भारत के प्राकृतिक संसाधन - natural resources of india in hindi

प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन हैं। जो पहले से प्रकृति में मौजूद होते हैं। इसमें वाणिज्यिक और औद्योगिक, सौंदर्य मूल्य और सांस्कृतिक मूल्य जैसी विशेषताएँ होती हैं।

पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधन के कुछ उदाहरण हैं - सूर्य का प्रकाश, वातावरण, जल, भूमि, खनिज, वनस्पति और पशु आदि। प्राकृतिक संसाधन हमारी प्रकृति के भंडार में संरक्षित होते हैं। जिसका उपयोग मानव अपनी आवश्यकता अनुशार करता हैं।

इसे भी देखे – संसाधन किसे कहते हैं

प्राकृतिक संसाधनों को विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। प्राकृतिक संसाधन सामग्री के आधार पर पर्यावरण के भीतर पाए जाते है। चलिए जानते है। भारत के प्राकृतिक संसाधन क्या क्या हैं और हम इसका कैसे उपयोग करते हैं।

भारत के प्राकृतिक संसाधन

भारत प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न है। इस सम्पन्नता के कारण ही प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था। भारत एक विशाल देश है, हमारे देश का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि. मी. है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व का सातवाँ बड़ा देश है। 

इसमें विभिन्न स्थल रूप, पर्वत, पठार एवं मैदान हैं, जो अनेक आर्थिक क्रियाओं को जन्म देते हैं। भारत के पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्र में खनिज एवं वन संपदाओं का भण्डार हैं।

वहीं मैदान कृषि एवं उससे सम्बन्धित व्यवसायों के स्रोत हैं। पर्वत एवं पठारी क्षेत्रों से निकलने वाली नदियाँ  उपजाऊ मिट्टी का निर्माण करती हैं। जो मानव जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करती हैं।

भारत के प्राकृतिक संसाधन - natural resources of india

भारत में विशाल कृषि भूमि, बहता व भूमिगत जल, वनस्पति, उपजाऊ मैदान, खनिज, जीव-जन्तु आदि संसाधनों से भरा पड़ा है। फिर भी भारत सांस्कृतिक विकास एवं प्रौद्योगिकी के अभाव के कारण अपना आर्थिक विकास नहीं कर पाया हैं।

असम के स्थानान्तरित कृषि को अपनाने वाले एवं जम्मू कश्मीर के चलवासी चरवाहे गूजर व बेकरवाला आदि इन क्षेत्रों एवं लोगों के पास आज भी सांस्कृतिक विकास एवं प्रौद्योगिकी का अभाव है।

प्राकृतिक संसाधन के प्रकार

प्राकृतिक संसाधन कई प्रकार के हो सकते हैं। नीचे 6 प्रकार के प्राकृतिक संसाधन का वर्णन किया गया हैं। जो हमारे प्रकृति में स्वतंत्र रूप से पाया जाता हैं।  

  1. भूमि संसाधन
  2. जल संसाधन
  3. खनिज संसाधन
  4. पशु संसाधन
  5. वन संसाधन
  6. ऊर्जा संसाधन

1. भूमि संसाधन

भारत का विशाल भूमि संसाधन इस देश के लिए महत्वपूर्ण है। यह तीन ओर विशाल समुद्र से तथा एक ओर हिमाच्छादित हिमालय पर्वत से घिरा है। अतः यहाँ सागरीय, पर्वतीय एवं मरुस्थलीय संसाधनों की भी प्रचुरता है। इसके ऊँचे-ऊँचे पर्वत, प्राचीन पठार और विस्तृत मैदान के कारण आर्थिक क्रियाओं के विविध रूप दिखाई देते हैं।

भारत के 43 प्रतिशत धरातल मैदानी है जहाँ कृषि एवं व्यवसाय होते हैं। 28 प्रतिशत भाग में पठार फैला है, जो औद्योगिक विकास के आधार हैं। यहाँ वन एवं कृषि क्षेत्रों की प्रचुरता है। 29 प्रतिशत भाग पर्वतों से घिरे हैं। ये वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं, खनिजों एवं स्वास्थ्य लाभ के केन्द्र होते है।

पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर सम्पूर्ण देश में पूरे वर्ष ताप एवं वर्षा के अनुकूल रहता है। प्राकृतिक वनस्पति एवं फसलों की उत्पादकता के करण भूमि अति उपयोगी होती है।

भारतीय कृषि की मजबूरी मानसून पर आश्रित होना है। मानसूनी हवाओं द्वारा वर्ष के केवल 3-4 महिने वर्षा होती है। यही नहीं यहाँ होने वाली वर्षा अनिश्चित और अनियमित भी होती है।

गर्मी के दिनों में वर्षा होने से वर्षा जल का वाष्पन से ह्रास हो जाता है। मूसलाधार वर्षा के कारण बहुत सा जल बहकर यत्र तत्र चला जाता है। नदियों में बाढ़ आ जाती है। वर्षा के असमान वितरण भी कृषि के विकास में बाधक है। हमारे लिए आवश्यक है कि हम भूमि का सर्वोत्तम उपयोग करें। इसके लिए सिंचाई के साधनों का विकास आवश्यक है।

भारत का सौभाग्य है कि यहाँ अनेक विशाल सदा बहने वाली नदियाँ हैं। इन नदियों में बाँध बनाकर सिंचाई कार्य किया जाता है। पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचाई की सुविधा के कारण कृषि का विकास तेजी से हुआ है।

कुछ प्रदेशों में अति सिंचाई के कारण जलाक्रांति की समस्या और उष्ण तथा शुष्क भागों में गहन जल के उपयोग के कारण लवणता अधिक होने की समस्या हो सकती है। इन समस्याओं के प्रति सचेत रहना आवश्यक है। इस तरह से हम भूमि की उर्वरता को नष्ट होने से बचा सकते हैं।

2. जल संसाधन

जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता जल भी है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर जल की उपस्थिति के कारण जीवों की उत्पत्ति हुई अर्थात् जल जीवों की जननी है। जल के बिना जीवन सम्भव नहीं है। प्रारम्भ में जब पृथ्वी द्रव अवस्था से ठोस अवस्था में आ रही थी। तब गर्म गैसीय पदार्थ ऊपर जमा हो रहे थे। 

जिससे वायुमण्डल की रचना हुई। गर्म गैसीय पदार्थ के ठण्डे होने से विशाल मेघों की रचना हुई, जो बाद में हजारों साल तक पृथ्वी पर मूसलाधार वर्षा करते रहे। इस प्रकार जल की रचना रासायनिक क्रिया से हुई और पृथ्वी पर जल अवतरित हुआ। जिससे सागर, महासागर आदि अस्तित्व में आये हैं।

