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कृषि के प्रकार - farming system in hindi

कृषि मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल से की जा रही है। भूमि को जोतना, बीज बोकर फसल उत्पन्न करना करना तथा पशुपालन करना कृषि कहलाता है।

कृषि के प्रकार 

भारत एक विशाल देश है। यहाँ की जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति आदि में पर्याप्त विभिन्नता है, यहाँ अनेक प्रकार की कृषि की जाती है। पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए निम्नांकित प्रकारों का वर्णन किया जा रहा है।

कृषि के प्रकार - farming system in hindi

1. निर्वहन या जीविकोपार्जन कृषि – इस प्रकार की कृषि कृषक द्वारा अपने व परिवार के जीविकोपार्जन के लिए किया जाता है। संपूर्ण कृषि उत्पाद परिवार की आवश्यकता की पूर्ति में ही खप जाता है। 

इस कृषि का मुख्य उद्देश्य भूमि के उत्पादन से अधिक जनसंख्या का भरण पोषण करना है। स्थानांतरित कृषि, स्थानबद्ध कृषि एवं गहन कृषि इसके अन्तर्गत आता है।

विशेषताएँ

1. खेत प्रायः छोटे आकार के होते हैं।

2. कृषि कार्य हेतु साधारणत: छोटे औजारों का प्रयोग होता है। मानव श्रम एक पशुबल को अधिक महत्व दिया जाता है।

3. अधिकतम उत्पादन लेने का प्रयास किया जाता है। वर्ष में एक, दो या तीन फसल ली जाती है।

4. अधिकांश उपजाऊ भूमि में कृषि की जाती है, अतः चारागाहों का अभाव हो जाता है। 

5. खाद्यान्न फसलों की प्रधानता होती है ।

भारत के अधिकांश क्षेत्रों में परंपरागत ढंग से जीवन निर्वाह मूलक कृषि की जाती है। कृषि पर लगभग 70% जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से निर्भर है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से इस प्रकार के कृषि की प्रधानता है।

2. व्यापारिक कृषि - व्यापार के उद्देश्य से की जाने वाली कृषि को व्यापारिक कृषि कहते हैं । इसे मुद्रादायनि कृषि भी कहते हैं। इसमें विशेष रूप से नगदी फसलें उगायी जाती हैं। फसलों का उत्पादन निर्यात के लिए किया जाता है।

विशेषताएँ - 

1. यह कृषि की आधुनिकतम पद्धति है।

2. कृषि उत्पादन बड़े पैमाने पर व्यापार के उद्देश्य से किया जाता है।

3. आधुनिक कृषि पद्धति का उपयोग होता है।

4. सभी प्रकार के उत्तम खाद, उर्वरक एवं दवाईयाँ, मशीनों आदि का प्रयोग किया जाता है। 

5. खेतों का आकार बड़ा होता है ।

6. रोपण, बागाती खेती, ट्रक फॉर्मिंग, डेयरी फॉर्मिंग आदि व्यापारिक कृषि के अन्तर्गत आते हैं। 

भारत में मुख्यत: चाय, कहवा, कपास, जूट, गन्ना, रबर विभिन्न प्रकार के मसालों एवं फल, मूँगफली, सरसों, सोयाबीन आदि की कृषि व्यापारिक कृषि की श्रेणी से आती है। 

यहाँ पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम, केरल, तमिलनाडु आदि राज्यों में व्यापारिक कृषि की प्रधानता है।

 3. शुष्क कृषि - यह वर्षा जल पर निर्भर खेती है इसीलिए इसे बारानी या वर्षाधीन खेती  कहते हैं। बारानी खेती का प्रतिशत खेती योग्य कुल कृषि भूमि का लगभग 70 प्रतिशत है। देश में फसल वाले कुल क्षेत्र 14 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर हैं। 

इसमें से 10 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बारानी खेती के अन्तर्गत आता है। इन क्षेत्रों से पोषक तत्वों वाली दालें, तिलहन तथा औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण फसल कपास और मूँगफली की फसलें एवं ज्वार, बाजरा, मक्का जैसी अनाज की फसलों का एक बड़ा भाग प्राप्त होता है। 

बारानी वर्षाधीन खेती वाले इलाकों के विकास हेतु शासन ने आठवीं योजना में 'राष्ट्रीय । पनधारा विकास कार्यक्रम' लागू किया है। पनधारा क्षेत्र वह भौगोलिक क्षेत्र है जिससे होकर पानी एक खास स्थान पर एकत्रित होता है। 

कृषि उपज वृद्धि के लिए नमी आवश्यक है। नमी का प्रमुख स्रोत वर्षा है। भारत में जहाँ 30 सेमी से 75 सेमी वार्षिक वर्षा होती है, वहाँ नमी का अभाव बना रहता है। 

ये दक्षिण हरियाणा, पूर्वी राजस्थान, गुजरात व पश्चिमी घाट के वृष्टि प्रदेश हैं, जो सूखाग्रस्त क्षेत्र कहलाते हैं । ये ही अर्ध शुष्क प्रदेश हैं जहाँ 30 सेमी से भी कम वर्षा होती है, वहाँ सिंचाई के बिना कृषि नहीं की जा सकती।

शुष्क प्रदेशों में कृषि हेतु शुष्क कृषि तकनीक को अपनाया जाता है जैसे

(i) वर्षा जल को संचित रखने का प्रयास करना ।

(ii) खेतों को वर्षा होने से पूर्व जोतना ।

 (iii) ऐसे बीजों का उपयोग करना जिनका उत्पादन कम जल में हो सके और उत्पादन भी अधिक दे सके। जैसे— गेहूँ, ज्वार, बाजरा, दाल, तिलहन आदि 

(iv) सिंचाई सुविधाएँ जुटाना आदि ।

4. आर्द्र कृषि  - 100 सेमी से 200 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में, जहाँ नमी वर्ष के अधिकांश दिनों तक बनी रहती है, आर्द्र खेती की जाती है। इसमें वर्ष में दो बार फसलें ली जाती हैं। कहीं-कहीं और कभी-कभी  तीसरी जायद फसलें भी ली जाती हैं। 

मध्य प्रदेश, गंगा के मध्यवर्ती मैदान, पूर्वी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मेघालय का पूर्वी भाग, गोदावरी का डेल्टा वाला भाग, उत्तर पूर्वी राजस्थान ऐसे ही क्षेत्र हैं। 

जहाँ 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा होती है एवं साल भर नमी बनी रहती है, ऐसे क्षेत्रों में नम तर कृषि अपनायी जाती है जिसमें वर्ष भर फसलें ली जाती हैं। 

यहाँ ऐसे बीजों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें अधिक जल की आवश्यकता हो या जो अधिक जल में भी समुचित उत्पादन देते हैं। जैसे- गन्ना, धान, जूट आदि ।

फसल चक्र

सहस्रों वर्षों के अनुभव से भारतीय किसानों ने जान लिया कि एक खेत पर निरन्तर बिना विश्राम के फसल लेते रहे तो मृदा का उपजाऊपन कम हो जाता है। किसानों ने अपने अनुभवों द्वारा खेत की मृदा के उपजाऊपन को बनाये रखने हेतु खेत को एक मौसम या एक वर्ष के लिए परती छोड़ दिये जाने की संवर्धनीय विधि विकसित कर ली है। 

प्राकृतिक क्रिया द्वारा मृदा उर्वरता स्वतः बढ़ जाती है और उस भूमि पर पुनः कृषि कर अधिक उत्पादन किया जा सकता है।

भारत में जनाधिक्य का दबाव कृषि भूमि पर अधिक है। अतः अधिक भूमि को परती  छोड़ा जाना सम्भव नहीं है। किसानों ने अनुभव से पता लगा लिया कि मृदा के उपजाऊपन को बनाये रखने के लिए खेत पर एक ही फसल बारबार न ली जाये, बल्कि खाद्यान्न फसल के बाद उसी खेत में कोई भी फली वाली फसल उपजायी जाये जिससे मृदा के उपजाऊपन को बनाये रखा जा सकता है। 

