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केंद्र राज्य वित्तीय सम्बन्ध - kendra rajya vittiya sambandh

26 जनवरी, 1950 से भारतीय गणराज्य की स्थापना हुई। इसी दिन देश में नया संविधान भी लागू हुआ तथा केन्द्र व राज्यों के बीच वित्तीय सम्बन्ध निर्धारित किये गये। इसमें यह व्यवस्था की गयी कि भारत के राष्ट्रपति की आज्ञा से प्रत्येक पाँच वर्ष बाद एक वित्तीय आयोग की स्थापना की जायेगी।  

जिसका सम्बन्ध पंचवर्षीय योजनाओं से था तथा जो राज्यों व केन्द्र के बीच समय-समय पर वित्तीय सम्बन्धों को स्थापित करेगा। भारत के स्वतन्त्र होने के पश्चात् देश के आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं को शुरू किया गया। 

इससे केन्द्र व प्रान्तों के बीच वित्तीय साधनों का महत्व और अधिक बढ़ गया है।

केंद्र राज्य वित्तीय सम्बन्ध 

संविधान की धारा 246 के अन्तर्गत संवैधानिक शक्तियों को इन तीनों भागों में विभाजित किया गया है-संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची। संसद को कोई भी नियम बनाने के अधिकार दिये गये। नये संविधान के अन्तर्गत आय के स्रोतों का बँटवारा निम्न प्रकार से किया गया है ।

(1) केन्द्रीय स्रोत 

केन्द्र अपनी आय के स्रोत में पूर्णरूपेण स्वतन्त्र है। इसमें उन स्रोतों को रखा गया है जिन पर पूर्ण अधिकार केन्द्र सरकार का रहेगा । जैसे- रेलवे, डाक-तार, प्रसारण, संचार, सीमा कर, निगम कर, कम्पनियों की पूँजी पर कर, उत्पादन शुल्क, मुद्रा व विदेशी विनिमय, अंश बाजार के सौदों पर मुद्रांक कर से भिन्न कर, चैक, हुण्डियों आदि पर मुद्रांक कर, सम्पदा पर कर, विदेशी ऋण, संगठित लौटरियाँ, संघ सरकार की सम्पत्ति, डाकखाना, बचत बैंक, संघ का लोक ऋण, भारत का रिजर्व बैंक आदि ।

(2) राज्य स्रोत

इस स्रोत द्वारा प्राप्त आय का उपयोग राज्य सरकारों द्वारा ही किया जा सकेगा। इसमें मुख्यतया कृषि आय कर, मालगुजारी विक्रय कर, मनोरंजन कर, भू-राजस्व, भूमि व भवनों पर कर, खनिज अधिकार पर कर, पूँजी कर, मादक द्रव्य पर उत्पादन कर, विद्युत सामग्री के उपभोग पर कर, विज्ञापनों पर कर, वाहनों पर कर, सड़कों पर यात्रा कर चुंगी कर, पथकर आदि प्रमुख हैं।

(3) विभाजित स्रोत

इसमें कर लगाने व वसूल करने के अधिकार केन्द्र को प्राप्त होंगे, परन्तु प्राप्त सम्पूर्ण आय वित्त सिफारिशों के आधार पर निर्धारित अनुपात में राज्यों के मध्य विभाजित कर दी जायेगी तथा केन्द्र कुछ भी अंश अपने पास नहीं रखेगा । जैसे- गैर-कृषि आय पर लगे कर, उत्पादन कर, भाड़े पर कर,विभाजन पर कर आदि ।

(4) केन्द्र द्वारा लगाये व राज्यों को विभाजित स्रोत

इसमें वे कर शामिल किये जाते हैं जो केन्द्र द्वारा लगाये व वसूल किये जाते हैं, परन्तु उनकी आय राज्यों को विभाजित कर दी जाती है जैसे- सम्पत्ति के उत्तराधिकार पर कर, बिलों, प्रतिज्ञा-पत्रों, चैक व बीमा पॉलिसी पर स्टाम्प कर, माल व यात्रियों पर सीमान्त कर, रेलवे भाड़े पर कर आदि ।