भारत के प्रमुख जल प्राप्ति स्रोतों को दो वर्गों में रखा जाता है - 

  1. धरातलीय जल 
  2. भूमिगत जल 

1. धरातलीय जल - भारत में धरातल जल वर्षा से प्राप्त होता है। वर्षा एक महत्वपूर्ण जल संसाधन है। इसी से नदियों, जलाशयों, नहरों आदि को जल की पूर्ति होती है। देश की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 110 सेमी है।

देश के 10 प्रतिशत भाग में 200 सेमी से अधिक तथा 33 प्रतिशत भाग में शून्य से 75 सेमी तक वर्षा होती है। जो लगभग 3700 बिलियन घन मीटर जल के बराबर है। इसका 33 प्रतिशत जल वाष्पीकृत हो जाता है। 45 प्रतिशत जल जलाशय, नदियों आदि में प्रवाहित होते है तथा शेष 22% जल भूमि द्वारा सोख लिया जाता है।

देश में कुल जल संसाधन 16.7 करोड़ हेक्टेयर प्राप्त होता है। जिसमे से केवल 6.6 करोड़ हेक्टेयर जल का उपयोग आवश्यकतानुरूप कृषि आदि कार्यों में किया जाता है। जितना जल का उपयोग करते है वह हमारे लिए संसाधन है ।

धरातलीय जल जो नदियों में प्रवाहित होता है, व्यर्थ न जाने पाये इसलिए स्वतन्त्रता के पश्चात् नदी मार्गों पर छोटे-बड़े जलाशयों का निर्माण किया गया है। और आवश्यकतानुसार समय-समय पर जल का उपयोग कृषि कार्यों, औद्योगिक आवश्यकताओं, विद्युत उत्पादन आदि कार्यों में किया जाता है।

कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जैसे - पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र, तेलंगाना, रॉयल सीमा, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक के पठार में जलाशयों एवं नहरों की आवश्यकता को महसूस किया गया। वहीं दूसरी ओर भूमिगत जल कृषि क्षेत्र में उपयोगिता को बढ़ावा देने हेतु विद्युत् ऊर्जा की आवश्यकता महसूस की गयी और बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाओं को अपनाया गया हैं।

सतलज नदी पर भाखड़ा नांगल, सतलज नदी पर इन्दिरा गाँधी नहर, बिहार में कोसी नदी पर कोसी परियोजना, उड़ीसा में महानदी पर हीराकुण्ड, आन्ध्र-कर्नाटक में तुंगभद्रा परियोजना, आन्ध्र में कृष्णा नदी पर नागार्जुन, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में चम्बल परियोजना मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश हेतु रिहन्द परियोजना आदि। कृषि उधोग और बिजली की आपूर्ति करने के लिए बनाये गए हैं।

2. भूमिगत जल - भारत में वर्षा जल का लगभग 22 प्रतिशत भाग चट्टानों के छिद्रों व दरारों से रिसकर धरातल में प्रवेश कर जाता है। चट्टानों में रिसकर पहुँचे हुए इसी जल को भूमिगत जल कहते हैं। कुएँ, पाताल तोड़ कुएँ, ट्यूबवेल, हैण्डपम्प आदि इसके उदाहरण हैं।

790 बिलियन घन मीटर जल धरातल के नीचे तक पहुँच जाता है, जिसे ट्यूबवेल, हैण्डपम्प एवं कुएँ खोदकर प्राप्त किया जा सकता है। इसका मात्र 70 प्रतिशत भाग ही हम आर्थिक रूप से प्रयोग कर सकते हैं, अर्थात् 70 प्रतिशत जल हमारे लिये जल संसाधन हैं। भारत में मानसूनी वर्षा अनियमित, अनिश्चित व असमान वितरण वाली है।

जिन भू-भागों में वर्षा नहीं होती या कम होती है, वहाँ का भूमिगत जल-स्तर नीचा एवं खारा होता है। जैसे पश्चिमी राजस्थान में कई स्थानों पर कुएँ खोदे गये जिनका जल इतना खारा निकला कि सिंचाई के काम में भी नहीं लाया जासकता हैं।

भूमिगत जल का लगभग 90 प्रतिशत भाग अकेला उत्तर भारत के मैदान में विद्यमान है। केन्द्रीय भूमिगत जल बोर्ड ने सर्वे द्वारा अनुमान लगाया है कि देश में भूमिगत जल की उपलब्धता करीब 433-9 लाख हेक्टेयर मीटर प्रति वर्ष है। इसमें से मात्र 71.3 लाख हेक्टेयर मीटर प्रतिवर्ष पानी का उपयोग घरेलू एवं औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए किया जाता है।

3. खनिज संसाधन

खनिज प्राकृतिक-रासायनिक यौगिक तत्व होता हैं। जो अजैव प्रक्रियाओं से बना है। भूमि से खोदकर निकाले गये पदार्थ को खनिज पदार्थ कहते हैं। जो एक या अधिक तत्वों के योग से बनता है। खनिज मानव की असंख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करता हैं।

ये औद्योगिक व्यापारिक तन्त्र की रीढ़ हैं। जल शक्ति, सौर्यिक शक्ति, परमाणु शक्ति आदि को उपयोग में लाने के लिए भी धात्विक खनिज आवश्यक है। कृषि, परिवहन, उत्खनन, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति आदि के लिए खनिज पदार्थ की आवश्यकता होती हैं।

जीवन के प्रत्येक आयामों में खनिज पदार्थों का महत्व एवं उपयोगिता बहुत अधिक है। इसके बिना हम जीवन के विकास की कल्पना नहीं कर सकते हैं। पाषाण युग, ताम्र युग, लौह युग , इस्पात युग, प्लास्टिक युग, अणु युग आदि मानव विकास के इतिहास की कथा बतलाते हैं। मानव के विकास एवं प्रगति में खनिज तत्वों का योगदान रहा है।

अधिकांश खनिज समाप्त होने वाले संसाधनों की श्रेणी में आते हैं। एक बार भूमि से निकाल लिये जाने के बाद दुबारा उसे प्राप्त नहीं किये जा सकते हैं। क्योंकि ये प्रकृति द्वारा ही लाखों करोड़ों वर्षों में निर्मित होते हैं।

खनिजों के गुण एवं मात्रा में विपरीत संबंध होता है। उत्तम गुण वाले खनिज कम मात्रा में तथा निम्न गुण वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। भारत एक वृहत् क्षेत्रफल वाला देश है। इसमें कई प्रकार की भू-रचनाएँ हैं, जिसके कारण प्रकृति ने इसे कई प्रकार के खनिजों से सम्पन्न किया है। 