फलियाँ वायुमण्डल से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती रहती हैं एवं मृदा के पोषक तत्वों को वापस कर देती हैं, विशेषकर नाइट्रोजन को। दालों व तिलहन के पौधों में यह विशेषता पायी जाती है। इसलिये उसी खेत पर खाद्यान्नों के बाद तिलहन या दाल उत्पन्न करने का क्रम चलता रहता है। 

इसे शस्यावर्तन या फसल चक्र या फसलों का आवर्तन कहते हैं, इस तरह की युक्तियाँ या तकनीकों से कृषि उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।  

मिश्रित फसल

मृदा के उपजाऊपन के ह्रास ने तथा मानसूनी वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता से कृषि उत्पादन की अनिश्चितता ने किसानों को ऐसी तकनीक विकसित करने के लिए प्रेरित किया, जिससे मृदा का उपजाऊपन बना रहे तथा कृषि उत्पादन का जोखिम कम हो । 

किसानों ने मिश्रित शस्य अथवा फसलों का साहचर्य की तकनीक विकसित की, इसमें एक ही शस्य अवधि में एक ही खेत में दो (दोहरी फसलें,  या दो से अधिक फसलें (बहु-फसलें,) बोई जाती हैं। बोने के समय यह ध्यान रखना होता है कि

(i) जो फसलें एक साथ बोई जा रही हैं, उनका वर्धनकाल अलग-अलग हो ।

(ii) एक पर्याप्त जल की आवश्यकता वाली फसल हो, तो दूसरी कम जल की आवश्यकता वाली फसल हो ।

(iii) एक खाद्य फसल हो तो दूसरी-तीसरी दलहन, तिलहन वाली फसल हो ।

इस तरह से की गयी खेती में फसलें एक साथ बोई जाती हैं, परन्तु अलग-अलग समय में काटी जाती हैं। उसी प्रकार वर्षा कम हो या पर्याप्त दोनों ही स्थिति में कोई न कोई फसल अच्छी ही होती है, जिससे किसानों को आर्थिक हानि होने का खतरा कम होता है। मिश्रित शस्य (Mixed Cropping) संयोजन में कई प्रकार की फसलों का तालमेल होता है, जो मृदा, मौसम, परम्परा, स्थानीय दशाओं, आर्थिक कारणों एवं गृहस्थी की आवश्यकताओं पर आधारित होता है। 

जैसे- गेहूँ + चना + सरसों एक ही मौसम की फसलें हैं। इसी प्रकार गेहूँ + जौ बोया जाता है । इस मिश्रण को गोजई कहते हैं। चना और जौ के मिश्रण को बेझड़ तथा गेहूँ व चना के मिश्रण को गोचनी कहते हैं ।

गहन कृषि

जनसंख्या की वृद्धि तथा कृषि योग्य भूमि की सीमित उपलब्धता के कारण खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाने हेतु अनेक विधियाँ अपनायी जा रही हैं। गहन कृषि उनमें से एक है। इसके अन्तर्गत एक कृषि वर्ष में ही उपलब्ध भूमि पर सभी मौसम की फसलें ली जाती हैं। जैसे- एक कृषक के पास 10 हेक्टेयर कृषि भूमि है, 

जिस पर खरीफ मौसम में पूरे 10 हेक्टेयर भूमि पर फसल लेता है तथा रबी के मौसम में पुन: 6 हेक्टेयर भूमि पर फसल लेता है, इस प्रकार वह 10 + 6 = 16 हेक्टेयर भूमि पर फसल प्राप्त करता है, जबकि उसके पास वास्तविक कृषि भूमि 10 हेक्टेयर ही थी। इसे ही गहन कृषि या शस्य गहनता कहते हैं।

शस्य गहनता सूचक  - कृषक ने अपनी 10 हेक्टेयर भूमि में केवल खरीफ फसल ली (बोयी) होती, तो शस्य गहनता सूचकांक 100 प्रतिशत होता । परन्तु उपर्युक्त उदारहण से शस्य गहनता सूचकांक 160 प्रतिशत होगा, क्योंकि उसने 10 हेक्टेयर में खरीफ एवं 6 हेक्टेयर में रबी फसल ली। 

इस प्रकार उसने 10 + 6 16 हेक्टेयर भूमि का उपयोग कृषि उत्पादन में किया । अतः शस्य गहनता सूचकांक भूमि उपयोग को प्रदर्शित करता है तथा भूमि की प्रति इकाई उत्पादकता को भी इंगित करता है। 

शस्य गहनता के लिए जल की उपलब्धता अनिवार्य है। चाहे वह वर्षा द्वारा उपलब्ध हो या सिंचाई द्वारा । यदि जल उपलब्ध नहीं है तो शस्य गहन फसल लिया जाना सम्भव नहीं है। इसी कारण सम्पूर्ण देश का शस्य गहनता सूचक मात्र 130% ही है, जबकि जहाँ जल की उपलब्धता है, वहाँ अपवाद को छोड़कर इसका प्रतिशत अधिक है । 

जैसे—सन् 1989-90 के अनुसार पंजाब में 176% एवं हरियाणा में 167% दर्ज किया गया था। शस्य गहनता का जल की उपलब्धता से घनिष्ठ सम्बन्ध है। 

शस्य गहनता पर उर्वरकों, उन्नत बीजों, यंत्रों, कीटनाशकों व नवीन तकनीकों का भी प्रभाव पड़ता है। शस्य गहनता सूचकांक पंजाब में सर्वाधिक है, जबकि आन्ध्रप्रदेश - असम में मात्र 117% तथा गुजरात में 110% है। 

सन् 1989-90 में पंजाब में उर्वरक का प्रयोग 168-4 किग्रा. प्रति हेक्टेयर है, जबकि गुजरात में यह केवल 75 किग्रा. प्रति हेक्टेयर है। इसी प्रकार ट्रैक्टरों का प्रयोग पंजाब में प्रति हजार हेक्टेयर पर 147 है, जबकि गुजरात में मात्र 26 है। 

पंजाब में पम्पसेटों की संख्या प्रति हजार हेक्टेयर पर 92 है, जबकि गुजरात में केवल 52 है। पंजाब का 94 प्रतिशत भाग सिंचित है, जबकि गुजरात का केवल 28 प्रतिशत भाग ही सिंचित है। 

पंजाब में गुजरात की अपेक्षा प्रति इकाई क्षेत्र पर निवेश उपयोग की तीव्रता बहुत अधिक है इसलिए पंजाब में शस्य गहनता सूचकांक गुजरात की तुलना में ऊँचा है ।

कृषि में नवीन प्रवृत्तियाँ

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय कृषि की दशा सोचनीय थी, अत: पंचवर्षीय योजनाओं तथा कृषि नीति के माध्यम से अनेक कदम उठाए गये इससे भारतीय कृषि में नवीन प्रवृत्तियों का जन्म हुआ

1. जमींदारी प्रथा का उन्मूलन - स्वतंत्रता के पूर्व अधिकांश कृषि भूमि पर जमींदारों का आधिपत्य था और कृषकों की स्थिति बन्धुआ मजदूरों जैसे थी। 

कृषि का सम्पूर्ण लाभ जमींदारों को प्राप्त होता था स्वतंत्रता के पश्चात् इस शोषण रूपी व्यवस्था को कानून बनाकर समाप्त कर दिया गया।

2. भूमि की अधिकतम सीमा का निर्धारण - स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि विकास के प्रयासों के अन्तर्गत शासन ने सर्वप्रथम सम्पत्ति सीमा कानून बनाकर कृषि भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारित कर दी। जिसके घेरे में अनेक जमींदार, जागीरदार व बड़े असरदार लोग आ गये। उनके पास की बची जमीनें शासन ने भूमिहीन कृषकों को बाँट दीं। 

इसी प्रकार के अनेक भूमि सुधार कानून किसानों को भू-स्वामित्व सौंपने के सम्बन्ध में बनाये गये। इन भूमि सुधार कानूनों के क्रियान्वयन के फलस्वरूप भारतीय कृषकों के जीवन स्तर में सुधार हुआ एवं उत्पादन में वृद्धि हुई ।

