बाजार के विभिन्न रूपों को समझाइए - baajaar ke vibhinn roopon ko samajhaie

 बाजार के रूप

बाजार का रूप अथवा बाजार का ढाँचा मुख्य रूप से प्रतियोगिता की मात्रा पर निर्भर करता है। प्रतियोगिता के आधार पर बाजार की मुख्य रूप से तीन स्थितियाँ होती हैं

(I) पूर्ण प्रतियोगिता,
(II) अपूर्ण प्रतियोगिता, 
(III) एकाधिकार। 

I. पूर्ण प्रतियोगिता  

पूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ एवं परिभाषाएँ -

अर्थशास्त्र के अन्तर्गत पूर्ण प्रतियोगिता से अभिप्राय, बाजार की उस स्थिति से है। जिसमें किसी वस्तु विशेष के अनेक क्रेता-विक्रेता उस वस्तु का क्रय-विक्रय स्वतंत्रतापूर्वक करते हैं तथा कोई एक क्रेता   अथवा विक्रेता वस्तु के मूल्य को प्रभावित करने में असमर्थ रहता है। 

पूर्ण प्रतियोगिता की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नांकित हैं -

बोल्डिंग के अनुसार - पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की वह स्थिति है, जिसमें प्रचुर संख्या में क्रेता और विक्रेता बिल्कुल एक ही प्रकार की वस्तु के क्रय-विक्रय में लगे होते हैं तथा जो एक-दूसरे के अत्यधिक निकट सम्पर्क में आकर आपस में स्वतंत्रतापूर्वक वस्तु का क्रय करते हैं।

श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के अनुसार, “पूर्ण प्रतियोगिता तब पायी जाती है, जब प्रत्येक उत्पादक के उत्पादन के लिए माँग पूर्णतया लोचदार होती है। इसका अर्थ यह है कि प्रथम, विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है जिससे किसी एक विक्रेता को उत्पादक का उत्पादन उस वस्तु के कुल उत्पादन का एक बहुत ही थोड़ा-सा भाग प्राप्त होता है तथा दूसरे सभी क्रेता प्रतियोगी विक्रेताओं के बीच चुनाव कराने की दृष्टि से समान होते हैं, जिससे कि बाजार पूर्ण हो जाता है। 

पूर्ण प्रतियोगिता की दशाएँ या विशेषताएँ 

पूर्ण प्रतियोगिता के बाजार के लिए निम्नलिखित दशाओं का होना अनिवार्य है

1. क्रेताओं एवं विक्रेताओं को बाजार में अधिक संख्या - पूर्ण प्रतियोगिता की सबसे पहली विशेषता यह है कि बाजार में क्रेताओं एवं विक्रेताओं की संख्या इतनी अधिक होनी चाहिए कि कोई भी क्रेता अथवा विक्रेता अकेले वस्तु की कीमत को प्रभावित करने की दशा में न हो। 

जब बाजार में बहुत से क्रेता और विक्रेता होते हैं, तो प्रत्येक विक्रेता कुल विक्रय मात्रा के इतने कम भाग का विक्रय करता है कि अपनी विक्रय मात्रा में वृद्धि या कमी करके वह वस्तु की कीमत में परिवर्तन नहीं कर सकता। 

इसी प्रकार व्यक्तिगत क्रेता वस्तु की कुल मात्रा का इतना कम भाग खरीदता है कि वह इसमें कमी या वृद्धि करके वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। 

2. वस्तुओं का समरूप होना – पूर्ण प्रतियोगिता की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि विभिन्न फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुओं में समरूपता का गुण होता है। उत्पादन में समरूपता इस अर्थ में होती है कि क्रेता के विचार से विभिन्न फर्मों की वस्तुएँ एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न होती हैं। 

उत्पादन में समरूपता होने के कारण विक्रेता बाजार में प्रचलित मूल्य से अधिक कीमत नहीं ले सकता, क्योंकि क्रेता दूसरे विक्रेता से वस्तुएँ खरीद लेंगे। इसलिए उत्पादित सभी इकाइयों के आकार, रंग, रूप, गुण आदि में कोई अन्तर नहीं होता है। 