भारत का उत्तरी भाग जो मैदानी है औरनवीन चट्टानों से बना है। यहाँ चूने के पत्थर व विशेष प्रकार की मिट्टियों को छोड़कर अन्य खनिज कम हैं। दक्षिणी प्रायद्वीपीय अत्यन्त कठोर चट्टान से निर्मित है। जहाँ आग्नेय चट्टानों की खनिजों का बाहुल्य है।

भारत में पाए जाने वाले प्रमुख खनिज निम्नलिखित हैं - 

  1. कोयला
  2. लौह अयस्क
  3. बॉक्साइट
  4. तांबा 
  5. अभ्रक
  6. सोना 
  7. चाँदी 
  8. नमक 

4. पशु संसाधन

किसी देश की अर्थव्यवस्था में पशु संसाधन का महत्वपूर्ण स्थान होता है। भारत कृषि प्रधान देश है। भारत में पशुओं के महत्व को इस समझा जा सकता है।

कृषि कार्य में पशुओं का महत्वपूर्ण योगदान है क्योंकि हल खींचने, बैलगाड़ी खींचने, बोझा ढोने, गन्ने की चरखियाँ पेरने, कुओं से पानी खींचने आदि कार्य में पशुओं का उपयोग किया जाता रहा है। हलाकी वर्तमान मे इसकी जगह मानिशों ने ले ली हैं। 

एक अनुमान के अनुसार भारतीय कृषि कार्य में लगभग 1185 करोड़ कार्यशील घण्टे प्रति वर्ष पशु शक्ति से प्राप्त किये जाते हैं। पशुओं के गोबर से उत्तम खाद तथा गोबर गैस का उत्पादन होता है। सन् 1984-85 में लगभग 80 करोड़ टन खाद पशुओं से प्राप्त किया गया हैं।

पशुओं से उत्तम पौष्टिक पदार्थ दूध प्राप्त होता है। दूध का उत्पादन जो सन् 1979-80 में लगभग 303 लाख टन था, जो 1984-85 से बढ़कर 380 लाख टन हो गया । पशुओं से चमड़ा और खाल प्राप्त होता है। उनसे विभिन्न प्रकार की सामग्रियाँ तैयार की जाती हैं।

भेड़ों से ऊन प्राप्त होता है। ऊन का उपयोग कपड़े, कम्बल आदि बनाने में किया जाता है। सन् 1984-85 में 3-84 करोड़ कि. ग्रा. ऊन का उत्पादन हुआ था। पशुओं से मांस की प्राप्ति होती है। मांस बहुत बड़ी जनसंख्या का मुख्य खाद्य पदार्थ है।

अनुमान है कि देश को पशुओं से करोड़ों की आय होती है। जो हमें दूध, खाद्य पदार्थ, खाद, ईंधन, मांस, चमड़ा, खालें, बाल, ऊन, अण्डा, हड्डियाँ इत्यादि प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त होती हैं। जबकि कृषि कार्य में इनका योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। भारत की कृषि आय में लगभग 10% भाग पशुओं का होता है।

पशु संसाधनों की स्थिति एवं वितरण - विश्व में सबसे अधिक पशुओं की संख्या भारत में है। विश्व के कुल भैसों का 57% और गाय-बैलों का 15% भाग भारत में है।

यहाँ प्राचीन काल से पशु-पालन किया जाता रहा है। पशुओं का सर्वाधिक उपयोग कृषि कार्य में किया जाता है। भारत में पशु-संसाधनों की वृद्धि निम्नांकित तालिका से स्पष्ट है -

पशुओं के नाम 2003 (मिलियन) गाय बैल 185-1 primer भैंस 97-9 भेड़ें 61.5 बकरियाँ 124-4 ऊँट 0.6 सुअर 13.5

देश का पशु संसाधन अधिकतर कम वर्षा व शुष्क जलवायु वाले स्थानों में (पशुपालन) होता है, क्योंकि यहाँ की प्राकृतिक रचना कृषि कार्य के अनुकूल नहीं होती। भारत के पशु संसाधन क्षेत्रों को अग्रलिखित भागों में रखा जा सकता है।

5. वन संसाधन

पृथ्वी के धरातल पर वन संसाधन, भू-पारिस्थितिकी के सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। इन्हें जैविक संसाधनों की श्रेणी में रखा जाता है। वनों की उपयोगिता एवं महत्व से स्पष्ट है कि मानव ने वन संसाधनों का प्रयोग कई रूपों में किया है।

उपयोगिता एवं महत्त्व - भारतीय संस्कृति में वनों का बड़ा महत्त्व रहा है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थों में भी वनों के महत्त्व का वर्णन मिलता है। आदिकाल से मानव का लालन-पालन इन्हीं वनों से होता आया है।

वनों से ही वनोपज एकत्रित कर भोजन, वस्त्र, आवास जैसी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति मानव करता रहा है, वहीं वन जलवायु को प्रभावित करते हैं, वन वर्षा करने वाले मेघों को आकर्षित करते हैं, भूमि के अपरदन को रोकते हैं,

बाढ़ों को नियन्त्रित करते हैं, अधिक वाष्पीकरण को प्रभावित करते हैं, पशुओं को चारा उपलब्ध कराते हैं, उद्योग-धन्धों एवं ग्रामीणों के लिए कच्चे माल उपलब्ध कराते हैं एवं जीव-जन्तुओं के शरण स्थल हैं, आदि । वनों के इसी महत्त्व को देखते हुए वनों को राष्ट्रीय सम्पदा कहा गया है।

पृथ्वी पर मानव के अस्तित्व में आने के पूर्व ही सम्भवतः वनों का विकास हो चुका था। तभी तो मानव के लिए वन पालना गृह रहे हैं. साधारणतः वन शब्द से आशय ऐसे विस्तृत क्षेत्र से है, जहाँ पेड़-पौधों का सघन आवरण पाया जाता है।

शासकीय आँकड़ों के अनुसार भारत में सन् 1985 के अनुसार 748.72 लाख हेक्टेयर भूमि पर (लगभग 22.8%) वन थे, परन्तु यह बढ़कर सन् 1991 में 752-3 लाख हेक्टेयर (लगभग 22.9%) तथा सन् 1999 में 6·37 करोड़ हेक्टेयर (19-39%) भूमि पर वन हैं, परन्तु सन् 1980-82 में सुदूर संवदेन उपग्रह से लिये गये चित्र के अनुसार मात्र 463.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही (लगभग 14%) वन पाये गये, जो भारत जैसे विशाल आकार के देश के लिए बहुत ही कम हैं।

1 भौगोलिक आधार पर वनों का वर्गीकरण - भारत में जलवायु की विविधता एवं धरातलीय असमानताओं के कारण विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते हैं। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण संस्था ने देश में पेड़-पौधों की 47,000 प्रजातियों का पता लगाया है। इनमें 5000 प्रजातियाँ तो ऐसी हैं जो केवल भारत में ही मिलती हैं। भौगोलिक तत्वों के आधार पर भारतीय वनों को पाँच भागों में बाँटा गया है

