग चेतना और सामाजिक वैषम्य

समाज में वर्ग-चेतना जाग्रत करना सामाजवादी काव्य का प्रमुख लक्ष्य रहा है। भारतीय समाज में वैसे ही विषमता की मात्रा अधिक है। प्रगतिवादी कवियों ने शोषितों की करुण अवस्था और शोषकों के ठाठ की मार्मिक अभिव्यंजना की है। 

बच्चन के शब्दों में,"एक ओर समृद्धि थिरकती, पास सिसकती है कंगाली, एक देह पर एक न चिथड़ा, एक स्वामी के गहनों वाली, अधर खड़े हैं रम्य महल वे आसमान को छूने वाले और पास में बनी झोंपड़ी जिसके छप्पर चूने वाले ।”

(3) पूँजीवाद और शोषकों के प्रति आक्रोश

प्रगतिवादी कवियों ने जहाँ समाज के शोषित वर्ग के प्रति अपनी चरम संवेदना व्यक्त की है, वहाँ पूँजीपतियों और शोषक वर्ग के प्रति अपने रोष की अभिव्यक्ति भी उन्होंने प्रचुर मात्रा में की है।

हिन्दी के प्रगतिवादी कवियों ने शोषक वर्ग की भर्त्सना करते हुए भी सर्वत्र मानवीय दृष्टिकोण को अपनाया है और रक्तमय क्रान्ति की सीमा तक वे नहीं गये हैं। 

महाकवि निराला ने समाज में पूँजीपतियों की भर्त्सना करते हुए अपनी प्रसिद्ध कविता 'कुकुरमुत्ता' की रचना की थी, जिसमें उन्होंने गुलाब के पौधे को समाज के पूँजीपति वर्ग का प्रतीक माना था । द्रष्टव्य है -

अबे सुनबे गुलाब,
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब, 
खून चूसा खाद का तूने, अशिष्ट
 डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट,
बहुतों को बनाया है तूने गुलाम ।

(4) नवीन क्रान्ति का स्वर

शोषकों और पूँजीपतियों के विनाश के लिए क्रान्ति अनिवार्य है और उस क्रान्ति का आह्वान सभी प्रगतिवादी कवियों ने किया है। कार्ल मार्क्स ने पूँजीपति सत्ता को समाप्त करने के लिए रक्तमय क्रान्ति को अनिवार्य माना था । 

हिन्दी के प्रगतिवादी कवियों ने भी इस क्रान्ति का संदेश प्रेषित किया और अपनी विभिन्न प्रकार की शैली और भाषा में क्रान्ति का आह्वान किया। 

(5) मानवतावाद की स्थापना 

प्रगतिवादी कवियों ने यथार्थ रूप में मानव के महत्त्व की स्थापना की । प्रगतिवादी कवि का मूल सन्देश कवि शील शब्दों में सशक्त अभिव्यक्ति को प्राप्त हुआ है

देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल ।
नया संसार बसायेंगे, नया इन्सान बनायेंगे ।।

इस प्रकार प्रगतिवादी कवियों ने अपनी कविता में मानवीयता की रक्षा का सन्देश दिया है। उन्होंने मानवता के शोषण का विरोध किया है और व्यर्थ की धार्मिकता और रहस्यवादिता के सिद्धान्तों का खण्डन किया है। 

उनका विश्वास मानव को मानवीय रूप में प्रतिष्ठित करने में है, और समाज के वैषम्य को दूर करके समाज में मानवीय समानता की प्रतिष्ठा करना उनका लक्ष्य है। 

इसीलिए उन्होंने अपने काव्य के द्वारा जन-हृदय में मानवीय भावों को उद्दीप्त करने का प्रयास किया है ।

प्रश्न 8. प्रयोगवादी काव्य की विशेषताएँ

उत्तर-हिन्दी काव्य साहित्य में सन् 1945 से 1955 तक के समय में लिखी गई कविता को प्रयोगवादी कविता की संज्ञा दी जाती है। प्रयोगवादी कविता के रचयिता कला को जीवन के लिए न मानकर कला को कला के लिए मानते हैं। 

अतः प्रयोगवादी कविता में समाज की अपेक्षा 'व्यक्ति' को अधिक महत्त्व दिया गया है। इस काल के काव्य में कवि की व्यक्तिगत अनुभूतियों को ही प्रायः काव्य का विषय बनाया गया है। 

यही कारण है कि प्रयोगवादी काव्य में अहंवादिता, स्वार्थप्रेरित, असामाजिकता, उद्दण्डता जैसी प्रवृत्तियाँ भी पनप गईं ।

प्रगतिवादी की अतिशय सामाजिकता ने व्यक्ति की पूरी तरह उपेक्षा कर दी। उधर विश्व के इतिहास में जो नवीन उथल-पुथल हो रही थी और विज्ञान के क्षेत्र में नित नये प्रयोग किये जा रहे थे ।

उन्होंने मानव के सामने नयी समस्याएँ और उलझनें खड़ी कर दी, जिनका समाधान प्रगतिवादी के पास न था। फलतः सन् 1943 में अज्ञेय के सम्पादन में 'तार-सप्तक' नामक एक कविता संग्रह निकला, जिसमें सात प्रयोगशील कवियों की रचनाएँ थीं। 

इसी के साथ परिस्थितियों को अभिव्यक्ति देना था। वस्तुतः प्रयोगवादी काव्य से आशय ऐसे काव्य से है, जिसमें भाव और कला सम्बन्धी प्रयोग सचेष्ट भाव से किये जाएँ।

प्रमुख कवि - सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन, अज्ञेय, गिरिजाकुमार माथुर, धर्मवीर भारती, गजानन माधव मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल, भवानीप्रसाद मिश्र, लक्ष्मीकान्त वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, नेमिचन्द जैन, प्रभाकर माचवे, शकुन्तला माथुर, नरेश कुमार मेहता आदि हैं। 

प्रश्न 9. प्रयोगवाद की विशेषताएँ बताइए। 

उत्तर - प्रयोगवादी कविता की मुख्य विशेषताएँ या प्रवृत्तियाँ

प्रयोगवादी कविता में सबसे बड़ी स्थापना आदर्श के स्थान पर यथार्थ पर बल दिया जाता है, वास्तव में अतियथार्थ पर जोर दिया जाता है। समाज के गुणों अथवा सौन्दर्य का बखान न करते हुए उसकी दुर्बलताओं को स्पष्ट किया गया है।

(1) नारी के प्रति दृष्टिकोण

प्रयोगवादियों ने नारी के सौन्दर्य का चित्रण न करते हुए उसे उसके विषैले रूप में ही देखा है। आर. सी. प्रसादसिंह इसी सन्दर्भ में नारी को नागिन बताते हुए कहते हैं कि"मेरे आगे बैठी, जैसी बैठी होती काली ।

काली नागिन दो चिह्ना वाली, उगले जहर ओठ पर ।”

(2) वैचित्र्यपूर्ण दर्शन

प्रयोगवादी कविता का दर्शन वैचित्र्यपूर्ण है। उसे पढ़-सुनकर न केवल हँसी आती है वरन् अजीब-सा भी लगता है। यह उदाहरण देखिए।

