निदर्शन का अर्थ क्या है - nirdeshank ka arth

Post Date : 18 May 2022

वर्तमान युग निदर्शन अथवा प्रतिचयन का युग है। आज के व्यस्ततम युग में किसी के पास इतना समय नहीं है कि संगणना प्रणाली के आधार पर समूचे समय का अध्ययन करके कार्य करें, इस युग में तो निदर्शन के आधार पर निर्णय लिये जाते हैं। निदर्शन अर्थात् नमूना देखकर लाखों करोड़ों के सौदे हो जाते हैं। 

दैनिक जीवन की अधिकांश समस्याओं का समाधान संगणना से नहीं वरन् प्रतिचयन के द्वारा ही सम्भव है तथा यह अपने आप में कोई अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि गेहूँ के विशाल ढेर में से कुछ दोनों को देखकर उसकी किस्म पता लगा लेना, रक्त की एक बूंद का परीक्षण करके रोगी के रोग का निदान कर देना, शादी से पूर्व कुछ प्रश्नों के आधार पर जीवन साथी तय कर लेना ये सब बातें सही अर्थों में निदर्शन अथवा न्यादर्श की ही व्याख्या मात्र है।

निदर्शन समूचे समग्र का प्रतिनिधित्व करता है। अधिकांश सांख्यिकों का यह अटूट विश्वास है कि यदि किसी समग्र में से निदर्शन इकाइयों का चयन वैज्ञानिक तरीकों से किया जाये तो निदर्शन इकाई में समग्र की सभी विशेषतायें दृष्टिगोचर होंगी। अंग्रेजी भाषा में निदर्शन के लिये के लिये 'सेम्पल' शब्द का उपयोग किया गया है।

जिसका अर्थ है-'नमूना' अर्थात् सरल शब्दों में निदर्शन से अभिप्राय नमूने से होता है।

निदर्शन की परिभाषा

1. सिम्पसन एवं काफ्का के अनुसार, “न्यादर्श किसी समग्र का वह भाग है जो सम्पूर्ण समग्र के अनुसन्धान के लिये चुना जाता है। एक न्यादर्श को समग्र की विशेषताओं का स्पष्ट चित्रण करना चाहिए। यह अपने में एक 'लघु समग्र' के समान है या इसे समग्र का उप-समुच्चय कह सकते हैं।"

2. या-लुन-चाऊ के अनुसार, “न्यादर्श, प्राथमिक न्यादर्श इकाइयों का वह भाग है जो समग्र का प्रतिनिधि सूक्ष्म रूप होता है और जिसके आधार पर ही समष्टि के बारे में निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।"

निदर्शन के उद्देश्य

निदर्शन अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य किसी विचारधारा समस्या के बारे में न्यूनतम समय, श्रम व अर्थ (मुद्रा) व्यय करके अधिकतम जानकारी हासिल करना है। संक्षेप में, निदर्शन के प्रमुख उद्देश्य अग्रलिखित हैं -

1. प्राचलों का अनुमान-निदर्शन सिद्धान्त का आधारभूत उद्देश्य न्यादर्श का अध्ययन करके समय में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करना है। दूसरे शब्दों में प्रतिदर्शन की सहायता से प्राचल का अनुमान लगाना निदर्शन सिद्धान्त का प्राथमिक उद्देश्य है। यह अनुमान दो प्रकार का हो सकता है- (अ) बिन्दु अनुमान तथा (ब) अन्तराल अनुमान। 

बिन्दु अनुमान में प्रतिदर्शज से प्राचल का एक निश्चित अनुमान लगाया जाता है जबकि अन्तराल अनुमान दो सीमा के मध्य लगाया जाता है। उदाहरण के लिये-प्रतिदर्शज के आधार पर यह कहना कि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का मध्यम भार 55 किलोग्राम है तो यह बिन्दु अनुमान होगा इसके विपरीत यह कहना कि प्राचल के मध्यम भार का अन्तराल 55 + 3 है तो यह अन्तराल अनुमान कहलायेगा क्योंकि प्राचल का वास्तविक माप 52 से 58 किलोग्राम के बीच स्थित होगा।