  1. उष्ण कटिबंधीय सदापर्णी वन
  2. मानसूनी वन
  3. मरुस्थलीय वन
  4. डेल्टाई वन
  5. हिमालय पर्वतीय वन

1. उष्ण कटिबंधीय सदापर्णी वन ये वन विषुवत् रेखीय वनों से मिलते-जुलते हैं । उच्च तापमान और पर्याप्त वर्षा (200 सेमी तथा इससे अधिक) के कारण वृक्षों की ऊँचाई 50 मीटर से भी अधिक होती है, सदा हरित वन 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भागों में पाये जाते हैं।

ये क्षेत्र पश्चिमी तटीय प्रदेश, पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल, उत्तर-पूर्वी पर्वतीय प्रदेश और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह हैं। वनस्पति की विविधता और अधिकता इन वनों की प्रमुख विशेषता है। इनकी लकड़ी काले रंग की तथा कठोर होती हैं।

लता व झाड़ियों के कारण वन दुर्गम हैं। मुख्य वृक्ष रबड़, महोगनी, एबोनी, ताड़, आबनूस, बाँस आदि हैं। इन वनों की लकड़ी का उपयोग पेटियाँ बनाने, पैकिंग करने व प्लाईवुड बनाने में किया जाने लगा है।

ये वन भूमध्य रेखीय वनों की तुलना में कम घने हैं। साथ ही वृक्षों की ऊँचाई भी अपेक्षाकृत कम है। जहाँ वर्षा की मात्रा कम हो जाती है, वहाँ ये वन अर्द्ध- सदाबहार वन कहलाते हैं।

2. मानसूनी वन - मानसूनी वन भारत के विशिष्ट वन हैं। इनका विस्तार लगभग सारे भारत में है, किन्तु ये 75 सेमी से लेकर 200 सेमी तक वर्षा वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से पाए जाते हैं। इन वनों के वृक्ष विशेष मौसम में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, इसलिए इन्हें उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन भी कहते हैं। आर्थिक दृष्टि से ये वन बहुत महत्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं। इन वनों के दो उप-वर्ग हैं

  1. आर्द्र मानसूनी वन
  2. शुष्क मानसूनी वन

आर्द्र मानसूनी वन - ये वन पर्णपाती या पतझड़ वन भी कहलाते हैं, क्योंकि शुष्क ग्रीष्म काल में ये वृक्ष अपनी सभी पत्तियाँ एक साथ गिरा देते हैं। इनकी ऊँचाई 30 से 40 मी. तक होती है। सदापर्णी वनों की भाँति ये वन सघन नहीं होते हैं अर्थात् आर्थिक दृष्टि से ये वन उपयोगी हैं।

ये वन 100 से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। ये वन गंगा की निचली व मध्य घाटी व पूर्वी तटीय मैदान में पाये जाते हैं अर्थात् छत्तीसगढ़, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु के भागों में पाये जाते हैं।

साल, सागौन, शीशम, आँवला, नीम, आम व चन्दन प्रमुख वृक्ष हैं, तथा अन्य वृक्षों में गूलर, जामुन, रीठा, बेर, पलास, महुआ, बरगद, पीपल आदि । सागौन लकड़ी फर्नीचर बनाने के लिए उपयुक्त होती है। चन्दन की लकड़ी सुगन्धित होती है ।

शुष्क मानसूनी वन - इन वनों के पत्ते ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ में ही गिर जाते हैं । कृषि भूमि को विकसित करने के लिए अनेक भागों के वनों को काटा गया है। ये वन 50 से 100 सेमी वर्षा वाले भागों में पाये जाते हैं। ये वन आर्द्र- मानसून वनों के पश्चिम की ओर पाये जाते हैं, क्योंकि वर्षा की मात्रा प्रायः पूर्व से पश्चिम की ओर कम होती जाती है।

ये वन पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान, मध्य व दक्षिणी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक व गुजरात के अधिकांश भागों में पाये जाते हैं। आम, जामुन, महुआ तथा शीशम मुख्य वृक्ष हैं। अन्य वृक्षों में बबूल, रीठा, बेर, खजूर, अमलता, नीम आदि हैं।

3. मरुस्थलीय वन - इन वनों में वर्षा की कमी के कारण वृक्षों में पत्तियाँ कम, छोटी व काँटेदार, जड़े लम्बी होती हैं । ये वन 50 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। पंजाब, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश आदि राज्यों के शुष्क भागों में यह वनस्पति पायी जाती है।

बबूल, नागफनी, रामबाँस, खेजड़ा, खैर, खजूर आदि प्रमुख वृक्ष हैं। इनका प्रयोग मुख्यतः ईंधन की लकड़ी के रूप में होता है। खजूर से गुड़ भी बनाया जाता है।

4. डेल्टाई वन - इन वनों को मैनग्रोव या ज्वारीय वन भी कहते हैं। ये नदियों के डेल्टा क्षेत्रों में पाये जाने के कारण डेल्टाई वन कहलाते हैं । इनकी लकड़ी अधिकतर नाव बनाने के काम में आती है।

गंगा-ब्रम्हपुत्र के डेल्टा क्षेत्र में ये वन पाये जाते हैं। ये वन महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि प्रायद्वीप की नदियों के डेल्टा क्षेत्र में पाये जाते हैं । सुन्दरी वृक्ष तथा मैनग्रोव मुख्य वृक्ष हैं। अन्य प्रकार के वृक्षों में केवड़ा, नारियल, बोगरा, गोरडन आदि हैं।

5. हिमालय पर्वतीय वन – पर्वतों पर ऊँचाई के कारण तापमान व वर्षा में अन्तर होता जाता है । फलतः वनस्पति भी ऊँचाई के अनुसार परिवर्तित होती जाती है। यहाँ उष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक का क्रम पाया जाता है, इसका विवरण अग्र प्रकार से है।

4800 मीटर से अधिक ऊँचाई पर किसी भी प्रकार के वृक्ष नहीं पाये जाते हैं। पर्वतीय ऊँचाई के बढ़ने के साथ-साथ वृक्षों की ऊँचाई घटती जाती है और हिम रेखा के निकट केवल अल्पाइन घास पायी जाती है।

भारत में वनों का वितरण

इस समय भारत की 752-3 लाख हेक्टेयर भूमि (19.47%) पर वनों का विस्तार है। यहाँ प्रति व्यक्ति वनों का औसत 0-2 हेक्टेयर मात्र है। भारत में वनों का वितरण बहुत असमान है। प्रादेशिक वनों के वितरण को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