अन्य स्रोत  - इसमें निम्नांकित स्रोतों को शामिल किया जाता है

(1) केन्द्र द्वारा लगाये व राज्य द्वारा वसूल - कुछ कर केन्द्र द्वारा लगाये जाते हैं, परन्तु उन्हें राज्य सरकारें वसूल करेंगी और यह उन्हीं की आय के स्रोत माने जायेंगे। जैसे- स्टाम्प पर कर, सौन्दर्य प्रसाधन पर लगा कर आदि ।

(2) केन्द्र द्वारा लगाये व वसूल परन्तु विभाजन योग्य मदें – धारा 270 के अन्तर्गत कुछ करों को लगाने व वसूल करने का अधिकार केन्द्र सरकार को होगा, परन्तु उसकी शुद्ध आय का विभाजन केन्द्र एवं राज्य सरकारों के मध्य वित्तीय आयोग की सिफारिशों के आधार पर होगा । जैसे—कृषि आय को छोड़कर अन्य आय पर कर एवं उत्पादन कर आदि ।

(3) अतिभार – केन्द्र सरकार आय कर एवं उत्पादन करों पर अतिभार लगा सकती है जो विभाजनशील नहीं होगा और इसकी समस्त आय पर केन्द्रीय सरकार का ही अधिकार होगा।

(4) व्यवसाय कर – राज्य सरकार व्यवसाय पर कर लगा सकती है। इसकी अधिकतम सीमा 850 रुपये वार्षिक तक हो सकती है। व्यवसाय कर व्यक्ति की आय के आधार पर भिन्न-भिन्न हो सकता है । 

(5) अनुदान की व्यवस्था - संविधान के अनुच्छेद 273 के अनुसार यह व्यवस्था की गयी है कि जूट का निर्यात करने वाले राज्यों को संचित निधि से अनुदान मिलेगा।

(6) राज्य के हितों की सुरक्षा-संसद द्वारा किसी वित्तीय मामले पर अधिनियम बनाने पर राज्य के हित जुड़े हों और तो राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी जिससे राज्य के हितों को सुरक्षित रखा जा सके।

(7) प्रशासनिक सुविधा का समन्वय - राज्य वित्त सम्बन्धी विषयों पर प्रशासनिक सुविधा एवं समन्वय की दृष्टि से संविधान में व्यापक रूप से व्यवस्थाएँ की गयी हैं।

(8) विशेष व्यवस्थाएँ - संविधान में कुछ एक विशेष व्यवस्थाएँ की गयी हैं जिससे केन्द्र सरकार की आय एवं सम्पत्ति पर राज्य सरकारों द्वारा कर नहीं लगाया जा सकता । ऐसा करने से केन्द्र के स्रोतों को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गयी है ।

(9) वित्त आयोग – केन्द्र व राज्यों के मध्य वित्तीय सम्बन्धों को मधुर बनाने के लिए प्रत्येक पाँच वर्ष के बाद वित्त आयोग की स्थापना की जाती है जिसमें एक सभापति के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य भी होते हैं । यह वित्त आयोग निम्न विषयों पर राष्ट्रपति को सुझाव देता है -

  1. करों की आय को केन्द्र व राज्य के मध्य विभाजित करने की व्यवस्था । 
  2. राज्यों को दिये गये सहायक अनुदानों का निर्धारण करना ।
  3. वित्त व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने हेतु अन्य मामलों पर परामर्श देना आदि ।

