भारत में पाए जाने वाले प्रमुख खनिज - bharat me paye jane wale khanij

खनिज एक ठोस रासायनिक यौगिक है जिसमें रासायनिक संरचना और विशिष्ट क्रिस्टल संरचना होती है जो प्राकृतिक रूप से शुद्ध होती है। खनिज एक संसाधन होता है जिसका उपयोग हम कई कार्यों मे करते हैं। खनिज हमारे विकास का अभिन्न तत्व हैं। 

खनिजों को मुख्य रूप से तीन वर्गों मे बांटा गया हैं  -

  1. धात्विक खनिज
  2. अधात्विक खनिज
  3. खनिज ईंधन

भारत में पाए जाने वाले प्रमुख खनिज 

इस पोस्ट मे हम धात्विक खनिज के बारे मे जानकारी प्राप्त करेंगे तो चलिए जानते हैं। भारत मे पाए जाने वाले प्रमुख खनिज के बारे में -

  1. लौह अयस्क
  2. अभ्रक
  3. बॉक्साइट
  4. तांबा 
  5. सोना 
  6. चाँदी 
  7. नमक 

1. लौह अयस्क

लौह अयस्क को विकास की धुरी या आधुनिक सभ्यता की जननी कहा जाता है। आज विभिन्न प्रकार के मशीनों, वाहनों, कल-पुर्जों, भवन, कारखानों, पुलों आदि का निर्माण इसी से होता है, लोहा विश्व के समस्त खनिजों में महत्वपूर्ण है।

भारत में पाए जाने वाले प्रमुख खनिज - bharat me paye jane wale khanij

लौह अयस्क के चार प्रकार होते हैं

1. मैग्नेटाइट - यह सबसे उत्तम कोटि का अयस्क है। इसमें लोहांश की मात्रा 70% तक होती है। इसका रंग काला होता है। इसमें गंधक एवं फॉस्फोरस मिले रहते हैं।

2. हैमेटाइट - यह लाल कत्थई रंग का होता है। इसमें लोहांश 60 से 70% तक पायी जाती है ।

3. लिमोनाइट - इसका रंग पीला या भूरा होता है। इसमें लोहा, ऑक्सीजन व हाइड्रोजन मिला रहता है, इसमें लोहांश 40 से 60% तक पाया जाता है।

4. सिडेराइट - यह निम्न कोटि का अयस्क है । इसका रंग राख जैसा होता है। इसमें लोहांश 10 से 48% तक पाया जाता है।

भारत में लौह अयस्क का वितरण

भारत में लौह अयस्क के मुख्य निक्षेप प्रायद्वीपीय पठारी भाग में हैं। इसके भंडार झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक व गोवा में विस्तृत हैं।

झारखंड - झारखंड की लौह पेटी वास्तव में उड़ीसा की लौह पेटी का ही विस्तार है। यहाँ लोहे का विश्व विख्यात क्षेत्र सिंहभूमि है, जहाँ से सर्वप्रथम लौह अयस्क का उत्पादन किया गया था। मुख्य खदानें पंसिराबुरु, गुआ, नोआमुण्डी, बुराबुरु हैं।

इसके अतिरिक्त हजारीबाग, मानभूमि में भी लौह अयस्क पाया जाता है। जमशेदपुर, दुर्गापुर, हीरापुर, केल्टी इस्पात संयंत्रों को यहाँ से लौह अयस्क की पूर्ति की जाती है ।

उड़ीसा - सुन्दरगढ़, मयूरभंज, क्योंझर, कोरापुरट एवं सम्बलपुर जिले में लौह अयस्क के भण्डार हैं। सुन्दरगढ़ जिले की बरसना, कोटुरा, मालनगोली, कंडाधार- पहाड़, मयूरगभंज जिले की गुरुमहिसानी, सुलेपात, बादाम पहाड़, क्योंझर की बाँसपानी, ठकुरानी, कुरुबन्दा फिलोरा, कोरापुट में अमरकोट खानों से लौह अयस्क निकाला जाता है।

इन खानों से जमशेदपुर, राउरकेला इस्पात संयंत्रों को लौह अयस्क की आपूर्ति की जाती है।

छत्तीसगढ़ - यहाँ लगभग 2.3 अरब टन लोहे के निक्षेप हैं। बस्तर, दुर्ग, बिलासपुर, रायगढ़, सरगुजा जिलों में इसकी खानें हैं। बस्तर व दुर्ग की खानें विश्व प्रसिद्ध हैं।

बस्तर में बैलाडिला व दुर्ग में दल्ली-राजहरा खानों का लौह अयस्क सीधे भिलाई, बोकारो इस्पात संयंत्रों को कच्चे माल के रूप में भेजा जाता है।

