आत्महत्या के प्रकारों का वर्णन कीजिए - aatmahatya ke prakaaron ka varnan keejie

आत्महत्या की पूर्व विवेचना से यह तथ्य तो पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि आत्महत्या एक सामाजिक प्रघटना है। जिसकी व्याख्या समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में ही की जानी चाहिए। 

प्रोफेसर इमाइल दुर्खीम ने आत्महत्या के अनेकानेक कारणों को स्वीकार करते हुए आत्महत्या के तीन प्रकारों को बतलाया है। जो निम्नलिखित हैं -

(1) अहम्वादी आत्महत्या - आत्महत्या का वह विशिष्ट प्रकार है, जिसमें आत्महत्या करने वाले व्यक्ति तथा समूह या समाज के पारस्परिक सम्बन्ध एक सीमा तक समाप्त हो जाते हैं। इससे सम्बन्ध समाप्त से हो जाते हैं। 

जिसके फलस्वरूप एक निश्चित समय बाद ऐसे व्यक्तियों को स्वयं अनुभव होने लगता है कि समाज के अन्य सदस्य जैसे उसकी उपेक्षा करने लगे हैं फलतः उसमें एकाकीपन का अनुभव होने लगता है और अन्त में वह सोचने लगता है कि उसका अपना कोई नहीं है। 

जो उससे प्रेम, सहानुभूति व अपनत्व रखता हो । ऐसी विषम परिस्थिति उसे स्वयं के लिए असहनीय लगने लगती है और उसके अहंम् को ठेस लगती है और वह अपनी अहम्वादी 'मनोवृत्ति के कारण आत्महत्या का सहारा लेता है। 

प्रोफेसर दुर्खीम ने अहम्वादी आत्महत्या के लिए सामूहिक चेतना का सहारा लेकर स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वह ऐसा मानता है कि जिन भी विशिष्ट स्थितियों या परिस्थितियों में समाज के सदस्यों पर सामूहिक चेतना का अधिक प्रभाव रहता है तो वह समाज के सामूहिक प्रकार्यों में अधिक सहभागी रहता है। 

जिसके कारण (सहभागी) उसे मनोमस्तिष्क में आत्महत्या का प्राथमिक विचार भी नहीं आता। किन्तु सामूहिक चेतना का प्रभाव नगण्य होते ही उसका सामाजिक सम्पर्क सीमित या कम हो जाता है। 

जिसके कारण वह स्वयं को उपेक्षित व अकेला-सा महसूस करने लगता है और आत्महत्या को प्रेरित होता है। यही मूल कारण है कि गर्मियों के दिनों में ठण्ड के दिनों की अपेक्षा आत्महत्याएँ बढ़ जाती हैं, क्योंकि व्यक्तियों में सामाजिक सम्पर्क कम हो जाता है। 

इसी प्रकार विवाहित व्यक्तियों की तुलना में अविवाहित, तलाकशुदा या परित्यक्त व्यक्ति अधिक आत्महत्या करते देखे जाते हैं। इसका प्रमुख कारण इन व्यक्तियों का पारिवारिक जीवन से सम्पर्क कम या नहीं रहता।

(2) परार्थवादी आत्महत्या - सामान्य अर्थ में परार्थवादी आत्महत्या अहम्वादी आत्महत्या का विपरीत रूप में कही जा सकती है। 

परार्थवादी आत्महत्या करने वाले व्यक्ति में समूहवाद की भावना अत्यधिक प्रबल होती है तथा व्यक्तिवादी भावना का ऐसे व्यक्ति महत्वहीन मानते हैं तथा सामूहिक हित या समूहवाद की भावना से प्रेरित होकर ये आत्महत्या को खुशी-खुशी गले लगा लेते हैं। ऐसी आत्महत्या को दुर्खीम परार्थवादी आत्महत्या कहते हैं। 

सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री टॉलकाट पारसन्स ने परार्थवादी आत्महत्या को व्यक्त करते हुए लिखा है कि परार्थवादी आत्महत्या उस सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति है, जो सामूहिक हितों के सामने व्यक्ति को समर्पण करने की दृष्टि से शक्तिशाली होती है तथा जिसके सामने सामूहिक जीवन की तुलना में व्यक्ति के जीवन को कम मूल्य दिया जाता है। 

पारसन्स के उपर्युक्त कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि जब व्यक्ति के व्यक्तिगत स्वार्थ व हित सामूहिक हित से इस मात्रा में घुल-मिल जाते हैं कि वह स्वहित की जगह सामूहिक हित को सर्वश्रेष्ठ मानने लगता है तो अपने स्वयं का व्यक्तित्व खो देता है तथा वह जो कुछ भी करता है या सोचता है। 

उसमें सामूहिक हित को सर्वोपरि मानकर महत्व देता है तथा समाज से पृथक् वह अपना अस्तित्व भी नहीं मानता तो इस प्रकार की अर्थात् परार्थवादी आत्महत्या करता है। 

उदाहरण के लिए, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए युद्ध में शत्रुओं से लड़ते हुए सैनिक अपने राष्ट्र के या समूह के हितों को सर्वोपरि मानकर ही मर जाते हैं। सैनिकों का इस प्रकार का कार्य परार्थवादी आत्महत्या की श्रेणी में ही गिना जा सकता है। इसी प्रकार श्रीमती इन्दिरा गाँधी एवं राजीव गाँधी की हत्या भी परार्थवादी आत्महत्या कही जा सकती है।

(3) अस्वाभाविक या असामान्य आत्महत्या - अस्वाभाविक या असामान्य आत्महत्या का सामान्य आशय व्यक्ति के सामने उन असामान्य या अस्वाभाविक परिस्थितियों का जन्म लेना है, जिनका सामना उसने सामान्य जीवन में कभी न किया हो। 

ऐसी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाने से व्यक्ति परिस्थितियों से सामंजस्य व अनुकूलन करने की स्थिति में स्वयं को तैयार नहीं कर पाता और आत्महत्या कर लेता है या आत्महत्या करने को प्रेरित हो जाता है। 

दुर्खीम ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि असामान्य (अस्वाभाविक) स्थिति आदर्शविहीनता की एक अवस्था है। स्वाभाविकता का अभाव है। नियमों का निलम्बन है, यह एक ऐसी स्थिति है, जिसे हम नियमविहीनता कहते हैं। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्ति के सामने अचानक ऐसी विषम सामाजिक स्थिति उत्पन्न हो जाए। जिसका साक्षात्कार पूर्व में उसने कभी न किया हो तो ऐसी अस्वाभाविक परिस्थिति में वह अपने आप पर सामान्य नियन्त्रण नहीं रख पाता और आत्महत्या को प्रेरित होता है या आत्महत्या करता है।  

व्यापार में अनायास बड़ा घाटा लग जाने या शेयर में नुकसान हो जाने पर की जाने वाली आत्महत्याएँ इसी श्रेणी की आत्महत्या कहलायेंगी। इसी प्रकार गरीब व्यक्ति को अचानक लाटरी से करोड़ों रुपया मिल जाए और वह अपनी इस नई स्थिति में सामंजस्य न बिठा पाए और आत्महत्या कर ले तो इस प्रकार की आत्महत्या भी इसी श्रेणी की आत्महत्या मानी जाएगी। 

इमाइल दुर्खीम का कहना है कि आर्थिक विसंगति ही नहीं वरन् अन्य सभी प्रकार की विसंगतियाँ व्यक्ति को आत्महत्या को प्रेरित करती हैं। उदाहरण के रूप में हम पारिवारिक विसंगति को ले सकते हैं-पारिवारिक विसंगति तब उत्पन्न हो जाती है जब परिवार के पति या पत्नी का देहान्त अचानक हो जाता। 

इस प्रकार की स्थिति में जीवित रहने वाला पति या पत्नी के सामने ऐसी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिसकी कुछ समय पूर्व तक उसने कल्पना भी नहीं की थी । ऐसी विषम परिस्थितियों में अनुकूलन या सामंजस्य न कर पाने की स्थिति में जीवित रहने वाला पक्ष आत्महत्या को प्रेरित होता है ।

