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पशु संसाधन क्या है - pashu sansadhan kya hain

प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लोग विभिन्न कारणों से जानवरों पर निर्भर होते हैं। पूरे इतिहास में, मनुष्य पशु उत्पादों का उपयोग विशेष रूप से भोजन के लिए और कपड़ों, औजारों और औषधियों के लिए भी करता रहा है। जानवर चिड़ियाघरों, सफारी और महासागरों में मुख्य आकर्षण हैं। 

वे वैज्ञानिक अनुसंधान और सैन्य, कृषि, खेल जैसे गतिविधियों में भी पशुओ का महत्वपूर्ण स्थान हैं। यह अध्याय मनुष्यों और पशु संसाधन के बीच संबंध के मुख्य रूपों और इसके जैविक, सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर एक संक्षिप्त समीक्षा प्रदान करता है।

पशु संसाधन क्या है 

पशु हमारे लिए मत्वपूर्ण हैं वे सदियों से हमारे जरूरतों को पूरा करते आ रहे हैं। चाहे कृषि कार्य हो या मांस दूध प्रधान कारण है । हम सदियों से पशु संसाधन पर निर्भर करते हैं। पशु संसाधन वह है जिसका उपयोग हम अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं।

पशु संसाधन क्या है - pashu sansadhan kya hain

भारत मे पशु संसाधन के बारे मे विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई हैं। चलिए जानते हैं हमारे देश मे पशु संसाधन की भिन्नता क्या हैं - 

1. हिमालय प्रदेशीय क्षेत्र - हिमालय पर्वतीय, पठारी एवं ऊबड़-खाबड़ स्थालाकृति क्षेत्र है, जहाँ भेड़बकरियाँ मुख्य पशु संसाधन हैं। हिमालयी नस्ल की बकरी हिमाचल प्रदेश, पंजाब और कश्मीर राज्य में पाली जाती है।

इस क्षेत्र के अन्तर्गत भूटान, नेपाल, उत्तर प्रदेश के कुमायूँ तथा गढ़वाल जिले, हिमाचल प्रदेश का शिमला, कुलू कांगड़ी क्षेत्र तथा जम्मू-कश्मीर शामिल किये जाते हैं।

बकरियों से दूध, बाल तथा भेड़ों से ऊन व दूध प्राप्त होता है । हिमाचल प्रदेश की शीतल जलवायु भेड़ पालन हेतु सर्वाधिक उपयुक्त है । इन क्षेत्रों में गाय, बैल, भैंस अत्यन्त कम हैं।

2.उत्तरी शुष्क जलवायु क्षेत्र वर्षा की कमी के कारण जलवायु शुष्क है, जिसमें प्रमुख रूप से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग आते हैं। यह भारत के प्रमुख पशु संसाधन क्षेत्र हैं, जहाँ चारा पर्याप्त मिलता है, जिसके कारण यहाँ के पशु हृष्ट-पुष्ट तथा अधिक दूध देने वाले होते हैं।

पंजाब व हरियाणा में साहीवाल तथा नीली नस्ल की गायें और मुर्रा नस्ल की भैंसें पाली जाती हैं। गाय-भैंसों से दूध प्राप्त करने के कार्य का यहाँ अच्छा विकास हुआ है। दिल्ली क्षेत्र में पंजाब व हरियाणा के समान ही पशुपालन का अच्छा विकास हुआ है। राजस्थान में भेड़ें तथा गायें पाली जाती हैं। यहाँ नागौरी, हरियाणी, अलवर, मेवाती, रवा थारपरकार नस्ल की गायों की बहुतायत है।

उ.प्र. तथा म.प्र. के पश्चिमी भागों में उत्तम नस्ल की गायें व भैंसें पाली जाती हैं। म.प्र. व उ. प्र. में गाय-बैल अधिक पाले जाते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ भेड़, बकरी, ऊँट, घोड़े तथा गधे भी पाले जाते हैं।

