भारत में सामाजिक परिवर्तन - bhaarat mein saamaajik parivartan

परिवर्तन प्रकृति का नियम है जो निरन्तर समाज और सामाजिक जीवन में किसी न किसी रूप में निरन्तर होता रहता है परिवर्तन के परिणामस्वरूप समाज में नवीनता आती है इसलिए यह कहा जाता है कि परिवर्तन पूर्ण की अवस्था या अस्तित्व में उपस्थित होने वाला अन्तर परिवर्तन है। 

भारत में सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति एवं अपराध का वर्णन कीजिए।

आज और कल के मध्य जो तुलनात्मक अन्तर होता है वह परिवर्तन कहा जाता है। परिवर्तन की गति कभी मंद होती है और कभी तीव्र होती है। अतः स्पष्ट है कि परिवर्तन सर्वव्यापी प्राकृतिक नियमानुसार मानव निर्मित समाज और सामाजिक संरचना में भी होता रहता है। 

भारत में सामाजिक परिवर्तन - bhaarat mein saamaajik parivartan

यदि हम समाज के सामाजिक आदर्श प्रतिमान, रीति-रिवाज, प्रथाओं, परम्पराओं और सामाजिक संरचना की तुलना आज से एक दशक पूर्व की सामाजिक संरचना और उसके अन्तर्गत पाए जाने वाले आदर्श प्रतिमान, रीति-रिवाज तथा प्रथाएँ परम्पराओं से करें तो अत्यधिक अंतर दृष्टिगोचर होगा। समाज सदैव गतिशील रहता है और इसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है।

भारतीय समाज पर यदि हम दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि आदिकाल से लेकर आज तक सामाजिक संरचना, सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक जीवन के ढंगों तथा समाज के व्यवहार प्रतिमानों में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है। यह परिवर्तन की प्रकृति उद्विकास के रूप में प्रगति के रूप में दिखलाई देती है। 

इसके साथ-साथ भारतीय समाज में होने वाले सांस्कृतिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप चक्रीय सामाजिक परिवर्तन भी होता रहा है। सामाजिक गतिशीलता और आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण संस्कृतिकरण आदि के परिणामस्वरूप भी भारतीय समाज में व्यापक सामाजिक परिवर्तन हुआ है। 

यह सामाजिक परिव समाज के किसी एक पक्ष में नहीं बल्कि समाज और सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष में परिवर्तन हुआ है। यदि वर्तमान से और पूर्व की आज हम तुलना करें तो स्पष्ट होता है कि समाज और सामाजिक जीवन का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसमें कि परिवर्तन न हुआ हो।

यद्यपि भारतीय समाज में जो परिवर्तन हुए हैं वे प्राकृतिक नियमानुसार हुए हों अथवा योजनाबद्ध ढंग से समाज और सामाजिक जीवन में परिवर्तन लाने का प्रयास किया गया हो। यह स्पष्ट है कि किसी भी कारण से समाज में जो परिवर्तन योजनाबद्ध ढंग से किए गए वह समाज की भलाई के उद्देश्य से किए जाते रहे हैं। 

चाहे ग्रामीण विकास, समन्वित विकास कार्यक्रम के द्वारा किया गया हो अथवा औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया द्वारा किया गया हो। ये सभी परिवर्तन समाज की भलाई के लिए, विकास के लिए, उन्नति के लिए, सामाजिक प्रगति के लिए और मानव के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर परिवर्तन किए जाते रहे हैं। 

इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर समाज के पथ पर अग्रसर हुआ है। समाज ने अत्यधिक उन्नति की है और निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर है। किन्तु इसके साथ ही साथ समाज में अनेक व्याधिकीय स्थितियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। 

जिनके परिणामस्वरूप समाज में अपराधिकता बढ़ी है अतएव सामाजिक परिवर्तन को भारत में अपराध के एक कारक के रूप में भी देखा और समझा जाता है। भारतीय समाज के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तन के सम्बन्ध में और इन परिवर्तनों के फलस्वरूप अपराध और अपराधी व्यवहार को हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं -

1. भारतीय सामाजिक जीवन में परिवर्तन और अपराध

वर्तमान युग में भारतीय समाज के सामाजिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। जिससे कि समाज के सामाजिक मूल्यों, प्रतिमानों, आदर्शों और सामाजिक नियमों में परिवर्तन परिलक्षित होता है। प्राचीन समाज की परिवारिक व्यवस्था, जो संयुक्त परिवार के रूप में पाई जाती थी वह आज प्रायः समाप्त हो गई है और उसके स्थान पर एकाकी परिवार का उदय हुआ जिसके फलस्वरूप आज परिवार टूट रहे हैं। 