महाराष्ट्र - चाँदा जिले के लोहारा, पीपलगाँव, अकोला, देवलागाँव, सूरजगढ़, रत्नागिरि क्षेत्र के रेडी, सावन्तवाड़ी, गुल्डूर खानों से लौह अयस्क निकाला जाता है । यहाँ सस्ते समुद्री परिवहन की सुविधा है।

कर्नाटक - यहाँ के चिकमंगलूर की बाबाबुदान पहाड़ी, कुद्रेमुख तथा चितलदुर्ग, शिमोगा, तुमकुर जिलों में भी लोहा प्राप्त होता है। भद्रावती संयंत्र को यहाँ से कच्चे माल की पूर्ति की जाती है।

गोवा - लौह अयस्क के प्रमुख क्षेत्र पिरना अदोल, पाले ओनड़ा, कुदनेम, सुरला, उत्तरी गोआ हैं। यहाँ लोहे की खुली व मशीनीकृत खानें हैं। सस्ते जल-परिवहन की सुविधा है। यहाँ देश के कुल लोहा का 1/4 भाग से अधिक लोहा प्राप्त होता है। यह लौह अयस्क में अग्रणी राज्य है, परन्तु यहाँ का लोहा निकृष्ट कोटि का है।

अन्य राज्य - लौह अयस्क का निक्षेप पश्चिमी तट के सहारे कर्नाटक, केरल के कुछ क्षेत्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पं. बंगाल में रानीगंज क्षेत्र, हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी तथा उत्तर प्रदेश के गढ़वाल, बिहार में भागलपुर, म. प्र. का बालाघाट, मण्डला एवं उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में है।

उत्पादन - भारत का लौह खनिज सुखद स्थिति में है। इसके कुल भण्डार 2071 करोड़ टन हैं, जो लगभग 400 वर्षों के लिए पर्याप्त हैं। इस प्रकार विश्व का लगभग 1/4 भाग निक्षेप यहाँ पाया जाता है। उत्पादन की दृष्टि से भारत का विश्व में छठवाँ स्थान है। भारत में लौह अयस्क का उत्पादन बढ़ते जा रहा है जो कि निम्नांकित तालिका से स्पष्ट है।

2. अभ्रक

अभ्रक एक ऐसा महत्वपूर्ण खनिज है, जिसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सर्वोच्च स्थान है। इसकी उपयोगिता के मुख्य तीन कारण हैं

  1. इसमें स्वच्छता की मात्रा अधिक होती है।
  2. लचक और तड़क बहुत होती है।
  3. बिजली और गर्मी के लिए इसमें कुचालकता रहती है।

अभ्रक एक पारदर्शक एवं ताप, विद्युत व ध्वनि अवरोधक खनिज पदार्थ है। यह परतदार, हल्का व चमकदार पदार्थ होता है। अभ्रक काले, हरे, लाल व सफेद रंगों में कायान्तरित चट्टानों में पाया जाता है। इसका अधिकाधिक उपयोग विद्युत् उपकरणों, रंग-रोगन, चिकनाई के तेल, दवाइयाँ आदि बनाने में किया जाता है।

पूर्व में अभ्रक का कोई पूरक नहीं था, परन्तु अब प्लास्टिक एवं संश्लेषित अभ्रक जैसे पदार्थ बना लिये गये हैं, जिससे इसकी माँग में कमी आयी है।

उत्पादन - अभ्रक उत्पादन में भारत विश्व में अग्रणी देश है। यह विश्व व्यापार का लगभग 60 प्रतिशत अभ्रक उत्पन्न करता। यहाँ तीन प्रकार के अभ्रक मिलते हैं— मस्कोवाईट, फलोगोपाइट तथा बायोटाईट। भारत में अभ्रक के उत्पादन में कुछ वर्षों से ह्रास की प्रवृत्ति पायी जा रही है,

वितरण - आर्थिक दृष्टि से अभ्रक के निक्षेप की चार महत्वपूर्ण शृंखलाएँ झारखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश एवं राजस्थान हैं। इनमें से सबसे समृद्ध झारखंड एवं बिहार है, झारखंड एवं बिहार से भारत का लगभग 60% उच्च कोटि का अभ्रक निकाला जाता है।

यहाँ कोडरमा वन क्षेत्र में तथा गिरीडीह, सिंहभूमि, पलामू में अभ्रक की बड़ी खानें हैं। आंध्र प्रदेश में विशाखापट्टनम, कृष्णा, नेल्लोर में अभ्रक पायी जाती है। राजस्थान में जयपुर, उदयपुर, अलवर, भीलवाड़ा जिलों में भी अभ्रक का उत्पादन होता है।

3. बॉक्साइट

बॉक्साइट एक उपयोगी धातु है, जो ऐल्युमिनियम बनाने के काम में आती है। उत्तम किस्म के बॉक्साइट में 50 से 60% ऐल्युमिनियम ऑक्साइड प्राप्त होता है। बॉक्साइट का उपयोग मिट्टी का तेल साफ करने, चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने, रासायनिक द्रव तैयार करने आदि में होता है।