“अगर कहीं मैं तोता होता, तो क्या होता,
तो क्या होता, तोता होता।"

(3) नवीन असामाजिक विषय-

प्रयोगवादी कविता के विषय में विचित्र से हैं। प्रयोगवादी कवियों ने गरम पकोड़े, चाय की प्याली टूटी, रुई, मकड़ी का जाला, चूहे, मच्छर आदि विषयों पर भी उदार भाव से कलम चलाई है जबकि पूर्ववर्ती कवियों की दृष्टि में ये विषय इस काबिल थे ही नहीं। एक उदाहरण देखिए

"कहीं मच्छर तड़प भन भन अनौखा शोर करते हैं।
चूहे भूखे निकलकर तोड़ ताबड़ जोर करते हैं।”  
    
(4) दमित वासना की अभिव्यक्ति 

प्रयोगवादी कविता की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उसमें साधनात्मक प्रेम का अभाव है। उसके स्थान पर इस कविता में मांसल प्रेम एवं दमित वासना की अभिव्यक्ति ही ज्यादा हुई है। वर्णन में सेक्स की प्रधानता है।

(5) प्रयोगवादी नये उपमान, नये प्रतीक और नई शैली

प्रयोगवादी कविता में भाव पक्ष एवं कला पक्ष में अनेक परिवर्तन हुए हैं। इस कविता में न केवल नवीन प्रतीकों का विधान है वरन् नये उपमानों का प्रयोग भी मिलता है, शैलीगत नवीनता के भी बहुतायत से दर्शन होते हैं।

(6) कविता के भाव पक्ष में उल्लेखनीय परिवर्तन

प्रयोगवादी कविता में न केवल कला पक्ष में क्रान्ति हुई है वरन् भाव पक्ष में भी, साहित्यिक परम्पराओं के क्षेत्र में भी क्रान्ति भावना के दर्शन मिलते हैं। एक सरल सार्थक उदाहरण देखिए

“चाँदनी चन्दन सदृश, हम क्यों लिखें? मुख हमें कमलों सरीखें क्यों दिखें ? हम लिखेंगे, चाँदनी उस रुपये सी है कि जिसमें, चमक है, खनक गायब है।" 

इस प्रकार कहीं उपेक्षित वस्तुओं में प्रयोगवादी कवि ने सौन्दर्य के दर्शन किए हैं, तो कहीं कंक्रीट और फटी ओढ़नी की चिन्दियों तक भी सौन्दर्य का व्यापक विस्तार भी हुआ है।

(7) पीड़ा बोध की गहराई 

प्रयोगवादी कवि 'स्व' की गुफा में पीड़ा के कवि खोजता रहता है। यह पीड़ा-बोध इतना सजग और गहरा है कि कवि उसे एक चिन्तन सत्य के रूप में दार्शनिक स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। कविवर अज्ञेय का निम्नलिखित उदाहरण यही कहता प्रतीत होता है

“दुःख सब को माँजता है, और, चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किन्तु जिनको माँजता है, उन्हें यह सीख है कि सबको मुक्त रखें ।”

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि प्रयोगवादी कविता ने हर क्षेत्र में नवीनता को प्रश्रय दिया है। अतिशय बौद्धिकता एवं अन्य कारणोवश अनेक आलोचकों ने इसकी कटु आलोचना भी की है। 

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के अनुसार, "किसी भी अवस्था में यह प्रयोगों का बाहुल्य वास्तविक साहित्य सृजन का स्थान नहीं ले सकता।" इसी प्रकार डॉ. राम भटनागर के अनुसार, "वहाँ बिम्बों, प्रतीकों, उपमानों, छन्दों और नई शताब्दी की खोज ने काव्य के स्वरूप अस्वस्थता उत्पन्न कर दी। 

नितान्त बोलचाल के शब्दों के साथ विदेशी शब्दों और तत्सम गर्भित अप्रचलित प्रयोग ने भाषा को जन-सम्पर्क से एकदम दूर कर एक ऐसे भावलोक की स्थापना की जो एकदम विशृंखल है।"

किन्तु धर्मवीर भारती प्रयोगशाला कविता का महत्व बताते हुए कहते हैं कि, “जहाँ तक इस काव्य में नई परिस्थितियों से प्रभावित नई अनुभूतियों को अभिव्यक्ति के लिए काव्य रूप व नई गठन खोजी, वहाँ तक यह काव्य निश्चित विकास और प्रगति में न केवल सहायक सिद्ध हुआ है वरन् वह बहुत महत्वपूर्ण चरण है।"

प्रश्न 10. नई कविता की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर - हर कविता की अपनी विशेषताएँ होती हैं। नयी कविता के स्वरूप, भाव और कला स्तर पर इतने परिवर्तन हुए हैं और प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और प्रपद्यवाद इस प्रकार मिश्रित हो गये हैं कि छ आलोचक इसे कविता ही मानने को तैयार नहीं है। 

नयी परम्परा (नयी कविता) के कवियों को परम्परा से अति चिढ़ है, उसकी भाव राशि, रस बोध, वाक्य विन्यास, छन्द शैली, बिम्ब योजना, प्रतीक योजना, उपमान योजना आदि में परम्परा की तुलना में इतना अन्तर है कि परम्परावादी इसे पहचान ही नहीं पाये।

नई कविता की प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ

नई कविता की प्रवृत्तियों को संक्षेप में निम्न प्रकार रखा जा सकता है1. क्षणवाद और लघु मानवता-नयी कविता जीवन के प्रति गहन आस्था रखती है। उसे जीवन के सम्पूर्ण उपभोग में अतीव विश्वास है। वह जीवन को उसके सारे गुण-दोष और पाप-पुण्य के साथ स्वीकारती है। 

वह इस मनोवैज्ञानिक सत्य में विश्वास रखती है कि हम क्षणों में जीते हैं अर्थात् वह जीवन की एक-एक अनुभूति, एक-एक सुख और एक-एक पीड़ा को स्वीकारती है। लघुमानवत्व का अर्थ यह है कि वह उस मनुष्य का चित्र खींचती है, जो अपनी सभी संवेदनाओं और भूख-प्यास से पूर्ण सामान्य मनुष्य है।

2. अनुभव की प्रमाणिकता

नयी कविता उसी अनुभव को व्यक्त करती है, जिसे भोगा गया है, जीकर प्राप्त किया गया है। इन कवियों की मान्यता है

अच्छा अपना ठाठ फकीरों मंगनी के सुख साज से। जीवन के सामान्य-से-सामान्य दिखाई देने वाले प्रसंग और कार्य-व्यापार नयी कविता में वर्णित हैं।

3. अनास्था और आस्था दोनों ही रूप

नयी कविता में चित्रित जीवन अपना है या उधार लिया हुआ, इस पर आलोचकों ने विचार किया है। कुछ आलोचक इसे उधार लिया हुआ मानते हैं। 

वे नयी कविता में वर्णित पीड़ा, बिखराव, अनास्था और मूल्यहीनता को पश्चिम का अनुभव मानते हैं, परन्तु नई कविता में वर्णित यह अनास्था और मृत्युबोध अपने ही समाज की विषम स्थिति से उत्पन्न हुआ है।

फिर इसमें केवल अनास्था, निराशा और मरण की आकांक्षा ही नहीं है, जिजीविषा और आस्था के स्वर भी हैं।