अब तक 10 वित्त आयोगों की स्थापना की जा चुकी है।

( 10 ) ऋण – भारतीय संविधान की धारा 293 में यह व्यवस्था की गयी है कि केन्द्रीय सरकार प्रान्तीय सरकारों के ऋण की गारण्टी दे सकती है तथा वह ऋण भी दे सकती है। केन्द्रीय सरकार ऋणों को संचित कोष से देगी। राज्य सरकारें बाजार से ऋण प्राप्त करने के लिए केन्द्र से अनुमति प्राप्त करेंगे, तभी वे ऋण ले सकेंगे । 

(11) वित्तीय आपातकालीन शक्तियाँ - यदि भारत के राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाय कि भारत के किसी भाग में वित्तीय व्यवस्था संकटकालीन स्थिति में पहुँच गयी है या वहाँ की साख संकट में पड़ गयी है तो यह संविधान के अनुच्छेद 360 के अनुसार वित्तीय संकट की घोषणा कर सकता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति उस क्षेत्र या राज्य के सरकारी कर्मचारियों तथा न्यायाधीशों तक के वेतन व भत्तों में कमी कर सकता है ।

वित्तीय साधनों का विभाजन

भारत सरकार अधिनियम, 1935 पर आधारित वित्तीय साधनों का केन्द्र एवं राज्य के मध्य विभाजन निम्न प्रकार रखा गया था -

(1) आयकर

प्रथम वित्त आयोग को विश्वास था कि आयकर को केन्द्र व राज्यों में स्रोतों के उचित समायोजन हेतु एक सन्तुलन तत्व के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा। 1935 के अधिनियम के अनुसार राज्यों को आयकर की राशि भी बंटनी थी। राज्य सरकारों को आयकर लगाने के अधिकार नहीं थे। निगम कर पूर्ण रूप से केन्द्रीय सरकार को प्रदान किया जाता है और राज्यों को विभाजित कोष का 50% भाग देना निश्चित किया गया ।

प्रथम वित्त आयोग – ने आय कर विभाजन में निम्नांकित को आधार माना - (i) विभिन्न राज्यों में एकत्रित की गयी आय कर की राशि, (ii) आयकर वसूली की राशि, (iii) प्रत्येक राज्य की जनसंख्या, (iv) औद्योगिक श्रमिकों की सापेक्षिक मात्रा, (v) सापेक्षिक प्रति व्यक्ति आय, (vi) विभिन्न आधार पर विभिन्न राज्यों की आवश्यकताएँ ।

द्वितीय वित्त आयोग ने राज्यों के हिस्सों को बढ़ाकर 60% कर दिया तथा यह सुझाव दिया कि राशि का 10% भाग संग्रहण आधार तथा 90% भाग जनसंख्या आधार पर वितरित किया जाना चाहिए । आयकर की शुद्ध प्राप्ति का 1% भाग केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए निश्चित किया गया है ।

तृतीय वित्त आयोग ने राज्यों के हिस्सों को बढ़कर 663% कर दिया तथा यह राशि 20% संग्रहण आधार पर व 80% जनसंख्या आधार पर विभाजित की जानी चाहिए । केन्द्र शासित प्रदेशों का भाग बढ़कर 2.5% करने की सिफारिश की गयी ।

में चतुर्थ वित्त आयोग ने यह अनुभव किया कि विगत 12 वर्षों की अवधि में निगम कर में 70% से वृद्धि हुई, जबकि इस अवधि में आयकर में 50% से वृद्धि सम्भव न हो सकी। अतः आयोग ने राज्यों का भाग बढ़ाकर 75% करने की सिफारिश की।

पंचम वित्त आयोग ने सिफारिश की कि आय कर की प्राप्ति में से राज्यों का हिस्सा 75% होगा जो कि 90% जनसंख्या के आधार पर व 10% तुलनात्मक संग्रह के आधार पर वितरित किया जाना चाहिए। संघ शासित क्षेत्र का 2.6% भाग निर्धारित किया गया है।