3. पंचवर्षीय योजनाओं को लागू करना - पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत अनेक कार्यक्रमों को लागू किया गया -

(i) बहुउद्देशीय योजना- वर्षा की अनियमितता एवं अनिश्चितता के कारण कृषि विकास में बाधा को देखते हुए कृषि में जल को एक आधारभूत तत्व मानकर सिंचाई विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत बहुउद्देशीय योजनाओं को अपनाया गया जिससे सिंचाई विभव लगभग 828 लाख हेक्टेयर हो गया। 

जबकि इस योजना के पूर्व (अर्थात् सन् 1951 के पूर्व) कुल सिंचाई विभव 226 लाख हेक्टेयर था। इस योजना से सिंचाई के अलावा विद्युत् उत्पादन भी किया जा रहा है।

(ii) सामुदायिक विकास कार्यक्रम - कृषि विकास हेतु सन् 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम लागू किया गया । परन्तु इससे उत्साहवर्धक परिणाम सामने नहीं आये। फिर भी इसने पिछड़ी हुई कृषि का आभास करवा कर कमियों को उजागर किया ।

(iii) IADP कार्यक्रम - सन् 1961 में इन्टेंसिव एग्रीकल्चरल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम (IADP) को कुछ जिलों में प्रदर्शन के रूप में लागू किया गया। बाद में इस कार्यक्रम को नयी युक्ति के साथ इन्टेंसिव एग्रीकल्चरल एरिया प्रोग्राम (IAAP) के नाम से शुरू किया गया। इसमें मध्यम एवं लघु सिंचाई साधनों तथा उर्वरकों के उपयोग को शामिल किया गया ।

(iv) हरित क्रान्ति कार्यक्रम - सन् 1967-68 में जल, उर्वरक एवं बीज पर आधारित पैकेज टेक्नोलॉजी या ग्रीन रिवोल्यूशन टेक्नोलॉजी (हरित क्रान्ति) नाम के कार्यक्रम को शुरू किया गया। इस कार्यक्रम का वास्तविक नाम ‘हाई ईल्डिंग वेरायटी प्रोग्राम' (HYVP) है। 

इससे खाद्यान्न फसलों गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा में ही सफलता मिली। दालों के उत्पादन में नहीं। यह पंजाब, हरियाणा में अधिक सफल हुई।

4. चकबंदी प्रथा – स्वतंत्रता पूर्व किसानों की अधिकांश कृषि भूमि बिखरी हुई थी, जिससे भूमि की सही देख-भाल नहीं हो पाती थी, व्यय अधिक होता था और सिंचाई सुविधाओं की व्यवस्था नहीं हो पाती थी।

अधिकांश भूमि मेड़ बनाने में नष्ट हो जाती थी। सरकार ने इन समस्याओं को दूर करने के लिए खेत (भूमि) की चकबंदी प्रथा लागू की। इससे किसानों के बिखरे व छोटे-छोटे खेत एक ही स्थान पर उपलब्ध हो गये।

5. अनुसंधान निगमों की स्थापना - इसके अन्तर्गत नई सार्वजनिक संस्थाओं का निर्माण जैसे- 'राष्ट्रीय बीज निगम’ ‘कृषि उद्योग निगम', 'राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम', 'कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम' आदि उल्लेखनीय हैं। 

इसके अतिरिक्त 'कृषि मूल्य आयोग' की स्थापना की गयी जो सरकार को समय-समय पर कृषि पदार्थों के लिए उचित कीमत सम्बन्धी नीतियों को सलाह देता है। 

6. अन्य सुविधाओं का प्रसार - शासन ने कृषि के लिए नए-नए, यन्त्रों बीजों एवं नवीन तकनीकी विधियों खोज हेतु कृषि अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना की। 

किसानों को कृषि के लिए समय-समय पर ऋण उपलब्ध कराने के लिए गाँव-गाँव में बैंकों की शाखाएँ खोली गयीं, कृषि उत्पादों को मण्डी तक पहुँचाने तथा नगरों से कृषि औजारों, उर्वरक, बीज आदि लाने हेतु गाँवों को नगरों से सड़कों द्वारा जोड़ा गया, बिजली, पानी आदि सुविधाएँ पहुँचायी गईं। 

महत्वपूर्ण फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रतिवर्ष निर्धारण, सहकारी समितियों की स्थापना, फसल बीमा योजना लागू करना आदि कदम उठाये गये जिससे कृषि के स्तर में आशाजनक सुधार हुआ तथा उत्पादन में वृद्धि हुई ।

उपर्युक्त प्रयासों के कारण वर्ष 1989 में आहार सामग्री की कुल उपलब्धता 495 ग्राम प्रति व्यक्ति के स्तर तक पहुँच गयी जो सन् 1950 के दशक में 395 ग्राम प्रति व्यक्ति थी । सन् 1991 में एक अन्तिम अनुभाग के अनुसार अनाज की प्रति व्यक्ति दैनिक उपलब्धि 511 ग्राम हो गई। 

इसका श्रेय खाद्यान्नों के उत्पादन में हुई प्रगति को जाता है। सन् 1949-50 में खाद्यान्न उत्पादन 5 करोड़ 49 लाख 20 हजार टन था जो सन् 1990-91 में बढ़कर 17 करोड़ 62 लाख 30 हजार टन हो गया ।

हरित क्रान्ति

भारत में नई कृषि नीति के परिणामस्वरूप सन् 1967-68 में का शुभारम्भ हुआ। इसका होने हेतु प्रदर्शन प्रभाव की युक्ति को अपनाते हुए कुछ चुने हुए कृषि क्षेत्रों में जल एवं उर्वरकों की सहायता से अधिक उपज देने वाले बीज की किस्मों का उपयोग कर खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि करना है। 

इस प्रौद्योगिकी में कुछ चुने हुए कृषि क्षेत्रों में अच्छे, विकसित, अधिक उपज देने वाले बीजों तथा पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग सिंचाई की सहायता से किया गया, फलस्वरूप खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ गया । 

इसे देखकर अन्य क्षेत्रों में इस युक्ति को अपनाया जिससे खाद्यान्न उत्पादन में एकाएक क्रान्ति आ गई फलस्वरूप एक पैकेज टेक्नोलॉजी को 'हरित क्रान्ति' का नाम मिल गया। 

इस युक्ति का प्रभाव पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं आंध्र प्रदेश में अधिक पड़ा तथा गेहूँ, धान (चावल) के उत्पादन में आशाजनक वृद्धि भी हुई। इससे खाद्यान्नों में जो सफलता मिली वह दालों, तिलहनों में नहीं देखी गयी ।

अधिक उपजाऊ किस्म कार्यक्रम (HYVP उद्देश्य खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर दुष्प्रभाव

इसका मुख्य कारण हरित क्रान्ति केवल 'अधिक उपजाऊ किस्म'  के बीजों, विशेषकर गेहूँ, मक्का एवं ज्वार, चावल आदि तक ही सीमित थी। इसे जौ, रागी एवं अन्य निकृष्ट अनाजों पर लागू नहीं किया गया। 

हरित क्रान्ति के कारण ग्रामीण क्षेत्र में लोगों की आय के स्तर में वृद्धि हुई है। लेकिन हरित क्रान्ति के दो दुष्प्रभाव भी हुए हैं-(i) हरित क्रान्ति से गाँवों में व्यक्तिगत असमानता को बढ़ावा मिला है, तथा (ii) हरित क्रान्ति द्वारा क्षेत्रीय असमानताओं में वृद्धि हुई है।

हरित क्रान्ति की प्रभावशीलता - हरित क्रान्ति से किसान जड़ता के भँवर से बाहर निकल आया है। दूसरी बात है कि हरित क्रान्ति के परिवर्तनों से सभी किसान (विशेषकर छोटे किसान) समान मात्रा में लाभ प्राप्त नहीं कर सके हैं, लेकिन जिन किसानों को इस क्रान्ति से लाभ प्राप्त नहीं हो सका।,