4. मूल्यों का परीक्षण 

नयी कविता धर्म, दर्शन, नीति, आचार आदि से सम्बन्धित किसी मूल्य को फारमूले के रूप में स्वीकार नहीं करती। यदि वे जीवन के नये चिन्तन और अनुभूतियों के मार्ग में आते हैं, तो उन्हें चुनौती देती है। 

जाने-माने मूल्यों की विघातक असंगतियों को प्रकाश में लाना और उन्हें स्वीकार करना नयी कविता की विशेषता है।

5. लोक सम्पत्ति

यह नयी कविता की एक महत्वपूर्ण विशेषता है-लोकजीवन की अनुभूतियाँ और सौन्दर्य-बोध उसने ग्रहण किये हैं। साथ ही लोक-जीवन के बिम्बों, शब्दों, उपमानों, प्रतीकों आदि का भी चयन किया है। 

अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, भारतभूषण अग्रवाल, मुक्तिबोध आदि की अनेक कविताएँ इस दृष्टि से देखी जा सकती हैं, जिनमें लोक जीवन की संवेदनाएँ अत्यन्त सुन्दरता से ग्रहण की गई हैं।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की अग्रलिखित पंक्तियों में लोक-जीवन की भाव-भीनी छवियाँ मुखरित हो उठी हैं

नये साल की शुभ कामनाएँ। खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को, कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को, नये साल की शुभ कामनाएँ ! जाते के गीतों को, बैलों की चाल को, करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को, नये साल की शुभकामनाएँ ! इस पकती रोटी को, बच्चों के शोर को, चौके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को, नये साल की शुभकामनाएँ !

6. व्यंग्य 

यह भी नयी कविता की एक प्रमुख प्रवृत्ति है। निम्न पंक्तियों में युगीन जीवन की विडम्बनाओं पर कवि का तीखा व्यंग्य देखिए

जाओ, दो आने का तेल लाओ, और टूटी कमर पर मालिश कराओ क्योंकि तुम्हारे हिमायतियों ने, पट्टी तुम्हारी कमर पर बाँधने के बजाय अपनी आँखों पर बाँध ली है, अपनेपन में भी देखो, कितनी धांधली है।

7. नित नये वादों का आन्दोलन

नव्यतर कविता में जितने कवि आये, उनमें से प्रत्येक अपने साथ एक नये वाद का नारा लेकर आया। नये वादों की जैसी भीड़ हिन्दी - कविता के क्षेत्र में एक साथ उमड़ उठी, वैसी विश्व के किसी भी साहित्य में नहीं दिखाई देती। 

कुछ महत्वपूर्ण वादों के नाम इस प्रकार हैं- सनातन सूर्योदयी कविता, सहज कविता, गलत कविता, सही कविता, नवगीत, अगीत आदि ।

 8. कलापरक विशेषताएँ 

नयी कविता की कलापरक विशेषताएँ भी स्पष्ट दिखाई देती हैं । बिम्बात्मकता, नई प्रतीक योजना, नये विशेषणों व उपमानों के प्रयोग में उनका शिल्प एक नयी छटा से •युक्त हो गया है। 

अधिकांश कवियों ने बिम्बों का चयन जीवन से किया है। शब्द-चयन भी ऐसा है, जिसमें मिट्टी की गन्ध समाई हुई है। डॉ. जगदीश गुप्त ने अर्थ की लय का प्रतिपादन कर गद्यवत उक्तियों को भी काव्य के क्षेत्र में परिगणित करने की बात कही है। रसानुभूति के स्थान पर उन्होंने 'सह-अनुभूति' शब्द भी प्रस्तुत किया है।

उपसंहार- उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि नयी कविता हिन्दी काव्य का सबसे नवीन उन्मेष है और एक जीवित विधा के रूप में आज भी प्रवाहमान है। 

चाहे विषय परिधि हो या उपमानों की परिकल्पना, चाहे बिम्ब योजना हो या उपमानों की परिकल्पना, चाहे प्रतीक विधान हो या चाहे वस्तुगत सौष्ठव हो या शिल्पगत सृजन सभी क्षेत्रों में नयी कविता ने अपना स्तुत्य स्थान प्राप्त कर लिया है।

 प्रश्न 11. राष्ट्रीय काव्यधारा की विशेषताएँ।

उत्तर - जिस समय प्रगतिवाद का हिन्दी साहित्य में आविर्भाव हुआ, उस समय भारतीय स्वतन्त्रता का आन्दोलन अपनी सम्पूर्ण शक्ति से भारतीय मानस को झकझोर रहा था। राष्ट्रीय चेतना की इस प्रबल लहर से तत्कालीन कवियों का अप्रभावित रह जाना सम्भव नहीं था। 

अतः हिन्दी साहित्य में कवियों का एक वर्ग तो केवल राष्ट्रीयता को लेकर काव्य-रचना में संलग्न था। श्री मैथिलीशरण . गुप्त, रामधारीसिंह दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', सियारामशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', श्यामनारायण पाण्डेय आदि कवि इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

प्रगतिवादी कवियों ने भी राष्ट्रीय चेतना से प्रभावित होकर अनेक कविताओं की रचना की है, किन्तु इसकी राष्ट्रीय चेतना का रूप अपेक्षाकृत अधिक व्यापक है। इसकी राष्ट्रीय रचना का स्थूलतया इन वर्गों में बाँटा जा सकता है

1. विदेशी दासता का विरोध,

2. पूँजीवाद का विरोध और शोषितों के प्रति सहानुभूति,

3. साम्प्रदायिकता का विरोध,

4. सामाजिक सुधारों का आग्रह,

5. युद्ध का विरोध और शान्ति की स्थापना का समर्थन,

6. भारतमाता का गौरव-गान ।

उस समय विदेशी दासता के विरोध का इतना अधिक महत्व था कि इसी विरोध को अपनाकर कोई भी कवि राष्ट्रीय कवि बन सकता था। जो लोग विदेशी दासता का विरोध कर रहे थे।

उनकी प्रशंसा करना या उन्हें प्रोत्साहन देना भी प्रकारान्तर से विदेशी दासता का ही विरोधी था । प्रगतिवादी कवियों ने दोनों विधियों से विदेशी दासता का विरोध किया है।

राष्ट्रीय चेतना के साथ-साथ पूँजीपतियों के प्रति घृणा और शोषितों के प्रति सहानुभूति की भावना भी बढ़ी । फलतः प्रत्येक प्रगतिवादी कवि ने पूँजीपतियों की भर्त्सना की, क्योंकि उनके अनुसार पूँजीपति भी शोषक होने के कारण दासता के बन्धनों को सुदृढ़ बनाने में सहायक थे। 

डॉ. 'सुमन' पूँजीपतियों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं

“बिक रहा पूत नारीत्व जहाँ, चाँदी के योथे टुकड़ों में,
कर्त्तव्य पालता धनिक वर्ग, मदिरा के जूठे टुकड़ों में । "