छठवें वित्त आयोग ने राज्यों के अंश के निर्धारण का आधार वही रखा जो पाँचवें आयोग ने निश्चित किया था, परन्तु राज्यों को प्राप्त होने वाला अंश बढ़ाकर 80% कर दिया । केन्द्र शासित क्षेत्रों को आयकर की शुद्ध प्राप्ति का 2.10% भाग प्राप्त होगा।

सातवें वित्त आयोग ने राज्यों को 85% भाग वितरित करने की सिफारिश की तथा 2.19%, भाग संघ क्षेत्रों के लिए रखा ।

आठवें वित्त आयोग ने कुल विशुद्ध प्राप्तियों का 2.79% संघ क्षेत्रों को वितरित करने तथा कुल आय कर प्राप्तियों का 85% राज्यों को वितरित करने का सुझाव दिया ।

नवें वित्त आयोग ने 1990-95 की अवधि में सभी राज्यों को कुल मिलाकर 1,06,036.43 करोड़ रुपये दिये जाने की सिफारिश की।

दसवें वित्त आयोग ने राज्यों को आयकर प्राप्ति का 85% भाग वितरित करने का सुझाव दिया ।

(2) जूट निर्यात कर

विभाजन के बाद जूट के 70% क्षेत्र पाकिस्तान के पास चले गये। परिणामस्वरूप भारत सरकार को 1919 के जूट निर्यात कर के वितरण की व्यवस्था में परिवर्तन करना पड़ा। 1947 से भारत में जूट उत्पादित क्षेत्रों का अंशदान घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया । इस व्यवस्था के विरोध में पश्चिम बंगाल ने यह कहा कि देश में पश्चिम बंगाल ही जूट उत्पादन का एक शक्तिशाली क्षेत्र रह गया है । 

अतएव उसे क्षतिपूर्ति की राशि अधिक और लम्बे समय तक मिलनी चाहिए। उस पर विचार किया गया। यह निश्चित राशि पश्चिम बंगाल, बिहार, असोम व उड़ीसा के लिए क्रमश: 100 लाख रुपये,17 लाख रुपये, 15 लाख रुपये व 3 लाख रुपये थी । इस बात को वित्त आयोग के सामने रखा गया और उसकी सिफारिश पर यह राशि बढ़ाकर क्रमशः 105 लाख रुपये,40 लाख रुपये, 35 लाख रुपये एवं 5 लाख रुपये कर दी गयी । 

आयोग का सुझाव था कि अनुदान की राशि धारा 273 के अनुसार क्रमश: 150 लाख, 75 लाख, 75 लाख और 15 लाख रुपये होनी चाहिए। दूसरे वित्त आयोग ने इस राशि को बढ़ाकर क्रमश: 152.69 लाख,72.31 लाख,75 लाख एवं 15 लाख रुपये वार्षिक निश्चित किया ।

(3) केन्द्रीय सरकारी कर

शक्कर, तम्बाकू एवं वनस्पति के उत्पादन पर लग हुए करों की आय राज्यों को नहीं मिलती थी । निर्यात समिति का सुझाव था कि तम्बाकू पर आबकारी कर का 50 प्रतिशत भाग राज्यों को मिलना चाहिए। वित्त आयोग ने यह सुझाव दिया कि तम्बाकू, माचिस, वनस्पति के उत्पादन से आबकारी कर की आय राज्यों में विभाजित करनी चाहिए। आयोग का सुझाव था कि इस आय का 10 प्रतिशत भाग राज्यों को प्राप्त होना चाहिए । 

द्वितीय वित्त आयोग ने विभाजन करने वाली आय में तीन के स्थान पर आठ वस्तुओं की आय को शामिल करने की सिफारिश की थी। इस सम्बन्ध में यह निश्चित किया गया कि इस आय का 90% भाग जनसंख्या के आधार पर तथा 10% भाग आवश्यक समायोजन के आधार पर विभाजित किया जाना चाहिए । 