वे भी इसकी बुराई नहीं करते हैं बल्कि अवसर मिलने पर इसे अपनाने को तैयार रहते हैं। इसी से हरित क्रान्ति की प्रभावशीलता एवं महत्व का आभास होता है। 

हरित क्रान्ति के उद्देश्य - (i) अल्प काल में कृषि उत्पादन में सुधार तथा (ii) एक लम्बी अवधि तक ऊँचे कृषि उत्पादन के स्तर के बने रहने, के बल पर भारतीय कृषि की स्थिर चली आ रही दशा में निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर हुए हैं

(अ) कृषि उत्पादन में वृद्धि, (ब) कृषि उत्पादकता में अथवा प्रति हेक्टेयर औसत उपज में वृद्धि। 

भारतीय कृषि की समस्याएँ

भारत कृषि प्रधान देश है जहाँ लगभग 70% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, परन्तु कृषि की दशा संतोषजनक नहीं है। जनसंख्या की अनियन्त्रित वृद्धि ने कृषि को बुरी तरह प्रभावित किया है। 

यद्यपि स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि विकास के लिए अनेक कार्य हुए हैं इसके बावजूद भारतीय कृषि की अनेक समस्याएँ हैं, जो निम्नलिखित हैं-

1. प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता कम होना – भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है फलस्वरूप प्रति व्यक्ति | उपलब्ध भूमि का औसत निरन्तर कम होता जा रहा है। 1951 में औसत 0-75 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति था, 1961 में 0-30, 1971 में 0:29 और 1985 में 0-15 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति हो गया। 

विश्व का यह औसत 4-5 प्रति व्यक्ति है। इस दृष्टिकोण से भारत में प्रति व्यक्ति भूमि की औसत उपलब्धता अत्यन्त कम है।

2. कृषि भूमि का असन्तुलित वितरण - भारत में कृषि भूमि का वितरण असमान है, खेतों के छोटे आकार व बिखरे होने के कारण आधुनिक विधि से कृषि करना एक समस्या मूलक है। 

स्वतंत्रता के पश्चात् भूमि सुधार तथा चकबन्दी कार्यक्रम चलाये जाने के बाद भी 1% धनी किसानों (जमीदारों) के पास कुल भूमि का 20% है। 

देश में 10% किसानों के पास समस्त कृषि भूमि का 50% है और देश के 89% किसानों के पास कुल भूमि का मात्र 30% है। इस प्रकार एक किसान के पास औसतन 0-1 हेक्टेयर भूमि है और यह भूमि भी अनेक छोटे-छोटे खेतों में बँटी हुई है।

3. फसलों की न्यून उत्पादकता - भारतीय कृषि की मुख्य समस्या फसलों की न्यून उत्पादकता है। देश में फसलों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन विश्व के कई देशों से कम है जैसा कि नीचे लिखे तथ्यों से स्पष्ट है

गेहूँ— भारत में गेहूँ की प्रति हेक्टेयर औसत उपज 18-7 क्विंटल है, जबकि डेनमार्क तथा नीदरलैण्ड में • यी औसत क्रमश: 41.6 तथा 40.4 क्विंटल है। 

चावल – देश में चावल की प्रति हेक्टेयर औसत उपज 18-7 क्विंटल है जबकि संयुक्त अरब गणराज्य में 53-3 व जापान में 61.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह विश्व का औसत 20 क्विंटल है।

कपास - कपास की प्रति हेक्टेयर उपज भारत में मात्र 1.9 क्विंटल है, जो कि सोवियत रूस के 8-4 तथा संयुक्त अरब गणराज्य के 7-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से काफी कम है। विश्व का औसत 3-4 क्विंटल है।

मूँगफली - भारत में मूँगफली की प्रति हेक्टेयर उपज मात्र 9-4 क्विंटल है, जो कि अमेरिका के 28-7 तथा जापान के 17.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बहुत कम है।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि देश में विभिन्न फसलों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम है । उत्पादकता में कमी का मुख्य कारण कृषि का पुराना ढंग, अशिक्षा, घटिया बीजों का प्रयोग, सिंचाई की सुविधा न होना इत्यादि है।

4. वर्षा की अनिश्चितता– वर्षा की अनिश्चितता मूलतः प्रकृतिजन्य समस्या है। भारतीय कृषि विशेषकर खरीफ फसलें मानसूनी वर्षा पर निर्भर हैं। मानसून के आने तथा लौटने में अनिश्चितता रहती है। 

कभी-कभी मानसून काल के बीच में लम्बा अवर्षण काल भी आ जाता है। इससे कृषि फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता है। रबी की फसल पर मौसमी दशाओं का बहुत प्रभाव पड़ता है। शीतकालीन वर्षा समय पर होने से गेहूँ की फसल अच्छी रहती है। 

जिस वर्ष यह वर्षा नहीं होती उस वर्ष रबी की फसल प्रभावित होती है। वर्षा की अनिश्चितता के कारण भारतीय कृषि को 'मानसून का जुआ' कहा जाता है।

5. सिंचाई के साधनों की अपर्याप्तता - भारतीय कृषि मुख्यतः मानसून पर आश्रित है। जब कभी मानसूनी वर्षा नहीं हो पाती तब देश के अधिकांश क्षेत्रों में सूखे की स्थिति निर्मित हो जाती है- जहाँ कहीं सिंचाई की सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती हैं, वहीं फसलों का उत्पादन होता है। 

देश की कुल कृषि भूमि के मात्र 44-83 प्रतिशत भाग में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। शेष 55.17 प्रतिशत भाग आज भी मानसून की पर निर्भर है। इस प्रकार भारत में सिंचाई के साधनों की कमी है। 

6. जोत का छोटा आकार - भारतीय कृषि के समक्ष एक प्रमुख समस्या यह है कि अधिकांश किसानों के जोत (खेत) का आकार बहुत छोटा है। भारत में जोत के औसत आकार 2 हेक्टेयर से कम है,। 

जबकि यह औसत न्यूजीलैण्ड में 184, संयुक्त राष्ट्र अमरीका में 58, ब्रिटेन में 24.5, एवं हॉलैण्ड में 26 हेक्टेयर है । जोत का आकार छोटा होने का प्रमुख कारण बढ़ती हुई जनसंख्या तथा पैतृक संपत्ति में बँटवारे की प्रथा है ।

7. किसानों में गरीबी व अशिक्षा - भारतीय कृषि के समक्ष सबसे गम्भीर समस्या कृषकों की गरीबी एवं अशिक्षा है। देश में अधिकांश कृषकों के पास आधुनिक कृषि के लिए विनियोग क्षमता, उन्नत बीज, सिंचाई की सुविधा, उर्वरक, यन्त्र एवं रासायनिक दवाइयों की कमी है। 

ये कृषक खेत में किसी प्रकार बीज डाल देते हैं तथा साधारण निराई-गुड़ाई के पश्चात् जो भी उपज मिल जाय उसी से संतोष कर लेते हैं । 

यदि किसी तरह उपर्युक्त साधन उपलब्ध हो जाए, तो कृषक शिक्षा के अभाव में इन साधनों का समुचित उपयोग नहीं कर पाते, फलस्वरूप उत्पादन अत्यन्त कम होता है।

8. अन्य समस्याएँ – उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त कुछ और भी समस्याएँ भारतीय कृषि के समक्ष विद्यमान हैं, जिनमें पशुओं की दयनीय दशा, पूँजी की अपर्याप्तता, भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्रास, विक्रय व्यवस्था का ठीक न होना आदि हैं।

भारतीय कृषि की समस्या का निदान

स्वतंत्रता के समय भारतीय कृषि की दशा सोचनीय थी । कृषि के विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं एवं अन्य कृषि नीतियों के माध्यम से सरकार द्वारा कई कदम उठाये गए।