जब अंग्रेज किसी भी प्रकार से भारतीय राष्ट्रीय चेतना का दमन न कर सके तो उन्होंने साम्प्रदायिकता का विष फैलाना प्रारम्भ किया, ताकि राष्ट्रीय एकता को घुन लग जाये और भारतवादी पारस्परिक संघर्षों में पड़कर अपने स्वतन्त्रता प्राप्ति के लक्ष्य से भ्रष्ट हो जायें।

 प्रगतिवादी कवियों ने सांप्रदायिकता के विरुद्ध भी आवाज उठाई और साम्प्रदायिकता के भावों को बढ़ावा देने वाले अहन्ता बताया। इन कवियों ने साम्प्रदायिकता को समाप्त करने का (सकल्प लिया। श्री नागार्जुन का यह संकल्प सभी कवियों के संकल्पों का प्रतिनिधित्व करता है।

"हाँ, बापू ! मैं निष्ठापूर्वक आज शपथ लेता हूँ,
साम्प्रदायवादी दैत्यों के निकट खोह, जब तक खण्डहर न बनेंगे, तब तक मैं इनके खिलाफ, लिखता जाऊँगा।”

प्रगतिवादी कवि भौतिक तथा बौद्धिक दोनों ही दृष्टियों के समाज को सुधारना चाहते थे, उसके जीवन-स्तर को ऊँचा करके उसमें नई चेतना भर देना चाहते थे।

इसलिए इन्होंने अनेक ऐसी कविताओं की रचना की, जिससे समाज को नई चेतना मिले। अपने इस ध्येय को पूरा करने के लिए उन्होंने प्रायः भारतीय इतिहास का सहारा लिया। 

दिनकर ने तत्कालीन समाज को बताया कि आज अहिंसा और धर्म की आवश्यकता नहीं, वरन् शस्त्र बल की आवश्यकता है, आज युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा नहीं वरन् अर्जुन और भीम जैसे वीर चाहिये ।

"रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
परा फिरा हमें साँजीव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम-वीर ।"

प्रगतिवादी कवियों ने युद्ध का खुलकर विरोध किया है। इनकी दृढ़ धारणा है कि युद्ध मानवता के विध्वंसक होते हैं। ये धरती पर अशान्ति, अन्याय और शोषण को जन्म देते हैं। 

यही कारण है कि अधिकांश प्रगतिवादी कवियों ने शान्तिदूत महात्मा गाँधी की संस्तुति की है। युगसारथी गाँधीजी के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा व्यक्त करते हुए डॉ. 'सुमन' कहते हैं कि यदि गाँधीजी न होते तो समूची मानवता युद्ध आग में जलकर राख हो जाती, सारी संस्कृति श्मशान बन जाती ।

भारतमाता के गौरव-गान के द्वारा ही इन कवियों ने अपनी राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति दी है। 'दिनकर' हिमालय के माध्यम से भारत माँ के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा इन शब्दों में व्यक्त करते हैं 

“मेरे नगपति! मेरे विशाल ! साकार दिव्य गौरव विराट, पौरुष के पूँजीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट ! मेरे भारत के दिव्य भाल !”

श्री नागार्जुन भी भारत माँ के प्रति असीम श्रद्धा को इन शब्दों में प्रकट करते हैं

“ देवि ! तुम्हारी वसुन्धरा का वित्ता - वित्ता रत्नाकर है,
जन-युग का यह रिक्त हस्त कवि
देवि ! तुम्हारे लिए, आज निज शीश झुकाता !”

स्पष्ट है कि प्रगतिवादी कवियों की राष्ट्रीय चेतना में रूढ़िवादिता न होकर अपने राष्ट्र के प्रति और अपने राष्ट्रवासियों के प्रति सच्चा प्रेम है। 

वे अपने राष्ट्र का उत्थान चाहते हैं उन्हें विश्वास भी है कि निकट भविष्य में ही देश दास्ता की कठोर शृंखलाओं से मुक्त होगा, लपटों से झुलसी हुई धरती से नई फसल पैदा होगी

“नयी फसल देगी फिर धरती, लपटों से झुलसाई । " इन कवियों की यह धारणा किसी कल्पना पर आश्रित नहीं, वरन् सामाजिक यथार्थता पर और वास्तविकता पर आधारित है।

प्रश्न 12. 'वह तोड़ती पत्थर' काव्य की समीक्षा कीजिए।

उत्तर - 'वह तोड़ती पत्थर' कविता में कवि निरालाजी ने इलाहाबाद में सड़क किनारे एक पत्थर तोड़ती महिला का कारुणिक चित्र प्रस्तुत किया है। गर्मियों के दिन थे कड़ी धूप में एक मजदूर स्त्री पत्थर तोड़ रही थी ।,

 पत्थर तोड़ते-तोड़ते दोपहर हो गई थी। जिस पेड़ के नीचे वह स्त्री बैठी हुई थी वह पेड़ छायादार नहीं था परन्तु विवशतावश उसी पेड़ के नीचे बैठकर काम कर रही थी। उसके हाथ में भारी हथौड़ा था, जिससे वह पत्थरों पर बार-बार चोट मारती थी। उसके सामने ही दूसरी ओर घने वृक्षों की पंक्ति, अट्टालिकाएँ और परकोटे वाली कोठियाँ थीं।

इस कविता का रचनाकाल सन् 1935 है। इसी सन् में भारत में प्रगतिवादी रचनाओं का प्रणयन प्रारम्भ हुआ था। निरालाजी की प्रस्तुत कविता प्रगतिवादी काव्यधारा की ही कविता है, जिसमें सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है। '

वह तोड़ती पत्थर' काव्यावतरण भाव, भाषा और कलात्मकता की दृष्टि से अद्वितीय प्रतीत होता है।

प्रश्न 13. मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख कृतियाँ । 

उत्तर- मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ हैं-(1) साकेत, (2) यशोधरा, (3) द्वापर, (4) भारत - भारती, (5) जय भारत, (6) पंचवटी, (7) झंकार, (8) जयद्रथ वध, (9) त्रिपथगा, (10) कुणाल गीत, (11) नहुष, (12) काबा और कर्बला, (13) विश्व वेदना, (14) विष्णुप्रिया आदि ।

इनके अतिरिक्त (1) चन्द्रहास, (2) तिलोत्तमा, (3) अनध गुप्तजी द्वारा रचित गीति-नाट्य है। (1) वीरांगना, (2) मेघनाद वध, (3) स्वप्नवासवदत्ता । क्रमशः बंगला, संस्कृत और फारसी से अनूदित रचनाएँ हैं।

भारत - भारती अपने समय की लोकप्रिय रचना मानी जाती थी। 

प्रश्न 14. मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं में राष्ट्रीय भावना ।

उत्तर - गुप्तजी एक सच्चे राष्ट्रभक्त कवि थे। हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीयता की जो धारा भारतेन्दु युग में आरम्भ हुई वह गुप्तजी की कविताओं में विकास पाती है। 

राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत पद्यांशों के प्रणयन के कारण ही राष्ट्रकवि के रूप में इन्हें सम्मानित किया गया। राष्ट्रीयता इनके काव्य का मूल स्वर है।

जर्जर वर्तमान को बिम्बित करते हुए उन्होंने लिखा है-

"हम कौन ये क्या हो गये और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें मिल के हम सब ये समस्याएँ सभी ।”