विघटित हो रहे हैं। परिवार के बच्चों की उचित देखरेख नहीं हो पा रही है जिससे वे अपराध की ओर अग्रसर हो जाते हैं और अपराधी बनते हैं। इसी प्रकार जाति प्रथा में परिवर्तन हुआ जिससे जातीय नियंत्रण समाप्त हो गया और वैवाहिक सम्बन्ध की मान्यताओं में परिवर्तन हुआ जिससे प्रेम विवाह, विधवा पुनर्विवाह आदि प्रचलित हुए, इससे यौन सम्बन्धी अपराधों में वृद्धि हुई है। 

प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर लैंगिक अपराधों में बढ़ावा देने का कार्य विशेष विवाह अधिनियम 1955 में किया है। आज जितनी जल्दी प्रेम विवाह होता है उतनी ही जल्दी उनका तलाक भी होता है। इस प्रकार समाज के सदस्यों में जो प्राचीन सामाजिक संबंध पाए जाते रहे हैं । 

बड़ों का आदर सम्मान लोगों के आपसी मित्रवत् और घनिष्ठ सम्बन्ध या एक-दूसरे के प्रति आदर सम्मान की भावना आदि जो समाज का व्यवहार प्रतिमान पाया जाता था वह व्यवहार प्रतिमान पर नवीन सामाजिक व्यवहार प्रतिमान का उदय हुआ जिसका मेल पुराने व्यवहार प्रतिमान के साथ नहीं हो रहा है। 

फलस्वरूप समाज में सामाजिक विकृति उत्पन्न हुई है और यह विकृति समाज में अनेक प्रकार के व्यक्ति के विरुद्ध अपराध को बढ़ावा दिया है।

2. भारतीय आर्थिक जीवन में परिवर्तन और अपराध

भारतीय समाज के आर्थिक जीवन में भी नवीन आविष्कारों के परिणामस्वरूप प्रौद्योगिकी उन्नति तथा औद्योगीकरण, नगरीकरण, आधुनिकीकरण आदि के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर अत्यधिक आर्थिक उन्नति हुई है वहाँ दूसरी ओर अत्यधिक व्यापक पैमाने पर आर्थिक अपराध भी बढ़े हैं क्योंकि संपत्ति के कारण अत्यधिक गंभीर अपराध होते रहे हैं। 

प्राचीन भारत की यह एक प्रसिद्ध कहावत है जो यथार्थ प्रतीत होती है कि झगड़े के तीन प्रमुख कारक-जर, जोरू और जमीन है। आर्थिक जीवन में आज जो भारतीय समाज में अत्यधिक परिवर्तन हुआ उस परिवर्तन ने मानव को अत्यधिक अपराधी व्यवहार की ओर अग्रसर कर दिया है। 

पूँजीवाद के विकास के कारण आज हर व्यक्ति अधिक-सेअधिक धनाढ्य होने के चिन्तन में लीन है। समाज में धन प्रतिष्ठा का द्योतक बन चुका है और व्यक्ति येन केन प्रकारेण धन और सम्पत्ति के अर्जन में लगा है। यदि उसे इसके लिए सही मार्ग नहीं मिल पाता तो वह गलत रास्ते से अवैधानिक तरीके से समाज के विरुद्ध कार्य और व्यवहार करके भी धन कमाने की चेष्टा करता है। 

जिससे समाज में चोरी, डकैती, आगजनी, लूटमार, हत्या, बलात्कार, राहजनी, धोखाधड़ी, जालसाजी मादक द्रव वस्तुओं का अवैधानिक व्यापार और तस्करी आदि प्रकार के अपराधों को अत्यधिक बढ़ावा मिला है। इससे स्पष्ट होता है कि सरल और सादे जीवन से उच्च और सम्पन्नतापूर्ण जीवन यापन तक पहुँचने की आर्थिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के अपराधी कृत्यों और अपराधी व्यवहारों को भी बढ़ावा मिला है। 

निर्धनता, बेरोजगारी, महँगाई भी पूँजीवाद के विकास के साथ-साथ भारत में बढ़ी है। निर्धनता और बेरोजगारी की मार से त्रस्त व्यक्ति के सामने आज पोषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है तो व्यक्ति मजबूरन अपराधी कृत्य और व्यवहारों में संलग्न हो जाता है इससे भी समाज में अपराध को बढ़ावा मिलता है । 