3. फर्मों का स्वतंत्र प्रवेश तथा बहिर्गमन – पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत फर्मों को उद्योग में प्रवेश करने तथा उद्योग को छोड़ने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। फर्मों के उद्योग में प्रवेश करने से उद्योग में फर्मों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। 

अतः प्रत्येक फर्म कुल उत्पादन के एक बहुत थोड़े से भाग का उत्पादन करती है और ऐसी दशा में एक फर्म के उद्योग में प्रवेश करने या उद्योग को छोड़ने से आकार व वस्तु की कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। असामान्य लाभ की दशा में फर्में उद्योग में प्रवेश कर सकती हैं तथा हानि की दशा में फर्मों उद्योग से बहिर्गमन कर सकती हैं।

4. क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान – पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत क्रेताओं को इस बात की पूरी जानकारी रहती है कि कहाँ, कौन-सी वस्तु, किस मूल्य में मिल रही है। इसी प्रकार विक्रेताओं को भी इस बात की पूरी जानकारी रहती है कि कौन-सा विक्रेता, किस वस्तु को, किस मूल्य में बेच रहा है। ऐसी दशा में क्रेता एवं विक्रेता व्यक्तिगत रूप से वस्तु के मूल्य को प्रभावित नहीं कर पाता।

5. उत्पत्ति के साधनों में पूर्ण गतिशीलता – पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत उत्पत्ति के साधनों को एक व्यवसाय को छोड़कर दूसरे व्यवसाय में जाने की पूरी स्वतंत्रता रहती है। इसलिए उत्पत्ति के साधन पूर्णरूपेण गतिशील होते हैं। यही कारण है कि पूर्ण प्रतियोगिता में उत्पत्ति के साधनों का पारिश्रमिक उनकी सीमांत उत्पादकता के बराबर निश्चित होता है। 

6. विक्रय एवं परिवहन लागतों का अभाव – पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत सभी उत्पादक एवं क्रेता एक-दूसरे के इतने अधिक निकट होते हैं। कि इनमें विक्रय एवं परिवहन लागतों का अभाव पाया जाता है। 

विशुद्ध प्रतियोगिता

एडवर्ड हैस्टिंग्स चैम्बरलिन ने पूर्ण तथा विशुद्ध प्रतियोगिता में अन्तर किया है। किसी समय बाजार में ऐसी प्रतियोगिता हो सकती है जिसमें एकाधिकारिक तत्वों का अभाव हो, तब इस प्रतियोगिता को विशुद्ध प्रतियोगिता कहा जायेगा।

विशुद्ध प्रतियोगिता के लिए केवल तीन बातों का होना आवश्यक है

(i) क्रेताओं एवं विक्रेताओं की पर्याप्त संख्या का होना, जिससे वे स्वतंत्रतापूर्वक वस्तुओं का क्रय-विक्रय कर सकें। अर्थात् दोनों पक्षों के ऊपर किसी प्रकार का हस्तक्षेप न हो।

(ii) वस्तु का समरूप होना, अर्थात् जिस वस्तु का क्रय-विक्रय किया जा रहा है वह वस्तु गुण व आकार-प्रकार में समान होनी चाहिए, तथा

(iii) फर्मों के प्रवेश और बहिर्गमन की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। 

II. अपूर्ण प्रतियोगिता 

पूर्ण प्रतियोगिता एवं विशुद्ध एकाधिकार बाजार, व्यावहारिक जगत में नहीं पाये जाते। इसीलिए श्रीमती जॉन रॉबिन्सन ने वास्तविक जगत के लिए 'अपूर्ण प्रतियोगिता' तथा प्रो. चैम्बरलिन ने 'एकाधिकारी प्रतियोगिता' को स्वीकार किया है। अतः व्यवहार में अपूर्ण प्रतियोगिता को ही महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। क्योंकि पूर्ण प्रतियोगिता तथा विशुद्ध एकाधिकार की धारणाएँ पूर्णतया काल्पनिक हैं।

अपूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ एवं परिभाषाएँ

अपूर्ण प्रतियोगिता बाजार की ऐसी अवस्था को कहा जाता है कि जिसमें या तो क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या अधिक नहीं होती अथवा उनकी वस्तु एक रूप नहीं होती अथवा उन्हें बाजार का पूर्ण ज्ञान नहीं होता। ऐसी प्रत्येक दशा अपूर्ण प्रतियोगिता का जन्म हो जाता है। 

इन शर्तों के कारण अपूर्ण प्रतियोगिता में माँग वक्र पूर्णतया लोचदार नहीं हो पाता है। जैसा कि प्रो. लर्नर ने लिखा है कि अपूर्ण प्रतियोगिता तब पायी जाती है। जबकि एक विक्रेता अपनी वस्तु के लिए एक गिरती हुई माँग रेखा का सामना करता है। इस प्रकार अपूर्ण प्रतियोगिता, पूर्ण प्रतियोगिता एवं एकाधिकार के बीच की अवस्था को कहा जाता है ।

अपूर्ण प्रतियोगिता के कारण 

अपूर्ण प्रतियोगिता के जन्म के प्रमुख कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओं के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है-

1. अल्प संख्या में विक्रेता - अपूर्ण प्रतियोगिता के जन्म का प्रमुख कारण यह है कि बाजार में विक्रेताओं की संख्या सीमित होती है, जबकि पूर्ण प्रतियोगिता में बहुत बड़ी संख्या में क्रेता एवं विक्रेता होते हैं ।

2. वस्तु के गुण में अन्तर - अपूर्ण प्रतियोगिता वस्तु के गुण में अन्तर होने के कारण उत्पन्न होती है। विभिन्न उत्पादकों द्वारा उत्पादित एक ही प्रकार की वस्तुओं में काल्पनिक भिन्नता की जाती है। उत्पादक विभिन्न प्रकार के व्यापार चिन्हों और नामों का प्रयोग कर अन्तर करते हैं । अपूर्ण प्रतियोगिता के कारण

3. मूल्य में अन्तर - अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत एक समान गुण वाली वस्तुओं के मूल्य में प्राय: अन्तर पाया जाता है। विज्ञापन और प्रचार के द्वारा उत्पादक एवं विक्रेतागण अधिक से अधिक क्रेताओं को आकर्षित करके मूल्य में अन्तर करने में सफल हो जाते हैं। 

4. विज्ञापन – अपूर्ण प्रतियोगिता का एक मुख्य अंग विज्ञापन तथा प्रचार है। अधिक से अधिक लाभ की प्राप्ति के लिए उत्पादक और विक्रेता अपनी-अपनी वस्तुओं का विज्ञापन एवं प्रचार कर वस्तु की बिक्री में वृद्धि करते हैं। अपूर्ण प्रतियोगिता वाली संस्थाओं के द्वारा विज्ञापन पर भारी मात्रा में व्यय किया जाता है। 6. क्रेताओं की अज्ञानता।

5. परिवहन लागत - अपूर्ण प्रतियोगिता के उत्पन्न होने के कारणों में परिवहन लागत भी है। किसी वस्तु की अधिक परिवहन लागत होने से अन्य प्रतियोगी विक्रेता बाजार में नहीं आ पाते तथा विक्रेता उस क्षेत्र में एकाधिकार के समान स्थिति प्राप्त कर लेता है तथा ऊँची कीमतें वसूल करता है।

6. क्रेताओं की अज्ञानता – अपूर्ण प्रतियोगिता क्रेताओं की अज्ञानता के कारण भी उत्पन्न होती है। अपूर्ण प्रतियोगिता में विभिन्न विक्रेताओं द्वारा लगभग समान वस्तुओं के लिए अलग-अलग मूल्य वसूल किया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि क्रेताओं को इस बात का ज्ञान नहीं होता कि कोई वस्तु विभिन्न स्थानों पर किस मूल्य में बेची जा रही है। साथ ही उन्हें यह भी ज्ञान नहीं रहता कि यही वस्तु अन्य विक्रेता से सस्ती मिल सकती है।