1. जमींदारी प्रथा का उन्मूलन ।

2. भूमि की अधिकतम सीमा का निर्धारण ।

3. कृषि स्रोतों के आकार को बढ़ाने हेतु चकबंदी कार्यक्रम को लागू करना ।

4. भूमिहीन कृषि मजदूरों को कृषि भूमि प्रदान करना ।

5. कृषि कार्य हेतु किसानों को प्रशिक्षण देना ।

6. किसानों को कम दर पर उत्तम बीज खाद उर्वरक एवं कृषि यंत्र उपलब्ध कराना ।

7. ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना।

8. बैंकों के माध्यम से किसानों को कम ब्याज पर कृषि हेतु ऋण उपलब्ध कराना ।

9. कृषि को मानसून की अनिश्चितता से बचाने के लिये सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना ।

10. किसानों को कृषि क्षेत्र में होने वाले अनुसंधानों एवं परिवर्तनों से परिचित कराना।

11. किसानों को उनके कृषि फसलों का उचित मूल्य दिलाने हेतु कृषि उत्पादों का न्यूनतम सरकारी मूल्य तय करना ।

12. कृषि अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना।

भारतीय कृषि की उपलब्धियाँ

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से कृषि में सुधार के प्रयास किए गए जिसके फलस्वरूप अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त हुई, जो निम्नलिखित हैं

1. खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि - स्वतंत्रता के पश्चात् खाद्यान्नों के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई है, जिसका प्रमुख श्रेय हरित क्रांति को जाता है। इसी कारण सन् 1975 के पूर्व का खाद्यान्न आयातक भारत न केवल आत्मनिर्भर हो गया वरन् निर्यात की स्थिति में भी आ गया।

2. कृषि भूमि के क्षेत्रफल में वृद्धि - स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषि भूमि के क्षेत्रफल में निरन्तर वृद्धि हुई है। 1950-51 में कुल भूमि का 42.56% भू-भाग कृषि के अन्तर्गत था जो 1970-71 में बढ़कर 46.01% तक पहुँच गया । वर्तमान में कुल भूमि का 46-73% भारतीय कृषि की उपलब्धियाँ भू-भाग कृषि कार्य के अन्तर्गत है। 

स्वतंत्रता के बाद परती भूमि सुधार कार्यक्रम खाली भूमि को कृषि योग्य बनाने आदि के कारण कृषित भूमि के क्षेत्रफल में वृद्धि हुई है। भारत संसार का ऐसा सबसे बड़ा देश है, जहाँ कुल भूमि में कृषि भूमि का प्रतिशत सबसे अधिक पाया जाता है। 

3. कृषि में उन्नत किस्म के बीजों का उपयोग - भारतीय कृषि की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है कि उन्नत किस्म के बीजों के उपयोग से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। हरित क्रांति के पश्चात् उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग बढ़ा है। 

1979-80 में 384 लाख हेक्टेयर भूमि पर उन्नत किस्म के बीजों का उपयोग होता था, जबकि 1983-84 में 525 लाख हेक्टेयर, 1991-92 में 647 लाख हेक्टेयर, 1993-94 में 743 लाख हेक्टेयर तथा 1995-96 में 750 लाख हेक्टेयर भूमि पर उन्नत किस्म के (विपुल उत्पादन देने वाले) बीजों का प्रयोग किया गया ।

4. रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में वृद्धि - हरित क्रांति के पश्चात् रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में तेजी आई है। फलस्वरूप उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई है। 1950-51 में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग मात्र 1·3 लाख टन था। 

1974-75 में 25-7 लाख टन उर्वरकों का उपयोग हुआ जो बढ़कर 1981-82 में 63.9 लाख टन तथा 1986-87 में 95 लाख टन हो गया। 1994-95 में 135 लाख टन उर्वरक का उपयोग किया गया । 1995-96 में इसका उपयोग लगभग 157 लाख टन रहा ।

5. सिंचित भूमि के क्षेत्रफल में वृद्धि - वर्षा की अनिश्चितता के कारण खेतों की सिंचाई का प्रबन्ध करना अति आवश्यक है स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कुल कृषि भूमि का 15% से भी कम भू-भाग सिंचित था इसीलिए योजनाकाल में सिंचाई के साधनों में वृद्धि की ओर विशेष ध्यान दिया गया। निम्न तालिका द्वारा सिंचित क्षेत्र में वृद्धि प्रदर्शित की गई है।

भारत की प्रमुख फसलों का प्रादेशिक प्रतिरूप

भारत में अनेक प्रकार की फसलें पैदा की जाती हैं तथापि अध्ययन की सुविधा हेतु फसलों को निम्न समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है -

1. खाद्य फसलें – चावल, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा, दालें आदि ।

2. व्यावसायिक फसलें - मूँगफली, तिल, सरसों, गन्ना आदि ।

3. रेशे वाली फसलें - कपास, जूट आदि । 

4. बागानी फसलें – चाय, कहवा, रबर आदि । -

1. खाद्यान्न फसलें

 चावल

चावल भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसल है, देश की कुल कृषि भूमि के लगभग 30% भाग में इसकी कृषि की जाती है। सन् 1996-97 में 432-83 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की गयी। भारत में मौसम के आधार पर चावल की तीन प्रकार की फसलें ली जाती हैं । 

शीतकालीन ( जुलाई से दिसम्बर) को अगहनी या अमन, ग्रीष्मकालीन ( दिसम्बर से अप्रैल) चावल को बोरो तथा शरदकालीन (जून से अक्टूबर) चावल को ओस के नाम से जाना जाता है ।

भौगोलिक दशाएँ 

1. तापमान  – चावल उष्णकटिबन्धीय पौधा है, अतः उसे ऊँचे तापमान की आवश्यकता होती है। बोते समय 20°C तथा फसल पकते समय 27°C तापमान ठीक माना गया है। 19°C से कम तापमान में यह पैदा नहीं होता।

2. वर्षा — खेतों में जल की मात्रा 75 दिनों तक भरी रहनी चाहिए। धान के पौधों को पानी की आवश्यकता अधिक होती है। 100 सेमी. से 200 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों को इससे अधिक अनुकूल मानते हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा अनिवार्य है।

3. मिट्टी — चावल के लिए उपजाऊ चिकनी, कछारी अथवा दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है, जिससे धान की जड़ें और पौधा खड़ा रह सके । डेल्टाई क्षेत्र एवं नदियों के बाढ़ क्षेत्र में धान अधिक होता है।

4. श्रम – चावल को बोने के लिए अधिक मात्रा में श्रमिकों की आवश्यकता होती है, क्योंकि क्यारियों से निकालने, निदाई, गुड़ाई, रोपाई कटाई, मिंजाई में श्रम की आवश्यकता पड़ती है। 

कृषि के ढंग 

भारत में चावल को तीन प्रकार से बोया जाता है

1. छिड़ककर – पहले धान के बीज को छिड़ककर हल चलाया जाता है जो परम्परागत विधि है। 2. रोपा विधि – इसमें पहले धान के बीज को छोटी-छोटी क्यारियों में बो दिया जाता है। 

जब 4-5 सप्ताह के पौधे बड़े हो जाते हैं तो उन्हें उखाड़कर पहले से ठीक किए गए खेतों में एक-एक कर रोप दिया जाता है। साधारणत: ये पौधे 6 से 9 सेमी. की दूरी पर लगा दिए जाते हैं।

3. हल चलाकर – चावल की खेती दक्षिण प्रायद्वीप के अधिकांश भागों में की जाती है, इसके अनुसार जुताई करते समय दाना बोते जाते हैं।

धान की किस्में – धान की प्रमुख किस्में रत्ना, जया, आई. आर. 36, आई. आर. 20 आई. आर. 8, पूसा,बी. आर. 10, बी. आर. 43, हसमा, हेमा, राजेश्वरी, बासमती, दुबराज, सफरी आदि । 

उत्पादक क्षेत्र – चावल भारत का प्रमुख खाद्यान्न है। इसकी खेती सम्पूर्ण राज्यों में की जाती है। चावल उत्पादन में भारत, चीन के बाद द्वितीय बड़ा उत्पादक देश है। भारत में चावल के प्रमुख उत्पादक राज्य निम्नलिखित हैं