गुप्तजी सच्चे अर्थों में एक युगप्रतिनिधि या राष्ट्रकवि थे। उन्होंने काव्य में युग की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि सभी समस्याओं का अंकन किया। 

साथ ही महान् कवि होने के नाते समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत किया। उनके काव्य में युग चेतना का व्यापक सन्निवेश है। उनकी पावन वाणी का परिधान धारण करके भारत की सांस्कृतिक साधना साहित्य की भूमि पर दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुई।

गुप्तजी ने प्राचीन परम्पराओं की रूढ़ियों को त्याग कर युग के अनुरूप नवीन विचार एवं भाव ग्रहण किए। 'साकेत' के द्वारा उन्होंने मानव-समाज को निष्काम कर्म, सात्विक जीवन, आत्म गौरव, निःस्वार्थ सेवा, कर्त्तव्यपरायणता, सामाजिक समानता, मानवता, समष्टि के लिए व्यष्टि, बलिदान, समन्वय की भावना आदि को उच्च सन्देश दिये।

गुप्तजी ने 'स्वतन्त्रता जन्मसिद्ध अधिकार है' यह मूलमन्त्र लोगों में फेंक दिया। जन्मसिद्ध अधिकार को खोकर बैठे रहने वालों पर गुप्तजी व्यंग्य प्रहार करते हुए अपनी लघुकाव् 'जयद्रथ वध' के माध्यम से कहा

"दुःख शोक जब जो आ पड़े, सो धैर्यपूर्वक सब सहो, होगी सफलता क्यों नहीं, कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो, अधिकार खोकर बैठे रहना, यह महा दुष्कर्म है, न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है। इस तत्व पर ही कौरवों से पाण्डवों का रण हुआ, जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।"

इस प्रकार कदम से कदम मिलाकर चलती हुई राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति गुप्तजी की सम्पूर्ण साहित्य यात्रा स्वतन्त्रता संग्राम के साथ हुई है। जो कहानी राजनीतिक स्तर पर देश के धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक जागरण की कहानी गाँधीजी लिख रहे थे, उसकी सार्थक परिणति गुप्तजी के काव्य में देखी जा सकती है। राष्ट्रकवि की रचनाओं में देश के लिए देखा गया राष्ट्रपिता का सपना साकार होकर हमारे सामने पूर्व प्रभाव के साथ आया है।

प्रश्न 15. निराला और मुक्त छन्द पर निबन्ध लिखिए।

उत्तर- कविवर निराला काव्य को निःसर्ग तथा बन्धन-मुक्त अवस्था में देखने के इच्छुक हैं। वे उसकी इस स्वतन्त्र चेतना में भविष्य के कल्याण के दर्शन करते हैं और यही कारण है कि उन्होंने भाषा, भाव और छन्द तीनों ही क्षेत्रों के बन्धन का विरोध किया है। 

यद्यपि यह सत्य है कि भारतवर्ष > प्राचीन कवि संस्कृत में अपने काव्य का छन्दोबद्ध अवस्था में उपस्थिति करके ही सौन्दर्य का विधान कर सके थे, तथापि यदि हम छन्द बन्धन का त्याग कर काव्य-शैली को अनियन्त्रित रीति से भी मधुर गति का उल्लास दे सकें तो वह निश्चय ही गलत नहीं हैं। 

हमारे कवि ने इसी सिद्धान्त को लेते हुए अपने काव्य में एक ओर तो छन्द-योजना का आदर्श रूप उपस्थित किया है और दूसरी ओर मुक्त छन्द के अति-वैषम्य में भी एकत्व का उद्भावन किया है। 

वास्तव में उन्होंने छन्द-शास्त्र की प्राचीन मर्यादाओं का विरोध कहीं भी नहीं किया और सर्वत्र यही चेष्टा की है कि छन्द के कारण उनके काव्य का प्रवाह अवरुद्ध न होने पाए। इसी कारण उनकी मुक्त छन्द में लिखी कविताओं में भी हमें कहीं-कहीं छन्द की प्राप्ति हो जाती है।

निराला छन्द में प्रणीत काव्य में हृदय के विशिष्ट प्रतिनिधित्व के दर्शन करते हैं, और प्रतिनिधि सृष्टि के कारण उसमें स्वाभाविकता को विशेष सन्निहित मानते हैं। यह कविता इसका प्रमाण है 

मुक्त छन्द
सहज प्रकाशन वह मन का,
निज भावों का प्रकट अकृत्रिम चित्र ।

मुक्त छन्द के विषय में यह धारणा स्वाभाविक ही है। इसमें आशा का मंगलमय सन्देश तो निहित है ही साथ में इसमें एक सौन्दर्यवादी कवि के अनुकूल निःसर्ग काव्य-रचना का दृष्टिकोण भी पूर्णतः निखर उठा है।

छन्द का भाषा से सहज मेल होता है। कवि ने इस तथ्य की हृदयंगम कर अपनी भाषा को उपयुक्त स्तर पर आयोजित करते हुए उसमें एक विशेष गति का विधान किया है। भाषा के विषय में उनका दृष्टिकोण स्पष्टतः सांगीतिक चेतना के आयोजन पर आधारित है। 

वे हिन्दी के गीतिकाव्य-सृष्टाओं में प्रमुख स्थान रखते हैं और उन्होंने इस क्षेत्र में अनेक भौतिक आदर्श उपस्थित किए हैं।

प्रश्न 16. निराला की भाषा व शैली ।

उत्तर - भाषा - निराला जी की भाषा शुद्ध खड़ी बोली है। उस पर उनका पूर्ण अधिकार है। उनका विश्वास था कि कवि को अपने भावों के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग करना चाहिए। 

उन्होंने स्पष्ट लिखा है- “किसी भाव को जल्दी और आसानी से तभी हम व्यक्त कर सकेंगे, जंब भाषा स्वतन्त्र और भावों की सच्ची अनुगामिनी होगी ।"

आपकी भाषा आपके भावों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करती है, जबकि भाषा पर बंगला भाषा का प्रभाव स्पष्ट लक्षित होता है। उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्राचुर्य देखने को मिलता है। 

संस्कृत शब्दों के बाहुल्य के कारण ही आपकी भाषा क्लिष्ट हो गई है। कुछ आलोचकों ने आपकी भाषा की क्लिष्टता से चिढ़कर आपको 'आधुनिक केशव' कह दिया है । यह सत्य है कि आपकी भाषा क्लिष्ट है, परन्तु भावों के अनुरूप है। 

आपकी भाषा की दुरूहता का कारण आपकी दार्शनिकता भी है। इसके साथ ही आपने सरल भाषा का प्रयोग अपनी प्रगतिवादी कविताओं में किया है। वहाँ आपने उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का भी निःसंकोच रूप में प्रयोग किया है। आपने अपनी अलौकिक प्रतिभा से हिन्दी भाषा को बहुत से नवीन शब्दों का भण्डार प्रदान किया है। 

आपने अपने निराले व्यक्तित्व से खड़ी बोली को निराला रूप प्रदान किया है। सारांश यह है कि आपकी भाषा शुद्ध, परिष्कृत, व्याकरण सम्मत, चित्रोपम, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशील है ।