अपूर्ण प्रतियोगिता के प्रकार 

अपूर्ण प्रतियोगिता मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं - 1.द्वयाधिकार 2. अल्पाधिकार 3. एकाधिकारिक प्रतियोगिता  

द्वयाधिकार 

द्वयाधिकार से आशय, बाजार की ऐसी स्थिति से होता है जिसमें केवल दो ही विक्रेता होते हैं। दोनों विक्रेताओं की वस्तु के एक ही रूप होते हैं और दोनों समान मूल्य-नीति का पालन करते हैं। यदि इनमें से कोई भी विक्रेता अपनी मूल्य-नीति में परिवर्तन करता है तो उसका प्रभाव दूसरे पर भी अवश्य पड़ता है। द्वयाधिकार बाजार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • यह एक ऐसी दशा का द्योतक है, जिसमें केवल दो ही उत्पादक होते हैं।
  • दोनों उत्पादक लगभग एक समान वस्तु का विक्रय करते हैं। 
  • दोनों ही अपने उत्पादन कार्य में स्वतंत्र होते हैं तथा दोनों की वस्तुएँ एक-दूसरे से प्रतियोगिता करती हैं।
  • दोनों के द्वारा प्रायः समान मूल्य-नीति का पालन किया जाता है।
  • एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नीति को ध्यान में रखना आवश्यक होता है।

अल्पाधिकार 

अल्पाधिकार बाजार की ऐसी अवस्था को कहा जाता है जिसमें किसी वस्तु के बहुत कम विक्रेता होते हैं और प्रत्येक विक्रेता पूर्ति एवं मूल्य पर समुचित प्रभाव रखता है। भारत के सन्दर्भ में लौहइस्पात उद्योग अल्पाधिकार के अन्तर्गत रखा जा सकता है। इस उद्योग में टाटा स्टील कम्पनी, हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड, मैसूर स्टील कम्पनी तथा बोकारो स्टील कम्पनी आदि शामिल हैं।

मेयर्स के अनुसार - अल्पाधिकार बाजार की उस अवस्था को कहते हैं, जहाँ विक्रेताओं की संख्या इतनी कम होती है कि प्रत्येक विक्रेता की पूर्ति का बाजार की कीमत पर प्रभाव पड़ता है तथा प्रत्येक विक्रेता इस बात को जानता है। 

श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के शब्दों में अल्पाधिकार, एकाधिकार एवं पूर्ण प्रतियोगिता की मध्यवर्ती स्थिति है, जिसमें विक्रेताओं की संख्या एक से अधिक होती है। लेकिन इतनी बड़ी नहीं कि बाजार कीमत पर किसी एक के प्रभाव को नगण्य बना दे।

अल्पाधिकार की विशेषताएँ अल्पाधिकार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. विक्रेताओं की संख्या का कम होना – अल्पाधिकार बाजार में विक्रेताओं की संख्या कम होती है, जिसके कारण- 

  • प्रत्येक विक्रेता का पूर्ति के एक बड़े भाग पर नियंत्रण रहता है, फलतः वस्तु की कीमत को प्रभावित कर सकता है।  
  • एक विक्रेता की क्रियाओं तथा नीतियों का प्रभाव दूसरे प्रतियोगी विक्रेताओं की कीमत व उत्पादन नीति पर पड़ता है।

2. माँग की अनिश्चितता - अल्पाधिकार प्रतियोगिता में फर्मों में आपसी निर्भरता होती है जिसके कारण फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग अनिश्चित रहती है । कोई भी फर्म वस्तु की माँग का सही-सही अनुमान नहीं लगा पाती है।

3. परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ - अल्पाधिकार बाजार की तीसरी विशेषता यह है कि फर्मों के बीच दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ कार्य करती हैं -

