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राजकोषीय नीति का क्या अर्थ है - rajkoshiya niti kya hai

अर्थशास्त्र की किसी भी अन्य शाखा में इतने व्यापक परिवर्तन नहीं हुए हैं, जितने कि प्रशुल्क नीति में हुए हैं। राष्ट्रीय उत्पाद, रोजगार, औद्योगिक उत्पादन व मूल्य, आदि को प्रभावित करने में यह नीति आधुनिक सरकारों के लिए बहुत लोकप्रिय है। 

राजकोषीय नीति का क्या अर्थ है

देश में पूर्ण रोजगार प्राप्त करने एवं अर्थव्यवस्था में मूल्यों में स्थिरता लाने की दृष्टि से प्रशुल्क नीति का ही प्रयोग किया जाता है। राजकोषीय नीति का प्रमुख कार्य पूँजी निर्माण को प्रोत्साहित करना है। इस नीति का प्रत्यक्ष सम्बन्ध देश की बचत, विनियोग, पूँजी निर्माण एवं वित्तीय साधनों से होता है। 

सरकार का दृष्टिकोण सदैव बजट को सन्तुलित करने का ही होता है तथा आवश्यकता पड़ने पर आन्तरिक एवं बाह्य ऋण लेने तथा घाटे की वित्त व्यवस्था करना ही प्रशुल्क नीति कहलाता है। प्रशुल्क नीति के अंगों में सरकारी कर, सरकारी व्यय एवं सार्वजनिक ऋण को शामिल किया जाता । 

इस प्रकार राजकोषीय नीति का मौलिक सम्बन्ध आय को निजी व्यय एवं बचत से हटाकर सरकारी क्षेत्र की ओर केन्द्रित करने से है।

राजकोषीय नीति के लक्षण

देश के आर्थिक विकास में प्रशुल्क नीति का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस नीति के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं

(1) पूँजीगत साधनों का उपयोग - प्रशुल्क नीति की सहायता से उपभोग पर अनावश्यक व्यय न करके उपलब्ध साधनों को पूँजीगत साधनों के रूप में प्रयोग करके विकास में अधिक योगदान दिया जा सकता है। 

(2) वित्तीय साधन - बचत एवं विनियोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से देश में पर्याप्त वित्तीय साधनों का होना आवश्यक है।

(3) ग्रामीण क्षेत्र से सहायता - ग्रामीण क्षेत्र से भी पर्याप्त मात्रा में वित्तीय सहायता प्राप्त की जानी चाहिए तथा बचतों को गतिशील बनाया जाना चाहिए ।

(4) उपभोग पर नियन्त्रण - प्रशुल्क नीति द्वारा ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि उपभोग पर नियन्त्रण लगाकर बचत को प्रोत्साहित किया जा सके।

(5) घाटे की वित्त व्यवस्था - आय के साधनों की कमी होने पर घाटे की वित्त व्यवस्था द्वारा साधनों को बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए मुद्रा प्रसार को नियन्त्रित किया जाना चाहिए।

(6) उचित ढंग से व्यय – प्राप्त साधनों को उचित ढंग से व्यय किया जाना चाहिए तथा आर्थिक विकास की विभिन्न मदों पर धन की मात्रा निर्धारित की जानी चाहिए ।

(7) कर निर्धारण में सुविधा - नियोजित अर्थव्यवस्था में कर का भार बहुत बढ़ जाता है, अतः अधिक आय वाले व्यक्तियों से अधिक मात्रा में कर प्रगतिशील आधार पर लिया जाता है, जबकि कम आय वाले व्यक्तियों को कर की छूट दी जाती है।

राजकोषीय नीति के उद्देश्य 

राजकोषीय नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नांकित हैं—

(1) आय की असमानता को दूर करना 

प्रशुल्क नीति का उद्देश्य अविकसित देशों में आय की असमानता को दूर करना है । यह कार्य आय के पुनर्वितरण की सहायता से किया जाता है जिसका विनियोग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जो औद्योगिक विकास में बाधाएँ उपस्थित करती है।