आलोचनात्मक मूल्यांकन 

प्रोफेसर इमाइल दुर्खीम के आत्महत्या सम्बन्धी विचारों का मूल्यांकन करते हुए कहा जा सकता है कि दुर्खीम ने एक समाजशास्त्री होने का पूर्ण दायित्व निर्वाह करते हुए अपने तर्कपूर्ण अध्ययन द्वारा आत्महत्या को एक विशुद्ध सामाजिक तथ्य मानकर उसे सामाजिक परिवेश में प्रस्तुत करके आत्महत्या के लिए सामाजिक अस्वस्थ परिस्थितियों अर्थात् सामाजिक विसंगतियों को प्रमुख कारण तत्व सिद्ध करने का सफल प्रयोग किया और जिसमें वे एक बहुत बड़ी सीमा तक सफल भी हुए । 

यही वह महत्वपूर्ण कारण है कि दुर्खीम द्वारा प्रतिपादित आत्महत्या का सिद्धान्त आज भी समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण अध्ययनों में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए है। इस दृष्टि से इसे आज भी मार्गदर्शक एवं पथप्रदर्शक के रूप में मान्यता दी जाती है। 

संक्षेप में कहा जा सकता है। आत्महत्या चाहे अहम्बादी हो या परार्थवादी व अस्वाभाविक, वह पूर्ण रूप से सामाजिक कारकों के फल के रूप में स्वीकार की गई है, अर्थात् सामाजिक अस्वस्थ परिस्थिति इसकी उत्तरदायी होती है। किन्तु इन बातों के पश्चात् भी जब हम किसी भी विद्वान् के विचारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हैं तो बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना पक्षपात के तथा बिना अपने पराए सोच के निष्पक्षता की कसौटी पर कसकर करना चाहिए। 

इस रूप में इमाइल दुर्खीम का यह दावा पूर्णतः सत्य प्रमाणित नहीं होता है कि आत्महत्या के लिए पूर्णतः सामाजिक कारण ही जिम्मेदार हैं या उत्तरदायी कारण तत्व हैं। वास्तविकता यह है कि सामाजिक कारणों के अतिरिक्त भी अन्य कारण तत्व आत्महत्या को प्रभावित करते हैं। 

इस रूप में कहा जा सकता है कि प्रोफेसर दुर्खीम ने इस सिद्धान्त में सामाजिक कारकों को अत्यधिक महत्व दे दिया है, जो आलोचना का प्रमुख एवं अन्तिम बिन्दु कहा जा सकता है। 

आत्महत्या समाजशास्त्रीय व्याख्या 

प्रोफेसर इमाइल दुर्खीम का कहना है कि किसी भी समाज में घटित होने वाली आत्महत्याओं का तर्कपूर्ण विश्लेषण समाजशास्त्रीय आधार पर किया जाना चाहिए। प्रत्येक समाज की अपनी कुछ विशिष्ट परिस्थितियाँ होती है। 

जो कि समाज के सदस्यों को निश्चित रूप से प्रभावित करती हैं और इन विशिष्ट परिस्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई भी व्यक्ति आत्महत्या करता है। दुर्खीम का ऐसा मत है कि समाज या समूह में कुछ ऐसी विशिष्ट परिस्थितियाँ या दशाएँ बन जाती हैं। 

जिसके प्रभाव से प्रभावित होकर व्यक्ति आत्महत्या करने को प्रेरित होता है या करता है। दुर्खीम का कहना है कि आत्महत्या समाज या समूह के अस्वस्थ प्रभाव का प्रतिफल है।

प्रत्येक व्यक्ति की अनेक सामाजिक, आर्थिक व मानसिक आवश्यकताएँ होती हैं, जिनकी पूर्ति कोई भी व्यक्ति स्वयं की करने में सक्षम नहीं होता, जिसके कारण ही वह समाज या समूह के सदस्यों के साथ रहकर पूर्ण करने का प्रयास करता है। 

