भारत में मुद्रा प्रसार के प्रभाव -bhaarat mein mudra prasaar ke prabhaav

Post Date : 28 July 2022

भारत में मुद्रा प्रसार के प्रभाव 

भारतीय अर्थव्यवस्था में कीमत वृद्धि का निम्नांकित प्रभाव पड़ा है - 

1. बचत एवं पूँजी - निर्माण की दरों में कमी-तीव्र गति से मूल्य वृद्धि होने के कारण जन-साधारण की बचत करने की क्षमता कम हो जाती है। परिणामस्वरूप बचत की दरें भी कम हो जाती हैं, जिसके कारण पूँजी निर्माण की दरें कम हो जाती हैं।

2. क्रय-शक्ति में कमी - वस्तुओं में मूल्य वृद्धि जनता की क्रय-शक्ति को कम कर देती है, जिससे उसको अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में कठिनाई होती है। परिणामस्वरूप उसकी कार्यक्षमता एवं उत्पादकता कम हो जाती है। 

3. विनियोगों पर विपरीत प्रभाव - मूल्य वृद्धि से विनियोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। विनियोगों की वास्तविक राशि कम हो जार्ती है। सरकार को विनियोग करने में देरी होती है। उत्पादन कार्यों में विनियोग होने के स्थान पर सट्टे के कार्यों में विनियोग होने लगता है।

4. विदेशी व्यापार में असन्तुलन - मूल्य वृद्धि से विदेशी व्यापार असन्तुलित हो जाता है। मूल्य वृद्धि के कारण से निर्यात होने वाली वस्तुओं की लागत बढ़ने के कारण उनके मूल्य भी बढ़ जाते हैं, जिससे वस्तुएँ विश्वव्यापी प्रतियोगिता में नहीं बिक पाती है। वहीं दूसरी ओर आयातित वस्तुएँ देशी वस्तुओं की तुलना में सस्ती पड़ती है, जिससे उनके आयात बढ़ जाते हैं। 

इस प्रकार, निर्यात कम व आयात अधिक होने से विदेशी व्यापार असन्तुलित हो जाता है। मूल्य वृद्धि के परिणाम बचत एवं पूँजी निर्माण की दरों में कमी, 

5. सामाजिक एवं राजनीतिक अस्थिरता - अत्यधिक मूल्य वृद्धि समाज में अशान्ति एवं राजनीतिक अस्थिरता को जन्म देती है, जिससे आर्थिक नियोजन एवं विकास की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हो जाती है।

6. आय तथा भार में असमानताएं - उद्योगपतियों, व्यापारियों तथा मध्यस्थों को बढ़ते हुए मूल्यों से लाभ रहता है। एक ओर तो उनके स्टॉक का मूल्य बढ़ जाता है, दूसरी ओर वे अपने माल का मूल्य सामान्य मूल्य वृद्धि से अधिक बढ़ा देते हैं, लेकिन इसके विपरीत वेतनभोगी एवं श्रमिक वर्ग पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। उनकी वास्तविक आय कम हो कम व गरीबों पर विकास का भार अधिक जाती है। वे विकास के लाभों से वंचित रह जाते हैं। धनवान लोगों पर विकास का भार पड़ता है।

7. आन्तरिक व्यापार - एक क्षेत्र की वस्तुओं में मूल्य वृद्धि दूसरे क्षेत्र की वस्तुओं में स्वतः ही मूल्य वृद्धि कर देती है। सामान्यतया जब कृषि मूल्य बढ़ते हैं तो अन्य वस्तुओं के मूल्य स्वतः ही बढ़ जाते हैं।