  • सहयोग की प्रवृत्ति तथा संयुक्त कार्यवाही की प्रवृत्ति, एवं 
  • संघर्ष व प्रतिद्वन्द्विता की प्रवृत्ति। इस प्रकार की प्रवृत्तियों से अल्पाधिकार में अनिश्चितता का वातावरण और भी बढ़ जाता है।

4. एकाधिकारी तत्व - अल्पाधिकार फर्म में एकाधिकार तत्व दिखायी देता है । अल्पाधिकार के अन्तर्गत, फर्मों के द्वारा विभेदीकृत वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक फर्म का वस्तु के उत्पादन तथा बाजार पर बहुत बड़ा अधिकार भी होता है। इसलिये प्रत्येक फर्म अपने क्षेत्र में एकाधिकारी जैसा कार्य करती है।

5. कीमत स्थिरता - कीमत में स्थिरता भी अल्पाधिकार की एक प्रमुख विशेषता है। कीमत स्थिरता से आशय, उस दशा से होता है जिसमें कीमत एक ही स्तर पर बनी रहती है, चाहे माँग व पूर्ति में कितना भी परिवर्तन क्यों न हो। 

6. फर्मों के प्रवेश व बहिर्गमन में कठिनाई - अल्पाधिकार की एक अन्य विशेषता यह भी है कि उद्योग में नई फर्मों का प्रवेश कठिन होता है, क्योंकि नई फर्म को स्थापित करने के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है तथा फर्मों की संख्या कम होती है। 

चूँकि अल्पाधिकारी फर्मों का कच्चे माल के स्रोतों पर अधिकार रहता है इसलिए अल्पाधिकार उद्योग में नई फर्मों का प्रवेश कठिन हो जाता है । इसी प्रकार से फर्मों का आकार बहुत बड़ा होने तथा बड़ी मात्रा में पूँजी का विनियोजन होने के कारण फर्मों का उद्योग से बहिर्गमन कठिन हो जाता है।

7. विज्ञापन एवं बिक्री को प्रोत्साहन - अल्पाधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक फर्म अपनी-अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए विज्ञापन, प्रचार आदि में बहुत अधिक व्यय करती है । फर्मों के द्वारा उत्पादित वस्तुओं में जितना अधिक अन्तर रहेगा, विज्ञापन व्यय भी उतना ही अधिक होगा ।

एकाधिकारिक प्रतियोगिता 

एकाधिकारिक प्रतियोगिता, अपूर्ण प्रतियोगिता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप है। एकाधिकारिक प्रतियोगिता का विचार सर्वप्रथम प्रो. चेम्बरलिन द्वारा प्रस्तुत किया गया था। उन्होंने इस बात को स्पष्ट किया कि व्यवसाय में न तो पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है और न ही विशुद्ध एकाधिकार, बल्कि इन दोनों के बीच की स्थिति पायी जाती है। 

प्रो. चेम्बरलिन के अनुसार - एकाधिकारिक प्रतियोगिता बाजार का वह रूप है, जिसमें बहुत सी फर्मों कार्य करती हैं और प्रत्येक फर्म मिली-जुली वस्तुएँ बेचा करती है। परन्तु उनके द्वारा बेची जाने वाली वस्तुएँ समरूप नहीं होती हैं। उनमें थोड़ा-बहुत भेद अवश्य पाया जाता है।

एकाधिकारिक प्रतियोगिता की विशेषताएँ 

एकाधिकारिक प्रतियोगिता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. विक्रेताओं की संख्या का अधिक होना - पूर्ण प्रतियोगिता के समान एकाधिकारिक प्रतियोगिता में भी विक्रेताओं की संख्या बहुत अधिक होती है। प्रत्येक विक्रेता अपनी-अपनी वस्तु को स्वतंत्रतापूर्वक बेचता रहता है परन्तु उत्पादन में विक्रेता अथवा उत्पादक का बहुत कम या थोड़ा-सा सहयोग होता है। यह सम्पूर्ण उत्पादन का बहुत थोड़ा-सा भाग बनाता है। उत्पादकों के बीच अपनी-अपनी वस्तु बेचने के लिए स्वतंत्र प्रतियोगिता भी होती है।