3. आर्द्र जलवायु के क्षेत्र - भारत के पूर्वी तथा पश्चिमी क्षेत्र आर्द्र जलवायु के अन्तर्गत आते हैं, जिनमें बिहार, प. बंगाल, उड़ीसा, असम, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पूर्वी तमिलनाडु, केरल, पश्चिमी समुद्र तटीय पट्टी तथा आन्ध्र प्रदेश आते हैं। इस भागों में पशुओं के लिए चारे का अभाव है।

हरा चारा नाम मात्र को मिलता है, जिसके कारण पशु कमजोर नस्ल के होते हैं। इन क्षेत्रों के मुख्य पशु गाय, बैल व भैंस हैं। यहाँ के पशुओं से हिमाचल दूध कम मात्रा में प्राप्त होता है।

पशुओं का उपयोग कृषि कार्यों में किया जाता है। आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु में देवनी, ओंगोल तथा कृष्णा वैली नस्लों की गायें पाली जाती हैं, यहाँ के भैंसों की मुख्य नस्लों में टोंडा, तेलंगाना, एलिचपुरी हैं। आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु में भेड़ें भी पाली जाती हैं। प. बंगाल के मुख्य पशु गाय, बैल व भैंस हैं।

यहाँ के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बंगाली नस्ल की भेड़ें पाली जाती हैं। इन बकरियों से मांस अच्छा प्राप्त होता है। बिहार में बैल, गाय, भैंस पाले जाते हैं, जिनसे दूध प्राप्त किया जाता है और खेती के काम में लिया जाता है।

4. मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र - इस प्रदेश के अन्तर्गत मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग, कर्नाटक, पूर्वी महाराष्ट्र, प. तमिलनाडु आदि सम्मिलित हैं। इसे काली मिट्टी का प्रदेश भी कहते हैं। इन प्रदेशों में वर्षा सामान्यतः 120 से.मी. से कम ही होती है।

यहाँ गाय, भैंस, भेड़ें व बकरियाँ पाली जाती हैं। मध्य प्रदेश में गोली, मालवी एवं नेवारी नस्ल की गायें तथा भदावरी एवं नागपुरी नस्ल की भैंसें पायी जाती हैं।

भेड़ बकरी को भी यहाँ पाला जाता है। महाराष्ट्र में डांगी खिलारी नस्ल की गायें एवं नागपुरी नस्ल की भैंसें पाली जाती हैं। इस राज्य में सूरती नस्ल की बकरियों व दक्कनी भेड़ों की अधिकता है।

आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु व कर्नाटक राज्यों में देवनी, ओंगोल, कृष्णावैली, हलीकर, कंग्याम आदि नस्ल की गायें तथा टोडा, तेलंगाना, परलाकी, बेदी एवं एलिचपुरी नस्ल की भैंसों का पशुपालन किया जाता है, साथ ही दक्कनी एवं नेलोरी नस्ल की भेड़ें एवं विभिन्न नस्लों की बकरियाँ पाली जाती हैं।

भारत में विश्व के सबसे अधिक पशु पाये जाते हैं, विश्व की कुल गायों का लगभग 17% और भैंसों का 50% भारत में ही पाया जाता है, परन्तु अधिकांश निम्न कोटि के एवं दुर्बल हैं। देश के विभिन्न राज्यों में गायबैल के वितरण में अत्यधिक असमानता है। उत्तर प्रदेश में गाय-बैल की संख्या 15% है, जो कि सर्वाधिक है।

मध्य प्रदेश में 14%, बिहार में 9-2%, महाराष्ट्र में 8-8%, आन्ध्र प्रदेश में 7.3%, राजस्थान में 7-2%, पश्चिम बंगाल में 6.5% एवं तमिलनाडु में 6.5% गाय-बैल पाये जाते हैं। भैंस की संख्या उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक है, जो कि कुल का 22% है।

इसके अतिरिक्त पंजाब, हरियाणा, आन्ध्र प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश में भैंस पाली जाती हैं। कुल भेड़ों का 60% राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु में पाली जाती हैं।