1. प. बंगाल – इस राज्य की कुल कृषि भूमि का 77% भाग में चावल की खेती की जाती है। यहाँ वर्ष में चावल की तीन फसलें अमन, ओस व बोरो उगायी जाती हैं। 

सन् 2001-02 में यहाँ 152.57 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ था, जो भारत के कुल उत्पादन का 16-39% भाग है। यहाँ चावल के प्रमुख जिले कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, बांकुड़ा, मिदनापुर, वर्धमान व दार्जिलिंग हैं।

2. उत्तर प्रदेश – इस राज्य के चावल के प्रमुख उत्पादक जिले सहारनपुर, देवरिया, गोरखपुर, लखनऊ, बहराइच, गोंडा बस्ती, बलिया, रायबरेली, पीलीभीत आदि हैं। यहाँ 2001-02 में चावल का उत्पादन 124-59 टन हुआ था, जो भारत के कुल उत्पादन का 13-38% से अधिक है।

3. आन्ध्र प्रदेश – इस राज्य में चावल की दो फसलें ली जाती हैं। प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1980 किग्रा. है। यहाँ गोदावरी नदी घाटियों तथ समुद्रतटीय मैदानों में चावल उगाया जाता है।

सन् 2001-02 में यहाँ चावल का उत्पादन 113-9 लाख टन का उत्पादन किया गया जो भारत के कुल उत्पादन का 12-24% है।

4. पंजाब – क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का अत्यन्त छोटा राज्य है, जहाँ 88.16 लाख टन चावल का उत्पादन किया जाता है । यहाँ चावल का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 3229 किग्रा है।

5. उड़ीसा – यहाँ चावल का उत्पादन कटक, पुरी,सम्बलपुर, बालासोर, मयूरगंज, गंजाम कालाहांडी, बोलनगिरि आदि जिलों में किया जाता है। यह भारत का पाँचवाँ बड़ा चावल उत्पादक राज्य है। 

6. तमिलनाडु – भारत का छठवाँ बड़ा चावल उत्पादक राज्य है। इस राज्य के 38% भूमि पर चावल की कृषि की जाती है। प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 3075 किग्रा. है। काबेरी डेल्टा का थंजापुर जिला राज्य का 25% चावल उत्पादन करता है।

7. बिहार – बिहार में चावल का 52-58 लाख टन (1999-2000 में) उत्पादन किया गया, यहाँ चावल उत्पादक प्रमुख जिले शाहाबाद, चम्पारण, गया, दरभंगा, पूर्णिया, मुँगेर, भागलपुर, सहरसा । 

8. छत्तीसगढ़–‘धान का कटोरा' के नाम से विख्यात राज्य छत्तीसगढ़ है। चावल यहाँ की प्रमुख फसल है। यहाँ कुल भूमि के 60% भाग में चावल का उत्पादन किया जाता है। यहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादन 2000 किग्रा. है। यहाँ चावल की खेती सभी 16 जिलों में की जाती है।

9. अन्य राज्य–अन्य राज्यों में असम, कर्नाटक, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तरांचल, केरल, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम , त्रिपुरा, मणिपुर आदि राज्यों में भी चावल प्रमुख फसल है ।

गेहूँ

चावल के बाद गेहूँ हमारे देश का दूसरा महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है। भारत विश्व का चौथा बड़ा गेहूँ उत्पादक देश है, यह विश्व का 8% गेहूँ उत्पन्न करता है। देश के उत्तर व उत्तर-पश्चिम भाग के लोगों का यह मुख्य आहार है। सन् 2001-02 में भारत में 718-14 लाख टन गेहूँ का उत्पादन हुआ था । 

भौगोलिक दशाएँ 

1. तापमान  गेहूँ समशीतोष्ण कटिबन्धीय पौधा है। इसे बोते समय 10° से 12° से ग्रे. तापमान तथा पकते समय 15° से 20° से. तापमान की आवश्यकता पड़ती है । 

2. वर्षा – गेहूँ की कृषि के लिए 20 से 75 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है, लेकिन 100 सेमी. से अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ की कृषि नहीं की जा सकती ।

3. मिट्टी  — गेहूँ की कृषि अनेक प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, परन्तु हल्की मृतिका मिट्टी, मृतिकायुक्त दोमट मिट्टी, भारी मिट्टी, बलुई मिट्टी इसके लिए उत्तम होती है।

4. भूमि — गेहूँ की कृषि के लिए समतल भूमि उपयुक्त होती है। 

5. श्रम  — गेहूँ की कृषि में यन्त्रों का प्रयोग अधिक होता है, अतः इसकी कृषि के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती है ।

उत्पादक क्षेत्र

1. उत्तर प्रदेश – गेहूँ के उत्पादन में इस राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। यहाँ की कुल कृषि भूमि के 82% भाग पर गेहूँ बोया जाता है। यहाँ भारत के कुल गेहूँ उत्पादन का 34-84% गेहूँ उत्पन्न किया जाता है। 

राज्य में गेहूँ का कुल उत्पादन 251-08 लाख टन है। यहाँ गेहूँ के अन्तर्गत आधा क्षेत्रफल गंगा और घाघरा नदियों के बीच में पाया जाता है। 

गंगा-यमुना दोआब प्रमुख गेहूँ उत्पादक क्षेत्र हैं। मेरठ, बुलन्दशहर, देहरादून, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़, मुजफ्फरपुर, मुरादाबाद, इटावा, फर्रुखाबाद, बदायूँ, कानपुर, फतेहपुर आदि जिलों में एकतिहाई कृषि योग्य भूमि में गेहूँ की कृषि की जाती है।

2. पंजाब – पंजाब भारत का द्वितीय बड़ा गेहूँ उत्पादक राज्य है। यहाँ 12% कृषि भूमि पर गेहूँ की खेती की जाती है । सन् 2001-02 में यहाँ गेहूँ का कुल उत्पादन 154.99 लाख टन हुआ था, जो भारत के कुल उत्पादन का 21.58% है। 

उर्वरा भूमि, सिंचाई सुविधा कीटनाशक दवाओं का प्रयोग यन्त्रीकरण के कारण प्रति हेक्टेयर उपज 3155 किग्रा. से अधिक है। गेहूँ उत्पादक जिलों में अमृतसर, लुधियाना, गुरुदासपुर, पटियाला, जालन्धर, भटिण्डा प्रमुख हैं ।

3. हरियाणा – देश के कुल कृषि भूमि में 6.17% भाग में गेहूँ बोया जाता है। यहाँ 2001-02 में 94.37 लाख टन गेहूँ का उत्पादन हुआ था, जो देश के कुल उत्पादन का 13-14% है। यहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादन 2617 कि.ग्रा. है। मुख्य उत्पादक जिले रोहतक, हिसार, गुड़गाँव करनाल व जिन्द आदि हैं ।

4. राजस्थान – यह भारत का चौथा बड़ा गेहूँ उत्पादक राज्य है। सन् 2001-02 में यहाँ 63-89 लाख टन गेहूँ का उत्पादन हुआ था, जो देश का 8-89% है।

5. मध्य प्रदेश – राज्य में कुल कृषि भूमि का 17-7% भाग पर गेहूँ की फसल ली जाती है। सन् 200102 में यहाँ गेहूँ का कुल उत्पादन 57-32 लाख टन हुआ था, जो भारत में कुल गेहूँ का 7-84% है। यहाँ गेहूँ के प्रमुख उत्पादक जिले होशंगाबाद, सागर, ग्वालियर, खण्डवा, खरगोन, उज्जैन, देवास, भोपाल, रीवा, जबलपुर आदि हैं।

6. अन्य – उपर्युक्त 5 राज्यों के अतिरिक्त बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, प. बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश में गेहूँ का उत्पादन किया जाता है।

3. तमिलनाडु – प्रति हेक्टेयर गन्ना उत्पादन में प्रथम तथा कुल उत्पादन में इसका तीसरा स्थान है। सन् 2001-02 में यहाँ 363.36 लाख टन गन्ना का उत्पादन हुआ था जो देश के कुल उत्पादन का 12-11% है। 4. कर्नाटक – यह गन्ने का चौथा बड़ा उत्पादक राज्य है। यहाँ गन्ना उत्पादन करने वाले प्रमुख जिले