इसके लिए वह दूसरे सदस्यों को सहयोग करता है तथा उनसे भी सहयोग की आशा करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि आवश्यकताएँ वह विशिष्ट केन्द्र बिन्दु है, जिसके चारों ओर समाज या समूह प्रक्रियातमक रूप में चक्कर लगाता रहता है। 

आवश्यकताओं के कारण व्यक्ति समाज या समूहों में परस्पर प्रेम, सहयोग, एकता, अपनत्व के साथ रहने की कामना संजोए रहता है। प्रेम, सहयोग अपनत्व व एकता के फलस्वरूप व्यक्ति की जीवन आनन्द से भर जाता है, हर तरफ उसे खुशियाँ ही खुशियाँ दिखाई देने लगती हैं। 

जीवन का प्रत्येक क्षण आनन्द से परिपूर्ण होता है। ऐसी विशिष्ट स्थितियाँ व्यक्ति को जीवन जीने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐसी स्थितियाँ समाज के स्वस्थ प्रभाव को प्रदर्शित करती हैं किन्तु इसके ठीक विपरीत कुछ ऐसी अस्वस्थ सामाजिक परिस्थितियाँ भी समाज या समूह में उत्पन्न होती रहती हैं। 

जिनके कारण व्यक्ति असन्तुष्ट, असुरक्षित, अकेला, निराश व दुःखी होने लगता है। अनेक प्रकार के सन्देह व शंकाएँ जन्म लेने लगती हैं, अपनत्व की भावना की जगह घृणा, द्वेष व जलन की भावना विकसित होने लगती है। 

सामाजिक जीवन का महत्व एक सीमा तक अनुपयोगी लगने लगता है। मन में भय या असुरक्षा की भावना तीव्रता से फैलकर मानसिक शान्ति को भंग कर देती है। जीवन में चारों और उसे अन्धकार-ही-अन्धकार दिखाई देने लगता है। 

प्रकाश की छोटी-सी किरण भी जब दिखाई नहीं पड़ती तो व्यक्ति अन्ततोगत्वा सोचने लगता है कि जीवनरूपी गोद से अच्छी तो मौत की नींद है। ऐसा जीवन भी कोई जीवन है ? इससे अच्छा तो ये जिन्दगी ही खत्म हो जाए। 

सब प्रपंचों से मुक्ति मिल जाएगी, सभी दुःख, तकलीफें व समस्याएँ स्वतः ही समाप्त हो जाएँगी और ऐसी सभी बातें व स्थितियों से प्रेरित होकर या विवश होकर आत्महत्या को तैयार होता है। 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि ऐसी विषम परिस्थितियाँ जिनमें व्यक्ति को अपने चारों और दुःख-ही-दुखः, अन्धकार - ही - अन्धकार तथा कष्ट-ही-कष्ट का अनुभव होने लगता है। ऐसी परिस्थितियाँ व्यक्ति को जीवन समाप्त करने को प्रेरित करने लगती हैं। ऐसी परिस्थितियाँ समाज की अस्वस्थ प्रभाव की परिचालक हैं। 

दुर्खीम ने इस सम्बन्ध में लिखा भी है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए, शक्ति की निश्चित मात्रा से पूर्ण एक सामूहिक दबाव होता है, जो व्यक्ति को आत्महत्या करने को विवश करता है। 

उक्त कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक-सामूहिक परिस्थितियों के द्वारा अस्वस्थ परिस्थितियाँ के द्वारा अस्वस्त परिस्थितियाँ ही आत्महत्या करने हेतु व्यक्ति को विवश करती हैं। अतः आत्महत्या का वास्तविक कारण तत्व समाज की वे अस्वस्थ समाजिक परिस्थितियाँ हैं। 