2. परिकल्पना का परीक्षण-प्रतिचयन सिद्धान्त का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य निदर्शन के आधार पर समग्र के बारे में की गई परिकल्पना की जाँच करना है। परिकल्पना परीक्षण के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता है। 

कि अवलोकित प्रतिदर्शज अर्थात् न्यादर्श का परिणाम तथा परिकल्पित प्राचल अर्थात् समग्र का कल्पित परिणाम में पाया जाने वाला अन्तर केवल प्रतिचयनों के उच्चावचनों के कारण हैं या वह सार्थक अथवा महत्वपूर्ण है। परिकल्पना परीक्षण को सार्थकता परीक्षण भी कहते हैं।

निदर्शन की रीतियाँ

निदर्शन की प्रमुख रीतियों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

दैव निदर्शन

सांख्यिकी में दैव निदर्शन सबसे महत्वपूर्ण रीति समझी जाती है क्योंकि इसमें पक्षपात की कोई सम्भावना नहीं रहती। समग्र में से जितने न्यादर्श लिये जाते हैं वे सब सम्भावना के आधार पर ही चुने जाते हैं। इस रीति के अनुसार न्यादर्श में समय की विभिन्न विशेषताओं वाले समंकों के चुने जाने की पूरी-पूरी सम्भावना रहती है। अतः उनका चुनाव अनुसन्धानकर्ता की इच्छा पर निर्भर नहीं रहता। 

दैव निदर्शन के कारण सम और विषम दोनों प्रकार की प्रकृति वाले समंक चुने जा सकते हैं, इसलिए उनकी निजी विशेषतायें एक-दूसरे के प्रभावों को समाप्त कर समग्र की वास्तविकता का स्पष्ट दिग्दर्शन कराने में सफल होती हैं।

इस विधि द्वारा जिस भी इकाई का न्यादर्श के रूप में चुनाव होगा उसमें अनुसन्धानकर्ता का कोई हस्तक्षेप नहीं है। चयन का यह कार्य पूर्ण दैव या अवसर पर छोड़ दिया जाता है। दैव निदर्शन के अनुसार न्यादर्श चुनने की तीन विधियाँ हैं।

(a) लॉटरी विधि - यह दैव निदर्शन की सरल विधि है। इस विधि में समग्र की सभी इकाइयों की एक-एक पर्ची बना दी जाती है। आवश्यकतानुसार ड्रम घुमाकर पर्चियों को चुन लिया जाता है अथवा पर्चियों को अच्छी तरह हिला-मिलाकर निष्पक्ष रूप से पर्चियाँ न्यादर्श के रूप में निकाल ली जाती हैं।

(b) दैव संस्थाओं की सारणी द्वारा - कई सांख्यिकीशास्त्रियों ने इस तरह की सारणियों का निर्माण किया है जिनमें TIPPET की सारणी मुख्य है। न्यादर्श का चुनाव इस आधार पर किया जाता है।

(c) एक निश्चित क्रम में इकाइयों को व्यवस्थित करना - समग्र की समस्त इकाइयों को अक्षरात्मक (Alphabetically) अथवा बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कर उद्देश्य के अनुसार व्यादर्श के लिए इकाइयाँ चुन ली जाती हैं।

सविचार निदर्शन

सुविचार निर्देशन विधियों में न्यादर्श के चुनाव के लिए किसी विशिष्ट विधि का प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि अन्वेषक अपनी इच्छा और आवश्यकतानुसार समग्र में से इकाइयों का चुनाव व्यादर्श के रूप में करता है। इसमें एक अन्वेषक द्वारा न्यादर्श का चुनाव दूसरे अन्वेषक से भिन्न होता है। न्यादर्श की गुणवत्ता अन्वेषक के ज्ञान और अनुभव पर निर्भर होती है। इस विधि को निर्णय निर्देशन भी कहा जाता है।