बेलगाँव, बेलारी, माण्डया, कोलार व रायचूर हैं। कर्नाटक में भारत का 25% गन्ना उत्पादित होता है।

5. आन्ध्र प्रदेश – गन्ना उत्पादन में इस राज्य का पाँचवाँ स्थान है। प्रमुख उत्पादन गोदावरी तथा कृष्णा नदी के डेल्टा में होता है, क्योंकि इस प्रदेश में उपर्युक्त नदियों के डेल्टा में नहर द्वारा सिंचाई करने की सुविधा प्राप्त है।

6. अन्य राज्य – इन राज्यों के अतिरिक्त भारत में गन्ना उत्पादक राज्यों में गुजरात (4-15%), हरियाणा (3·11%), पंजाब (2.94%), उत्तरांचल (2.52%) बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ प्रमुख हैं।

जूट या पटसन

जूट भारतीय मूल का पौधा है, इससे रेशा प्राप्त होता है। जूट से टाट, बोरे, परदे, कालीन, गलीचा, दरी आदि बनाए जाते हैं। इसके विविध उपयोग के कारण इसे भारत का "सुनहरा रेशा " भी कहा जाता है। जूट, कपास के बाद भारत की दूसरी महत्वपूर्ण रेशेदार फसल है।

भौगोलिक दशाएँ 

1. तापमान  — जूट उष्ण-आर्द्र जलवायु का पौधा है। इसके लिए 24° से 37° से. तापमान उपयुक्त होता है। 2. वर्षा (Rainfall)—इसके लिए 100 से 200 सेमी. वर्षा उपयुक्त है। उत्तम रेशे के लिए वर्ष पर्यन्त वर्षा आवश्यक है।

3. मिट्टी — गहरी उपजाऊ कॉप मिट्टी में फसल की पैदावार अधिक होती है। नदी के बाढ़ क्षेत्र की उपजाऊ मिट्टी जूट के लिए उपयुक्त है।

4. जल — जूट एक रेशेदार फसल है। इसके रेशे को अलग करने, सड़ाने, छिलने व धोने के लिए पर्याप्त स्वच्छ जल की आवश्यकता पड़ती है।


5. श्रम  — जूट काटने, बण्डल बनाने, सड़ाने, छिलने, धोने के लिए सस्ते व कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है।

उत्पादक राज्य

भारत विश्व का द्वितीय बड़ा जूट उत्पादक राज्य है, बंग्लादेश का स्थान प्रथम है। 

1. प. बंगाल – भारत में प. बंगाल को जूट उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त है। भारत का 83% से अधिक जूट प. बंगाल में पैदा किया जाता है। प्रमुख जूट उत्पादक जिले वर्धमान, मुर्शिदाबाद, नादिया, मिदनापुर, मालदा, प. ढिनाजपुर व हुगली हैं।

2. बिहार – देश का द्वितीय बड़ा जूट उत्पादक राज्य बिहार है। इस राज्य के जूट उत्पादक प्रमुख पूर्णिया, कटिहार, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, चम्पारन व सहरसा आदि हैं। - 3. असम – जूट उत्पादन में भारत का तीसरा बड़ा राज्य असम है। यहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1380 किग्रा. है। जूट उत्पादक प्रमुख जिले नवागाँव, गोभालपाड़ा एवं कामरूप हैं।

4. उड़ीसा – इस राज्य में कटक, बालेश्वर, किन्दूझरगढ़ तथा पुरी जिले में जूट की खेती की जाती है।

 5. उत्तर प्रदेश – यहाँ प्रमुख उत्पादक जिले खीरी, बहराइच, गोंडा, पीलीभीत, बस्ती व देवरिया हैं। 

6. अन्य राज्य – इन राज्यों के अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश में विशाखापट्टनम, श्रीकाकुलम, छत्तीसगढ़ में रायगढ़, बिलासपुर, केरल व त्रिपुरा में भी जूट की खेती की जाती है ।

चाय चाय एक मुद्रादायिनी रोपणी फसल है। यह दक्षिण पूर्व एशिया के पर्वतीय भागों का मूल पौधा है। चाय एक सदापर्णी झाड़ी है जिसकी सुखाई हुई पत्ती पेय पदार्थ के काम आती है। चाय में थीन नामक तत्व होता है, जिसके प्रयोग से हल्का नशा व स्फूर्ति पैदा होती है। 

चाय भारत की अति महत्वपूर्ण बागाती फसल है, जिसके निर्यात से देश को काफी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है । यहाँ चाय की खेती उद्योग के रूप में की जाती है। वर्तमान समय में इससे परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से लगभग 20 लाख व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त है।

भारत में यद्यपि चाय जंगली दशा में असम के पहाड़ी भागों में काफी समय पहले से ही उगती आई है, परन्तु व्यावसायिक पैमाने पर इसके उत्पादन की शुरुआत सन् 1840 में तत्कालीन गर्वनर विलियम बैंटिक द्वारा कराई गई। बाद में यहाँ चाय की खेती का उत्तरोत्तर विकास होता गया और भारत चाय का एक महत्वपूर्ण उत्पादक देश बन गया।

वर्तमान में भारत विश्व में सर्वाधिक चाय पैदा करने वाला देश है तथा विश्व का लगभग एक-तिहाई से कुछ कम चाय का उत्पादन भारत में ही होता है। उत्पादन के साथ-साथ चाय के निर्यात में भी भारत का विश्व में प्रथम स्थान है।

भौगोलिक दशाएँ 

1. तापमान – चाय उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु का पौधा है। इसके लिए 25° से 30° तक तापमान उपयुक्त है। पाला इसके लिए हानिकारक होता है।

2. वर्षा– चाय के लिए 150 से 200 सेमी. वार्षिक वर्षा अनुकूल होती है। पत्तियों के निरन्तर विकास के लिए वर्षा पूरे साल समान रूप से वितरित होनी चाहिए। बार-बार बौछार का पड़ना और सुबह का कोहरा नई पत्तियों की तीव्र वृद्धि में सहायक होता है।

3. भूमि  — चाय के लिए ढालू भूमि का विशेष महत्व है। चाय के पौधों के विकास के समय जड़ों में पानी एकत्रित नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि चाय के बगीचे के लिए समुद्र तल से 600 से 1800 मीटर ऊँचे पहाड़ी ढाल उपयुक्त भूमि है।

4. मिट्टी –चाय के लिए सामान्यतः हल्की बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है जिसमें पर्याप्त मात्रा में चूना, फास्फोरस, लोहा, पोटाश व जीवाश्म होता है।

5. श्रम– चाय की खेती के लिए सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। चाय का पौधा लगाने उसकी निराई, काट-छाँट तथा पत्ता चुनने और सुखाने आदि कार्यों में कुशल श्रमिकों की आवयकता पड़ती है।

उत्पादक राज्य

भारत विश्व का 35% चाय पैदा करता है तथा विश्व में चाय उत्पन्न करने में प्रथम स्थान पर है। यहाँ 8·05 लाख मीट्रिक टन चाय का उत्पादन होता है। भारत में चाय उत्पादक प्रमुख राज्य निम्न हैं—

1. असम – असम भारत का सबसे बड़ा चाय उत्पादक राज्य है। सन् 2001-02 में असम में कुल 2-32 लाख हेक्टेयर भूमि पर चाय के बागान लगे हुए थे । 

जो कि भारत के कुल चाय बागान भूमि का 53% था । इस वर्ष चाय का कुल उत्पादन 414 हजार टन हुआ, जो भारत के कुल चाय उत्पादन का लगभग 50% है। 

असम में मुख्य चाय उत्पादक जिले शिवसागर, लखीमपुर, दरांग, नवांगाँव, कागरूप तथा गोलपाड़ा हैं। असम की अधिकांश चाय ब्रह्मपुत्र तथा सुरमा घाटियों में उगायी जाती है।