1. पर्याप्त वन भूमि वाले राज्य - इसके अन्तर्गत वे राज्य आते हैं, जहाँ की कुल भूमि का 50% से अधिक भाग वनों का है। इसमें अण्डमान निकोबार द्वीप (86.2%), मणिपुर (67.5%), अरुणाचल प्रदेश (61.9%), त्रिपुरा (61.0%), मिजोरम (80.5% ), और उत्तरांचल (63%) सम्मिलित हैं। भारतीय वनों का वितरण 1. पर्याप्त

2. आवश्यकता के अनुरूप वन वाले राज्य - पर्यावरण को सन्तुलित बनाये रखने के लिए कम से कम 30% भूमि वनों का होना आवश्यक होता है। भारत में 30% से 50% वन भूमि वाले राज्य छत्तीसगढ़ (46%), मेघालय ( 41.1% ), दादर व नगर हवेली (41-2%), असम (39-1%), हिमाचल प्रदेश (38·1%), उड़ीसा (38-3%), सिक्किम (36-3%), एवं मध्यप्रदेश (35-1%), हैं।

3. आवश्यकता से कम वन वाले राज्य - इसके अन्तर्गत 20% से 30% तक वन भूमि वाले क्षेत्र समाहित हैं। इसमें केरल (28-9%), गोवा, दमन दीव ( 26.1%), आन्ध्र प्रदेश (23-0%), कर्नाटक (20.1%), व महाराष्ट्र (20-8%), हैं।

4. अल्प वन भूमि वाले राज्य – इसमें उत्तर प्रदेश (17-4%), नागालैण्ड, तमिलनाडु, बिहार (16-8%), पश्चिम बंगाल (13.5%), गुजरात (10-0%), जम्मू व कश्मीर (9.4%), राजस्थान (9-0%), पंजाब (5-2%), और हरियाणा (3-9%) है।

देश के 50% वन प्रायद्वीपीय पठार व पहाड़ियों में 20% तक हिमालय पर्वतीय प्रदेश में, 12% वन पूर्वी घाट व तटीय प्रदेश में, 10.5% वन पश्चिमी घाट व तटीय प्रदेश में और 7-5% वन उत्तरी मैदान में पाये जाते हैं।

समस्याएँ

भारत में वनों का विस्तार मानक स्तर से बहुत कम है। साथ ही यहाँ के वन संसाधन अग्रलिखित समस्याओं से ग्रस्त हैं -

1. वृक्षों की अंधाधुन्ध कटाई - स्वतन्त्रता के पश्चात् निरन्तर जनसंख्या वृद्धि के कारण कृषि उद्योग विकास के लिए वनों की अंधाधुन्ध कटाई से भारत में वनों का क्षेत्रफल अत्यन्त कम हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में मकान के निर्माण तथा जलाऊ ईंधन के लिए वनों को काटा जाता है।

शहरों में स्थापित उद्योगों में कच्चे माल की पूर्ति के लिए वनों को काटा जाता है। परिणामस्वरूप भारत के भारतीय वन संसाधन की प्रमुख अधिकांश वन क्षेत्र आज नग्न भूमि में परिवर्तित हो चुके हैं। समस्याएँ

2. वनों में आग लगना - मानवीय या प्राकृतिक कारणों से वनों में आग लग जाती है। इससे वन जलकर नष्ट हो जाते हैं।

3. वनों के क्षेत्रफल में कमी - कृषि के विस्तार, उद्योग स्थापित करने तथा मानव बस्ती के लिए आजकल वन भूमि का उपयोग किया जा रहा है। परिणामस्वरूप वन भूमि के क्षेत्रफल में कमी आ रही है।

4. पर्यावरण असन्तुलन - पर्यावरण सन्तुलन के लिए भूमि में से 33% भाग पर वन होने चाहिए जबकि भारत में 22.9% भूमि पर ही वन हैं। वनों की कमी से वायुमण्डल में गैसों का सन्तुलन बिगड़ गया है और पर्यावरण में जहरीली गैसों का प्रभाव बढ़ रहा है।

विश्वव्यापी स्तर पर ओजोन मण्डल में छेद पड़ने लगे हैं जो मानव तथा पर्यावरण के लिए खतरे की चेतावनी है ।

5. अन्य समस्याएँ – वनों की कमी से नगरों में आज औद्योगिक प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। कहीं भयानक बाढ़ तो कहीं सूखे की स्थिति है । वन क्षेत्रों में कमी के साथ-साथ वन्य प्राणियों की संख्या भी कम हो रही है। वन संसाधन के समक्ष अनेक समस्याएँ हैं, जिनसे मानव के स्वास्थ्य तथा कार्यक्षमता, राष्ट्रीय, प्राकृतिक संसाधन आदि पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है।

वन संरक्षण के उपाय

हमारे देश में वन संसाधन की कमी तथा उससे उत्पन्न समस्याओं को देखते हुए वनों का संरक्षण करना आवश्यक है। वनों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए -

1. वृक्षारोपण – वनों का विस्तार ही वनों का सर्वोत्तम संरक्षण है। भारत की राष्ट्रीय वन नीति में उल्लेखित 33% वन भूमि के लिए ठोस प्रयास किये जाने चाहिए। वनविहीन पहाड़ों, पठारों एवं अन्य खाली क्षेत्रों में वृक्षारोपण किया जाय। वृक्षारोपण कार्यक्रम को सार्थक बनाना और उसकी पर्याप्त सुरक्षा भी करनी चाहिए ।

2. वनों की कटाई पर रोक - वनों की कटाई पर कठोरता से रोक लगाकर ईंधन, चारे तथा लकड़ी की पूर्ति के लिए वैकल्पिक स्रोत तैयार किये जाने चाहिए। प्राकृतिक वनों को काटे जाने पर उनके स्थान पर शीघ्र पनपने वाले वृक्षों का रोपण किया जाना चाहिए । आदिवासी क्षेत्रों में वनों को काटकर खेती करने की प्रथा पर पूर्ण रोक लगानी चाहिए।

3. वनों को आग से बचाना- वनों में आग लगाने की समस्या सामान्य हो गयी है। वनों में अग्नि शमन के लिए आवश्यक उपकरण तथा प्रशिक्षित कर्मचारियों को तैयार किया जाना चाहिए ।

4. परिवहन मार्गों का विकास - वनों की सुरक्षा के लिए जंगली क्षेत्रों में सड़क परिवहन तथा संचार के साधनों का विकास करना नितांत आवश्यक है। इससे वनों को सुरक्षित रखने में शासन को आसानी होगी।

5. वानिकी विकास – परम्परागत वानिकी के अतिरिक्त कृषि वानिकी, विस्तार वानिकी, रक्षा पंक्ति वानिकी एवं सामाजिक वानिकी विकास पर विशेष ध्यान दिया जाये ।