शैली - निराला जी ने अपने काव्य की रचना गीत शैली में की है। आपकी इस शैली में गीत की समस्त विशेषताएँ उपलबध हो जाती हैं। निराला जी के गीतों को विशेष दृष्टि से पाँच भागों में विभाजित कर सकते हैं -

(1) शृंगारिक गीत, (2) विनय और प्रार्थना के गीत, (3) राष्ट्रीय गीत, (4) प्रगतिशील या सामाजिक गीत, और (5) प्रयोगात्मक गीत । निराला जी की शैली में प्रतीकात्मकता, लाक्षणिकता, चित्रात्मकता और संगीतात्मकता जैसे गुण विद्यमान हैं। 

प्रश्न 17. पन्त के काव्य में प्रगतिशील चेतना। 

सौंदर्य प्रेम के कवि पंत अतिकाल तक सूक्ष्म की साधना में लीन न रह सके। कवि का अतृप्त मन फिर स्थूल की ओर उन्मुख होता है। कवि की आत्मा में प्रगतिवादी विचारा कार्य करती है। 'गुंजन' से पूर्व प्रकृति प्रधान और मानव गौण था। 

अब तक कवि प्रकृति प्रधान रचना करता था और मानवीय दृष्टिकोण से रचनाएँ नहीं की थीं। कवि के दृष्टिकोण में परिवर्तन के साथ ही उसकी दृष्टि मानव पर जमी। अब कवि प्रकृति को मानव के दृष्टिकोण से देखने लगा। 

प्रकृति के क्रिया-कलापों में मानव की ही छाया थी।

सीख़ा तुमसे फूलों ने मुख मंद देख मुस्काना, तारों ने सजल नयन हो, करुणा किरणें बरसाना, सीखा हँसमुख लहरों ने, आपस में मिल खो जाना, अलि ने जीवन का मधु पी, मृदु राग प्रणय के गाना । 

कवि की कल्पना निराधार शून्य में घरौंदे बनाना छोड़कर इस पृथ्वी पर अपने पैर टिकाती है तो उसे मानवता की सुन्दरता के दर्शन होते हैं

"सुन्दर है बिहंग, सुमन सुन्दर
, मानव ! तुम सबसे सुन्दरतम् । निर्मित सबकी मिल सुषमा से तुम निखिल सृष्टि से चिर निरूपम ।'

कवि भू पर स्वर्ग की स्थापना मानव द्वारा कर सकता है, पर कब ? जब बाह्य एवं आन्तरिक दोनों प्रकार के सुधारों का प्रसार हो । 

जाति, वर्ण, भाषा-भेद के साथ धनी - निर्धन का भेद मानव की प्रगति में बाधक है। मानव को इन्हें पहचानना पड़ेगा तथा इनको अपने मन से दूर निकालकर फेंकना होगा। 'युगवाणी की खोज' नामक कविता में कवि ऐसे मानव की खोज में है जो कि

“आज मनुज को खोज निकालो, जाति, वर्ण संस्कृति समाज से। मूल व्यक्ति को फिर से पालो । देश राष्ट्र के विविध भेद हर, धर्म नीतियों में समत्व भर, रूढ़ि रीतिगत विश्वासों की
अन्ध यवनिका आज उठा लो।”

इस प्रकार हम देखते हैं कि पन्तजी अपने युग के अनेक प्रगतिवादी कवियों से कहीं आगे हैं। उसके प्रगतिवाद में सभ्यता तथा शिष्टता की एक गूँज है। 

पन्तजी का विश्वास है कि यदि मानव अकेला सुधर जाये तो प्रकृति में उसके सुखोपभोग के लिए पर्याप्त साधन हैं, जिनका प्रयोग करके मानव-समाज पूर्णतया सुखी रह सकता है। किन्तु इसके लिए उसे सर्वप्रथम मानव बनना पड़ेगा। 

मानव यदि मानव बन सका तो उसके लिए इसी पृथ्वी पर ही कुछ भी अलभ्य नहीं रह जायेगा । कवि ने अपने काव्य में सर्वत्र ही लोकहित की दिशा का अनुसंधान किया है। कवि के काव्य में छायावाद, रहस्यवाद तथा प्रगतिवाद का पूर्ण समन्वय है। 

फिर भी कवि किसी वाद का समर्थक नहीं अपितु वह एकमात्र सौन्दर्योपासक, प्रकृति का सुकुमार कोमल कवि ही शेष रहता है।

 प्रश्न 18. सुमित्रानन्दन पन्त की 'भारत माता' कविता का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर - भारत माता कविता में कवि ने परतन्त्र भारत की दीनता का जिक्र करते हुए उसके दुःख का वर्णन किया है। कवि भारत को माता से सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि दासता में बँधी होने के कारण भारत माता का स्वरूप अत्यन्त विषाद से भरा हुआ है। 

दीनता से भारत माता आँखें झुकाये अपलक नेत्रों से प्रतिभा की तरह देख रही है। भारत माता के होठों पर चिर और शान्त रोदन है। 

भारत माता युग-युग की परतन्त्रता के अन्धकार विषाद से भर गयी है। विषण्ण में भारत माता आज अपने ही घर में प्रवासिनी की तरह हो गई है। 

भारत माता अनादि काल से इस परतन्त्रता की ज्वाला में जलते-जलते अति दीन हो गई है। उसका मत अति दुःखी है। आज वह अपने ही घर में एक परदेशी की तरह कैद है।

भारत माता कविता में कवि ने भारत माता को ग्राम निवासिनी कहा है। कवि कहते हैं कि आज मेरी माता की युगों-युगों की तपस्या समाप्त हुई। वह अहिंसा रूपी अमृत का दूध पिलाकर अपनी सन्तान के भय को दूर कर रही है। 

उनका अहिंसा का सिद्धान्त संसार के भय और निराशा को दूर करने वाला है। मेरी भारत माता संसार की माँ हैं। मानव मात्र के लिए उनके प्रेम भरे अन्तस में सन्तान की माया है।

भारत माता कविता में कवि भारतवासियों की आत्मा पर बल देते हुए उनमें चेतना जाग्रत करते हैं। जिसकी वजह से आज हम स्वतन्त्र देश के नागरिक बन पाये हैं।

 प्रश्न 19. निः शस्त्र सेनानी कविता का केन्द्रीय भाव लिखो। 

उत्तर - निःशस्त्र सेनानी कविता में कवि पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर रहने का चित्रण संवाद के माध्यम से किया है। कवि कहता है कि हे भाई! ये स्वजन से दिखने वाले कौन लोग खड़े हुए हैं ? फिर स्वयं ही उत्तर देता है कि इनका कोई नाम नहीं है, इनका तो बस कर्म करते रहने में ही विश्वास है । 

कवि पुनः प्रश्न करता है कि क्या ये भाई-बहन हैं? तो उत्तर मिलता है- इनमें से अहिंसा बहन है और आत्मबल उसका भाई है। कवि का यहाँ तर्क है कि आत्मबल से अहिंसा की शक्ति मिलती है। 

जिन्होंने इस संसार की रचना की है वही सृष्टि के रचयिता इनके पिता हैं और जिसने पृथ्वी पर इतनी सुंदर रचनाओं की सृष्टि की और सुख के साधनों की रचना की है, वही प्रकृति इनकी माता है।

