कृषि के प्रकार - farming system in hindi

कृषि मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल से की जा रही है। भूमि को जोतना, बीज बोकर फसल उत्पन्न करना करना तथा पशुपालन करना कृषि कहलाता है।

कृषि के प्रकार

भारत एक विशाल देश है। यहाँ की जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति आदि में पर्याप्त विभिन्नता है, यहाँ अनेक प्रकार की कृषि की जाती है। पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए निम्नांकित प्रकारों का वर्णन किया जा रहा है।

  1. जीविकोपार्जन कृषि
  2. व्यापारिक कृषि
  3. शुष्क कृषि
  4. आर्द्र कृषि

कृषि के प्रकार - farming system in hindi

1. जीविकोपार्जन कृषि

इस प्रकार की कृषि कृषक द्वारा अपने व परिवार के जीविकोपार्जन के लिए किया जाता है। संपूर्ण कृषि उत्पाद परिवार की आवश्यकता की पूर्ति में ही खप जाता है। 

इस कृषि का मुख्य उद्देश्य भूमि के उत्पादन से अधिक जनसंख्या का भरण पोषण करना है। स्थानांतरित कृषि, स्थानबद्ध कृषि एवं गहन कृषि इसके अन्तर्गत आता है।

विशेषताएँ

  1. खेत प्रायः छोटे आकार के होते हैं।
  2. कृषि कार्य हेतु छोटे औजारों का प्रयोग होता है। 
  3. अधिकतम उत्पादन लेने का प्रयास किया जाता है।
  4. अधिकांश उपजाऊ भूमि में कृषि की जाती है। 
  5. खाद्यान्न फसलों की प्रधानता होती है।

भारत के अधिकांश क्षेत्रों में परंपरागत ढंग से जीवन निर्वाह मूलक कृषि की जाती है। कृषि पर लगभग 70% जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से निर्भर है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से इस प्रकार के कृषि की प्रधानता है।

2. व्यापारिक कृषि

व्यापार के उद्देश्य से की जाने वाली कृषि को व्यापारिक कृषि कहते हैं । इसे मुद्रादायनि कृषि भी कहते हैं। इसमें विशेष रूप से नगदी फसलें उगायी जाती हैं। फसलों का उत्पादन निर्यात के लिए किया जाता है।

विशेषताएँ 

  1. यह कृषि की आधुनिकतम पद्धति है।
  2. कृषि उत्पादन बड़े पैमाने पर व्यापार के उद्देश्य से किया जाता है।
  3. आधुनिक कृषि पद्धति का उपयोग होता है।
  4. सभी प्रकार के उत्तम खाद, उर्वरक एवं दवाईयाँ, मशीनों आदि का प्रयोग किया जाता है। 
  5. खेतों का आकार बड़ा होता है ।
  6. रोपण, बागाती खेती, ट्रक फॉर्मिंग, डेयरी फॉर्मिंग आदि व्यापारिक कृषि के अन्तर्गत आते हैं। 

भारत में मुख्यत: चाय, कहवा, कपास, जूट, गन्ना, रबर विभिन्न प्रकार के मसालों एवं फल, मूँगफली, सरसों, सोयाबीन आदि की कृषि व्यापारिक कृषि की श्रेणी से आती है। 

यहाँ पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम, केरल, तमिलनाडु आदि राज्यों में व्यापारिक कृषि की प्रधानता है।

 3. शुष्क कृषि

यह वर्षा जल पर निर्भर खेती है इसीलिए इसे बारानी या वर्षाधीन खेती  कहते हैं। बारानी खेती का प्रतिशत खेती योग्य कुल कृषि भूमि का लगभग 70 प्रतिशत है। देश में फसल वाले कुल क्षेत्र 14 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर हैं। 

इसमें से 10 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बारानी खेती के अन्तर्गत आता है। इन क्षेत्रों से पोषक तत्वों वाली दालें, तिलहन तथा औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण फसल कपास और मूँगफली की फसलें एवं ज्वार, बाजरा, मक्का जैसी अनाज की फसलों का एक बड़ा भाग प्राप्त होता है। 

बारानी वर्षाधीन खेती वाले इलाकों के विकास हेतु शासन ने आठवीं योजना में 'राष्ट्रीय। पनधारा विकास कार्यक्रम' लागू किया है। पनधारा क्षेत्र वह भौगोलिक क्षेत्र है जिससे होकर पानी एक खास स्थान पर एकत्रित होता है। 

कृषि उपज वृद्धि के लिए नमी आवश्यक है। नमी का प्रमुख स्रोत वर्षा है। भारत में जहाँ 30 सेमी से 75 सेमी वार्षिक वर्षा होती है, वहाँ नमी का अभाव बना रहता है। 

ये दक्षिण हरियाणा, पूर्वी राजस्थान, गुजरात व पश्चिमी घाट के वृष्टि प्रदेश हैं, जो सूखाग्रस्त क्षेत्र कहलाते हैं। ये ही अर्ध शुष्क प्रदेश हैं जहाँ 30 सेमी से भी कम वर्षा होती है, वहाँ सिंचाई के बिना कृषि नहीं की जा सकती।

शुष्क प्रदेशों में कृषि हेतु शुष्क कृषि तकनीक को अपनाया जाता है जैसे

  1. वर्षा जल को संचित रखने का प्रयास करना।
  2. खेतों को वर्षा होने से पूर्व जोतना।
  3. ऐसे बीजों का उपयोग करना जिनका उत्पादन अधिक होता हैं।
  4. सिंचाई सुविधाएँ जुटाना आदि।

4. आर्द्र कृषि

100 सेमी से 200 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में, जहाँ नमी वर्ष के अधिकांश दिनों तक बनी रहती है, आर्द्र खेती की जाती है। इसमें वर्ष में दो बार फसलें ली जाती हैं। कहीं-कहीं और कभी-कभी  तीसरी जायद फसलें भी ली जाती हैं।

मध्य प्रदेश, गंगा के मध्यवर्ती मैदान, पूर्वी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मेघालय का पूर्वी भाग, गोदावरी का डेल्टा वाला भाग, उत्तर पूर्वी राजस्थान ऐसे ही क्षेत्र हैं। 

जहाँ 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा होती है एवं साल भर नमी बनी रहती है, ऐसे क्षेत्रों में नम तर कृषि अपनायी जाती है जिसमें वर्ष भर फसलें ली जाती हैं। 

यहाँ ऐसे बीजों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें अधिक जल की आवश्यकता हो या जो अधिक जल में भी समुचित उत्पादन देते हैं। जैसे- गन्ना, धान, जूट आदि।

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