6. वन संरक्षण के प्रति लोगों में चेतना जाग्रत करना - प्राचीनकाल से भारत में वनों को अत्यधिक महत्व दिया जाता रहा है जैसा कि- अग्नि पुराण में कहा गया है – “एक वृक्ष दस पुत्रों के बराबर होता है” इसी से वनों का महत्व स्पष्ट होता है। दुर्भाग्यवश जनसंख्या वृद्धि एवं अज्ञानता के कारण वर्तमान में वनों की अंधाधुन्ध कटाई की जा रही है।

वनों के विनाश से उत्पन्न होने वाले गंभीर दुष्परिणामों के प्रति समय रहते सचेत करने का प्रयास करना चाहिए एवं शासन को इस संबंध में एक निश्चित वन नीति निर्धारित करके लोगों में वन संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करने का प्रयास करना चाहिए।

'सन् 1952 की वन नीति के अनुसार जुलाई, 1952 से भारत सरकार ने वन महोत्सव मनाना प्रारम्भ किया है । वन महोत्सव आन्दोलन का मूल आधार- “वृक्ष का अर्थ जल है, जल का अर्थ रोटी है और रोटी ही जीवन है।"

यह निर्विवाद सत्य है कि वनों के बिना धरातल पर किसी भी जीव- -जन्तु का जीवित रहना सम्भव नहीं है, इसलिए वन संरक्षण को सर्वोत्तम प्राथमिकता दी जाये ।

6. ऊर्जा संसाधन

कोयला

शक्ति के साधनों में कोयला सर्वोपरि है। इसी कारण आधुनिक औद्योगीकरण का सूत्रपात एवं विश्व का विकास हुआ। कोयले का महत्व अकथनीय है। वैज्ञानिकों ने इस कच्चे पदार्थ से आज तक लगभग दो लाख विविध वस्तुओं का निर्माण किया है, जिससे इसका महत्व स्वतः स्पष्ट होता है।

उपयोग – कोयले का उपयोग लिपिस्टिक तथा सुगंधित तेलों, जैसे- प्रसाधन की वस्तुएँ, नायलोन, डेक्रोन जैसे सूक्ष्म धागे वाले वस्त्र, प्लास्टिक, टूथ ब्रश, बटन, वाटर प्रूफ कागज, नेफ्थालिन, अमोनिया जैसी वस्तुएँ, कोक, कोलतार, (डामर, फिनाइल, बेंजोल), कृत्रिम रबर, कृत्रिम पेट्रोलियम, रंग, पेंट, सेक्रीन, इत्र, दवाईयाँ, पॉलिश के रंग, बालों में लगाने वाला खिजाब, नील, वार्निश, रंगों के घोल, प्रिंटिंग प्रेस तथा फोटो कलर प्रिंटिंग की स्याही आदि बनाने में किया जाता है।

कोयले की हाइड्रोजनीकरण क्रिया से पेट्रोल प्राप्त किया जाता है। धातुओं को गलाने, ताप शक्ति का निर्माण करने तथा भाप शक्ति बनाने आदि के कार्य में इसका अधिकाधिक उपयोग किया जाता है ।

कोयले के प्रकार - रासायनिक सम्मिश्रण की दृष्टि से भारत में निम्नलिखित चार प्रकार के कोयले की किस्में पायी जाती हैं

(i) एन्थ्रेसाइट—यह सर्वोत्तम किस्म का कोयला है, इसमें कार्बन की मात्रा 80 से 95% तक होती है ।

(ii) बिटूमिनस – यह कोयला गोंडवाना काल की शैलों में मिलता है। इसमें कार्बन की मात्रा 75 से 80% होती है ।

(iii) लिग्नाइट – यह मध्यम श्रेणी का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 45 से 55% होती है।

(iv) पीट कोयला – यह निम्न श्रेणी का कोयला है । यह धुँआ बहुत देता है। इसमें कार्बन की मात्रा 40% से कम होती है ।

उत्पादन एवं वितरण – भारत कोयला उत्पादन में विश्व का पाँचवाँ बड़ा राष्ट्र है। यहाँ कोयले का अनुमानित भंडार “जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया” के अनुसार जनवरी, 2001 में 2,13,905-51 मिलियन टन बताया गया है, जो गोंडवाना तथा टर्शियरी अवसादी चट्टानों में पाया जाता है।

यह मुख्यतः पश्चिम बंगाल के रानीगंज, झारखंड के झरिया, बोकारो, मध्य प्रदेश के उमरिया, पंच नहान, सिंगरौली, छत्तीसगढ़ के चिरमिरी, झिलमिली, कोरबा, महाराष्ट्र के चाँद - वर्धा, उड़ीसा के ईब, तालचेर एवं आंध्र के गोदावरी घाटी से प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैण्ड एवं जम्मू कश्मीर हैं ।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – विश्व के कोयला निर्यात में भारत का योगदान 1 प्रतिशत से कम रहता है। यह देश म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान तथा मारीशस को कोयले का निर्यात करता है। सन् 1950-51 में भारत में 3-2 करोड़ रुपये का 12 लाख टन कोयला निर्यात किया गया, जो सन् 1960-61 में बढ़कर 5-3 करोड़ रुपये तथा 14 लाख टन हो गया।

सन् 1980-81 में निर्यात की मात्रा घटकर लगभग 1 लाख टन रह गई, जिसका मूल्य लगभग 3 करोड़ रुपए था । जो बढ़कर वर्तमान में 350 रुपये हो गया है।

खनिज तेल

पेट्रोलियम का शाब्दिक अर्थ चट्टानी तेल है। यह लैटिन भाषा के दो शब्दों पेट्रो और ओलियम से मिलकर बना है। पेट्रो का अर्थ 'शैल' (चट्टान) और ओलियम का अर्थ ‘तेल’ होता है। इस प्रकार इसका शाब्दिक अर्थ 'चट्टानी तेल' अर्थात् खनिज तेल है।

ऐसा माना जाता है कि हजारों वर्ष पूर्व तेल की उत्पत्ति वनस्पतियों एवं समुद्र के अनेक छोटे-बड़े जीवजन्तुओं के जो प्राचीन काल में डेल्टाओं, झीलों और समुद्रों में रहते थे, किसी कारणवश दब जाने से पृथ्वी की गर्मी व दबाव से आसवन क्रिया के कारण हुई।

उपयोग – कोयले के बाद शक्ति के साधनों में खनिज तेल का महत्व सबसे अधिक है। इसका अधिकाधिक उपयोग ताप, प्रकाश, चालक शक्ति और मशीनों को चिकना करने के लिए किया जाता है । इसने अपने गुणों के कारण ही स्थल, जल एवं वायु, यातायात में क्रान्ति लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