(2) मुद्रा प्रसार पर नियन्त्रण

प्रशुल्क नीति का प्रयोग मुद्रा प्रसार के प्रभाव को रोकने के लिए किया जा सकता है। प्रशुल्क नीति का प्रयोग प्रगतिशील कर एवं कर नीति में सुधार करके मुद्रा प्रसार के प्रभावों को रोकने में किया जाता है।

(3) निजी विनियोग को महत्व

अविकसित राष्ट्रों में निजी विनियोग को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है करों से प्राप्त आय को निजी उद्योग के विकास पर व्यय किया जा सकता है। निजी क्षेत्र में कठिनाइयाँ उपस्थित होने पर अनुचित विनियोग पर रोक लगाकर, अधिक कर की व्यवस्था करके एवं करों में छूट देकर सहायता पहुँचायी जा सकती है।

(4) बचत एवं विनियोग को बढ़ावा

प्रशुल्क नीति का उद्देश्य देश में बचत एवं विनियोग को बढ़ाना है । इसके लिए करों में वृद्धि, विनियोग निजी क्षेत्र से सरकारी क्षेत्र की ओर मोड़कर, उपभोग पर कर लगाकर तथा उत्पादन बढ़ाने के प्रयास करने सम्बन्धी उपायों का पालन किया जाता है।

अल्पविकसित राष्ट्रों में प्रशुल्क नीति

अल्पविकसित देशों में प्राकृतिक साधनों का बाहुल्य रहता है परन्तु वहाँ पर वित्तीय साधनों का अभाव पाये जाने से उन देशों में अनेक प्रकार की समस्याएँ उदय हो जाती हैं । एक धनी राष्ट्र में बचत की मात्रा अधिक होने पर वित्तीय आवश्यकताओं के अनुरूप करारोपण के स्तर एवं ऋण के स्तर को समायोजित किया जा सकता है। 

किन्तु एक निर्धन राष्ट्र में विपरीत स्थिति होती है जहाँ ऊँचे द्वारा राज्य व्यय को पूर्ण किया जाता है। अल्पविकसित राष्ट्रों में प्रशुल्क नीति का कार्य पूँजी निर्माण व विनियोग की दर में वृद्धि करना है, जिससे अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता विकसित हो सके व आर्थिक विकास सम्भव हो सके। 

सार्वजनिक क्षेत्र में व्यय में अपार वृद्धि हुई है और इन व्ययों को पूर्ण करने के लिए सरकार के पास निम्नलिखित साधन होते हैं

(1) करारोपण

करारोपण के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए एक 'प्रभावी कर नीति' की सहायता से आय प्राप्त की जा सकती है। करारोपण के मुख्य उद्देश्य निम्न प्रकार हैं

(i) उच्चावचन पर नियन्त्रण-करारोपण का उपयोग उच्चावचनों पर नियन्त्रण लगाने के रूप में किया जाना चाहिए। अर्द्धविकसित राष्ट्रों में यह नियन्त्रण प्रायः निर्यात क्षेत्र में लगाया जाता है ।

(ii) कर आय में वृद्धि करारोपण का उद्देश्य अधिकतम मात्रा में कर आय में वृद्धि करना होना चाहिए । इसके लिए कर मशीनरी में परिवर्तन करना होगा। कर आय में वृद्धि करके कुल आय को बढ़ाया जा सकता है तथा उससे विकास के नवीन आयाम स्थापित किये जा सकते हैं ।

(iii) साधनों का हस्तान्तरण-करारोपण का उद्देश्य समाज से राज्य को साधनों का अधिकतम मात्रा में हस्तान्तरण सम्भव होना चाहिए जिससे उपभोग एवं विनियोग पर न्यूनतम प्रभाव पड़े। अतः करारोपण द्वारा अधिकतम मात्रा में साधनों का हस्तान्तरण करना चाहिए ।