तृतीय वित्त आयोग ने सुझाव दिया कि राज्यों का अंश कुल आबकारी आय का 20% भाग होना चाहिए और वस्तुओं की संख्या बढ़ाकर 35% कर दी । चौथे वित्त आयोग ने भी इस बात को स्वीकार किया कि आबकारी करों से प्राप्त होने वाली आय का 20% भाग राज्यों में बाँटा जाये, लेकिन आय का 80% भाग जनसंख्या के आधार पर वितरित किया जाना आवश्यक होगा।

(4) अतिरिक्त आबकारी कर

सन् 1957 से भारत सरकार ने अतिरिक्त आबकारी कर लगाने की व्यवस्था की थी, जिसको राज्यों में बाँटा जाना था । द्वितीय वित्त आयोग ने सुझाव दिया था कि बिक्री कर की ने वसूली प्रत्येक राज्य को दी जाय तथा शेष को उपयोग के आधार पर वितरित किया जाय। उसकी शुद्ध आय का 1.25 प्रतिशत भाग जम्मू-कश्मीर को तथा 1 प्रतिशत भाग केन्द्र शासित प्रदेशों को मिलना चाहिए । 

तृतीय वित्त आयोग ने जम्मू-कश्मीर का अंशदान 1.25 से बढ़ाकर 1.50% कर दिया और कहा कि शेष राशि को राज्यों में जनसंख्या व संग्रह के आधार पर बाँटा जाय। चतुर्थ वित्त आयोग ने सुझाव दिया कि राज्यों को बिक्री कर की दर के आधार पर इस राशि का वितरण किया जाना चाहिए। पाँचवें वित्त आयोग का सुझाव था कि इस आय में से जम्मू-कश्मीर और नगालैण्ड को कोई मुआवजा नहीं दिया जाय, परन्तु शुद्ध प्राप्ति की क्रमशः0.83% व 0.9% राशि दी जानी चाहिए। 

 छठे वित्त आयोग ने कुल प्राप्ति में से 1.4% केन्द्र शासित क्षेत्रों को तथा 98.6% भाग राज्यों में वितरित करने की सिफारिश की । सातवें वित्त आयोग ने शक्कर पर उत्पादन शुल्क की विशुद्ध प्राप्तियों का 3-271% केन्द्रीय सरकार को संघ क्षेत्रों में तथा शेष 96.729% भाग विभिन्न राज्यों में वितरित करने की सिफारिश की ।

(5) रेलवे यात्री भाड़े पर कर

सन् 1957 में पहली बार इस कर का निर्धारण किया गया। द्वितीय वित्त आयोग ने यह सुझाव दिया था कि शुद्ध आय का 25% भाग केन्द्र के लिए रखा जाय और शेष राशि को राज्यों में वितरित कर दिया जाय। तृतीय वित्त आयोग ने सुझाव दिया कि राज्यों को 12.5 करोड़ रुपये का वार्षिक अनुदान दिया जाय। चतुर्थ वित्त आयोग ने बताया कि इस राशि का वितरण राज्यों को क्षतिपूर्ति के आधार पर किया जाये । 

छठे वित्त आयोग का मत था कि इस कर का 2.5% भाग केन्द्र शासित प्रदेशों को तथा शेष राशि में से राज्यों का अंश अचल सम्पत्ति के कुल मूल्य के आधार पर प्रत्येक वित्तीय वर्ष में निर्धारित किया जाना चाहिए । सातवें वित्त आयोग ने जायदाद कर की विशुद्ध प्राप्तियों को विभिन्न राज्यों में चल तथा अचल सम्पत्ति के सकल मूल्य के अनुपात में बाँटने की सिफारिश की ।

(6) मृत्यु कर - भारत में यह कर 1933 से लागू किया गया । इस कर की वितरण व्यवस्था का आधार आयकर रखा गया। द्वितीय वित्त आयोग ने इस व्यवस्था में यह सुझाव दिया कि कुल शुद्ध मृत्यु कर की राशि में से 1% राशि केन्द्रीय सरकार को रखनी चाहिए तथा शेष 99% राशि राज्यों में बाँटी जाय। 