इस विश्व को अमरत्व प्रदान करने की इच्छा और आत्म निर्भर हो जीवित रहने की शक्ति प्राप्त है। देह क्या है - देह तो सुली पर चढ़ा हुआ एक चमड़े का टुकड़ा मात्र है और क्रांतिकारी इस देह की कभी परवाह नहीं करते।

क्रांतिकारियों का क्षेत्र क्या है - संपूर्ण विश्व ही कार्य क्षेत्र है । शोक का अर्थ पीड़ित मानव की आवाज से है जो अंत तक कंपा देती है। कवि कहता है कि कर्मवीरों को हर्ष उस समय होता है, जब वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं ।

कवि ने क्रांतिकारियों का विभिन्न उपमानों के माध्यम से परिचय देता है। 

प्रश्न 20. 'साम्राज्ञी का नैवेद्य-दान' कविता का )

उत्तर- 'साम्राज्ञी' का नैवेद्य-दान' कविता 'अज्ञेय' द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने जापान की साम्राज्ञी कोनित्यों को रिक्त हस्त मन्दिर पहुँचने पर उभरने वाले मनोभाव का चित्रण किया है। 

इस कविता में महात्मा बुद्ध के दर्शन की मूलाधार करुणा की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है। गौतम बुद्ध द्वारा प्रसारित करुणा की भावना पर प्रकाश डालते हुए कवि ने साम्राज्ञी के माध्यम से स्पष्ट करना चाहा है कि प्रकृति के अणु परमाणु में निरन्तर बुद्ध की करुणा सुनायी पड़ती है। 

साम्राज्ञी जीवन की भावानुकूलता तथा सुखात्मक आनन्दानुभूति में भी बुद्ध की करुणा को भूल नहीं पाती। करुणा के कारण ही साम्राज्ञी को अन्तरंग और बहिरंग जगत को समझने की शक्ति मिली है। इसी के आधार पर वह जगत की सुखात्मक अनुभूति करती है। 

मानवेत्तर जगत में भी कलियों के रूप में विकासोन्मुख बुद्ध की करुणा पेड़-पौधों की शाखाओं पर दृश्यमान रहती है। इसी कारण उस करुणा से प्रेरित होकर ही साम्राज्ञी उन कलियों को उनकी शाखाओं से विलग कर बुद्ध के प्रति समर्पित रहने का साहस नहीं जुटा सकी। 

वह बुद्ध से निवेदन करती है कि मेरे द्वारा लाया गया पुष्प जो दूसरों द्वारा संचित होगा कोई महत्त्व न रखता और न ही तुम्हारे महान् व्यक्तित्व के अनुरूप होता। अतः देव मेरे खाली हाथ आने को क्षमा कर मेरे निवेदन को स्वीकार कर कृतार्थ करो । 

इस कविता के माध्यम से कवि ने बौद्ध मत के अहिंसा और करुणा की सुन्दर अभिव्यक्ति की है।

प्रश्न 21. 'अर्वाचीन हिन्दी काव्य' में संकलित पाँच कवियों का पूरा नाम लिखिए। 

उत्तर - 'अर्वाचीन हिंदी काव्य में संकलित पाँच कवियों के नाम निम्न है

(1) मैथिलीशरण गुप्त, (2) पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, (3) माखनलाल चतुर्वेदी, (4) सुमित्रानन्दन पंत, (5) सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' ।

 प्रश्न 22. टिप्पणी लिखिए - "ताज" कविता का सार । 

उत्तर - ताज कविता “सुमित्रानंदन पंत” द्वारा लिखी गई कविता है, जिसमें उन्होंने अपना आक्रोश तो व्यक्त किया ही है, लेकिन अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए ताज को आधार बनाया है। 

कवि का कहना है कि जब समाज में गरीबों और असहायों का शोषण करने वाले लोग उत्पन्न हो जाते हैं तो मानवता त्राहि-त्राहि करने लगती है। 

ताजमहल को आधार बनाकर कवि ने शोषक वर्ग की आलोचना की है तथा उन्हें गरीबों और असहायों के प्रति संवेदनशील रहने की सलाह देती है। कवि का कहना है कि समाज में बहुत लोग ऐसे हैं, जिन्हें एक वक्त का खाना तक ढंग से नहीं मिल पाता, उनके पास पहनने को कपड़े तक नहीं हैं, रहने को घर नहीं है। 

वहीं कुछ लोग ऐसे हैं, जो अपनी मृतक पत्नी की याद में करोड़ों रुपयों का भवन अर्थात् ताजमहल बनवा देते हैं। ये शरीर तो नश्वर है, उसके नष्ट हो जाने पर उस शरीर की याद में पत्थर के भवन बनवाने से क्या फायदा। 

जबकि जिंदा शरीर भूख-प्यास से तड़प रहे हों, ये कहाँ का न्याय है। ये मानवता नहीं है, ये शोषण है।

प्रश्न 23. हरिऔध की भाषा शैली पर टिप्पणी

उत्तर- हरिऔध जी का भाषा पर व्यापक अधिकार है। उन्होंने ब्रज और खड़ी बोली दोनों भाषाओं में समानाधिकार से रचनाएँ की हैं। खड़ी बोली पर हरिऔध जी के समान अन्य किसी कवि का व्यापक अधिकार नहीं है।

वे जैसी सफलता से संस्कृतमयी भाषा में अभिव्यक्त करते हैं, उतनी ही सफलता से बोल-चाल की मुहावरेदार हिन्दी में भी रचनाएँ करते हैं। संस्कृनिष्ठ तथा बोल-चाल की भाषा पर उनका समान रूप से अधिकार है।

हरिऔधजी की ब्रजभाषा में सरलता, सरसता आदि के गुण मिलते हैं न तो उसमें क्लिष्टता है और न शब्दों की तोड़-मरोड़ ही है। हरिऔध जी की ब्रजभाषा पर खड़ी बोली का स्पष्ट प्रभाव है। खड़ी बोली हिन्दी में 'हरिऔध' जी के 'प्रिय-प्रवास' वैदेही- वनवास' और 'चौपदे' प्रमुख ग्रन्थ हैं। '

प्रिय-प्रवास' और 'वैदेही वनवास' की भाषा संस्कृतनिष्ठ है। कहीं पर यदि हिन्दी क्रियाओं को निकाल दिया जाये तो भाषा हिन्दी के स्थान पर विशुद्ध ही बन जाती है। निम्नलिखित उदाहरण में देखिये 

रुपोद्यान प्रफुल्ल प्राय कलिका राकेन्दु बिम्बानना।
तन्वंगी कल- हासिनी सुरसिका क्रीड़ा-कला पुत्तली ॥ 

संस्कृत के वर्णिक वृत्रों के प्रयोग और क्लिष्ट भाषा की अभिव्यक्ति के कारण ही भाषा का यह क्लिष्ट और संस्कृतनिष्ठ रूप हो गया है, पन्तु सर्वत्र ऐसी भाषा नहीं है। वह सरल और प्रसाद गुण से युक्त है। एक उदाहरण लीजिए

ठुमकते गिरते पड़ते हुए,
जननि के कर की उँगली गहे। सदन में चलते जब श्याम थे, उमड़ता तब हर्ष पयोधि था ॥ 