(iv) निजी पूँजी निर्माण करारोपण का उद्देश्य प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से देश में निजी पूँजी निर्माण को प्रोत्साहित करना होना चाहिए ।

(v) कर- भार के वितरण में समानता–कर लगाते समय समानता के सिद्धान्त का पालन करना चाहिए जिससे कर के भार का समान रूप से वितरण किया जा सके तथा उत्पादक प्रयासों में वृद्धि हो सके ।

(2) कर नीति

सरकार द्वारा आर्थिक विकास में भाग लेने पर सार्वजनिक बचतों को महत्व दिया जाता है । अतः सरकार की कर नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे बचतों पर बुरा प्रभाव न पड़े । देश में उत्पादन लागत में कमी, उत्पादन में वृद्धि, जोखिम को न्यूनतम करना एवं निजी विनियोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कर नीति में तीन बातों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है - 

  • (क) कर-प्रेरणा।
  • (ख) आर्थिक स्थिरता।
  • (ग) अर्द्धविकासत राष्ट्रों में कर सुधार।

(क) कर-प्रेरणा - बड़े स्तर के व्यवसाय को आकर्षित करने के लिए करों में छूट देकर, भूमि पर कर लगाकर, निर्यात करों में छूट देकर तथा लाभ का पुनर्विनियोग करके देश के व्यापारियों को कर-प्रेरणा देकर विकास के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

(ख) आर्थिक स्थिरता - कर नीति के द्वारा देश में आर्थिक स्थिरता स्थापित की जा सकती है । सार्वजनिक व्ययों की सहायता से विनियोग में वृद्धि करके बेरोजगारी को रोका जा सकता है। विनियोग में वृद्धि निर्यात में वृद्धि लाकर सम्भव हो सकती है। इसके विपरीत निर्यात में कमी करने से विपरीत प्रभाव दिखायी देते हैं । 

आर्थिक पद्धति पूर्ण रूप से विकसित न होने से प्रशुल्क नीतियाँ ठीक प्रकार से कार्य सम्पन्न नहीं कर पातीं । इन राष्ट्रों में प्रशुल्क नीति द्वारा क्रय-शक्ति में वृद्धि करने पर भी मूल्यों में व्यय हो जायेगी । मन्दीकाल में कर-नीति सफलतापूर्वक कार्य नहीं कर पाती । 

अतः करारोपण द्वारा आर्थिक स्थिरता लाने के प्रयास किये जाने चाहिए, जिससे देश का आर्थिक विकास सम्भव हो सके। प्रशुल्क नीति में सुधार करने से साधनों में बढ़ोत्तरी होगी जिनका उपयोग अस्थिरता का नियन्त्रण करने में किया जा सकेगा।

(ग) अर्द्धविकसित राष्ट्रों में कर सुधार - अर्द्धविकसित राष्ट्रों में सुधार करके विकास कार्यक्रम बनाये जा सकते हैं। करारोपण विधि में सुधार करके कर की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है तथा आर्थिक विकास में धन को विनियोजित किया जा सकता है। प्रगतिशील करों को लगाकर धनी वर्ग से अधिक मात्रा में राशि प्राप्त की जा सकती है तथा उसे विकास कार्यों में लगाया जा सकता है।

(3) आन्तरिक ऋण

अर्द्धविकसित देशों में करारोपण द्वारा पर्याप्त मात्रा में आय प्राप्त न होने से सरकार को आन्तरिक ऋण लेकर वित्तीय व्यवस्था करनी होती है। इसके लिए विभिन्न प्रकार के ऋणपत्र तथा डाकखाने एवं खजाने के ऋणपत्र आदि को जारी किया जाता है। कर की अपेक्षा व्यक्ति ऋण देना अधिक सुरक्षित समझता है।