यहाँ की भेड़ों से अच्छी किस्म का ऊन प्राप्त होता है। बकरियाँ मुख्यतः राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में पाली जाती हैं। घोड़े, खच्चर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में अधिक पाये जाते हैं। -

पशु संसाधन की समस्याएँ - पशु संसाधन का वितरण देश में असमान है। भारत में विश्व के लगभग एक चौथाई पशु पाये जाते हैं, जो सर्वाधिक है।

भारत में पशुओं का प्रति 100 हेक्टेयर भूमि पर घनत्व 130 है। यह घनत्व न्यूजीलैण्ड में 46, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 22 तथा आस्ट्रेलिया में 4 है। इस प्रकार भारत में पशु संसाधन विपुल मात्रा में हैं, किन्तु यहाँ के अधिकांश पशु निम्न कोटि के एवं दुर्बल हैं। भारत के पशु संसाधन की मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

1. अनियन्त्रित संख्या - भारत में विशाल संख्या में पशु पाये जाते हैं। यहाँ गाय, बैल, भैंस, भेड़ व बकरियों की संख्या 40 करोड़ से अधिक है। पशुओं की संख्या के दृष्टिकोण से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है,।

जिनमें अच्छे नस्ल तथा श्रेष्ठ नस्ल के पशुओं की संख्या अत्यन्त कम है। भारत में इतने सारे पशुओं के लिए चारागाह उपलब्ध नहीं है। अतः यहाँ के पशु अनियन्त्रित भार स्वरूप ही हैं।

2. चारागाह का अभाव - भारत में स्थायी चारागाह एवं चारण स्थल 3.9 प्रतिशत है। बढ़ती हुई अबादी के लिए आवास एवं कृषि के पश्चात् चारागाह हेतु अत्यंत कम भूमि बचती है। फलतः अधिकांश पशु कृषि कार्य से बचे व्यर्थ पदार्थ जैसे— फसलों के डंठल से जीवन निर्वाह करते हैं।

यही कारण है कि ये पशु दुबले-पतले, कमजोर तथा निकृष्ट श्रेणी के हैं, इनसे दूध भी कम प्राप्त होता है। चारे की कमी के कारण पशुओं के हल खींचने की श्रम शक्ति कम है। गायों की प्रजनन क्षमता भी घट जाती है और कमजोर बच्चों को जन्म देती है।

3. उत्तम नस्ल की कमी - भारत में उत्तम नस्ल के पशुओं का अभाव है। आधे से अधिक पशु निकृष्ट श्रेणी के हैं, जिनसे मिलने वाली दूध की मात्रा कम है। आर्थिक दृष्टिकोण से अधिकांश क्षेत्रों में पशुपालन का व्यवसाय घाटे में है।

सभी प्रकार के पशुओं को एक साथ चराया जाता है, इससे निम्न श्रेणी के साँड़ों के सम्पर्क में आने के कारण गायें कमजोर तथा निम्न श्रेणी के बछड़ों को जन्म देती हैं।

फलस्वरूप पशुओं की प्रजाति या जा रही है। इसका कारण भारत में नस्ल सुधार के लिए उत्तम साँड़ों तथा कृत्रिम गर्भाधान नस्ल लगातार बिग केन्द्रों की कमी है।

4. पशुओं में संक्रामक रोगों का फैलाव - सभी पशुओं को एक साथ रखने, गन्दा जल पीने, सड़ीगली चीज खाने तथा पशुओं के रहने के स्थान की साफ-सफाई न होने के कारण यहाँ के पशु अनेक रोगों से पीड़ित रहते हैं। वर्षा के दिनों में गन्दगी बढ़ जाने से पशुओं में पैरों (खुरों) तथा मुँह की बीमारियों का प्रकोप होता है।

ये रोग संक्रामक होते हैं, जो एक पशु से दूसरे पशु तक शीघ्रता से फैलते हैं । इन बीमारियों से पशुओं का भारी पैमाने पर विनाश होता है। फलत: कई देशी गाय, बैलों और भैसों के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है।