स्तरित अथवा मिश्रित निदर्शन रीति 

यह रीति सविचार एवं दैव निदर्शन रीतियों का मिश्रण है। इस रीति के अनुसार अनेक वर्गों या स्तरों (Strata) में समग्र को विभिन्न विशेषताओं के आधार पर विभाजित कर दिया जाता है जिसमें कि प्रत्येक वर्ग अथवा समूह में से न्यादर्शों का चुनाव हो सके। इसके पश्चात् भिन्न-भिन्न वर्गों में से वांछित व्यादर्श दैव-निदर्शन के आधार पर प्राप्त किये जाते हैं। 

प्रत्येक खण्ड से छाँटे जाने वाले मदों की संख्या उसमें सम्मिलित कुल मदों के अनुपात में होगी। उदाहरणार्थ, यदि किसी कारखाने के 10,000 विभिन्न कर्मचारियों की स्थिति का अध्ययन करना हो तो पहले उन्हें निश्चित विशेषताओं के आधार पर अलग-अलग खण्डों अथवा स्तरों में बाँटा जायेगा, तत्पश्चात् प्रत्येक स्तर में से आनुपातिक रूप से दैव निदर्शन का चुनाव कर लिया जायेगा; 

जैसे- यदि विभिन्न चार स्तरों में 2,000, 1,000, 6,400 तथा 600 कर्मचारी हों और 10 प्रतिशत मदों का चुनाव करना हो तो प्रत्येक स्तर में से क्रमशः 200, 100, 640 और 60 कर्मचारियों का ही दैवचयन किया जायेगा।

अभ्यंश निदर्शन 

इस विधि में समस्त समग्र की विभिन्न भागों में उनकी विशेषताओं के आधार पर बाँट दिया जाता है; जैसे- आयु, लिंग, व्यवसाय, आय आदि के आधार पर प्रत्येक भाग में कितनी मदें न्यादर्श के लिए ली जायेंगी उसका अभ्यंश (Quota) निश्चित कर लिया जाता है। अभ्यंश या कोटे के अनुसार अनुसन्धानकर्ता स्वयं अपनी इच्छा से न्यादर्श के लिए मदों का चयन कर लेता है। 

अतः न्यादर्श की मदों का चुनाव अनुसन्धानकर्ता के व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर करता है। यह विधि निर्णय निदर्शन की तरह है जिसका प्रयोग सामाजिक, राजनैतिक व धार्मिक सर्वेक्षण के लिए किया जाता है।

इस प्रकार का अभ्यंश निदर्शन उन परिस्थितियों में अत्यन्त उपयुक्त समझा जाता है जब किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा विषय के सम्बन्ध में लोगों की राय जानना हो। उदाहरण के लिए किसी नई उत्पादित वस्तु के विषय में लोगों का विचार जानने के लिए इस रीति का सुगमतापूर्वक उपयोग किया जाता है। 

भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी की लोकप्रियता जानने के लिए अभ्यंश निदर्शन रीति का कई बार उपयोग किया गया है। इस विधि का एक ही दोष यह है कि प्रगणकों के चुनाव में कोई पक्षपात किया है तो प्राप्त परिणाम भी दोषयुक्त हो सकते हैं। अतः दैव निदर्शन के गुण न होने के कारण सरल होते हुए भी यह रीति सीमित महत्व रखती है।

स्तरित निदर्श 

इस विधि का प्रयोग न्यादर्श चुनाव में उस समय किया जाता है जब किसी समग्र की इकाइयाँ एक समान न हों तथा विभिन्न विशेषताओं वाली हो । न्यादर्श के चयन के लिए समग्र को विभिन्न समूहों में बाँट दिया जाता है। समग्र का प्रत्येक समूह stratum कहलाता है। प्रत्येक समूह की कुछ उन इकाइयों को चुन लिया जाता है जो उस समूह का प्रतिनिधित्व करती है। यह चुनाव क्रिया दैव निदर्शन विधि द्वारा ही होती है।