2. निकट स्थानापन्न - एकाधिकारिक प्रतियोगिता की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि विभिन्न फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ एक-दूसरे के निकट स्थानापन्न होती हैं। दूसरे शब्दों में, “एकाधिकारिक प्रतियोगिता में अनेक एकाधिकारी होते हैं, जो एक-दूसरे से प्रतियोगिता करते हैं। ये प्रतियोगिता फर्में, सादृश्य वस्तुएँ उत्पन्न नहीं करतीं और न ही सर्वथा भिन्न वस्तुएँ ही उत्पन्न करती हैं। 

3. उत्पादन - विभेद - एकाधिकारिक प्रतियोगिता की सबसे महत्वपूर्ण  विशेषता उत्पादन-विभेद है। विभिन्न फर्मे सादृश्य एवं निकट स्थानापन्न वस्तुएँ उत्पन्न करती हैं। उत्पादन - विभेद वास्तविक एवं काल्पनिक दोनों प्रकार का होता है । उत्पादन - विभिन्नता के प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं -

  • फर्मों के द्वारा उत्पादन - विभेद वस्तु की सामग्री के गुण में अन्तर कर दिया जाता है। वस्तु की बनावट, टिकाऊपन और मजबूती में अन्तर करके भी उत्पादन - विभेद किया जाता है।
  • ग्राहकों को दी जानी वाली सुविधाएँ - फर्में अपने ग्राहकों को विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ, जैसे - उधार की सुविधा, घर में वस्तुएँ पहुँचाने की सुविधाएँ, किसी वस्तु के पसन्द न आने पर वापस लेने की सुविधा आदि प्रदान कर उत्पादन - विभेद करती हैं।
  • विज्ञापन और प्रचार - विज्ञापन व प्रचार से किसी वस्तु की बिक्री बढ़ जाने पर उस फर्म की वस्तु अच्छी मानी जाती है और इसलिए वह फर्म अधिक मूल्य लेने में सफल हो जाती है।

4. फर्मों का स्वतंत्र प्रवेश व बहिर्गमन – एकाधिकारिक प्रतियोगिता की चौथी विशेषता यह है कि फर्मों को उद्योग में प्रवेश करने एवं उद्योग छोड़ने में कोई कठिनाई नहीं होती, क्योंकि फर्मों का आकार छोटा होता है एवं उत्पादन करने में विशेष पूँजी की आवश्यकता नहीं होती।

5. प्रत्येक फर्म कीमत निर्धारक होती है - एकाधिकारिक प्रतियोगिता की प्रत्येक फर्म स्वतंत्र कीमत-नीति अपना सकती है । प्रत्येक फर्म अपनी वस्तु की अपनी इच्छानुसार कीमत निर्धारित करती है ।

6. गैर-मूल्य प्रतियोगिता - एकाधिकारिक प्रतियोगिता की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसमें गैर-मूल्य प्रतियोगिता पायी जाती है। सभी फर्में अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए विभिन्न उपायों को अपनाती हैं; जैसे – मुफ्त मरम्मत की गारंटी, बिक्री के पश्चात् एक निश्चित समय तक मुफ्त सेवा, खरीदने पर मुफ्त उपहार तथा निश्चित क्रय करने पर विशेष छूट आदि।

 III. एकाधिकार

एकाधिकार का अर्थ एवं परिभाषाएँ

एकाधिकार शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों 'Monos' तथा 'Polus' से बना है। Monos का अर्थ होता है एक या अकेला और Polus का अर्थ होता है विक्रेता। इस प्रकार, Monopoly शब्द का अर्थ हुआ एक अकेला विक्रेता या एक ही बेचने वाला।

