सुंदरकांड की 11 चौपाई - sundar kand tulsidas

Post Date : 11 November 2022

सुंदरकाण्ड के पाठ करने से बल बुद्धि की प्राप्ति होती हैं। इसमें भगवान राम के भक्त हनुमान की गुण और शक्ति का बखान किया गया हैं। सुन्दरकाण्ड गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस के सात अध्याय में से पांचवा अध्याय है।

सुंदर काण्ड का पाठ शनिवार को करने से शनि का प्रभाव कम हो जाता हैं। कहा जाता हैं की शनि महाराज हनुमान जी के भक्त को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। और सुंदरकांड का पाठ करने वालो की मनोकामना जल्द पूर्ण हो जाती हैं।

सुंदरकांड की चौपाई

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता ।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा ।
सुनत बचन कह पवनकुमारा ।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं ।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई ।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ।।
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना ।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ।।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा ।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा ।
तासु दून कपि रूप देखावा ।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा ।
 अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ।।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा ।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा ।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा ।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा ।।

निसिचर एक सिंधु महुँ रहई ।
करि माया नभु के खग गहई ।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं ।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ।।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई ।।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई ।।
सोइ छल हनुमन कहँ  कीन्हां ।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ।।
ताहि मारि  मारुतसुत बीरा ।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा ।।
तहाँ जाई देखि बन सोभा ।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा ।।
नाना तरु फल फूल सुहाए ।
खग मृग बृंद देखि मन भाए ।।
सैल बिसाल देखि एक आगे ।
ता पर चढ़ेउ भी त्यागें ।।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई ।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ।।
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी ।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ।।
अति उतंग जलननिधि चहु पासा ।
कनक कोट कर परम प्रकासा ।।

मसक समान रूप कपि धरी ।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी ।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी ।।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा ।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा ।।
मुठिका एक महा कपि हनी ।
रूधिर बमत धरनीं ढनमनी ।।
पुनि संभारि उठी सो लंका ।
जोरि पानि कर बिनय ससंका ।।
जब रावनहि ब्रम्ह बर दीन्हा ।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ।।
बकल होसि तैं कपि कें मारे ।
तब जानेसु निसिचहर संघारे ।।
तात मोर अति पुन्य बहूता ।
देखेउँ नयन राम कर दूता ।।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा ।
हृदयँ राखि कोसलपुर  राजा ।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई ।
गोपद सिंधु अनल सितलाई ।।
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही ।
राम कृपा करि चितवा जाही ।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना ।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना ।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा ।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं ।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ।।
सयन किएँ देखा कपि तेही ।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा ।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ।।

लंका निसिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ।।
मन महुँ तरक करैं कपि लागा ।
तेहीं समय बीभीषनु जागा ।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी ।
साधु ते होइ न कारज हानी ।।
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए ।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए ।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई ।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई ।
मोरें ह्रदय प्रीती अति होई ।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी ।
आयहु मोहि करन बड़भागी ।।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी ।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा ।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ।।
तामस तनु कछु साधन नाहीं ।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं ।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता ।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता ।।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा ।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती ।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती ।।
कहहु कवन मैं परम कुलीना ।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा ।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ।।

जानतहूँ अस स्वामि बसारी।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्राम।।
पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता।।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहवाँ।।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनाम।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

तरु पल्ल्व महुँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
संग नारि बहु किएँ बनावा।।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करऊँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। 
सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। 
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। 
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
सठ सुनें हरि आनेहि मोही। 
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

सीता मैं मम कृत अपमाना। 
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। 
सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। 
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चन्द्रहास हरु मम परितापं। 
रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि  बर धारा। 
कह सीता हरु मम  दुख भारा ।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। 
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। 
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। 
राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। 
सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
सपनें बानर लंका जारी।
जातुधान  सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। 
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
एही बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। 
लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। 
तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ  दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। 
जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। 
मातु बिपति संगिनी  तैं मोरी।।
तजौं देह करू बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाईं।।
आनि काठ रचु चिता बनाई। 
मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य कर मम प्रीति सयानी। 
सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
सुनत बचत पद गहि समुझाएसि। 
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
 निसि न अनल मिली सुनु सुकुमारी। 
अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सुला। 
देखियत प्रगट गगन अंगारा। 
अवनि न आवत एकउ तारा।।
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। 
मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। 
सत्य नाम करू हरु मम सोका।।
नूतन किसलय अनल समाना। 
देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। 
सो छन कपिहि कलप सम बीता।।