इससे लगभग 5,000 किस्मों की उप-वस्तुएँ भी प्राप्त की जाती हैं। खनिज तेल को साफ करने पर ईंधन का तेल, गैसोलिन, गैस का तेल, मिट्टी का तेल, डिस्टिलेट, चिकना करने का तेल, पैराफीन, नेप्था, वैसलीन, बेंजीन, कोक, मोम आदि प्राप्त होते हैं ।

भारत में खनिज तेल का वितरण- भारत में पेट्रोलियम की खोज पहली बार 1866 में ऊपरी असम घाटी में हुई थी। 1890 में डिगबोई क्षेत्र में तेल की खोज की गयी। 1958 में खंभात की खाड़ी में, 1960 में अंकलेश्वर क्षेत्र में, 1975 में बॉम्बे हाई में पेट्रोल की खोज की गयी । इन प्रयत्नों के फलस्वरूप देश में तेल के उत्पादन में तीव्र वृद्धि होने लगी। वर्तमान समय में भारत में निम्नलिखित चार तेल उत्पादक क्षेत्र हैं

1. उत्तरी पूर्वी प्रदेश - यह देश का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ तेल के मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं

(i) डिगबोई क्षेत्र – यह क्षेत्र लखीमपुर जिले में 8 वर्ग किमी. भूमि में फैला हुआ है। यहाँ तेल के 100 से अधिक कुएँ हैं। तेल के प्रमुख क्षेत्र डिग्बोई, बाप्पापांग, हास्सापांग और पानाटोला हैं। इस क्षेत्र का तेल डिंग्बोई तेल शोधक कारखाने में साफ किया जाता है।

(ii) सुरमा घाटी— यह क्षेत्र सुरमा नदी की घाटी में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में तेल बदरपुर, मसीमपुर और पथरिया केन्द्रों से प्राप्त होता है।

(iii) नाहर कटिया-मोरान क्षेत्र – यह एक नवीन क्षेत्र है। यह ब्रह्मपुत्र की घाटी में डिग्बोई से 40 किमी. पश्चिम की ओर है। नाहर कटिया, मोरान, हगरीजन प्रमुख केन्द्र हैं। इस क्षेत्र का तेल नूनमाटी व बरौनी तेलशोधक कारखानों में साफ किया जाता है।

(iv) शिव सागर व तकना क्षेत्र — यहाँ रुद्र सागर में तेल के कुएँ हैं। क्षेत्र 2. गुजरात प्रदेश – यह प्रदेश खंभात के बेसिन तथा गुजरात के मैदान में विस्तृत है। यहाँ के मुख्य निम्नलिखित हैं

(i) लुनेज क्षेत्र - इसे खंभात क्षेत्र भी कहा जाता है। यह क्षेत्र बड़ौदा से 60 किमी. पश्चिम में स्थित है।

(ii) अंकलेश्वर क्षेत्र – इस क्षेत्र का पता सन् 1959 में लगा। इसे बसुधारा क्षेत्र के नाम से पुकारा जाता है।

(iii) अहमदाबाद क्षेत्र – इस क्षेत्र में अहमदाबाद के निकट कलोल, नवगाम, ओल्पाद, कथाना, धोलका महसाना, कोसम्बा आदि स्थानों पर भी तेल का पता चला है।

(iv) बड़ोदरा क्षेत्र – यह क्षेत्र बड़ोदरा के समीप फैला है। यहाँ बादसर प्रमुख उत्पादक केन्द्र है।

3. बॉम्बे हाई – इसकी खोज 1975 में की गई। यह मुम्बई तट के निकट मुम्बई से 176 किमी. उ. प्र. दिशा में स्थित है। यह भारत का पहला अपतटीय (कम गहरा) क्षेत्र है। यहाँ से खनिज तेल निकालने के लिए समुद्र (में एक विशेष प्लेटफॉर्म का निर्माण किया गया, जिसको "सागर सम्राट" कहते हैं।

समुद्र तली पर बिछायी गई पाइप लाइनों द्वारा खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस तट पर पहुँचायी जाती है। 2001-02 में यहाँ से 20145 हजार टन कच्चा तेल प्राप्त किया गया था, जो भारत के कुल उत्पादन का लगभग 63% है।

4. पूर्वी तट प्रदेश – यह कृष्णा- गोदावरी और कावेरी की द्रोणियों में विस्तृत है। 1980 के दशक में तेल और प्राकृतिक गैस आयोगऔर आयल इण्डिया लिमिटेड ने इस क्षेत्र में विस्तृत सर्वेक्षण एवं खोज किया। नारीमनम और कोविलप्पल कावेरी द्रोणी के प्रमुख तेल क्षेत्र हैं।

2001-02 में इस द्रोणी में 4-41 लाख टन कच्चा तेल निकाला गया। इसके अतिरिक्त अभी कुछ समय पूर्व आन्ध्र प्रदेश के गोदावरी, कृष्णा द्रोणी में भी तेल की खोज हुई है। 2001-02 में आन्ध्र प्रदेश ने 2-83 लाख टन का उत्पादन किया।

व्यापार – भारत अपनी आवश्यकता का केवल एक तिहाई पेट्रोलियम ही पैदा करता है, शेष दो तिहाई पेट्रोलियम की आपूर्ति आयात से होती है। भारत अधिकांश पेट्रोलियम पदार्थ रूस, ईरान, इराक, म्यांमार, सऊदी अरब, इण्डोनेशिया, बहरीन, स. रा. अमेरिका तथा अमानिया आदि देशों से आयात किया जाता है।

पेट्रोलियम के संचित भण्डार

प्राकृतिक गैस एवं तेल आयोग के अनुसार भारत में पेट्रोलियम के संचित भण्डारों की मात्रा 1,750 लाख मी टन की है, जबकि भारत सरकार का पेट्रोलियम एवं रसायन मन्त्रालय देश में लगभग 1,300 लाख मी टन खनिज तेल के संचित भण्डार बताया है।

दूसरी ओर सोवियत संघ के खनन विशेषज्ञ भारत में 1.5 अरब मी टना खनिज तेल के संचित भण्डार बताते हैं । अन्तर्राष्ट्रीय भूगर्भिक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 620 करोड़ मी टन पेट्रोलियम के संचित भण्डार हैं।

पेट्रोलियम उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र

भारत में पेट्रोलियम उत्पादन के निम्नलिखित तीन क्षेत्र सर्वप्रमुख हैं।

(1) असम तेल क्षेत्र, (2) गुजरात तेल क्षेत्र, (3) अरब सागर के अपतटीय तेल क्षेत्र।

भारत मे खनिज संसाधनों की समस्याएँ

पृथ्वी के गर्भ में अनेक (प्राकृतिक सम्पदा) बहुमूल्य पदार्थ पाये जाते हैं, जिसे मानव अपने हित के लिए अनेक वर्षों से निकालता रहा है। खनिज को निकालना या खानें खोदना प्रकृति की सम्पदा का अपहरण करना है,