जो सामाजिक परिवेश में ही फलती-फूलती हैं। वास्तविकता यह है कि आत्महत्या प्रगट में चाहे व्यक्तिगत कार्य लगता है किन्तु वास्तव में यह सामाजिक प्रतिफल है। इस सम्बन्ध में दुर्खीम कहते हैं कि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के कार्य जो शुरू से ही उसके व्यक्तिगत स्वभाव की अभिव्यक्ति प्रतीत होते हैं। 

किन्तु वास्तव में उस सामाजिक दशा के पूरक तथा प्रसारक होते हैं। जिसे वे बाहरी रूप से व्यक्त करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि दुर्खीम आत्महत्या के लिए अस्वस्थ सामाजिक परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराता है। 

दुर्खीम का विचार है कि सामाजिक एकता, पारिवारिक स्थिति या परिस्थिति, धार्मिक व राजनैतिक पक्ष आदि आत्महत्या के कारण तत्वों के रूप में गिने जा सकते हैं।

इमाइल दुर्खीम का मत है कि आत्महत्या सामाजिक एकता की कमी को प्रदर्शित करती है। सामाजिक एकता का आशय सामूहिक चेतना का शक्तिशाली होना है तथा सामूहित चेतना, समाज या समूह के सदस्यों को समाज यां समूह के साथ एकरूपता स्थापित करने की प्रेरणा देती है। 

इस रूप में आत्महत्या सामाजिक एकता की स्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। दुर्खीम धर्म व परिवार को आत्महत्या रोकने की महत्वपूर्ण संस्था मानता है। इसी प्रकार राजनैतिक संगठन के सम्बन्ध में दुर्खीम कहता है कि राजनैतिक संगठन जितना अधिक शक्तिशाली होता है। उतनी ही कम आत्महत्याएँ होती हैं।

इमाइल दुर्खीम ने आत्महत्या का सिद्धान्त प्रतिपादित करने के पूर्व आत्महत्या से सम्बन्धित तथ्यों को एकत्रित किया तथा एकत्रित तथ्यों को विश्लेषण करके निम्नलिखित महत्वपूर्ण निष्कर्षो को प्राप्त किया। जैसे -

(1) आत्महत्या की संख्या जनसंख्यात्मक दृष्टि से प्रति वर्ष लगभग समान रहती है। 

(2) आत्महत्या की संख्या सर्दियों की अपेक्षा गर्मी में अधिक होती है।

(3) आत्महत्या तुलनात्मक रूप से स्त्रियों की अपेक्षा पुरुष अधिक करते हैं। 

(4) तुलनात्मक रूप में कम आयु सीमा में कम तथा अधिक आयु सीमा में अधिक आत्महत्याएँ होती हैं।

(5) ग्रामीण परिवेश में रहने वाले नगरीय परिवेश में रहने वालों की तुलना में आत्महत्या कम करते हैं।

(6) साम्रान्य जन की तुलना में सैनिक अधिक आत्महत्या करते हैं। 

(7) प्रोटेस्टेन्ट धर्मावलिम्बयों की तुलना में कैथोलिक, धर्मावलम्बियों में आत्महत्या कम होती है। 

(8) विवाहित व्यक्तियों में अविवाहित व्यक्ति व विधवा, विधुर, परित्यकता आदि की तुलना में कम आत्महत्याएँ पाई जाती हैं।

(9) बच्चे वाले व्यक्तियों की तुलना में गैर बच्चे वाले व्यक्ति, अर्थात् निसन्तान (जिनके जन्म नहीं होता या होकर मर जाते हैं) आत्महत्याएँ अधिक करते हैं ।

उपर्युक्त निष्कर्षो के तथ्य एक समान दृष्टि में भौगोलिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रतीत होते हैं। किन्तु जैसा कि दुर्खीम का कहना है कि यदि गम्भीरता एवं सूक्ष्मता से इनकी जाँच की जाए तो निष्कर्ष स्वरूप सामाजिक कारण ही मूलतः दिखाई देंगे। 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि आत्महत्या सामाजिक दशा का प्रतिफल है। इसी से यह एक सामाजिक तथ्य है तथा समाज अस्वस्थ प्रभाव का फल कहा जा सकता है।

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