भारत में मुद्रा प्रसार के कारण - bhaarat mein mudra prasaar ke kaaran

 भारत में मुद्रा प्रसार के कारण

भारत में कीमत वृद्धि के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. जनसंख्या में वृद्धि - सन् 1951 में देश की जनसंख्या 36 1 करोड़ थी, जो बढ़कर सन् 2011 तक लगभग 121 करोड़ पहुँच चुकी है। जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई, जिससे मूल्यों में वृद्धि हुई।

2. घाटे की वित्त व्यवस्था - पिछले कुछ दशकों में भारत में विकासात्मक व गैर-विकासात्मक व्ययों को पूरा करने के लिए घाटे की वित्त व्यवस्था का उपयोग बड़ी मात्रा में किया गया है, जैसे- प्रथम योजना में 396 करोड़ रुपये की वित्त व्यवस्था की गई थी, जो ग्यारहवीं योजना में बढ़कर 4,00,996 करोड़ रुपये से भी अधिक हो गई है। घाटे की वित्त व्यवस्था से तात्पर्य है कि बजट के घाटे की प्राप्ति के लिए नोटों को छापकर पूर्ति करना है। इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा बढ़ जाती है, फलतः मूल्य-स्तर में वृद्धि हो जाती है ।

3. कृषि उत्पादन में कमी - भारत एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु यहाँ कृत्रिम सिंचाई साधनों का अभाव है। आज भी कृषि मानसून पर निर्भर है, मानसून के असफ़ल होने से कृषि उत्पादन में कमी होती है और मूल्यों में वृद्धि की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

4. प्रशासनिक व्ययों में वृद्धि - सरकार का प्रशासनिक व्यय सन् 1950-51 में कुल 900 करोड़ रुपये था, जो सन्  2009-10 में बढ़कर लगभग 29,35,72,817 करोड़ रुपये हो गया। प्रशासनिक व्यय में वृद्धि से मौद्रिक आय में वृद्धि होती है और मूल्य वृद्धि को प्रोत्साहन मिलता है।

5. मजदूरी एवं भत्ते में वृद्धि - मूल्य वृद्धि के कारण मजदूरी एवं सरकारी भत्तों में वृद्धि की गयी, जिससे मूल्य वृद्धि को और प्रोत्साहन मिला।

6. काला धन व संग्रह प्रवृत्ति - देश में काले धन एवं संचय की प्रवृत्ति ने चोरबाजारी, मुनाफाखोरी, सट्टेबाजी आदि प्रवृत्तियों को बढ़ाया है जिससे अनावश्यक एवं कृत्रिम मूल्य वृद्धि को प्रोत्साहन मिलता है।

7. शहरीकरण में वृद्धि - जनसंख्या में वृद्धि से शहरीकरण में निरन्तर वृद्धि हुई। लोगों के रहन-सहन के स्तर में वृद्धि हुई, जिससे विलासिता एवं आरामदायक वस्तुओं की माँग बढ़ी। विलासिता एवं आरामदायक वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हुई इसमें पूँजी विनियोजन की मात्रा बढ़ी। इसके विपरीत अनिवार्य वस्तुओं के उत्पादन हेतु कम विनियोग होने से इन वस्तुओं की पूर्ति कम हुई, जिससे मूल्य वृद्धि को प्रोत्साहन मिला।

8. मुद्रा पूर्ति में वृद्धि - मूल्य वृद्धि का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि है । विगत 50 वर्षों में 34 गुने से भी अधिक मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि हुई, जिस अनुपात में मुद्रा पूर्ति में वृद्धि हुई है उस अनुपात में उत्पादन नहीं बढ़ा है, जिससे कीमतों में वृद्धि हुई है।

9. औद्योगिक उत्पादन में कमी - विभिन्न योजनाओं में औद्योगिक उत्पादन दर का जो लक्ष्य निर्धारित किया गया उसे प्राप्त करने में सरकार असफल रही। औद्योगिक उत्पादन में लक्षित वृद्धि न होने से भी मूल्यों में वृद्धि हुई।

10. पूर्ति सम्बन्धी कारण - सामान्य मूल्य का यह सिद्धान्त है कि जिस अनुपात में माँग में वृद्धि हो रही है, यदि उसी अनुपात में वस्तुओं की पूर्ति में वृद्धि कर दी जाये तो कीमतों में वृद्धि नहीं होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश विभिन्न योजनाओं में कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में माँग के अनुरूप वस्तुओं की पूर्ति बढ़ायी नहीं जा सकी जिससे कीमतों में वृद्धि हुई। 

11. बैंक दर में वृद्धि - बैंक दर में वृद्धि होने से उत्पत्ति के साधनों की माँग बढ़ती है। साधनों की माँग में वृद्धि से उनकी मौद्रिक आय बढ़ती है, जिससे कीमतों में वृद्धि हुई।

12. आयातित वस्तुओं की उच्च कीमत - विदेशों से आयातित वस्तुएँ; जैसे- पेट्रोलियम पदार्थ, रासायनिक उत्पाद व खाद के मूल्यों में वृद्धि के कारण देश में मूल्य वृद्धि को प्रोत्साहन मिला।

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