भारत में पशु संसाधन के समक्ष अनेक समस्याएँ हैं। इन समस्याओं को हल करने हेतु योजनाबद्ध प्रयास करना आवश्यक है।

पशु संसाधन संरक्षण

देश में पशु संसाधन विपुल मात्रा में है, परन्तु यहाँ श्रेष्ठ नस्ल के पशुओं की कमी है। भारत में पशु संसाधन संरक्षण हेतु निम्नलिखित साधन अपनाने चाहिए -

1. चारागाह (पशु चारे) की व्यवस्था - मानव बस्तियों के समीप खाली भूमि पर चारागाह को विकसित किया जावे । वर्षा काल में उत्पन्न होने वाली हरी-हरी घासों को सुखाकर रखा जा सकता है। खेतों में ऐसी फसलें बोयी जायें जिनसे पशुओं को पौष्टिक चारा मिले, साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हो ।

आम की गुठली, मूँज, काँस, जामुन की गुठली, बबूल की फली, मूँगफली के छिलके आदि से पौष्टिक आहार तैयार करना चाहिए।

वैज्ञानिक चारा उत्पादन प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सम्पूर्ण देश में 7 प्रादेशिक केन्द्र स्थापित किये गये हैं—(1) हरियाणा - हिसार, (2) पश्चिम बंगाल-कल्याणी, (3) गुजरात-गाँधीनगर, (4) तमिलनाडुअलमदी, (5) आंध्रप्रदेश-हैदराबाद, (6) राजस्थान - सूरतगढ़, (7) जम्मू कश्मीर-शोहामा ।

2. नस्ल सुधार कार्यक्रम - भारत के अधिकांश पशु निर्बल होते हैं, अतः उनकी नस्लों में सुधार आवश्यक है। पशुपालन कार्य वैज्ञानिक रीति से होनी चाहिए। विभिन्न नस्ल के पशुओं को एक साथ नहीं चराना चाहिए। नस्ल के अनुसार पशुओं को अलग-अलग रखा जाय।

भारत में पशुओं की नस्ल सुधारने के लिए 150 साँड़ केन्द्र हैं जहाँ से प्रति वर्ष 10 लाख साँड़ों को नस्ल सुधार हेतु देश के विभिन्न क्षेत्रों में भेजा जाता है, उल्लेखनीय है, कि देश में पशुओं की संख्या अधिक है। प्रजनन तथा नस्लसुधार के लिए इनके अतिरिक्त और उपाय किये जा सकते हैं-

  1. कृत्रिम गर्भाधान केन्द्रों का निर्माण हो जिससे दुधारू गाय तथा बैल प्राप्त किये जा सकें।
  2. फार्म से प्राप्त साँड़ों को एक ही साथ रखा जाय,
  3. बढ़िया नस्ल वाले पशुओं का विदेश से आयात किया जाये ।

3. उचित देखभाल - पशुपालन का कार्य वैज्ञानिक ढंग से हो, पशुओं को ताजा व पौष्टिक चारा दिया जाय, उनके स्थान को हमेशा साफ रखना चाहिए तथा पीने के लिए ताजे जल की व्यवस्था होनी चाहिए।

पशुपालन करने वालों को उचित देखभाल करने का प्रशिक्षण देना चाहिए। उचित देखभाल से पशु संसाधन की कार्य क्षमता बढ़ती है और ज्यादा आर्थिक लाभ होता है।

4. बीमारियों से बचाव – भारत सरकार ने पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए अनेक पशु चिकित्सालयों की स्थापना की है, परन्तु इन चिकित्सा केन्द्रों में आवश्यक दवाइयों, उपकरणों एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव परिलक्षित होता है,

अतः इन कमियों को दूर किया जाना आवश्यक है ताकि पशु संसाधन को बीमारियों से बचाया जा सके।भारत में यद्यपि विश्व के सबसे अधिक पशु पाये जाते हैं, जिसका गुणात्मक महत्व अत्यन्त कम है और श्रेष्ठ नस्ल के पशुओं का अभाव है।

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