(4) हीनार्थ प्रबन्धन

यदि करारोपण एवं आन्तरिक ऋण द्वारा पर्याप्त मात्रा में धन प्राप्ति सम्भव न हो सके तो सार्वजनिक व्ययों की पूर्ति के लिए सरकार को हीनार्थ प्रबन्धन का सहारा लेना पड़ता है। विदेशों में जनता से ऋण लेना ही हीनार्थ प्रबन्धन माना जाता है, परन्तु भारत में हीनार्थ प्रबन्धन के अन्तर्गत नवीन नोटों की निकासी करके मुद्रा प्रसार का सहारा लिया जाता है। भारत में पंचवर्षीय योजनाओं में हीनार्थ प्रबन्धन का सहारा लिया गया ।

प्रशुल्क नीति की कठिनाइयाँ

देश के आर्थिक विकास में प्रशुल्क नीति का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण होते हुए भी, अल्पविकसित राष्ट्रों में प्रशुल्क नीति को अपनाने में निम्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है

(1) उपयुक्त परिस्थितियों का अभाव - अविकसित राष्ट्रों में प्रायः उपयुक्त परिस्थितियों के अभाव में लोचपूर्ण एवं उचित कर नीति को अपनाना सम्भव नहीं हो पाता ।

(2) आय ज्ञात करने में कठिनाइयाँ - अदल-बदल की प्रथा का प्रयोग होने पर जनता की आय ज्ञात करना कठिन होता है,जिससे उपयुक्त कर नीति को अपनाना सम्भव नहीं हो पाता । इसके लिए जनता को शिक्षित करना होगा जिससे ये अपनी आय के बारे में सही जानकारी प्रदान कर सकें।

(3) आय का वितरण - यदि आय का एक बड़ा भाग ऐसे व्यक्तियों को जाए जो कि बचत करें, तो कुल माँग में कोई वृद्धि नहीं होगी। दूसरी ओर यदि आय का अधिकांश भाग व्यय कर दिया जाए, तो गुणक प्रभाव के कारण उसका प्रभाव अधिक होगा और प्रशुल्क नीति लाभकारी होगी ।

प्रशुल्क नीति के विभिन्न अंग

प्रशुल्क नीति के अनेक अंग हैं। उनमें से मुख्य इस प्रकार हैं— 

(1) व्यय नीति - प्रजातान्त्रिक राष्ट्रों में आय को इस प्रकार व्यय किया जाता है कि जनता को अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त हो सके। आय से व्यय अधिक होने पर घाटे के बजट बनाये जाते हैं तथा ऋण भी लिये जाते हैं। ऋण की मात्रा मुद्रा एवं साख की स्फीति को कम करने के लिए अत्यन्त उपयोगी मानी जाती है। 

(2) पूर्ण रोजगार - प्रशुल्क नीति की सहायता से अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति को स्थायी रूप दिया जा सकता है । सरकार का यह दायित्व है कि समस्त योजनाओं में पूर्ण समायोजन किया जाये तथा सामान्य कल्याण में वृद्धि की जानी चाहिए। प्रशुल्क नीति का उद्देश्य पूर्ण रोजगार की स्थिति को बनाये रखना है।

(3) कर-नीति करों का समाज के विभिन्न वर्गों पर समान प्रभाव नहीं पड़ता है। करों की वृद्धि या कमी से उपभोग, उत्पादन, वचत एवं विनियोग पर प्रभाव पड़ता है। ऊँचे कर उत्पादन को हतोत्साहित करते हैं तथा रोजगार को कम करते हैं । 

मूल्यों में वृद्धि होकर निर्यात गिर जाते हैं तथा देश के आर्थिक विकास पर बुरा प्रभाव डालते हैं। करों की दर सीमित रखनी चाहिए अन्यथा अर्थव्यवस्था का विकास सीमित मात्रा में होगा। आर्थिक विकास कर नीति के अतिरिक्त शासन नीति की दृढ़ता पर भी निर्भर करता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि वर्तमान समय में राजकोषीय नीति का लोक अर्थशास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान है। आज राजकोषीय नीति महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान करने लगी है, इसलिए इसका महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा है।

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