3. भारतीय राजनीतिक जीवन में परिवर्तन और अपराध

स्वतंत्र भारत के पूर्व भारतीयों के पास गुलामी की जंजीरें थीं जिससे कि उसमें हीन भावना थी किन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् इनमें नव चेतना जाग्रत हुई, जिससे नवीन राजनीतिक आदर्श और प्रतिमान की स्थापना की गई और प्रजातंत्र के आधार पर राजनीतिक दलों का विकास हुआ। 

इन राजनीतिक दलों में देश के विकास की भावना के साथ-साथ स्वार्थमयी प्रकृति का भी विकास हुआ जिससे राजनीति के क्षेत्र में अपराधीकरण की प्रक्रिया को बल मिला और राजनीतिक दृष्टि से अनेक राजनेताओं के द्वारा अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अपराधी गिरोह तक को आज सहयोग देते हैं। 

वर्तमान भारत में वोट की राजनीति के कारण राजनीतिक दलों द्वारा अपने-अपने वोट बैंक को संरक्षण प्रदान करने के लिए अपराधी कृत्य तक को बढ़ावा देते हैं। आज जो समाज में सफेदपोश अपराध, संगठित अपराध, आतंकवाद अत्यधिक देश में व्याप्त है उसमें राजनीतिक नेताओं का भी गुप्त रूप से सहयोग पाया जाता है। 

अधिकांश प्रांतीय सरकारों में अपराधीकृत्य करने वाले और अपराध को बढ़ावा देने वाले अनेक राजनीतिक पदों पर तथा शासकीय-अशासकीय पदों पर कार्यरत हैं। भारत के विभिन्न दलों के बीच आज इस प्रकार की प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती है कि एक-दूसरे को अपराधी करार देते हैं और साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भाषावाद के आधार पर विभिन्न प्रकार के अपराध किए और कराये जाते हैं। 

4. धार्मिक जीवन में परिवर्तन और अपराध

भारतीय धार्मिक जीवन में परिवर्तन के साथ-साथ धर्म की आड़ में किए जाने वाले अपराधों में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। वास्तव में वैज्ञानिक उन्नति के कारण धर्म का स्थान आज विज्ञान लेता जा रहा है इसलिए धर्म के प्रति लोगों को आस्था और विश्वास में कमी आई है। इसके साथ ही साथ शिक्षा के व्यापक प्रचार, प्रसार और सुधार के कारण लोगों में जो धार्मिक अंधविश्वास था उस धारण में परिवर्तन हुआ। 

बाह्य आडम्बर की धारणा का आज लोप होता जा रहा है इस प्रकार एक ओर तो भारत में धार्मिक सद्भावना, सर्वधर्म समभाव की बात कही जाती है तो दूसरी ओर आए दिन धर्म के आधार पर मार-काट, झगड़े-फसाद, लूट-खसोट आदि किए जा रहे हैं। धार्मिक उन्माद फैलाया जाता है। 

इसके साथ ही साथ मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघरों में जो देवी-देवताओं और भगवान के स्थल माने जाते हैं आज अपराधियों के संरक्षण के स्थल बनते जा रहे हैं और अपराधी व्यवहार करने वाले इन धर्म स्थलों को भी नहीं छोड़ते उनमें भी अपराधी कृत्य किए जाते हैं। यहाँ तक कि मंदिरों के पुजारी, मठ के मठाधीश आदि के द्वारा भी व्यक्ति के विरुद्ध अपराध और सम्पत्ति के अपराध किए और कराये जाते हैं।

5. भारत में शैक्षणिक जीवन में परिवर्तन और अपराध

भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में योजनाबद्ध ढंग से व्यापक परिवर्तन किया गया है। निरक्षरता को तो पूर्णतः समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही साथ प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में तकनीकी ज्ञान प्राप्त करने वालों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। 

इससे एक ओर जहाँ देश की शैक्षिक उन्नति हुई है, समाज का शैक्षिक विकास हुआ है वहाँ दूसरी ओर शिक्षित बेरोजगारी अत्यधिक बढ़ी है और व्यावसायिक शिक्षा के विकास के बावजूद भी शिक्षित लोगों को न तो उनके ज्ञान के आधार पर नौकरी मिलती है और न ही वे इतने साधन सम्पन्न हैं कि स्वयं का कार्य और व्यवसाय कर सकें। 

इस बेरोजगारी के परिणामस्वरूप लोगों में ग्लानि, कुंठा घर कर जाती है और वे अपने ज्ञान का प्रयोग सृजनात्मक कार्यों की ओर न लगाकर विध्वंसात्मक या अपराधी कृत्य की ओर उपयोग करते हैं। जिससे भी अपराध को बढ़ावा मिलता है । 