इस सुझाव का अनुमोदन तृतीय वित्त आयोग के द्वारा किया गया था। चतुर्थ वित्त आयोग ने केन्द्रीय सरकार के लिए मृत्यु कर की राशि 1% से बढ़ाकर 2% कर दी थी । कृषि भूमि पर मृत्यु कर राज्यों द्वारा ही लगाया व वसूला जाता है। केन्द्र केवल नियन्त्रक के रूप में अपनी भूमिका निभाता है । 

छठे वित्त आयोग का मत था कि इस कर का 2.5% भाग केन्द्र शासित प्रदेशों को तथा शेष राशि में से राज्यों का अंश अचल सम्पत्ति के कुल मूल्य के आधार पर प्रत्येक वित्तीय वर्ष में निर्धारित किया जाय। सातवें वित्त आयोग ने जायदाद कर की विशुद्ध प्राप्तियों को विभिन्न राज्यों में चल तथा अचल सम्पत्ति के सकल मूल्य के अनुपात में बाँटने की सिफारिश की । 

(7) अनुदान

भारत में अनुदानों की व्यवस्था 1935 के अधिनियम से ही कर दी गयी थी। विभाजन के बाद भी यह व्यवस्था बनी रही । प्रथम वित्त आयोग ने राज्यों में प्राथमिक शिक्षा के प्रसार के लिए अनुदानों की तथा द्वितीय वित्त आयोग ने राज्यों के पुनर्गठन से उत्पन्न समस्याओं के समाधान के लिए सिफारिश की थी । तृतीय वित्त आयोग ने संवहन के विकास के लिए अनुदानों की सिफारिश की थी। राज्यों के व्यय भार में वृद्धि के कारण समय-समय पर अनुदानों की राशि में वृद्धि की जाने लगी है ।

वित्तीय सम्बन्ध के लाभ

केन्द्र एवं राज्य सरकारों के मध्य स्थापित किये गये वित्तीय सम्बन्धों के प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं

(1) स्पष्ट विभाजन - संविधान में केन्द्र तथा राज्य के मध्य वित्तीय साधनों का स्पष्ट विभाजन कर दिया गया है जिससे केन्द्र तथा राज्यों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के कर लगाने के अधिकार प्राप्त हैं। इस प्रकार की व्यवस्था से राज्यों व केन्द्र के मध्य किसी भी प्रकार का मनमुटाव नहीं हो है ।

(2) वार्षिक अनुदान - राज्य को वित्तीय साधन पर्याप्त रहें, इसके लिए केन्द्र द्वारा वार्षिक अनुदान देने की व्यवस्था की गयी है ।

(3) केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति सुदृढ़ केन्द्र ही देश को सुदृढ़ सरकार प्रदान कर सकता है। इस नीति पर ही वित्तीय मामलों में भी केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति को ही प्रधानता दी गयी है।

(4) संघर्षों से मुक्ति - संविधान में व्यवस्था करने से केन्द्र व राज्यों के मध्य संघर्ष एवं वाद-विवाद समाप्त हो गये हैं। राज्यों को यह अधिकार प्राप्त है कि वे नवीन कर लगाकर अपनी आय के साधनों में वृद्धि कर लें ।

(5) कुशलता एवं औचित्य - वित्तीय साधनों का विभाजन करते समय संघीय वित्त के आधारभूत सिद्धान्तों को ध्यान में रखा गया है जिसमें कुशलता एवं औचित्य को विशेष महत्व प्रदान किया गया है।

(6) अच्छे वित्तीय सम्बन्ध – केन्द्र व राज्य सरकारों के मध्य अच्छे वित्तीय सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास किये गये हैं जिससे आर्थिक विकास की सही योजना का निर्माण किया जा सके और उसे उचित ढंग से कार्यान्वित किया जा सके ।

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