तब देखी मुद्रिका मनोहर। 
राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। 
हरष बिषाद हृदयँ अकुलांनी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई। 
माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। 
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनै लागा। 
सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनै श्रवण मन लाई। 
आदिहु तें सब कथा सुनाई।। 
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। 
कही सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। 
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी। 
सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। 
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें। 
कही कथा भई संगति जैसें।।


हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। 
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना।
भयहु तात मो कहुँ जल जाना।।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी।
अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई।
कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
सहज बानी सेवक सुख दायक।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता।
होइहहिं निरखि स्याम मृदू गाता।।
बचनु  न आव नयन भरे बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।
तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।

कहेउ राम बियोग तव सीता।
मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू।
काल निसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई।
काहि कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानू प्रीति रसु एतनेहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।
सुनि मम बचन तजहु कदराई।।



जौं रघुवीर होति सुधि पाई।
करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
राम बान रबि उएँ जानकी।
तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाऊँ लवाई।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सूत कपि सब तुम्हहि समाना।
जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम् संदेहा।
सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।



मन संतोष सुनत कपि बानी।
भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना।
होहु तात बल सील निधाना।।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।
लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी।
परम सुभट रजनीचर भारी।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।



चलेउ नाइ सिर पैठेउ बागा।
फल खाएसि तरु तौरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
नाथ एक कपि आवा भारी।
तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे।
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
सुनि रावन पठए भट नाना।
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
सब रजनीचर कपि संघारे।
गए पुकारत कछु अधमारे।।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा।
चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।
पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
चला इन्द्रजित अतुलित जोधा।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अति बिसाल तरु एक उपारा।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा।
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।।
मुठिका मारी चढ़ा तरु जाई।
ताहि एक छन मुरुछा आई।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।

ब्रम्हबान कपि कहुँ तेहिं मारा।
परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ।
नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए।
कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।


कह लंकेस कवन तैं कीसा।
केहि कें बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखउँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुनु रावन ब्रम्हांड निकाया।
पाइ जासु बल बिरंचि हरि ईसा।
पालत सृजत हरत दससीसा।।
जा बल सीस धरत सहसानन।
अंडकोस समेत गिरी कानन।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता।।
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे  सकल अतुलित बलसाली।।


जानऊँ मैं तुम्हारी प्रभुताई।
सहसबाहु सन परी लराई।।
समर बालि सन करि जसु पावा।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा।
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी।
मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
 जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे।।
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी।
भ्रम तजि भजहु भगत भी हारी।।
जाकें डर अति काल डेराई।
जो सूर असर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै।
मोरे कहें जानकी दीजै।।


राम चरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राजू तुम्ह करहू।।
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी।
सब भूषन भूषित बर नारी।।
राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।

जदपि कही कपि अति हित बानी।
भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
मृत्यु निकट आई खल तोही।
लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना।
मतिप्रभ तोर प्रकट मैं जाना।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसियाना।
बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
सुनत निसाचर मारन धाए।
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।।
नाइ सीस करि बिनय बहूता।
नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई।
सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर।
अंग भंग करि पठइअ बंदर।।



पूँछ हीन बानर तहाँ जाइहि।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई।
देखऊँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
बचन सुनत कपि मन मुस्काना।
भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनी रावन बचना।
लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
रहा न  नगर बसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी।
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता।
भयउ परम लघु रूप तुरंता।।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं।
भईं सभीत निसाचर नारीं।।



देह बिलास परम् हरुआई।
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला।
झपट लपट बहु कोटि कराला।।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा।
एहिं अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई।
बानर रूप धरे सुर कोई।।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझमारी।।


मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।
जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ।
हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनाम।
सब प्रकार प्रभु पूरनकाम।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ मम संकट भारी।।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना।
तुन्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।



चलत महाधुनि गर्जेसि भारी।
गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा।
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा।।
मिले सकल अति भए सुखारी।
तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
चले हरषि रघुनायक पासा।
पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
तब मधुबन भीतर सब आए।
अंगद समंत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे।।
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।