वितरण - देश में बॉक्साइट का अनुमानित भण्डार 295-30 करोड़ टन है। इसके महत्वपूर्ण निक्षेप आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, गोवा, गुजरात, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश में पाये जाते हैं।

उत्पादन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र झारखंड का राँची, पलामू, छत्तीसगढ़ के सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़, बस्तर, म.प्र. के बालाघाट, शहडोल, जबलपुर व मण्डला हैं। गुजरात के कैरा, कच्छ, सूरत, पोरबन्दर तथा महाराष्ट्र के थाना, रत्नागिरी, कोल्हापुर जिले हैं। बॉक्साइट उत्पादन में भारत ने तीव्र प्रगति की है।

उत्पादन - भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से बॉक्साइट उत्पादन में तीव्र प्रगति हुई है। सन् 1950-51 में 68 हजार मी टन बॉक्साइट उत्पादित किया गया, जिसका मूल्य 7.82 लाख रुपया था।

सन् 1990-91 में 49.84 लाख मी टन, सन् 199192 में 50.13 लाख मी टन तथा सन् 1993-94 में 54.50 लाख मी टन बॉक्साइट उत्पादित किया गया। सन् 1994-95 में भारत में 48.55 लाख मी टन, सन् 1999-2000 में 68.50 लाख मी टन तथा 200102 में 7,717 बॉक्साइट का उत्पादन किया गया था।

4. ताँबा

यह अलौह धातु है। ऐसा माना जाता है कि मनुष्य ने धातुओं में सबसे पहले ताँबे को ही जाना। प्राचीन काल में इसका अधिकाधिक उपयोग होता था। इसलिए उस युग का नाम ताम्र युग पड़ गया।

ताँबा बिजली का उत्तम चालक है। इस पर जंग नहीं लगता, इसमें लचीलापन होता है। यह टिकाऊ, सस्ता तथा किसी भी धातु के साथ आसानी से मिल जाने वाला खनिज है।

इन्हीं विशेषताओं के कारण प्राचीनकाल में इसका उपयोग बर्तन, औजार एवं सिक्के बनाने में होता था, परन्तु आधुनिक युग में इसका अधिकाधिक उपयोग विद्युत् उपकरणों में किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त ताँबे को अन्य धातुओं के साथ मिलाकर नवीन धातु के निर्माण में प्रयोग किया जाता है, जैसे- ताँबे को जस्ते के साथ मिलाकर पीतल; रांगा के साथ मिलाकर काँसा ऐल्युमिनियम के साथ मिलाकर डूराल्यूमिन निकिल के साथ मिलाकर मोनल काँसे के साथ मिलाकर निकिल सिल्वर सोने के साथ मिलाकर रोल्ड गोल्ड बनाते हैं।

वितरण - भारत में ताँबा निक्षेप का अभाव है। यहाँ अनुमानतः 103 करोड़ टन ताँबे का सुरक्षित भण्डार है, जिनसे धातु अंश लगभग 90-35 लाख टन प्राप्त हो सकता है।

देश का अधिकांश ताँबा सिंहभूमि झारखण्ड, बालाघाट मध्य प्रदेश, खेतड़ी, झुंझुनू, अलवर जिलों राजस्थान से प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त कुछ निक्षेप खम्मम नेल्लोर जिला आंध्रप्रदेश, चित्रदुर्ग हसन जिला कर्नाटक और सिक्किम में पाया जाता है।

भारत में सन् 1950-51 में 3-74 लाख मी टन ताम्र अयस्क उत्पादित किया गया, जिसका मूल्य 1-94 करोड़ रुपया था। सन् 1960-61 में यह उत्पादन बढ़कर 4-23 लाख मी टन मूल्य 2-29 करोड़ रुपया हो गया। सन् 1991 में देश में 51.07 लाख मी टन तथा 1999-2000 में 30.84 लाख मी टन ताम्र अयस्क उत्पादित किया गया हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – हमारे देश में ताँबे का उत्पादन माँग से कम होता है। यही कारण है कि हमारे देश को ताँबे की आपूर्ति के लिए विदेशों पर निर्भर रहना होता है। सन् 1950-51 में भारत ने 8.5 करोड़ रुपये मूल्य का ताम्र अयस्क विदेशों से आयात किया जाता था।

सन् 1984-85 में भारत का यह आयात मूल्य 90 करोड़ रुपया एवं 1992-93 में बढ़कर 500 करोड़ रु. हो गया। भारत को ताँबा निर्यात करने वाले देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान तथा कनाडा प्रमुख हैं। भारत से ताँबा का निर्यात मुख्य रूप से ब्राजील को किया जाता है।