सुविधाजनक निदर्शन 

निदर्शन की इस प्रणाली के अनुसार समय की केवल उन्हीं इकाइयों को चुना जाता है जो सुविधानुसार उपलब्ध हो सकती हैं। अतः यह प्रणाली बहुत वैज्ञानिक नहीं कही जा सकती क्योंकि इस प्रकार चुने हुए समंक समग्र का कितना प्रतिनिधित्व करेंगे यह कहना कठिन है। कभी-कभी समयाभाव होने पर समंक संकलन हेतु इस प्रणाली का उपयोग किया जाता है, किन्तु महत्वपूर्ण अनुसन्धानों के लिए सुविधाजनक निदर्शन कोई पसन्द नहीं करता। वस्तुतः सुविधाजनक निदर्शन भी एक प्रकार से विस्तृत निदर्शन ही है।

(7) व्यवस्थित निदर्शन (Systematic Sampling)-व्यवस्थित निदर्शन विधि का प्रयोग तभी किया जा सकता है जब समग्र की सभी इकाइयाँ उपलब्ध हों। समग्र की सभी इकाइयों को संख्यात्मक, भौगोलिक अथवा अक्षरात्मक आधार पर बढ़ते या घटते क्रम में क्रमबद्ध कर लिया जाता है। 

तत्पश्चात् न्यादर्श इकाइयों का चुनाव कर लिया जाता है। उदाहरण के लिए, 1000 विद्यार्थियों में से 100 विद्यार्थी (न्यादर्श की इकाइयाँ) चुनते हैं। समग्र की कुल इकाइयों की संख्या को न्यादर्श की इकाइयों की संख्या से विभाजित कर संख्यात्मक क्रमबद्ध में nth item के अनुसार न्यादर्श की इकाइयों का चुनाव किया जाता है।

बहुस्तरीय दैव निदर्शन 

इस प्रणाली का आधार तो दैव निदर्शन ही होता है किन्तु न्यादर्शों के चुनाव का कार्य विभिन्न स्तरों पर किया जाता है। समग्र को प्रथम स्तर निदर्शन इकाइयों में बाँटकर किसी उचित रीति द्वारा न्यादर्श चुन लिया जाता है। यह इस क्रिया की प्रथम स्थिति होती है। इसके पश्चात् प्रथम स्तर की न्यादर्श इकाइयों का द्वितीय स्तर की इकाइयों में बाँटा जाता है और इनसे पुनः एक न्यादर्श चुना जाता है। 

उदाहरणार्थ, भारत में प्रति व्यक्ति उपभोग ज्ञात करने के लिये सभी राज्यों में से कुछ जिले छाँट लिये जायें तत्पश्चात् कुछ शहर तथा शहरों में से कुछ मौहल्ले तथा कुछ परिवार एवं व्यक्तियों का चुनाव कर लिया जाता है।

सांख्यिकी अनुसन्धान

सांख्यिकी अनुसन्धान ज्ञान की वह खोज है जो सांख्यिकी रीतियों द्वारा की जाये। दूसरे शब्दों में किसी क्षेत्र में संख्यात्मक विश्लेषण द्वारा समस्या का उचित निर्वचन करने के उद्देश्य से आवश्यक समंकों के वैज्ञानिक संकलन की क्रिया को सांख्यिकी अनुसन्धान कहते हैं।

सांख्यिकी अनुसन्धान केवल उन समस्याओं से सम्बोधित होता है जिसका संख्यात्मक विवेचन किया जा सके। जैसे किसी देश की जनसंख्या, औद्योगिक मजदूरों की आर्थिक स्थिति, विद्यार्थियों का मासिक व्यय, शिक्षित वर्ग की बेरोजगारी। इसके विपरीत गुणात्मक तथ्यों के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष रूप से सांख्यिकी अनुसन्धान नहीं किया जा सकता। उनका केवल अप्रत्यक्ष रूप से अध्ययन किया जा सकता है।

सांख्यिकी अनुसन्धान के प्रमुख चरण 

  1. सांख्यिकी अनुसन्धान का आयोजन 
  2. समंकों का संकलन 
  3. समंकों का सम्पादन एवं प्रस्तुतीकरण 
  4. समंकों का विश्लेषण 
  5. समंकों का निर्वाचन तथा प्रतिवेदन तैयार करना।