2. प. बंगाल – यह भारत का द्वितीय बड़ा चाय उत्पादक राज्य है। यहाँ भारत की एक चौथाई चाय पैदा होती है। मुख्य उत्पादक जिले दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी तथा कूच बिहार हैं। यहाँ द्वार के पहाड़ी ढालों पर चाय पैदा होती है। दार्जिलिंग के उत्तम किस्म की सुगन्धित चाय विश्व प्रसिद्ध है।

3. तमिलनाडु– तमिलनाडु भारत का तीसरा बड़ा चाय उत्पादक राज्य है। यहाँ भारत का उत्पादन होता है। यहाँ मुख्यतः कोयम्बटूर, नीलगिरि तथा अन्नामलाई जिलों के पहाड़ी ढालों में चाय पैदा की जाती है। 

4. केरल – दक्षिण भारतीय राज्य केरल भारत का 8-4% चाय पैदा कर चौथा बड़ा चाय उत्पादक राज्य है। यहाँ चाय की खेती वायनाद, ट्रावनकोर मालाबार, त्रिचूर व कोझीकोड जिलों में की जाती है। 

5. कर्नाटक – यहाँ कहवा की तुलना में चाय का कम महत्व है, यहाँ चाय शिमोगा, चिकमंगलूर, हसन, काटूर कुर्ग जिलों में चाय उत्पन्न की जाती है ।

6. उत्तरांचल – भारत के उत्तरी क्षेत्र में उत्तरांचल प्रमुख है। यहाँ देहरादून, गढ़वाल चमोली, कुमायूँ, नैनीताल, अल्मोड़ा व पिथौरागढ़ जिलों में चाय पैदा की जाती है ।

उत्पादन एवं व्यापार 

देश में सन् 1950-51 से 2000-01 तक की अवधि के मध्य चाय के क्षेत्र तथा उत्पादन को तालिका 25 में दर्शाया गया है, जिससे स्पष्ट है कि इन 45 वर्षों में जहाँ चाय का क्षेत्र बढ़कर सवा गुना अधिक हुआ है, वहीं चाय के उत्पादन में दो गुना से भी अधिक वृद्धि हुई है।

भारत विश्व में सर्वाधिक चाय उत्पादित करने वाला देश है, इसीलिए यहाँ से काफी बड़ी मात्रा में चाय का विदेशों को निर्यात किया जाता है। 

चाय का निर्यात प्रमुख रूप से ब्रिटेन, पोलैण्ड, रूसी राष्ट्र, संयुक्त राज्य अमेरीका, एकीकृत जर्मनी, अफगानिस्तान, सूडान, इराक, ईरान, मिस्र आदि देशों को किया जाता है । कुल निर्यात का 60% ब्रिटेन को होता है।

कपास

कपास भारतीय मूल का रेशेदार व्यापारिक फसल है। इसके रेशे से सूती वस्त्र तैयार किया जाता है। इसी उपयोगिता के कारण भारत में इसकी खेती अति प्राचीन समय से होती आ रही है। भारत की कुल कृषि योग्य भूमि के 5% भाग में कपास पैदा की जाती है।

भौगोलिक दशाएँ 

1. तापमान –कपास उष्ण तथा उपोष्ण कटिबन्धीय पौधा है, इसके लिए 21° से 27° सेग्रे. तापमान अनुकूल होता है। इसकी खेती के लिए 6-7 माह पालारहित मौसम आवश्यक है। 

2. वर्षा – कपास के लिए 50 से 100 सेमी. वर्षा आवश्यक है, किन्तु 40 से 150 सेमी. वर्षा वाले भागों में भी इसे पैदा किया जा सकता है।

3. मिट्टी  — लावा निर्मित काली उपजाऊ मिट्टी कपास के लिए उपयुक्त है। गहरी उपजाऊ दोमट मिट्टी भी उपयुक्त होती है ।

4. भूमि  – इसके लिए समतल किन्तु सुप्रवाहित भूमि उपयुक्त होती है। 5. श्रम (Labour) — कपास बोने, चुनने व सिंचाई में कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। कपास की किस्में

1. लम्बे रेशे वाली कपास – जिसका रेशा 22 मिमी. से अधिक होता है ।

2. मध्यम रेशे वाली कपास – इसका रेशा 18 से 22 मिमी. होता है ।

3. छोटे रेशे वाली कपास – इसका रेशा 18 मिमी. से कम होता है। 

उत्पादक राज्य

1. महाराष्ट्र–कपास उत्पादन में इस राज्य का स्थान देश में प्रथम है, यहाँ सन् 2001-02 में 26-65%लाख गाँठों का उत्पादन हुआ था, देश के कुल उत्पादन का 26.65% है। कपास उत्पादक प्रमुख जिले यवतमाल, औरंगाबाद, अमरावती, नासिक, नागपुर, अकोला, शोलापुर, जलगाँव, धुलिया व वर्धा हैं । 

2. आन्ध्र प्रदेश–यहाँ मुख्यतः मंगारी किस्म की कपास पैदा होती है। यहाँ कर्नूल, कड्डप्पा, गुण्टूर, प. गोदावरी, कृष्णा, महमूद नगर, आलिदाबाद और अनन्तपुर आदि प्रमुख कपास उत्पादक जिले हैं । सन् 2001-02 में यहाँ 18·72 लाख गाँठों का उत्पादन हुआ जो देश के कुल उत्पादन का 18.55% है।

3. गुजरात – देश के कुल कपास क्षेत्र की 18.5% भूमि इसी राज्य में है। कपास उत्पादन में इस राज्य का तृतीय स्थान है। मुख्य उत्पादक जिले बड़ोदरा, सुरेन्द्रनगर, भड़ौच, अहमदाबाद हैं। सन् 2001-02 में यहाँ 17.03 लाख गाँठें उत्पादित की जो भारत के कुल उत्पादन का 16-87% है।

4. पंजाब – यहाँ कपास का प्रति हेक्टेयर उत्पादन अन्य राज्यों से सर्वाधिक 386 किग्रा है । यह राज्य भारत का 12-95% कपास उत्पादित करता है। यहाँ कपास उत्पन्न करने वाले प्रमुख जिले लुधियाना, भटिण्डा, अमृतसर, फिरोजपुर, जालन्धर व संगरूर हैं।

5. हरियाणा – कपास उत्पादन में इस का स्थान पंचम है। यहाँ के मुख्य उत्पादक जिले हिसार, करनाल, गुड़गाँव व रोहतक हैं। हिसार राज्य का लगभग 25% कपास उत्पन्न करता है। हरियाणा देश का 7-15% कपास उत्पन्न करता है ।

6. अन्य राज्य – कपास उत्पन्न करने वाले अन्य राज्यों में कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, केरल, मेघालय, बिहार, उड़ीसा व प. बंगाल प्रमुख हैं।

कृषि का महत्व

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ कृषि न केवल परम्परागत व्यवसाय है अपितु जीवनयापन का तरीका भी है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। राष्ट्रीय आय का एक बड़ा भाग लगभग 46% कृषि से प्राप्त होता है।

हमारी श्रम शक्ति का 64% भाग प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर आश्रित है। कुल श्रमिकों में दो तिहाई भाग कृषि श्रमिकों का है। भारत के 22 करोड़ पशुओं का भोजन भी कृषि जन्य पदार्थों से प्राप्त होता है। सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 22% कृषि से मिलता है। 

गैर कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी मात्रा में उपभोक्ता वस्तुएँ और अधिकांश बड़े उद्योगों जैसे- सूती वस्त्र उद्योग, जूट उद्योग, चीनी उद्योग, कागज उद्योग, वनस्पति तेल, घी उद्योग आदि को कच्चा माल कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त होता है। 

देश की 1 अरब से भी अधिक आबादी का भरण-पोषण कृषि के विकास से ही संभव है। अनाज की प्रति व्यक्ति उपलब्धता सन् 1999-2000 में प्रतिदिन 407 ग्राम तक पहुँच गयी है।

देश के कुल निर्यात में कृषि का योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। वर्ष 1999-2000 में कृषि उत्पादों के निर्यात से 24,576 करोड़ रु. की आय हुई थी । वास्तव में कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। 

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