5. सोना

प्राचीन काल से ही सोना एक आकर्षक धातु होने के साथ संपन्नता एवं गौरव का प्रतीक रहा है। इसका महत्व आभूषण बनाने, सम्पत्ति के रूप में संचित करने तथा मुद्रा बनाने के लिए होता रहा है।

आकर्षक एवं बहुमूल्य धातु होने के कारण मानव इसको प्राप्त करने के लिए सदा प्रयासरत रहा है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में उन्नति हुई तथा सभ्यता का विकास हुआ हैं।

सोना पीले रंग का चमकदार, ठोस, भारी, मुलायम एवं जंग न लगने वाली धातु है। यह आसानी से पिघलाया जा सकता है। शुद्ध सोना 24 कैरेट का होता है, जो मुलायम होता है। इसे कड़ा करने हेतु ताँबा, निकल, चाँदी, पीतल आदि धातुओं का मिश्रण किया जाता है।

वितरण - सोना आग्नेय चट्टानों से प्राप्त होता हैं। जिसे नदियों की जलोढ़ मिट्टी से प्राप्त किया जाता है। देश की कई नदियों के बालू में भी सोने के अंश पाये जाते हैं। हमारे देश में तीन महत्वपूर्ण स्वर्ण क्षेत्र हैं, प्रथम कर्नाटक के कोलार जिले का कोलार क्षेत्र जहा अधिक मात्र मे सोना पाया जाता था। द्वितीय रायचूर जिले का हट्टी स्वर्ण क्षेत्र एवं तृतीय अनन्तपुरम जिले का रामगिरी स्वर्ण क्षेत्र आदि।

उत्पादन – भारत में 67.9 टन स्वर्ण धातु के साथ स्वर्ण में खनिज का अनुमानित भंडार हैं। इसके उत्पादन में प्रारम्भ से उतार-चढ़ाव रहा है। हमारे देश में इसका उत्पादन माँग अनुसार बहुत कम है। अतः समय-समय पर सोना आयात किया जाता है।

6. चाँदी

चाँदी, सोने के ही समान मुलायम धातु है । यह शुद्ध रूप में नहीं मिलती, सामान्यतः यह जस्ता, ताँबा, सीसा व सोने आदि धातुओं के साथ पायी जाती है। इसका रंग सफेद चमकदार होता है। यह ठोस, भारी, कठोर व जंग न लगने वाली मूल्यवान खनिज धातु है।

चाँदी का उपयोग सोने से भी अधिक होता है। उपयोग में लाने के लिए इसमें ताँबा, जस्ता आदि धातुएँ मिलायी जाती हैं, जिससे यह कड़ी हो जाती है। इसका उपयोग औषधि बनाने में, चाँदी के वर्क बनाने में, भस्म बनाने में, फोटोग्राफी में, शल्य चिकित्सा में हड्डियों के बन्द बाँधने, सिर की कुचली हड्डियों की जगह लगाने में, आभूषण बनाने तथा मुद्रा के रूप में किया जाता है।

भारत में चाँदी की माँग अन्य देशों की अपेक्षा अधिक है, परन्तु भारत में चाँदी बहुत कम मात्रा में मिलती है। अतः आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु चाँदी विदेशों से आयात की जाती है। कर्नाटक में कोलार स्वर्ण क्षेत्र तथा झारखंड में सिंहभूमि क्षेत्र से चाँदी प्राप्त की जाती है।

इसके अतिरिक्त राजस्थान के उदयपुर जवार खानों तथा भीलवाड़ा जिले के अंगुचारामपुरा की खानों से भी चाँदी प्राप्त की जाती है।

7. नमक

भारत में नमक प्राप्ति के मुख्य तीन स्रोत हैं - समुद्री जल, खारी झील, नमक की शैलें। यह मुख्यतः खाने के उपयोग में आता है। इसके अतिरिक्त रंग, कलई, काँच, प्लास्टिक, स्टार्च आदि उद्योगों में इसका उपयोग किया जाता है।

समुद्र तटीय राज्यों के कच्छ, काठियावाड़, सूरत, गोवा, तूतीकोरिन, कटक, पुरी, सुन्दरवन क्षेत्र में समुद्री जल से नमक प्राप्त किया जाता है।

सांभर, फलौदी, डिंडवाना झीलों एवं जलाशयों से भी नमक प्राप्त किया जाता है। इसी प्रकार चट्टानों से भी नमक प्राप्त किया जाता है। चट्टानों से प्राप्त होने वाले नमक को सेंधा नमक कहते हैं। यह हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिले एवं दारंग क्षेत्र से प्राप्त होता है। नमक का रासायनिक नाम 'सोडियम क्लोराइड’ है। भारत से प्रतिवर्ष विदेशों में नमक का निर्यात किया जाता है।

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