जौं न होति सीता सुधि पाई।
मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एही बिधि मन बिचार कर राजा।
आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा।
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी।
राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना।
राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ।
कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।।
राम कपिन्ह जब


जामवंत कह सुनु रघुराया।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोई बिजई बिनई गुन सागर।
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवनतनय के चरित सुहाए।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए।
पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी।
रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।



चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही।
रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी।
बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना।
दीन  बंधु प्रनतारित हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी।
केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना।
बिछुरत प्रान न कीन्ह  पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा।
निसरत प्रान करहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा।
स्वान जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहिं जलु निज हित लागी।
जरैं न पाव देह बिरहागी।।



सुंदरकांड के चौपाई 31 से 40 तक 
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना।
भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन कायँ मन मम गति जाही।
सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति  प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात  प्रभु जातुधान की।
रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार कर्रौ का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मीरा।।
सुनु सूत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता।
लोचन नीर पुलक अति गाता।।



बार बार प्रभु चहइ उठावा।
प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर।
लागे कहन कथा अति सुन्दर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा।
कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका।
केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग कै बड़ि मनुसाई।
साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा।।
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।


नाथ भगति अति सुुुुखदायनी।
देहु कृपा करि अनपायनी।। 
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। 
एवमस्तु तब कहेउ भवानी।। 
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। 
ताहि भजनु तजि भाव न आना।। 
यह संबाद जासु उर आवा। 
रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा।
जय जय जय कृपालु सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा।
कहा चलैं कर करहु बनावा।।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे।
तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी।
नभ तें भवन चले सुर हरषी।।



प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा।
गर्जहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना।
चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा।
भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना।
सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
जासु सकल मंगलमय कीती।
तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं।
फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई।
असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा।
गर्जहिं बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी।
चले गगन महि इच्छाचारी।।
 केहरिनाद भालु कपि करहीं।
डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।



उहाँ निसाचर रहहिं ससंका।
 जब तें जारि गयउ कपि  लंका।।
निज निज गृह सब करहिं बिचारा।
नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
जासु दूत बल बरनि न जाई।
तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी।
मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
रहसि जोरि कर पति पग लागी।
बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरहू।
मोर कहा अति हित हियँ धरहू।।
समुझत जासु दूत कइ करनी।
स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई।
पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई।
सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें।
हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।



श्रवन सुनी सठ टा करि बानी।
बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा।
मंगल महुँ भी मन अति काचा।।
 जौं आवइ मर्कट कटकाई।
जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा।
तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई।
चलेउ सभा ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता।
भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई।
सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू।
ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं।
नर बानर केहि लेखे माहीं।।



सोइ रावन कहुँ बनी सहाई।
अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा।
भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन।
बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता।
मति अनुरूप कहउँ हित ताता।।
जो आपन चाहै कल्याना।
सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं।
तजउ चउथि के चंद कि नाईं।।
चौदह भुवन एक पति होई।
भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ।
अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।


तात राम नहिं नर भूपाला।
भुवनेश्वर कालहु कर काला।।
ब्रम्ह अनामय अज भगवंता।
ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
गो द्विज धेनु देव हितकारी।
कृपासिंधु मानुष तनु धारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता।
बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा।
प्रनतारित भंजन रघुनाथा।।
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही।
भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा।
बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन।
सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।



मालयवन्त अति सचिव सयाना।
तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन।
सो उर धरहु जो कहत बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी।
तेहि सीता पर प्रीती घनेरी।।



बुध पुरान श्रुति संमत बानी।
कही बिभीषन निति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई।
खल तोहि निकट मृत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा।
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं।
भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती।
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा।
अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा।
रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
 सचिव संग लै नभ पथ गयऊ।
सबहिं सुनाइ कहत अस भयऊ।।


अस कहि चला बिभीषनु जबहीं।
आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधू अवज्ञा तुरत भवानी।
कर कल्यान अखिल कै हानी।।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा।
भयउ बिभव बिनु तबहिं आभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं।
करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता।
अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी।
दंडक कानन पावनकारी।।
जे पद जनकसुताँ उर लाए।
कपट  कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई।
अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई।।



एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा।
आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा।
जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
ताहि राखि कपीस पहिं आए।
समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई।
आवा मिलन दसानन भाई।।
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा।
कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया।।
भेद हमार लेन सठ आवा।
राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी।
मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना।।



कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई।
मोरें सनमुख आव कि सोई।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
जग महुँ सखा निसाचर जेते।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाईं।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं।।



सादर तेहि आगें करि बानर।
चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वैा भ्राता।
नयनानंद दान के दाता।।
बहुरि राम छबिधाम के बिलोकी।
रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलम्ब कंजारुन लोचन।
स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा।
आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पलकित अति गाता।
मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता।
निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा।
जथा उलूकहि तम पर नेहा।



अस कहि करत दंडवत देखा।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लागावा।।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी।
बोले बचन भगत भय हारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा।
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
खल मंडली बसहु दिनु राती।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती।
अति नय निपुन न भाव अनीती।।
बरु भल बास नरक कर ताता।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया।
जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया।।



तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।
लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरें चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तरुन तमी अँधिआरी।
राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे।
देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला।
ताहि न ब्याप त्रिबिध भवसूला।।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ।
सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा।
तेहिं  प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।



सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ।
जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही।
आवै सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं।
हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें।
लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।
धरऊँ देह नहिं आन निहारें।।



सुनु लंकेस सकल गुन तोरें।
तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा।
सकल कहहिं जय कृपाबरूथा।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी।
नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अम्बुज गहि बारहिं बारा।
हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी।
प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
अब कृपाल निज भगति पावनी।
देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा।
मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं।
मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा।
सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।



अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना।
ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा।
प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी।
सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक।
कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
सुनू कपीस लंकापति बीरा।
केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती।
अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक।
कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्धपि तदपि नीति असि गाई।
बिनय करिअ सागर सन जाई।।



सखा कही तुम्ह नीकि उपाई।
करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा।
राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा।
सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा।
दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा।
ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई।
सिंधु समीप गए रघुराई।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई।
बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए।
पाछें रावन दूत पठाए।।


प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ।
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने।
सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर।
अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए।
बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे।
दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना।
तेहि कोसलाधीस कै आना।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए।
दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती।
लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।


तुरत नाइ लछिमन पद माथा।
चले दूत बरनत गन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए।
रावण चरन सीस तिन्ह नाए।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता।
कहिस न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी।
जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
करत राज लंका सठ त्यागी।
होइहि जव कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई।
कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा।
भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी।
जिन्ह के हृदयँ त्रास  अति मोरी।।



नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें।
मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा।
जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना।
कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिक काटै लागे।
राम सपथ दीन्हें हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई।
बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी।
बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा।
सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला।
अमित नाग बल बिपल बिसाला।।


ए कपि सब सुग्रीव समाना।
इन सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं।
तृन समान त्रैलोकहि गनहीं।।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर।
पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं।
जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा।
आयसु  पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला।
पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा।
ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका।
मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका।।


राम तेज बल बुधि बिपुलाई।
सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर।
तव भ्रातहिं पूँछेउ नय नागर।।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं।
मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा।
जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई।
सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई।
रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
सचिव सभीत बिभीषन जाकें।
बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी।
समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
रामानुज दीन्ही यह पाती।
नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन।
सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।



सुनत सभय मन मुख मुसुकाई।
कहत दसानन सबहिं सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा।
लघु तापस कर बाग़ बिलासा।।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी।
समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा।
नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ।
ज्द्धपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही।
उर अपराध न एकउ धरिही।।
जनकसुता रघुनाथहि दीजै।
एतना कहा मोर प्रभु कीजे।।
जब तेहिं कहा देन बैदेही।
चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ।
कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई।
राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी।
राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा।
मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।


लछिमन बान सरासन आनू।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती।
सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।
यह मत लछिमन के मन भावा।।
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना।
बिप्र रूप आयउ तजि माना।।


सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई।
सो तेहि भाँति रहें सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधीकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।
करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई।।



नाथ नील नल कपि दोऊं भाई।
लरिकाईं रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई।
करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ।
जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
एहिं सर मम उत्तर तट बासी।
हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा।
तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी।
हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा।
चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।