'हरिऔध' जी के काव्य की बोलचाल की भाषा सर्वथा काव्योचित है। उसमें कठिन शब्दों का बहिष्कार और प्रतिदिन के बोल-चाल के शब्दों का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार की भाषा में मुहावरों और कहावतों का प्रयोग बहुत अधिक हुआ है। इस सम्बन्ध में 'हरिऔध' जी का निम्न कथन दृष्टव्य है

'मुहावरे हमारी बोलचाल के लिए जीवन की चमकती चिंगारी स्वरूप स्फूर्ति हैं। वे भोज्य पदार्थों की उस जीवन-प्रदायनी सामग्री के समान हैं, जो उनको सुस्वादु तथा लाभप्रद बनाती है। मुहावरों से शून्य भाषा या लेखन-शैली अमधुर, शिथिल तथा असुन्दर हो जाती है। "

हरिऔघजी की मुहावरेदार भाषा
नहीं मिलते आँखों वाले, पड़ा अंधेर से है पाला। कलेजा कब किसने थामा, देख छिलते दिल का छाला ॥

भाषा के समान 'हरिऔध' जी की काव्य- -शैली में भी विविधता है। वह विषय के अनुकूल बदलती रहती है। वर्णन प्रधान विषय में शैली - इतिवृत्तात्मक हो जाती है उनकी सुधारवादी और उपदेशात्मक रचनाओं की शैली का यही रूप मिलता है। 

भाषा की गहनता या अनुभूतियों के प्रकाशन के प्रसंग में शैली भावात्मक हो गई है। - प्रिय प्रवास और अयोध्या सिंह "हरिऔध” ।

प्रश्न 24. प्रिय प्रवास का काव्य सौन्दर्य । 

उत्तर - आगे चलकर ब्रजभाषा के प्रति हरिऔध जी का मोह नहीं रहा और वे खड़ी बोली की ओर आ गए। पहले उन्होंने बोल-चाल की खड़ी बोली में उर्दू छन्दों को अपनाया। 

इसके पश्चात् पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से संस्कृति-वर्णन-वृन्तों और संस्कृत की समस्त पदावली में महाकाव्य 'प्रिय प्रवास' की रचना की । 

'प्रिय - प्रवास' हरिऔध जी का कीर्ति-स्तम्भ है और खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। 'प्रिय - प्रवास' की रचना से पूर्व खड़ी बोली हिन्दी में अच्छे काव्यों तथा महाकाव्यों का प्रायः अभाव था।

'प्रिय-प्रवास' में श्रीकृष्ण का पावन-चरित्र है, परन्तु 'प्रिय - प्रवास के कृष्ण काव्य परम्परा में प्रेम से लथपथ रसिक बिहारी कृष्ण न होकर लोक-सेवी जननेता श्रीकृष्ण हैं। राधा भी कृष्ण का पावन आदर्श लेकर अन्त में लोकसेविका बन जाती है। 

लोक हित के लिए 'प्रिय- प्रवास के कृष्ण और राधा अपने स्वार्थों का बलिदान करते दिखाई पड़ते हैं। प्राचीन भक्त कवियों के राधा-कृष्ण 'प्रिय-प्रवास' में आकर सर्वथा नवीन हो गए। बीसवीं शताब्दी की बुद्धिवादी विचारधारा से प्रभावित कृष्ण 'प्रिय-प्रवास' में आकर सर्वथा नवीन हो गए। 

बीसवीं शताब्दी की बुद्धिवादी विचारधारा से प्रभावित कृष्ण की अलौकिक घटनाओं को भी हरिऔध जी ने लौकिक रूप प्रदान किया। जनश्रुति के अनुसार कृष्ण ने अंगुली पर गोवर्धन को उठाया, परन्तु 'प्रिय-प्रवास' के अनुसार 

लख अपार प्रसार गिरीन्द्र में, ब्रज घराधिप के प्रिय पत्र को । सकल लोक लगे कहने उसे, रख लिया अंगुली पर स्याम ने।

'प्रिय - प्रवास' महाकाव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संस्कृत के अतुकान्त वर्णिक छन्दों का प्रथम बार प्रयोग हुआ है।

'वैदेही वनवास' हरिऔध जी की दूसरी प्रबन्ध कृति है। 'प्रिय-प्रवास' के समान इसमें भी 'हरिऔध' जी ने लोकसेवा का पावन आदर्श उपस्थित किया है। 

इस ग्रन्थ में भी बुद्धिवाद का पर्याप्त अभाव है, इसमें राम और सीता के उनके पूर्ववर्ती रूपों का मानवीय रूप प्रदान किया गया है 'वैदेही - वनवास' में 'गाँधीवादी शान्ति' और अहिंसा का समर्थन है। इनमें 'हरिऔध' ने सुधारवादी दृष्टिकोण को अधिक ग्रहण किया है। 

प्रश्न 25. सुभद्रा कुमारी चौहान के काव्य की विशेषताएँ

उत्तर-साहित्यिक विशेषताएँ-सुभद्रा जी की काव्य साधना के पीछे उत्कट देश-प्रेम, अपूर्व साहस और आत्मोत्सर्ग की प्रबल कामना है। आजादी के लिए जेल-जीवन की सम्पूर्ण यातनाओं को हँसते-खेलते, सुखपूर्वक सहने में उन्हें विशेष आनन्द आता था। इनकी कविता में सच्ची वीरांगना का ओज और शौर्य प्रकट हुआ है।

सुभद्रा जी की कविता में मुख्यतः दो प्रकार की काव्य प्रवृत्ति उजागर हुई हैं- पहली राष्ट्रीय भावना और दूसरी घरेलू जीवन। राष्ट्रीय भावनाओं की कविताओं में कवयित्री का देश प्रेम उजागर होता हैं। 

इन कविताओं में वे एक जनकवि के रूप में दिखाई देती हैं। इनकी कविताओं में अपने की काव्य प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। भारतीय इतिहास और संस्कृति की भी गहरी छाप उनके काव्य में मिलती है। 

'झाँसी की रानी', 'वीरों का हो कैसा बसन्त', 'सेनानी का स्वागत', 'राखी की चुनौती', 'जलियाँवाला बाग', 'विजयादशमी' आदि ऐसी कविताएँ हैं जिनमें इनकी देश-प्रेम की भावना झलकती है। 'वीरों का हो कैसा बसन्त' की निम्नांकित पंक्तियों में देशप्रेम की ओजस्विनी अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है - 

हल्दीघाटी के शिलाखण्ड, 
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचण्ड,
राणा ताना का कर घमण्ड,
दे जगा आज स्मृतियाँ ज्वलन्त 
वीरों का हो कैसा बसन्त ।

घरेलू जीवन से सम्बन्धित इनकी कविताओं में पारिवारिक सम्बन्धों को आधार बनाकर विविध भावनाएँ व्यक्त की गई हैं। 'बालिका का परिचय', 'पाया मैंने बचपन फिर से', 'बचपन बेटी बन आया' आदि ऐसी ही कविताएँ हैं। 'समर्पण', 'ठुकरा दो या प्यार करो', 'प्रियतम से' आदि कविताएँ प्रेम और भक्तिपरक हैं ।

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