आज भारतीय समाज में अनेक छोटे बड़े अपराधी गैंग के संचालक या शातिर बदमाश उच्च शिक्षित व्यक्ति हैं। उदाहरण स्वरूप उच्च शिक्षा प्राप्त उच्च शैक्षणिक संस्था में कार्यरत प्राध्यापक के द्वारा प्राचार्य की हत्या थोड़े-से धन के कारण कर दी गई है जिसके सम्बन्ध में कभी सोचा भी नहीं जा सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शैक्षणिक क्षेत्र में भी विकास रूपी परिवर्तन के साथ-साथ भारत में अपराधी कृत्यों को भी बढ़ावा मिला ।

6. भारतीय समाज में कुछ अन्य परिवर्तन और अपराध

भारतीय समाज और सामाजिक जीवन के कुछ अन्य पक्षों में भी व्यापक परिवर्तन हुए हैं और इन परिवर्तनों के साथ-साथ अपराधी कृत्यों को भी अत्यधिक बढ़ावा मिला है। 

जैसे सांस्कृतिक पक्षों में परिवर्तन, परिवहन के संचार और साधनों में परिवर्तन, स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन, नगरों का विकास, जनजातीय जीवन का विकास, दलित वर्ग का उत्थान और विकास आदि । इस प्रकार इन क्षेत्रों में जहाँ एक ओर परिवर्तन परिलक्षित होता है वहाँ दूसरी ओर अपराधी कृत्यों को भी अत्यधिक बढ़ावा मिला है। 

आज दुपहिया और चार पहिया वाहनों का उपयोग केवल आवागमन के सुख के लिए ही नहीं किया जाता बल्कि अपराधी कृत्यों के लिए भी इनका उपयोग किया जाता है। गुण्डे, बदमाश, मारपीट करने वाले चोर, लुटेरे और अपराधी गिरोहों के लिए ये वाहन भागने के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं। 

बैंक डकैती, हत्या, लूट आदि में इनका प्रयोग किया जाता है। संदेशवाहन के द्वारा भी अपराधी कृत्यों को अंजाम दिया जाता है। आजकल सेलुलर फोन मोबाइल और दूरभाष से संगठित अपराधी वर्ग के लोग और सफेदपोश अपराधी आपस में बातचीत करके अपराधीकृत्य की योजना बनाते हैं और उसे क्रियान्वित करके अपराध को बढ़ावा देते हैं। 

जब महिलाओं का स्तर पुरुषों के समान नहीं था और न उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त थे तब महिला अपराध और महिलाओं के विरुद्ध अपराध बहुत कम हुआ करते थे किन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में महिलाओं की स्थिति में व्यापक परिवर्तन हुआ और प्रत्येक दृष्टि से पुरुषों के समान उन्हें अधिकार प्राप्त हो गए। 

ऐसी स्थिति में महिला और पुरुषों के बीच अपने-अपने अहं को लेकर तनाव होता रहता है और यह तनाव जब चरम सीमा पर पहुँच जाता है तो आत्महत्या को बढ़ावा मिलता है। आए दिन आज समाचार-पत्रों में महिला अपराध की घटनाएँ पढ़ने को मिलती हैं। 

महिलाएँ अपराधी क्षेत्र में भी आज अत्यधिक कार्यरत हैं। चोरी, बलात्कार, तस्करी, वेश्यावृत्ति, यहाँ तक कि डकैती के क्षेत्रों में भी कार्यरत हैं। दस्यु सुंदरी फूलन देवी का नाम जगजाहिर है जो राजनीतिक पद पर प्रतिष्ठित थी।

वर्तमान भारत में आधुनिकीकरण, पाश्चात्यीकरण, लौकिकीकरण, औद्योगीकरण, व्यापारीकरण आदि के परिणामस्वरूप भी अत्यधिक परिवर्तन हुआ है और इस परिवर्तन के कारण अनेक प्रकार की सामाजिक समस्याएँ जैसे आवास की समस्या, गंदी बस्ती की समस्या, बेरोजगारी, निर्धनता, युवा आक्रोश, भिक्षावृत्ति, मद्यपान, वेश्यावृत्ति, सामुदायिक विघटन, वैत्तिक विघटन, पारिवारिक विघटन आदि में अत्यधिक वृद्धि हुई है। 

इन समस्याओं की वृद्धि के कारण इनके दुष्प्रभाव के परिणामस्वरूप अपराध, बाल अपराध, महिला अपराध आदि में भी निरन्तर वृद्धि हुई है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में सामाजिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर सामाजिक विकास और सामाजिक प्रगति हुई है जहाँ दूसरी ओर समाज में अपराध और अपराधी कृत्यों को भी बढ़ावा मिला है। 

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