इस प्रकार, एकाधिकार बाजार की वह स्थिति है जिसमें एक वस्तु का एक ही विक्रेता होता है। बाजार में वस्तु की पूर्ति पर उसका पूरा नियंत्रण होता है। वस्तु के कोई निकट स्थानापन्न वस्तुएँ बाजार में उपलब्ध नहीं होती हैं। 

अतः एकाधिकारी द्वारा उत्पादित वस्तु एवं अन्य वस्तुओं के बीच माँग की आड़ी लोच अत्यन्त कम होती है। चूँकि एकाधिकारी का अपनी वस्तु की पूर्ति पर पूर्ण नियंत्रण होता है, अतः वह अपने उत्पादित वस्तु के लिए कीमत स्वयं ही निर्धारित करता है। एकाधिकारी वस्तु की कीमत और उत्पादन की मात्रा दोनों एक साथ निश्चित नहीं कर सकता। वह दोनों में से कोई एक बात कर सकता है।

एकाधिकार की प्रमुख परिभाषाएँ

1. प्रो. लर्नर के अनुसार - एकाधिकारी का अभिप्राय उस विक्रेता से है, जिसकी वस्तु के लिए माँग का वक्र गिरती हुई रेखा के रूप में होता है। 

2. प्रो. टॉमस के शब्दों में विस्तृत अर्थ में एकाधिकार शब्द वस्तुओं या सेवाओं के किसी भी प्रभावपूर्ण कीमत नियंत्रण को व्यक्त करता है। चाहे वह माँग का हो अथवा पूर्ति का, लेकिन संकुचित अर्थ में, इसका प्रयोग उत्पादकों तथा विक्रेताओं के एक ऐसे संघ से होता है, जो कि वस्तुओं तथा सेवाओं की पूर्ति कीमत पर नियंत्रण रखता है।

प्रो. बोल्डिंग के अनुसार - विशुद्ध एकाधिकार एक ऐसी फर्म होती है, जो किसी ऐसी वस्तु का उत्पादन करती है, जिसका अन्य फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुओं में कोई प्रभावपूर्ण स्थानापन्न नहीं होता ।”3

एकाधिकार की विशेषताएँ 

एकाधिकार बाजार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. एक ही निर्माता या विक्रेता – एकाधिकार बाजार में वस्तु विशेष का एक ही निर्माता या विक्रेता होता है। वस्तु के क्रेता अधिक संख्या में होते हैं ।

2. पूर्ति पर नियंत्रण - एकाधिकारी जिस वस्तु का निर्माता होता है, उसकी पूर्ति पर पूर्ण नियंत्रण रहता है ।

3. निकट स्थानापन्न वस्तु नहीं - एकाधिकारी का वस्तु पर एकाधिकार होता है। उसकी बाजार में कोई निकट स्थानापन्न वस्तु नहीं होती है।

4. कीमत पर नियंत्रण - एकाधिकारी का वस्तु की कीमत पर पूर्ण नियंत्रण रहता है । वह वस्तु की कीमत स्वयं तय करता है। वह जब चाहे तब वस्तु की कीमत में परिवर्तन करता रहता है।

5. नई फर्मों का प्रवेश नहीं – एकाधिकार बाजार में कोई नई फर्म प्रवेश नहीं कर सकती । इसलिए बाजार में केवल एक ही फर्म रहती है।

6. कीमत - विभेद - एकाधिकार कुछ दशाओं में अपनी वस्तु को अलग-अलग व्यक्तियों को, अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग कीमतों पर बेच सकता है। 

7. माँग की लोच शून्य - एकाधिकारी वस्तु की माँग की लोच शून्य रहती है।

8. कोई भी फर्म या संस्था - एकाधिकारी व्यक्ति, फर्म, फर्म समूह, सरकारी विभाग या सरकार कोई भी हो सकता है।

9. फर्म या उद्योग एक ही - एकाधिकार में फर्म या उद्योग का एक ही अर्थ होता है । जब हम फर्म के साम्य की व्याख्या करते हैं, तो यह व्याख्या उद्योग के लिए भी लागू हो जाती है।

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