क्योंकि पृथ्वी से जब एक बार किसी भी खनिज पदार्थ को निकाल लिया जाता है, तो उतनी मात्रा में वह खनिज सदा के लिए समाप्त हो जाता है। भारत में अनेक प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। भारतीय खनिज संसाधन के समक्ष निम्नलिखित समस्याएँ हैं

1. असमान वितरण - भारत में खनिजों का वितरण असमान है, जैसे- कोयले, पेट्रोलियम तथा लोहे के निक्षेप देश के कुछ क्षेत्रों पर ही पाये जाते हैं, जबकि इनकी माँग देश के सभी भागों में है। इन खनिजों का वितरण बाजार और औद्योगिक क्षेत्र से दूर होने के कारण इनका समुचित विकास नहीं हो पा रहा है ।

2. उत्तम किस्म के खनिजों की कमी - भारत में पाये जाने वाले कई खनिज निम्न श्रेणी के हैं, जिनमें ताँबा, सीसा, जस्ता, राक-फॉस्फेट आदि हैं। भारत में अच्छी श्रेणी खनिज संसाधनों की समस्याएँ के कोकिंग कोल कम मात्रा में है, जबकि भारतीय उद्योगों में कोकिंग कोल की अत्यधिक आवश्यकता है।

3. आधुनिक खनन तकनीक का अभाव - हमारे देश में अभी भी खनन कार्य आधुनिक वैज्ञानिक विधि से नहीं होता है । शिक्षित व प्रशिक्षित श्रमिकों तथा आधुनिक यन्त्रों, मशीनों के अभाव के कारण खनिज पदार्थ पूरी मात्रा में नहीं निकाले जाते जिसके कारण लगभग 1 से 3% तक खनिज व्यर्थ नष्ट हो जाते हैं ।

4. सस्ते परिवहन का अभाव - भारत में परिवहन के सस्ते साधन अर्थात् जलमार्गों के अपर्याप्त विकास के कारण अधिकांश खनिजों का परिवहन कार्य रेलमार्गों तथा सड़क मार्गों द्वारा होता है। रेल तथा सड़क परिवहन व्यय अधिक होने के कारण खनिज महँगे पड़ते हैं जिसके कारण खनिजों का दोहन प्रभावित होता है।

5. नये खनिज क्षेत्रों के खोज में धीमी गति - भारत के नये खनिज क्षेत्रों के खोज का कार्य अभी भी अधूरा है। देश के कई भागों की भूगर्भिक जाँच बाकी है। असम और उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों की तो पूरी तरह से जाँच भी नहीं हो पाई है।

राष्ट्रीय खनिज नीति का अभाव, खनिजों के कचरे का उपयोग न होना, आधुनिक तकनीकी ज्ञान का अभाव आदि अन्य समस्याएँ हैं, जिसके कारण खनिज संसाधन का पूर्ण विकास नहीं हो पा रहा है।

खनिज संसाधनों का संरक्षण

खनिज समाप्त होने वाले होते हैं। यदि हम इनका तीव्र गति से दोहन करते रहें तो कुछ समय पश्चात् हमारे पास खनिज नहीं होंगे। अतः खनिजों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित कदम उठाये जा सकते हैं-

1. प्रौद्योगिकी का विकास - खनिजों के शोषण में आज बुद्धिमतापूर्ण प्रौद्योगिकी विकास करना आवश्यक है। खनिजों के खनन में उच्च आधुनिक तकनीक अपनायी जानी चाहिए, इससे खनिज व्यर्थ व नष्ट नहीं होगा और ज्ञात भण्डारों का अधिक समय तक उपयोग किया जा सकेगा।

जैसे- कोयले के भण्डार सीमित हैं जबकि जल संसाधन विपुल तथा समाप्त न होने वाली है। अतः जल विद्युत का अधिकाधिक विकास करके कोयले के भण्डार का काफी लम्बे समय तक उपयोग किया जा सकता है।

2. खनिजों का विकल्प खोजना - जो खनिज कम मात्रा में पाये जाते हैं, उनके स्थान पर विकल्प (संश्लेषित उत्पाद) खोजकर प्राकृतिक संसाधनों को अधिक समय तक उपयोग के लिए बचाया जा सकता है। जैसे—एल्यूमिनियम का उपयोग ताँबे के विद्युत् तारों की जगह किया जा सकता है।

प्लास्टिक ने आज कई धातुओं का स्थान ले लिया है। “तेल शैल” नामक चट्टान में खनिज तेल की पर्याप्त मात्रा होती है। अतः तेल शैल का उपयोग करके पेट्रोलियम का संरक्षण किया जा सकता है।

3. खनिजों का विवेकपूर्ण उपयोग- खनिजों का उपयोग विवेकपूर्ण होना चाहिए । उत्तम प्रकार के कोकिंग कोयले का उपयोग केवल धातु शोधन उद्योगों के लिए हो और निम्न श्रेणी के कोयले से कोलतार, रंग, कृत्रिम ऑयल तथा ताप विद्युत् प्राप्त किया जाय ।

4. खनिजों से उपउत्पादों की प्राप्ति- किसी खनिज से धातु निकालने की प्रक्रिया में कुछ अन्य धातु भी प्राप्त होते हैं जैसे- ताँबे से गंधक का तेजाब व गंधकीय गैसें प्राप्त की जा सकती हैं ।

व्यर्थ हो जाने वाले अभ्रक के छोटे टुकड़ों से बोर्ड, अभ्रक की चादरें, ईंटें, पेंट तथा पोटाश प्राप्त किये जा सकते हैं। निकिल और चाँदी को परिष्कृत करते समय उसमें आर्सेनिक ऑक्साइड प्राप्त किया जा सकता हैं।

5. आधुनिक यन्त्रों एवं उपकरणों का उपयोग,खानों से खनिज निकालने में आधुनिक यन्त्रों उपकरणों तथा तकनीकों का अधिकाधिक उपयोग किया जाय। ऐसा करने से खनिजों की व्यर्थ बर्बादी को रोका जा सकता है।,

6. लोगों में जागरुकता लाना - लोगों को खनिजों की समाप्यता के प्रति जागरूक किया जाय तथा देश में अल्प मात्रा में उपलब्ध खनिजों को मितव्ययितापूर्ण उपयोग के लिए प्रेरित किया जाय ।

7. अन्य उपाय – खनिजों के नये क्षेत्रों का पता लगाया जाय, ईंधन के लिए बायोगैस तथा सौर ऊर्जा के उपयोग पर बल दिया जाय तथा खनिजों के संरक्षण के लिए व्यापक राष्ट्रीय नीति घोषित की जाय।

Search this blog